RBSE Class 7 Hindi रचना निबंध लेखन

RBSE Solutions for Class 7 Hindi

Rajasthan Board RBSE Class 7 Hindi रचना निबंध लेखन

प्रश्न-निम्नलिखित विषयों में से एक पर निबन्ध लिखिए।

1. स्वच्छ भारत : सुन्दर भारत

प्रस्तावना – स्वच्छता का अर्थ साफ-सफाई से है। साफसफाई से रहना मनुष्य जीवन के लिए अति आवश्यक है। यदि हम इस बात पर दृष्टि डालें तो हमारी माताएँ सुबह सो कर उठने के बाद सबसे पहले घर को झाड़ती-बुहारती हैं और घर के सभी सदस्य नहाने-धोने का काम करते हैं। यह स्वच्छता या साफ-सफाई का काम हमारा प्रमुख लक्ष्य दैनिक जीवन में एक सहज प्रक्रिया है, क्योंकि इसके पीछे हमारा प्रमुख लक्ष्य ‘नीरोगी काया’ बनाये रखना है।

स्वच्छ भारत, सुन्दर भारत अभियान – स्वच्छता का भाव हमारे मन से जुड़ा हुआ है। इसी भाव के प्रति जागरूकता सृजित करने के लिए तथा देश को साफ-सुथरा व गन्दगी से मुक्त बनाने के लिए हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रव्यापी ‘स्वच्छ भारत, सुन्दर भारत’ अभियान का औपचारिक शुभारम्भ 2 अक्टूबर, 2014 को गाँधी जयन्ती के शुभ अवसर पर नई दिल्ली में एक वाल्मीकि बस्ती में झाडू लगाकर किया।

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स्वच्छ भारत, सुन्दर भारत अभियान की घोषणा – स्वच्छ भारत, सुन्दर भारत अभियान की घोषणा वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर (15 अगस्त, 2014 को) लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में की थी। इसके तहत उन्होंने कहा था कि 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती तक देश को एक स्वच्छ भारत के रूप में प्रस्तुत करना है। उनके अनुसार यही गाँधीजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, क्योंकि गाँधीजी ने ही देशवासियों को ‘क्यूट इण्डिया, क्लीन इण्डिया’ का सन्देश दिया था।

स्वच्छता आन्दोलन का आह्वान – प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता आन्दोलन का आह्वान करते हुए सन्देश रूप में कहा कि हम मातृभूमि की स्वच्छता के लिए अपने आप को समर्पित कर दें। इसके लिए प्रत्येक सप्ताह दो घण्टे अर्थात् सभी देशवासी प्रतिवर्ष लगभग सौ घण्टे का योगदान करें। इसके साथ ही धार्मिक और राजनीतिक नेताओं, महापौरों, सरपंचों व उद्योगपतियों से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि वे शहरों, आसपास के क्षेत्रों, गाँवों, कार्य-स्थलों तथा घरों की स्वच्छता की कार्य-योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करने में जुट जाएँ। इसके लिए उन्होंने प्रत्येक ग्राम पंचायत को बीस-बीस लाख रुपये सालाना अनुदान देने की भी घोषणा की और ग्रामीण क्षेत्रों में 11.11 करोड़ शौचालयों के निर्माण के लिए 1.34 लाख करोड़ रुपयों की मंजूरी प्रदान कर दी।

उपसंहार – स्वच्छता ही जीवन है। स्वच्छ रहना हमारा अनिवार्य कर्म और धर्म है। इस सामाजिक एवं राष्ट्रीय दृष्टि से ‘स्वच्छ भारत, सुन्दर भारत’ अभियान एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य प्रधान अभियान है। इसमें हम सबकी भागीदारी वांछनीय है।

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2. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान

प्रस्तावना – वर्तमान काल में अनेक कारणों से मानवता कलंकित हो रही है। कहीं भोगवादी बुरी प्रवृत्ति है, तो कहीं लिंगभेद एवं वर्ग-भेद चल रहा है। कुछ दकियानूसी सोच वाले लोग बेटा या पुत्र को कुलदीपक और बुढ़ापे का सहारा मानते हैं तो बेटी को मुसीबतों की जड़ मानते हैं। इसी कारण वे कन्या-जन्म नहीं चाहते हैं और न चाहने पर भी यदि बेटी हो गई, तो उसे घर के कार्यों में लगाकर अशिक्षित रखते हैं। इस तरह की सोच से बेटी का जीवन अभिशाप बन रहा है।

सामाजिक चेतना का प्रसार – हमारे देश के निम्नमध्यमवर्गीय समाज में बेटी को पराया धन मानते हैं। इसलिए बेटी को पालना-पोषना, पढ़ाना-लिखाना और उसकी शादी पर काफी दहेज देना आदि बेवजह का भार मानते हैं। इसी दकियानूसी सोच के कारण ऐसे लोग घर में कन्या को जन्म नहीं देना चाहते हैं। वे चिकित्सकीय साधनों से गर्भावस्था में लिंग-परीक्षण करवाकर भ्रूण-हत्या करा देते हैं, कन्याजन्म को रोक देते हैं। इसका बुरा परिणाम यह दिखाई दे रहा है कि बालक-बालिकाओं के लिंगानुपात में बड़ा अन्तर स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा है, जो भावी समाज में दाम्पत्यजीवन के लिए बड़ा भारी संकट बन रहा है।

लिंगानुपात की इस बिगड़ती स्थिति को देखकर तथा सामाजिक गलत मानसिकता को लेकर सरकार की चिन्ता बढ़ गयी है। समाज का सही विकास हो और लोगों के दकियानूसी विचारों को नयी चेतना में बदला जावे, इस दृष्टि से सरकार ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है। सभी संचार माध्यमों से इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तथा ‘अबके बरस मोहि बिटिया ही दीजो’ जैसे मर्मस्पर्शी नारों के द्वारा कन्या-जन्म की मंगल कामना की जा रही है।

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अभियान एवं उद्देश्य – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के सम्बन्ध में हमारे राष्ट्रपति ने लोकसभा के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से जून, 2014 को सम्बोधित किया। जिसमें बेटी बचाओ, बेटी पढाओ, उनका संरक्षण और सशक्तीकरण किया जाए, पर जोर दिया गया। इस अभियान में लिंग परीक्षण से बालिका भ्रूण-हत्या को रोकना, बालिकाओं को पूर्ण संरक्षण तथा विकास के लिए शिक्षा से सम्बन्धित उनकी सभी गतिविधियों में पूर्ण भागीदारी की गई है। साथ ही उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं कौशल विकास के कार्यक्रमों में ‘मीडिया’ के माध्यम से हर तरह से उन्हें प्रोत्साहित करना मुख्य उद्देश्य है। इससे लिंग परीक्षण प्रतिबन्धित होगा और बेटियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

