RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

Rajasthan Board  RBSE Class 12 Sociology Important Questions  Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में  Important Questions and Answers.

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RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 1.
'द वैल्थ ऑफ नेशन्स' नामक पुस्तक के लेखक हैं
(क) एडम स्मिथ 
(ख) प्रो. मार्शल 
(ग) प्रो. पीगू
(घ) रावर्स्टन
उत्तर:
(क) एडम स्मिथ 

प्रश्न 2. 
औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत महत्त्वपूर्ण केन्द्र था
(क) कच्चे माल को निर्यात करने का
(ख) बने-बनाये माल को निर्यात करने का 
(ग) पूँजीगत माल को निर्यात करने का
(घ) पूँजीगत माल को आयात करने का 
उत्तर:
(ख) बने-बनाये माल को निर्यात करने का 

प्रश्न 3. 
मारवाड़ी परिवार का प्रतिनिधित्व प्रमुख रूप से किस घराने के द्वारा किया गया है
(क) टाटा परिवार 
(ख) डालमिया परिवार 
(ग) मोदी परिवार 
(घ) बिड़ला परिवार 
उत्तर:
(घ) बिड़ला परिवार 

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 4. 
आधुनिक समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक, जो कि पूँजीवाद के कटु आलोचक थे
(क) मैक्स वेबर 
(ख) कार्ल मार्क्स 
(ग) ओबन
(घ) दुर्थीम 
उत्तर:
(ख) कार्ल मार्क्स 

प्रश्न 5. 
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं
(क) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुएँ
(ख) पूँजी 
(ग) समाचार और लोगों का संचलन
(घ) धार्मिक आस्था 
उत्तर:
(घ) धार्मिक आस्था 

प्रश्न 6. 
पुष्कर का पशु मेला लगता है
(क) महाराष्ट्र 
(ख) उड़ीसा
(ग) राजस्थान 
(घ) उत्तर प्रदेश 
उत्तर:
(ग) राजस्थान 

प्रश्न 7. 
उदारवाद की प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं है
(क) सरकारी विभागों का निजीकरण 
(ख) पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप नहीं करना 
(ग) विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी करना
(घ) पूँजीगत उत्पादों को क्रय करना बिक्री करना नहीं 
उत्तर:
(घ) पूँजीगत उत्पादों को क्रय करना बिक्री करना नहीं 

प्रश्न 8. 
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया का सम्बन्ध है
(क) विश्व के देशों की परस्पर अन्तर्सम्बद्धता से 
(ख) व्यापार में रियायतें और सुविधाओं से
(ग) विश्व के देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों से 
(घ) इनमें से कोई नहीं 
उत्तर:
(क) विश्व के देशों की परस्पर अन्तर्सम्बद्धता से 

प्रश्न 9. 
'लेस-ए-फेयर' से क्या आशय है? 
(क) बाजार को अकेला छोड़ दिया जाए।
(ख) अदृश्य हाथ। 
(ग) पारम्परिक व्यापारिक समुदाय।
(घ) जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाजार। 
उत्तर:
(क) बाजार को अकेला छोड़ दिया जाए।

प्रश्न 10. 
बस्तर जिले में कौनसे आदिवासी रहते हैं ? 
(क) भील 
(ख) सांथाल 
(ग) गोंड
(घ) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(ग) गोंड

प्रश्न 11. 
"बाजार का महत्त्व सिर्फ इसकी आर्थिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है।" यह कथन किनका है?
(क) दुर्खाइम 
(ख) एल्फ्रेड गेल 
(ग) कार्ल मार्क्स 
(घ) मैक्स वेबर 
उत्तर:
(ख) एल्फ्रेड गेल 

प्रश्न 12. 
उत्तरी भारत के बनिया किस समुदाय में आते हैं ? 
(क) क्षत्रिय 
(ख) ब्राह्मण 
(ग) शूद्र
(घ) वैश्य 
उत्तर:
(घ) वैश्य 

प्रश्न 13. 
उपनिवेशकाल में नमक का दूरदराज तक व्यापार किनके द्वारा होता था?
(क) क्षत्रिय
(ख) वैश्य
(ग) बंजारों द्वारा
(घ) ब्राह्मणों द्वारा 
उत्तर:
(ग) बंजारों द्वारा

प्रश्न 14. 
सबसे ज्यादा जाना-माना व्यापारिक समुदाय कौनसा है जो भारत में हर जगह पाया जाता है ? 
(क) जैन समुदाय 
(ख) पारसी समुदाय 
(ग) सिंधी समुदाय
(घ) मरवाडि समुदाय
उत्तर:
(घ) मरवाडि समुदाय

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

प्रश्न 1.
बाजार एक आर्थिक संस्था ही नहीं अपितु एक..........................संस्था भी है। 
उत्तर:
सामाजिक
 
प्रश्न 2. 
आरम्भिक दौर के सबसे चर्चित राजनीतिक अर्थशास्त्री..........................थे। 
उत्तर:
एडम स्मिथ

प्रश्न 3. 
दे वेल्थ ऑफ नेशन्स..........................पुस्तकों की श्रृंखला है।
उत्तर:
पाँच

प्रश्न 4. 
भारत में उपनिवेशकाल से पहले जटिल मौद्रीकृत..........................विद्यमान थी। 
उत्तर:
अर्थव्यवस्था

प्रश्न 5. 
मार्क्स के अनुसार..........................की प्रक्रिया के नकारात्मक सामाजिक प्रभाव हैं। 
उत्तर:
पण्यीकरण

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 6. 
उदारवाद जैसी आर्थिक नीति के कारण..........................के युग की शुरुआत हुई।
उत्तर:
भूमण्डलीकरण

प्रश्न 7.
..........................का अर्थ है दुनिया के किसी एक कोने में किसी बाजार में परिवर्तन होने पर दूसरे कोनों पर उसका अनुकूल-प्रतिकूल असर होना।
उत्तर:
एकीकरण

प्रश्न 8.
.........................कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आता है जब हिन्दू तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में नहाने आते हैं। 
उत्तर:
पुष्कर मेला

प्रश्न 9. 
भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमण्डलीकरण प्राथमिक तौर पर.........................की नीति की वजह से हुआ है।
उत्तर:
उदारीकरण 

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
बाजार की अर्थव्यवस्था को सर्वप्रथम किसने समझने का प्रयास किया? 
उत्तर:
एडम स्मिथ ने। 

प्रश्न 2. 
'द वैल्थ ऑफ नेशन्स' पुस्तक के लेखक कौन हैं? 
उत्तर:
एडम स्मिथ। 

प्रश्न 3. 
अदृश्य हाथ का नाम किस विद्वान द्वारा दिया गया? 
उत्तर:
एडम स्मिथ द्वारा। 

प्रश्न 4. 
खुले बाजार से क्या तात्पर्य है? 
उत्तर:
खुला बाजार सभी प्रकार की राष्ट्रीय अथवा अन्य रोकथाम से मुक्त होता है। 

प्रश्न 5. 
लेस-ए-फेयर से क्या तात्पर्य है? 
उत्तर:
लेस-ए-फेयर से तात्पर्य है:बाजार में हस्तक्षेप न किया जाये। 

प्रश्न 6. 
वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर कहाँ पर है? 
उत्तर:
वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर अमेरिका में न्यूयार्क में है। 

प्रश्न 7. 
वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर न्यूयार्क में आतंकवादी हमला कब हुआ था? 
उत्तर:
यह हमला 9/11 को हुआ था। 

प्रश्न 8. 
नासदाक क्या है? 
उत्तर:
नासदाक एक प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक विनिमय केन्द्र का नाम है जो न्यूयॉर्क में स्थित है। 

प्रश्न 9.
सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति के कारण पहली बार किसका भूमंडलीकरण हुआ? 
उत्तर:
सूचना-प्रौद्योगिकी-क्रांति के कारण पहली बार बाजार का भूमंडलीकरण हुआ। 

प्रश्न 10. 
उद्योगपतियों द्वारा गठित दो संगठनों के नाम लिखिये। 
उत्तर:

  1. एसोसिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री। 
  2. ऑल इण्डिया एक्सपोर्ट्स चैम्बर। 

प्रश्न 11. 
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता बताइये। 
उत्तर:
विश्व में बाजारों का विस्तार और एकीकरण का बढ़ना। 

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 12. 
भारहीन अर्थव्यवस्था कौन-सी है?
उत्तर:
भारहीन अर्थव्यवस्था में उत्पादन सूचना पर आधारित होता है, जैसे - कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर। 

प्रश्न 13. 
भूमंडलीकरण की नीति का आरंभ भारत में कब और किस नीति के कारण हुआ? 
उत्तर:
1980 में उदारीकरण की नीति के कारण। 

