RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति Important Questions and Answers.

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RBSE Class 12 Biology Chapter 9 Important Questions खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
निम्नलिखित फसलों की किस्मों में से दो रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन कीजिए- हिमगिरी, पूसा गौरव, पूसा कोमल, पूसा A - 4।
उत्तर:
हिमगिरी, पूसा कोमल।

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प्रश्न 2. 
नीली क्रान्ति की उपयोगिता बताइट।
उत्तर:
नीली क्रान्ति के कारण शिम्प (Shrimp) उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। 

प्रश्न 3. 
दुग्ध उत्पादन में औसत से कम दूध देने वाले जंतुओं के लिए सबसे उत्तम प्रजनन विधि का सुझाव दीजिए।
उत्तर:
बहि:संकरण (out crossing)। 

प्रश्न 4. 
नील क्रान्ति क्या है?
उत्तर:
नील क्रान्ति (Blue revolution) जलीय संसाधनों से हुए जैविक उत्पादन का परिचायक है। 

प्रश्न 5. 
गेहूँ की पर्ण या धारी किट्ट प्रतिरोधक किस्म का नाम बताइए।
उत्तर:
हिमगिरी। 

प्रश्न 6. 
कवक द्वारा फसलों में उत्पन्न कोई एक रोग का नाम लिखिए।
उत्तर:
कवक गेहूँ में स्टेम या ब्लैक रस्ट (Black rust) नामक रोग पैदा करते है।

प्रश्न 7. 
भेड़ की नयी नस्ल हिसारडेल के जनकों के नाम दीजिए।
उत्तर:
मेरिनो नस्ल का नर तथा बीकानेरी नस्ल की मादा भेड़ के संकरण से हिसारडेल का जन्म हुआ। 

प्रश्न 8. 
पोमेटो पादप का निर्माण किन दो पादपों के प्रोटोप्लास्ट संलयन से होता है?
उत्तर:
पोमेटो पादप पोटेटो (Potato) व टोमटो (Tomato) के प्रोटोप्लास्ट संलयन से बना है। 

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प्रश्न 9. 
डेयरी फार्म में दुग्ध उत्पादन प्राथमिक रूप से किस बात पर निर्भर करता है? 
उत्तर:
दुग्ध उत्पादन प्राथमिक रूप से दुधारू पशु की नस्ल पर निर्भर करता है। 

प्रश्न 10. 
'जर्सी' शब्द को आप किस पशु से जोड़ेंगे? 
उत्तर:
जर्सी गाय की एक उन्नत नस्ल है। 

प्रश्न 11. 
किस प्रकार की पशु प्रजनन विधि समयुग्मजता को बढ़ावा देती है? 
उत्तर:
अन्तः प्रजनन (Inbreeding) को। 

प्रश्न 12. 
लेगहान किस जीव की उन्नत नस्ल है? 
उत्तर:
मुर्गी की। 

प्रश्न 13. 
MOET का शब्द विस्तार कीजिए। 
उत्तर:
मल्टीपिल ओव्यूलेशन एम्ब्रियो ट्रांसफर (Multiple Ovulation Embryo Transfer)।

प्रश्न 14. 
भारतीय मधुमक्खी का वैज्ञानिक नाम लिखिष्ट। 
उत्तर:
एपिस इंडिका (Apis indica)। 

प्रश्न 15. 
एक स्वच्छ जलीय व एक समुद्री जल वाली खाद्य मछली के नाम लिखिए। 
उत्तर:
स्वच्छ जलीय मछली रोहू, समुद्री मछली पोमफ्रेट (Pomfrets)। 

प्रश्न 16. 
खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के लिए हरित क्रान्ति शब्द का प्रयोग किया गया, नीली क्रान्ति का प्रयोग क्या दर्शाता है? 
उत्तर:
जल कृषि (aquaculture) विशेष रूप से मछली उत्पादन में वृद्धि। 

प्रश्न 17. 
अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान कहाँ स्थित है? 
उत्तर:
मनीला, फिलीपींस (Philippines) में। 

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प्रश्न 18. 
धान की उन्नत किस्म IR - 8 का विकास कहाँ हुआ? 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) फिलीपींस में। 

प्रश्न 19. 
धान की दो उन्नत किस्मों के नाम लिखिए। 
उत्तर:
जया और रत्ना।

प्रश्न 20. 
उच्च प्रोटीन अंश वाली किस्म एटलस 66 किस पौधे से सम्बन्धित है?
उत्तर:
गेहूँ से। 

प्रश्न 21. 
एकल कोशिका प्रोटीन के रूप में प्रयोग किये जाने वाले प्रोटीन के अच्छे स्रोत एक सूक्ष्मजीव का नाम लिखिए। 
उत्तर:
स्पाइरुलीना (Spirulina)। 

प्रश्न 22. 
पूसा शुभ्रा किस फसल की रोग प्रतिरोधी किस्म है? 
उत्तर:
फूल गोभी (Cauliflower) की। 

प्रश्न 23. 
सरसों की श्वेत किट्टरोधी किस्म का नाम लिखिष्ट। 
उत्तर:
सरसों की पूसा स्वर्निम (Pusa Swarnim) किस्म श्वेत किट्टरोधी है।

प्रश्न 24. 
किसी एक ऐसे आकारिकीय लक्षण का नाम लिखिए जो पौधों को कीट प्रतिरोधी बनाता है। 
उत्तर:
रोमिल (Pubescent) अर्थात् छोटे-छोटे रोम (hairs) वाली पत्तियाँ। 

प्रश्न 25. 
कपास की किस प्रकार की किस्में बाल वॉम को आकर्षित नहीं करतीं? 
उत्तर:
मकरन्द रहित (nectarless) कपास की किस्में। 

प्रश्न 26. 
मक्का में एस्पार्टिक अम्ल का उच्च स्तर उसके लिए किस प्रकार लाभकारी है। 
उत्तर:
यह उसे मक्का के तना छेदक (stem borer) के लिए प्रतिरोधी बनाता है।

प्रश्न 27. 
पीले मोसेक विषाणु के लिए प्रतिरोधी भिण्डी की किस्म का नाम लिखिए। 
उत्तर:
परभानी भिण्डी (Parbhani bhindi)। 

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प्रश्न 28. 
मूंग में पाउडरी मिल्ड्यू के लिए प्रतिरोधकता किस विधि द्वारा विकसित की गई? 
उत्तर:
उत्परिवर्तन प्रजनन (mutation breeding) द्वारा। 

प्रश्न 29. 
पूर्णशक्तता का क्या अर्थ है? 
उत्तर:
पौधे की एक पृथक्कित व विभेदित कोशिका की पूर्ण पौधे में विकसित हो जाने की क्षमता पूर्ण शक्तता (totipotency) कहलाती है। 

प्रश्न 30. 
स्पाइरुलीना का क्या आर्थिक महत्व है?
उत्तर:
स्पाइरुलीना (Spirulina) प्रोटीन व खनिजों का अच्छा स्रोत है। अत: इसे एकल कोशिका प्रोटीन (single cell protein; SCP) के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

प्रश्न 31. 
वांछित लक्षणों के लिए समयुग्मता बढ़ाने के लिए मवेशियों में प्रयोग की जाने वाली कार्यनीति का नाम लिखिए।
उत्तर:
अन्तः प्रजनन (Inbreeding)। 

प्रश्न 32. 
इण्टरनेशनल सेन्टर फॉर व्हीट (गेहूँ) एण्ड मेज (मक्का) कहाँ स्थित है?
उत्तर:
मैक्सिको (Mexico) 

प्रश्न 33. 
निम्नलिखित के नाम लिखिए
(a) मधुमक्खी पालन के लिए उपयुक्त सर्वाधिक सामान्य मधुमक्खी प्रजाति 
(b) मुर्गे की कोई उन्नत नस्ल 
उत्तर:
(a) एपिस इंडिका (Apis indica)
(d) लैंगहान (Leghorn)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
(a) मछलियों की वैश्विक माँग की आपूर्ति के लिए उपयोग की जाने वाली दो तकनीकों के नाम लिखिए।
(b) अलवण जल की दो मछलियों के नाम लिखिए
उत्तर:
(a) जल कृषि (Aqua culture), मत्स्य पालन (Pisciculture) 
(b) कतला (catla) तथा रोहूँ (Rohu)। 

प्रश्न 2. 
(a) हमारी कुछ स्पीसीज (जाति) को फसलों के खेतों में मधुमक्खी पालन क्यों किया जाता है। व्याख्या कीजिए। ऐसी कुछ फसली प्रजातियों के नाम लिखिए। 
(b) सफल मधुमक्खी पालन के लिए ध्यान में रखने वाले तीन महत्वपूर्ण चरणों की सूची बनाइए।
उत्तर:
(a) मधुमक्खियाँ कुछ स्पीशीज (जाति) की फसलों में परागणकर्ता का कार्य करती हैं। पुष्पीकरण के समय इसके छत्तों को खेतों/बागों के बीच में रखने से पौधों की परागण क्षमता बढ़ती है। किसान को बढ़ी फसल के साथ शहद की अतिरिक्त आय होती है। इसलिए इन फसलों में मधुमक्खी पालन किया जाता है। उदारहणार्थ- सूर्यमुखी, सरसों, सेब तथा नाशपाती। 
(b) 

  • मधुमक्खियों की प्रकृति (Nature) तथा स्वभाव (Habit) का जाना 
  • मक्खी के छत्तों को रखने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन। 
  • विभिन्न मौसम में छत्तों का प्रबन्धन। 

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प्रश्न 3. 
उस हार्मोन का नाम लिखिष्ट जो मल्टीपल औव्यूलेशन हैम्ब्रियो ट्रांसफर (MOET) तकनीक द्वारा गाय को दिया जाता है। इस हार्मोन का प्रकार्य लिखिए।
उत्तर:
पुतिका प्रेरक हॉर्मोन (Follicle Stimulating Hormone; FSH)।
प्रकार्य (Function)- यह पुतक परिपक्वन (Follicular maturation) को प्रेरित कर सुपर ओव्यूलेशन की स्थिति बनाता है। अर्थात् गाय में एक अण्ड के बजाय 6 - 8 अण्डों का उत्पादन होता है। 

प्रश्न 4. 
शूक्ष्म प्रवर्धन तकनीक के कोई दो लाभों का उल्लेख कीजिष्ट। प्रयोगशाला में इस क्रिया को किस प्रकार किया जाता है। इस तकनीक द्वारा व्यावसायिक स्तर पर उगाए जाने वाले किन्हीं दो महत्वपूर्ण खाद्य - पादपों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शूक्ष्म प्रवर्धन तकनीक के लाभ (Advantages of Micropropagation Technique)-

  • शूक्ष्म प्रवर्धन तकनीक द्वारा कम समय में हजारों पौधों का निर्माण किया जा सकता है। 
  • इस तकनीक की सहायता से रोगमुक्त पादपों का निर्माण किया जाता है। 

प्रयोगशाला में शूक्ष्म प्रवर्धन तकनीक द्वारा नए पादपों के विकास में निम्न पद अपनाए जाते हैं-

  • प्रथम पद में रोगाणुरहित परिस्थितियों का निर्माण किया जाता है। 
  • द्वितीय पद में कोंतक को पोषक माध्यम में वांछनीय परिस्थितियों पर स्थानान्तरित करके नए पादप का निर्माण किया जाता है।
  • तृतीय पद में नवनिर्मित पादप को प्रयोगशाला में मृदा में रोपित किया जाता है तथा इसके पश्चात् इसे प्रयोगशाला से बाहर रोपण के लिए भेज दिया जाता है।

शूक्ष्म प्रवर्धन तकनीक का प्रयोग आलू, टमाटर, पान तथा गन्ना के व्यावसायिक उत्पादन में किया जाता है। 

प्रश्न 5. 
समुचित उदाहरण की सहायता से समझाइए कि पशुओं में नई नस्ल विकसित करने के लिए बहिःसंकरण कैसे सम्पन्न किया जाता है?
उत्तर:
बहिःसंकरण (Out Crossing) 
एक ही नस्ल के असम्बद्ध (unrelated) पशुओं के बीच कराया संगम बहि: संकरण (out crossing) कहलाता है। बहि: संकरण में पशु एक ही नस्ल के तो होते हैं परन्तु इसमें 4 - 6 पौड़ियों तक दोनों ओर को किसी भी वंशावली में उभयपूर्वज नहीं होना चाहिए। इस प्रकार बहिः संकरण से उत्पन्न संतति बहिः संकर (out cross) कहलाती है। बहि:संकरण दो परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है-
(a) ऐसे पशु जिनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता तथा मांस उत्पादन क्षमता औसत से कम होती है, तब इन दोनों गुणों में सुधार हेतु बहिःसंकरण अपनाया जाता है। 
(b) अन्तः प्रजनन अवसादन (Inbreeding depression) से छुटकारा पाने के लिए बहि:संकरण का प्रयोग किया जाता है। 

संकरण (Cross Breeding) 
इस प्रकार के पशु प्रजनन में एक नस्ल के उत्तम या श्रेष्ठ नर का दूसरी नस्ल की श्रेष्ठ मादा के साथ संगम कराया जाता है। संकरण दोनों जनकों के वांछित गुणों को एक साथ लाने में सहायक होता है। अर्थात एक पशु अगर उत्तम उत्पादकता वाला तथा दूसरा अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला हो तो संतति दोनों गुणों से सम्पन्न हो सकती है। संतति संकर पशुओं का प्रयोग व्यापारिक उत्पादन के लिए किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप से, संतति को अन्त: प्रजनन व चयन की प्रक्रिया से गुजार कर ऐसी स्थायी नस्ल विकसित की जा सकती है जो उपलब्ध नस्ल से बेहतर हो।

