RBSE Class 8 Hindi रचना निबन्ध-लेखन

Rajasthan Board RBSE Class 8 Hindi रचना निबन्ध-लेखन

RBSE Solutions for Class 8 Hindi

1. स्वच्छ भारत अभियान स्वच्छता क्या है?
निरंतर प्रयोग में आने पर या वातावरण के प्रभाव से वस्तु या स्थान मलिन होता रहता है। धूल, पानी, धूप, कूड़ा-करकट की पर्त को साफ करना, धोना, मैल और गंदगी को हटाना ही स्वच्छता कही जाती है। अपने शरीर, वस्त्रों, घरों, गलियों, नालियों, यहाँ तक कि अपने मोहल्लों और नगरों को स्वच्छ रखना हम सभी का दायित्व है।

स्वच्छता के प्रकार:
स्वच्छता को मोटे रूप में दो प्रकार से देखा जा सकता है- व्यक्तिगत स्वच्छता और सार्वजनिक स्वच्छता। व्यक्तिगत स्वच्छता में अपने शरीर को स्नान आदि से स्वच्छ बनाना, घरों में झाडू-पोंछा लगाना, स्नानगृह तथा शौचालय को विसंक्रामक पदार्थों द्वारा स्वच्छ रखना। घर और घर के सामने से बहने वाली नालियों की सफाई, ये सभी व्यक्तिगत स्वच्छता के अंतर्गत आते हैं। सार्वजनिक स्वच्छता में मोहल्ले और नगर की स्वच्छता आती है जो प्रायः नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों पर निर्भर रहती है। सार्वजनिक स्वच्छता भी व्यक्तिगत सहयोग के बिना पूर्ण नहीं हो सकती।

स्वच्छता के लाभ –
‘कहा गया है कि स्वच्छता ईश्वर को भी प्रिय है।’ ईश्वर का कृपापात्र बनने की दृष्टि से ही नहीं अपितु अपने मानव जीवन को सुखी, सुरक्षित और तनावमुक्त बनाए रखने के लिए भी स्वच्छता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। मलिनता या गंदगी न केवल आँखों को बुरी लगती है,

बल्कि इसका हमारे स्वास्थ्य से भी सीधा संबंध है। गंदगी रोगों को जन्म देती है। प्रदूषण की जननी है और हमारी असभ्यता की निशानी है। अत: व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने में योगदान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। स्वच्छता के उपर्युक्त प्रत्यक्ष लाभों के अतिरिक्त इसके कुछ अप्रत्यक्ष और दूरगामी लाभ भी हैं। सार्वजनिक स्वच्छता से व्यक्ति और शासन दोनों लाभान्वित होते हैं। बीमारियों पर होने वाले खर्च में कमी आती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय होने वाले सरकारी खर्च में भी कमी आती है। इस बचत को अन्य सेवाओं में उपयोग किया जा सकता है।

स्वच्छता : हमारा योगदान:
स्वच्छता केवल प्रशासनिक उपायों के बलबूते नहीं चल सकती। इसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी परम आवश्यक होती है। हम अनेक प्रकार से स्वच्छता से योगदान कर सकते हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैंघर का कूड़ा-करकट गली या सड़क पर न फेंकें। उसे सफाईकर्मी के आने पर उसकी ठेल या वाहन में ही डालें। कूड़े-कचरे को नालियों में न बहाएँ। इससे नालियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं। गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है। पालीथिन का बिल्कुल प्रयोग न करें। यह गंदगी बढ़ाने वाली वस्तु तो है ही, पशुओं के लिए भी बहुत घातक है। घरों के शौचालयों की गंदगी नालियों में न बहाएँ। खुले में शौच न करें तथा बच्चों को नालियों या गलियों में शौच न कराएँ। नगर पालिका के सफाईकर्मियों का सहयोग करें।

उपसंहार:
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है। इसका प्रचार-प्रसार मीडिया के माध्यम से निरंतर किया जा रहा है। अनेक जन प्रतिनिधि, अधिकारी-कर्मचारी, सेलेब्रिटीज (प्रसिद्ध लोग) इसमें भाग ले रहे हैं। जनता को इसमें अपने स्तर से पूरा सहयोग देना चाहिए। इसके साथ गाँवों में खुले में शौच करने की प्रथा को समाप्त करने के लिए लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के प्रेरित किया जा रहा है। उसके लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की जा रही है। इन अभियानों में समाज के प्रत्येक वर्ग को पूरा सहयोग करना चाहिए।

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2. बाल श्रम से जूझता बचपन:

बाल श्रमिक कौन:
14 वर्ष से कम आयु के मजदूरी या उद्योगों में काम करने वाले बालक आते हैं। खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में मेहनत-मजदूरी की चक्की में पिसता देश का बचपन समाज की सोच पर एक कलंक है। ढाबों, कारखानों और घरों में अत्यन्त दयनीय स्थितियों में काम करने वाले ये बाल-श्रमिक देश की तथाकथित प्रगति के गाल पर एक तमाचा हैं। इनकी संख्या लाखों में है।

बाल श्रमिक की दिनचर्या:
इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या पूरी तरह इनके मालिकों या नियोजकों पर निर्भर होती है। गर्मी हो, वर्षा या शीत इनको सबेरे जल्दी उठकर काम पर जाना होता है। इनको भोजन साथ ले जाना पड़ता है या फिर मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। इनके काम के घंटे नियत नहीं होते। बारह से चौदह घण्टे तक भी काम करना पड़ता है। कुछ तो चौबीस घण्टे के बँधुआ मजदूर होते हैं। बीमारी या किसी अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर इनसे कठोर व्यवहार यहाँ तक कि निर्मम पिटाई भी होती है।

गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण:
घरों में या कारखानों में काम करने वाले इन बालकों का तरह-तरह से शोषण होता है। इनको बहुत कम वेतन दिया जाता है। काम के घण्टे नियत नहीं होते। बीमार होने या अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर वेतन काट लिया जाता है। इनकी कार्य-स्थल पर बड़ी दयनीय दशा होती है। सोने और खाने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। नंगी भूमि पर खुले आसमान या कहीं कौने में सोने को मजबूर होते हैं। रूखा-सूखा या झूठन खाने को दी जाती है। बात-बात पर डाँट-फटकार, पिटाई, काम से निकाल देना तो रोज की कहानी है। यदि दुर्भाग्य से कोई नुकसान हो गया तो पिटाई या वेतन काट लेना आदि साधारण बातें हैं। वयस्क मजदूरों की तो यूनियनें हैं जिनके द्वारा वह अन्याय और अत्याचार का विरोध कर पाते हैं किन्तु इन बेचारों की सुनने वाला कोई नहीं। केवल इतना ही नहीं मालिकों और दलालों द्वारा इनका शारीरिक शोषण भी होता है।

सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास:
बाल श्रमिकों की समस्या बहुत पुरानी है। इसके पीछे गरीबी के साथ ही माँ-बाप का लोभ और पारिवारिक परिस्थिति कारण होती है। इस समस्या से निपटने के लिए सामाजिक और शासन के स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं। सामाजिक स्तर पर माँ-बाप को बालकों को शिक्षित बनाने के लिए समझाया जाना आवश्यक है। इस दिशा में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है । सरकारी स्तर पर बाल श्रम रोकने को कठोर कानून बनाए गए हैं। लेकिन उनका परिपालन भी सही ढंग से होना आवश्यक है। विद्यालयों में पोषाहार एवं छात्रवृत्ति आदि की सुविधाएँ दिया जाना, बाल श्रमिकों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जाना आदि प्रयासों से यह समस्या समाप्त हो सकती है।

3. खुला शौच मुक्त गाँव

खुला शौच मुक्त से आशय:
‘खुला शौच मुक्त’ को सरल भाषा में कहें तो ‘खुले में शौच क्रिया से मुक्त होना’ इसका आशय है। ऐसा गाँव जहाँ लोग बाहर खेतों या जंगलों में शौच के लिए न जाते हों, घरों में ही शौचालय हों, ‘खुला शौच’ मुक्त गाँव कहा जाता है। गाँवों में खुले में शौच के लिए जाने की प्रथा शताब्दियों पुरानी है। जनसंख्या सीमित होने तथा सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान किए जाने के कारण इस परंपरा से कई लाभ जुड़े हुए थे। गाँव से दूर शौच क्रिया किए जाने से ‘मैला ढोने के काम से मुक्ति तथा स्वच्छता दोनों का साधन होता था। मल स्वतः विकरित होकर खेतों में खाद का काम करता था। पर आज की परिस्थितियों में खुले में शौच, रोगों को खुला आमंत्रण बन गया है। साथ ही इससे उत्पन्न महिलाओं की असुरक्षा ने इसे विकट समस्या बना दिया है। अतः इस परंपरा का यथाशीघ्र समाधान, स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा की दृष्टि से परम आवश्यक हो गया है।

सरकारी प्रयास:
कुछ वर्ष पहले तक इस दिशा में सरकारी प्रयास शून्य के बराबर ही थे। गाँवों में कुछ सम्पन्न और सुरुचि युक्त परिवारों में ही घरों में शौचालय का प्रबन्ध होता था। वह भी केवल महिला सदस्यों के लिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब ग्रामीण महिलाओं और विशेषकर किशोरियों के साथ होने वाली लज्जाजनक घटनाओं पर ध्यान दिया तो स्वच्छता अभियान के साथ खुला शौच मुक्त गाँव अभियान को भी जोड़ दिया। इस दिशा में सरकारी प्रयास निरंतर चल रहे हैं। घरों में शौचालय बनाने वालों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। समाचार पत्रों तथा टी.वी. विज्ञापनों में प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से घरों में शौचालय बनाने की प्रेरणा दी जा रही है।

जन जागरण:
किसी प्राचीन कुप्रथा से मुक्त होने में भारतीय ग्रामीण समुदाय को बहुत हिचक होती है। उन पर सरकारी प्रयासों की अपेक्षा, अपने बीच के प्रभावशाली व्यक्तियों, ६ गर्मचार्यों तथा मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का प्रभाव अधिक पड़ता है। अतः ‘खुले में शौच’ की समाप्ति के लिए जन जागरण परम आवश्यक है। इसके लिए कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ भी प्रयास कर रही हैं। इसके साथ ही धार्मिक आयोजन में प्रवक्ताओं द्वारा इस प्रथा के परिणाम की प्रेरणा दी जानी चाहिए। शिक्षक, छात्र-छात्राओं के द्वारा प्रदर्शन का सहारा लेना चाहिए। गाँव के शिक्षित युवाओं को इस प्रयास में हाथ बँटाना चाहिए। ऐसे जन जागरण के प्रयास मीडिया द्वारा तथा गाँव के सक्रिय किशोरों और युवाओं द्वारा किए भी जा रहे हैं। खुले में शौच करते व्यक्ति को देखकर सीटी बजाना ऐसा ही रोचक प्रयास है।