प्रश्न 14. 
भारत में उदारीकरण के कारण किन-किन उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रोनिक्स और तेलीय अनाजों के उद्योगों पर। 

प्रश्न 15. 
धोराई समाज का अध्ययन कब और किस मानव विज्ञानी के द्वारा किया गया था? 
उत्तर:
1982 में, मानवशास्त्री एल्फ्रेड गेल के द्वारा।

प्रश्न 16. 
भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमण्डलीकरण किस नीति के कारण हुआ है? 
उत्तर:
उदारीकरण। 

प्रश्न 17. 
खुले व्यापार से आपका क्या आशय है? 
उत्तर:
एक ऐसा बाजार जो किसी भी प्रकार की राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त हो। 

प्रश्न 18. 
समाजशास्त्रियों के अनुसार बाजार क्या है ?
उत्तर:
समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार वो सामाजिक संस्था है जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित है।

प्रश्न 19. 
धोराई गाँव कहाँ स्थित है ? 
उत्तर:
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिला में। 

प्रश्न 20. 
भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययन किन पर केन्द्रित हैं ? 
उत्तर:
'पारम्परिक व्यापारिक समुदायों' या जातियों जैसे नाकरट्टारों पर। 

प्रश्न 21. 
उपनिवेशकाल में नमक का व्यापार किस प्रकार होता था? 
उत्तर:
उपनिवेशकाल में नमक का व्यापार एक उपेक्षित जनजातीय समूह, बंजारों द्वारा होता था। 

प्रश्न 22. 
उपनिवेशवाद का भारतीय अर्थव्यवस्था पर हुए परिणाम का एक नकारात्मक उदाहरण दीजिए। 
उत्तर:
हथकरघा के काम का खात्मा हो जाना। 

प्रश्न 23. 
अधिकतर इतिहासकार उपनिवेशकाल को किस रूप में देखते हैं ?
उत्तर:
संधिकाल के रूप में।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
उपनिवेशवाद क्या है ?
उत्तर:
जब कोई विदेशी शक्ति किसी देश की राजनीतिक सत्ता हथिया कर उस देश के संसाधनों का अपने देश के लोगों व उद्योगों के हित में प्रयुक्त किया जाता है, तो इसे उपनिवेशवाद कहते हैं।

प्रश्न 2. 
बाजार को खुला कर देने और अनेक उत्पादों के आयात पर लगे प्रतिबंध को हटा देने के क्या परिणाम सामने आये?
उत्तर:
बाजार को खुला कर देने और अनेक उत्पादों के आयात पर लगे प्रतिबंध हटा देने से अब बहुत सारी विदेशी वस्तुएँ यहाँ बिकती हैं, जो पहले यहाँ नहीं मिलती थीं।

प्रश्न 3. 
बाजार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
बाजार तमाम तरह की आर्थिक क्रियाओं को इंगित करने वाली एक आर्थिक संस्था के साथ-साथ एक सामाजिक संस्था भी है, जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित है।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 4. 
हाट बाजार अथवा साप्ताहिक बाजार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
हाट बाजार अथवा साप्ताहिक बाजार एक निश्चित अवधि के बाद लगने वाले बाजार होते हैं, जहाँ लोग वस्तुओं का क्रय-विक्रय करते हैं।

प्रश्न 5. 
एडम स्मिथ के अनुसार 'अदृश्य हाथ' का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
एडम स्मिथ के अनुसार 'अदृश्य हाथ' का तात्पर्य है कि कोई एक अदृश्य बल काम करता है जो व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्तियों को समाज के लाभों में परिवर्तित कर देता है।

प्रश्न 6. 
भूमंडलीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वह दौर जिसमें दुनिया पहले से ज्यादा अन्तर्सम्बन्धित है, न केवल आर्थिक तौर पर अपितु राजनैतिक तौर पर भी, इसी को भूमंडलीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 7. 
भूमंडलीकरण के अन्तर्गत बाजारों के एकीकरण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
भूमंडलीकरण के अन्तर्गत बाजारों के एकीकरण से यह तात्पर्य है कि दुनिया के किसी एक कोने में किसी बाजार में होने वाले परिवर्तन का प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव उसके दूसरे कोनों में भी होता है।

प्रश्न 8. 
मैक्स वेबर के द्वारा 'प्रतिष्ठा का हाथ' किसे कहा गया?
उत्तर:
लोग जो सामान खरीदते एवं उपभोग करते हैं, वह समाज में उनकी प्रस्थिति के साथ गहनता से जुड़ा होता है। वेबर द्वारा इसी को 'प्रतिष्ठा का हाथ' कहा गया।

प्रश्न 9. 
हुंडी क्या है?
उत्तर:
हुंडी एक कर्ज-पत्र की तरह होती है जिसे व्यापारियों के द्वारा लम्बी दूरी के व्यापार के लिए प्रयुक्त किया जाता है। 

प्रश्न 10. 
पण्यीकरण से क्या तात्पर्य है?
अथवा 
पण्यीकरण कब होता है ?
उत्तर:
जिस वस्तु को पहले खरीदा और बेचा न जाता हो परन्तु अब उसे खरीदा और बेचा जाता हो, तब पण्यीकरण होता है।

प्रश्न 11. 
भूमंडलीकरण के द्वारा किन-किन क्षेत्रों में परिचालन होता है ?
उत्तर:
भूमण्डलीकरण के द्वारा पूँजी और वस्तुओं में ही नहीं, अपितु लोगों, सांस्कृतिक उत्पादों और छवियों का भी परिचालन होता है।

प्रश्न 12. 
विनिमय मूल्य क्या है ? यह अवधारणा किसकी है?
उत्तर:
उत्पादन मूल्य और विक्रय मूल्य के मध्य लाभ को विनिमय मूल्य कहा जाता है । यह अवधारणा कार्ल मार्क्स की है।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 13. 
हाट या साप्ताहिक बाजार के दो लाभ बताइये।
उत्तर:

  1. इसमें लोग कृषि तथा वनों के उत्पादों को व्यापारियों को बेचते हैं। 
  2. इसमें लोग सगेसम्बन्धियों से मिलते हैं तथा विवाह सम्बन्ध भी निश्चित करते हैं।

प्रश्न 14. 
समाजशास्त्रियों का बाजार के सन्दर्भ में क्या मत है ? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार सामाजिक संस्थाएँ हैं जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं। उदाहरण के लिए, बाजारों का नियंत्रण या संगठन अक्सर विशेष सामाजिक समूह या वर्गों द्वारा होता है और इसकी अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं से भी विशेष संबद्धता होती है।

प्रश्न 15. 
अर्थव्यवस्थाएँ समाज में रची-बसी हैं। दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अर्थव्यवस्थाएँ समाज में 'रची-बसी' हैं। इस मत को यहाँ दो उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया गया है, एक उदाहरण है-एक साप्ताहिक आदिवासी हाट का और दूसरा है-एक 'पारंपरिक व्यापारिक समुदाय' और भारत के उपनिवेशिक दौर में उसका लेन-देन का नेटवर्क या तंत्र।

प्रश्न 16. 
ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासी अर्थव्यवस्था पर पड़े कोई दो प्रभाव बताइये।
उत्तर:

  1. वनों पर ब्रिटिश शासन का एकाधिकार होने से आदिवासियों को उनके उत्पादों से हाथ धोना पड़ा। 
  2. आदिवासियों को अब बागानों और खदानों में काम करने को बाध्य होना पड़ा।

प्रश्न 17. 
व्यापार के कुछ क्षेत्रों पर एक ही जाति का एकाधिकार हो जाता है। इसके कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. तमिलनाडु में नाकरट्टारों में जाति आधारित व्यापार। 
  2. मारवाड़ी समुदाय के द्वारा किया जाने वाला व्यापार।

प्रश्न 18. 
पण्यीकरण के कोई दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:

  1. गरीब लोगों के द्वारा अपनी किडनी को धनी व्यक्तियों को बेचा जाना। 
  2. विवाह ब्यूरो के द्वारा विवाह सम्बन्ध निश्चित करवाने के बदले पैसा लेना।

प्रश्न 19. 
भूमंडलीकरण के कौन-कौन से रुझान हैं ?
उत्तर:
भूमण्डीकरण के रुझान हैं:

  1. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, समाचार एवं लोगों का आवागमन 
  2. प्रौद्योगिकी एवं अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास।

प्रश्न 20. 
भारत किन स्रोतों के द्वारा विश्व-अर्थव्यवस्था के साथ लगातार जुड़ता जा रहा है?
उत्तर:
भारत 

  1. सॉफ्टवेयर उद्योग और 
  2. व्यापार में बाह्य स्रोतों के प्रयोग का उद्योग, के द्वारा विश्व अर्थव्यवस्था के साथ लगातार जुड़ता जा रहा है।