उपसंहार – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के प्रति सामाजिक जागरूकता आनी चाहिए और रूढ़िवादी सोच का डटकर विरोध करना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि सन्तान ईश्वर की देन है। इसी बदली सोच से ही बिगड़ते लिंगानुपात में परिवर्तन आयेगा और बेटियों को समाज में| सम्मानजनक स्थान प्राप्त होगा।

3. दीपावली
अथवा
हमारा प्रिय त्योहार
अथवा
दीपों का त्योहार : दीपावली

1. प्रस्तावना – भारत कृषि-प्रधान देश है। हमारे यहाँ त्योहारों एवं उत्सवों का विशेष महत्त्व है। जैसे ही ऋतु-परिवर्तन होता है, खेतों में नयी फसल पक जाती है, तब मानव-मन अपनी खुशी को उत्सवों और त्योहारों के रूप में प्रकट करता है। दीपावली भी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अपना विशेष महत्त्व रखता है।

2. मनाने का कारण – इस त्योहार को मनाने का एक कारण यह है कि इसी दिन भगवान् राम लंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त करके और चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उनके आने की खुशी में घर-घर में दीपक जलाये गये थे। उसी पुण्य-दिवस की खशी में यह त्योहार मनाया जाता है। इसके साथ ही इस त्योहार को मनाने के पीछे अन्य भी कारण माने जाते हैं। जैसे भगवान् कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस का वध; किसानों की धान की फसल का पकना आदि।

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3. उत्सव की शोभा-दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस त्योहार को मनाने के लिए घरों की सफाई, रंगाई, पुताई की जाती है। दीपावली के दिन गाँवों व शहरों में दीपक जलाये जाते हैं। बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी से घर, बाजार और दुकानें सजायी जाती हैं। सभी लोग लक्ष्मी-पूजन करते हैं।

मिठाइयाँ खाते हैं और पटाखे छुड़ाकर मन की खुशी को प्रकट करते हैं। अमावस्या के दो दिन पहले धनतेरस को लोग नये बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं। चतुर्दशी को छोटी दीवाली मनायी जाती है और अमावस्या के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। उसके दूसरे दिन भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाइयों के तिलक करती हैं और मिठाइयाँ खिलाती हैं।

4. लाभ-हानि – इस त्योहार से सबसे बड़ा लाभ यह है कि घरों की सफाई हो जाती है। लोगों के घर जा-जाकर मिलने से प्रेम-सहयोग की भावना का विकास होता है। इस त्योहार पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं। यह सबसे बड़ी हानि है।

5. उपसंहार – यह हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। यह समाज की सामूहिक मंगलेच्छा का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग सबकी खुशहाली और समृद्धि की मंगल कामना करते हैं। यह भारतीय जन-जीवन के आनन्द और उल्लास का त्योहार है।

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4. होली
अथवा
रंगों का त्योहार : होली
अथवा
हमारा प्रिय त्योहार

1. प्रस्तावना – हमारे देश में अनेक त्योहार मनाये जाते हैं। जैसे-दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी आदि। ये हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार हैं। होली रंगों का त्योहार है। इसलिए यह आनन्द और उमंग का त्योहार है।

2. मनाने का कारण – यह त्योहार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस त्योहार को मनाने के संबंध में दो बातें कही जा सकती हैं। पहली तो यह कि इस त्योहार पर फसलें पकने को तैयार होती हैं। हिन्दुओं की लोक मान्यता है कि देवता को भोग लगाये बिना कोई वस्तु उपयोग में नहीं ली जानी चाहिए। इसीलिए नये अन्न की आहुति अग्नि में डालते हैं। इसी परम्परा से होली का त्योहार मनाते हैं। दूसरी बात यह है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा हुआ। वह दुष्ट था और अपने आपको ही भगवान् मानता था।

उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का परम भक्त था। वह उसे ईश्वर की भक्ति न करने के लिए बार-बार मना करता था। पुत्र द्वारा न मानने पर पिता ने उसे अनेक कष्ट दिए, पर वह फिर भी नहीं माना। अन्त में उसने अपनी बहिन होलिका से कहा कि तुम प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ जाओ। होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ गयी, लेकिन प्रह्लाद न जलकर होलिका अग्नि में भस्म हो गयी। तब से यह त्योहार मनाया जाता है।

3. मनाने की विधि – फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन किया जाता है। दूसरे दिन दोपहर तक सभी बड़े-बूढ़े, बच्चे अपने-अपने समूह में मिलकर रंग और गुलाल से होली खेलते हैं। एक-दूसरे के गले मिलते हैं। इस दिन पूरा वातावरण रंगीला हो जाता है। शाम के समय नहाधोकर नये कपड़े पहन कर एक-दूसरे के घर मिलने जाते हैं, बधाइयाँ देते हैं और मिठाइयाँ खाते हैं।

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4. त्योहार की अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ – इस त्योहार की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि लोग इस अवसर पर पुराने गिले-शिकवे भूलकर आपस में गले मिलते हैं। प्रेम-व्यवहार को आपस में बढ़ाते हैं। बुराई की दृष्टि से कुछ लोग इस अवसर पर नशे में चूर होकर एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकते हैं।

5. उपसंहार – होली मिलन और आनन्द का त्योहार है। इसलिए हमें इस त्योहार पर अभद्र प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, बल्कि एक-दूसरे के गले मिलकर आपसी प्रेमव्यवहार बढ़ाना चाहिए। हम सबको मिलकर इसके सांस्कृतिक महत्त्व को समझना चाहिए।

5. रक्षाबन्धन

1. प्रस्तावना – त्योहार मनाने की हमारी प्राचीन परम्परा है। आर्यों के सामाजिक जीवन में मानसिक थकान व रोजाना के कामों की ऊब को मिटाने की दृष्टि से किसी न किसी बहाने से कोई त्योहार मनाया जाता था, जिसमें उल्लास एवं खुशियाँ प्रकट की जाती थीं। आर्यों की वर्ण-व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक वर्ण का एक विशेष त्योहार होता था। जिस प्रकार दीपावली का संबंध विशेषकर वैश्य वर्ग से है, उसी प्रकार रक्षाबन्धन का संबंध सदैव ही ब्राह्मण वर्ग से माना जाता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि अन्य वर्ग वाले इसे नहीं मनाते हैं। आस्था की दृष्टि से आज भी सभी वर्गों के व्यक्ति इस त्योहार को बड़ी खुशी के साथ मनाते हैं।

