RBSE Class 9 Science Important Questions Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं

Rajasthan Board RBSE Class 9 Science Important Questions Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं  Important Questions and Answers.

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RBSE Class 9 Science Chapter 13 Important Questions हम बीमार क्यों होते हैं 

बहुचयनात्मक प्रश्न:

प्रश्न1. 
हमारे शरीर में निस्यंदन द्वारा मूत्र का निर्माण करने वाला अंग है।
(अ) हृदय
(ब) फेफड़े
(स) वृक्क
(द) आहार नाल
उत्तर:
(स) वृक्क

प्रश्न 2. 
निम्न में से दीर्घकालिक रोग है।
(अ) खाँसी
(ब) बुखार
(स) जुकाम
(द) फीलपाँव
उत्तर:
(द) फीलपाँव

RBSE Class 9 Science Important Questions Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं 

प्रश्न 3. 
काला जार नामक रोग का कारक है।
(स) जीवाणु
(द) प्रोटोजोआ
उत्तर:

प्रश्न 4. 
प्रोटोजोआ जनित रोग समूह है।
(अ) मलेरिया - कालाजार
(ब) एंथ्रेक्स व मलेरिया
(स) टायफाइड - एंथ्रेक्स
(द) एंथ्रेक्स - कालाजार
उत्तर:
(द) एंथ्रेक्स - कालाजार

प्रश्न 5. 
एड्स रोग के संचरण का कारण है।
(अ) रोगग्रस्त व्यक्ति का खून दूसरे व्यक्ति को देने से
(ब) संक्रमित सूई द्वारा इंजेक्शन लमाने से
(स) यौन सम्पर्क से
(द) उपर्युक्त सभी से
उत्तर:
(अ) रोगग्रस्त व्यक्ति का खून दूसरे व्यक्ति को देने से

प्रश्न 6. 
एड्स का कारण है।
(अ) HIV वायरस
(ब) प्रोटोजोआ
(स) जीवाणु
(द) विषाणु
उत्तर:
(अ) HIV वायरस

प्रश्न 7. 
बैक्टीरिया जनित रोग युग्म है।
(अ) डेंगू तथा एड्स
(ब) हैजा तथा क्षय रोग
(स) एंथ्रेक्स तथा एड्स
(द) डेंगू तथा क्षय
उत्तर:
(ब) हैजा तथा क्षय रोग

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प्रश्न 8. 
वायरस जंनित रोग समूह है।
(अ) इन्फ्लुएंजा तथा डेंगू बुखार
(ब) टायफाइड तथा हैजा
(स) हैजा तथा क्षय
(द) क्षय तथा एंथ्रेक्स
उत्तर:
(अ) इन्फ्लुएंजा तथा डेंगू बुखार

प्रश्न 9. 
शिशु अवस्था में टीका लगाने के साथ - साथ एक - एक माह के अन्तराल में तीन बार दवा जिस बीमारी से बचने के लिए पिलाई जाती है, वह है।
(अ) डिफ्थीरिया
(ब) कुकर खाँसी
(स) चेचक
(द) पोलियो
उत्तर:
(द) पोलियो

प्रश्न 10. 
मलेरिया रोग उत्पन्न करने वाला कारक है।
(अ) प्रोटोजोआ
(ब) जीवाणु
(स) वायरस
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(अ) प्रोटोजोआ

प्रश्न 11. 
शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट करने वाला कारक है।
(अ) मलेरिया
(ब) HIV वायरस
(स) कैंसर
(द) क्षय
उत्तर:
(ब) HIV वायरस

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प्रश्न12. 
सिरदर्द, उल्टी आना, बेहोशी आना लक्षण शरीर के किस अंग के प्रभावित होने को बताते हैं।
(अ) मस्तिष्क को
(ब) फेफड़ों को
(स) वृक्क को
(द) हृदय को
उत्तर:
(स) वृक्क को

प्रश्न 13. 
फेफड़ों के संक्रमित होने पर लक्षण प्रकट होते हैं।
(अ) चक्कर आते हैं
(ब) उल्टी आती है
(स) खाँसी आती है
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) उल्टी आती है

प्रश्न 14.
स्वयं की जैव रासायनिक प्रणाली जिस सूक्ष्मजीव में होती है, वह है।
(अ) वायरस
(ब) बैक्टीरिया
(स) HIV
(द) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(ब) बैक्टीरिया

प्रश्न 15. 
वह रोग जो एक बार होने पर पुन: होने की संभावना नहीं रहती है, वह है।
(अ) कुष्ठ रोग
(ब) चेचक
(स) मलेरिया
(द) जुकाम
उत्तर:
(ब) चेचक

प्रश्न 16. 
लेश्मानिया प्रोटोजोआ किस व्याधि (रोग) का कारक है?
(अ) कालाजार
(ब) मुँहासे
(स) निद्रा
(द) मलेरिया
उत्तर:
(अ) कालाजार

प्रश्न 17.  
HIV वायरस शरीर में कहाँ फैलता है?
(अ) मस्तिष्क में
(ब) लाल रुधिर कोशिकाओं में
(स) लसीका ग्रन्थियों में
(द) आहार नाल में
उत्तर:
(स) लसीका ग्रन्थियों में

प्रश्न 18. 
'वरण शोथ' किस अंग से सम्बन्धित रोग है?
(अ) मस्तिष्क
(ब) वृक्क
(स) आमाशय
(द) यकृत
उत्तर:
(अ) मस्तिष्क

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प्रश्न 19. 
'पेप्टिक व्रण' का रोगकारक है।
(अ) वाइरस
(ब) बैक्टीरिया
(स) प्रोटोजोआ
(द) कृमि
उत्तर:
(ब) बैक्टीरिया

प्रश्न 20. 
निद्रालु रोग या व्याधि का कारक है।
(अ) लेश्मानिया
(ब) ऐस्केरिस
(स) ट्रिप्नोसोमा
(द) प्लाज्मोडियम
उत्तर:
(स) ट्रिप्नोसोमा

प्रश्न 21. 
पेनिसिलीन एंटीबायोटिक बैक्टीरिया के किस भाग को प्रभावित करती है?
(अ) कोशिका झिल्ली 
(ब) कशाभिका 
(स) अवपंक स्तर
(द) कोशिका भित्ति
उत्तर:
(द) कोशिका भित्ति

प्रश्न 22. 
लेंगिक सम्पर्क द्वारा फैलने वाला रोग है।
(अ) मलेरिया
(ब) कालाजार
(स) सिफलिस
(द) फीलपाँव
उत्तर:
(स) सिफलिस

प्रश्न 23. 
रोगी माता से शिशु में स्थानान्तरित होने वाला रोग है?
(अ) फीलपाँव
(ब) एड्स
(स) मलेरिया
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) एड्स

प्रश्न 24. 
मलेरिया रोग का रोगवाहक (वेक्टर) है?
(अ) कुत्ता
(ब) घरेलू मक्खी
(स) मच्छर
(द) प्रोटोजोआ
उत्तर:
(स) मच्छ

रिक्त स्थान वाले प्रश्न:

निम्नलिखित प्रश्नों में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

प्रश्न1. 
रोगों का..............सफल उपचार की अपेक्षा अच्छा है।
उत्तर:
निवारण

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प्रश्न 2. 
टीकाकरण द्वारा.....................रोगों का निवारण किया जा सकता है।
उत्तर:
संक्रामक 

प्रश्न 3. 
गोलकृमि मानव की.....................में पाया जाता है।
उत्तर:
छोटी आँत

प्रश्न 4. 
पेनिसिलीन बैक्टीरिया की....................बनाने वाली प्रक्रिया को बाधित कर देती है।
उत्तर:
कोशिका भित्ति

प्रश्न 5. 
हमारा.................तंत्र रोगों से बचाता है।
उत्तर:
प्रतिरक्षा।

सत्य/असत्य कथन वाले प्रश्न:

निम्नलिखित कथनों में सत्य तथा असत्य कथन छाँटिए:

प्रश्न 1. 
सामुदायिक स्वच्छता व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 2. 
उच्च रक्तचाप का कारण अधिक वजन होना तथा व्यायाम न करना है।
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 3. 
एंटीवाइरल औषधि बनाना एंटीबैक्टीरियल औषधि बनाने की अपेक्षा सरल है।
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4. 
जापानी मस्तिष्क ज्वर उत्पन्न करने वाला वाइरस मच्छर के काटने से शरीर में पहुँचता है।
उत्तर:
सत्य

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प्रश्न 5. 
लैंगिक संचारी रोग सामान्य सम्पर्क द्वारा फैलते हैं।
उत्तर:
असत्य।

मिलान वाले प्रश्न:

निम्नलिखित प्रश्नों का मिलान कीजिए:

प्रश्न 1. 