प्रश्न 21. 
उदारीकरण से भारत में किन-किन उद्योगों में फायदा होगा?
उत्तर:
उदारीकरण से भारत में:

  • सॉफ्टवेयर एवं सूचना प्रौद्योगिकी, 
  • मछली तथा फल उत्पादन में फायदा होगा।

प्रश्न 22. 
उदारीकरण की कोई दो नीतियाँ बताइये।
उत्तर:

  1. पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी दखल को कम कर देना। 
  2. विदेशी वस्तुओं के आयात में आयात शुल्क में कमी करना।

प्रश्न 23. 
राजस्थान में पुष्कर मेले का महत्त्व बताइये।
उत्तर:

  1. यहाँ पशुओं का विनिमय होता है। 
  2. यहाँ धार्मिक पुण्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों की भी अदला-बदली होती है।

प्रश्न 24. 
पूँजीवाद की दो मूल विशेषताएँ लिखिये। उत्तर-पूँजीवाद की दो मूल विशेषताएँ ये हैं

  1. उत्पादनों के साधनों पर व्यक्ति का नियंत्रण होता है। 
  2. यह व्यक्ति के अधिकारों पर आधारित सामाजिक-आर्थिक पद्धति है।

प्रश्न 25. 
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अर्थव्यवस्था की जिन प्रभावशाली ऊँचाइयों का संचालन संभाला, उनमें कौन से क्षेत्र शामिल थे?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अर्थव्यवस्था की जिन प्रभावशाली ऊंचाइयों का संचालन संभाला, उनमें ये क्षेत्र शामिल थे-सुरक्षा, परिवहन, संचार, ऊर्जा, खनन तथा अन्य परियोजनाएँ।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 26. 
आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में कौन-से खण्ड या क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
आधुनिक अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित खण्ड या क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं:

  1. उदारीकरण की आर्थिक नीति 
  2. पारराष्ट्रीय निगम 
  3. इलेक्ट्रोनिक्स अर्थव्यवस्था 
  4. भाररहित या ज्ञानात्मक अर्थव्यवस्था।

प्रश्न 27. 
साप्ताहिक बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करता है? कैसे?
उत्तर:
साप्ताहिक बाजार उत्पादों के आदान-प्रदान के साथ-साथ एक सामाजिक संस्था के रूप में स्थानीय लोगों के लिए अपने रिश्तेदारों तथा सगे-सम्बन्धियों तथा परिचितों से सामाजिक मेल-मिलाप के केन्द्र होते हैं। यहाँ ये लोग अपने जवान बेटे-बेटियों के विवाहों को तय कर सकते हैं, गप्पे हाँक सकते हैं और कई अन्य कार्य कर सकते हैं।

प्रश्न 28. 
पूँजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझाइये।
उत्तर:
मार्क्स ने लिखा है कि सभी आर्थिक व्यवस्थाएँ सामाजिक व्यवस्थाएँ भी हैं; क्योंकि हर उत्पादन-विधि विशेष सम्बन्धों से बनती है। पूँजीवादी उत्पादन विधि के अन्तर्गत मजदूरी या श्रम भी एक बिकाऊ सामान बन जाता है। इस तरह पूँजीवादी समाज में दो वर्गों-पूँजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग का गठन होता है।

प्रश्न 29. 
एडम स्मिथ के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
एडम स्मिथ का जन्म 1723 में तथा मृत्यु 1790 में हुई थी। आपको समकालीन आर्थिक विचारों के उद्गमकर्ता के रूप में जाना जाता है। स्मिथ अपनी पाँच पुस्तकों की श्रृंखला 'दे वेल्थ ऑफ नेशन्स' से प्रसिद्ध हैं, जिसमें इस बात की व्याख्या की गई है कि कैसे खुली-बाजार अर्थव्यवस्था में तार्किक स्वयं-लाभ आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 30. 
आधुनिक अर्थशास्त्र का अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में क्या विचार है ?
उत्तर:
आधुनिक अर्थशास्त्र का विकास एडम स्मिथ जैसे प्रारंभिक विचारकों के विचारों से हुआ और यह इस विचार पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था को समाज के एक पृथक् हिस्से के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जो बड़े सामाजिक एवं राजनीतिक संदर्भ से अलग है, जिसमें बाजार अपने स्वयं के नियमों के अनुसार कार्य करता है।

प्रश्न 31. 
भूमण्डलीकरणं से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
भूमण्डलीकरण मुक्त बाजार की स्थिति में विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की प्रक्रिया है। यह विश्व को राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सूत्र में बांधने वाली प्रक्रिया है। इसमें राष्ट्रीय भौगोलिक सीमाएँ अर्थहीन हो जाती हैं। यह सभी देशों में सहयोग तथा भाईचारे को बढ़ाती है। 

प्रश्न 32. 
उदारीकरण से क्या तात्पर्य है ?
अथवा 
अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
उदारीकरण से तात्पर्य-उदारीकरण एक प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था खुली अर्थव्यवस्था में परिणित हो जाती है। आर्थिक क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप कम-से-कम हो जाता है तथा निजीकरण बढ़ता है। 

प्रश्न 33. 
उदाहरण की सहायता से 'पण्यीकरण' के अर्थ की विवेचना कीजिए।
अथवा 
उपयुक्त उदाहरण देते हुए 'पण्यीकरण' को समझाइये।
उत्तर:
पण्यीकरण उस समय होता है जब कोई वस्तु पहले बाजार में खरीदी- बेची नहीं जा सकती हो और अब वह बेची-खरीदी जा सकती हो। इसमें कोई वस्तु बाजार में बिकने वाली चीज बन जाती है। उदाहरण के लिए श्रम और कौशल अब ऐसी चीजें हैं जो खरीदी व बेची जा सकती हैं।

प्रश्न 34. 
शिक्षा के पण्यीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा भी अब बाजार में बिकने वाली वस्तु हो गई है जो पहले नहीं थी। इसी को शिक्षा का पण्यीकरण कहा जाता है। उदाहरण के लिए अनेक निजी संस्थान जो व्यक्तित्व संवारने, अंग्रेजी बोलना सिखाने तथा अन्य चीजों के लिए पाठ्यक्रमों को चलाते हैं और उसके एवज में वे छात्रों से धन-राशि वसूल करते हैं। इसी प्रकार कोचिंग कक्षाएँ चलाना भी शिक्षा के पण्यीकरण को दर्शाती हैं क्योंकि ये बातें पहले सामान्य स्कूलों, कॉलेजों तथा परिवारों में सामान्य रूप से सिखाई जाती थीं।।

प्रश्न 35. 
'खेतिहर' समाजों में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केन्द्रीय विशेषता होती है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दुनिया भर के अधिकांश कृषक या 'खेतिहर' समाजों में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केंद्रीय विशेषता होती है। साप्ताहिक बाजार आस-पास के गांवों के लोगों को एकत्रित करता है जो अपनी खेती की उपज या किसी और उत्पाद को बेचने आते हैं और वे बनी-बनाई वस्तुएँ एवं अन्य सामान खरीदने आते हैं। इन बाजारों में स्थानीय क्षेत्र से बाहर के लोगों के साथ-साथ साहूकार, मसखरे, ज्योतिषी एवं तमाम तरह के विशेषज्ञ अपनी सेवाएँ एवं वस्तुओं के साथ आते हैं।

प्रश्न 36. 
"बाजार की रूपरेखा उस क्षेत्र के अधिक्रमित अन्तर-समूहों के सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीकात्मक चित्रण करती है।" स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अधिक्रम में एवं साथ ही बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। अमीर और उच्च श्रेणी वाले राजपूत आभूषण निर्माता और मध्यम श्रेणी के स्थानीय हिंदू व्यापारी बाजार के बीच वाले क्षेत्रों में बैठते हैं और आदिवासी जो तरकारी और स्थानीय सामान बेचते हैं वो बाजार के बाहरी हिस्सों में बैठते हैं। खरीदी और बेची जाने वाली वस्तुओं एवं मोल-भाव के प्रकार से सामाजिक संबंधों का पता चलता है।

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प्रश्न 37. 
उपयुक्त उदाहरण देते हुए प्रतिष्ठा का प्रतीक' (स्टेट्स सिम्बल) शब्द को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
लोग जो सामान खरीदते हैं तथा उपयोग करते हैं, वह समाज में उनकी प्रस्थिति से गहनतापूर्वक जुड़ा होता है । वेबर ने इसे 'प्रतिष्ठा का प्रतीक' कहा है। उदाहरण के लिए, भारत में लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अनुमान उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली कार के मॉडल तथा सेलफोन से किया जाता है।