2. मनाने का कारण – रक्षा-बन्धन के त्योहार को मनाने के पीछे अनेक दन्तकथाएँ हैं। वामनावतार और राजा बलि की पौराणिक कथा इससे सम्बन्धित है। वैसे तो प्राचीन समय में वैदिक आचार्य अपने शिष्य के हाथ में रक्षा का सूत्र बाँधकर उसे वेदशास्त्र में पारंगत करते थे, परन्तु आज इन बातों का महत्त्व निरर्थक है। अब इस त्योहार ने भाई-बहिन के पवित्र रिश्ते का रूप धारण कर लिया है।

3. मनाने का तरीका – श्रावण की पूर्णिमा को रक्षाबन्धन का त्योहार उल्लास व उमंग के साथ मनाया जाता है। विशेषकर राजस्थान में तो यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। बहिनें नवीन वस्त्र धारण कर अपने भाइयों के ललाट पर मंगल तिलक लगाती हैं, उन्हें मिठाई खिलाती हैं तथा उनके हाथों में राखी बाँधती हैं। यदि राखी के त्योहार पर किसी बहिन को अपना भाई नहीं मिलता है, तो उसे बड़ा दुःख होता है। रक्षाबन्धन पर ‘राखी-सूत्र’ के बदले भाई अपनी बहिन को धन देकर सहायता करता है। वास्तव में यह त्योहार भाई-बहिन के पवित्र संबंधों का त्योहार है।

4. महत्त्व – रक्षाबन्धन एक सांस्कृतिक त्योहार ही नहीं है, अपितु सामाजिक महत्त्व का त्योहार भी है। इसे राजस्थान के इतिहास में भी महत्त्व दिया गया है। कहा जाता है कि रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा के लिए मुसलमान बादशाह हुमायूँ को अपना ‘राखी-बन्ध’ भाई बनाया था, जिसने मुसीबत के समय रानी की सहायता की थी।

5. उपसंहार – इस प्रकार हम देखते हैं कि अन्य त्योहारों की भाँति रक्षा-बन्धन का त्योहार भारत में हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहारों में माना जाता है। इस अवसर पर भाई व बहिन परस्पर स्नेह-बन्धन की परम्परा को स्वीकार करते हैं तथा अपना कर्तव्य पालन करने की प्रतिज्ञा करते हुए हमारे सामाजिक जीवन की आधारशिला को दृढ़ करते हैं।

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6. स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त)
अथवा
राष्ट्रीय पर्व : स्वतन्त्रता दिवस

1. प्रस्तावना-हमारे देश भारत पर 15 अगस्त, 1947 से पहले अंग्रेजों का राज्य था। उनके राज्य में हमारा देश परतन्त्र था। देश की आजादी के लिए हमारे देशभक्त शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान किया। लगभग सौ वर्षों के निरन्तर संघर्ष के बाद देश को आजादी प्राप्त हुई। यह आजादी हमें 15 अगस्त, 1947 को प्राप्त हुई। इसलिए यह दिवस भारतीय इतिहास में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

2. मनाने के कारण-इस दिन हमने अंग्रेज-शासन से मुक्ति पायी थी। इस दिवस को मनाने के मूल में प्रमुख कारण देश को आजादी दिलाने में जिन लोगों ने अपना बलिदान दिया, उन्हें श्रद्धांजलि देना तथा आजादी हमेशा कायम रहे, इसके लिए शपथ लेना रहा है। इसीलिए प्रतिवर्ष 15 अगस्त के दिन यह दिवस राष्ट्रीय पर्व के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है।

3. विभिन्न कार्यक्रम – यह राष्ट्रीय पर्व प्रतिवर्ष सरकार और जनता द्वारा धूम-धाम से मनाया जाता है। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इस दिन झण्डा फहरा कर देशभक्ति के विभिन्न रोचक कार्यक्रम छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत किये जाते हैं। मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं। पूरा भारत इस दिन देशभक्ति के गीत गाता है और आजादी की रक्षा करने की प्रतिज्ञा दोहराता है। राज्यों की राजधानियों तथा केन्द्र की राजधानी दिल्ली में यह दिवस विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

लाल किले की प्राचीर पर तिरंगे को लहराकर प्रधानमंत्री महोदय उपस्थित जनसमूह को सम्बोधित करते हुए भाषण देते हैं। राष्ट्रपति इस अवसर पर विशिष्ट सेवाओं एवं महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए अनेक व्यक्तियों को विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं। रात्रि के समय शहरों और राज्यों की राजधानियों में रोशनी की जाती है।

4. उपसंहार – भारतीय इतिहास में यह दिन हमेशा अमर रहेगा। प्रतिवर्ष यह दिवस देशवासियों के लिए नवीन प्रेरणा एवं उत्साह लेकर आता है। हमें प्रतिवर्ष इस पर्व को अत्यधिक उत्साह एवं जोश के साथ मनाना चाहिए। इस दिन हमें भारत की प्रगति एवं सुख-समृद्धि के लिए सतत कार्य करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए और हमारी स्वतन्त्रता हमेशा कायम रहे, यह संकल्प लेना चाहिए। सभी देशवासियों को मिलकर इस उत्सव को अत्यधिक उत्साह के साथ मनाना चाहिए।

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7. गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी)
अथवा
राष्ट्रीय पर्व : गणतन्त्र दिवस

1. प्रस्तावना-हमारे देश में अनेक पर्व-त्योहार मनाये जाते हैं। राष्ट्रीय पर्यों में स्वतन्त्रता-दिवस और गणतन्त्र दिवस का अत्यधिक महत्त्व है। 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश अंग्रेजशासन की गुलामी से मुक्त हुआ था और 26 जनवरी, 1950 को भारत देश का अपना संविधान लागू हुआ था। तभी से ये दोनों राष्ट्रीय पर्व हमारे देश के कोने-कोने में मनाये जाते हैं।

2. मनाने का कारण-स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद हमारे देश के शासकों ने प्रजातान्त्रिक ढंग से अपने देश के शासन को चलाने के लिए अपना संविधान बनाया, उस बने संविधान को 26 जनवरी, 1950 के दिन लागू किया गया और भारत को प्रभुता-सम्पन्न गणतन्त्र घोषित किया गया। तब से यह दिन प्रतिवर्ष गणतन्त्र दिवस के रूप में पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

3. विविध कार्यक्रम-इस राष्ट्रीय पर्व को सरकार और जनता दोनों ही बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन प्रात:काल से ही विद्यालयों और महाविद्यालयों में रोचक कार्यक्रम प्रारम्भ हो जाते हैं। भारत के कोने-कोने में यह उत्सव अत्यधिक हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है। जगह-जगह तिरंगा फहराया जाता है। राष्ट्र-भावनाओं से पूरित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मिठाइयाँ और फल बाँटे जाते हैं। गणतन्त्र दिवस का मुख्य उत्सव भारत की राजधानी दिल्ली में होता है।