रोग

रोगकारक

(a) मलेरिया

(i) प्रोटोजोजा

(b) एड्स

(ii) कृमि

(c) क्षयरोग

(iii) वाइरस

(d) फीलपाँव

(iv) बैक्टीरिया

उत्तर:

रोग

रोगकारक

(a) मलेरिया

(i) प्रोटोजोजा

(b) एड्स

(iii) वाइरस

(c) क्षयरोग

(iv) बैक्टीरिया

(d) फीलपाँव

(ii) कृमि


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प्रश्न 2. 

सेग

प्रभावित अंग

(a) क्षय रोग

(i) मस्तिष्क

(b) हैपेटाइटिस

(ii) यकृत

(c) जापानी मस्तिष्क ज्वर

(iii) फेफड़े

(d) मलेरिया

(iv) RBC (रक्त)

उत्तर:

सेग

प्रभावित अंग

(a) क्षय रोग

(iii) फेफड़े

(b) हैपेटाइटिस

(ii) यकृत

(c) जापानी मस्तिष्क ज्वर

(i) मस्तिष्क

(d) मलेरिया

(iv) RBC (रक्त)

 

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1. 
बैक्टीरिया का संक्रमण होने पर किसका उपयोग लाभदायक होता है?
उत्तर:
एण्टीबायोटिक का।

प्रश्न 2. 
कुत्ते के काटने पर कौनसा टीका लगवाना चाहिए ?
उत्तर:
बी.सी.जी.।

प्रश्न 3. 
पेप्टिक व्रण के कारक बैक्टीरिया का पता लगाने वाले वैज्ञानिकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रॉबिन वॉरेन तथा बैरी मार्शल।

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प्रश्न 4. 
हमारे शरीर की क्रियाओं में बदलाव क्या प्रदर्शित करता है ?
उत्तर:
रोग के लक्षण।

प्रश्न 5. 
तीव्र या प्रचंड रोग किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
जिन रोगों की अवधि कम होती है, उन्हें तीव्र या प्रचंड रोग कहा जाता है।

प्रश्न 6. 
दीर्घकालिक रोग से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
लम्बी अवधि या जीवनपर्यन्त रहने वाले रोग, दीर्घकालिक रोग कहलाते हैं।

प्रश्न 7. 
प्रोटोजोआ से होने वाले किन्हीं दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  मलेरिया 
  2. कालाजार।

प्रश्न 8. 
मुँहासे रोग का मुख्य कारक कौन है? नाम लिखिए।
उत्तर:
स्टेफाइलोकोकाई बैक्टीरिया।

प्रश्न 9.
ट्रिप्नोसोमा किस रोग का कारक है?
उत्तर:
प्रोटोजोआ ट्रिप्नोसोमा निद्रा रोग का कारक है।

प्रश्न 10.
गोल कृमि (एस्केरिस लुंब्रीकॉयडिस) बच्चों के शरीर के किस अंग में पाया जाता है ?
उत्तर:
छोटी आँत में।

प्रश्न 11.
संक्रामक रोग किसे कहते हैं?
उत्तर:
वे रोग जिनके तात्कालिक कारक सूक्ष्मजीव होते हैं, उन्हें संक्रामक रोग कहते हैं।

प्रश्न 12.
कैंसर रोग का क्या कारण है?
उत्तर:
कैंसर रोग आनुवंशिक असामान्यता के कारण होता है।

प्रश्न 13.
पेप्टिक व्रण का क्या कारण है ?
उत्तर:
पेप्टिक व्रण हेलीकोबैक्टर पायलोरी नामक बैक्टीरिया के कारण होता है।

प्रश्न 14.
पेप्टिक व्रण रोग के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर:
इससे आमाशय तथा ग्रहणी में एसिडिटी सम्बन्धी दर्द तथा रक्तस्राव होता है।

प्रश्न 15.
शरीर क्रिया विज्ञान तथा औषधि के लिए 2005 में नोबेल पुरस्कार किन वैज्ञानिकों को दिया गया था ?
उत्तर:
रॉबिन वॉरेन तथा बैरी मार्शल को।

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प्रश्न 16.
रोग उत्पन्न करने वाले मुख्य जीव कौन - कौन से हैं ?
उत्तर:
रोग उत्पन्न करने वाले जीव कुछ वायरस, कुछ बैक्टीरिया, कुछ फंजाई (कवक), कुछ प्रोटोजोआ (एककोशिक जीव) हैं।

प्रश्न 17.
वायरस से होने वाले चार रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
खाँसी - जुकाम, इंफ्लुएंजा, डेंगू बुखार तथा AIDS।

प्रश्न 18.
बैक्टीरिया से फैलने वाले चार रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
टायफॉयड, हैजा, क्षय रोग, एंक्रेक्स।

प्रश्न 19.
सामान्य त्वचा रोग किससे फैलते हैं?
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की फंजाई से।

प्रश्न 20.
फीलपाँव (एलिफेनटाइसिस) रोग किसके द्वारा फैलाया जाता है?
उत्तर:
कृमि की स्पीशीज़ से।

प्रश्न 21.
सभी वायरस कहाँ रहते हैं ?
उत्तर:
मेजबान की कोशिकाओं में।

प्रश्न 22.
रोग फैलाने वाले किन तीन कारकों का गुणन बहुत तेजी से होता है?
उत्तर:
वायरस, बैक्टीरिया तथा फंजाई का।

प्रश्न 23.
रोग उपचार में एंटिबायोटिक कैसे कार्य करते हैं ?
उत्तर:
एंटबायोटिक बैक्टीरिया के महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक मार्ग को बंद कर देते हैं।

प्रश्न 24.
सामान्य खाँसी - जुकाम में एंटिबायोटिक अपना प्रभाव क्यों नहीं दिखा पाते?
उत्तर:
खाँसी - जुकाम वायरस जनित रोग है और एंटीबायोटिक वायरस को प्रभावित नहीं कर पाते हैं।

प्रश्न 25.
AIDS का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:
AIDS = Acquired Immuno Deficiency Syndrome (एक्वायर्ड इम्युनो डेफिसिएंसी सिन्ड्रोम)।

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प्रश्न 26.
पीलिया रोग के मुख्य लक्षण क्या हैं?
उत्तर:
पीलिया रोग में रोगी को भूख नहीं लगती, मितली व उल्टी आती है।

प्रश्न 27.
संक्रमित कुत्ते या बंदर के काटने पर किस रोग के होने की संभावना रहती है ?
उत्तर:
रैबीज रोग के।

प्रश्न 28.
वायु द्वारा फैलने वाले चार रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सर्दी - जुकाम
  2. निमोनिया
  3. क्षय
  4. खसरा।


प्रश्न 29.
रोग निवारण हेतु उपलब्ध किन्हीं चार टीकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  टिटेनस
  2. डिफ्थीरिया
  3.  चेचक
  4. पोलियो।