प्रश्न 38. 
"साप्ताहिक बाजार आदिवासी ग्रामों के सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केन्द्रीय विशेषता है।" इस कथन को समझाइये।
उत्तर:
साप्ताहिक बाजार विभिन्न स्थानीय तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ते हैं तथा उन्हें वृहत् राष्ट्रीय व्यवस्थाओं और कस्बों तथा महानगरीय केन्द्रों से जोड़ते हैं। ये उत्पादों के लेन-देन के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप के केन्द्र होते हैं। यह बाजार आदिवासी ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा बाहरी वातावरण के मध्य एक कड़ी होता है।

प्रश्न 39. 
एडम स्मिथ के अनुसार आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजार कैसे काम करते हैं ?
उत्तर:
एडम स्मिथ के अनुसार आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजार अपने स्वयं के नियमों के अनुसार कार्य करता है। इसमें व्यक्ति स्वयं के लाभ के अनुसार कार्य करता है। यह अर्थव्यवस्था तब सबसे अच्छे से कार्य करती है. जब हर व्यक्ति- खरीददार और विक्रेता-तर्कसंगत निर्णय लेते हैं, जो उनके हित में होते हैं।

प्रश्न 40. 
पारस्परिक व्यापार प्रणाली में 'हुण्डी' ने किस प्रकार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ?
उत्तर:
पारंपरिक व्यापार प्रणाली में हुंडी विनिमय बिल या कर्ज का एक महत्त्वपूर्ण साधन थी। इसे व्यापारी लम्बी दूरियों के व्यापारिक लेन-देन में प्रयोग करते थे। चूंकि व्यापार में इन व्यापारिक समुदायों के नातेदारी के लोग क्षेत्र प्रमुख होते थे, इसलिए जारी गई हुंडी दूसरे कोने में स्वीकार की जाती थी।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 41. 
उपनिवेशवाद के आने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था किन रूपों में परिवर्तित हुई ? 
उत्तर:
उपनिवेशवाद के आने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था निम्न रूपों में परिवर्तित हुई

  1. भारत का हथकरघा उद्योग पूरी तरह से चौपट हो गया। 
  2. भारत विश्व की पूँजीवादी व्यवस्था के साथ जुड़ गया।
  3. अब भारत उत्पादित सामानों के निर्यात के स्थान पर कच्चे माल का निर्यातक और विदेशी उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बना दिया गया।

प्रश्न 42. 
औपनिवेशिक नियंत्रण के बाद जनजातीय बाजारों में कौन-कौन से परिवर्तन आये?
उत्तर:
औपनिवेशिक नियंत्रण के बाद:

  1. आदिवासी अर्थव्यवस्था को क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया। 
  2. जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण कर गैर-जनजातीय लोगों के लिए इस क्षेत्र में खोल दिया गया। 
  3. आदिवासियों को खदानों तथा बागानों में श्रमिक के रूप में रखा जाने लगा। इस प्रकार यहाँ श्रम के बाजार का विकास हुआ। 

प्रश्न 43. 
क्या बाजार एक सामाजिक संस्था है? विवेचना कीजिए।
अथवा 
बाजार एक सामाजिक संस्था है। समझाइये।
उत्तर:
समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार एक सामाजिक संस्था है जो कि विशेष सांस्कृतिक तरीकों से निर्मित है। उदाहरण के लिए, बाजारों का नियंत्रण अथवा संगठन विशेष सामाजिक समूहों अथवा वर्गों के द्वारा होता है और इसकी अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं से भी विशेष सम्बद्धता होती है।

प्रश्न 44. 
औपनिवेशिक शासन से पूर्व क्षेत्र विशेष का व्यापार विशिष्ट समुदायों के द्वारा नियंत्रित होते थे, क्यों?
उत्तर:

  1. औपनिवेशिक शासन से पूर्व व्यापार और खरीद-फरोक्त प्रायः जाति एवं नातेदारी तंत्र में होती थी। 
  2. व्यापारी अपने समुदाय या जाति के लोगों पर औरों की अपेक्षा अधिक भरोसा करते थे और इन्हीं सम्पर्कों में व्यापार करते थे। फलतः व्यापार जैसे कुछ क्षेत्रों पर एक जाति विशेष का एकाधिकार हो जाता था।

प्रश्न 45. 
उदारवादिता में किस तरह की नीतियाँ शामिल हैं?
उत्तर:
उदारवादिता में कई तरह की नीतियाँ शामिल हैं, जैसे-सरकारी विभागों का निजीकरण; पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम कर देना; विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी करना; और विदेशी कम्पनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने की सहूलियत देना।

प्रश्न 46. 
व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी सम्पर्क कैसे योगदान कर सकते हैं ?
उत्तर:
व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी सम्पर्क की भूमिका:

  1. व्यापार के कुछ विशेष क्षेत्र ऐसे होते थे जो विशेष जाति और नातेदारी तन्त्रों के द्वारा संचालित किये जाते थे क्योंकि व्यापारी इन सदस्यों पर अधिक विश्वास करते थे।
  2. जाति, नातेदारी की सामाजिक संरचना सभी व्यापार के अनुकूल थी।
  3. यहाँ की बैंकिंग और अन्य व्यापारिक गतिविधियाँ भी जाति और नातेदारी के द्वारा संगठित और संचालित होती थी।

प्रश्न 47. 
भूमण्डलीकरण की तीन विशेषतएँ बताइये। 
उत्तर:
भू-मण्डलीकरण की विशेषताएँ

  1. भूमण्डलीकरण में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर विश्व ज्यादा अन्तर्सम्बन्धित होता है। 
  2. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, समाचार और लोगों का आवागमन बढ़ जाता है तथा प्रौद्योगिकी का विकास होता है। 
  3. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया मुक्त अर्थव्यवस्था तथा निजीकरण को बढ़ावा देती है।

प्रश्न 48. 
पूँजीवादी समाज में उपभोग अत्यधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हो जाता है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
पूँजीवादी समाज में उपभोग के अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाने के पीछे आर्थिक कारण के साथ-साथ प्रतीकात्मक कारण भी हैं; क्योंकि पूँजीवादी समाजों में उपभोग के द्वारा सामाजिक भिन्नता व श्रेष्ठता का निर्माण होता है और उसे प्रदर्शन भी किया जा सकता है। प्रत्येक उपभोक्ता अपनी सामाजिक, आर्थिक प्रस्थिति के अनुसार विशेष प्रकार की वस्तुएँ खरीद कर उनका प्रदर्शन कर सकता है।

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प्रश्न 49. 
आदिवासी समाजों में साप्ताहिक हाट की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:

  1. आदिवासी लोग पहाड़ी और जंगलाती क्षेत्रों में दूर-दूर तक फैले क्षेत्र में निवास करते हैं । ये लोग साप्ताहिक हाट में जाकर अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्र तथा परिचितों से भेंट कर सकते हैं।
  2. अपने उत्पादों को बेचने तथा घरेलू वस्तुओं तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए इन हाटों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 50. 
बस्तर जिले के आदिवासी बाजार में कौन-कौन-सी आर्थिक क्रियायें सम्पन्न होती हैं ?
उत्तर:
बस्तर जिले के आदिवासी बाजार में विक्रेता अधिकतर हिन्दू व्यापारी होते हैं और खरीददार मुख्यतः आदिवासी होते हैं । आदिवासी जंगली और कृषि सम्बन्धी उत्पादों और अपने श्रम को बेचकर जो पैसा कमाते हैं, उनसे वे गहने, पायलें, बर्तन, चाकू, नमक, हल्दी तथा अन्य बनी-बनायी वस्तुएँ खरीदते हैं।

प्रश्न 51. 
एल्फ्रेड गेल (1982) के अध्ययन के अनुसार "बाजार का महत्त्व सिर्फ इसकी आर्थिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है।" स्पष्ट करें।
अथवा 
एल्फ्रेड गेल के द्वारा धौराई के अध्ययन में क्या बताया गया था?
उत्तर:
एल्फ्रेड गेल के द्वारा धौराई के अध्ययन में यह बताया गया था कि बाजार का महत्त्व केवल इसकी आर्थिक क्रियाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बाजार की रूपरेखा क्षेत्र विशेष के अधिक्रमित अन्तर समूहों के सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीकात्मक चित्रण भी करती है। विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अनुक्रम व बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। जैसे-अमीर और उच्च श्रेणी वाले राजपूत आभूषण निर्माता और मध्यम श्रेणी के स्थानीय हिंदू व्यापारी बाजार के बीच वाले क्षेत्रों में स्थापित होते हैं और आदिवासी बाजार के बाहरी हिस्सों में बैठते हैं।

प्रश्नं 52. 
आप कैसे कह सकते हैं कि औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत आन्तरिक एवं बाहरी दुनिया से व्यापार करने में सक्षम था?
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत में उन्नत उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र तथा सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था थी, जिसके द्वारा भारत आन्तरिक एवं बाकी दुनिया के साथ व्यापार करने में सक्षम था। विनिमय और कर्ज का महत्त्वपूर्ण साधन हुंडी थी।