प्रधानमंत्री प्रातः इंडिया गेट पर ‘अमर जवान ज्योति’ को श्रद्धांजलि देकर विजय चौक पहुँचते हैं। वहीं महामहिम राष्ट्रपति राष्ट्रध्वज फहराते हैं और 21 तोपों की सलामी दी जाती है। बैण्ड-बाजों की धुन के साथ तीनों सेनाओं एवं सुरक्षा बलों की भव्य परेड होती है और राज्यों की अनेक झांकियाँ निकलती हैं। विविध करतब दिखाये जाते हैं। रात्रि को राजभवनों पर रोशनी की जाती है और रंग-बिरंगी आतिशबाजी चलायी जाती है।

4. उपसंहार – यह राष्ट्रीय त्योहार हमें अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा हेतु जागरूक रहने का सन्देश देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अपने द्वारा बनाये संविधान के अधीन रहकर अपने और राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षा करें और लोकतन्त्र की महानता को बनाये रखें।

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8. किसी मेले का वर्णन (पुष्कर मेला)

1. प्रस्तावना – सर्दी की ऋतु थी। शुक्रवार को हम सभी छात्र अपनी कक्षा में एकाग्रचित होकर भूगोल पढ़ रहे थे -कि प्रधानाध्यापकजी का भेजा हुआ चपरासी छुट्टी की सूचना लेकर आया। कक्षा अध्यापकजी ने सूचना पढ़कर सुनाई कि कल शनिवार को पुष्कर के मेले के कारण छुट्टी रहेगी। मेले का नाम सुनते ही हर्ष का ठिकाना न रहा। मैंने तुरन्त दो-चार मित्रों के साथ मेले में जाने का कार्यक्रम बनाया।

2. प्रस्थान – दूसरे दिन हम चार मित्र भोजन से निवृत्त होकर एक साथ मेला देखने को रवाना हुए। घर से निर्दिष्ट स्थान लगभग तीन मील दूर था। अतः हम लोगों ने पैदल यात्रा करना तय किया। मार्ग का दृश्य बड़ा ही मनोहारी लग रहा था। कुछ लोग बैलगाड़ी में बैठकर जा रहे थे तो कुछ बसों एवं कारों पर सवार थे। कोई ऊँट-लड्ढे पर आसन जमाए हुए था तो किसी ने ताँगे की शरण ली थी। कहने का तात्पर्य यह है कि मार्ग में बड़ी भीड़ थी, सड़क पुष्करवाटी के पास आनासागर के किनारे-किनारे गई थी। अतः बतखों, जल कुक्कुटों को देखते हुए हम लोग पहाड़ों के बीच में होकर जाने वाली सड़क पर जा पहुँचे जो घाटी में होकर कुछ ही दूर तक गई है। घाटी पार करने पर सड़क फिर पहाड़ के सहारे चली गई है। इस प्रकार मार्ग का दृश्य देखते हुए हम पंच कुण्डों पर जा पहुंचे।

3. मेले का वर्णन – वहाँ पहुँचकर सबने पहले सरोवर के पवित्र जल में स्नान किया। इसके बाद रंगजी के मन्दिर में दर्शन करने गये। दर्शन करने के बाद हम लोगों ने पूडी वाले की दुकान पर जाकर भूख शान्त की। फिर हम लोगों ने मेले में घूमना प्रारम्भ किया। मेले में विभिन्न चीजों की सजी दुकानें थीं। उन पर खरीदने वालों की भीड़ लगी हुई थी। कोई घर में उपयोग आने वाली चीजों को खरीद रहा था, तो कोई स्वाद के अनुसार खाद्य-वस्तुओं को खरीदकर उनका स्वाद चख रहा था। कहीं बन्दर का तमाशा दिखाया जा रहा था तो कहीं बच्चे और बड़े झूलों पर झूल कर आनन्द ले रहे थे। मेला देखते और घूमते हमने थकान महसूस की और हम सब शाम को ताँगे में बैठकर घर आ गये।

4. उपसंहार – पुष्कर हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ माना जाता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से इस मेले का अपना ही महत्त्व है। मेले से अनेक लाभ होते हैं। मनोरंजन के साथ-साथ हमारी ज्ञान शक्ति भी बढ़ती है। एक-दूसरे से मिलने से परिचय बढ़ता है।

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9. मेरा आदर्श विद्यालय
अथवा
मेरा विद्यालय

1. प्रस्तावना – प्रत्येक विद्यालय विद्या की देवी सरस्वती का पवित्र मन्दिर माना जाता है। यद्यपि सभी विद्यालयों में छात्रों को शिक्षा दी जाती है, परन्तु कुछ विद्यालय अपनी अलग विशेषता रखते हैं तथा उनमें शिक्षा देने के नये-नये प्रयोग किये जाते हैं। ऐसे विद्यालयों को आदर्श विद्यालय माना जाता है। मेरा विद्यालय भी आदर्श विद्यालय है।

2. विद्यालय का परिचय – मेरा विद्यालय शहर के मध्य में स्थित है। इसके विशाल भवन में पन्द्रह कमरे, एक सभा भवन तथा एक पुस्तकालय कक्ष है। विद्यालय के सामने खेल का विशाल मैदान है तथा पीछे की तरफ छोटा-सा बगीचा है। मेरे विद्यालय में एक प्रधानाध्यापकजी तथा पन्द्रह शिक्षक-शिक्षिकाएँ हैं। तीन चपरासी और दो लिपिक भी हैं। प्रत्येक कक्षा में चालीस-चालीस छात्र हैं तथा सभी के बैठने के लिए मेज-कुर्सी हैं। पुस्तकालय में काफी पुस्तकें हैं। विद्यालय में खेल-कूद का सामान भी पर्याप्त है।

3. विद्यालय की विशेषताएँ – हमारा विद्यालय एक आदर्श विद्यालय है। यहाँ पर अध्ययन की अच्छी व्यवस्था है, इसीलिए विद्यालय के अधिकांश शिक्षार्थी परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं। विद्यालय का अनुशासन सर्वोत्तम है। शिक्षा के साथसाथ हमें यहाँ खेलकूद, ध्यान-योग, सामान्य ज्ञान एवं सदाचार की भी शिक्षा दी जाती है। इसके साथ ही सह-शैक्षिक गतिविधियों का प्रभावी संचालन किया जाता है। विषय में कमजोर शिक्षार्थियों के लिए विशेष कक्षाएं लगाई जाती हैं। इस प्रकार हमारे विद्यालय की ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जिनसे यह आदर्श विद्यालय माना गया है।

4. लाभ – मेरे आदर्श विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों का भविष्य उज्ज्वल बन जाता है। इससे अन्य विद्यालयों को भी शिक्षण-व्यवस्था सुधारने में सहायता मिलती है। मेरे विद्यालय से अन्य विद्यालयों को मॉडल और प्रश्न-पत्र भेजे जाते हैं तथा यहीं से अनेक सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं। इस प्रकार मेरे आदर्श विद्यालय से यहाँ के छात्रों तथा अन्य विद्यालयों को अनेक लाभ हैं।