हमारा योगदान:
‘हमारा’ में छात्र-छात्रों, शिक्षक, राजनेता, व्यवसायी, जागरूक नागरिक आदि सभी लोग सम्मिलित हैं। सभी के सामूहिक प्रयास से बराई को समाप्त किया जा सकता है। ग्रामीण जनता को खुले में शौच से होने वाली हानियों के बारे में समझाना चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि इससे रोग फैलते हैं और धन तथा समय की बरबादी होती है। साथ ही यह एक अशोभनीय आदत है। यह महिलाओं के लिए अनेक समस्याएँ और संकट खड़े कर देता है। घरों में छात्र-छात्राएँ अपने माता-पिता आदि को इससे छुटकारा पाने के लिए प्रेरित करें। उपसंहार- खुले में शौच मुक्त गाँवों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकारी प्रयासों के अतिरिक्त ग्राम-प्रधानों तथा स्थानीय प्रबुद्ध और प्रभावशाली लोगों को आगे आकर इस अभियान में रुचि लेनी चाहिए। इससे न केवल ग्रामीण भारत को रोगों, बीमारियों पर होने वाले व्यय से मुक्ति मिलेगी बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी सुधेरगी।

4. बेटी बचाओ:

बेटी पढ़ाओ घोर पाप:
हमारी भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी का स्वरूप माना जाता है। नवरात्रि और देवी जागरण के समय कन्या-पूजन की परम्परा से सभी परिचित हैं। हमारे ध र्मग्रन्थ भी नारी की महिमा का गुणगान करते हैं। आज उसी भारत में कन्या को माँ के गर्भ में ही समाप्त कर देने की लज्जाजनक परम्परा चल रही है। इस घोर पाप ने सभ्य जगत के सामने हमारे मस्तक को झुका दिया है। कन्या-भ्रूण हत्या के कारण कन्या-भ्रूण को समाप्त करा देने के पीछे अनेक कारण हैं। कुछ राजवंशों और सामन्त परिवारों में विवाह के समय वर-पक्ष के सामने न झुकने के झूठे अहंकार ने कन्याओं की बलि ली। पुत्री की अपेक्षा पुत्र को महत्व दिया जाना, धन लोलुपता, दहेज प्रथा तथा कन्या के लालन-पालन और सुरक्षा में आ रही समस्याओं ने भी इस निन्दनीय कार्य को बढ़ावा दिया है। दहेज लोभियों ने भी इस समस्या को विकट बना दिया है। झूठी शान के प्रदर्शन के कारण कन्या का विवाह सामान्य परिवारों के लिए बोझ बन गया है।

कन्या-भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम:
इस निन्दनीय आचरण के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। देश के अनेक राज्यों में लड़कियों और लड़कों के अनुपात में चिन्ताजनक गिरावट आ गई है। लड़कियों की कमी हो जाने से अनेक युवक कुँवारे घूम रहे हैं। अगर सभी लोग पुत्र ही पुत्र चाहेंगे तो पुत्रियाँ कहाँ से आएँगी। विवाह कहाँ से होंगे ? वंश कैसे चलेंगे ? इस महापाप में नारियों का भी सहमत होना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है।

कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय:
कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जनता और सरकार ने लिंग परीक्षण को अपराध घोषित करके कठोर दण्ड का प्रावधान किया है फिर भी चोरी छिपे यह काम चल रहा है। इसमें डॉक्टरों तथा परिवारीजन दोनों का सहयोग रहता है। इस समस्या का हल तभी सम्भव है जब लोगों में लड़कियों के लिए हीन भावना समाप्त हो। पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं किया जाय। कन्या-भ्रूण हत्या भारतीय समाज के मस्तक पर कलंक है। इस महापाप में किसी भी प्रकार का सहयोग करने वालों को समाज से बाहर कर दिया जाना चाहिए और कठोर कानून बनाकर दण्डित किया जाना चाहिए। कन्या-भ्रूण हत्या मानवता के विरुद्ध अपराध है।

बेटी बचाओ:
बेटियाँ देश की सम्पत्ति हैं। उनको बचाना सभी भारतवासियों का कर्त्तव्य है। वे बेटों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। परिवार तथा देश के उत्थान में उनका योगदान बेटों से भी अधिक है। उसके लिए उनकी सुरक्षा के साथ ही उनको सुशिक्षित बनाना भी जरूरी है। हमारे प्रधानमंत्री ने यह सोचकर ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है।

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5. राष्ट्रीय एकता

प्रस्तावना:
प्राचीनकाल में भारत में अनेक संप्रदाय, धर्म तथा गणराज्य होते हुए भी सांस्कृतिक एकता के सूत्र सुदृढ़ थे। लेकिन वर्तमान में राजनैतिक स्वार्थ एवं धार्मिक कट्टरता के कारण हमारी राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ गई है।

भारत में राष्ट्रीय एकता:
अनेकता में एकता के दर्शन भारत की अनूठी विशेषता है। यहाँ प्राचीनकाल से ही ज्ञान, प्रवृत्ति, कर्म, धर्म आदि में पूर्ण समन्वय रहा है। इसी समन्वयी प्रवृत्ति के कारण बाहर से आने वाली संपूर्ण संस्कृतियों को भी यहाँ अपनाया गया। वर्तमान में भारत में साम्प्रदायिकता के कारण राष्ट्रीय एकता में कमी आ रही है। भाषावाद तथा क्षेत्रवाद के कारण अलगाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद तथा आतंकवाद पनप रहा है। कुछ क्षेत्रों में नक्सलवाद, जातिवाद एवं वर्गवाद भी बढ़ रहा है। फलस्वरूप आज भारत में राष्ट्रीय एकता बनाये रखना कठिन हो गया है।

वर्तमान में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता:
लोकतंत्र की स्थिरता, स्वतंत्रता की रक्षा तथा राष्ट्र के सर्वतोन्मुखी विकास के लिए राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है। जब तक संपूर्ण राष्ट्र एकता के सूत्र में नहीं बँधेगा तब तक देश का न तो विकास ही हो सकेगा और न आर्थिक प्रगति हो सकेगी। अतएव प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्र-प्रेम को बढ़ावा दे तथा राष्ट्रीय एकता को दृढ़ करे।

उपसंहार:
आज भारत में एकता का स्वर गूंजने लगा है। उसकी रक्षा के लिए आज राष्ट्रीय भावना की प्रबल आवश्यकता हैं। अतः हमें जाति, धर्म या क्षेत्रवाद जैसी क्षुद्र विचारधाराओं से दूर रहकर विघटनकारी तत्वों का दमन करना चाहिए।

6. दीपावली

प्रस्तावना:
भारत त्योहारों का देश है। दीपावली हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है।

मनाने का कारण:
दीपावली के समय पर हमारे यहाँ खरीफ की फसल अधिकतर तैयार हो जाती है, अतः पूर्वजों ने देवताओं को नया अन्न भेंट करने के लिए उत्सव मनाने का प्रचलन किया था। यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद इसी दिन अयोध्या लौटे थे। अतः अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाकर यह उत्सव मनाया था।

मनाने का ढंग:
दीपावली का उत्सव कई दिन चलता है, अर्थात् कृष्ण पक्ष की तेरस से शुक्ल पक्ष की दूज तक। धन-तेरस के दिन दीपक जलाकर सब लोग अपने द्वार पर रखते हैं। बर्तन खरीदना इस दिन शुभ समझा जाता है। दूसरे दिन को छोटी दीपावली कहते हैं। तीसरे दिन लक्ष्मीजी का पूजन होता है। लोग घरों, दुकानों और कार्यालयों को दीपकों और रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों की मालाओं से सजाते हैं। ऐसा विश्वास है कि लक्ष्मीजी प्रत्येक घर में आती हैं और जिस घर की स्वच्छता व संदरता से प्रसन्न हो जाती हैं, उस घर को अपने निवास के लिए चुन लेती हैं। इस दिन सब लोग नवीन वस्त्र धारण करते हैं तथा अपने इष्ट-मित्रों को मिठाइयाँ देते हैं। चौथे दिन ‘गोवर्धन-पूजा’ होती है। पाँचवाँ दिन ‘भैया दूज’ या ‘यम द्वितीया’ कहलाता है।

दीपावली का महत्त्व:
दीपावली हिंदुओं का महत्त्वपूर्ण त्योहार है। इस अवसर पर घरों की सफाई, लिपाई व पुताई हो जाती है। दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध होता है, बीमारी फैलाने वाले मच्छर, कीड़े तथा पतंगे सब मर जाते हैं।

कुरीतियाँ:
दीपावली एक अत्यंत पवित्र त्योहार है परंतु कुछ कुरीतियों ने इसके स्वरूप को बिगाड़ दिया है। कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं और हजारों रुपये हार जाते हैं। लाखों रुपयों के पटाखे जला दिए जाते हैं। इससे प्रायः भयंकर दुर्घटनाएँ भी हो जाती हैं।

उपसंहार:
दीपावली हिंदुओं का पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण त्योहार है। यह हमें प्रसन्नता का संदेश देता है।

7. होली

प्रस्तावना:
एक ही तरह का जीवन जीते-जीते व्यक्ति ऊब जाता है। इसके लिए समाज ने अनेक पर्यों व त्योहारों, मेलों आदि की व्यवस्था की है। हमारे देश में सभी धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं । सभी के अपने-अपने त्योहार हैं। हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में ‘होली’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

मनाने का कारण:
होली का त्योहार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। वसंत ऋतु के आगमन से चारों ओर सुगंधित वातावरण हो जाता है। खेतों में फसलें पकने के लिए तैयार हो जाती हैं। किसान फसलों को देखकर खुश हो उठता है। उसकी यही खुशी होली के त्योहार के रूप में फूट पड़ती है। यह भी कहा जाता है कि प्राचीनकाल में दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद को मारने के लिए अपनी बहिन होलिका को बुलाया था। होलिका को वरदान मिला था कि वह आग में नहीं जलेगी। वह प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। भगवान की कृपा से प्रह्लाद तो बच गए, परंतु वह जल गई। इसी खुशी में प्रतिवर्ष होली वाले दिन होलिका दहन किया जाता है।

मनाने का ढंग:
होली के त्योहार की तैयारी एक माह पहले से होने लगती है। घरों व मुहल्लों में उपले-लकड़ियाँ एकत्र करके होली रखी जाती है। होली में शुभमुहूर्त में आग लगाई जाती है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार होली का त्योहार मनाया जाता है । मथुरा में जलती होली के बीच से पंडा निकलता है। सभी एक-दूसरे पर रंग, अबीर, गुलाल डालते हैं तथा आपस में गले मिलते हैं। बरसाने की लट्ठमार होली पूरे विश्व में प्रसिद्ध है । होली में जौ एवं गेहूँ की बालियाँ भूनकर सब एक-दूसरे को प्रेम सहित भेंट करते हैं। पुराने गिले-शिकवे भूलकर सब एक-दूसरे से गले मिलते हैं। होली को प्रीति-पर्व भी कहा जाता है। सब एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर देते हैं।

अच्छाइयाँ:
होली का त्योहार परस्पर प्रेम और सौहार्द्र की भावना को बढ़ाता है। होली पर अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है। सभी में नया उत्साह, नई उमंग, नया जोश दिखाई देता है।