हिसारडेल (Hisardale) भेड़ की एक नयी नस्ल है जिसे मैरीनों नस्ल के नर (marino ram) व बीकानेरी नस्ल की मादा (Bikaneri ewes) के बीच हुए संकरण से प्राप्त किया गया है। गाय में करन स्विस (Karan Swiss), करन फ्रीस (Karan Fries) व फौजवाल (Frieswal) इसी प्रकार विकसित संकर नस्ल की गायें हैं जिन्हें देसी नस्ल व विदेशी नस्ल के बीच क्रॉस से उत्पन्न किया गया है। करन फ्रीज (Karan Fries) हालैण्ड की होल्स्टन फ्रीजन व भारत की थापरकर (Thaparkar) गाय के संकरण से बनी संकर नस्ल है। करन स्विस (Karan Swiss) स्विटजरलैंड की ब्राउन स्विस व भारत की साहीवाल (Sahiwal) गाय के संकरण से बनी नस्ल है। सुनन्दिनी (Sunandini) NDRI केरल में विकसित विदेशी व देशी नस्लों के संकरण से बनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली गाय है। जसी गाय गौवंश की एक उत्तम विदेशी नस्ल है। मुर्गी में गिरिराज (Giriraj) नस्ल, ILS - 82 व HH 260 संकर नस्ल हैं।

प्रश्न 6. 
(a) अंतः प्रजनन तथा बहिःप्रजनन में अंतर स्पष्ट कीजिए। 
(b) पशु प्रजनन में अन्तःप्रजनन के कोई तीन लाभ तथा एक महत्वपूर्ण हानि लिखिए।
उत्तर:
(a)

अन्तःप्रजनन

बहिःप्रजनन

एक ही नस्ल के व आपस में घनिष्ठता से सम्बद्ध पशुओं के बीच 4 से 6 पीढ़ी तक कराया गया संगम (mating) अन्तःप्रजनन (Inbreeding) कहलाता है।

आपस में बिना किसी सम्बन्ध वाले पशुओं के बीच कराया जाने वाला प्रजनन बहि:प्रजनन (Out breeding) कहलाता है।


(b) अन्तःप्रजनन के लाभ (Advantages of Inbreeding) 

  • जन्तुओं के शुद्ध वंशक्रम (Pure line) विकसित करने के लिए अन्तः प्रजनन आवश्यक है। 
  • अन्तःप्रजनन श्रेष्ठ या उत्तम जीवों का संचयन तथा कम जरूरी जीनों के निष्कासन में मदद करता है। 
  • अन्तःप्रजननी जौनों की उत्पादकता बढ़ती है।

अन्तःप्रजनन की हानि (Drawback of Inbreeding): अन्तः प्रजनन चयन में निष्कासित कर दिए गए हानिकारक अप्रभावी जीनों को प्रकट कर देता है। 

प्रश्न 7. 
मधुमक्खी पालन आय बढ़ाने का एक अच्छा उद्योग है। सफल मधुमक्खी पालन के लिए ध्यान रखने वाले बिन्दुओं (चरणों) को लिखिए। उस भारतीय प्रजाति का नाम लिखिए जिसका इस कार्य के लिए सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है।
उत्तर:
मधुमक्खी पालन (Bee keeping) 
व्यापारिक स्तर पर शहद के उत्पादन हेतु मधुमक्खियों का कृत्रिम छत्तों में पालन (छत्तों का रख - रखाव) ही मधुमक्खी पालन (apiculture) या (Bee keeping) कहलाता है। भारत में यह एक प्राचीन काल से चला आ रहा कुटीर उद्योग (cottage industry) है। 

मधुमक्खी पालन के लाभ (Advantages of Bee keeping) 
1. मधुमक्खी पालन से हमें प्रमुखतः शहद व बी वैक्स अर्थात मोम भी प्राप्त होता है। शहद (Honey) उच्च पोषक महत्व का आहार है इसमें विभिन्न प्रकार की शर्कराएँ, जैसे- लेबुलोज, डेक्सट्रोज व माल्टोज के अलावा अनेक एंजाइम, खनिज व विटामिन पाये जाते हैं। औषधियों की देशी प्रणाली (आयुर्वेद) में भी शहद का व्यापक प्रयोग किया जाता है। केक, आइसक्रीम व अन्य खाद्य उत्पादों के साथ प्रयोग किये जाने के कारण शहद की बढ़ती मांग ने मधुमक्खियों को बड़े पैमाने पर पालने के लिए बाध्य किया है। 

2. मोम (Bees wax) का प्रयोग विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों (cosmetics) व पालिश में किया जाता है। चाहे लघु स्तर पर किया गया हो या वृहद स्तर पर मधुमक्खी पालन आय उत्पादक उद्योग बन गया है। अतः अतिरिक्त आय का स्रोत है। यह एक स्थापित तथ्य है कि सूरजमुखी, सरसों जैसी फसल या फलों के बाग में मधुमक्खी पालन करने से फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, क्योंकि मधुमक्खियाँ अच्छी परागणकर्ता (pollinating agent) मानी जाती हैं। 

3. मधुमक्खी के विष (Bees venom) का प्रयोग कुछ रोगों के उपचार में किया जाता है।

मधुमक्खी की प्रजातियाँ (Species of Honey bees)
मधुमक्खी की अनेक प्रजातियों का पालन किया जाता है जिसमें सर्वाधिक प्रमुख एपिस इण्डिका (Apis indica) है। इसे सामान्य रूप से भारतीय मधुमक्खी कहा जाता है। यह मक्खी आक्रामक नहीं होती लेकिन इसकी उत्पादन क्षमता अधिक नहीं है। अन्य प्रमुख प्रजातियाँ हैं-
एपिस डोरसेटा (Apis dorsata) बड़ी मक्खी 
एपिस फ्लोरी (Apis florae) सबसे छोटी मक्खी 
एपिस मैलीफेरा (Apis mellifera) विदेशी (Exotic) या इटैलियन बी। 

मधुमक्खी पालन सरल है (Bee Keeping is easy) 
मधुमक्खी पालन एक सरल प्रक्रिया है जिसे किसी भी स्थान पर जहाँ पर्याप्त फलों के बगीचे, जंगली झाड़ियाँ, फूलदार फसल या चारागाह हो, किया जा सकता है। इसके लिए किसी बड़े खर्चे और तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। मधुमक्खियों के छत्तों को घर के आँगन, बरामदों या छत पर भी रखा जा सकता है। मधुमक्खी पालन में अधिक श्रम की भी आवश्यकता नहीं होती।
 RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति 1
मधुमक्खी पालन यद्यपि अपेक्षाकृत आसान है, परन्तु इसके लिए विशेष प्रकार के ज्ञान व कौशल की आवश्यकता होती है। कई सरकारी व गैर सरकारी संगठन मधुमक्खी पालन की शिक्षा प्रदान करते हैं। सफल मधुमक्खी पालन के लिए निम्नलिखित बिन्दु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं-

  • मधुमक्खियों की प्रकृति (nature) तथा स्वभाव (habits) का ज्ञान। 
  • मक्खी के छत्तों को रखने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन। 
  • मक्खियों के समूह (दल) को पकड़ना तथा छत्ते में रखना। 
  • विभिन्न मौसमों में छत्तों का प्रबन्धन। 
  • शहद तथा मोम का एकत्रीकरण.(collection) व रखरखाव। 

मधुमक्खियाँ सूर्यमुखी, सरसों, सेब तथा नाशपाती के पुष्पों में परागणकर्ता का कार्य करती हैं। पुष्पीकरण के समय इनके छत्तों को खेतों/बागों के बीच में रखने से पौधों की परागण क्षमता बढ़ती है। किसान को बड़ी फसल के साथ शहद की अतिरिक्त आय होती है।

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प्रश्न 8. 
पशुपालन में बहिःप्रजनन, बहिःसंकरण तथा पार - प्रजनन (संकरण) पद्धतियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बहिः प्रजनन (Out Breeding) 
आपस में बिना किसी सम्बंध वाले पशुओं के बीच कराया जाने वाला प्रजनन, वहि: प्रजनन (Out breeding) कहलाता है। 
यह निम्न प्रकार का हो सकता है-

  • एक ही नस्ल के (ऐसे जीवों के बीच जो आपस में सम्बद्ध नहीं हो अर्थात जो साझी पूर्वजता प्रदर्शित नहीं करते हों) जीवों के बीच। 
  • अलग - अलग नस्लों के जीवों के बीच (संकरण या Cross breeding) 
  • अलग - अलग प्रजातियों के बीच अन्तः प्रजातीय संकरण/अन्तः विशिष्ट संकरण (Interspecific hybridisation)

बहिःसंकरण (Out Crossing) 
एक ही नस्ल के असम्बद्ध (unrelated) पशुओं के बीच कराया संगम बहि: संकरण (out crossing) कहलाता है। बहि: संकरण में पशु एक ही नस्ल के तो होते हैं परन्तु इसमें 4 - 6 पौड़ियों तक दोनों ओर को किसी भी वंशावली में उभयपूर्वज नहीं होना चाहिए। इस प्रकार बहिः संकरण से उत्पन्न संतति बहिः संकर (out cross) कहलाती है। बहि:संकरण दो परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है-
(a) ऐसे पशु जिनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता तथा मांस उत्पादन क्षमता औसत से कम होती है, तब इन दोनों गुणों में सुधार हेतु बहिःसंकरण अपनाया जाता है। 
(b) अन्तः प्रजनन अवसादन (Inbreeding depression) से छुटकारा पाने के लिए बहि:संकरण का प्रयोग किया जाता है। 

संकरण (Cross Breeding) 
इस प्रकार के पशु प्रजनन में एक नस्ल के उत्तम या श्रेष्ठ नर का दूसरी नस्ल की श्रेष्ठ मादा के साथ संगम कराया जाता है। संकरण दोनों जनकों के वांछित गुणों को एक साथ लाने में सहायक होता है। अर्थात एक पशु अगर उत्तम उत्पादकता वाला तथा दूसरा अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला हो तो संतति दोनों गुणों से सम्पन्न हो सकती है। संतति संकर पशुओं का प्रयोग व्यापारिक उत्पादन के लिए किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप से, संतति को अन्त: प्रजनन व चयन की प्रक्रिया से गुजार कर ऐसी स्थायी नस्ल विकसित की जा सकती है जो उपलब्ध नस्ल से बेहतर हो।

हिसारडेल (Hisardale) भेड़ की एक नयी नस्ल है जिसे मैरीनों नस्ल के नर (marino ram) व बीकानेरी नस्ल की मादा (Bikaneri ewes) के बीच हुए संकरण से प्राप्त किया गया है। गाय में करन स्विस (Karan Swiss), करन फ्रीस (Karan Fries) व फौजवाल (Frieswal) इसी प्रकार विकसित संकर नस्ल की गायें हैं जिन्हें देसी नस्ल व विदेशी नस्ल के बीच क्रॉस से उत्पन्न किया गया है। करन फ्रीज (Karan Fries) हालैण्ड की होल्स्टन फ्रीजन व भारत की थापरकर (Thaparkar) गाय के संकरण से बनी संकर नस्ल है। करन स्विस (Karan Swiss) स्विटजरलैंड की ब्राउन स्विस व भारत की साहीवाल (Sahiwal) गाय के संकरण से बनी नस्ल है। सुनन्दिनी (Sunandini) NDRI केरल में विकसित विदेशी व देशी नस्लों के संकरण से बनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली गाय है। जसी गाय गौवंश की एक उत्तम विदेशी नस्ल है। मुर्गी में गिरिराज (Giriraj) नस्ल, ILS - 82 व HH 260 संकर नस्ल हैं।


प्रश्न 9. 
(a) कोई किसान अपने गन्ने की फसल में कौन - से वांछित गुण देखना चाहता है। 
(b) वांछित लक्षणों वाला गन्ना उगाने में पादप प्रजनन तकनीकों ने उत्तरी भारत के किसानों की किस प्रकार मदद की।
उत्तर:
(a) किसान अपने गन्ने की फसल में निम्न गुण देखना चाहता है-

  • फसल की उत्पादकता अधिक हो। 
  • फसल रोग प्रतिरोधी हो।
  • फसल अधिक शर्करा प्रदान करने वाली हो। 

(b) मूल रूप से उत्तरी भारत में गन्ने की सैकरम बारबेरी (Saccharum barberi) प्रजाति को उगाया जाता था। इसकी उत्पादकता एवं शर्करा की मात्रा कम थी। दूसरी ओर दक्षिण भारत में गन्ने की दूसरी प्रजाति सैकेरम आफिसिनेरम (Saccharum officinarum) उगायी जाती थी। यह उष्ण कटिबन्धीय प्रजाति मोटे तने तथा अधिक शर्करा वाली थी। लेकिन यह उत्तरी भारत में उगाने में सक्षम नहीं थी। पादप प्रजनन तकनीकों के प्रयोग से गन्ने की दोनों प्रजातियों को सफलतापूर्वक संकरित कराके ऐसी गन्ने की किस्म विकसित की गई जिसमें दोनों जनकों के वांछित गुण थे। अर्थात् यह मोटे तने वाली, अधिक शर्करा वाली, उच्च उत्पादकता वाली तथा साथ ही उत्तर भारत में उगने में सक्षम थी। इस प्रकार पादप प्रजनन तकनीकों ने उत्तरी भारत के किसानों की वांछित गुणों वाली गन्ने की प्रजाति विकसित करने में सहायता की। 

प्रश्न 10. 
(a) अन्तः प्रजनन अवसाद क्या होता है? 
(b) पशुओं के अन्तःप्रजनन के दौरान 'वरण' के महत्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(a) अन्तःप्रजनन अवसाद (Inbreeding Depression) लगातार किया गया अन्तः प्रजनन जीवों की उर्वरता (fertility) व उत्पादकता (productivity) कम कर देता है। इसे अन्तः प्रजनन अवसाद कहते हैं।

(b) उत्तम नर व मादा का वरण या चयन का अभिप्राय उच्च गुणवत्ता वाले पशु के चयन से है। उत्तम नर अन्य पशुओं की तुलना में उत्तम संतति पैदा करता है तथा भारवाही पशु के रूप में भी उत्तम होता है। उत्तम मादा वह गाय या भैसे हो सकती हैं जिसमें प्रति दुग्ध श्रावण काल (Pactation period) में अधिक दुग्ध उत्पादन होता है। उत्तम नर तथा मादा के संगम से उत्पन्न संतानों का पुनः वरण किया जाता है। 