5. उपसंहार – मेरा विद्यालय सभी बातों में आदर्श विद्यालय है। इसमें सभी छात्रों को सच्चाई, ईमानदारी, आज्ञापालन, कर्तव्यनिष्ठा और परिश्रमशीलता आदि की शिक्षा दी जाती है। इसमें हमारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है। ऐसे विद्यालय के प्रति हमें गर्व होता है। इसी कारण हमें अपने विद्यालय से बहुत प्रेम है।

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10. विद्यालय का वार्षिकोत्सव

1. प्रस्तावना – वर्तमान काल में विद्यालयों में हर वर्ष वार्षिकोत्सव का आयोजन किया जाता है। ऐसे उत्सव का छात्रों के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। वार्षिकोत्सव में अनेक कार्यक्रम रखे जाते हैं, जिनमें भाग लेने से छात्रों में नवीन उत्साह, स्फूर्ति तथा सजगता आ जाती है।

2. उत्सव की तैयारियाँ – हमारे विद्यालय के प्रधानाध्यापकजी। ने प्रार्थना सभा में घोषणा की कि 24 जनवरी को विद्यालय का वार्षिकोत्सव मनाया जायेगा। इस सूचना से सभी छात्र उत्सव की तैयारी में जुट गये। कुछ छात्रों ने गुरुजनों की सहायता से एक एकांकी (नाटक) की तैयारी की। कुछ छात्र गायन-वादन और विचित्र वेशभूषा की तैयारी पर लग गये। विद्यालय के मैदान में एक बड़ा पाण्डाल व मंच बनाया गया और अभिभावकों को निमन्त्रण-पत्र भेजे गये।

3. उत्सव का आरम्भ एवं कार्यक्रम – निश्चित दिन को प्रातः नौ बजे से वार्षिकोत्सव प्रारम्भ हुआ। सभी आगन्तुक अपनेअपने स्थान पर बैठ गये। उत्सव के मुख्य अतिथि शिक्षा मन्त्रीजी थे। उनके आसन ग्रहण करते ही सर्वप्रथम छात्रों ने ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्रगीत गाया। इसके बाद स्वागत गान हुआ और मंच पर बैठे सभी महानुभावों को पुष्पमालाएँ पहनाई गईं। इसके बाद प्रधानाध्यापकजी ने स्वागत-भाषण दिया।

4. विविध कार्यक्रम – वार्षिकोत्सव के अवसर पर वाद-विवाद प्रतियोगिता, अन्त्याक्षरी एवं एकल गायन प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई। इसके बाद लम्बी कूद, ऊंची कूद आदि का आयोजन हुआ। फिर हॉकी एवं फुटबॉल के मैच हुए। दो घण्टे के विश्राम के बाद रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इन सभी कार्यक्रमों के बाद मुख्य अतिथि का भाषण हुआ। उन्होंने छात्रों को सदाचारी तथा कर्त्तव्यपरायण बनने का उपदेश दिया। इसके बाद छात्रों को पुरस्कार का वितरण किया गया। अन्त में प्रधानाध्यापकजी ने सभी आगन्तुकों को धन्यवाद दिया। इस प्रकार हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव सम्पन्न हुआ।

5. उपसंहार – प्रत्येक विद्यालय में ऐसे उत्सव मनाये जाते हैं। इनसे छात्रों को प्रोत्साहन मिलता है, साथ ही अभिभावकों को अपने बालकों के मानसिक विकास का वास्तविक परिचय मिलता है। वार्षिकोत्सव के आयोजन से जहाँ विद्यालय की गतिविधियों का पता चलता है, वहीं छात्रों में परस्पर सहयोग, संगठन आदि गुणों का विकास भी होता है।

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11. मेरा प्रिय शिक्षक
अथवा
मेरे प्रिय गुरुजी
अथवा
मेरे प्रिय अध्यापक

1. प्रस्तावना – विद्यालय वर्तमान शिक्षा के केन्द्र हैं, जहाँ शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं। शिक्षा शिक्षकों के द्वारा दी जाती है। वे ही हमारे भावी जीवन का निर्माण कर, हमें सुनागरिक -बनाते हैं। शिक्षक हमारे सम्माननीय हैं। वे हम पर बहुत उपकार करते हैं। इसीलिए उनको ‘गुरु’ का सम्मान दिया जाता है और उन्हें गोविन्द से भी ऊँचा माना गया है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोविन्द दियो मिलाय।।

2. प्रिय शिक्षक – मैं राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता हूँ। हमारे विद्यालय में ग्यारह अध्यापक हैं। वैसे तो हमारे विद्यालय के सभी अध्यापक विभिन्न विषयों के ज्ञाता तथा परिश्रमी हैं, किन्तु जिस शिक्षक ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है, वह हैं श्री संजीव कुमारजी। ये अपनी अनेक विशेषताओं के कारण हमारे प्रिय शिक्षक हैं।

3. मेरे प्रिय शिक्षक की विशेषताएँ – मेरे प्रिय शिक्षक मेरे विषयाध्यापक के साथ-साथ कक्षाध्यापक भी हैं। वे हमारी कक्षा को हिन्दी विषय पढ़ाते हैं। वे एक योग्य और अनुभवी शिक्षक हैं। वे कठिन से कठिन पाठ को भी रुचिकर बनाकर पढ़ाते हैं। उनके पढ़ाने का ढंग इतना सरल और रोचक है कि सभी शिक्षार्थी उनकी बात को बड़े ध्यान से सुनते हैं और ग्रहण करते हैं। पूरी कक्षा अनुशासित और प्रसन्नचित्त होकर पढ़ती है। केवल पढ़ाने में ही नहीं, अपितु अन्य व्यक्तिगत गुणों के कारण भी वह मेरे प्रिय शिक्षक हैं। वे सादा जीवन उच्च विचार के पोषक हैं।

विद्यालय और कक्षा में नियमित रूप से समय पर आना, शिक्षार्थियों के साथ पुत्रवत् स्नेह करना, ईमानदारी और परिश्रम के साथ पढ़ाना, गरीब छात्रों की सहायता करना हमेशा सत्य बोलना, दूसरों के साथ मधुर व्यवहार करना, आदि ऐसे अनेक गुण हैं जो हमें प्रभावित करते हैं। इनके साथ ही वे पढ़ाने के अलावा विद्यालय के अन्य सहशैक्षिक कार्यक्रमों में भी अपना उत्तरदायित्व आगे बढ़कर हमेशा निभाते हैं। यही कारण है सभी शिक्षक, शिक्षार्थी यहाँ तक कि प्रधानाध्यापक भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।