प्रश्न 53.
तमिलनाडु में नाकरट्टारों में जाति आधारित व्यापार को समझाइये।
उत्तर:
नाकरट्टारों में कर्ज लेना और पैसा जमा कराना जाति पर आधारित सामाजिक सम्बन्धों से जुड़ा होता था। विनिमय नाकर ट्टारों की प्रतिष्ठा, क्षमता और जमा पूँजी जैसे सिद्धान्तों के अनुसार होता था। इनकी बैंकिंग व्यवस्था एक जाति आधारित बैंकिंग व्यवस्था थी। प्रत्येक नाकरट्टारों इन सामूहिक संस्थाओं से सम्बद्ध था।

प्रश्न 54. 
औपनिवेशिक शासन के दौरान किस प्रकार से मारवाड़ी समुदाय ने स्वयं को पुनर्गठित किया और अपनी स्थिति को संभाला था?
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन के दौरान मारवाड़ी समुदाय ने कलकत्ता में मिलने वाले सुअवसरों का लाभ उठाया तथा व्यापार तथा साहूकारी को जारी रखने के लिए वे देश के विभिन्न भागों में बस गये। अपने गहन सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर इस समुदाय ने बैंकिंग व्यवस्था की स्थापना की और लोगों को ब्याज पर कर्ज देने लगे।

प्रश्न 55. 
वर्तमान में मारवाड़ियों की बाजार व्यवस्था में भूमिका बताइये।।
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद मारवाड़ी परिवारों ने स्वयं को आधुनिक उद्योगपतियों में हस्तान्तरित कर दिया। साहूकारी और बैंकिंग व्यवस्था के संचालन के साथ-साथ आज औद्योगिक जगत् में भी मारवाड़ी समुदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। छोटे प्रवासी व्यापारी से साहूकार और बड़े उद्योगपतियों के रूप में बदलना काफी महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 56. 
कार्ल मार्क्स के द्वारा किन-किन आधारों पर पूँजीवाद की आलोचना की गई है? 
उत्तर:
कार्ल मार्क्स द्वारा पूँजीवाद की आलोचना

  1. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमिक का श्रम एक पण्य वस्तु बन गया है।
  2. पूँजीवादी व्यवस्था में मजदूरों को अपनी श्रम-शक्ति को बेचकर अपनी मजदूरी कमानी पड़ती है, जिससे पूँजीपति और कामगार नामक दो वर्गों का निर्माण हुआ।
  3. इस व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग का शोषण करता है। 

प्रश्न 57. 
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में किन-किन क्षेत्रों को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में पूँजी और वस्तुओं, लोगों, सांस्कृतिक उत्पादों एवं छवियों का विश्वभर में परिचालन किया जाता है। उत्पाद, सेवाएँ और सांस्कृतिक तत्व, जैसे-योग, आयुर्वेद, पर्यटन आदि, जो पहले बाजार व्यवस्था से बाहर थे, ये अब बाजार-व्यवस्था के हिस्से बन गये हैं।

प्रश्न 58. 
भूमण्डलीकरण की केन्द्रीय विशेषता कौन सी है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है-विश्व के चारों कोनों में बाजारों का विस्तार और एकीकरण का बढ़ना। एकीकरण के बढ़ने से यह आशय है कि दुनिया के किसी भाग में होने वाले परिवर्तन का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव उसके अन्य भागों में भी अवश्य पड़ता है। जैसे-अमेरिकी बाजार की गिरावट का असर भारत के सॉफ्टवेयर व सेवा उद्योगों पर पड़ता है।

प्रश्न 59. 
उदारीकरण में किन-किन नीतियों को शामिल किया जाता है?
उत्तर:

  1. उदारीकरण की प्रक्रिया में सरकारी संस्थाओं को निजी संस्थाओं को बेच दिया जाता है। 
  2. इसमें पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप को कम-से-कम कर दिया जाता है। 
  3. इसमें विदेशी वस्तुओं के आयात को सुगम बनाने हेतु आयात शुल्क कम कर दिया जाता है। 
  4. इसमें विदेशी कम्पनियों को अपने देश में निवेश करने की सुविधाएँ दी जाती हैं।

प्रश्न 60. 
सन् 1990 के दशक से सरकार द्वारा अपनाई गई उदारीकरण की नीति के क्या परिणाम निकले?
अथवा 
भारत में उदारीकरण से होने वाले सकारात्मक प्रभावों को बताइये। 
उत्तर:
भारत में उदारीकरण के सकारात्मक प्रभाव

  1. उदारीकरण ने भारत में आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा दिया है।
  2. उदारीकरण ने भारतीय बाजारों को विदेशी कम्पनी के लिए खोल दिया है। इससे यहाँ अब बहुत-सी विदेशी वस्तुएँ मिलने लगी हैं।
  3. उदारीकरण से पूँजी का निवेश बढ़ा है तथा निजीकरण से रोजगार के अवसरों तथा कार्यकुशलता में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 61. 
पूँजी से क्या आशय है? 
उत्तर:
पूँजी-पूँजी निवेशं योग्य संसाधनों की संचित निधि का नाम है। इस शब्द का प्रयोग आमतौर पर सक्रिय विधियों के लिए किया जाता है, जिन्हें निवेश के लिए संभालकर रखा जाता है। सिर्फ बचाकर इकट्ठी की गई विधि के लिए पूँजी का प्रयोग नहीं किया जाता है।

प्रश्न 62. 
पूँजीवाद से क्या आशय है ?
उत्तर:
पूँजीवाद-पूँजीवाद सामान्य वस्तु या पण्य उत्पादन पर आधारित उत्पादन पद्धति या एक सामाजिक व्यवस्था है जहाँ व्यक्तिगत सम्पत्ति और बाजार ने सभी क्षेत्रों में अपनी पैठ बना ली है और सभी चीजों के साथ-साथ श्रम शक्ति को भी पण्य वस्तु के रूप में बदल दिया है। इसमें दो प्रमुख वर्ग होते हैं-(1) पूंजीपति वर्ग और (2) सर्वहारा या श्रमिक वर्ग। .

प्रश्न 63. 
व्यापार प्रक्रिया के लिए बाहरी स्रोतों से सहायता लेने से क्या आशय है ?
उत्तर:
व्यापार प्रक्रिया के लिए बाहरी स्रोतों से सहायता लेना एक ऐसी पद्धति है जिसके द्वारा उत्पादन प्रक्रिया के किसी हिस्से को अथवा सेवा उद्योग के किसी अंग को किसी तीसरे पक्ष द्वारा सम्पन्न करने के लिए बाहर ठेका दिया जाए। उदाहरण के लिए कोई टेलीफोन कं. अपने ग्राहक सेवा प्रभाग के कार्य किसी अन्य छोटी कम्पनी से कराए।

प्रश्न 64. 
जाति आधारित बाजार क्या है ? समझाइये।
उत्तर:
उपनिवेश के पहले के दिनों में भारत में देशज व्यापारियों का एक संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था थी जिससे भारत आंतरिक स्तर पर तथा बाकी दुनिया से भी व्यापार करने में सक्षम था। इन पारंपरिक व्यापारिक जातियों की अपने कर्ज और बैंकिंग की व्यवस्थाएँ थीं। हुंडी या विनिमय बिल इसका प्रमुख उदाहरण है। चूंकि प्राथमिकता में व्यापार इन समुदायों की जाति एवं नातेदारी क्षेत्रों में ही होता था। इसलिए इसे जाति आधारित बाजार कहा गया। 

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में बाजार किस प्रकार कार्य करता है ?
उत्तर:
इसके जवाब के लिए हमें संक्षिप्त तौर पर अठारहवीं शताब्दी के इंग्लैंड और आधुनिक अर्थशास्त्र के शुरुआती दिनों के बारे में जानना होगा जिसे उस दौर में 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था' कहा जाता था। आरंभिक दौर के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में एडम स्मिथ सबसे चर्चित थे। स्मिथ का तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सौदों का एक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से खुद-ब-खुद एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। यह तब भी होता है जब करोड़ों के लेन-देन में शामिल व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति इसकी स्थापना का इरादा नहीं रखता। प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ को बढ़ाने की सोचता है और ऐसा करते हुए वो जो भी करता है वो स्वतः ही समाज के या सभी के हित में होता है। इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि कोई एक अदृश्य बल यहाँ काम करता है जो इन व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्ति को समाज के लाभ में बदल देता है। इस बल को स्मिथ ने 'अदृश्य हाथ' का नाम दिया। स्मिथ ने 'अदृश्य हाथ' के विचार को इस तर्क के रूप में प्रयोग किया कि जब बाजार में व्यक्ति स्वयं लाभ के अनुसार काम करता है तो समाज को हर तरह से फायदा होता है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को बढ़ाता है और अधिक समृद्धि उत्पन्न करता है।