प्रश्न 11. 
पादप प्रजनन के मुख्य चरण क्रमशः लिखिए। इसकी उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
पादप प्रजनन क्या है? (What is Plant Breeding?) 
"खेती के लिए अधिक उपयुक्त, अच्छा उत्पादन देने वाली व रोग प्रतिरोधी वांछित पादप किस्मों को तैयार करने हेतु पादप प्रजातियों में किये उद्देश्य पूर्ण फेर बदल पादप प्रजनन (plant breeding) कहलाते हैं।"
अथवा 
"पादप प्रजनन अनुप्रयोज्य वनस्पति विज्ञान की एक शाखा है जो आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों के सुधार से सम्बंधित है।" 
परम्परागत पादप प्रजनन का प्रयोग हजारों वर्ष से होता आ रहा है। मानव सभ्यता के आरम्भ से ही शुरू हो गये इस विज्ञान के अभिलेख 9000 - 11000 वर्ष पुराने हैं। आज के समय की अधिकांश फसलें प्राचीन समय में किये पौधों के घरेलूकरण (domestication) का ही परिणाम है। आज की अधिकांश खाद्य फसले पुरानी घरेलूकृत किस्मों से व्युत्पन्न हैं। प्रचलित पादप प्रजनन तकनीक के प्रमुख पद है - शुद्ध वंशक्रम (pure line) का संकरण (hybridization) तथा कृत्रिम चयन (artificial selection)। इन्हीं के द्वारा वांछित गुणों, जैसे - उच्च उत्पादन क्षमता, उच्च गुणवत्ता व रोग प्रतिरोधकता वाले पादपों का चयन होता है। आनुवंशिकी (Genetics), आण्विक जीव विज्ञान (molecular biology) व ऊतक सम्वर्धन (tissue culture) के क्षेत्र में हुई उन्नति के कारण आज पादप प्रजनन में आण्विक आनुवंशिकी के साधनों का प्रयोग किया जा रहा है।

घरेलूकरण 
किसी प्रजाति (जन्तु/पादप) का, उसके प्राकृतिक पर्यावरण से मानवीय देख - रेख व प्रबन्धन में ले आना घरेलूकरण (domestication) कहलाता है। किसी प्रजाति में आनुवंशिक बदलाव लाने के लिए उसका घरेलूकरण आवश्यक है। 

पादप प्रजनन के उद्देश्य (objectives of Plant Breeding) 
पादप प्रजनन में एक प्रजनक पौधे में निम्न गणों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यही पादप प्रजनन के उद्देश्य या आवश्यकताएँ हैं-

  1. उच्च उत्पादकता (Higher yield) यह पादप प्रजनन का प्रमुख उद्देश्य है। 
  2. बेहतर गुणवत्ता (Better quality) उपलब्ध फसल की गुणवत्ता में सुधार, जैसे - पोषक मान में सुधार। 
  3. रोग प्रतिरोधकता (Disease Resistance) विभिन्न रोगों, कीटों व अन्य पौड़कों (pest) के लिए प्रतिरोधकता (इसमें विषाणु, कवक जीवाणु, कृमि आदि रोगजनकों के लिए प्रतिरोधकता शामिल हैं।) 
  4. पर्यावरणीय तनावों/दबावों के प्रति बढ़ी सहनशीलता (increased tolerance to environmental stresses) जैसे - लवणीयता (salinity), अतिकारी ताप (extreme temperature) सूखा (drought) आदि को सहन करने की क्षमता। 
  5. किसी विशिष्ट कृषीय (agronomic) लक्षण का विकास, जैसे - बौनापन (dwarfism), अधिक शाखन (intensive branching) आदि।

RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

प्रश्न 12. 
पादप प्रजनन के उद्देश्य बताइए। किसी भी फसल की नई आनुवंशिक नस्ल के प्रजनन के चरण बताइए।
उत्तर:
पादप प्रजनन क्या है? (What is Plant Breeding?) 
"खेती के लिए अधिक उपयुक्त, अच्छा उत्पादन देने वाली व रोग प्रतिरोधी वांछित पादप किस्मों को तैयार करने हेतु पादप प्रजातियों में किये उद्देश्य पूर्ण फेर बदल पादप प्रजनन (plant breeding) कहलाते हैं।"
अथवा 
"पादप प्रजनन अनुप्रयोज्य वनस्पति विज्ञान की एक शाखा है जो आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों के सुधार से सम्बंधित है।" 

परम्परागत पादप प्रजनन का प्रयोग हजारों वर्ष से होता आ रहा है। मानव सभ्यता के आरम्भ से ही शुरू हो गये इस विज्ञान के अभिलेख 9000 - 11000 वर्ष पुराने हैं। आज के समय की अधिकांश फसलें प्राचीन समय में किये पौधों के घरेलूकरण (domestication) का ही परिणाम है। आज की अधिकांश खाद्य फसले पुरानी घरेलूकृत किस्मों से व्युत्पन्न हैं। प्रचलित पादप प्रजनन तकनीक के प्रमुख पद है - शुद्ध वंशक्रम (pure line) का संकरण (hybridization) तथा कृत्रिम चयन (artificial selection)। इन्हीं के द्वारा वांछित गुणों, जैसे - उच्च उत्पादन क्षमता, उच्च गुणवत्ता व रोग प्रतिरोधकता वाले पादपों का चयन होता है। आनुवंशिकी (Genetics), आण्विक जीव विज्ञान (molecular biology) व ऊतक सम्वर्धन (tissue culture) के क्षेत्र में हुई उन्नति के कारण आज पादप प्रजनन में आण्विक आनुवंशिकी के साधनों का प्रयोग किया जा रहा है।

घरेलूकरण 
किसी प्रजाति (जन्तु/पादप) का, उसके प्राकृतिक पर्यावरण से मानवीय देख - रेख व प्रबन्धन में ले आना घरेलूकरण (domestication) कहलाता है। किसी प्रजाति में आनुवंशिक बदलाव लाने के लिए उसका घरेलूकरण आवश्यक है। 

पादप प्रजनन के उद्देश्य (objectives of Plant Breeding) 
पादप प्रजनन में एक प्रजनक पौधे में निम्न गणों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यही पादप प्रजनन के उद्देश्य या आवश्यकताएँ हैं-

  1. उच्च उत्पादकता (Higher yield) यह पादप प्रजनन का प्रमुख उद्देश्य है। 
  2. बेहतर गुणवत्ता (Better quality) उपलब्ध फसल की गुणवत्ता में सुधार, जैसे - पोषक मान में सुधार। 
  3. रोग प्रतिरोधकता (Disease Resistance) विभिन्न रोगों, कीटों व अन्य पौड़कों (pest) के लिए प्रतिरोधकता (इसमें विषाणु, कवक जीवाणु, कृमि आदि रोगजनकों के लिए प्रतिरोधकता शामिल हैं।) 
  4. पर्यावरणीय तनावों/दबावों के प्रति बढ़ी सहनशीलता (increased tolerance to environmental stresses) जैसे - लवणीयता (salinity), अतिकारी ताप (extreme temperature) सूखा (drought) आदि को सहन करने की क्षमता। 
  5. किसी विशिष्ट कृषीय (agronomic) लक्षण का विकास, जैसे - बौनापन (dwarfism), अधिक शाखन (intensive branching) आदि।

प्रश्न 13. 
डेयरी फार्म प्रबन्धन की प्रक्रियाओं को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
डेयरी फार्म प्रबन्धन की निम्न प्रक्रियाएँ उल्लेखनीय हैं-

  1. डेयरी फार्म में पशुओं के रखने का स्थान पर्याप्त बड़ा होना चाहिए। 
  2. यह साफ सुथरा, शुष्क, हवादार तथा रोगाणुरहित होना चाहिए। 
  3. इसमें पीने के साफ पानी की व्यवस्था व पशुओं के मलमूत्र निष्कासन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 
  4. पशुओं के खाने (feed) में रेशे (roughage) व सान्द्रित पोषक (concentrates) का उचित अनुपात होना चाहिए। 
  5. पूरे फार्म में तथा पशुओं की देखरेख करने वाले व्यक्ति को भी वैयक्तिक स्वच्छता (personal hygiene) का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 
  6. बैटरिनरो डॉक्टर के नियमित आवधिक दौरे (visits) होने चाहिए। 
  7. पशुओं की नस्ल अच्छी होनी चाहिए। 

प्रश्न 14. 
उत्तरी भारत के क्षेत्रों में गन्ने के उच्च एवं वांछनीय गुण जैसे कि मोटा तना तथा उच्च शर्करा वाले पौधे प्राप्त करने के लिए कौन - सी तकनीक अपनाई गई? समझाइये।
उत्तर:
उत्तर भारत में पहले सैकेरम बारबेरी प्रजाति का गन्ना बोया जाता था जिसमें शर्करा कम थी और तथा उपज भी कम होती थी। दक्षिण भारत में बोया जाने वाला सैकेरम आफिसिनेरम (Saccharum, officinarum) का तना मोटा था व शर्करा अंश ज्यादा था लेकिन यह उत्तर भारत में उगने में अक्षम था। इन दोनों प्रजातियों के संकरण (hybridisation) से ऐसी किस्म प्राप्त की गई जो मोटे तने व उच्च शर्करा अंश वाली तो थी ही, साथ में उत्तर भारत में उगने में भी सक्षम थी।

प्रश्न 15. 
एक केला शाक वाइरस से संक्रमित हो गया है। इस शाक से आप केले का स्वस्थ पौधा कैसे प्राप्त करेंगे? समझाइये।
उत्तर:
किसी संक्रमित पौधे के भी शीर्षस्थ (apical) व कक्षस्थ (axillary) विभज्योतक (meristem) विषाणुमुक्त होते हैं। संक्रमित केले के इन भागों को कोंतक या एक्सप्लांट (explant) के रूप में पर्याप्त पोषक पदार्थों वाले संवर्धन माध्यम में निजीकृत परिस्थितियों में उगाने (अर्थात् ऊतक संवर्धन) से स्वस्थ केले के पौधे प्राप्त होंगे। 

प्रश्न 16. 
सूरजमुखी या सरसों उगाने वाले किसान को साथ में मधुमक्खी पालन से क्या लाभ है? 
अथवा
आप जीव विज्ञान के छात्र होने के कारण किसानों को कैसे समझायेंगे कि मधुमक्खी पालन इनके लिए आसान व आर्थिक दृष्टि से लाभदायक है।
उत्तर:
इसके लिए बहुत बड़े निवेश व तकनीकी कौशल की आवश्यकता नहीं होती तथा पष्यों वाले किसी भी खेत के पास प्रारम्भ किया जा सकता है। किसी भी किसान को मधुमक्खी पालन से शहद तथा मोम के रूप में अतिरिक्त आय तो होती ही है साथ ही सूरजमुखी व सरसों जैसे खेतों में मधुमक्खी पालन से परागण भी अधिक से अधिक फूलों में हो जाता है क्योंकि मधुमक्खी एक अच्छी परागणकर्ता होती है। इससे फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। 

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प्रश्न 17. 
कृत्रिम वीर्य सेचन का क्या महत्व है? 
उत्तर:

  • कृत्रिम वीर्य सेचन विधि में वीर्य को देश के विभिन्न भागों तक आसानी से भेजा जा सकता है तथा मादा पशु का अनावश्यक कष्टकारी परिवहन बच जाता है। 
  • एक नर पशु से प्राप्त वीर्य को अनेक मादाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है। 
  • वीर्य को बहुत दिनों तक हिमीकृत अवस्था (frozen form) में संग्रहित किया जा सकता है। 
  • उत्तम नस्ल की सन्तति की सुनिश्चितता होती है। 

प्रश्न 18. 
वांछित किस्म के मवेशियों की संख्या बढ़ाने में MOET कार्यक्रम सहायक रहा है। इस कार्यक्रम के विभिन्न चरणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बहिः प्रजनन (Out Breeding) 
आपस में बिना किसी सम्बंध वाले पशुओं के बीच कराया जाने वाला प्रजनन, वहि: प्रजनन (Out breeding) कहलाता है। 
यह निम्न प्रकार का हो सकता है-

  • एक ही नस्ल के (ऐसे जीवों के बीच जो आपस में सम्बद्ध नहीं हो अर्थात जो साझी पूर्वजता प्रदर्शित नहीं करते हों) जीवों के बीच। 
  • अलग - अलग नस्लों के जीवों के बीच (संकरण या Cross breeding) 
  • अलग - अलग प्रजातियों के बीच अन्तः प्रजातीय संकरण/अन्तः विशिष्ट संकरण (Interspecific hybridisation)

बहिःसंकरण (Out Crossing) 
एक ही नस्ल के असम्बद्ध (unrelated) पशुओं के बीच कराया संगम बहि: संकरण (out crossing) कहलाता है। बहि: संकरण में पशु एक ही नस्ल के तो होते हैं परन्तु इसमें 4 - 6 पौड़ियों तक दोनों ओर को किसी भी वंशावली में उभयपूर्वज नहीं होना चाहिए। इस प्रकार बहिः संकरण से उत्पन्न संतति बहिः संकर (out cross) कहलाती है। बहि:संकरण दो परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है-
(a) ऐसे पशु जिनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता तथा मांस उत्पादन क्षमता औसत से कम होती है, तब इन दोनों गुणों में सुधार हेतु बहिःसंकरण अपनाया जाता है। 
(b) अन्तः प्रजनन अवसादन (Inbreeding depression) से छुटकारा पाने के लिए बहि:संकरण का प्रयोग किया जाता है। 

संकरण (Cross Breeding) 
इस प्रकार के पशु प्रजनन में एक नस्ल के उत्तम या श्रेष्ठ नर का दूसरी नस्ल की श्रेष्ठ मादा के साथ संगम कराया जाता है। संकरण दोनों जनकों के वांछित गुणों को एक साथ लाने में सहायक होता है। अर्थात एक पशु अगर उत्तम उत्पादकता वाला तथा दूसरा अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला हो तो संतति दोनों गुणों से सम्पन्न हो सकती है। संतति संकर पशुओं का प्रयोग व्यापारिक उत्पादन के लिए किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप से, संतति को अन्त: प्रजनन व चयन की प्रक्रिया से गुजार कर ऐसी स्थायी नस्ल विकसित की जा सकती है जो उपलब्ध नस्ल से बेहतर हो।