4. उपसंहार – मेरे प्रिय शिक्षक योग्य, परिश्रमी, स्नेही, कर्मठ, ईमानदार, अनुशासनप्रिय एवं व्यवहार-कुशल हैं। पूरा विद्यालय ही नहीं बल्कि पूरा कस्बा उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है। मेरी आकांक्षा है कि वे हमें अगली कक्षा में भी पढ़ायें और अपने आदर्श गुणों के कारण हमारे प्रिय शिक्षक बने रहें।

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12. क्रान्तिदूत कम्यूटर
अथवा
कम्प्यूटर का महत्त्व
अथवा
कम्प्यूटर शिक्षा
अथवा
कम्प्यूटर शिक्षा का महत्त्व

1. प्रस्तावना – वर्तमान समय में कम्प्यूटर का आविष्कार एक चमत्कारी घटना है। सन् 1926 में टेलीविजन का आविष्कार होने पर वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर के सम्बन्ध में अनुसन्धान प्रारम्भ किया। लगभग पन्द्रह वर्ष के बाद अमेरिका और इंग्लैण्ड के वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर का आविष्कार किया। कम्प्यूटर देखने में टाइपराइटर एवं टेलीविजन का मिला-जुला रूप है। यह मानव का नया मस्तिष्क है जो तीव्र गणना और स्मरण करने की क्षमता रखता है।

2. कम्प्यूटर की कार्यक्षमता-कम्प्यूटर एक प्रकार से अत्यधिक तेज गति की प्रोसेसिंग मशीन है। एक शक्तिशाली कम्प्यूटर एक सेकण्ड में तीस लाख की गणना कर सकता है और हजारों मानवों के मस्तिष्क का कार्य एक साथ कुछ ही सेकण्डों में कर लेता है। गणित-सांख्यिकी के क्षेत्र में – कम्प्यूटर का आविष्कार आश्चर्यजनक है।

3. कम्प्यूटर के विविध प्रयोग एवं कम्प्यूटर शिक्षा का महत्त्व – कम्प्यूटर के बढ़ते महत्त्व के कारण आज कम्प्यूटर शिक्षा को अनिवार्य माना जाने लगा है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कम्प्यूटर का उपयोग किया जाने लगा है। कम्प्यूटर शिक्षा के बिना कम्प्यूटर की कार्यप्रणाली तथा उसके उपयोग को नहीं जाना जा सकता। कम्प्यूटर का आज अनेक कार्यों में प्रयोग किया जा रहा है। उसके द्वारा वायुयानों का संचालन, कृत्रिम उपग्रहों की गति पर नियंत्रण, वैज्ञानिक उपकरणों के संचालन, उपग्रहों के प्रक्षेपण और संचालन आदि किये जा रहे हैं।

इसके साथ बैंकों में, रेलवे कार्यालयों में, औद्योगिक इकाइयों के परिचालन में तथा व्यावसायिक प्रबन्धन के क्षेत्र में कम्प्यूटर का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। इनके अलावा उद्योग, व्यवसाय, यातायात, बिजली, पानी, टेलीफोन आदि के बिल, परीक्षा से सम्बन्धित सारे कार्य, मनोरंजन के साधनों का उपयोग, बड़े-बड़े कार्यालयों का संचालन इसके द्वारा हो रहा है। यह ज्योतिष गणना और भविष्यफल बताने में भी सहायक है। इस प्रकार अब प्रत्येक क्षेत्र में इसका प्रभाव एवं महत्त्व माना जा रहा है। कम्प्यूटर विज्ञान के रूप में इसका और अधिक विकास किया जा सकता है।

4. उपसंहार – वर्तमान समय में कम्प्यूटर विज्ञान का क्रान्तिकारी आविष्कार है। यह मानव का शक्तिशाली मस्तिष्क जैसा है। यह सभी के लिए आवश्यक एवं उपयोगी साधन है। वास्तव में इसे ‘क्रान्तिदूत कम्प्यूटर’ कहना चाहिये।

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13. पर्यावरण प्रदूषण

1. प्रस्तावना – हमारे सौर मण्डल एवं धरती के चारों ओर के परिवेश को पर्यावरण कहते हैं, जो कि सभी जीवों व उनकी प्रजातियों के विकास, जीवन व मृत्यु को प्रभावित करता है। आज सारा संसार पर्यावरण सुरक्षा के प्रति चिन्तित है। आज संसार की प्रत्येक वस्तु प्रदूषण से ग्रस्त है। यहाँ तक पानी, हवा, मिट्टी आदि सभी प्रदूषित हो गये हैं। इसके कारण धरती का पर्यावरण दूषित हो गया है और प्राणियों का जीवन अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो रहा है। इस कारण पर्यावरण प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गया है।

2. पर्यावरण प्रदूषण के कारण – वैज्ञानिकों ने अनुसन्धान करके पर्यावरण प्रदूषण के जो कारण गिनाये हैं, उनमें ये प्रमुख हैं- निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, तीव्र गति से शहरीकरण, बड़े उद्योगों की स्थापना, परमाणु संयन्त्र, जमीन से खनिज पदार्थों का अधिक मात्रा में दोहन, सड़कों एवं बड़े बाँधों का निर्माण, पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की अधिकता आदि। कारखानों से गन्दा पानी नदियों और जलाशयों में गिरकर उन्हें प्रदूषित कर रहा है। वन काटे जा रहे हैं। इन सभी कारणों से हवा, पानी आदि में प्रदूषण बढ़ रहा है।

3. पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव – पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव अत्यधिक हानिकारक है। आज कई असाध्य रोग ऐसे हैं जो दूषित पानी, हवा या दूषित गैसों के कुप्रभाव से जानलेवा बन गये हैं। जल-प्रदूषण के प्रभाव से उपजाऊ खेती नष्ट हो रही है। बड़ी-बड़ी खानों से निकाले गये खनिजों के साथ जो गन्दा पदार्थ बाहर आता है और कारखानों से बड़ी मात्रा में जो अपशिष्ट निकलता है, उससे जल एवं वायु में प्रदूषण बढ़ रहा है। वाहनों की अधिकता से ध्वनि प्रदूषण भी हो रहा है। इनसे आदमी की सुनने-समझने की शक्ति कम हो रही है।

4. पर्यावरण सुधार के उपाय – प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन अनेक उपाय कर रहा है। हमारे देश में भी अनेक उपाय किये जा रहे हैं। जैसे-अधिक से अधिक पेड़-पौधों को रोपना, जल-मल की सफाई के सीवरेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट लगाना, नदियोंजलाशयों को स्वच्छ रखना, हरित क्षेत्र का विकास करना, दूषित गैसों एवं रेडियोधर्मिता पर नियन्त्रण रखना, वनों की कटाई रोकना, खनिज दोहन पर रोक लगाना आदि। इसके लिए सरकार और कुछ समाजसेवी लोगों के द्वारा जनजागरण किया जा रहा है।