आधुनिक अर्थशास्त्र का विकास एडम स्मिथ जैसे प्रारंभिक विचारकों के विचारों से हुआ और यह इस विचार पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था को समाज के एक पृथक् हिस्से के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जो बड़े सामाजिक एवं राजनीतिक संदर्भ से अलग है, जिसमें बाजार अपने स्वयं के नियमों के अनुसार कार्य करता है। इस उपागम के विपरीत, समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढाँचे के अंदर आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक वैकल्पिक तरीके का विकास करने का प्रयास किया है।

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प्रश्न 2. 
औपनिवेशीकरण के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था में आए तीन मिल परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
औपनिवेशीकरण के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तन-भारतीय अर्थव्यवस्था का आर्थिक रूपान्तरण उपनिवेशवाद के साथ ही शुरू हुआ। औपनिवेशीकरण के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था में आए तीन प्रमुख परिवर्तन निम्नलिखित थे: 
1. उत्पादन, व्यापार तथा कृषि में विघटन:
उपनिवेश के पहले भी भारत में विस्तृत और परिष्कृत व्यापारिक तंत्र विद्यमान थे। परन्तु औपनिवेशीकरण के कारण उत्पादन, व्यापार तथा कृषि में अत्यधिक विघटन हुआ। औपनिवेशीकरण के पहले की शताब्दियों से भारत हथकरघा के कपड़ों का मुख्य निर्माता और निर्यातक होने के साथसाथ अनेक अन्य वस्तुओं जिनकी वैश्विक बाजार में माँग थी, का स्रोत था परन्तु औपनिवेशीकरण के बाद भारत का हथकरघा उद्योग पूरी तरह चौपट हो गया; क्योंकि तात्कालिक बाजारों में इस दौर में मशीनों से बने कपड़ों की देश में भरमार लगा दी गई।

2. भारत का उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बनना:
उपनिवेशकाल के दौरान भारत दुनिया की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से सम्बद्ध हो गया तथा भारत कच्चे माल तथा कृषक उत्पादों का निर्यातक तथा उद्योगों से उत्पादित वस्तुओं का उपभोक्ता बन कर रह गया, जबकि इससे पहले भारत उद्योगों से उत्पादित वस्तुओं का प्रमुख निर्यातक देश था।

3. नये व्यापारिक समूहों का प्रवेश:
औपनिवेशिक काल के दौरान एक तरफ तो अनेक यूरोपीय समूह व्यापार तथा व्यवसाय के क्षेत्र में आने लगे तथा उन्होंने यहाँ के व्यापारिक समुदायों को उनका व्यापार छोड़ने के लिए बाध्य किया, तो दूसरी तरफ उपनिवेशवाद द्वारा प्रदान किए गए आर्थिक अवसरों का लाभ उठाकर मारवाड़ी तथा नाकरट्टार जैसे नए व्यापारिक समुदायों का जन्म हुआ जिन्होंने भारत के व्यापार तथा वाणिज्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 3. 
उदारीकरण के लाभ और हानियों की विवेचना कीजिए। 
उत्तर:
उदारीकरण से होने वाले लाभ-भारत में उदारीकरण के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं
1. भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण-उदारीकरण की नीति के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण हुआ।

2. आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाना-उदारीकरण की नीति के तहत सरकारी उद्यमों के निजीकरण, पूँजी, श्रम तथा व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप में कमी, विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी तथा भारत में विदेशी कम्पनियों को उद्योग कायम करने की सुविधाएँ देने आदि के बदलावों ने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया; क्योंकि सरकारी संस्थाओं की तुलना में निजी संस्थाएँ अधिक कुशल होती हैं तथा विदेशी पूँजी के निवेश से यहाँ पूँजी की समस्या का भी समाधान हुआ।

3. अनेक उद्योगों के उत्पादन को लाभ-वैश्विक बाजार से भारतीय उद्योग के कुछ क्षेत्रों, जैसेसॉफ्टवेयर, सूचना तकनीकी, मछली व फल उत्पादन को लाभ हुआ है। उदारीकरण से हानियाँ-भारत में उदारीकरण से निम्नलिखित हानियाँ हो रही हैं:

  1. अधिक चीजें खोकर कम चीजों की प्राप्ति-उदारीकरण की प्रक्रिया के चलते हम अपनी अधिक चीजें खोकर कम चीजें हासिल कर सकेंगे।
  2. अनेक उद्योगों पर दुष्प्रभाव-उदारीकरण की प्रक्रिया के चलते भारत के अनेक औद्योगिक क्षेत्रों, जैसे-ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रोनिक्स तथा तैलीय अनाजों के उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा; क्योंकि ये उद्योग विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पायेंगे।
  3. किसान तथा छोटे उत्पादकों को हानि-सब्सिडी और समर्थन मूल्य को कम कर दिये जाने से अनेक किसानों के सामने रोजी-रोटी कमाने की समस्या खड़ी हो गई है तथा छोटे उत्पादकों के सामने प्रतिस्पर्धा के दौर में अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ता नजर आ रहा है।
  4. रोजगार में अस्थिरता-उदारीकरण के कारण रोजगार के स्रोत स्थिर नहीं रहे हैं। सरकारी संगठित विभागों में नौकरियाँ लगातार कम हो रही हैं। यह स्थिति कामगारों के लिए प्रतिकूल साबित हो रही है।

प्रश्न 4. 
बस्तर जिले के साप्ताहिक बाजार के अध्ययन के माध्यम से जनजातीय स्थानीय अर्थव्यवस्था और बाहरी वातावरण के बीच की कड़ियों और आदिवासियों एवं अन्य लोगों के बीच के आर्थिक शोषण के सम्बन्ध को दर्शाइए।
उत्तर:
साप्ताहिक बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में, जनजातीय स्थानीय अर्थव्यवस्था और बाहरी वातावरण के बीच की कड़ियों और आदिवासियों एवं अन्य लोगों के बीच के आर्थिक शोषण का संबंध, इन सबका चित्रण बस्तर जिले के एक साप्ताहिक बाजार के अध्ययन में किया गया है। इस जिले में गोंड आदिवासी रहते हैं। साप्ताहिक बाजार में आप स्थानीय लोग, जिसमें जनजातीय और गैर-जनजातीय (मुख्यतः हिंद) के साथ-साथ बाहरी लोग जिसमें मुख्यतः विभिन्न जातियों के हिंदू व्यापारी होते हैं, को पाएँगे। वन अधिकारी भी बाजार में इन आदिवासियों के साथ व्यापार करने आते हैं जो वन-विभाग के लिए काम करते हैं। इस प्रकार, इस बाजार में तमाम तरह के विशेष विक्रेता अपने उत्पाद और सेवाएँ बेचने आते हैं। मुख्य चीजें जिनका बाजार में विनिमय होता है, वे बनी-बनाई वस्तुएँ (जैसे-गहने और पायलें, बर्तन और चाकू), गैर-स्थानीय खाद्य पदार्थ (जैसे-नमक और हल्दी), स्थानीय खाद्य सामग्री, खेतिहर उत्पाद और बनी बनाई वस्तुएँ (जैसे-बाँस की टोकरी), और जंगल के उत्पाद (जैसे-इमली एवं तिलहन) हैं।

 जंगल के उत्पाद जो आदिवासी लेकर आते हैं, वह व्यापारी खरीदकर कस्बों में ले जाते हैं। इन हाटों में खरीददार मुख्यतः आदिवासी ही होते हैं, पर विक्रेता मुख्यतः जाति-प्रधान हिंदू होते हैं। आदिवासी, जंगली और खेती संबंधी उत्पादों और अपने श्रम-बल को बेचकर जो पैसा कमाते हैं वो मुख्यतः इन हाटों में मिलने वाली सस्ती पायलों एवं गहनों और उपभोग की वस्तुएँ जैसे, बने-बनाए कपड़ों की खरीददारी के लिए खर्च करते हैं।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में
 
प्रश्न 5. 
व्यापार की सफलता में 'जाति और कुटुम्ब' का तंत्र किस प्रकार सहायक होता है ? उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
अथवा 
पूर्व-औपनिवेशिक भारत में जाति-आधारित बाजारों और व्यापार तंत्रों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पूर्व औपनिवेशिक भारत में व्यापार तंत्र-भारतीय अर्थव्यवस्था का मौद्रीकरण उपनिवेशिकता के पहले से ही विद्यमान था। उपनिवेश के पहले के दिनों में भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था भी शामिल थी जिससे भारत आंतरिक स्तर पर और बाकी दुनिया से भी व्यापार करने में सक्षम था। जाति आधारित बाजार और व्यापार तंत्र