बुराइयाँ:
होली के त्योहार के साथ कुछ बुराइयाँ भी जुड़ी हुई हैं। इस दिन कई लोग शराब, भाँग आदि का सेवन करते हैं और नशे में एक-दूसरे से झगड़ा भी कर बैठते हैं। रंग लगाने के बहाने लोग दूसरों पर कीचड़, कोलतार, तेजाब आदि भी डाल देते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है

उपसंहार:
होली के त्योहार के साथ जुड़ी ये थोडी-सी बुराइयाँ यदि दूर हो जाएँ तो इससे अच्छा और कोई त्योहार नहीं है। यह मेल-मिलाप एवं आपसी भाई-चारे की भावना को विकसित करता है। आपस के भेद-भाव भुलाकर हम सबको होली का त्योहार मनाना चाहिए।

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8. स्वतंत्रता दिवस

प्रस्तावना:
अपनी स्वतंत्रता पर गर्व करना किसी भी देश के लिए गौरव की बात है। स्वतंत्रता प्राप्त करने में लाखों वीर बलिदान हो जाते हैं। शहीदों की स्मृति को बनाए रखने एवं स्वतन्त्रता पर गर्व करने के लिए स्वतन्त्रता दिवस समारोह हमारे देश में प्रतिवर्ष 15 अगस्त को मनाया जाता है।

मनाने का कारण:
हमारा देश सदियों की परतंत्रता के उपरान्त पंद्रह अगस्त सन् उन्नीस सौ सैंतालीस को स्वतंत्र हुआ। इस शुभ दिन के लिए न जाने कितने वीरों ने अपनी जान न्यौछावर कर दी। इसी दिन लाल किले पर हमारा अपना राष्ट्रीय-ध्वज तिरंगा मुक्त-आकाश में फहर उठा। सभी भारतवासियों ने इसी दिन गुलामी की जंजीरों से मुक्ति पाई। इस दिन बलिदानियों को श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।

विभिन्न कार्यक्रम:
स्वतंत्रता दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है। इस पावन पर्व को सरकार एवं जनता दोनों धूमधाम से मनाते हैं। दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री राष्ट्रध्वज फहराते हैं तथा सैनिक राष्ट्रध्वज को सलामी देते हैं । सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों तथा महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में राष्ट्रध्वज फहराए जाते हैं तथा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। संसद भवन, विधानसभाओं एवं सरकारी भवनों पर रंग-बिरंगी रोशनी की जाती है। पूरे दिन राष्ट्रभक्ति व देशप्रेम के गीत गूंजते रहते हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन राष्ट्रभक्ति के विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। देश के सभी नगरों में तथा गाँव-गाँव में स्वतंत्रता दिवस समारोह धूमधाम से मनाया जाता है।

उपसंहार:
हमें स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाने की औपचारिकता ही पूरी नहीं करनी है, बल्कि हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम देश की स्वतंत्रता की रक्षा प्राण देकर भी करेंगे तभी स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन का उद्देश्य पूरा हो सकेगा।

9. गणतंत्र-दिवस

प्रस्तावना:
हमारे राष्ट्रीय पर्यों में स्वतंत्रता-दिवस’ एवं ‘गणतंत्र-दिवस’ प्रमुख हैं। ‘गणतंत्र’ का अभिप्राय है- गण = समूह + तंत्र = व्यवस्था, अर्थात् समूह द्वारा शासन को संचालित करना । सन् 1947 से पूर्व भारत में अंग्रेजों की सरकार थी। स्वतंत्र होने के बाद जनता के प्रतिनिधियों ने सरकार का गठन किया तथा गणतंत्रात्मक पद्धति से शासन का संचालन आरंभ किया । यह व्यवस्था जिस दिन से प्रारंभ की गई, वह दिन ही गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

मनाने का कारण:
सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ तो शासन चलाने के लिए अपना संविधान बनाया गया । यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्रियान्वित किया गया । हमारा देश उसी दिन से गणतंत्र राष्ट्र बन गया। इसी खुशी को व्यक्त करने के लिए पूरा राष्ट्र 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस’ के रूप में धूमधाम के साथ मनाता है।

मनाने का ढंग:
गणतंत्र-दिवस का समारोह पूरे देश में मनाया जाता है। भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली में गणतंत्र-दिवस विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन प्रातः 8 बजे के बाद भारत के राष्ट्रपति इंडिया गेट के पास सलामी लेते हैं तथा ध्वजारोहण करते हैं। अनेक रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सभी राज्यों में, सरकारी भवनों पर, स्कूल-कालेजों में राष्ट्रध्वज फहराया जाता है। रात्रि में सरकारी भवनों पर रोशनी की जाती है। इस दिन दिल्ली को दुल्हन की तरह विशेष रूप से सजाया जाता है। महीनों पहले से गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियाँ चलती हैं। विदेशों से अनेक सम्मानित अतिथि गणतंत्र दिवस समारोह देखने के लिए दिल्ली आते हैं। भारत के हर नगर में प्रभात फेरी निकाली जाती हैं, स्कूल-कॉलेजों में अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।

उपसंहार:
गणतंत्र दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है। इसके साथ हमारी भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। आजादी की रक्षा का संकल्प भी हम इस दिन लेते हैं तथा स्वतंत्रता प्राप्त करने में जिन वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया, उन्हें हम याद करके स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

10. राजस्थान का प्रसिदध मेला : गणगौर।

प्रस्तावना:
राजस्थान लोकपरंपराओं एवं लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने में सदैव अग्रणी रहा है। यहाँ वर्ष-भर उत्सव व त्योहार मनाये जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है – “म्हारो रंग रंगीलो राजस्थान।” राजस्थान में अनेक मेले लगते हैं। इन्हीं मेलों में ‘गणगौर’ के मेले का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मेलों में दूर-दूर से लोग आते हैं, एक-दूसरे से परिचय बढ़ता है तथा आनंद मिलता है।

मेले की परंपरा:
‘गणगौर’ हमारी भारतीय संस्कृति से जुड़ी परंपरा का पर्व है। कुमारी कन्याएँ एवं विवाहिताएँ अपने सौभाग्य के लिए गौरी-पूजन करती हैं। गौरी (पार्वती) ने शिव को पति रूप में पाने के लिए व्रत रखा था। इस मेले का सूत्र इसी पौराणिक लोककथा से जुड़ता है। गौरी (पार्वती) को सौभाग्य की देवी माना जाता है। गौरी की मिट्टी की प्रतिमाएँ बनाकर घर में रखी जाती हैं तथा सोलह दिन तक उन प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है। इन प्रतिमाओं का विसर्जन करना ही गणगौर मेले का उद्देश्य है।

मेले का स्थान और समय:
गणगौर का प्रसिद्ध मेला जयपुर में लगता है। यह मेला राजस्थान का प्रसिद्ध मेला है। यह मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला तीज और चौथ को जयपुर के मुख्य मार्ग त्रिपोलिया बाजार, गणगौरी बाजार
और चौगान में धूमधाम से लगता है।

मेले का दृश्य:
जयपुर के गणगौर मेले को देखने के लिए देशी तथा विदेशी पर्यटक भी आते हैं। राजस्थान के विभिन्न गाँवों से आने वाले लोग रंग-बिरंगी पोशाकें पहने हुए मेले में सम्मिलित होते हैं। स्त्रियों की टोलियाँ लोकगीत गाते हुए चलती हैं। संध्या को निश्चित समय पर राजमहल के त्रिपोलिया दरवाजे से गणगौर की सवारी धूमधाम से निकलती है। सवारी में आगे-आगे हाथी, ऊँट, रथ होते हैं। इनके पीछे पुलिस एवं बैंड चलते हैं। गणगौर की सवारी सुंदर ढंग से सजी पालकी में चलती है। यह. जुलूस त्रिपोलिया बाजार से छोटी चौपड़ होता हुआ गणगौरी बाजार तक जाता है। यहाँ अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधन, खाने-पीने के सामान आदि रहते हैं।

मेले का समापन:
हीरे-जवाहरात से सजी-धजी गणगौर की प्रतिमा से युक्त सवारी जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है, वैसे ही मेला उखड़ता जाता है। सड़कों पर भीड़ की रेल-पेल शुरू हो जाती है। लोग अपने-अपने घरों को लौटना शुरू कर देते हैं।

उपसंहार:
मेलों के आयोजन से हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ जीवित रहती हैं। हमें अपनी संस्कृति एवं लोकपरंपराओं की जानकारी होती है। उनके प्रति हमारे मन में आस्था जाग्रत होती है। यद्यपि आधुनिकता के प्रभाव से मेलों में कुछ बुराइयाँ भी देखने को मिलती हैं, फिर भी मेलों का आयोजन सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यापारिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

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11. रक्षा-बंधन

प्रस्तावन:
हिंदू-त्योहारों में दो त्योहार ऐसे हैं जो भाई-बहिन के पवित्र प्रेम पर आधारित हैं। ये हैंभैया-दूज तथा रक्षा-बंधन। रक्षा-बंधन का त्योहार श्रावण-मास की पूर्णिमा को होता है। इसलिए इसे श्रावणी-पर्व भी कहते हैं। यह त्योहार वर्षा ऋतु में होता है। उस समय आकाश में काली घटाएँ छाई रहती हैं। धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। सभी छोटे-बड़े नदी-तालाब पानी से भर जाते हैं।

इतिहास:
रक्षा-बंधन का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। कहते हैं कि एक बार देवताओं और दैत्यों के युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। श्रावण की पूर्णिमा के दिन इंद्राणी ने इंद्र के पास एक ब्राह्मण के हाथ रक्षा-सूत्र भेजा। ब्राह्मण ने मंत्र पढ़कर वह सूत्र (धागा) इंद्र के दाहिने हाथ की कलाई में बाँध दिया। उस रक्षा-सूत्र (राखी) के प्रभाव से देवताओं की जीत हुई, तभी से प्रतिवर्ष बहिनें भाइयों को और ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधने लगे। हमारे इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जबकि राखी की पवित्रता की रक्षा भाइयों ने अपने जीवन का मूल्य देकर की है।

विधर्मी और विदेशी लोगों ने भी राखी के महत्त्व को स्वीकार किया है। एक बार बहादुरशाह ने रानी कर्मवती के राज्य पर आक्रमण कर दिया। कर्मवती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर युद्ध में सहायता माँगी। हुमायूँ मुसलमान था। कर्मवती के पति से उसके पिता की शत्रुता रही थी। किंतु राखी पाते ही वह सब कुछ भूलकर सहायता देने को तैयार हो गया। दुर्भाग्य से उसे आने में देर लगी। तब तक कर्मवती की सेना हार चकी थी और कर्मवती अपनी सखियों के साथ चिता में भस्म हो चुकी थी।

मनाने का ढंग:
रक्षा-बंधन मुख्य रूप से ब्राह्मणों का त्योहार है। इस दिन ब्राह्मण नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। वे अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते हैं। घरों पर सेवइयाँ और चावल बनाये जाते हैं। कहीं-कहीं पकवान भी बनते हैं। बहिनें भाइयों को राखी बाँधती हैं और मिठाई खिलाती हैं, भाई इसके बदले उन्हें उपहार देते हैं।