5. उपसंहार – पर्यावरण प्रदूषण का समाधान केवल सरकार के कहने से नहीं हो सकता। इसके लिए जनता में जागरूकता जरूरी है। प्रदूषण फैलाने वाले साधनों या कार्यों पर रोक लगाने से पर्यावरण में सन्तुलन स्थापित हो सकता है।

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14. विज्ञान के चमत्कार

1. प्रस्तावना-आज विज्ञान ने ऐसे अनेक आविष्कार कर दिये हैं, जिनसे जीवन का प्रत्येक कार्य अत्यन्त आसान हो गया है। इतना ही नहीं, आज प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान का ही साम्राज्य है। यही कारण है कि हम इस युग को पूर्णरूप से विज्ञान का युग कहते हैं।

2. विज्ञान के विविध चमत्कार – वर्तमान में विज्ञान ने अलग|अलग क्षेत्रों में अनेक चमत्कार किये हैं। विज्ञान ने यातायात के अनेक साधनों का निर्माण कर स्थानों की दूरी परी विजय पा ली है। राकेट का निर्माण करके अन्तरिक्ष यात्रा आसान कर दी है। सन्देश भेजने के क्षेत्र में अनेक चमत्कार दिखाई देते हैं। टेलीफोन, मोबाइल, इन्टरनेट, टेलीविजन, रेडियो आदि। चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने अनेक चमत्कार किये हैं। अब असाध्य रोगों का इलाज किया जा रहा है तथा स्वचालित उपकरणों से शरीर के अन्दर की शल्य-क्रिया होने लगी है।

परखनली से बच्चे जन्म लेने लगे हैं। कम्प्यूटर विज्ञान का सबसे बड़ा चमत्कार है। इसे मनुष्य का दस हजार गुना शक्तिशाली मस्तिष्क कहा जाने लगा है। मनोरंजन के साधनों में सिनेमा, ग्रामोफोन, वीडियो गेम्स आदि अनेक साधन बन गये हैं। इसी प्रकार घरों में काम आने वाले कूलर, फ्रिज, एयरकण्डीशनर, पंखे, आटा पिसाई मशीन, मिक्सर-जूसर, गीजर, रूम हीटर आदि कई उपकरण बन गये हैं।

3. विज्ञान से लाभ व हानि – विज्ञान ने अनेक चमत्कारी आविष्कार कर अपनी शक्ति से प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है। परन्तु परमाणु शक्ति के आविष्कार से विज्ञान ने मानव-सभ्यता के विनाश का रास्ता खोल दिया है। घरों में रसोईघर से लेकर किसानों के खेत-खलिहान तक अनेक उपकरण काम में आ रहे हैं, इनसे काम शीघ्रता से हो जाता |है। ये सब चमत्कार विज्ञान की लाभकारी देन हैं। परन्तु विज्ञान ने कुछ आविष्कार ऐसे कर दिये हैं, जिससे हानि भी हो रही है। कई नये आविष्कारों से असाध्य रोग फैल रहे हैं तथा धरती का तापमान व पर्यावरण भी इन चमत्कारों से प्रभावित हो रहा है।

4. उपसंहार – विज्ञान के चमत्कारों से लाभ और हानि दोनों ही हैं। हमें यह तो मानना पड़ेगा कि आज का जीवन पूरी तरह विज्ञान पर निर्भर है। वैज्ञानिक साधनों के बिना आज का मानव एक घण्टे भी शान्ति और चैन से नहीं रह सकता है। हमें चाहिए कि हम विज्ञान का उपयोग मानव-कल्याण के लिए करें तो यह विज्ञान हमारे लिए वरदान बन जायेगा।

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15. भयानक अग्निकाण्ड का आँखों देखा वर्णन
अथवा
अविस्मरणीय घटना

1. प्रस्तावना – इस संसार में अनेक ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जिन्हें हम नहीं चाहते हैं। जैसे भयानक बाढ़ या भूकम्प का आना, हैजा, चेचक आदि का फैलना या किसी अग्निकांड का होना आदि जो मनुष्य पर विपत्ति का पहाड़ गिरा देती हैं। यहाँ एक भयानक अग्निकांड का आँखों देखा वर्णन किया जा रहा है जो कि मेरे लिए अविस्मरणीय है।

2. अग्निकाण्ड का स्थान व समय – जून का महीना था। भीषण गर्मी से बचने के लिए हमारे गाँव के अधिकतर लोग दोपहरी में पेडों की छाया में विश्राम कर रहे थे। हमारे गाँव में लगभग सभी के घरों में छप्पर बने हुए हैं। गाँव के बीच में| रामदीन किसान का घर है। दोपहरी में अचानक ही उसके छप्पर में आग लग गई। बात ही बात में आग की लपटों ने ‘भयंकर रूप धारण कर लिया।

3. अग्नि काण्ड का दृश्य – आग की उठती लपटों को देखकर चारों ओर हो-हल्ला होने लगा। सभी आग को बुझाने के लिए दौड़ पड़े। कोई कन्धे पर घड़ा लेकर, कोई हाथ में बाल्टी लेकर आग बुझाने का जी-जान से प्रयास करने लगा। आग भयंकर रूप धारण कर चुकी थी। लोग ज्यों-ज्यों पानी डालते, त्यों-त्यों आग शान्त होने के बजाय और बढ़ रही थी। चारों ओर से ‘पानी लाओ, पानी लाओ’ की आवाजें आ रही थीं। उधर रामदीन किसान की पत्नी छाती पीटती रो रही थी। लगभग एक घण्टे के अथक परिश्रम के बाद आग पर काबू पाया जा सका, लेकिन तब तक उसका छप्पर तथा उसमें रखा सारा सामान स्वाहा हो गया था।

4. दुर्घटना से हानि – उस अग्निकाण्ड को मैंने अपनी आँखों से देखा था और आग बुझाने वालों का भी मैंने जी-जान से सहयोग किया था। लेकिन बेचारे रामदीन का घर का सारा सामान जलकर राख हो गया था। उसके साथ ही उसकी दो साल की बच्ची भी जो छप्पर के नीचे सो रही थी, वह जलकर मर गयी। इससे उसके परिजनों का करुण विलाप सभी के हृदयों को शोक में डुबा रहा था। सभी दु:खी और बेचैन थे।

5. उपसंहार – गाँव के सभी लोगों ने रामदीन के परिवार वालों को “होनी को कोई नहीं टाल सकता” कहकर और समझा-बुझाकर शान्त किया। साथ ही सबने मिलकर उसकी सहायता की। छप्पर के जल जाने और बच्ची के मर जाने का अफसोस तो सभी को रहा। आज भी जब मुझे उस भयंकर अग्निकांड का स्मरण हो आता है, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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16, मेरा प्रिय खेल
अथवा
मेरा प्रिय खेल-क्रिकेट