हिसारडेल (Hisardale) भेड़ की एक नयी नस्ल है जिसे मैरीनों नस्ल के नर (marino ram) व बीकानेरी नस्ल की मादा (Bikaneri ewes) के बीच हुए संकरण से प्राप्त किया गया है। गाय में करन स्विस (Karan Swiss), करन फ्रीस (Karan Fries) व फौजवाल (Frieswal) इसी प्रकार विकसित संकर नस्ल की गायें हैं जिन्हें देसी नस्ल व विदेशी नस्ल के बीच क्रॉस से उत्पन्न किया गया है। करन फ्रीज (Karan Fries) हालैण्ड की होल्स्टन फ्रीजन व भारत की थापरकर (Thaparkar) गाय के संकरण से बनी संकर नस्ल है। करन स्विस (Karan Swiss) स्विटजरलैंड की ब्राउन स्विस व भारत की साहीवाल (Sahiwal) गाय के संकरण से बनी नस्ल है। सुनन्दिनी (Sunandini) NDRI केरल में विकसित विदेशी व देशी नस्लों के संकरण से बनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली गाय है। जसी गाय गौवंश की एक उत्तम विदेशी नस्ल है। मुर्गी में गिरिराज (Giriraj) नस्ल, ILS - 82 व HH 260 संकर नस्ल हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
कायिक संकरण किसे कहते हैं? इस प्रक्रिया में निहित विभिन्न चरण समझाइए। इसका क्या महत्व है?
उत्तर:
ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) 
परम्परागत प्रजनन तकनीकें धीमी होने के कारण, फसल उन्नयन कार्यक्रमों की बढ़ती मांगों को समय से व प्रभावशाली ढंग से पूरा करने में प्राय: सफल नहीं हो पाती। अत: इस कार्य के लिए एक नई तकनीक ऊतक सम्वर्धन (tissue culture) का विकास हुआ।
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"पादप ऊतक सम्वर्धन अजीकृत परिस्थितियों (aseptic conditions) में, किसी ठोस या तरल कृत्रिम सम्वर्धन माध्यम में पादप कोशिका, ऊतक या अंगों को उगाने की तकनीकी है"। 
पादप कोशिकाओं की एक विशिष्ट क्षमता, पूर्णशक्तता के कारण ऐसा किया जाना सम्भव हो सका। 

पूर्णशक्तता क्या है? (What is totipotency) 
"किसी पादप की वर्धी, विभेदित कोशिका (Somatic, differentiated eel) की उचित परिस्थितियाँ मिलने पर पूर्ण पादप में विकसित हो जाने की क्षमता पूर्णशक्तता या कोशिकीय पूर्णशक्तता (cellular totipotency) कहलाती है।" 

पूर्णशक्तता का पहला प्रमाण सन् 1950 में एफ. सी. स्टीवाई (EC. Steward) ने दिया। लेकिन हैबरलैट (Haberlandt) ने सन् 1902 में ही इस विचार को व्यक्त किया था लेकिन वह प्रमाण न दे सके। 

ऊतक सम्वर्धन की आवश्यकताएँ (Requirements of Tissue culture) 
ऊतक सम्वर्धन की आवश्यकताएँ हैं - सम्वर्धन माध्यम, निजीकृत परिस्थितियाँ व कत्तॊतकी। 
(i) सम्वर्धन माध्यम (Culture medium): किसी भी कोशिका, ऊतक या अंग की वृद्धि के लिए एक सम्वर्धन माध्यम (Culture medium) की आवश्यकता होती है। सम्वर्धन माध्यम ही उगने वाले ऊतक की पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। सम्बर्धन माध्यम ठोस व स्थिर (Solid and Static) हो सकता है या तरल (liquid)। सम्वर्धन माध्यम को टेस्ट ट्यूब, पेट्री डिश या फ्लास्क किसी भी उपकरण में रखा जा सकता है। 

बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए अधिक माध्यम व बड़े पात्र की आवश्यकता होती है। सम्वर्धन माध्यम में निम्न का होना आवश्यक है-

  1. कार्बन स्रोत (Source of Carbon) सम्वर्धन माध्यम में प्रायः सुक्रोस या अन्य शर्करा के रूप में एक कार्बन स्रोत का होना आवश्यक है। कार्बन स्रोत ही कोशिका की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 
  2. अन्य कार्बनिक पदार्थों में अमीनो अम्ल (amino acids) व विटामिन प्रमुख हैं। 
  3. अकार्बनिक लवण (Inorganic Salts) पादप कोशिकाओं की वृद्धि हेतु अनेक अकार्बनिक लवणों की आवश्यकता होती है। अत: माध्यम में नाइट्रोजन, कैल्शियम, पोटैशियम, फास्फोरस आदि प्रदान करने वाले लवण भी डाले जाते है। 
  4. वृद्धि नियामक (Growth Regulators) सम्वर्धन माध्यम में पादप ऊतक वृद्धि को पादप वृद्धि हार्मोन, जैसे आक्सिन (auxins), साइटोकाइनिन (cytokinins) आदि द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। माध्यम को ठोस बनाने के लिए अगर अगर (agar agar) का प्रयोग किया जाता है। 

(ii) निजीकृत परिस्थितियाँ (Aseptic Conditions): ऊतक सम्वर्धन सहित किसी भी प्रकार के सम्वर्धन में निजौकृत परिस्थितियों का विशिष्ट महत्व है। अगर निजीकृत परिस्थितियाँ नहीं होती तो सम्वर्धन माध्यम में अनेक अवांछित सूक्ष्मजीवों की भी वृद्धि प्रारम्भ हो सकती है। सूक्ष्मजीव हर स्थान पर उपलब्ध होते हैं तथा सम्वर्धन माध्यम सूक्ष्मजीवों के भोजन का कार्य करता है। अत: माध्यम में सूक्ष्मजीवों का उगना बहुत आसान होता है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए प्रयोगशाला के सभी उपकरणों, ग्लासवेयर जैसे परखनली, पलास्क व सम्वर्धन माध्यम को भी निजीकृत (sterile) किया जाता है। जहाँ ऊतक सम्वर्धन किया जा रहा है वह पूरा स्थान निजीकृत होता है। 

(iii) कोंतक या एक्सप्लाण्ट (Explant): पौधे की वह कोशिका/ऊतक/अंग जिसे सम्वर्धन माध्यम पर उगाया जाता है अर्थात जिससे सम्वर्धन का प्रारम्भ होता है कोंतक (explant) कहलाता है। एक्सप्लाण्ट को सम्वर्धन माध्यम में निजर्मीकृत परिस्थितियों में उगाने पर इससे पूरा पौधा विकसित हो जाता है। इस तकनीक द्वारा बहुत कम समय में पादपों की बड़ी संख्या तैयार की जा सकती है। ऊतक सम्वर्धन द्वारा हजारों पादपों के निर्माण की यह विधि सूक्ष्म प्रवर्धन (micropropagation) कहलाती है। सोमाक्लोन (Somaclones) ऊतक सम्वर्धन में एक छोटे से एक्सप्लाण्ट से अनेक पादप तैयार किये जाते हैं। यह सभी पौधे आनुवंशिक रूप से उस पौधे के समान होते है जिससे यह एक्सप्लाण्ट लिया गया था। चूंकि यह बिना लैंगिक जनन के केवल वीं विधि द्वारा उगते हैं। अत: यह सोमाक्लोन (Somaclone) कहलाते हैं।

ऊतक सम्वर्धन विधि द्वारा अनेक महत्वपूर्ण खाद्य पौधे, जैसे - टमाटर, केला, सेब आदि का व्यावसायिक उत्पादन किया गया है। विभज्योतक सम्वर्धन (Meristem Culture) ऊतक सम्बर्धन का एक महत्वपूर्ण प्रयोग संक्रमित रोगी पौधों से स्वस्थ पौधों की प्राप्ति है। विषाणु से संक्रमित एक पादप में इसका शीर्षस्थ (apical) व अक्षीय (axillary) विभज्योतक (meristem) विषाणु मुक्त होता है। अत: मेरिस्टेम को एक्सप्लाण्ट के रूप में प्रयोग करने पर इससे विषाणु मुक्त पौधे प्राप्त होते हैं। इन मेरिस्टेम को इन विट्रो परिस्थितियों (in vitro conditions) में उगाने पर अनेक स्वस्थ पौधे प्राप्त हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने मेरिस्टेम सम्वर्धन द्वारा केला, गन्ना, आलु आदि के पौधे तैयार करने में सफलता पाई है।

कायिक संकरण (Somatic Hybridization)
दो भिन्न - भिन्न किस्मों/प्रजातियों की कोशिकाओं से पृथक्कित, नग्न जीव द्रव्यों के युग्मन से कायिक संकर (Somatic hybrid) की प्राप्ति होती है। कायिक संकर विकसित करने की तकनीक ही कायिक संकरण (somatic hybridization) कहलाती है। इन संकरों को साइब्रिड (cybrid) भी कहा जाता है।

  1. कायिक संकरण का प्रथम पद है - कोशिकाओं से पेन्टिनेज व सेल्यूलेज एंजाइमों की मदद से कोशिका भित्ति अलग करना। 
  2. पादप कोशिका से कोशिका भित्ति के अलग हो जाने पर इसे जीवद्रव्य (protoplast) कहा जाता है। यह कोशिका कला से घिरा पादप कोशिका का जीवद्रव्य है। 
  3. अब कुछ रसायनों/क्षणिक अवधि के उच्च वोल्टेज इलैक्ट्रिक करेण्ट द्वारा दोनों जीवद्रव्यों को संलयित (fuse) कराया जाता है। 
  4. जब जीवद्रव्य को एक उचित माध्यम पर सम्वर्धित किया जाता है तब इनमें कोशिका भित्ति का पुनरुत्पादन (regeneration) हो जाता है। 
  5. यह कोशिका विभाजित होकर लघु पादपों (plantlers) का निर्माण कर देती है। 
  6. आलू व टमाटर की कोशिकाओं के जीवद्रव्य के संलयन से 'पोमेटो' (Pomato) का निर्माण किया गया लेकिन दुर्भाग्यवश इस पादप में व्यावसायिक उपयोग हेतु आवश्यक लक्षणों का अभाव था।
  7. कायिक संकरण से उन पादपों के बीच संकरण कराया जा सकता है जिनमें लैंगिक संकरण के सभी प्रयास विफल हुए हैं या जिनमें लैंगिक संकरण हो ही नहीं सकता। 
  8. धान व गाजर (carrot) के बीच कायिक संकर बनाये गये हैं लेकिन लैंगिक संकरों का निर्माण सफल नहीं हुआ। 
  9. कायिक संकरों का प्रयोग जीन स्थानान्तरण (gene transfer), कोशिका द्रव्य स्थानान्तरण (cytoplasm transfer) व पर बहुगुणित (allopolyploids) बनाने में किया जा सकता है। 

ऊतक सम्वर्धन का महत्व व प्रायोगिक अनुप्रयोग (Significance of Tissue Culture and Practical applications) 

  1. शूक्ष्म सम्वर्धन (micropropagation) द्वारा कम समय में हजारों पौधों का निर्माण किया जा सकता है। 
  2. चूँकि यह प्रयोग शाला में किया जाता है। अतः बाह्य पर्यावरणीय परिस्थितियों/मौसम का इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 
  3. ऊतक सम्वर्धन द्वारा सोमाक्लोन का निर्माण किया जाता है जिनकी विभिन्नताएँ अधिक महत्व की हैं। 
  4. विभज्योतक सम्वर्धन या मेरिस्टेम कल्चर (meristem culture) द्वारा रोग मुक्त पादपों का निर्माण किया जा सकता है। 
  5. बीज बनाने में अक्षम पौधों को इस विधि द्वारा तेजी से गुणित किया जा सकता है। 
  6. परागकण/पराग कोष सम्वर्धन (anther culture) का प्रयोग अगुणित पौधे (haploid plants) बनाने में किया जाता है, जिनको समयुग्मजी वंश क्रम (Homozygous line) बनाने में प्रयोग किया जाता है। उत्परिवर्तनों के अध्ययन में इनका विशिष्ट महत्व है। 
  7. भूण संर्वधन, बीजाण्ड सम्वर्धन, अण्डाशय सम्वर्धन आदि से विज्ञान की अनेक गुत्थियों को समझने में मदद मिली है। एम्ब्रियो रेस्क्यु (Embryo rescue) संकरण की सफलता हेतु आवश्यक है। 
  8. जीव द्रव्य संलयन तकनीक ने संकरण को नई विमाएँ (dimensions) दी हैं। इनसे दो प्रजाति ही नहीं वंशों के बीच भी संकरण कराया जा सकता है। 
  9. जर्म प्लाज्म के इन विट्रो संरक्षण व क्रायो प्रिजरवेशन में इसी तकनीक का प्रयोग होता है। 
  10. जनक पौधे (explant) के मूल गुण बनाये रखे जा सकते हैं क्योंकि इससे बने सभी पौधे इसके क्लोन होते हैं।

खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति से सम्बन्धित महत्वपूर्ण व रोचक तथ्य 