1. हुंडी तथा विनिमय बिल:
भारत में पारंपरिक व्यापारिक समुदायों या जातियों की अपनी कर्ज और बैंक की व्यवस्थाएँ थीं। उदाहरण के लिए, विनिमय और कर्ज का एक महत्त्वपूर्ण साधन-हुंडी या विनिमय का बिल थी। इसे व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार में इस्तेमाल करते थे। चूंकि व्यापार प्राथमिकता में इन समुदायों की जाति एवं नातेदारी क्षेत्रों में ही होता था। इसलिए देश में किसी एक कोने से एक व्यापारी द्वारा जारी हुई हुंडी दूसरे कोने में व्यापारी द्वारा स्वीकार की जाती थी।

2. बैंक संयुक्त पारिवारिक संस्थान के रूप में तमिलनाडु के नाकरट्टारों की बैंकिंग और व्यापारिक गतिविधियाँ समुदाय के सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई थीं। जाति, नातेदारी और परिवार की संरचना सब व्यापार के अनुकूल थी और व्यापार इन्हीं सामाजिक संरचनाओं के भीतर होता था। इनके बैंक भी उनके संयुक्त पारिवारिक संस्थान थे ताकि व्यापारिक संस्थान की संरचना भी परिवार की तरह रहे । नाकरट्टारों की बैंकिंग व्यवस्था एक जाति आधारित बैंकिंग व्यवस्था थी।

3. व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियाँ जाति और नातेदारी पर आधारित-व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियाँ भी जाति और नातेदारी संबंधों के माध्यम से संगठित थीं। उदाहरण के लिए नाकरट्टार व्यापारियों के जाति और नातेदारी आधारित सामाजिक सम्पर्कों ने उन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया और सीलोन में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाने में सहायता दी।

4. कर्ज लेना और पैसा जमा करना-नाकरट्टारों में एक-दूसरे से कर्ज लेना या पैसा जमा करना जाति आधारित सामाजिक सम्बन्धों से जुड़ा होता था जो कि व्यापार के भू-भाग, आवासीय स्थान, वंशानुक्रम, विवाह और सामान्य सम्प्रदाय की सदस्यता पर आधारित था। नाकरट्टारों में प्रतिष्ठा, निर्णय क्षमता और जमा पूँजी जैसे सिद्धान्तों के अनुसार विनिमय होता था।

प्रश्न 6. 
औपनिवेशिक युग में यदि पूँजीवाद प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गई तो राष्ट्र-राज्य प्रमुख राजनीतिक स्वरूप बन गये। यह प्रक्रिया कैसे घटित हुई ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
औपनिवेशिक युग में पूँजीवाद प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गई थी, क्योंकि उपनिवेशीय देशों की अर्थव्यवस्था इस काल में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिक जुड़ गई थी। उदाहरण के लिए, उपनिवेशवाद के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे बदलाव आए जिससे उत्पादन, व्यापार और कृषि में एक अभूतपूर्व विघटन हुआ। भारत का हथकरघे का उद्योग खत्म हो गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस वक्त के बाजारों में इंग्लैंड से सस्ते बने-बनाए कपड़ों की भरमार लग गई थी। अंग्रेजी राज से पहले भारत बने-बनाए सामानों के निर्यात का प्रमुख केंद्र था। उपनिवेश के बाद भारत कच्चे माल और कृषक उत्पादों का स्रोत और उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बना दिया गया, यह दोनों कार्य इंग्लैंड के उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए किए गए।

पण्यीकरण की प्रक्रिया-पूँजीवादी व्यवस्था में पण्यीकरण की स्थिति सामने आई जिससे जीवन के हर क्षेत्र और हिस्सों में बाजारों का विस्तार होता गया जो कि पहले इस व्यवस्था से अछूते थे। उदाहरण के लिए श्रम और कौशल को पूँजीवादी व्यवस्था में खरीदा और बेचा जाने लगा। उपभोग का महत्त्वपूर्ण हो जाना-पूँजीवादी समाज में पण्यीकरण के साथ-साथ उपभोग अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। यह सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गया। इस प्रक्रिया ने भी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का विस्तार किया। इस प्रकार औपनिवेशिक युग में औद्योगीकरण, पण्यीकरण तथा उपभोग के बढ़ते महत्त्व के कारण पूँजीवाद प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गई। इस युग में राष्ट्र-राज्य प्रमुख राजनीतिक स्वरूप बन गये। आज हम सभी राष्ट्र-राज्यों में रहते हैं तथा सभी की कोई न कोई राष्ट्रीयता है।

प्रश्न 7. 
बाजार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस तरह अलग है ?
उत्तर:
आमतौर पर हम बाजारों को क्रय-विक्रय का स्थान मानकर चलते हैं । दैनिक बोलचाल के प्रयोग में 'बाजार' शब्द का अर्थ विशेष बाजार हो सकता है, जिन्हें हम शायद जानते हैं, जैसे-रेलवे स्टेशन के पास का बाजार, फलों का बाजार या थोक बाजार। वृहत् अर्थ में 'बाजार' अर्थव्यवस्था के लगभग समान है। बाजार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण तथा आर्थिक दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं बाजार पर आर्थिक दृष्टिकोण-आर्थिक दृष्टि से बाजार को लगभग अर्थव्यवस्था के समान माना जाता है जिसमें सभी प्रकार की आर्थिक क्रियायें और आर्थिक संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है। इसमें सभी प्रकार के क्रय-विक्रय, व्यापारिक लेन-देन और सौदे किये जाते हैं।

बाजार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण-समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अन्तर्गत बाजार को एक सामाजिक संस्था के रूप में स्वीकार किया गया है। समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार एक सामाजिक संस्था है जो कि विशेष सांस्कृतिक तरीकों से निर्मित है। उदाहरण के लिए, बाजारों का नियंत्रण अथवा संगठन विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों के द्वारा होता है और इसकी अन्य सामाजिक संस्थाओं जैसे-परिवार, नातेदारी, जाति इत्यादि। सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं से भी विशेष सम्बद्धता होती है। समाजशास्त्रियों का मत है कि बाजार की अर्थव्यवस्था समाज में रची-बसी होती है। 
इसे दो उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:

  1. साप्ताहिक आदिवासी हाटबाजार तथा 
  2. बाजार पारिवारिक व्यापारिक समुदाय के रूप में। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि बाजार का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण आर्थिक दृष्टिकोण से भिन्न है।

प्रश्न 8. 
जनजातियों में साप्ताहिक बाजार या हाट की आवश्यकता क्यों होती है? साप्ताहिक बाजार अथवा हाट आर्थिक और सामाजिक दोनों ही संस्थाओं की भूमिका कैसे निभाते हैं ?
उत्तर:
जनजातियों में साप्ताहिक बाजार या हाट की आवश्यकता-दुनियाभर के अधिकांश कृषक या 'खेतिहर' समाजों में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केन्द्रीय विशेषता होती है। आदिवासी लोग पहाड़ी और जंगलाती क्षेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिवास दूर-दूर तक के क्षेत्रों में फैले होते हैं। सड़कें टूटी-फूटी और संचार के साधन अव्यवस्थित होते हैं, अर्थव्यवस्था अविकसित होती है। इसलिए अपने उत्पादों को बेचने तथा घरेलू वस्तुओं व अन्य आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए इन्हें हाट आवश्यकता होती है। साप्ताहिक बाजार आर्थिक संस्था के रूप में-साप्ताहिक बाजार एक आर्थिक संस्था की भूमिका निभाता है; क्योंकि
1. साप्ताहिक बाजार आस-पास के गांवों के लोगों को एकत्रित करता है जो अपनी खेती की उपज या किसी और उत्पाद को बेचने आते हैं और वे बनी-बनाई वस्तुएँ एवं अन्य सामान खरीदने आते हैं जो उनके गाँवों में नहीं मिलते।
2. इन बाजारों में स्थानीय क्षेत्र से बाहर के लोगों के साथ-साथ साहूकार, मसखरे, ज्योतिषी एवं तमाम तरह के विशेषज्ञ अपनी सेवाओं एवं वस्तुओं के साथ आते हैं।
3. जनजातीय लोग अपने कृषि उत्पादों तथा जंगल से लाये उत्पादों को यहाँ पर स्थानीय व्यापारियों को बेचते हैं। 
4. स्थानीय व्यापारी इन उत्पादों को आस-पास के कस्बों में जाकर के बेचते हैं।
5. जनजातीय लोग हाट में से अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ, जैसे-नमक, हल्दी, कृषि के उपकरण, दैनिक उपभोग की वस्तुएँ, चूड़ियाँ, पायल व अन्य गहने आदि खरीदते हैं।
साप्ताहिक बाजार सामाजिक संस्था के रूप में-साप्ताहिक बाजार एक सामाजिक संस्था की भी भूमिका निभाते हैं; यथा