1. प्रस्तावना-मनुष्य स्वभाव से ही खेलप्रिय है। वह अवकाश के क्षणों में अपने मनचाहे खेल खेलता है। जैसे-हॉकी, फुटबाल, क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो आदि। आज सबसे अधिक प्रचलन क्रिकेट के खेल का है। इसलिए क्रिकेट मेरा भी प्रिय खेल है।

2. खेल खेलने का ढंग – क्रिकेट खेलने के लिये मैदान के मध्य में बाईस गज लम्बी पिच बनाई जाती है। इसके दोनों छोरों पर एक दल के दो खिलाड़ी बैट लेकर खड़े रहते हैं। उनके पीछे तीन-तीन विकिट खड़े रहते हैं जिनके ऊपर बेल्स रहती हैं। दूसरे दल के खिलाड़ी पिच की सीधाई में गेंद फेंकते हैं, जिसे शॉट मारकर रन बनाये जाते हैं। क्रिकेट के खेल में एक टीम के ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। गेंद फेंकने के लिये ओवरों का निश्चय किया जाता है। एक ओवर में छः बार गेंद फेंकी जाती है।

प्रत्येक खिलाड़ी साफ-सुथरी पोशाक में रहता है। क्रिकेट खेलने में कई बातों का ध्यान रखा जाता है। इसमें मैच की अवधि, टॉस करना, अम्पायर (निर्णायक) की स्थिति आदि सभी बातों के लिए अनेक नियम बनाये गये हैं। बैट्समैन द्वारा पिच पर दौड़ लगाने को रन कहते हैं। खिलाड़ी गेंद को खेलते हुए जितनी बार दौड़ लगा सके, उतने ही रन बन जाते हैं। उसके आउट होने पर दूसरा खिलाड़ी आता है।

इस प्रकार दस खिलाड़ियों के आउट होने पर दस विकिट गिर जाते हैं और परी टीम आउट हो जाती है। फिर दूसरी टीम भी इसी प्रकार खेलती है। यह खेल बीस-बीस ओवरों का, एक दिन, तीन दिन या पाँच दिन का होता है। क्रिकेट का खेल अनेक कारणों से अतीव मनोरंजक है। इसका मैदान गोलाकार होता है। इसमें प्रत्येक खिलाड़ी स्वस्थ-चुस्त होता है। जब वह गेंद फेंकने या कैच करने के लिये दौड़ता है, तो उसकी फुर्ती देखते बनती है। यह सभ्य। लोगों का खेल है।

इसके नियम-उपनियम समझे बिना नहीं खेला जा सकता। बड़े शहरों में हर माह क्रिकेट मैच होते रहते हैं। कभी अन्य देशों की टीमें भी खेलने आती हैं, ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय मैचों को देखने के लिये अपार जनता उमड़ पड़ती है। आजकल तो गली-गली और गाँव-गाँव में क्रिकेट का प्रचार हो गया है और प्रत्येक बालक इस खेल में रुचि लेता है। इस खेल के खिलाड़ियों का काफी मान-सम्मान भी होता है।

3. उपसंहार – प्रत्येक खेल का स्वस्थ जीवन के विकास में महत्त्व है। अन्य खेलों में कम समय लगता है, परन्तु क्रिकेट के खेल में अधिक समय और धन व्यय होता है। फिर भी यह खेल स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का परिचायक है। इसी कारण हमें यह अतीव प्रिय खेल लगता है।

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17. शिक्षा का अधिकार

1. प्रस्तावना – मनुष्य को ज्ञान देकर सामाजिक बनाने, उसे सभ्य नागरिक बनाने की प्रक्रिया का नाम ही शिक्षा है। सामाजिक विज्ञान विश्वकोष के अनुसार शिक्षा ही वयस्क हो रहे बालक को समाज में प्रवेश करने योग्य बनाती है। शिक्षा के द्वारा बालकों के व्यक्तित्व का विकास होता है, उनमें भविष्य में स्वावलम्बी बनाने की योग्यता एवं क्षमता बढ़ती है। लोकतन्त्र में सुनागरिकों का निर्माण शिक्षा-प्रसार से ही होता है।

2. शिक्षा का अधिकार – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के साथ ही हमारे संविधान में यह निश्चय किया गया कि आगामी दस वर्षों में चौदह वर्ष तक के सभी बालकों को बुनियादी शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जायेगी, परन्तु इस व्यवस्था को लागू करने में पूरे साठ साल लग गये और अब निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के रूप में सामने आया है जो एक अप्रैल, 2010 से पूरे भारत में लागू हो चुका है। इससे अनिवार्य शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर वर्ग के बालकों को अधिक लाभ मिलने लगा है। शिक्षा जीवन जीना सिखाती है तो अनिवार्य अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से सभी बालकों को जीवन जीने का बुनियादी अधिकार प्राप्त हो गया है।

3. शिक्षा के अधिकार का स्वरूप – भारत सरकार द्वारा जारी निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकारअधिनियम में यह व्यवस्था है कि प्रारम्भिक कक्षा से आठवीं कक्षा तक अर्थात् चौदह वर्ष तक प्रत्येक बालक को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की सुविधा दी जायेगी। इसके लिए केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारें समस्त व्यय वहन करेंगी।

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किसी विद्यालय में प्रविष्ट बालक को कक्षा आठ तक किसी कक्षा में नहीं रोका जायेगा, अर्थात् उसे अगली कक्षा में प्रोन्नत करना होगा और प्रारम्भिक शिक्षा पूरी किये बिना विद्यालय से निष्कासित नहीं किया जायेगा। बालक को शारीरिक दण्ड या मानसिक उत्पीड़न नहीं मिलेगा। राष्ट्रीय बालक अधिकार आयोग के अधिनियमों के अनुसार बालकों के समस्त अधिकारों को संरक्षण दिया जायेगा।

4. शिक्षा का अधिकार से लाभ – शिक्षा का अधिकार – अधिनियम से समाज को अनेक लाभ हैं। इससे-

  • प्रत्येक बालक को प्रारम्भिक शिक्षा निःशुल्क मिलेगी।
  • समाज में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ेगा।
  • शिक्षा परीक्षोन्मुखी न होकर बुनियादी हो जायेगी।
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण रुक जायेगा।
  • सभी बालकों के व्यक्तित्व का उचित विकास होगा।
  • गरीब अभिभावकों को उसका पूरा लाभ मिलेगा।।

5. उपसंहार – इस प्रकार भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने से सभी बालकों के लिए ज्ञान-मन्दिर के द्वार खोल दिये गये हैं। इससे समाज का विकास तथा शिक्षा का उचित प्रसार हो सकेगा तथा साक्षरता की शतप्रतिशत वृद्धि होगी।

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