प्रश्न 30.
पीलिया रोग का कारक क्या है?
उत्तर:
हिपेटाइटिस के वायरस ही पीलिया रोग उत्पन्न करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर:
स्वास्थ्य: 'स्वास्थ्य' वह अवस्था है जिसके अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कार्य समुचित क्षमता द्वारा उचित प्रकार से किया जा सके। अतः स्वास्थ्य केवल शारीरिक रोग या विकलांगता की अनुपस्थिति नहीं है, वरन् किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन क्षमता की सामान्य स्थिति है। स्वस्थ जीवन हेतु अच्छा स्वास्थ्य आवश्यक है। यह रोग के साथ   - साथ मानसिक तनाव व चिन्ता से मुक्ति की भी दशा है।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य व्यक्तिगत नहीं अपितु सामुदायिक समस्याओं से प्रभावित होता है। कैसे?
उत्तरं:
"स्वास्थ्य व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन की एक समग्र समन्वयित अवस्था है।" कोई भी व्यक्ति उसे अकेले पूर्णत: प्राप्त नहीं कर सकता। उसका स्वास्थ्य उसके परिवेश या भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होता है।
उदाहरणार्थ:
हम अपनी व्यक्तिगत तथा अपने घरों की सफाई इसलिए करते हैं, ताकि हम रोग के कारकों से। बचे रह सकें। परन्तु अगर हमारा पास - पड़ोस स्वच्छ नहीं है, तो हम स्वस्थ नहीं रह पायेंगे, क्योंकि पास - पड़ोस स्वच्छ न होने से अशुद्ध वायु, मक्खी, मच्छर आदि कीटों के आने - जाने के कारण ये संक्रमणकारी सूक्ष्मजीव हमें भी संक्रमित कर देंगे और हम अस्वस्थ हो जायेंगे। अतः स्वास्थ्य व्यक्तिगत नहीं, एक सामुदायिक समस्या है।

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प्रश्न 3.
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली कोई दो व्यक्तिगत समस्याएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली व्यक्तिगत समस्या में व्यक्ति की अच्छी आर्थिक परिस्थितियाँ तथा कार्य करने की क्षमता है। यदि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह संतुलित एवं पौष्टिक आहार नहीं ले पाएगा जो उसके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है तथा इस अवस्था में वह कार्य करने की क्षमता भी नहीं रख सकेगा।

(2) दूसरी व्यक्तिगत समस्या स्वयं का व्यवहार है। यदि वह प्रसन्न नहीं है तथा उसका व्यवहार ठीक नहीं है तो वे एक - दूसरे से डरकर काम करेंगे अत: व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए सामाजिक समानता आवश्यक है जिससे वह प्रसन्नचित्त व तनावमुक्त होकर समाज में रह सके।

प्रश्न 4.
स्वस्थ रहने तथा रोगमुक्त में क्या अन्तर है?
उत्तर:
सामान्यतः हम रोग होना तभी सोचते हैं जब किसी प्रकार की कोई असुविधा या शारीरिक परेशानी होती है। लेकिन अगर हमें कोई रोग नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वस्थ हैं। अगर किसी रोग के लक्षण नहीं हैं, फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा है। जैसे हम स्वस्थ हैं, किन्तु अध्ययन में हमारी रुचि नहीं है तो हम मानसिक रूप से अस्वस्थ हो सकते हैं।

अत: अच्छा स्वास्थ्य उसे कहते हैं जब मनुष्य शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से अपनी सभी क्षमताओं का भरपूर उपयोग करे। अतः स्वास्थ्य समाज तथा समुदाय से जुड़ा है, जबकि रोग व्यक्तिगत है।

प्रश्न 5.
रोग के लक्षण से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर:
हमारा शरीर अनेक ऊतकों, अंगों एवं अंग - तंत्रों से बना होता है। ये सभी एक समन्वयन (Cordination) में कार्य करते हैं। जब किसी अंग या अंग - तंत्र में कोई क्रियात्मक या संरचनात्मक परिवर्तन होता है, तब यह परिवर्तन रोग के लक्षण दर्शाते हैं। रोग के लक्षण हमें शरीर में 'खराबी' का संकेत देते हैं। जैसे सिरदर्द, खाँसी, दस्त. किसी घाव में पस (मवाद) आना. ये सभी रोग के लक्षण हैं।

प्रश्न 6.
रोग के लक्षण से हमें क्या संकेत मिलता है ?
उत्तर:
रोग के लक्षण से किसी न किसी रोग का पता लगता है किन्तु इनसे यह पता नहीं लगता कि कौनसा रोग है।
उदाहरणार्थ: सिरदर्द परीक्षा के लिए तैयारी करने से हो सकता है, यह मलेरिया से हो सकता है या फिर वरण शोथ (meningitis) से भी हो सकता है।

प्रश्न 7.
रोग के चिह्न से रोग की सुनिश्चितता कैसे करते हैं?
उत्तर:
रोग के चिह्न का निर्धारण चिकित्सक लक्षणों के आधार पर करता है। लक्षण किसी विशेष रोग के बारे में सुनिश्चित संकेत देते हैं। चिकित्सक रोग के सही कारण को जानने के लिए प्रयोगशाला में कुछ परीक्षण भी करवा सकते हैं।

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प्रश्न 8.
तीव्र तथा दीर्घकालिक रोग से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर:
तीव्र रोग: वे रोग, जो कम अवधि के लिए होते हैं, तीव्र या प्रचंड रोग कहलाते हैं। जैसे - सर्दीजुकाम (Common cold)।
दीर्घकालिक रोग:
 वे रोग, जो बहुत लम्बी अवधि तक या जीवनपर्यन्त रहते हैं, दीर्घकालिक रोग कहलाते हैं, जैसे-फीलपाँव (elephantiasis), फेफड़ों का क्षय रोग (Tuberculosis), कैंसर आदि।

प्रश्न 9.
संक्रामक और असंक्रामक रोग क्या हैं?
उत्तर:
संक्रमण के आधार पर रोग दो प्रकार के होते हैं।
(i) संक्रामक रोग:
संक्रामक कारकों द्वारा फैलने वाले रोग संक्रामक रोग कहलाते हैं। संक्रामक कारकों में अधिकांशत: सूक्ष्म जीव होते हैं। अतः वे रोग जिनके तात्कालिक कारक सूक्ष्म जीव होते हैं, संक्रामक रोग कहलाते हैं। इन्हें संक्रामक इसलिए कहते हैं क्योंकि सूक्ष्म जीव समुदाय में फैल सकते हैं तथा इनके कारण होने वाले रोग भी इनके साथ ही फैल जाते हैं।

(ii) असंक्रामक रोग:
ये रोग पीड़ित व्यक्ति तक ही सीमित रहते हैं अन्य व्यक्तियों में नहीं फैलते। ये संक्रामक कारकों द्वारा नहीं फैलते, इसलिए असंक्रामक रोग कहलाते हैं। जैसे-कैंसर, उच्च रक्तचाप आदि।


प्रश्न 10.
संक्रामक कारकों के आधार पर संक्रामक रोगों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है?
उत्तर:
संक्रामक रोगों के आधार पर रोगों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से है।

  1.  जीवाणुओं या बैक्टीरिया द्वारा फैलाये जाने वाले रोग: जैसे - क्षय रोग, हैजा, टायफाइड, दस्त, टिटेनस, डिफ्थीरिया आदि ।
  2.  विषाणुओं या वायरस द्वारा फैलाये जाने वाले रोग: जैसे - पोलियो, चिकन - पॉक्स, रैबीज, जुकाम, खसरा, एड्स आदि।
  3. प्रोटोजोआ द्वारा फैलाये जाने वाले रोग: जैसे - डायरिया, गैस्ट्रोइटाइटिस, मलेरिया आदि।
  4. कवक या फंजाई द्वारा फैलाये जाने वाले रोग: जैसे - दाद, त्वचा रोग आदि।