  1. विश्व की कुल 350000 ज्ञात पादप प्रजातियों में से लगभग 80000 खाद्य प्रजातियां है लेकिन वर्तमान में केवल 150 प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें से केवल 30 से हम अपनी कैलोरीज व प्रोटीन का 95% प्राप्त करते हैं। 
  2. दक्षिण अफ्रीका के कालाहारी रेगिस्तान के कंग लोग केवल दो पादप प्रजातियों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। 
  3. सैकेरम आफिसिनेरम में रेड रॉट के लिए प्रतिरोधकता सैकेरम स्पोन्टेनियम (Saccharum spontaneum) से प्राप्त हुई है। 'Co' canes कोयम्बटूर में विकसित गन्ना किस्में है। 
  4. आलू को अनेक रोगों के लिए प्रतिरोधी बनाने का श्रेय इसके वन्य सम्बन्धियों (wild relatives) को है। 
  5. धान की सबसे अधिक उगाई जाने वाली किस्म IR - 36 का विकास IARI में डॉ. गुरुदेव एस. खुश के नेतृत्व में हुआ था। 
  6. बफैलो (Buffalo) शब्द का प्रयोग विश्व के भिन्न - भिन्न हिस्सों में भिन्न - भिन्न प्रकार से होता है। अपने देश में भैसे (buffalo) शब्द से आशय जल भैस (water buffalo) से है। 
  7. सभी घरेलू बकरियों का विकास वन्य बकरी कोप्रा हिरकस (Copra hireus) से हुआ है। 
  8. रानीखेत (Ranikhet) पक्षियों जैसे मुगों का एक विषाणु जन्य रोग है। 
  9. कटला, सिंधारा, मागुर व सिंधी मछलियाँ पूरे भारत में पाई जाती हैं। 
  10. करन स्विस (Karan Swiss) संकर गाय की नस्ल को नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (National Dairy Research Institute) करनाल, हरियाणा में विकसित किया गया। 
  11. सुनन्दिनी (Sunandini) एक क्रास ब्रीड गाय है जिसे NDRI केरल में विकसित किया गया है।
  12. खुरपका या फुट एण्ड माउथ (Foot and Mouth) रोग पशुओं विशेषकर गौवंश का एक प्रमुख विषाणु संक्रमण है। 
  13. कश्मीरी व तिब्बतन बकरी का फर पशमीना (Pashmina) कहलाता है। 
  14. सेण्ट्रल एवियन रिसर्च इन्स्टीट्यूट इज्जतनगर यू.पी. में स्थित है। 
  15. गेहूँ व राई (rye) के संकरण से कृत्रिम फसल द्विटिकेल (Triticale) उत्पन्न की गई है। 
  16. पीली कटेली या आर्जीमोन मेक्सिकाना (Argemone mexicana) के बीज भारत में पादप प्रवेश (Plant introduction) के रूप में आये। यह एक खरपतवार (weed) है। 
  17. IARI की स्थापना बिहार के पूसा (Pusa) नामक स्थान पर हुई थी। बाद में IARI के दिल्ली में आ जाने के बाद इसे पूसा इन्स्टीटयूट कहा जाने लगा। 
  18. भारत में मथुरा, कानपुर व इंदौर गेहूँ की सबसे बड़ी मन्डी है। 
  19. अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRID की स्थापना सन् 1960 में फिलीपींस में हुई। यहीं से सन् 1966 में धान की उन्नत व अर्ध वामन किस्म IR - 8 विकसित हुई।

कायिक संकरण का महत्व-

  • इस विधि द्वारा उन पौधों के बीच संकरण कराया जा सकता है जिनके बीच पारम्पारिक प्रजनन असफल रहा है या हो ही नहीं सकता।
  • इस विधि का प्रयोग जीन' स्थानान्तरण व पुरबहुगुणित (allopolyploids) बनाने में किया जा सकता है। 

RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

प्रश्न 2. 
पौधों के उन लक्षणों का उल्लेख कीजिए जो उन्हें कीट पीड़कों के लिए प्रतिरोधी बनाते हैं। किन्हीं दो फसलों की कीट प्रतिरोधी किस्मों के नाम लिखिए। इस प्रकार की प्रतिरोधकता के लिए संकरण हेतु प्रतिरोधकता के स्रोत क्या होंगे? 
उत्तर:
नाशी कीट (कीट पीड़क) के लिए प्रतिरोधकता के विकास हेतु पादप प्रजनन (Plant Breeding for Developing Resistance to Insect Posts) 
कवक, जीवाणु व विषाणु रोगों के अतिरिक्त फसलों में होने वाले व्यापक नुकसान का एक और प्रमुख कारण, कीट (insect) व अन्य पीड़कों (pests) का ग्रसन (infestation) है। कुछ पौधों में अनेक आकारिकीय (morphological) कार्यिकीय (physiological) या जैव रासायनिक (biochemical) विशिष्टताओं के कारण प्रतिरोधकता होती है अर्थात् शारीरिक या रासायनिक लक्षण पौधे को कीट के प्रसन के लिए अभेद्य बना देते है। 

आकारिकीय विशिष्टताएँ (Morphological peculiarities) जो कीट द्वारा ग्रसन (infestation) में बाघा बनती है वह हैं-
(a) पत्तियों का रोमिल होना (hairy leaves) (Pubescent): पत्तियों पर रोम (hairs) की उपस्थिति कीट को पत्ती के मुख्य ऊतक तक पहुंचने में बाधक होती है। कपास में जैसिड (Jassids) व गेहूँ में सीरियल लीफ बीटल (Cereal Leaf Beetle) इसी प्रकार के उदाहरण हैं।
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(b) तने का ठोस व कठोर होना: तने के ठोस होने के कारण स्टेम सॉफ्लाई (Stem Sawfly) इन तनों को पसन्द नहीं करती। इसी प्रकार चिकनी पत्तियों वाली व मकरन्द विहीन (nectar less) कपास की किस्में बॉल वर्म (ball worm) को रास नहीं आता। अर्थात् इन विशिष्ट आकारिकीय लक्षणों के कारण यह पौधे कीटों से बचे रहते हैं। मोटी कोशिका भित्ति, सिलिका का जमाव, पत्रावरण (leaf sheath) का प्रकार धान को कुछ कीटों के लिए रोधी बनाते हैं। भिण्डी में मध्यशिरा व पत्रक पर लम्बे रोम होते हैं जो कीट को पत्ती तक नहीं पहुँचने देते। 

जैवरासायनिक विशिष्टताएँ: जो पौधों को कीटों से बचाये रखने में सहायक होती हैं का एक अच्छा उदाहरण मक्का का पौधा है। इसमें उपस्थित एस्पार्टिक अम्ल की उच्च सान्द्रता, कम नाइट्रोजन व शर्करा अंश मक्के के स्टेम बोरर (maize stem borer) को इससे दूर ही रखते हैं। मक्का में यूरोपियन कार्न बोरर (corn borer) के लिए प्रतिरोधकता एक एलीलौकैमीकल (MBOA) के कारण होती है यह एक रिपेलैण्ट (repellent) की तरह कार्य करता है। कददू कुल के पौधों में पाया जाने वाले पदार्थ कुकरबिटेसिन (cucurbitacines) कड़वे होते है व इसके प्रभाव से वह कीटों से बचे रहते हैं। पीड़कों या नाशी कीटों के लिए प्रतिरोधकता से सम्बन्धित प्रजनन विधि में वही सब पद होते हैं जो किसी अन्य कृषीय लक्षण (agronomic trait) जैसे उच्च उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता आदि के लिए किये पादप प्रजनन में शामिल होते हैं। कौटों के लिए प्रतिरोधकता की जीन के स्रोत अन्य फसली किस्में तथा इनके वन्य सम्बन्धी होते है। संकरण व चयन विधि से विकसित फसली पौधों की किस्में जिनमें कीट प्रतिरोधकता होती है निम्न सारणी में प्रदर्शित हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न सहित)

प्रश्न 1. 
पशुओं के खाने में उपस्थित होना चाहिए-
(a) रेशे (roughage) 
(b) सान्द्रित पोषक (concentrates) 
(c) उपर्युक्त दोनों
(d) विटामिन व खनिज 
उत्तर:
(c) उपर्युक्त दोनों

प्रश्न 2. 
निम्न में से कौन - सी मुर्गी की देशी नस्ल है-
(a) लेगहान
(b) असील 
(c) रोडे आइलैण्ड रेड 
(d) मिनोचा 
उत्तर:
(b) असील 

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प्रश्न 3. 
एक्वाकल्चर किसके सम्वर्धन से सम्बन्धित है-
(a) मछलियों व क्रस्टेशियन 
(b) मौलस्क 
(c) जलीय पौधे
(d) उपर्युक्त सभी। 
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी। 

प्रश्न 4. 
निम्न में से कौन - सी तकनीक गौवंश के वांछित गुणों में कमी ला देती है-
(a) बहिः प्रजनन
(b) बहुसंकरण 
(c) संकरण
(d) अन्तः प्रजनन। 
उत्तर:
(d) अन्तः प्रजनन। 

प्रश्न 5. 
MOET एक विधि है-
(a) गर्भ निरोधक की 
(b) पशुओं में संकरण की
(c) मछलियों के सम्बर्धन की 
(d) मधुमक्खी पालन की। 
उत्तर:
(b) पशुओं में संकरण की

प्रश्न 6. 
खच्चर (mule) एक उदाहरण है-
(a) अन्तः प्रजाति संकरण का 
(b) अन्तः प्रजनन का
(c) बहिः प्रजनन का 
(d) उपर्युक्त सभी का। 
उत्तर:
(a) अन्तः प्रजाति संकरण का 

प्रश्न 7. 
पोम्फ्रेट है-
(a) एक समुद्री मछली 
(b) कृत्रिम वीर्य सेचन तकनीक 
(c) उन्नत भेड़
(d) विदेशी नस्ल की मुर्गी। 
उत्तर:
(a) एक समुद्री मछली 

प्रश्न 8. 
अच्छी नस्ल की गाय को हार्मोन द्वारा उत्तेजित कर अधिक संख्या में अण्डों की मुक्ति कराना कहलाता है-
(a) इन विट्रो फर्टिलाइजेशन 
(b) एम्बियो ट्रांसफर
(c) सुपर ओव्यूलेशन 
(d) सरोगेसी। 
उत्तर:
(c) सुपर ओव्यूलेशन 

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प्रश्न 9. 
कतला है-
(a) भैंस की एक नस्ल 
(b) टी की नस्ल
(c) स्वच्छ जलीय मछली 
(d) क्रस्टेशियन। 
उत्तर:
(c) स्वच्छ जलीय मछली 

प्रश्न 10. 
प्रो० एम० एस० स्वामि नाथन हैं एक प्रसिद्ध-
(a) पुरातत्व विज्ञानी 
(b) पादप प्रजनक 
(c) कोशिका विज्ञानी 
(d) चिकित्सका
उत्तर:
(b) पादप प्रजनक 

प्रश्न 11. 
हेटेरोसिस है-
(a) परागकण बन्ध्यता 
(b) ऊतक क्षय 
(c) संकर ओज
(d) प्रेरित समयुग्मजवा। 
उत्तर:
(c) संकर ओज

प्रश्न 12. 
हिसारडेल है एक-
(a) बकरी
(b) भेड़ 
(c) भैस
(d) मधुमक्खी। 
उत्तर:
(b) भेड़ 

प्रश्न 13. 
संकर ओज का कारण है-
(a) समयुग्मजता
(b) विषमयुग्मजता 
(c) जीवद्रव्य कुंचन 
(d) सरोगेसी। 
उत्तर:
(b) विषमयुग्मजता 

प्रश्न 14. 
पादप प्रजातियों का उनकी वन्य अवस्था से मानव प्रबन्धन में लाना कहलाता है-
(a) घरेलूकरण (domestication) 
(b) विपुंसन (emasculation) 
(c) प्रवासन (migration)
(d) संकरण (hybridisation)। 
उत्तर:
(a) घरेलूकरण (domestication) 

प्रश्न 15. 
रोगजनक मुक्त पादप प्राप्त किये जाते हैं-
(a) बीजों से 
(b) संचित खाद्य वाले वर्षों भागों से 
(c) शीर्षस्थ विभज्योतक से
(d) भूमिगत तनों से। 
उत्तर:
(c) शीर्षस्थ विभज्योतक से

प्रश्न 16. 
डॉ० नार्मन बोरलॉग का नाम जुड़ा है-
(a) हरित क्रान्ति से
(b) ऑपरेशन फ्लड से 
(c) नीली क्रान्ति से 
(d) जैव प्रौद्योगिकी से। 
उत्तर:
(a) हरित क्रान्ति से

प्रश्न 17. 
एक विभेदित कोशिका की पूर्ण पौधे में विकसित होने की क्षमता कहलाती है-
(a) सूक्ष्म प्रवर्धन 
(b) पूर्ण शक्तता 
(c) सोमा क्लोन
(d) उत्परिवर्तनशीलता। 
उत्तर:
(b) पूर्ण शक्तता 

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प्रश्न 18. 
कायिक संकरण होता है-
(a) विभज्योतक संवर्धन 
(b) जीवद्रव्य संलयन
(c) जीवद्रव्य कुंचन 
(d) अन्तः प्रजातीय संकरण। 
उत्तर:
(b) जीवद्रव्य संलयन

प्रश्न 19. 
सुनन्दिनी नाम किस पशु की उन्नत नस्ल को दिया गया है-
(a) गाय
(b) भैंस 
(c) बकरी
(d) भेड़। 
उत्तर:
(a) गाय

प्रश्न 20. 
ट्रिटीकेल नामक कृत्रिम फसल में गेहूँ के पौधे को किस के साथ किये संकरण से बनाया गया है-
(a) जौ (Barley) 
(b) राई (Rye)
(c) ज्वार ((Sorghum) 
(d) बाजरा (pearl millet)। 
उत्तर:
(b) राई (Rye)

प्रश्न 21. 
निम्न में से कौन - सा सुमेलित है-
(a) एपीकल्चर - मधुमक्खी 
(b) पाइसीकल्चर - सिल्क मोथ 
(c) सेरीकल्चर - मछली
(d) एक्वाकल्चर - मच्छर। 
उत्तर:
(a) एपीकल्चर - मधुमक्खी 

प्रश्न 22. 
निम्न में से कौन - सा सुमेलित है-
(a) सेण्ट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट - शिमला 
(b) नेशनल बॉटनीकल रिसर्च इंस्टीट्यूट - दिल्ली 
(c) सेण्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट - कटक 
(d) सेण्ट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट - मैसूर।
उत्तर:
(d) सेण्ट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट - मैसूर।

प्रश्न 23. 
खली (oil cake) पशुओं के आहार में है-
(a) रफेज (roughage) 
(b) कन्सनट्रेट (concentrate) 
(c) औषधि
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं। 
उत्तर:
(b) कन्सनट्रेट (concentrate) 

प्रश्न 24. 
जया किस फसल की उन्नत नस्ल है-
(a) गेहूँ
(b) धान 
(c) सरसों
(d) फूल गोभी। 
उत्तर:
(b) धान 

प्रश्न 25. 
केन्द्रीय गन्ना प्रजनन केन्द्र स्थित है-
(a) कोयम्बटूर में 
(b) नई दिल्ली में 
(c) शिमला में
(d) जैसलमेर में। 
उत्तर:
(a) कोयम्बटूर में 

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प्रश्न 26. 
धान की IR - 8 कहाँ प्रजाति विकसित हुई है-
(a) IARI
(b) ICAR 
(c) IRRI
(d) CBRI
उत्तर:
(c) IRRI