महत्त्व:
रक्षा-बंधन एक महत्त्वपूर्ण त्योहार है। यह भाई-बहिन के पवित्र प्रेम पर आधारित है। राखी के चार कोमल धागे प्रेम का कठोर बंधन बन जाते हैं। राखी में प्रेम का वह अमृत भरा हुआ है जो सारे बैर-विरोधों को भला देता है। राखी के बहाने दूर-दूर रहने वाले भाई-बहिन वर्ष में एक बार मिल लेते हैं।

वर्तमान स्थिति:
अब धीरे-धीरे रक्षा-बंधन का वास्तविक आनंद कम होता जा रहा है। राखियों में चमक-दमक तो पहले से बढ़ गई है। अब तो चाँदी की राखियाँ भी मिलने लगी हैं। किंतु उनके पीछे छिपी हई भावना समाप्त होती जा रही है। आजकल ब्राह्मण केवल दक्षिणा के लिए रक्षा-सूत्र बाँधते हैं। बहिनें भी अब केवल डाक से राखी भेजकर अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेती हैं।

उपसंहार:
राखी तो वास्तव में रक्षा-सूत्र है। इसके महत्त्व को रुपये से नापना उचित नहीं। यह त्योहार हमें अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करने की शिक्षा देता है। यह बहिन और भाई को सदा के लिए प्रेम के धागे में बाँधे रखता है। बहिन-भाई के सुपावन प्यार की पहचान राखी। देखने में चार धागे, है बहुत बलवान राखी।।

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12. मेरे प्रिय शिक्षक

प्रस्तावना:
गुरु को साक्षात् परब्रह्म मानने वाली संस्कृति के देश में आदर्श गुरुजनों का अकाल पड़ने लगे तो इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। लेकिन ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ’ वाली कहावत भी झूठी नहीं है। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान मुझे एक व्यक्ति ऐसे मिले जिन्हें पाकर एक आदर्श गुरु की मेरी कल्पना को बहुत संतुष्टि प्राप्त हुई।

मेरे गुरुजी का व्यक्तित्व:
अपने गुरुजी से मेरा पहला संपर्क कक्षा 5 में हुआ। वे सदैव धोती-कुर्ता पहनते और हमेशा ही मुस्कराते रहते थे। वे अध्यापन-कार्य में बड़े नियमित, मधुरभाषी और एकांतसेवी थे। नाम था- शिव शर्मा। उनके बाहरी व्यक्तित्व ने मुझे प्रथम दिन ही मुग्ध कर लिया। धीरे-धीरे उनके आंतरिक व्यक्तित्व का भी परिचय मिलता गया और मेरा हृदय उनके प्रति श्रद्धा से झुकता चला गया।

मेरे गुरुजी की जीवन-शैली:
गुरुजी को अपने शिष्यों से अपार स्नेह था। गुरुजी भीतर-बाहर से एक थे। वे ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ की जीवन-शैली के अनुयायी थे। कक्षा में कुछ शरारती छात्र भी थे। उनकी शरारतें कभी-कभी गुरुजी के सामने समस्या खड़ी कर देती थीं। मेरे गुरुजी के मुख पर उस समय दु:ख और सहानुभूति के ऐसे मार्मिक भाव उभरते थे कि शरारती छात्र को उनसे आँख मिलाने का साहस नहीं होता था। उसकी सारी शरारत जैसे धरती में समा जाती थी।

गुरुजी का छात्रों पर प्रभाव:
छात्रों पर गुरुजी का प्रभाव असाधारण था। जब अन्य कक्षाओं में मारपीट तथा डाँट-फटकार की ध्वनियाँ गूंजती थीं, हमारी कक्षा में प्रश्नोत्तर और खिल-खिलाहट की ही आवाज सुनाई पड़ती थी । छात्रों पर उनके प्रभाव का प्रत्यक्ष दर्शन तो उस दिन हुआ जब हम कक्षा 5 उत्तीर्ण करके विद्यालय से विदा हो रहे थे। हर छात्र की आँखें आँसुओं से गीली थीं। दो-तीन छात्र तो रो रहे थे। गुरुजी ने हम सभी को कुछ उपदेश दिए और प्यार भरी आँखों से देखते हुए विदा किया।

उपसंहार:
कबीर की गुरु-महिमा को अगर कहीं प्रत्यक्ष देखा तो परम श्रद्धेय शिव शर्मा में देखा। ‘कबिरा ते जन अंध हैं गुरु को कहते और’ इस उक्ति का मर्म ऐसे ही गुरुजनों के संपर्क में समझा जा सकता है।

13. विद्यालय का वार्षिकोत्सव

प्रस्तावना:
विद्यालयों में विभिन्न प्रतियोगिताएँ वर्षभर चलती रहती हैं। इन प्रतियोगिताओं के विजेता छात्र-छात्राओं को पुरस्कार प्रदान करने एवं छात्र-छात्राओं में सामाजिकता के गुणों का विकास करने के उद्देश्य से विद्यालय में वार्षिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है।

उत्सव की तैयारियाँ:
10 जनवरी को प्रार्थना-सभा में प्रधानाध्यापकजी ने घोषणा की कि वार्षिक उत्सव 23 जनवरी को मनाया जाएगा । छात्र-छात्राओं ने तालियाँ बजाकर इस घोषणा का स्वागत किया। इसी दिन प्रधानाध्यापकजी के कक्ष में एक बैठक बुलाई गई, जिसमें सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के अतिरिक्त कुछ छात्र-छात्राओं को भी वार्षिक उत्सव संबंधी कुछ न कुछ कार्य सौंपे गए। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के निदेशक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने छात्र-छात्राओं का चयन करके उनकी तैयारी प्रारंभ करा दी। समूह नृत्य, समूह गान, सरस्वती वंदना, कव्वाली, नाटक, संस्कृत नाटिका, विचित्र वेशभूषा आदि कार्यक्रमों के लिए छात्रों ने तैयारी की। विद्यालय-प्रांगण में ही भव्य पंडाल लगाया गया एवं मंच बनाया गया। उत्सव का समय सायं 4 बजे रखा गया।

उत्सव का आयोजन:
मुख्य अतिथि जिलाधीश महोदय थे। ठीक चार बजकर पंद्रह मिनट पर मुख्य अतिथि का आगमन हुआ। सबसे पहले मुख्य अतिथि ने दीप प्रज्वलित करके कार्यक्रम के शुभारंभ की घोषणा की। तत्पश्चात् छात्र-छात्राओं ने अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। समूह नृत्य, कव्वाली एवं नाटक को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। विचित्र वेशभूषा के कार्यक्रम ने तो दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि वे बहुत देर तक तालियाँ बजाते रहे ।

प्रधानाध्यापकजी ने विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ी। इसके बाद मुख्य अतिथि महोदय ने विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत किया तथा संक्षिप्त भाषण भी दिया। कार्यक्रम का संचालन कक्षा आठ के छात्र राजेश ने किया। कार्यक्रम का समापन राजस्थान के प्रसिद्ध लोकनृत्य ‘घूमर’ से हुआ।

उपसंहार:
सभी शिक्षक-शिक्षिकाएँ एवं छात्र-छात्राएँ कार्यक्रम की सफलता पर प्रसन्न थे । सभी ने एक-दूसरे को बधाई दी। उत्सव में सभी का पूरा सहयोग रहा।

14. विद्यार्थी-जीवन और अनुशासन

प्रस्तावना:
जिस जीवन में कोई नियम या व्यवस्था नहीं, वह मानव-जीवन नहीं पशु-जीवन ही हो सकता है । बिना किसी भय या लोभ के नियमों का पालन करना ही अनुशासन है।

अनुशासन का महत्त्व:
चाहे कोई संस्था हो या व्यावसायिक प्रतिष्ठान, चाहे परिवार हो या प्रशासन, अनुशासन के बिना किसी का भी कार्य नहीं चल सकता। सेना और पुलिस विभाग में तो अनुशासन सर्वोपरि माना जाता है। विद्यालय देश की भावी पीढ़ियों को तैयार करते हैं । विद्यार्थी-जीवन ही व्यक्ति की भावी तस्वीर प्रस्तुत करता है। आज हर क्षेत्र में देश को अनुशासित युवकों की आवश्यकता है। विद्यार्थी-जीवन और अनुशासन – वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन आवश्यक है किंतु जीवन का जो भाग सारे जीवन का आधार है उस विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन का होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। किंतु वर्तमान समय में विद्यार्थी अनुशासनहीन होते जा रहे हैं।

अनुशासनहीनता के कारण:
विद्यालयों में बढ़ती अनुशासनहीनता के पीछे मात्र छात्रों की उदंडता ही कारण नहीं है, सामाजिक परिस्थितियाँ और बदलती जीवन-शैली भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। दूरदर्शनी-संस्कृति ने छात्रों को समय से पूर्व ही युवा बनाना प्रारंभ कर दिया है। भविष्य के लिए उपयोगी ज्ञान वर्तमान में ही परोसना शुरू कर दिया है। सारी सांस्कृतिक शालीनता उनसे छीनी जा रही है। आरक्षण ने भी छात्रों को निराश और लक्ष्यविहीन बना डाला है। अभिभावकों की उदासीनता ने भी इस विष–बेल को बढ़ाया है। अधिकांश अभिभावक विद्यालयों में बच्चे का प्रवेश कराने के बाद उसकी सुध नहीं लेते।

निवारण के उपाय:
इस स्थिति से केवल अध्यापक या प्रधानाचार्य नहीं निपट सकते। शिक्षा एक सामूहिक दायित्व है, जिसकी जिम्मेदारी पूरे समाज को उठानी चाहिए। यह भी सच है कि अनुशासन किसी पर बलपूर्वक नहीं थोपा जा सकता, इसलिए दूसरों को अनुशासित रखने के लिए स्वयं भी अनुशासित रहकर आदर्श प्रस्तुत करना होगा।

उपसंहार:
अनुशासन का दैनिक जीवन में बहुत महत्त्व है। अनुशासन का क्षेत्र भी अत्यंत व्यापक है। अनुशासन के बिना मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अनुशासन के अभाव में शिक्षा का कोई महत्त्व नहीं है।

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15. यदि मैं प्रधानाचार्य होता

प्रस्तावना:
विद्यालय वस्तुतः शिक्षा के केंद्र हैं। यदि विद्यालयों में पठन-पाठन का वातावरण ठीक नहीं है तो निश्चय ही वहाँ शिक्षक पढ़ाई के कार्य को प्रभावशाली ढंग से नहीं कर पाएँगे। विद्यालयों में शिक्षण का स्तर गिर रहा है, राजनेताओं का हस्तक्षेप होने लगा है तथा अध्यापक उदासीन रहने लगे हैं।

यदि मैं प्रधानाचार्य होता:
प्रधानाचार्य का पद विद्यालय में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। प्रधानाचार्य ही शिक्षण की योजना बनाता है। विद्यालय को सफलता के साथ संचालित करना प्रधानाचार्य का दायित्व है। यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो अपने कर्तव्यों का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करता। मैं अपने विद्यालय में इस प्रकार सुधार करने का प्रयास करता : सबसे पहले मैं अनुशासन पर ध्यान देता।

छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों एवं कर्मचारियों को ठीक समय पर विद्यालय आने के लिए कहता। मैं स्वयं अनुशासित रहता तथा सभी के लिए आदर्श प्रस्तुत करता। ठीक समय पर विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का आना-जाना मैं सुनिश्चित करता। मैं शिक्षा के स्तर में सुधार करता, विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देता तथा शिक्षकों के पढ़ने के लिए ज्ञानवर्धक पुस्तकें एवं पत्रिकाएँ मँगाता तथा उन्हें पढ़ने के लिए देता।

शिक्षकों से कहता कि वे पूरी तैयारी करके ही कक्षा में पढ़ाने जाएँ। मैं स्वयं भी पढ़ाता। समय-समय पर छात्रों के अभिभावकों से भी मिलता। में विद्यालय में खेलकूद, स्काउटिंग, एन.सी.सी., रेडक्रास आदि को संचालित कराता। विद्यार्थियों को बोलने का पूरा अवसर देता। समय-समय पर महापुरुषों के जीवन पर गोष्ठियाँ करवाता। बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए मैं यथासंभव सभी प्रयास करता । मैं विद्यालय की पत्रिका प्रतिवर्ष प्रकाशित करवाता, जिसमें छात्रों की स्वरचित रचनाएँ ही प्रकाशित की 1 जातीं। मैं विद्यार्थियों में एकता, राष्ट्रप्रेम एवं सर्वधर्म समभाव की भावना का विकास करता।

उपसंहार:
विद्यालय का प्रधानाचार्य यदि शिक्षाविद् है तथा वह बालमनोविज्ञान को समझता है तो विद्यालय में शिक्षा का स्तर ऊँचा रहेगा। अच्छा प्रधानाचार्य विद्यालय को आदर्श विद्यालय बना देता है । यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो शेक्षणिक स्तर में सुधार करता तथा अपने अध्ययन, त्याग एवं कठोर परिश्रम से विद्यालय को शिक्षा का वास्तविक केंद्र बनाने का प्रयास करता।

16. हमारा विद्यालय

प्रस्तावना:
विद्यालय देश के वह पवित्र स्थल है जहाँ। देश के भविष्य का निर्माण होता है। विद्यालय, विद्या की देवी का पावन मंदिर है। जिस स्थान पर विद्यार्थी विद्याध्ययन के लिए आते हैं, वह स्थान ही विद्यालय कहलाता है। विद्यालय शब्द दो शब्दों से मिलाकर बना है- विद्या+आलय अर्थात् विद्या का घर। विद्यालय में गुरु एवं शिष्य के संबंध अत्यंत मधुर होते हैं । मुझे अपने विद्यालय पर गर्व है । हमारे विद्यालय का नाम ‘आदर्श विद्या मंदिर’ है।

विद्यालय भवन:
हमारे विद्यालय का भवन अत्यंत सुंदर एवं विशाल है। इसमें बीस कमरे हैं। प्रत्येक कमरा हवादार एवं प्रकाशयुक्त है । पुस्तकालय कक्ष, विज्ञान प्रयोगशाला, खेल-कूद का कक्ष, स्काउट कक्ष एवं एक बड़ा मीटिंग हॉल भी हमारे विद्यालय में है। शिक्षकों के बैठने के लिए स्टाफ रूम है। प्रधानाचार्य का कक्ष मुख्य द्वार के पास ही है। प्रत्येक छात्र के बैठने के लिए अलग-अलग कुर्सी-मेज की व्यवस्था है।

विद्यालय का वातावरण:
हमारे विद्यालय में चालीस शिक्षक हैं। सभी शिक्षक अपने-अपने विषय के विद्वान हैं। छात्रों के साथ शिक्षक बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं । कक्षा शिक्षक इतनी अच्छी तरह से समझाते हैं कि छात्रों को सब कुछ समझ में आ जाता है। शिक्षक अपने साथ शिक्षण से संबंधित सहायक सामग्री लाते हैं जिससे हम सब छात्र अत्यंत रुचि के साथ पढ़ते हैं । हमारे विद्यालय का शैक्षिक वातावरण अत्यंत सुंदर है । जिस समय कक्षाएँ चलती हैं उस समय पूरे विद्यालय प्रांगण में शांति रहती है। जिन छात्रों का समय खेलकूद का होता है वे चुपचाप पंक्तिबद्ध होकर मैदान में चले जाते हैं ।

वहाँ खेलकूद के शिक्षक तरह:
तरह के खेल सिखाते हैं तथा साथ खेलते भी हैं। विद्यालय के प्रधानाचार्य- हमारे विद्यालय के प्रधानाचार्य अत्यंत कशल प्रशासक हैं. वे अनशासनप्रिय हैं, वे स्वयं अच्छे खिलाड़ी हैं तथा अंग्रेजी विषय में पी-एच. डी. हैं। उनका व्यवहार शिक्षकों के साथ तथा विद्यार्थियों के साथ बहुत अच्छा रहता है। विद्यालय की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है । विद्यालय की सफाई करने के लिए चार अनुचर भी हैं ।

उपसंहार:
विद्यालय, व्यावहारिक नियमों की शिक्षा देते हैं । यहाँ हमें मिलकर रहना सिखाया जाता है। माता-पिता, गुरुजनों का आदर करना हमें यहीं सीखने को मिलता है । देश के प्रति प्रेम रखना तथा राष्ट्रीय एकता की बातें विद्यालय में सिखाई जाती हैं । अपना विद्यालय मुझे कितना पसंद है. इसे शब्दों में व्यक्त कर पाना कठिन है । विद्यालय मेरा पूजाघर है । मैं इसकी वंदना करता हूँ और नित्य प्रति इसे शीश झुकाकर नमन करता हूँ।

17. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी

प्रस्तावना:
हमारे देश में समय-समय पर राम, कृष्ण और बुद्ध जैसे अनेक महापुरुषों का जन्म होता रहा है। इन्हीं महापुरुषों ने संकट के समय जनता को दिशा दिखाई। इसी श्रृंखला में भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने वाले महापुरुषों में महात्मा गाँधी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है।

जन्म एवं शिक्षा:
गाँधीजी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। उन्हें सारा राष्ट्र ‘महात्मा’ के नाम से जानता है। भारतीय उन्हें श्रद्धा के साथ ‘राष्ट्रपिता’ और ‘बापू’ कहते हैं। उनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 ई. को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। तेरह वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता करमचंद ने उनका विवाह कस्तूरबा के साथ कर दिया। वे उन्नीस वर्ष की अवस्था में बैरिस्ट्री की शिक्षा के लिए विलायत गए। सन् 1891 में वे बैरिस्ट्री की परीक्षा पास करके भारत लौट आए।

सत्याग्रह का आरंभ;
विदेश से वापस आकर गाँधीजी मुम्बई में वकालत करने लगे। वहीं पोरबंदर की एक फर्म के एक मुकदमे की पैरवी हेतु वे 1893 ई. में दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ गोरे शासकों द्वारा काले लोगों पर किए जा रहे अत्याचारों को देखकर उनका मन दुःखी हो गया। उन्होंने काले-गोरे का भेदभाव मिटाने के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। अंग्रेजों ने उन पर अत्याचार किए, उनका अपमान किया, परंतु गाँधीजी ने सत्याग्रह जारी रखा । अंत में गाँधीजी के सत्याग्रह के सामने गोरी सरकार को झुकना पड़ा और गाँधीजी की जीत हई। अफ्रीका से लौटने के बाद गाँधीजी को कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिना जाने लगा।

स्वतंत्रता-संग्राम का नेतृत्व:
भारत आते ही स्वतंत्रताआंदोलन की बागडोर गाँधीजी के हाथ में आ गई। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित किया। उन्होंने सत्य और अहिंसा का सहारा लिया। वे अनेक बार जेल गए। उन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन, 1930 में नमक सत्याग्रह तथा 1942 में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन के माध्यम से संघर्ष जारी रखा। 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हो गया।

जीवन का अंत:
देश स्वतंत्र हो जाने पर गाँधीजी ने कोई पद स्वीकार नहीं किया। गाँधीजी पक्के वैष्णव थे। वे नियमित रूप से प्रार्थना सभा में जाते थे । 30 जनवरी, 1948 के दिन प्रार्थना सभा में एक हत्यारे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी । पूरा देश दुःख और ग्लानि से भर उठा। उनकी मृत्यु का दुःख पूरे राष्ट्र ने महसूस किया।

उपसंहार:
महात्मा गाँधी को भारतवर्ष ही नहीं पूरा विश्व आदर के साथ याद करता है। वे मानवता, सत्य एवं अहिंसा के पुजारी थे। गाँधीजी जैसे व्यक्ति हजारों, लाखों वर्षों में अवतरित होते हैं। सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए राष्ट्रसेवा में लग जाना ही गाँधीजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।।

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18. प्रदूषण या पर्यावरण प्रदूषण

प्रस्तावना:
भूमि, जल, वायु, आकाश, वृक्ष, नदी, पर्वत; यही सब मिलकर बनाते हैं – पर्यावरण। इन्हीं के बीच मनुष्य आदिकाल से रहता चला आ रहा है । पर्यावरण मनुष्य को प्रकृति का अमूल्य वरदान है । लेकिन वैज्ञानिक प्रगति के मद में मत्त मानव ने प्रकृति को अपनी दासी बनाने के अभियान में, पर्यावरण को अपार हानि पहुँचाई है।

प्रदूषण क्या है:
‘दूषण’ का अर्थ दोषयुक्त होना है। ‘प्र’ उपसर्ग लगाने से दूषण की अत्यधिकता व्यक्त होती है, आजकल ‘प्रदूषण’ शब्द का प्रयोग एक विशेष अर्थ में किया जा रहा है। पर्यावरण के किसी अंग को, किसी भी प्रकार से मलिन या दूषित बनाना ही प्रदूषण है।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार:

(i) जल प्रदूषण:
जल मानव-जीवन के लिए परम आवश्यक है। जल के परंपरागत स्रोत हैं- कुआँ, तालाब, नदी तथा वर्षा का जल। प्रदूषण ने इन सभी स्रोतों को दूषित कर दिया है । औद्योगिक प्रगति के कारण उत्पन्न हानिकारक कचरा और रसायन इन जल-स्रोतों को दूषित कर रहे हैं।

(ii) वायु प्रदूषण:
आज शुद्ध वायु मिलना कठिन हो गया है । वाहनों, कारखानों और सड़ते हुए औद्योगिक कचरे ने वायु में भी जहर भर दिया है। घातक गैसों के रिसाव भी यदा-कदा प्रलय मचाते रहते हैं।

(iii) खाद्य प्रदूषण:
प्रदूषित जल और वायु के बीच पनपने वाली वनस्पति या उसका सेवन करने वाले पशु-पक्षी भी आज प्रदूषित हो रहे हैं। चाहे शाकाहारी हो या मांसाहारी; कोई भी भोजन प्रदूषण से नहीं बच सकता।