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प्रश्न 11.
संक्रामक कारकों के वर्गों के अध्ययन से हमें क्या लाभ है ?
उत्तर:
संक्रामक कारकों के वर्गों के अध्ययन से हमें रोग उपचार करने में सहायता मिलती है। इन वर्गों के आधार पर उपचार विधि का निर्धारण करते हैं। जैसे - सभी वायरस परपोषी की कोशिकाओं में रहते हैं लेकिन बैक्टीरिया में ऐसा कम ही होता है। वर्गीकरण के अनुसार सभी बैक्टीरिया एक - दूसरे से वायरस की अपेक्षा अधिक निकट होते हैं। अत: अनेक जैव प्रक्रियाएँ सभी बैक्टीरियाओं में समान होती हैं, लेकिन वायरस वर्ग से भिन्न होंगी। अतः एक ही औषधि जो एक वर्ग में किसी जैविक प्रक्रिया को रोकती है, सभी सदस्यों के लिए प्रभावकारी हो सकती है। लेकिन वही औषधि अन्य वर्ग से सम्बन्धित रोगाणुओं पर प्रभाव नहीं डालेगी।

प्रश्न 12.
एंटीबायोटिक क्या है? ये कैसे कार्य करते हैं?
उत्तर:
एंटीबायोटिक वे रासायनिक पदार्थ हैं जो सूक्ष्मजीवों से उत्पन्न किए जाते हैं। ये सूक्ष्मजीवों (जीवाणुओं) की वृद्धि को रोकते हैं या उन्हें मार देते हैं। जैसे पेनिसिलीन (Penicillin), टेट्रासाइक्लीन (Tetracycline) आदि। बहुत से जीवाणु (Bacteria) अपनी सुरक्षा के लिए एक कोशिका भित्ति बना लेते हैं। एंटीबायोटिक कोशिका भित्ति बनाने की प्रक्रिया को रोक देते हैं और जीवाणु मर जाता है। पेनिसिलीन जीवाणु की कई स्पीशीज में कोशिका भित्ति बनाने की प्रक्रिया को रोक देता है, परिणामस्वरूप जीवाणु कोशिका भित्ति नहीं बना पाते और वे सरलता से मर जाते हैं।

प्रश्न 13.
वायरस पर एंटिबायोटिक का प्रभाव क्यों नहीं दिखाई देता ?
उत्तर:
वायरस की जैव प्रक्रियाएँ बैक्टीरिया से भिन्न होती हैं। वे मेंजबानों की कोशिकाओं में रहते हैं। इनमें कोई जैव रासायनिक मार्ग नहीं होता है। यही कारण है कि कोई भी एंटिबायोटिक वायरस संक्रमण पर प्रभभावकारी नहीं है। यदि हम खाँसी-जुकाम से ग्रस्त हैं तो एंटबायोटिक लेने से रोग की तीव्रता अथवा उसकी समय विधि कम नहीं होती।

प्रश्न 14.
संचारी रोग से क्या आशय है? वायु द्वारा रोग का संचरण कैसे होता है?
उत्तर:
बहुत से सूक्ष्मजीवीय कारक रोगी से स्वस्थ मनुष्य तक विभिन्न तरीकों से फैलते हैं अर्थात् वे संचरित हो सकते हैं अत: इन्हें संचारी रोग कहते हैं। वायु द्वारा रोग संचरण - जब रोगी छींकता है या खाँसता है, तो उस समय छोटे - छोटे बूंदक बाहर निकलते हैं। जब उसके समीप कोई अन्य व्यक्ति हो तो श्वास द्वारा ये बूंदक उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इससे स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जाता है। वायु द्वारा खाँसी, जुकाम, निमोनिया तथा क्षय रोग के रोगाणुओं का संचरण होता है।

प्रश्न 15.
जल द्वारा रोगों का प्रसार किस प्रकार होता है ? समझाइए।
उत्तर:
जल द्वारा रोगों का प्रसार:
जब संक्रमणीय रोग यथा हैजा से ग्रसित रोगी के अपशिष्ट पेयजल में मिल जाते हैं और यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति जाने - अनजाने में इस जल को पीता है तो रोगाणुओं को एक नया पोषी मिल जाता है, जिससे वह भी इस रोग से ग्रसित हो जाता है। ऐसे रोग अधिकतर साफ पेयजल न मिलने के कारण फैलते हैं।

प्रश्न 16.
लैंगिक संचारी रोग कैसे फैलते हैं ?
उत्तर:
लैंगिक संचारी रोग:
लैंगिक संचारी रोग, लैंगिक सम्पर्क द्वारा फैलते हैं। लैंगिक रोग जैसे सिफलिस, गोनोरिया और एड्स (AIDS) रोगी के साथ लैंगिक सम्पर्क करने पर ही दूसरे पोषी में संचारित होते हैं। इसीलिए इन्हें लैंगिक संचरणीय रोग (Sexually Transmitted Diseases, STD) कहते हैं।

प्रश्न 17.
वाहक (Vector) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाले जीवों को वाहक ( वेक्टर) कहते हैं। उदाहरण के लिए घरेलू मक्खी हैजे, पेचिश आदि के कीटाणुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है तो मादा एनाफ्लीज मच्छर मलेरिया को फैलाते हैं। ऐडीज मच्छर डेंगू को फैलाता है।

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प्रश्न 18. 
पेप्टिक व्रण से क्या आशय है? इसके बारे में क्या नई खोज हुई?
उत्तर:
पेप्टिक व्रण पेट की एक बीमारी है, जिसमें आमाशय तथा ग्रहणी में एसिडिटी सम्बन्धी दर्द होता है तथा रक्तस्राव होता है। पहले यह माना जाता था कि यह रहन - सहन के गलत ढंग के कारण होता है। लोग सोचते थे कि परेशानी और चिन्ता से आमाशय में एसिड का स्राव होता है, जिस कारण पेप्टिक व्रण हो जाता है। परन्तु आस्ट्रेलिया के डॉ. राविन वॉरेन तथा बैरी मार्शल ने पता लगाया कि यह रोग 'हैलिकोबैक्टर पायलोरी' नामक बैक्टीरिया से होता है, जो आमाशय के निचले भाग में इकट्ठे हो जाते हैं। अब इस रोग का उपच्चर सरलता से प्रतिजैविक के उपयोग से किया जा सकता है।

प्रश्न 19.
रोगाणुओं के प्रवेश के आधार पर हमारे शरीर के ऊतक एवं अंग किस प्रकार प्रभावित होते हैं ?
उत्तर:
रोगाणु विभिन्न माध्यमों से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। किसी ऊतक या अंग में संक्रमण उसके शरीर में प्रवेश के स्थान पर निर्भर करता है।
उदाहरणार्थ:

  1. यदि रोगाणु वायु के द्वारा नाक से प्रवेश करता है, तब संक्रमण फेफड़ों में होता है, जैसे कि क्षय रोग में।
  2. यदि रोगाणु मुँह से प्रवेश करता है तो संक्रमण आहार नाल में होता है जैसे कि खसरा का रोगाणु आहार नाल में और हेपेटाइटिस का रोगाणु यकृत में संक्रमण करता है।