प्रश्न 27. 
एकल कोशिका प्रोटीन में शामिल है-
(a) स्पाइरुलीना
(b) खाद्य कवक 
(c) (a) व (b)
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं। 
उत्तर:
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं। 

प्रश्न 28. 
मुर्रा एक उन्नत नस्ल है-
(a) बकरी की
(b) भैस की 
(c) गाय की
(d) ऊँट की। 
उत्तर:
(b) भैस की 

प्रश्न 29. 
निम्न में से सही कथन कौन - सा है-
(a) भारत में फिशरीज सफल उद्योग नहीं रहा है। 
(b) पशुओं में आहार आवश्यकताएँ सदा समान रहती है। 
(c) उत्परिवर्तन प्रजनन द्वारा पशुओं की अनेक उन्नत नस्ले विकसित की गई हैं। 
(d) पत्तियों पर रोमों की उपस्थिति पौधे को पीड़क कीट के लिए प्रतिरोधी बनाती है। 
उत्तर:
(d) पत्तियों पर रोमों की उपस्थिति पौधे को पीड़क कीट के लिए प्रतिरोधी बनाती है। 

प्रश्न 30. 
निम्न में से कौन - सा पौ? का कवक जन्य रोग है-
(a) लेट ब्लाइट ऑफ पोटेटो 
(b) मोजेक 
(c) लीफ कर्ल
(d) उपर्युक्त सभी। 
उत्तर:
(a) लेट ब्लाइट ऑफ पोटेटो

प्रश्न 31. 
रेड रॉट ऑफ शुगर केन का रोग जनक है एक-
(a) कवक
(b) जीवाणु
(c) विषाणु
(d) निमेटोड। 
उत्तर:
(a) कवक

प्रश्न 32. 
पादप ऊतक सम्वर्धन माध्यम में क्या सर्वाधिक महत्वपूर्ण है-
(a) सोडियम क्लोराइड 
(b) कार्बन स्रोत
(c) बिटामिन A 
(d) कोलेस्टेरॉल। 
उत्तर:
(b) कार्बन स्रोत

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प्रश्न 33. 
मिथाइलोफिलस मिकाइलोट्रोफस किसके उत्पादन में प्रयोग किया जाता है-
(a) बायोटिन
(b) मिथाइल एल्कोहोल 
(c) प्रोटीन
(d) बायोगैस। 
उत्तर:
(c) प्रोटीन

HOTS : Higher Order Thinking Skill Questions

प्रश्न 1. 
जर्म प्लाज्म संरक्षण व विनिमय में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग भूख और गरीबी के उन्मूलन में आवश्यक है। स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
पादप प्रजनन कार्यक्रमों की सफलता जर्म प्लाज्म की विभिन्नता के सभी सम्भावित स्रोतों से संग्रह पर निर्भर करती है। फसली पौधों के वन्य सम्बन्धी या किसी भी प्रकार से सम्बन्धित, पृथ्वी के किसी भी कोने में पाये जाने वाले जीवों के जीन/एलील के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और विनिमय से ही पादप व जन्तु प्रजनन के इस आधार को मजबूत बनाया जा सकता है। इसी से खाद्यान्न व पशु उत्पादों में वृद्धि कर लोगों को भूख से छुटकारा मिल सकता है। पशुपालन व कृषि के इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन के भी अवसरों में वृद्धि होगी जिससे गरीबी से मुक्ति मिलेगी। भारत में हरित क्रान्ति मैक्सिकन वैराइटीज के प्रवेश से ही सम्भव हुई। IR - 8 जैसी धान की उन्नत किस्म अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) फिलीपींस में विकसित हुई। अर्म प्लाज्म संरक्षण व विनिमय में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग भूख व गरीबी उन्मूलन हेतु आवश्यक है। 

प्रश्न 2. 
वैज्ञानिक जैव विविधता के संरक्षण, कम ज्ञात या जानकारी में नहीं आये जीवों के बारे में जानकारी जुटाने में क्यों लगे रहते हैं? 
उत्तर:
अभी तक खोजे नहीं गये या कम ज्ञात, जानकारी में नहीं आये जीव वांछित प्रकार के जनन द्रव्य (desired germplasm) का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते है। इसी प्रकार जैव विविधता के संरक्षणं से इसकी आनुवंशिक विविधता का भी संरक्षण होता है जो प्रजनन कार्यक्रमों में बहुत महत्त्व की हो सकती है। प्रत्येक आनुवंशिक विविधता दुर्लभ (rare) है तथा इनका संरक्षण करना चाहिए। 

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प्रश्न 3. 
नीली क्रान्ति का क्या महत्व है? 
उत्तर:
भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। पशुधन में भी तेजी से इजाफा हुआ है। कृषि योग्य भूमि के क्षेत्र में वृद्धि एक सीमा तक ही सम्भव होती है। हरित क्रान्ति ने हमें कुछ वर्षों के लिए खाद्य सुरक्षा की स्थिति में तो ला दिया है लेकिन अब तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने हरित क्रान्ति की सफलता को भी औना बनाना सिद्ध कर दिया है। खाद्य उत्पादन में वृद्धि का प्रयास कृषि व पशुपालन में परम्परगत प्रजनन व जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग द्वारा किया जा रहा है। लेकिन साथ - साथ 8000 किमी० से लम्बी तटीय सीमा व भरपूर वर्षा वाले इस देश में इन संसाधनों के भी मानव हित में पर्याप्त दोहन (exploitation) की आवश्यकता है। नीली क्रान्ति जल कृषि में तेजी से बढ़े उत्पादन से सम्बन्धित है। यह न सिर्फ खाद्य सुरक्षा में मदद कर रही है अपितु लोगों को कुपोषण से निजात दिलाने में भी मददगार है। भारत आज एक्वाकल्चर के उत्पादों के निर्यात से अच्छी विदेशी पूंजी प्राप्त कर रहा है।

NCERT EXEMPLAR PROBLEMS 

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
अच्छी तरह (100 से अधिक) पर पकाये चिकन व अण्डे से बर्ड फ्लु फैलने की सम्भावना है-
(a) बहुत अधिक
(b) अधिक 
(c) मध्यम
(d) बिल्कुल नहीं।
उत्तर:
(d) बिल्कुल नहीं।

प्रश्न 2. 
जन्तुओं का एक समूह जो वंश क्रम से सम्बद्ध (related by descent) है तथा समान लक्षण साझा करता है, कहलाता है-
(a) नस्ल (Breed) 
(b) रेस (Races)
(c) किस्म (Variery) 
(d) प्रजाति (Species)।
उत्तर:
(a) नस्ल (Breed) 

प्रश्न 3. 
पशुपालन में अन्तः प्रजनन कराया जाता है क्योंकि यह-
(a) ओज बढ़ाता है 
(b) नस्ल सुधारता है 
(c) विषम युग्मजता बढ़ाता है
(d) समयुग्मजता बढ़ाता है। 
उत्तर:
(d) समयुग्मजता बढ़ाता है। 

प्रश्न 4. 
सोनालिका व कल्यान सोना किसकी किस्में हैं-
(a) गेहूँ
(b) धान 
(c) मिलेट
(d) तम्बाकू। 
उत्तर:
(a) गेहूँ

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प्रश्न 5. 
निम्न में से कौन - सा कवकजन्य रोग नहीं है-
(a) गेहूँ की रस्ट
(b) बाजरे की स्मट 
(c) क्रूसीफर की ब्लैक रॉट 
(d) गन्ने की रेड रॉट। 
उत्तर:
(c) क्रूसीफर की ब्लैक रॉट 

प्रश्न 6. 
अनेक दक्षिण भारतीय राज्य प्रतिवर्ष धान की 2 - 3 फसल लेते हैं। कौन - सा कृषिय लक्षण इसे सम्भव बनाता है-
(a) धान के पौधे का छोटा (dwarf) होना 
(b) सिंचाई के अच्छे साधन 
(c) जल्दी पकने वाली धान की किस्में
(d) रोगप्रतिरोधी धान की किस्में। 
उत्तर:
(c) जल्दी पकने वाली धान की किस्में

प्रश्न 7. 
अपनी गन्ने की फसल में एक किसान निम्न में से कौन - सा संयोजन चुनेगा-
(a) मोटा तना, लम्बे पर्व, उच्च शर्करा व रोग प्रतिरोधकता 
(b) मोटा तना, उच्च शर्करा अंश व अच्छा पुष्पन 
(c) मोटा तना, छोटे पर्व (internode), उच्च शर्करा अंश व रोग प्रतिरोधकता 
(d) मोटा तना, कम शर्करा अंश, रोग प्रतिरोधकता। 
उत्तर:
(a) मोटा तना, लम्बे पर्व, उच्च शर्करा व रोग प्रतिरोधकता 

प्रश्न 8. 
किसी फसली पौधे की जीनों में क्षारकों का क्रम बदलने के लिए कुछ रसायनों व विकिरण का प्रयोग कहलाता है-
(a) पुनर्योगज DNA तकनीक 
(b) पराजीनी प्रक्रिया 
(c) उत्परिवर्तन प्रजनन
(d) जीन थेरपी। 
उत्तर:
(c) उत्परिवर्तन प्रजनन

प्रश्न 9. 
वह वैज्ञानिक प्रक्रिया जिसके द्वारा फसली पौधों को वांछित पोषक तत्वों से समृद्ध किया जाता है, कहलाती है-
(a) पादप सुरक्षा (Plant Protection) 
(b) प्रजनन (Breeding) 
(c) जैव प्रबलीकरण (Bio fortification)
(d) जैव उपचारण (Bio remediation)। 
उत्तर:
(c) जैव प्रबलीकरण (Bio fortification)

प्रश्न 10. 
शब्ब पूर्णशक्तता (totipotency) पौधों की किस क्षमता को बतलाता है-
(a) कोशिका को पूर्ण पादप बनाने की 
(b) कलिका की पूर्ण पादप बनाने की 
(c) बीजों के अंकुरित होने की
(d) कोशिका के आकार में वृद्धि की। 
उत्तर:
(a) कोशिका को पूर्ण पादप बनाने की 

प्रश्न 11. 
नीचे कायिक संकरण के सम्बन्ध में कुछ कथन दिये हैं इनके आधार पर सही विकल्प का चुनाव कीजिए-
(i) एक ही पौधे की विभिन्न कोशिकाओं के जीवद्रव्य का संलयन होता है। 
(ii) विभिन्न प्रजातियों की कोशिकाओं के जीवद्रव्य को संलवित किया जाता है।
(iii) कोशिकाऊ का सेल्यूलोज व पेक्टिनेज से उपचारण आवश्यक होता है। 
(iv) संकर जीवद्रव्य किसी एक जनक के जीवद्रव्य के लक्षण प्रदर्शित करता है। 
(a) (ii) व (iii) 
(b) (i) व (ii) 
(c) (i) व (iv)
(d) (ii) व (iv) 
उत्तर:
(a) (ii) व (iii) 

प्रश्न 12. 
कळ्तक (explant) है-
(a) मृत पादप
(b) पौधे का भाग 
(c) ऊतक सम्वर्धन में प्रयुक्त पौधे का भाग
(d) पौधे का वह भाग जिसमें विशिष्ट जीन अभिव्यक्त होती है 
उत्तर:
(c) ऊतक सम्वर्धन में प्रयुक्त पौधे का भाग

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प्रश्न 13. 
लाइसीन व ट्रिप्टोफन है-
(a) प्रोटीन 
(b) गैरजरूरी अमीनों अम्ल 
(c) जरूरी (आवश्यक) अमीनो अम्ल
(d) एरोमैटिक अम्ल 
उत्तर:
(c) जरूरी (आवश्यक) अमीनो अम्ल

प्रश्न 14. 
सूक्ष्म प्रवर्धन (micro propagation) है-
(a) सूक्ष्मजीवों का इन विट्रो प्रवर्धन 
(b) पौधों का इन विट्रो प्रवर्धन 
(c) कोशिकाओं का इन विट्रो प्रवर्धन
(d) पौधों को छोटे स्तर पर उगाना। 
उत्तर:
(b) पौधों का इन विट्रो प्रवर्धन 

प्रश्न 15. 
प्रोटोप्लास्ट है-
(a) जीवद्रव्य (protoplasm) का एक नाम 
(b) एक जन्तु कोशिका 
(c) कोशिका भित्तिरहित पादप कोशिका
(d) पादप कोशिका। 
उत्तर:
(c) कोशिका भित्तिरहित पादप कोशिका

प्रश्न 16. 
प्रोटोप्लास्ट को पृथक करने के लिए आवश्यक है-
(a) पेक्टीनेज 
(b) सेल्यूलेज 
(c) पेक्टीनेज व सेल्यूलेज दोनों
(d) काइटिनेजा 
उत्तर:
(c) पेक्टीनेज व सेल्यूलेज दोनों

प्रश्न 17. 
निम्न में से कौन - सी एक समुद्री मछली है-
(a) रोहू
(b) हिल्सा
(c) कतला
(d) कॉमन कार्पी 
उत्तर:
(b) हिल्सा

प्रश्न 18. 
किसी पौधे के सभी जीनों के सभी एलीलों का संग्रहण कहलाता है-
(a) जर्म प्लाज्म संग्रहण 
(b) जीवद्रव्य संग्रहण 
(c) हरबेरियम 
(d) सोमाक्लोनल कलेक्शन।
उत्तर:
(a) जर्म प्लाज्म संग्रहण 

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें 
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उत्तर:
(I) सेल्यूलेज, पेक्टिनेज, 
(II) कायिक संकरण, 
(III) पोमेटो, 
(IV) कायिक संकर। 
(Cellulase, Pectinase) (Somatic Hybridisation) (Pomato) (Somatic Hybrid) 

प्रश्न 2. 
पश प्रजनन में अगर दो घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित पशओं में कुछ पीढ़ियों तक प्रजनन कराया जाय तो ओज व प्रजनन क्षमता का हास होता है। इसका क्या कारण है? 
उत्तर:
इस घटना को अन्तः प्रजनन अवनमन (Inbreeding depression) कहा जाता है। प्रजनन क्षमता व ओज में इस कमी का कारण अप्रभावी एलीलों (recessive alleles) के एक साथ आने की प्रवृत्ति व सन्तति
में हानिकारक प्रभावों की अभिव्यक्ति है। 