(iv) ध्वनि प्रदूषण:
आज मनुष्य को ध्वनि के प्रदूषण को भी भोगना पड़ रहा है। आकाश में वायुयानों की कानफोड़ ध्वनियाँ, धरती पर वाहनों, यंत्रों और ध्वनिविस्तारकों का शोर, सब मिलकर मनुष्य को बहरा बना देने पर तुले हुए हैं।

प्रदूषण रोकने के उपाय:
प्रदूषण रोकने के लिए प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को बस्तियों से सुरक्षित दूरी पर ही स्थापित और स्थानांतरित किया जाना चाहिए। उद्योगों से निकलने वाले कचरे और दूषित जल को निष्क्रिय करने के उपरांत ही विसर्जित करने के कठोर आदेश होने चाहिए।

वायु को प्रदूषित करने वाले वाहनों पर भी नियंत्रण आवश्यक है। आजकल हमारी सरकार औद्योगिक कचरे से बायो-ऊर्जा बनाकर इसके निस्तारण का प्रयत्न कर रही है। ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति तभी मिलेगी जब वाहनों का अंधाधुंध प्रयोग रोका जाए। हवाई अड्डे बस्तियों से दूर बनें । रेडियो, टेपरिकार्डर तथा लाउडस्पीकरों को मंद ध्वनि से बजाया जाए ।

उपसंहार:
यदि प्रदूषण पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो आदमी शुद्ध जल, वायु, भोजन और शांत वातावरण के लिए तरस जाएगा । प्रशासन और जनता दोनों के गंभीर प्रयासों से ही प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है।

19. आतंकवाद की समस्या

प्रस्तावना:
बमों के धमाके, गोलियों की तड़तड़ाहट, असुरक्षित जन-जीवन, असुरक्षित धर्मस्थान, निर्दोषों का बहता लह, निराश्रितों के बढते शरणस्थल, यह तस्वीर है हमारे आधुनिक जगत् की । कोई भी, कहीं भी सुरक्षित नहीं है । समाचार-पत्र आतंकवादी कृत्यों के समाचारों से भरे रहते हैं।

आतंकवाद क्या है –
आतंकवाद बल-प्रयोग द्वारा तथा आतंक फैलाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का बर्बर तरीका है।

आतंकवाद का विश्वव्यापी रूप:
आतंकवाद एक विश्वव्यापी समस्या है। ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व वाला ‘अलकायदा’, अफगानिस्तान के तालिबान, पड़ोस में फल-फूल रहे जेहादी तथा भारत एवं नेपाल में सक्रिय माओवादी और नक्सलवादी आतंकवाद के सहारे ही अपना अधिकार जमाना चाहते हैं।

भारत में आतंकवादी गतिविधियाँ तथा दुष्परिणाम:
स्वतंत्र भारत में आतंकवाद का प्रारंभ पूर्वी सीमांत से हुआ। नागालैंड, त्रिपुरा, असम आदि प्रदेशों में विदेशी शक्तियों के षड्यंत्र से आतंकवादी गतिविधियाँ काफी समय से चलती रही हैं। भारत में स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी व राजीव गाँधी की हत्या से लेकर, विमान अपहरण, निर्दोष लोगों की हत्याएँ, जगह-जगह धमाके, यहाँ तक कि सेना पर भी घात लगाकर हमला करना, अक्षरधाम और संसद-भवन पर हमला, आदि आतंकवाद के ही उदाहरण हैं ।

जयपुर में हए बम ब्लास्ट तथा मुंबई में हुए हमले में सैकड़ों लोगों की जान चली गईं। पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की आतंकवादी हमले में हत्या कर दी गई । आतंकवाद को प्रोत्साहित करने वाला देश स्वयं आतंकवाद की चपेट में आ गया । यह घटना संदेश देती है कि आतंकवाद बढ़ाकर किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

मुक्ति के उपाय:
आतंकवाद के विरुद्ध संसार का हर सभ्य और समझदार देश आवाज उठा रहा है, किंतु यह रोग बढ़ता ही जा रहा है। आतंकवादी गतिविधियों का कठोरता से सामना करके ही सफलता मिल सकती है।

उपसंहार:
आज आतंकवाद को रोकने के लिए हमें अपनी सेना को नवीनतम सैन्य उपकरणों से सुसज्जित करना होगा और सारी गुप्तचर एजेंसियों को अधिक चुस्त और सावधान बनाना होगा। तभी हम इस आतंकवाद की समस्या से छुटकारा पा सकेंगे।

20. विज्ञान के चमत्कार

प्रस्तावना:
आज हमारा जीवन कितना सुखी है। हमारे कमरे जाड़े में गरम और गर्मी में ठंडे रहते हैं। पलक झपकते ही हमें हजारों मील दूर के समाचार घर बैठे मिल जाते हैं। हमारी रातें अब दिन जैसी जगमगाती हैं। हमारे घर के भीतर ही रेडियो और टेलीविजन हमारा मन बहलाते हैं। .यह सब किसकी देन है ? एकमात्र उत्तर हैविज्ञान की।

विज्ञान और उसके चमत्कार:
मनुष्य ने जब धरती पर जन्म लिया तो उसे अपने चारों ओर की प्रकृति का कोई ज्ञान न था। वह अपनी आवश्यकता के अनुसार सभी वस्तुओं का उपभोग करने लगा। धीरे-धीरे उसका ज्ञान भी बढ़ता गया। आज वह विज्ञान के बल पर सम्पूर्ण प्रकृति का स्वामी बन गया है। उसने और उसके विज्ञान ने जीवन के हर क्षेत्र में चमत्कार कर दिखाया है।

ज्ञान एवं शिक्षा के क्षेत्र में:
हमारी पुस्तकें, कापियाँ और लेखन-सामग्री मशीनों से तैयार होती हैं। आज आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा भी शिक्षा दी जा रही है।

कृषि और उद्योग के क्षेत्र में:
आजकल विज्ञान ने हमारी कृषि की उपज कई गुनी बढ़ा दी है। अच्छे बीजों, रासायनिक खादों और कृषि-यंत्रों की सहायता से अब खेती सरल भी हो गई है और लाभदायक भी। आजकल हमारे सभी उद्योग मशीनों पर आधारित हैं। कहीं-कहीं तो सारा काम मशीनें ही करने लगी हैं, मनुष्य केवल उनके काम देखते हैं।

समाचार एवं यातायात के क्षेत्र में:
विज्ञान ने यात्रा जैसे कठिन काम को भी आसान कर दिया है । रेलगाड़ी अथवा वायुयान द्वारा लंबी-लंबी दूरियाँ भी थोड़ी-सी देर में तय की जा सकती हैं । दिल्ली शहर में भीड़ के बढ़ते हुए दबाव के कारण जमीन के नीचे तथा ऊपर मैट्रो ट्रेन चलाकर यातायात को सुगम बनाया गया है। टेलीफोन, तथा ई-मेल द्वारा समाचार भेजना अब कितना सरल हो गया है । रेडियो अथवा दूरदर्शन के माध्यम से हम देश-विदेश के समाचार क्षण-मात्र में जान लेते हैं।

मनोरंजन के क्षेत्र में:
विज्ञान हमारा मन बहलाने में भी पीछे नहीं है। रेडियो, टेप-रिकार्डर, टेलीविजन आदि अनेक साधनों से वह हमारा मनोरंजन करता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में:
आज रोगी के शरीर का भीतरी हाल जानने के लिए एक्स-रे से भी अच्छी मशीनें हमें प्राप्त हैं। हर बीमारी की अच्छी-से-अच्छी दवा की खोज की जा रही है। आपरेशन द्वारा शरीर के अंगों को भी बदला जा सकता है। लेजर किरणों से बिना चीर-फाड़ के भी ऑपरेशन होने लगे हैं।

युद्ध के क्षेत्र में:
आज हम राडार की सहायता से शत्रु के हवाई आक्रमण की जानकारी पहले से कर सकते हैं। ऐसे अस्त्र भी बन गये हैं जिनसे शत्रु के लड़ाकू विमान को जमीन पर बैठे हुए भी गिरा सकते हैं। निकट भविष्य में सैनिकों के स्थान पर रोबोट द्वारा युद्ध लड़े जाने की संभावना को साकार करने में वैज्ञानिक लगे हुए हैं।

अन्य क्षेत्रों में:
कैलकुलेटर गणित के कठिन से कठिन प्रश्न को एक क्षण में हल कर देता है। कंप्यूटर तो हमारे दिमाग के समान ही सोचने, समझने और निष्कर्ष निकालने का काम करते हैं।

उपसंहार:
विज्ञान एक सेवक के समान हमारे काम करता है और हमें आराम देता है। वह हमें किसी भी ऋतु में कष्ट नहीं होने देता। किंतु कभी-कभी युद्ध के रूप में वह विनाश भी करता है। इसलिए हमें विज्ञान का प्रयोग सोच-समझकर ही करना चाहिए।।

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21. दहेज प्रथा

प्रस्तावना:
दहेज की परंपरा हमारे समाज में प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। कन्यादान के साथ दी जाने वाली दक्षिणा के समान यह दहेज हजारों वर्षों से विवाह का अनिवार्य अंग बना हुआ है। किंतु प्राचीन और वर्तमान दहेज के स्वरूप और आकार में बहुत अधिक अंतर आ चुका है।

वर्तमान स्थिति:
प्राचीन समाज में दहेज नव-दंपति को नवजीवन आरंभ करने के उपकरण देने का और सद्भावना का चिह्न था। राजा, महाराजा और धनवान लोग धूमधाम से दहेज देते थे, परंतु सामान्य गृहस्थी का काम तो दो-चार बर्तन या गौदान से ही चल जाता था । आज दहेज अपने निकृष्टतम रूप को प्राप्त कर चुका है। काले धन से संपन्न समाज का धनी वर्ग, अपनी लाडली के विवाह में धन का जो अपव्यय और प्रदर्शन करता है वह औरों के लिए होड़ का कारण बनता है । अपने परिवार के भविष्य को दाँव पर लगाकर समाज के सामान्य व्यक्ति भी इस मूर्खतापूर्ण होड़ में सम्मिलित हो जाते हैं। इसी धन-प्रदर्शन के कारण वर-पक्ष भी कन्या पक्ष के पूरे शोषण पर उतारू रहता है।

कन्या-पक्ष की हीनता:
प्राचीनकाल में कन्या को वर चुनने की स्वतंत्रता थी किंतु जबसे माता-पिता ने उसको किसी के गले बाँधने का कार्य अपने हाथों में लिया, तब से कन्या अकारण ही हीनता का पात्र बन गयी है। आज तो स्थिति यह है कि बेटी वाले को बेटे वाले की उचित-अनुचित सभी बातें सहन करनी पड़ती हैं। इस भावना का अनुचित लाभ वर-पक्ष पूरा-पूरा उठाता है। घर में चाहे साइकिल भी न हो, परंतु वह स्कूटर पाये बिना तोरण स्पर्श न करेंगे । बेटी का बाप होना मानो पूर्वजन्म और वर्तमान का भीषण पाप हो।

कुपरिणाम:
दहेज के दानव ने भारतीयों की मनोवृत्ति को इस हद तक दूषित किया है कि एक साधारण परिवार की कन्या और कन्या के पिता का जीना कठिन हो गया है। इस प्रथा की बलिवेदी पर न जाने कितने कन्या-कुसुम बलिदान हो चुके हैं। लाखों परिवारों के जीवन की शांति को नष्ट करने का अपराध इस प्रथा ने किया है।