प्रश्न 20.
शोथ के कारण शरीर पर कुछ स्थानीय प्रभाव क्या पड़ते हैं और क्यों ?
उत्तर:
संक्रामक रोगों के ऊतक:
विशिष्ट प्रभाव के अतिरिक्त उनके अन्य सामान्य प्रभाव भी होते हैं। अधिकांश सामान्य प्रभाव इस पर निर्भर करते हैं कि संक्रमण से शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र क्रियाशील हो जाए। एक सक्रिय प्रतिरक्षा तंत्र प्रभावित ऊतक के चारों ओर रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए अनेकों कोशिकाएँ बना देता है। नई कोशिकाओं के बनने के प्रक्रम को शोथ कहते हैं। इस प्रक्रम के अन्तर्गत स्थानीय प्रभाव जैसे फूलना तथा


प्रश्न 21.
उन रोगों का उल्लेख कीजिए जिनमें रोगाणुओं के प्रवेश स्थान पर संक्रमण न होकर अन्य भाग में संक्रमण होता है।
उत्तर:
कई रोगाणु ऐसे हैं जो संक्रमण उन अंगों में करते हैं जो उसके प्रवेश स्थान से संबंधित नहीं हैं। जैसे HIV का विषाणु (Virus) लैंगिक अंगों से प्रवेश करता है लेकिन पूरे शरीर की लसिका ग्रन्थियों में फैल जाता है और शरीर के प्रतिरक्षी तंत्र को हानि पहुँचाता है। इसी तरह मलेरिया का रोगाणु त्वचा के द्वारा प्रवेश करता है और रक्त की लाल रुधिर कोशिकाओं को नष्ट करता है। इसी प्रकार जापानी मस्तिष्क ज्वर का विषाणु मच्छर के काटने से त्वचा में प्रवेश करता है लेकिन यह मस्तिष्क को संक्रमित करता है।

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प्रश्न 22.
किसी रोग की तीव्रता का क्या आधार है?
अथवा
किसी रोग की तीव्रता किस बात पर निर्भर करती है ?

उत्तर:
रोग की तीव्रता की अभिव्यक्ति शरीर में स्थित सूक्ष्मजीवों की संख्या पर निर्भर करती है। यदि सूक्ष्मजीव की संख्या बहुत कम है तो रोग की अभिव्यक्ति भी कम होगी। यदि उसी सूक्ष्म जीव की संख्या अधिक होगी तो रोग की अभिव्यक्ति इतनी तीव्र होगी कि जीवन को भी खतरा हो सकता है।

प्रश्न 23.
संक्रामक रोगों के उपचार के उपाय लिखिए।
उत्तरं:
संक्रामक रोगों के उपचार के दो उपाय हैं।
(1) रोग के प्रभाव को कम करके:
इसमें रोग के लक्षण कम हो जाते हैं। ये लक्षण प्राय: शोथ (inflammation) के कारण होते हैं। हम आराम कर ऊर्जा संरक्षण कर सकते हैं जो हमारे स्वस्थ होने में सहायक होगी। किन्तु इसमें रोग का पूरी तरह समाप्त होना सम्भव नहीं होता है।

( 2 ) रोग के कारण को समाप्त करना:
इसमें रोगाणु को मारने के लिए दवाएँ दी जाती हैं। उदाहरणार्थजीवाणु (Bacteria) को मारने के लिए एंटीबायोटिक या मलेरिया परजीवी को मारने के लिए कुनैन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 24.
बैक्टीरिया को एंटिबायोटिक प्रभावित करते हैं पर मानव को नहीं। क्यों ?
उत्तर:
एंटिबायोटिक सामान्यत: बैक्टीरिया के महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक मार्ग को बन्द कर देते हैं। साधारणत: अनेक बैक्टीरिया अपनी रक्षा के लिए कोशिका भित्ति बना लेते हैं। पेनिसिलीन, एंटिबायोटिक बैक्टीरिया की कोशिका भित्ति बनाने वाली प्रक्रिया को बाधित कर देती है। जिस कारण बैक्टीरिया कोशिका भित्ति नहीं बना सकते हैं और वे सरलता से मर जाते हैं। मानव की कोशिकाएँ कोशिका भित्ति नहीं बना सकतीं इसलिए पेनिसिलीन का प्रभाव हम पर नहीं होता। पेनिसिलीन ऐसे सभी बैक्टीरिया को प्रभावित करते हैं जिनमें कोशिका भित्ति बनाने की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 25.
एंटीवायरल औषधि का बनाना एंटीबैक्टीरियल औषधि के बनाने की अपेक्षा कठिन क्यों है ?
उत्तर:
एंटीवायरल औरधि का बनाना एंटीबैक्टीरियल औषधि के बनाने की अपेक्षा कठिन होता है क्योंकि बैक्टीरिया में अपनी जैव रासायनिक प्रणाली होती है जबकि वायरस में अपनी जैव रासायनिक प्रणाली बहुत कम होती है। वायरस हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं और अपनी जीवन प्रक्रिया के लिए हमारी मशीनरी का उपयोग करते हैं। इसका अर्थ यह है कि आक्रमण करने के लिए अपेक्षाकृत कम वायरस विशिष्ट लक्ष्य होते हैं।

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प्रश्न 26.
संक्रामक रोगों के उपचार में क्या - क्या कठिनाइयाँ हैं?
उत्तर:
संक्रामक रोगों से छुटकारा पाने की तीन सीमाएँ (कठिनाइयाँ) हैं।

  1. यदि व्यक्ति बीमार हो जाए तो उसकी शारीरिक क्रियाओं को बहुत हानि होती है और वे पूर्णत: सुचारु नहीं हो पातीं।
  2. उपचार में लंबा समय लगता है अर्थात् सही उपचार में भी उसे काफी समय तक बिस्तर पर आराम करना पड़ता है।
  3. पीड़ित व्यक्ति, यदि संक्रमित है, तो संक्रमण अन्य व्यक्तियों तक भी फैल सकता है। इसीलिए कहा गया है कि निवारण, रोग के उपचार से बेहतर है। (Prevention is better than cure.) इसीलिए कहा गया है कि निवारण, रोग के उपचार से बेहतर है। (Prevention is better than cure.)


प्रश्न 27.
यदि एक बार किसी को चेचक हो जाए तो दुबारा उसे कभी चेचक नहीं हो सकती। क्यों ?
उत्तर:
यदि कोई व्यक्ति एक बार चेचक से ग्रसित हो जाए तो उसे दुबारा यह रोग कभी नहीं हो सकता क्योंकि जब चेचक के रोगाणु प्रतिरक्षा तंत्र पर पहली बार आक्रमण करते हैं तो प्रतिरक्षा तंत्र रोगाणुओं से इसके प्रति क्रिया करता है और फिर इसका विशिष्ट रूप से स्मरण कर लेता है। इस प्रकार जब वही रोगाणु या उससे मिलता - जुलता रोगाणु पुन: संपर्क में आता है तो पूरी शक्ति से उसे नष्ट कर देता है। इससे पहले संक्रमण की अपेक्षा दूसरा संक्रमण शींत्र ही समाप्त हो जाता है। यह प्रतिरक्षाकरण के नियम का आधार है।

प्रश्न 28.
टीके का आविष्कार कैसे हुआ?
उत्तर:
टीके के आविष्कार का श्रेय एडवर्ड जैनर को जाता है। उन्होंने देखा कि महामारी के समय उन ग्वालों को चेचक नहीं हुई, जिन्हें गो चेचक हुई थी। गो चेचक एक मन्द रोग है। जेनर ने जानबूझकर लोगों को गो चेचक दिया। इससे उनमें चेचक के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न हो गई। इस आधार पर जैनर को आभास हुआ कि चेचक का बैक्टीरिया, गो चेचक के वायरस से समानता रखता है। लैटिन में Cowpox का अर्थ है-'वैक्सीनिया' जिसे हम टीके के रूप में जानते हैं।