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प्रश्न 3. 
क्या आप मानव द्वारा बनाई फसल के बारे में जानते है? इसका 'विकास कैसे हुआ? 
उत्तर:
ट्रिटिकेल (Triticale): इसे गेहूँ (ट्रिटिकम एस्टाइवम - Triticum aestivum) तथा राई (सीकेल सीरिएल - Secale cereale) के संकरण से बनाया गया। 

प्रश्न 4. 
हाल ही में पश्चिमी बंगाल, ओडीशा व महाराष्ट्र में लाखों मुर्गियों को मारा गया। इसका क्या कारण था? 
उत्तर:
इन राज्यों में यह मुर्गियाँ विषाणु H5 N1 से संक्रमित पायी गयी थीं। यह विषाणु बर्ड फ्लु का रोग जनक है जो एक पेन्डेमिक (Pandemic) रोग है।

प्रश्न 5. 
छिपी क्षधा (hidden hunger) से क्या अभिप्राय है? 
उत्तर:
संतुलित आहार न लेने अर्थात् पोषक पदार्थों विशेष रूप से सूक्ष्म पोषक तत्वों, जैसे - खनिज, विटामिन तथा प्रोटीन की कमी वाला आहार लेने से मनुष्य कुपोषित हो जाता है। इसी अवस्था को छिपी क्षुधा की अवस्था कहा जाता है। 

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
आप एक डेयरी फार्म स्थापित करने की योजना बना रहे हैं। इसको प्रारम्भ करने से पहले आप किन विभिन्न पहलुओं को दृष्टिगत रखेंगे? 
उत्तर:
दुग्ध उत्पादन की गुणवत्ता व मात्रा में सुधार हेतु निम्न प्रयास किये जायेगे:

  1. यह सुनिश्चित करना कि डेयरी में पशु उन्नत नस्ल (Improved breed) के हो, यदि नहीं हैं तो डेयरी में उन्नत नस्ल के पशु जैसे साहीवाल, करन स्विस आदि गाय तथा मुर्रा जैसी भैंसों का प्रबन्ध करना। 
  2. डेरी पशुओं के लिए रेशे (roughage) व सान्द्रित पोषक (concentrates) जैसे अनाज/खल (oil cake) का सही अनुपात सुनिश्चित करना अर्थात् सन्तुलित आहार। 
  3. पशुओं के रहने के स्थान पर सुनिश्चित करना कि वह साफ सुथरा (Clean) सूखा, हवादार पर्याप्त रूप से बड़ा हो। उसमें पीने के पानी का उचित प्रबन्ध हो तथा पशु के मलमूत्र निकासी का समुचित प्रबन्ध हो। 
  4. डेरौ में वेटरिनरी चिकित्सक का नियमित दौरा (visit) होता हो। 
  5. दूध दुहने वाले व अन्य कर्मचारी स्वस्थ व स्वच्छ हो तथा स्वच्छता के नियमों का पालन करते हों। 

प्रश्न 2. 
गेहूँ के उन तीन उन्नत गुणों का नाम लिखिए जिनके कारण हरित क्रान्ति सम्भव हो सकी। 
उत्तर:

  1. अहवामन प्रकृति (Semidwarf nature)
  2. उच्च उत्पादकता (High yielding) गुण 
  3. रोग प्रतिरोधकता (Disease resistance) गुण
  4. शीघ्र परिपक्वन (Early maturing/Quick yielding)। 

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प्रश्न 3. 
पौधों के तीन ऐसे लक्षण बताइयें जो कीट पीड़क का असम (infestation) रोकते हैं। 
उत्तर:

  • रोमिल पत्ती (Pubescent leaves) - पत्ती व अन्य वायवीय भागों पर रोमों की उपस्थिति। 
  • फूलों में मकरन्द (nectar) का अभाव, ठोस, तना अभेद्य तना, सिलिका का जमाव। 
  • पौधों का कड़वे रसायन या अन्य विषैले रसायन उत्पन्न करना। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
आप एक वनस्पति विज्ञानी हैं तथा पादप प्रजनन के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। एक नयी किस्म की निर्मुक्ति से पहले अपनाये जाने वाले उन सभी पदों का उल्लेख कीजिए जो आप अपनायेंगे। 
उत्तर:
पावप प्रजनन के विभिन्न चरण - विभिन्नताओं का संग्रहण (collection of variability), जनकों का मूल्यांकन तथा चयन (evaluation and selection of parents), चयनित जनकों के बीच संकरण (cross hybridization among the selected parents)। श्रेष्ठ पुनयोजन का चयन तथा परीक्षण (selection and testing of superior recombinants), नये कंषणों का परीक्षण, निर्मुक्ति तथा व्यावसायीकरण (testing, release and commercialization of new cutivars) 

पादप प्रजनन क्या है? (What is Plant Breeding?) 
"खेती के लिए अधिक उपयुक्त, अच्छा उत्पादन देने वाली व रोग प्रतिरोधी वांछित पादप किस्मों को तैयार करने हेतु पादप प्रजातियों में किये उद्देश्य पूर्ण फेर बदल पादप प्रजनन (plant breeding) कहलाते हैं।"
अथवा 
"पादप प्रजनन अनुप्रयोज्य वनस्पति विज्ञान की एक शाखा है जो आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों के सुधार से सम्बंधित है।" 

परम्परागत पादप प्रजनन का प्रयोग हजारों वर्ष से होता आ रहा है। मानव सभ्यता के आरम्भ से ही शुरू हो गये इस विज्ञान के अभिलेख 9000 - 11000 वर्ष पुराने हैं। आज के समय की अधिकांश फसलें प्राचीन समय में किये पौधों के घरेलूकरण (domestication) का ही परिणाम है। आज की अधिकांश खाद्य फसले पुरानी घरेलूकृत किस्मों से व्युत्पन्न हैं। प्रचलित पादप प्रजनन तकनीक के प्रमुख पद है - शुद्ध वंशक्रम (pure line) का संकरण (hybridization) तथा कृत्रिम चयन (artificial selection)। इन्हीं के द्वारा वांछित गुणों, जैसे - उच्च उत्पादन क्षमता, उच्च गुणवत्ता व रोग प्रतिरोधकता वाले पादपों का चयन होता है। आनुवंशिकी (Genetics), आण्विक जीव विज्ञान (molecular biology) व ऊतक सम्वर्धन (tissue culture) के क्षेत्र में हुई उन्नति के कारण आज पादप प्रजनन में आण्विक आनुवंशिकी के साधनों का प्रयोग किया जा रहा है।

घरेलूकरण 
किसी प्रजाति (जन्तु/पादप) का, उसके प्राकृतिक पर्यावरण से मानवीय देख - रेख व प्रबन्धन में ले आना घरेलूकरण (domestication) कहलाता है। किसी प्रजाति में आनुवंशिक बदलाव लाने के लिए उसका घरेलूकरण आवश्यक है। 

पादप प्रजनन के उद्देश्य (objectives of Plant Breeding) 
पादप प्रजनन में एक प्रजनक पौधे में निम्न गणों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यही पादप प्रजनन के उद्देश्य या आवश्यकताएँ हैं-

  1. उच्च उत्पादकता (Higher yield) यह पादप प्रजनन का प्रमुख उद्देश्य है। 
  2. बेहतर गुणवत्ता (Better quality) उपलब्ध फसल की गुणवत्ता में सुधार, जैसे - पोषक मान में सुधार। 
  3. रोग प्रतिरोधकता (Disease Resistance) विभिन्न रोगों, कीटों व अन्य पौड़कों (pest) के लिए प्रतिरोधकता (इसमें विषाणु, कवक जीवाणु, कृमि आदि रोगजनकों के लिए प्रतिरोधकता शामिल हैं।) 
  4. पर्यावरणीय तनावों/दबावों के प्रति बढ़ी सहनशीलता (increased tolerance to environmental stresses) जैसे - लवणीयता (salinity), अतिकारी ताप (extreme temperature) सूखा (drought) आदि को सहन करने की क्षमता। 
  5. किसी विशिष्ट कृषीय (agronomic) लक्षण का विकास, जैसे - बौनापन (dwarfism), अधिक शाखन (intensive branching) आदि।

RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

प्रश्न 2. 
क्या मधुमक्खी पालन किसान को अनेक लाभ देता है? इसका उस स्थिति में लाभ लिखिए जब यह फूलों की खेती वाले स्थान के पास किया जा रहा है। 
उत्तर:
मधुमक्खी पालन (Bee keeping) 
व्यापारिक स्तर पर शहद के उत्पादन हेतु मधुमक्खियों का कृत्रिम छत्तों में पालन (छत्तों का रख - रखाव) ही मधुमक्खी पालन (apiculture) या (Bee keeping) कहलाता है। भारत में यह एक प्राचीन काल से चला आ रहा कुटीर उद्योग (cottage industry) है। 

मधुमक्खी पालन के लाभ (Advantages of Bee keeping) 

  • मधुमक्खी पालन से हमें प्रमुखतः शहद व बी वैक्स अर्थात मोम भी प्राप्त होता है। शहद (Honey) उच्च पोषक महत्व का आहार है इसमें विभिन्न प्रकार की शर्कराएँ, जैसे- लेबुलोज, डेक्सट्रोज व माल्टोज के अलावा अनेक एंजाइम, खनिज व विटामिन पाये जाते हैं। औषधियों की देशी प्रणाली (आयुर्वेद) में भी शहद का व्यापक प्रयोग किया जाता है। केक, आइसक्रीम व अन्य खाद्य उत्पादों के साथ प्रयोग किये जाने के कारण शहद की बढ़ती मांग ने मधुमक्खियों को बड़े पैमाने पर पालने के लिए बाध्य किया है। 
  • मोम (Bees wax) का प्रयोग विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों (cosmetics) व पालिश में किया जाता है। चाहे लघु स्तर पर किया गया हो या वृहद स्तर पर मधुमक्खी पालन आय उत्पादक उद्योग बन गया है। अतः अतिरिक्त आय का स्रोत है। यह एक स्थापित तथ्य है कि सूरजमुखी, सरसों जैसी फसल या फलों के बाग में मधुमक्खी पालन करने से फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, क्योंकि मधुमक्खियाँ अच्छी परागणकर्ता (pollinating agent) मानी जाती हैं। 
  • मधुमक्खी के विष (Bees venom) का प्रयोग कुछ रोगों के उपचार में किया जाता है।

मधुमक्खी की प्रजातियाँ (Species of Honey bees)
मधुमक्खी की अनेक प्रजातियों का पालन किया जाता है जिसमें सर्वाधिक प्रमुख एपिस इण्डिका (Apis indica) है। इसे सामान्य रूप से भारतीय मधुमक्खी कहा जाता है। यह मक्खी आक्रामक नहीं होती लेकिन इसकी उत्पादन क्षमता अधिक नहीं है। अन्य प्रमुख प्रजातियाँ हैं-
एपिस डोरसेटा (Apis dorsata) बड़ी मक्खी 
एपिस फ्लोरी (Apis florae) सबसे छोटी मक्खी 
एपिस मैलीफेरा (Apis mellifera) विदेशी (Exotic) या इटैलियन बी। 

मधुमक्खी पालन सरल है (Bee Keeping is easy) 
मधुमक्खी पालन एक सरल प्रक्रिया है जिसे किसी भी स्थान पर जहाँ पर्याप्त फलों के बगीचे, जंगली झाड़ियाँ, फूलदार फसल या चारागाह हो, किया जा सकता है। इसके लिए किसी बड़े खर्चे और तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। मधुमक्खियों के छत्तों को घर के आँगन, बरामदों या छत पर भी रखा जा सकता है। मधुमक्खी पालन में अधिक श्रम की भी आवश्यकता नहीं होती।
RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति 1
मधुमक्खी पालन यद्यपि अपेक्षाकृत आसान है, परन्तु इसके लिए विशेष प्रकार के ज्ञान व कौशल की आवश्यकता होती है। कई सरकारी व गैर सरकारी संगठन मधुमक्खी पालन की शिक्षा प्रदान करते हैं। सफल मधुमक्खी पालन के लिए निम्नलिखित बिन्दु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं-

  1. मधुमक्खियों की प्रकृति (nature) तथा स्वभाव (habits) का ज्ञान। 
  2. मक्खी के छत्तों को रखने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन। 
  3. मक्खियों के समूह (दल) को पकड़ना तथा छत्ते में रखना। 
  4. विभिन्न मौसमों में छत्तों का प्रबन्धन। 
  5. शहद तथा मोम का एकत्रीकरण.(collection) व रखरखाव। 

मधुमक्खियाँ सूर्यमुखी, सरसों, सेब तथा नाशपाती के पुष्पों में परागणकर्ता का कार्य करती हैं। पुष्पीकरण के समय इनके छत्तों को खेतों/बागों के बीच में रखने से पौधों की परागण क्षमता बढ़ती है। किसान को बड़ी फसल के साथ शहद की अतिरिक्त आय होती है।

प्रश्न 3. 
फसल उन्नयन कार्यक्रमों में परम्परागत पादप प्रजनन तकनीकों की अपेक्षा ऊतक संवर्धन तकनीक का क्या लाभ है? 
उत्तर:
ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) 
परम्परागत प्रजनन तकनीकें धीमी होने के कारण, फसल उन्नयन कार्यक्रमों की बढ़ती मांगों को समय से व प्रभावशाली ढंग से पूरा करने में प्राय: सफल नहीं हो पाती। अत: इस कार्य के लिए एक नई तकनीक ऊतक सम्वर्धन (tissue culture) का विकास हुआ।
RBSE Class 12 Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति 2
"पादप ऊतक सम्वर्धन अजीकृत परिस्थितियों (aseptic conditions) में, किसी ठोस या तरल कृत्रिम सम्वर्धन माध्यम में पादप कोशिका, ऊतक या अंगों को उगाने की तकनीकी है"। 
पादप कोशिकाओं की एक विशिष्ट क्षमता, पूर्णशक्तता के कारण ऐसा किया जाना सम्भव हो सका। 