मुक्ति के उपाय:
इस कुरीति से मुक्ति का उपाय क्या है ? इसके दो पक्ष हैं- जनता और शासन। शासन कानून बनाकर इसे समाप्त कर सकता है और कर भी रहा है। किंतु बिना जन-सहयोग के ये कानून फलदायी नहीं हो सकते। इसलिए महिला वर्ग को और कन्याओं को स्वयं संघर्षशील बनना होगा, स्वावलंबी बनना होगा। ऐसे वरों का तिरस्कार करना होगा, जो उन्हें केवल धन-प्राप्ति का साधन मात्र समझते हैं।

उपसंहार:
हमारी सरकार ने दहेज-विरोधी कानून बनाकर इस कुरीति के उन्मूलन की चेष्टा की है, लेकिन वर्तमान दहेज-कानून में अनेक कमियाँ हैं। इसे कठोर से कठोर बनाया जाना चाहिए। परंतु सामाजिक चेतना के बिना केवल कानून के बल पर इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।

22. दूरदर्शन

प्रस्तावना:
दूरदर्शन आज हमारे घरों का एक आवश्यक उपकरण बन चुका है। छोटे पर्दे के नाम से यह सिनेमा का घर-घर प्रतिनिधित्व कर रहा है। छात्रवर्ग तो दूरदर्शन का दीवाना है। उनके आचार-विचार, भाव-भंगिमा, नख-शिख-सज्जा, भाषा और व्यवहार का दीक्षा-गुरु दूरदर्शन बन चुका है।

दूरदर्शन का विस्तार:
भारत में दूरदर्शन का आगमन सन् 1959 के आसपास हुआ था। तब यह मात्र वैज्ञानिक चमत्कार की वस्तु थी । केवल संपन्न व्यक्ति अथवा सरकारी प्रतिष्ठान ही इसका आनंद लेने के अधिकारी थे। किंतु पिछले वर्षों में दूरदर्शन सुरसा के मुख की भाँति विस्तार को प्राप्त हुआ है।

दूरदर्शन के लाभ:
आज दूरदर्शन सर्वव्यापक रूप में जनजीवन का अनिवार्य अंग बन चुका है। सामाजिक जीवन का कोई भी अंग, कोई भी क्षेत्र इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

मनोरंजन के क्षेत्र में:
मनोरंजन के क्षेत्र में तो इसने अपने सभी प्रतियोगियों को पछाड़ दिया है। सिनेमा से भी सुलभ और सुविधाजनक मनोरंजन दूरदर्शन से प्राप्त होता है। घर पर निश्चिंतता से बैठकर विविध प्रकार के मनोरंजनों का लाभ और कोई उपकरण नहीं करा सकता। फिल्म, नाटक, नृत्य, कवि-सम्मेलन, विविध खेल और प्रतियोगिताएँ, दृश्य-दर्शन, पर्यटन आदि मनोरंजन के विविध स्वरूप घर बैठे उपलब्ध रहते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में:
शिक्षा के क्षेत्र में भी दूरदर्शन ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। सक्रिय और प्रभावी शिक्षण-प्रणाली में दूरदर्शन का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।

कृषि के क्षेत्र में:
कृषि संबंधी जानकारी, मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ, पारिवारिक समस्याएँ, रसोईघर की ज्ञानवृद्धि तथा सौंदर्य-सुरक्षा आदि की जानकारी देने से दूरदर्शन की उपयोगिता सभी को अनुभव हो रही है।

राजनीति के क्षेत्र में:
राजनीतिक दृष्टि से तो दूरदर्शन का आज भारी महत्त्व है। जनमत के निर्माण, राजनेताओं के विचार और आचार के दर्शन, विश्वभर की राजनैतिक घटनाओं से परिचय आदि के द्वारा निरंतर राजनैतिक जागरूकता बनाये रखने में दूरदर्शन की ही भूमिका है।

व्यापार के क्षेत्र में:
दूरदर्शन आज व्यापार का अभिन्न अंग बन चुका है। कौन-सा वस्त्र, कौन-सा भोजन, कौन-सी सज्जा-सामग्री, चाय, टूथपेस्ट और मसाले आपके लिए उपयोगी हैं, यह सलाह दूरदर्शन बिना कोई शुल्क लिये निरंतर दे रहा है।

दूरदर्शन से हानियाँ:
दूरदर्शन का सबसे घातक प्रभाव युवावर्ग पर पड़ा है। युवक-युवतियों का खान-पान, वस्त्र, हाव-भाव, भाषा और चरित्र सभी कुछ दूरदर्शन से कुप्रभावित हो रहा है। हिंसा, अश्लीलता, उदंडता, शिक्षा से अरुचि, सामाजिक मर्यादाओं की उपेक्षा, बाजारू प्रेम-प्रसंग सभी कुछ दूरदर्शन ही युवाओं और छात्रवर्ग के सामने परोस रहा है। अपराध, आतंक, मानसिक तनाव आदि सभी का उत्तरदायी दूरदर्शन है।

व्यापारिक विज्ञापनों द्वारा समाज को मूर्ख बनाने में भी दूरदर्शन सहायक बन रहा है।। राजनीतिक दृष्टि से भी इसका दुरुपयोग हो रहा है। इसके माध्यम से सत्तारूढ़ दल के प्रचार को अधिक महत्त्व दिया जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी दूरदर्शन हानिकारक है। निरंतर देखने से दृष्टि-हास, मानसिक तनाव और आंगिक जड़ता आदि रोग भी दूरदर्शन ही दे रहा है।

उपसंहार:
लाभ और हानियों पर विचार-विमर्श के पश्चात् भी दूरदर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता । प्रत्येक आविष्कार का दुरुपयोग या सदुपयोग मनुष्य के ऊपर निर्भर है । दूरदर्शन के व्यापक प्रसार और प्रभाव का सदुपयोग करके उसे समाज का परममित्र, मार्गदर्शक और सहयोगी बनाया जा सकता है ।

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23. मेरा प्रिय खेल (फुटबॉल)

प्रस्तावना:
खेल दो प्रकार के होते हैं –
(i) स्वदेशी, जैसे- गुल्ली-डंडा, कबड्डी और
(ii) विदेशी, जैसेवॉलीबॉल, फुटबॉल, टेनिस, क्रिकेट आदि।

इन खेलों में मुझे फुटबॉल विशेष पसंद है। यह एक सीधा-सादा और सस्ता खेल है तथा इसमें शरीर का अच्छा व्यायाम हो जाता है। खेल का स्वरूप- फुटबॉल का खेल एक बड़े से चौरस मैदान में खेला जाता है, इसके खिलाड़ी दो दलों में बँट जाते हैं। आमतौर पर 11-11 खिलाड़ियों की दो टोलियाँ बना ली जाती हैं। मैदान के बीचों-बीच एक रेखा खींचकर दो भाग कर लिए जाते हैं। प्रत्येक दल को अपने सामने वाले भाग पर गोल करना होता है। एक दल (टीम) गोल करने का प्रयत्न करता है और दूसरा दल उसे रोकता है।

एक खिलाड़ी गोल के निकट रहता है। उसका कार्य केवल गोल की रक्षा करना होता है. इसे गोल-रक्षक या गोल-कीपर कहते हैं। गोल के अन्य खिलाड़ी अपने-अपने स्थान से गेंद को अंदर आने से रोकते हैं और दूसरे उसे गोल में ले जाने का प्रयत्न करते हैं । इस खेल का निर्णायक रैफरी कहलाता है, वही खेल को आरंभ करता है तथा वही गलती करने वाले खिलाड़ियों को टोकता व हार-जीत का निर्णय करता है । सारे कार्य उसकी सीटी के संकेत पर होते हैं ।

खेल का महत्त्व:
स्वास्थ्य के लिए खेल बहुत आवश्यक है। खेलने से भोजन पचता है और भूख अच्छी लगती है। मेरी दृष्टि में फुटबॉल का खेल विशेष महत्त्वपूर्ण है। इस खेल में शरीर को अधिक चोट लगने का डर भी नहीं रहता । फुटबॉल से शरीर का अच्छा व्यायाम हो जाता है। खेल के दो दलों में से एक जीतता है और दूसरा हारता है, किंतु इस हार-जीत से आपसी प्रेम घटने के बजाय बढ़ता है।

उपसंहार:
हम बच्चों के लिए खेलों का विशेष महत्त्व होता है । खेल हमारे बढ़ते शरीरों को स्वस्थ और सुंदर बनाते हैं । हम लोग आपस में तथा दूसरे विद्यालयों की टीमों से मैच भी खेलते हैं। फुटबॉल के खेल में हमारा उत्साह दिन-दिन बढ़ता जा रहा है ।

24. पुस्तकालय

प्रस्तावना:
पुस्तकालय (पुस्तक+आलय) शब्द का अर्थ है-पुस्तकों का घर वह स्थान जहाँ पुस्तकों का संग्रह किया जाता है ‘पुस्तकालय’ कहलाता है । पुस्तकालय में अनेक विषयों की पुस्तकें विषयानुसार क्रम से लगी रहती हैं । इनमें से लोग अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं।

पुस्तकालयों के प्रकार:
पुस्तकालय मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-
(1) निजी पुस्तकालय,
(2) सार्वजनिक पुस्तकालय।

निजी पुस्तकालय वह होता है जो लोग अपने ही घर पर अपने लिए स्थापित करते हैं । ऐसे पुस्तकालय में केवल एक व्यक्ति या परिवार की रुचि की पुस्तकें होती हैं । सार्वजनिक पुस्तकालय आम जनता के लिए होता है। ऐसे पुस्तकालयों का

संचालन तीन तरह से होता है –
व्यक्तिगत स्तर पर, पंचायती स्तर पर और सरकारी स्तर पर । कुछ धनी लोग अपने ही पैसे से पुस्तकालय खुलवाकर जनता की सेवा करते हैं। ये व्यक्तिगत पुस्तकालय कहलाते हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर तथा विद्यालयों द्वारा संचालित पुस्तकालय पंचायती होते हैं । इनके अतिरिक्त सरकार भी कुछ पुस्तकालय चलाती है।

पुस्तकालय की उपयोगिता:
पुस्तकालय ज्ञान के भंडार होते हैं, जिनके पास विद्यालय जाने के लिए समय नहीं है वे लोग पुस्तकालय की पुस्तकों से अपना ज्ञान बढ़ाते हैं। आज पुस्तकों के मूल्य बहुत बढ़ गए हैं। इसलिए सब लोग उन्हें नहीं खरीद सकते। किंतु पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर तो सभी पढ़ सकते हैं । इस प्रकार निर्धन व्यक्तियों के लिए पुस्तकालय विशेष लाभदायक होते हैं। पुस्तक पढ़ना खाली समय बिताने का एक अच्छा साधन है।