प्रश्न 29.
स्पष्ट कीजिए, विभिन्न रोग होने के एक नहीं बल्कि बहुत से कारण होते हैं।
उत्तर:
रोग होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे - वायरस, पर्याप्त पोषण का न होना, अर्थात् कुपोषण, आनुवंशिक भिन्नता, साफ पानी की अनुपलब्धता, गरीबी, लोक सेवाओं की अनुपलब्धता आदि। इस प्रकार स्पष्ट है कि सभी रोगों के तात्कालिक कारण तथा सहायक कारण होते हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के रोग होने के एक नहीं बल्कि बहुत से कांरण होते हैं।

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प्रश्न 30.
हिपेटाइटिस क्या है ? इससे बचाव के क्या उपाय हैं ?
उत्तर:
हिपेटाइटिस वायरस जनित रोग है, जिसे पीलिया भी कहते हैं। यह रोग पानी द्वारा फैलता है। इससे बचाव के लिए हिपेटाइटिस 'A' के टीके लगवाने चाहिए किन्तु ये टीके पाँच वर्ष से कम आयु में ही शिशुओं को लगवाने चाहिए क्योंकि पाँच वर्ष बाद बच्चा हिपेटाइटिस 'A' के प्रति प्रतिरक्षा प्राप्त कर चुका होता है क्योंकि पानी के माध्यम से यह वायरस बालक के सम्पर्क में आ चुका होता है।

बचाव के उपाय: उबला हुआ क्लोरीनकृत जल का प्रयोग करना चाहिए तथा रोगी के सम्पर्क में नहीं रहना चाहिए।

प्रश्न 31.
HIV से पीड़ित रोगी का उपचार सम्भव नहीं होता। क्यों?
अथवा
HIV - AIDS रोगी की मृत्यु का कारण क्यों बन जाता है?
उत्तर:
संक्रमण के विशिष्ट ऊतक कई बार अतिसामान्य प्रभाव को लक्षित करते हैं। HIV संक्रमण में वायरस प्रतिरक्षा तंत्र में जाते हैं और इसके कार्य को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार HIV-AIDS से प्रभावित मनुष्य का शरीर प्रतिदिन होने वाले छोटे संक्रमणों का मुकाबला नहीं कर पाता। हल्के खाँसी - जुकाम से भी निमोनिया हो सकता है तथा आहार नाल के संक्रमण से रुधिरयुक्त प्रवाहिका हो सकता है। अन्तत: ऐसे छोटे - छोटे अन्य संक्रमण ही HIV - AIDS के रोगी की मृत्यु का कारण बनते हैं।

प्रश्न 32. 
प्रतिरक्षाकरण के नियम' का क्या आधार है?
उत्तर:
जब रोगाणु प्रतिरक्षा तंत्र पर पहली बार आक्रमण करते हैं तो प्रतिरक्षा तंत्र रोगाणुओं से प्रतिक्रिया करता है और फिर इसका विशिष्ट रूप से स्मरण कर लेता है। इस प्रकार जब वही रोगाणु या उससे मिलता - जुलता रोगाणु सम्पर्क में आता है तो पूरी शक्ति से उसे नष्ट कर देता है। इससे पहले संक्रमण की अपेक्षा दूसरा संक्रमण शीष्र ही समाप्त हो जाता है। यही प्रतिरक्षाकरण के नियम का आधार है।

निबन्धात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
रोग निवारण की सामान्य विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
रोग निवारण की सामान्य विधियाँ:

  1. हम रोगी से दूर रहें, साथ ही उन कारणों से अवगत हों, जिनसे यह रोग फैलता है।
  2. वातोढ (वाय द्वारा फैलने वाले) सक्ष्म जीवों से बचने के लिए खले स्थान में रहना चाहिए, भीड़ भरे स्थानों
  3. पर नहीं जाना चाहिए।
  4. जलोढ़ (जल द्वारा फैलना) सूक्ष्म जीवों से बचने के लिए साफ जल का उपयोग करना चाहिए। जल को जीवाणुरहित करके ही उपयोग में लेना चाहिए। अतः संक्रामक रोगों से बचने के लिए हमें अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखना चाहिए।
  5.  हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र जो रोगाणु से हमारी सुरक्षा करता है, वह मजबूत हो, इसके लिए हमारे भोजन में पर्याप्त पौष्टिक पदार्थ होने चाहिए तथा हमारी दैनिक दिनचर्या नियमित हो तथा हम मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक रूप से स्वस्थ हों।

इस सामान्य प्रक्रिया से हम संक्रामक रोगों से बच सकते हैं।

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प्रश्न 2.
तीव्र एवं दीर्घकालिक रोगों का हमारे शरीर पर प्रभाव बतलाइए।
उत्तर:
तीव्र रोगों की अवधि कम होती है, परन्तु दीर्घकालिक रोग लम्बी अवधि तक या जीवनपर्यन्त रहते हैं। तीव्र तथा दीर्घकालिक रोगों के हमारे स्वास्थ्य पर भिन्न - भिन्न प्रभाव होते हैं। कोई भी रोग, जो हमारे शरीर के किसी भी भाग के कार्य को प्रभाबित करता है, तो वह हमारे सामान्य स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, क्योंकि सामान्य स्वास्थ्य के लिए शरीर के सभी अंगों का समुचित कार्य करना आवश्यक है। लेकिन तीव्र रोग, जो बहुत कम समय तक रहता है, उसे सामान्य स्वास्थ्य को प्रभावित करने का समय नहीं मिलता। लेकिन दीर्घकालिक रोग हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

(i) तीव्र प्रचंड रोगों का प्रभाव:
इन रोगों की अवधि कम होती है, जैसे-खाँसी-जुकाम कुछ समय बाद स्वतः ही ठीक हो जाता है। अतः ये रोग जो अधिक समय तक नहीं रहते इनका कुप्रभाव हमारे सामान्य स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता। खाँसी - जुकाम के कारण हमारे शरीर के वजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, हमारी सांस भी नहीं फूलती तथा हम सदैवव थकान भी महसूस नहीं करते। इस रोग के कारण विद्यालय भी कुछ दिनों के लिए ही नहीं जाते जिससे अध्ययन कार्य में अधिक बाधा नहीं होती है।

(ii) दीर्घकालिक रोगों का प्रभाव:
यह रोग शरीर में लम्बी अवधि तक अथवा जीवनपर्यन्त रहते हैं। इस कारण ये हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। जैसे यदि फेफड़े क्षय रोग से संक्रमित हो जाएँ तो कई वर्षों तक बीमार होने के कारण वजन कम हो जाता है और हर समय थकान महसूस करते हैं। इस रोग से पीड़ित होने पर हमें लम्बे समय तक के लिए विद्यालय छोड़ना पड़ सकता है। इससे हमारी स्कूल की पढ़ाई बाधित होगी। इससे स्कूल में पढ़ाई को समझने में कठिनाई होगी। इससे हमारे सीखने की क्षमता कम हो जाएगी। इसलिए दीर्घकालिक रोग तीव्र रोग की अपेक्षा लोगों के स्वास्थ्य पर लम्बे समय तक विपरीत प्रभाव बनाए रखते हैं।


प्रश्न 3.
कोशिका सजीवों की मौलिक इकाई है। ऐसा कोई भी कारण जो कोशिकाओं एवं ऊतकों को उचित प्रकार से कार्य करने से रोकता है, वह शरीर की समुचित क्रिया में कमी का कारण होता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि कोशिका हमारे शरीर की संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई होती है। इससे यह आशय है कि कोशिका द्वारा शरीर संरचना होती है तथा यह जीवित है। अतः यह शरीर में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं को सम्पन्न करती है। कोशिका निर्माण में अनेक कार्बनिक पदार्थ, जैसे - प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा अथवा लिपिड सहयोग देते हैं। कोशिका के अन्दर अनेक गतिविधियाँ होती रहती हैं, जैसे - गतिशीलता, कोशिका विभाजन कर r नई कोशिका का निर्माण, कोशिका में टूट - फूट की मरम्मत आदि। कोशिका का सम्बन्ध ऊतक से तथा ऊतक का सम्बन्ध अंग से है अतः अंगों तथा ऊतकों में भी विशिष्ट क्रियाएँ चलती रहती हैं, जैसे - फेफड़े सांस लेते हैं, वृक्क में निस्यंदन द्वारा मूत्र बनता है, मस्तिष्क सोचने का कार्य करता है।