पूर्णशक्तता क्या है? (What is totipotency) 
"किसी पादप की वर्धी, विभेदित कोशिका (Somatic, differentiated eel) की उचित परिस्थितियाँ मिलने पर पूर्ण पादप में विकसित हो जाने की क्षमता पूर्णशक्तता या कोशिकीय पूर्णशक्तता (cellular totipotency) कहलाती है।" 

पूर्णशक्तता का पहला प्रमाण सन् 1950 में एफ. सी. स्टीवाई (EC. Steward) ने दिया। लेकिन हैबरलैट (Haberlandt) ने सन् 1902 में ही इस विचार को व्यक्त किया था लेकिन वह प्रमाण न दे सके। 

ऊतक सम्वर्धन की आवश्यकताएँ (Requirements of Tissue culture) 
ऊतक सम्वर्धन की आवश्यकताएँ हैं - सम्वर्धन माध्यम, निजीकृत परिस्थितियाँ व कत्तॊतकी। 
(i) सम्वर्धन माध्यम (Culture medium): किसी भी कोशिका, ऊतक या अंग की वृद्धि के लिए एक सम्वर्धन माध्यम (Culture medium) की आवश्यकता होती है। सम्वर्धन माध्यम ही उगने वाले ऊतक की पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। सम्बर्धन माध्यम ठोस व स्थिर (Solid and Static) हो सकता है या तरल (liquid)। सम्वर्धन माध्यम को टेस्ट ट्यूब, पेट्री डिश या फ्लास्क किसी भी उपकरण में रखा जा सकता है। 

बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए अधिक माध्यम व बड़े पात्र की आवश्यकता होती है। सम्वर्धन माध्यम में निम्न का होना आवश्यक है-

  • कार्बन स्रोत (Source of Carbon) सम्वर्धन माध्यम में प्रायः सुक्रोस या अन्य शर्करा के रूप में एक कार्बन स्रोत का होना आवश्यक है। कार्बन स्रोत ही कोशिका की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 
  • अन्य कार्बनिक पदार्थों में अमीनो अम्ल (amino acids) व विटामिन प्रमुख हैं। 
  • अकार्बनिक लवण (Inorganic Salts) पादप कोशिकाओं की वृद्धि हेतु अनेक अकार्बनिक लवणों की आवश्यकता होती है। अत: माध्यम में नाइट्रोजन, कैल्शियम, पोटैशियम, फास्फोरस आदि प्रदान करने वाले लवण भी डाले जाते है। 
  • वृद्धि नियामक (Growth Regulators) सम्वर्धन माध्यम में पादप ऊतक वृद्धि को पादप वृद्धि हार्मोन, जैसे आक्सिन (auxins), साइटोकाइनिन (cytokinins) आदि द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। माध्यम को ठोस बनाने के लिए अगर अगर (agar agar) का प्रयोग किया जाता है। 

(ii) निजीकृत परिस्थितियाँ (Aseptic Conditions): ऊतक सम्वर्धन सहित किसी भी प्रकार के सम्वर्धन में निजौकृत परिस्थितियों का विशिष्ट महत्व है। अगर निजीकृत परिस्थितियाँ नहीं होती तो सम्वर्धन माध्यम में अनेक अवांछित सूक्ष्मजीवों की भी वृद्धि प्रारम्भ हो सकती है। सूक्ष्मजीव हर स्थान पर उपलब्ध होते हैं तथा सम्वर्धन माध्यम सूक्ष्मजीवों के भोजन का कार्य करता है। अत: माध्यम में सूक्ष्मजीवों का उगना बहुत आसान होता है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए प्रयोगशाला के सभी उपकरणों, ग्लासवेयर जैसे परखनली, पलास्क व सम्वर्धन माध्यम को भी निजीकृत (sterile) किया जाता है। जहाँ ऊतक सम्वर्धन किया जा रहा है वह पूरा स्थान निजीकृत होता है। 

(iii) कोंतक या एक्सप्लाण्ट (Explant): पौधे की वह कोशिका/ऊतक/अंग जिसे सम्वर्धन माध्यम पर उगाया जाता है अर्थात जिससे सम्वर्धन का प्रारम्भ होता है कोंतक (explant) कहलाता है। एक्सप्लाण्ट को सम्वर्धन माध्यम में निजर्मीकृत परिस्थितियों में उगाने पर इससे पूरा पौधा विकसित हो जाता है। इस तकनीक द्वारा बहुत कम समय में पादपों की बड़ी संख्या तैयार की जा सकती है। ऊतक सम्वर्धन द्वारा हजारों पादपों के निर्माण की यह विधि सूक्ष्म प्रवर्धन (micropropagation) कहलाती है। सोमाक्लोन (Somaclones) ऊतक सम्वर्धन में एक छोटे से एक्सप्लाण्ट से अनेक पादप तैयार किये जाते हैं। यह सभी पौधे आनुवंशिक रूप से उस पौधे के समान होते है जिससे यह एक्सप्लाण्ट लिया गया था। चूंकि यह बिना लैंगिक जनन के केवल वीं विधि द्वारा उगते हैं। अत: यह सोमाक्लोन (Somaclone) कहलाते हैं।

ऊतक सम्वर्धन विधि द्वारा अनेक महत्वपूर्ण खाद्य पौधे, जैसे - टमाटर, केला, सेब आदि का व्यावसायिक उत्पादन किया गया है। विभज्योतक सम्वर्धन (Meristem Culture) ऊतक सम्बर्धन का एक महत्वपूर्ण प्रयोग संक्रमित रोगी पौधों से स्वस्थ पौधों की प्राप्ति है। विषाणु से संक्रमित एक पादप में इसका शीर्षस्थ (apical) व अक्षीय (axillary) विभज्योतक (meristem) विषाणु मुक्त होता है। अत: मेरिस्टेम को एक्सप्लाण्ट के रूप में प्रयोग करने पर इससे विषाणु मुक्त पौधे प्राप्त होते हैं। इन मेरिस्टेम को इन विट्रो परिस्थितियों (in vitro conditions) में उगाने पर अनेक स्वस्थ पौधे प्राप्त हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने मेरिस्टेम सम्वर्धन द्वारा केला, गन्ना, आलु आदि के पौधे तैयार करने में सफलता पाई है।

कायिक संकरण (Somatic Hybridization)
दो भिन्न - भिन्न किस्मों/प्रजातियों की कोशिकाओं से पृथक्कित, नग्न जीव द्रव्यों के युग्मन से कायिक संकर (Somatic hybrid) की प्राप्ति होती है। कायिक संकर विकसित करने की तकनीक ही कायिक संकरण (somatic hybridization) कहलाती है। इन संकरों को साइब्रिड (cybrid) भी कहा जाता है।

  1. कायिक संकरण का प्रथम पद है - कोशिकाओं से पेन्टिनेज व सेल्यूलेज एंजाइमों की मदद से कोशिका भित्ति अलग करना। 
  2. पादप कोशिका से कोशिका भित्ति के अलग हो जाने पर इसे जीवद्रव्य (protoplast) कहा जाता है। यह कोशिका कला से घिरा पादप कोशिका का जीवद्रव्य है। 
  3. अब कुछ रसायनों/क्षणिक अवधि के उच्च वोल्टेज इलैक्ट्रिक करेण्ट द्वारा दोनों जीवद्रव्यों को संलयित (fuse) कराया जाता है। 
  4. जब जीवद्रव्य को एक उचित माध्यम पर सम्वर्धित किया जाता है तब इनमें कोशिका भित्ति का पुनरुत्पादन (regeneration) हो जाता है। 
  5. यह कोशिका विभाजित होकर लघु पादपों (plantlers) का निर्माण कर देती है। 
  6. आलू व टमाटर की कोशिकाओं के जीवद्रव्य के संलयन से 'पोमेटो' (Pomato) का निर्माण किया गया लेकिन दुर्भाग्यवश इस पादप में व्यावसायिक उपयोग हेतु आवश्यक लक्षणों का अभाव था।
  7. कायिक संकरण से उन पादपों के बीच संकरण कराया जा सकता है जिनमें लैंगिक संकरण के सभी प्रयास विफल हुए हैं या जिनमें लैंगिक संकरण हो ही नहीं सकता। 
  8. धान व गाजर (carrot) के बीच कायिक संकर बनाये गये हैं लेकिन लैंगिक संकरों का निर्माण सफल नहीं हुआ। 
  9. कायिक संकरों का प्रयोग जीन स्थानान्तरण (gene transfer), कोशिका द्रव्य स्थानान्तरण (cytoplasm transfer) व पर बहुगुणित (allopolyploids) बनाने में किया जा सकता है। 

ऊतक सम्वर्धन का महत्व व प्रायोगिक अनुप्रयोग (Significance of Tissue Culture and Practical applications) 

  1. शूक्ष्म सम्वर्धन (micropropagation) द्वारा कम समय में हजारों पौधों का निर्माण किया जा सकता है। 
  2. चूँकि यह प्रयोग शाला में किया जाता है। अतः बाह्य पर्यावरणीय परिस्थितियों/मौसम का इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 
  3. ऊतक सम्वर्धन द्वारा सोमाक्लोन का निर्माण किया जाता है जिनकी विभिन्नताएँ अधिक महत्व की हैं। 
  4. विभज्योतक सम्वर्धन या मेरिस्टेम कल्चर (meristem culture) द्वारा रोग मुक्त पादपों का निर्माण किया जा सकता है। 
  5. बीज बनाने में अक्षम पौधों को इस विधि द्वारा तेजी से गुणित किया जा सकता है। 
  6. परागकण/पराग कोष सम्वर्धन (anther culture) का प्रयोग अगुणित पौधे (haploid plants) बनाने में किया जाता है, जिनको समयुग्मजी वंश क्रम (Homozygous line) बनाने में प्रयोग किया जाता है। उत्परिवर्तनों के अध्ययन में इनका विशिष्ट महत्व है। 
  7. भूण संर्वधन, बीजाण्ड सम्वर्धन, अण्डाशय सम्वर्धन आदि से विज्ञान की अनेक गुत्थियों को समझने में मदद मिली है। एम्ब्रियो रेस्क्यु (Embryo rescue) संकरण की सफलता हेतु आवश्यक है। 
  8. जीव द्रव्य संलयन तकनीक ने संकरण को नई विमाएँ (dimensions) दी हैं। इनसे दो प्रजाति ही नहीं वंशों के बीच भी संकरण कराया जा सकता है। 
  9. जर्म प्लाज्म के इन विट्रो संरक्षण व क्रायो प्रिजरवेशन में इसी तकनीक का प्रयोग होता है। 
  10. जनक पौधे (explant) के मूल गुण बनाये रखे जा सकते हैं क्योंकि इससे बने सभी पौधे इसके क्लोन होते हैं।

खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति से सम्बन्धित महत्वपूर्ण व रोचक तथ्य 

  1. विश्व की कुल 350000 ज्ञात पादप प्रजातियों में से लगभग 80000 खाद्य प्रजातियां है लेकिन वर्तमान में केवल 150 प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें से केवल 30 से हम अपनी कैलोरीज व प्रोटीन का 95% प्राप्त करते हैं। 
  2. दक्षिण अफ्रीका के कालाहारी रेगिस्तान के कंग लोग केवल दो पादप प्रजातियों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। 
  3. सैकेरम आफिसिनेरम में रेड रॉट के लिए प्रतिरोधकता सैकेरम स्पोन्टेनियम (Saccharum spontaneum) से प्राप्त हुई है। 'Co' canes कोयम्बटूर में विकसित गन्ना किस्में है। 
  4. आलू को अनेक रोगों के लिए प्रतिरोधी बनाने का श्रेय इसके वन्य सम्बन्धियों (wild relatives) को है। 
  5. धान की सबसे अधिक उगाई जाने वाली किस्म IR - 36 का विकास IARI में डॉ. गुरुदेव एस. खुश के नेतृत्व में हुआ था। 
  6. बफैलो (Buffalo) शब्द का प्रयोग विश्व के भिन्न - भिन्न हिस्सों में भिन्न - भिन्न प्रकार से होता है। अपने देश में भैसे (buffalo) शब्द से आशय जल भैस (water buffalo) से है। 
  7. सभी घरेलू बकरियों का विकास वन्य बकरी कोप्रा हिरकस (Copra hireus) से हुआ है। 
  8. रानीखेत (Ranikhet) पक्षियों जैसे मुगों का एक विषाणु जन्य रोग है। 
  9. कटला, सिंधारा, मागुर व सिंधी मछलियाँ पूरे भारत में पाई जाती हैं। 
  10. करन स्विस (Karan Swiss) संकर गाय की नस्ल को नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (National Dairy Research Institute) करनाल, हरियाणा में विकसित किया गया। 
  11. सुनन्दिनी (Sunandini) एक क्रास ब्रीड गाय है जिसे NDRI केरल में विकसित किया गया है।
  12. खुरपका या फुट एण्ड माउथ (Foot and Mouth) रोग पशुओं विशेषकर गौवंश का एक प्रमुख विषाणु संक्रमण है। 
  13. कश्मीरी व तिब्बतन बकरी का फर पशमीना (Pashmina) कहलाता है। 
  14. सेण्ट्रल एवियन रिसर्च इन्स्टीट्यूट इज्जतनगर यू.पी. में स्थित है। 
  15. गेहूँ व राई (rye) के संकरण से कृत्रिम फसल द्विटिकेल (Triticale) उत्पन्न की गई है। 
  16. पीली कटेली या आर्जीमोन मेक्सिकाना (Argemone mexicana) के बीज भारत में पादप प्रवेश (Plant introduction) के रूप में आये। यह एक खरपतवार (weed) है। 
  17. IARI की स्थापना बिहार के पूसा (Pusa) नामक स्थान पर हुई थी। बाद में IARI के दिल्ली में आ जाने के बाद इसे पूसा इन्स्टीटयूट कहा जाने लगा। 
  18. भारत में मथुरा, कानपुर व इंदौर गेहूँ की सबसे बड़ी मन्डी है। 
  19. अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRID की स्थापना सन् 1960 में फिलीपींस में हुई। यहीं से सन् 1966 में धान की उन्नत व अर्ध वामन किस्म IR - 8 विकसित हुई।
Bhagya
Last Updated on Dec. 4, 2023, 10:14 a.m.
Published Dec. 3, 2023