जब हमारे पास कोई काम नहीं होता तो हमारा दिमाग बहुत-सी अनुचित बातें सोचने में लग जाता है । इस प्रकार पुस्तकालय हमें बुरी आदतों से बचाकर अच्छा नागरिक बनाते हैं। पुस्तकालय में वे ही लोग आते हैं जो ज्ञान बढ़ाना और अपने को सुधारना चाहते हैं। इस प्रकार पुस्तकालय में जाने से हमारी भले लोगों से भेंट होती है । इससे आपसी प्रेम भी बढ़ता है।

उपसंहार:
पुस्तकालय हमारे सच्चे मित्र होते हैं। वे हमें ऊबने नहीं देते । वे हमारा मनोरंजन करते तथा ज्ञान बढ़ाते हैं।

25. यदि मैं सरपंच होता

प्रस्तावना:
भारत सदा से कृषि प्रधान देश रहा है। यहाँ की 80% जनसंख्या गाँवों में ही निवास करती है। केंद्रीय व प्रांतीय सरकारें गाँवों के सुधार के लिए अनेक योजनाएँ बनाती हैं, पर उनकी योजनाओं का लाभ प्रत्येक गाँव में पहुँचना कठिन होता है। गाँव-गाँव में समृद्धि लाने का कार्य ग्राम पंचायत के योग्य सरपंच द्वारा ही संभव हो पाता है।

सरपंच बनने के बाद मेरे कार्य:
यदि मुझे ग्राम पंचायत का सरपंच बनने का मौका मिलता तो गाँववालों से पूछकर व भली-भाँति समझकर उनकी हर समस्या को दूर कर गाँव को समृद्धशाली बनाने का प्रयत्न करने के साथ-साथ मैं निम्नलिखित कार्य करता –

(i) नियमानुसार ग्राम पंचायत की मीटिंग बुलाता। ग्राम की समस्याओं पर विचार करके तथा वहाँ के स्थानीय लोगों के सहयोग से इन्हें सुलझाने की पूरी चेष्टा करता । पंचायत के मुख्य कार्य-गाँव की सफाई, प्रकाश व्यवस्था, शिक्षा, भूमि के मामूली झगड़े का निवारण, स्वास्थ्य की देखभाल, गाँवों के कच्चे रास्तों को पक्का करना, राहत कार्यों की देखभाल, बीज-खाद वितरण व्यवस्था, खेती के रोगों की रोकथाम, तालाबों, नलकूपों की समय-समय पर मरम्मत आदि को अपने सहयोगियों की मदद से अच्छी प्रकार करवाता ताकि गाँवों में शीघ्र परिवर्तन दिखाई देने लगता।

(ii) इन सब कार्यों को कराने हेतु पैसे की आवश्यकता होती। गाँव पंचायत की आय के साधन हैं- मवेशियों व घरों पर टैक्स, वाहनों पर टैक्स, आवासीय भूमि की बिक्री, मेला का टैक्स, चारागाह टैक्स, कृषि टैक्स, मवेशी पर लगे दंड द्वारा वसूला गया टैक्स । मैं इन सभी आय के साधनों को वसूल करवाने के लिए ईमानदार कर्मचारियों की नियुक्ति करता । समय-समय पर स्वयं निरीक्षण करता ताकि किसी भी स्तर पर टैक्सों की चोरी न हो। इसके लिए पंचायत की रोकड़ और रिकॉर्ड अनुभवी व शिक्षित व्यक्तियों से तैयार करवाता।

(iii) मैं यह भी निगरानी करता कि आय से प्राप्त धन का दुरुपयोग न हो, इसको जनता की सुविधा के लिए खर्च करने दिया जाए।

(iv) अपने प्यारे गाँववासियों को समय-समय पर यह भी बताता कि वे दहेज न लें, न दें । दहेज की बुराइयों को खूब विस्तार से समझाता । यह भी सलाह देता कि किसी मृत्यु पर व्यर्थ में पानी की तरह वे पैसा न बहाएँ बल्कि इसके धन से गाँव में अस्पताल व स्कूल खुलवाएँ ताकि कोई भी रोगी साधारण उपचार हेतु शहर की ओर न जाएँ तथा शिक्षा के लिए हमारे बच्चे कहीं अन्यत्र न जाएँ। कन्याओं के लिए भी कक्षा 10 तक स्कूल खुलवाने के लिए जनता का व सरकार का सहयोग लेने का भरसक प्रयत्न करता।

उपसंहार:
सरपंच के रूप में गाँवों का संपूर्ण विकास ही मेरा एकमात्र लक्ष्य रहता।

26. मरुभूमि का जीवन-धन : जल

प्रस्तावना:
जल मनुष्य के जीवन का प्रमुख साधन है। इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। सभी प्राकृतिक वस्तुओं में जल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। राजस्थान का अधिक भाग मरुस्थल है, जहाँ जल नाम मात्र को भी नहीं है, इस कारण यहाँ कभी-कभी भीषण अकाल पड़ता है। जल-संकट के कारण – राजस्थान के पूर्वी भाग में चंबल, दक्षिणी भाग में माही के अतिरिक्त कोई विशेष जल-स्रोत नहीं हैं, जो जल-आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। पश्चिमी भाग तो पूरा रेतीले टीलों से भरा हुआ निर्जल प्रदेश है जहाँ केवल इंदिरा गाँधी नहर ही एकमात्र आश्रय है। राजस्थान में जल-संकट के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं –

  • भूगर्भ के जल का तीव्र गति से दोहन हो रहा है। इससे जल-स्तर कम होता जा रहा है।
  • पेयजल के स्रोतों का सिंचाई में उपयोग होने से जल संकट बढ़ता जा रहा है ।
  • उद्योगों में जलापूर्ति भी आम लोगों को संकट में डाल रही है।
  • पंजाब, हरियाणा आदि पड़ोसी राज्यों का असहयोगात्मक रवैया भी जल-संकट का प्रमुख कारण है।
  • राजस्थान की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि वर्षा की कमी रहती है और यदि वर्षा हो भी जाए तो उसकी रेतीली जमीन में पानी का संग्रह नहीं हो पाता । निवारण हेतु

उपाय:
राजस्थान में जल-संकट के निवारण हेतु युद्ध स्तर पर प्रयास होने चाहिए अन्यथा यहाँ घोर संकट उपस्थित हो सकता है।

कुछ प्रमुख सुझाव इस प्रकार हैं –

  1. भूगर्भ के जल का असीमित दोहन रोका जाना चाहिए ।
  2. पेयजल के जो स्रोत हैं, उनका सिंचाई हेतु उपयोग न किया जाए। मानव की मूलभूत आवश्यकता का पहले ध्यान रखा जाए।
  3. वर्षा के जल को रोकने हेतु छोटे बाँधों का निर्माण किया जाए, ताकि वर्षा का जल जमीन में प्रवेश करे और जल-स्तर में वृद्धि हो।
  4. पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश की सरकारों से मित्रतापूर्वक व्यवहार रखकर आवश्यक मात्रा में जल प्राप्त किया जाए।

उपसंहार:
भारत में भूगर्भ जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। देश के सर्वाधिक उपजाऊ प्रदेश इस संकट के शिकार हो रहे हैं, फिर राजस्थान जैसे मरुभूमि प्रधान प्रदेशों के भावी जल-संकट की कल्पना ही सिहरा देने वाली है। अतः जल प्रबंधन हेतु शीघ्र सचेत और सक्रिय हो जाने में ही हमारा कल्याण निहित है।

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27. जल संकट : एक विकट समस्या

जल की महत्ता:
‘जल’ का एक नाम ‘जीवन’ भी है। सचमुच इस भूमंडल पर जल ही जीवन का आधार है। जल नहीं तो जीवन भी नहीं । प्रकृति ने मानव को भूमि, वायु, प्रकाश आदि की भाँति जल भी बड़ी उदारता से प्रदान किया है लेकिन मनुष्य ने अपनी मूर्खता और स्वार्थ के कारण प्रकृति के इस वरदान को भी दूषित और दुर्लभ बना दिया है।

जल संरक्षण का तात्पर्य:
जल संरक्षण का तात्पर्य है जल का अपव्यय रोकना और वर्षा के समय व्यर्थ बह जाने वाले जल को भविष्य के लिए र क्षित करके रखना । बताया जाता है कि धरती का तीन चौथाई भाग जल से ढंका हुआ है किन्तु पीने योग्य या पयोगी जल की मात्रा बहुत सीमित है । हम प्रायः धरती के भीतर स्थित जल को उपयोग में लाते हैं । कुएँ, हैण्डपंप, नलकूप, सबमर्सिबिल पम्प आदि से यह जल प्राप्त होता है। धरती के ऊपर नदी, तालाब, झील, झरनों आदि का जल उपयोग में आता है किन्तु प्रदूषण के चलते ये जल के स्रोत अनुपयोगी होते जा रहे हैं । धरती के भीतर स्थित जल की अंधाधुंध खिंचाई के कारण जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। यह भविष्य में जल के घोर संकट का संकेत है। अतः जल का संरक्षण करना अनिवार्य हो गया है।

राजस्थान में जल संरक्षण:
राजस्थान में धरती के अंदर जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। भू-गर्भ के जल का यहाँ जल-संरक्षण बहुत जरूरी है। संतुलन वर्षा के जल से होता है जो राजस्थान में अत्यन्त कम होती है अत: धरती को पानी वापस नहीं मिल पाता। अब जल-संरक्षण की चेतना जाग्रत हो रही है। लोग परम्परागत रीतियों से जल का भण्डारण कर रहे हैं। सरकार भी इस दिशा में प्रयास कर रही है । खेती में जल की बरबादी रोकने के लिए सिंचाई की फब्बारा पद्धति, पाइप लाइन से आपूर्ति, हौज-पद्धति, खेत में ही तालाब बनाने आदि को अपनाया जा रहा है। मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त श्री राजे – सिंह का ‘तरुण भारत संघ’ तथा अन्य स्वयंसेवी संगठन भी सहयोग कर रहे हैं।

जल संरक्षण के अन्य उपाय:
उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त जल संरक्षण के अन्य उपायों का अपनाया जाना भी परम आवश्यक है। शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियों तथा बोतल बंद जल बेचने वाले संस्थानों पर नियंत्रण किया जाना चाहिए । वर्षा के जल को संग्रह करके रखने के लिए तालाब, पोखर आदि अधिक से अधिक बनाये जाने चाहिए। नगरों में पानी का अपव्यय बहुत हो रहा है। अतः जल के अपव्यय पर कठोर नियंत्रण हो तथा सबमर्सिबिल पम्प आदि के साथ एक रिचार्ज बोरिंग अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।

जल संरक्षण सभी का दायित्व:
धरती के अंदर जल-स्तर का गिरते जाना आने वाले जल-संकट की चेतावनी है। भूमण्डल का वातावरण गर्म हो रहा है। इससे नदियों के जन्म-स्थल ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि हमारी प्रसिद्ध नदियों का नाम ही मात्र शेष रह जाये। यदि जल संकट इसी तरह बढ़ता गया तो निकट भविष्य में यह संघर्ष का कारण बन सकता है। कुछ विचारकों कहना है कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह जल पर अधिकार को लेकर होगा । अतः हम सभी का दायित्व है कि जल के संरक्षण में तन, मन, धन से योगदान करें।

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