हमारा शरीर विभिन्न अंग तंत्रों से बना है अत: ये सभी क्रियाएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। यदि वृक्क में विभाजन कर, नई कोशिका का निर्माण, कोशिका में टूट - फूट की मरम्मत आदि। कोशिका का सम्बन्ध ऊतक से तथा ऊतक का सम्बन्ध अंग से है अत: अंगों तथा ऊतकों में भी विशिष्ट क्रियाएँ चलती रहती हैं, जैसे - फेफड़े सांस लेते हैं, वृक्क में निस्यंदन द्वारा मूत्र बनता है, मस्तिष्क सोचने का कार्य करता है।

हमारा शरीर विभिन्न अंग तंत्रों से बना है अत: ये सभी क्रियाएँ एक - दूसरे से सम्बन्धित हैं। यदि वृक्क में निस्यंदन न हो तो विषैले पदार्थ हमारे शरीर में एकत्रित हो जाएंगे। इस परिस्थिति में मस्तिष्क उचित प्रकार से कार्य नहीं करेगा। इन सभी कार्यों को करने के लिए कोशिकाओं को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोजन द्वारा मिलती है अत: ऐसा कोई भी कारक जो कोशिकाओं एवं ऊतकों को उचित प्रकार से कार्य करने से रोकता है, वह हमारे शरीर की समुचित क्रिया में कमी का कारण होता है।

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प्रश्न 4.
रोगाणुओं के विभिन्न प्रकारों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
रोगाणुओं के प्रकार (Kinds of pathogens):
जीव विज्ञान की दृष्टि से सूक्ष्म जीवों को विभिन्न श्रेणियों में रखा जाता है। मानव में रोग उत्पन्न करने वाले विभिन्न रोगाणुओं और उनकी श्रेणियों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है।
(1) विषाणु (Virus): ये मानव में रोग उत्पन्न करने वाले सबसे सूक्ष्म रोगाणु हैं। संरंचना एवं व्यवहार की दृष्टि से ये शेष सजीवों से भिन्न होते हैं। चिकन पोक्स (Chicken Pox), पोलियो (Polio), रेबीज, जुकाम, हिपेटाइटिस (Hepatitis), फ्लू (Flu), डेंगू बुखार, एड्स (AIDS) आदि विषाणु जनित मानव रोग हैं।

( 2 ) जीवाणु (Bacteria): विभिन्न प्रकार के परजीवी जीवाणु, मानव शरीर में प्रवेश कर कई प्रकार के रोग उत्पन्त्र करते हैं। हैजा (Cholera), प्लेग (Plague), निमोनिया (Pneumonia), कुष्ठ (Leprosy), तपेदिक (Tuberculosis) आदि जीवाणु जनित मानव रोगों के कुछ उदाहरण हैं। स्वच्छता के नियमों का पालन कर इनके संक्रमण से बचा जा सकता है। रोग हो जाने पर डॉक्टर की सलाह पर प्रतिजैविक औषधियों का उपयोग कर इन रोगों से पूर्ण मुक्ति पाई जा सकती है।

(3) प्रोटोजोआ (Protozoa): कुछ एककोशीय जीव प्रोटोजोआ भी मानव शरीर में परजीवी की तरह निवास कर रोग उत्पन्न करते हैं। कालाजार तथा मलेरिया प्रोटोजोआ जनित रोग के प्रमुख उदाहरण हैं। मलेरिया के कारण प्रतिवर्ष बहुत जन एवं धन की हानि होती है। यह प्लाज्मोडियम (Plasmodium) वंश के प्रोटोजोआ द्वारा होता है। प्लाज्मोडियम के अतिरिक्त ट्रिपेनोसोमा, अमीबा, लैसमानिया, जियार्डिया आदि प्रोटोजोआ भी मानव रोग के कारण हैं।

प्रश्न 5.
एड्स (AIDS) के कारण, लक्षण, रोकथाम एवं रोगमुक्ति के उपाय लिखिए।
उत्तर:
एड्स (AIDS): इसका पूरा नाम एक्वायर्ड इम्युनो डेफिसिएंसी सिन्ड्रोम है। यह बीमारी HIV (ह्यूमन इम्यूनो डेफिसिएंसी वायरस) के कारण होती है।
एड्स के संक्रमण के कारण:

  1.  एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में एड्स का संक्रमण लैंगिक संपर्क द्वारा हो सकता है।
  2.  रक्त स्थानान्तरण द्वारा, जैसे AIDS से ग्रसित व्यक्ति का रक्त स्वस्थ व्यक्ति को स्थानान्तरित किया जाए।
  3. संक्रमित सूई या ब्लेड के प्रयोग से।
  4.  गर्भावस्था में रोगी माता द्वारा या रोगी माता द्वारा शिशु को स्तनपान द्वारा हो सकता है।

लक्षण:

  1. लसीका ग्रन्थि में सूजन।
  2. प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है।
  3. रक्त कणिकाओं की कमी से रक्तस्नाव एवं लगातार बुखार रहता है।
  4. शरीर का भार कम होने लगता है।
  5.  प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट हो जाने पर छोटे से छोटे संक्रमण का भी बड़ा प्रभाव शरीर में परिलक्षित होता है, जैसेखाँसी - जुकाम होने पर निमोनिया हो सकता है।

रोकथाम एवं उपचर:

  1. शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए ताकि लोगों में यौन संक्रमित रोगों एवं एड्स के प्रति जागरूकता उत्पन्न हो सके।
  2. एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति का रुधिर अन्य को नहीं दिया जाना चाहिए।
  3. एक बार प्रयोगी (डिस्पोजेबल) सूई का ही उपयोग करना चाहिए। यदि ऐसा सम्भव न हो तो सूई को ब्लीच घोल से साफ करना चाहिए, इससे एच.आई.वी. नष्ट हो जाते हैं।
  4. असुरक्षित एवं अवांछनीय यौन सम्बन्धों से बचना चाहिए।
  5.  नशा मुक्ति अभियान चलाया जाना चाहिए क्योंकि सूई से नशा लेने वालों में इस रोग के प्रसार की आशंका अधिक रहती है।
  6. वर्तमान में एड्स के उपचार हेतु प्रभावी औषधि का टीका उपलब्ध नहीं है परन्तु इस दिशा में प्रयास जारी हैं, फिर भी कई एन्टीरेट्रोवाइरल औषधियों का उपयोग रोग को नियंत्रण में रखने हेतु किया जाता है।

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प्रश्न 6.
रोग की अंग - विशिष्ट तथा ऊतक - विशिष्ट अभिव्यक्ति से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 रोग की अंग:
 विशिष्ट तथा ऊतक: विशिष्ट अभिव्यक्ति से आशय है कि जिस ऊतक अथवा अंग पर हमारे शरीर में रोग के सूक्ष्मजीव कई स्थानों से प्रवेश कर सकत है। वास्तव म सूक्ष्म जाव का वाभन्न स्पाशाज शरीर के विभिन्न भागों में विकसित होती है। यदि ये हवा से नाक द्वारा प्रवेश करते हैं, तो ये फेफड़ों में जाएंगे तथा यदि यह क्षय रोग का बैक्टीरिया है तो फेफड़े में क्षय रोग उत्पन्न करेगा। यदि मुँह द्वारा प्रवेश करते हैं तो ये आहार नाल में रहेंगे, जैसे - टायफाइड रोग उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया अथवा ये यकृत में जाएंगे जैसे हेपेटाइटिस बैक्टीरिया जो पीलिया रोग के वाहक हैं।

किन्तु हमेशा ऐसा नहीं है। HIV वायरस, जो लैंगिक अंगों द्वारा शरीर में प्रवेश करता है, लसीका ग्रन्थियों में फैलता है। मलेरिया उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीव जो मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश करते हैं, वे यकृत में जाते हैं, उसके बाद लाल रुधिर कोशिकाओं में जाते हैं। इसी प्रकार जापानी मस्तिष्क ज्वर उत्पन्न करने वाला वायरस भी मच्छर काटने से शरीर में पहुँचता है। लेकिन यह मस्तिष्क को संक्रमित करता है।

जिस ऊतक अथवा अंग पर सूक्ष्म जीव आक्रमण करता है, रोग के लक्षण तथा चिह्न उसी पर निर्भर करते हैं। यदि फेफड़े पर आक्रमण होता है तब लक्षण खाँसी तथा कम साँस आना होगा। यदि यकृत पर आक्रमण होता है तब पीलिया होगा। यदि मस्तिष्क पर आक्रमण होता है तब सिरदर्द, उल्टी आना, चक्कर अथवा बेहोशी आना होता है। यदि हम यह जानते हैं कि कौनसे ऊतक अथवा अंग पर आक्रमण हुआ है और उनके क्या कार्य हैं तो हम संक्रमण के चिह्न तथा लक्षण का अनुमान लगा सकते हैं।

कुछ विशेष संक्रमण में विशिष्ट ऊतक अति सामान्य प्रभाव दर्शाते हैं। जैसे HIV संक्रमण में वायरस प्रतिरक्षा तंत्र को प्रंभावित करता है। यही कारण है कि HIV - AIDS से बहुत से प्रभाव परिलक्षित होते हैं क्योंकि हमारा शरीर प्रतिदिन होने वाले छोटे संक्रमणों का मुकाबला नहीं कर पाता है। हल्के से खाँसी-जुकाम से भी निमोनिया हो सकता है। इसी प्रकार आहार नाल के संक्रमण से रुधिर युक्त प्रवाहिका हो सकता है। अंतत: ये अन्य संक्रमण ही HIV AIDS के रोगी की मृत्यु के कारण बनते हैं। रोग की तीव्रता की अभिव्यक्ति शरीर में स्थित सूक्ष्मजीवों की संख्या पर निर्भर करती है। यदि सूक्ष्मजीव अधिक संख्या में हैं तो रोग की अभिव्यक्ति तीव्र होगी। इसका निर्धारण हमारा प्रतिरक्षा तंत्र भी करता है।

प्रश्न 7.
रोगों के निवारण की कौन - कौन सी विधियाँ हैं ? समझाइए।
उत्तर:
रोगों के निवारण (रोकथाम) की निम्न दो विधियाँ हैं।

  1. सामान्य विधियाँ
  2. रोग विशिष्ट विधियाँ


(1) सामान्य विधियाँ: इसमें हम निम्न उपाय प्रयोग करते हैं।
(i) संक्रमित होने से बचाव:
सबसे पहले हम संक्रमित होने से बचाव के उपाय करते हैं। ये उपाय रोग के संक्रमण होने पर आधारित हैं।
(a) वातोढ़ (वायु से फैलने वाले) रोगाणु से बचने के लिए इस तरह की परिस्थितियाँ बनाई जाती हैं कि रोगाणु दूसरे व्यक्ति में न फैल सके और पर्यावरण में जीवित न रह सके। उदाहरणार्थ - रोगाणु यदि वायु द्वारा फैलता है तो पीड़ित व्यक्ति को अलग रखा जाना चाहिए व देखाल करने वाले व्यक्ति को नाक पर कपड़ा या फिल्टर का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के परिवेश को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक रखें।

(b) जलोढ़ ( जल द्वारा फैलने वाले) रोगाणुओं से बचाव के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित (safe) पेयजल आवश्यक है तथा रोगी के अपशिष्ट पदार्थों को जल में नहीं मिलने देना चाहिए, अच्छा हो जमीन में गाड़ दें।

(c) रोगवाहकों जैसे मच्छर, मक्खी व कॉकरोच आदि द्वारा होने वाले संक्रमण से बचने के लिए उनको समाप्त करना या वृद्धि रोकना आवश्यक है। मच्छरों के जनन को रोकने के लिए पानी का जमाव न होने दें तथा साफ व स्वच्छ वातावरण रखें। खाने की वस्तुओं को ढककर तथा मक्खी और कॉकरोच की पहुँच से दूर रखना चाहिए।

(ii) प्रतिरक्षा तंत्र की सक्रियता:
जब कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश करता है, तो प्रतिरक्षा तंत्र की विशिष्ट कोशिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं और उससे लड़ने लगती हैं। यदि ये कोशिकाएँ रोगाणु को मारने में सफल हो जाती हैं तो हमें वह रोग नहीं होता। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो हम उस रोग से पीड़ित हो जाते हैं।

अतः रोग से बचने के लिए हमारे प्रतिरक्षा तंत्र का शक्तिशाली होना आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब हम पौष्टिक एवं संतुलित आहार हमार प्रोतरक्षा तत्र का शाक्तशाली होना आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब हम पौष्टिक एवं संतुलित आहार समुचित मात्रा में लें और बुरी आदतों से दूर रहें। जैसे - धूम्रपान, नशीले पदार्थ एवं असुरक्षित यौन सम्बन्ध आदि।

(2) रोग विशिष्ट विधियाँ:
रोगों के निवारण (रोकथाम) का अत्यधिक विशिष्ट एवं उचित उपाय है प्रतिरक्षाकरण (Immunisation) या टीकाकरण। इस विधि में, बहुत थोड़ी संख्या (मात्रा) में रोगाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में डाल दिए जाते हैं। रोगाणु के प्रवेश करते ही प्रतिरक्षा तंत्र 'धोखे' में आ जाता है, और उस रोगाणु से लड़ने वाली विशिष्ट कोशिकाओं का उत्पादन आरम्भ कर देता है। इस प्रकार रोगाणु को मारने वाली विशिष्ट कोशिकाएँ शरीर में पहले से ही निर्मित हो जाती हैं और जब रोग का रोगाणु वास्तव में शरीर में प्रवेश करता है तब प्रवेशित रोगाणु से विशिष्ट कोशिकाएँ लड़ती हैं और उसे मार देती हैं।

RBSE Class 9 Science Important Questions Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं

प्रश्न 8.
पाँच ' Fs ' क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
साफ - सफाई एवं स्वच्छता द्वारा रोग संचरण से बचाव के पाँच तरीकों को संक्षेप में पाँच 'Fs' द्वारा दर्शाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं

  1.  तरल पदार्थ (Fluid): जल स्रोत को सुरक्षित करें तथा जल का उपचार व संचय सावधानी से करें।
  2. हाथ व उंगलियाँ (Fingers): खाना बनाने या खाने से पूर्व हाथ धोयें, मलत्याग के बाद हाथ धोयें।
  3. मक्खियाँ व कीड़े (Flies): खाने को ढककर रखें तथा मक्खियों व कीड़ों को नियंत्रित रखें।
  4. खेत व मैदान (Fields): उपयोग करने से पूर्व सब्जियाँ व फल साफ करें तथा खुले में मलत्याग ना करें।
  5. बाढ़ (Floods): उचित जल निकासी की व्यवस्था तथा जल का उपचार।

इन पाँच 'Fs' का पालन करने पर मल पदार्थ से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है।

Prasanna
Last Updated on May 18, 2022, 7:30 p.m.
Published May 12, 2022