  1. जनजातीय लोग हाट में जाकर अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों अथवा परिचितों से भेंट कर सकते हैं।
  2. इन साप्ताहिक बाजारों में स्थानीय लोगों के द्वारा अपने जवान बेटे और बेटियों के विवाह सम्बन्ध निश्चित किये जाते हैं।
  3. यहाँ पर इन लोगों द्वारा अपनी अन्य क्रियाओं को सम्पन्न किया जाता है। 

प्रश्न 9. 
जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाजार अथवा हाट में कौन-कौन से परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं ?
उत्तर:
जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाजार अथवा हाट में होने वाले परिवर्तन-जनजातीय समाजों में साप्ताहिक बाजार अपना हाट काफी पुरानी संस्था है, जिसमें समय के साथ कई परिवर्तन आये हैं; यथा
1. औपनिवेशिक शासन के अन्तर्गत जब दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों को शासन के अधीन लिया गया तो यहाँ की अर्थव्यवस्था को क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया गया।

2. जनजातीय क्षेत्रों में औपनिवेशिक शासन के दौरान पक्की सड़कों का निर्माण किया गया ताकि इन इलाकों के समृद्ध जंगलों और खनिजों तक बेरोक-टोक पहुँचा जा सके। पक्की सड़कों के निर्माण के बाद यहाँ पर गैरजनजातीय लोगों, व्यापारी, साहूकार तथा आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय लोगों का तांता लग गया।

3. गैर-जनजातीय लोगों के आगमन के परिणामस्वरूप आदिवासी अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आए। अब साप्ताहिक बाजारों या हाट में जंगलों के विभिन्न प्रकार के उत्पादनों को.बाहरी लोगों को बेचा जाने लगा तथा कई प्रकार की नवीन वस्तुएँ इस बाजार में सम्मिलित हो गईं।

4. अब हाट अथवा साप्ताहिक बाजारों में आदिवासियों द्वारा अपने श्रम और बल दोनों का ही विक्रय किया जाने लगा; क्योंकि आदिवासी अब खदानों और बागानों के श्रमिक के रूप में कार्य करने के लिए विवश हो गये। इन सभी परिवर्तनों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों के साप्ताहिक बाजार या हाट बड़े बाजारों से जुड़ गए, लेकिन यहाँ बाहर से आए साहूकारों, व्यापारियों ने आदिवासियों को दरिद्र कर दिया, उनमें से अधिकांश ने अपनी जमीनें बाहरी लोगों के हाथ खो दीं।

प्रश्न 10. 
बस्तर जिले में आदिवासी बाजार में किन-किन वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बस्तर जिले के आदिवासी बाजार-बस्तर जिले में गौंड आदिवासी निवास करते हैं। यहाँ के साप्ताहिक बाजारों अथवा हाट में स्थानीय जनजातीय और गैर-जनजातीय हिन्दू लोगों के साथ-साथ बाहरी लोग जिनमें विभिन्न जातियों के हिन्दू व्यापारी तथा वन-विभाग के अधिकारी भी व्यापार करने के उद्देश्य से आते हैं। वस्तुओं और सेवाओं का लेन-देन-बस्तर आदिवासी बाजार में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं का लेन-देन किया जाता है; यथा
1. व्यापारियों द्वारा विक्रय की जाने वाली वस्तुएँ-इन बाजारों में प्रमुख रूप से हिन्दू व्यापारियों द्वारा जिन वस्तुओं का विक्रय किया जाता है, उनमें बनी बनायी वस्तुएँ, जैसे-गहने और पायलें, बर्तन, चाकू, गैर-स्थानीय खाद्य पदार्थ, जैसे-नमक व हल्दी और जंगल के विभिन्न प्रकार के उत्पाद जैसे-इमली और तिलहन आदि हैं। इन वस्तुओं के खरीददार यहाँ के आदिवासी लोग होते हैं।

2. आदिवासियों द्वारा विक्रय की जाने वाली वस्तुएँ-आदिवासी वहाँ के जंगल से प्राप्त विभिन्न उत्पादों तथा कृषि उत्पादों को लेकर बाजार में आते हैं। उन्हें वे बाजार के व्यापारियों को बेचा करते हैं। व्यापारी लोग इन उत्पादों को खरीदकर उन्हें आसपास के कस्बों में बेच देते हैं।

3. श्रम और बल का विक्रय-आदिवासी हाट अथवा साप्ताहिक बाजारों में अपने श्रम और बल का भी विक्रय करते हैं; क्योंकि उन्हें अब खदानों और बागानों में श्रमिक के रूप में कार्य करने के लिए विवश होना पड़ा है। यहाँ अब बल और श्रम को खुलकर बेचा और खरीदा जाता है।

4. सामाजिक क्रियाएँ-आदिवासी लोग इन आर्थिक क्रियाओं के साथ-साथ इन बाजारों में अपनी अनेक सामाजिक क्रियाओं को भी सम्पन्न करते हैं। यथा-वे अपने मित्रों, रिश्तेदारों से भेंट करते हैं, अपने विवाह योग्य लड़के-लड़कियों का विवाह तय करते हैं तथा अन्य सामाजिक क्रियाएँ सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 11. 
"औपनिवेशिक शासन से पहले भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर थी।" इस कथन की व्याख्या कीजिए। .
उत्तर:
भारत की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था-भारत ग्रामीण समुदायों का देश है। औपनिवेशिक शासन से पहले ये गाँव अपनी अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भर थे। औपनिवेशिक शासन के बहुत पहले से ही गाँव विनिमय के बड़े तंत्र के हिस्से थे।

1. विस्तृत और परिष्कृत व्यापार व्यवस्था-आधुनिक शोधों से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत में विस्तृत और परिष्कृत व्यापार तंत्र विद्यमान था। उदाहरण के लिए, भारत में कई शताब्दियों से हथकरघा के कपड़ों का निर्यात होने के साथ-साथ अनेक अन्य वस्तुओं जैसे-मसालों आदि, जिनकी वैश्विक बाजारों में, मुख्यतः यूरोपीय बाजारों में, भारी मांग थी, का निर्यात होता था।

2. संगठित व्यापारिक तंत्र तथा सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था-औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत में उन्नत उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र तथा सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था थी, जिसके द्वारा भारत आंतरिक एवं बाकी दुनिया के साथ व्यापार करने में सक्षम था। इन पारम्परिक व्यापारिक समुदायों अथवा जातियों की अपनी कर्ज और बैंकिंग की व्यवस्थाएँ थीं। उदाहरण के लिए, विनिमय और कर्ज का महत्त्वपूर्ण साधन हुंडी अथवा विनिमय का बिल थी, इसे व्यापारी लम्बी दूरी के व्यापार में प्रयोग करते थे।

3. जाति एवं नातेदारी आधारित व्यापार-औपनिवेशिक काल से पूर्व व्यापार प्राथमिकता में व्यापारिक समुदायों की जाति एवं नातेदारी क्षेत्रों में होता था। इसलिए देश के एक कोने से जारी की हुई हंडी को दूसरे कोने के व्यापारी के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता था। स्पष्ट है कि औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारतं की अर्थव्यवस्था स्वयं में आत्मनिर्भर थी।

RBSE Class 12 Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 12. 
पण्यीकरण से आप क्या समझते हैं? इसके नकारात्मक प्रभाव को बताते हुए समकालीन भारत में इसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पण्यीकरण से आशय-पण्यीकरण तब होता है जब पहले किसी वस्तु को बाजार में खरीदा या बेचा न जा सकता हो, लेकिन आज वही वस्तु बाजार में खरीदी और बेची जाती हो। श्रम और कौशल आज ऐसी ही वस्तुएँ हैं जो कि आज बाजार में बिक रही हैं। पण्यीकरण के नकारात्मक प्रभाव-पण्यीकरण में श्रम और कौशल सभी का बाजारीकरण हो जाता है । यहाँ तक कि मानव अंगों को भी खरीदा और बेचा जाने लगता है और मानवीयता का ह्रास हो जाता है। उदाहरण के लिए जिन धनी व्यक्तियों को किडनी की आवश्यकता है, उन्हें किडनी प्रतिस्थापन करवाने के लिए गरीबों के द्वारा अपनी किडनी दी जाती है और इसके बदले उन्हें धनी लोगों से पैसे मिलते हैं।

समकालीन भारत में पण्यीकरण के प्रभाव:

  1. पहले जहाँ विवाहों का निर्धारण घर-परिवार के लोगों के द्वारा किया जाता था, आज यह व्यावसायिक विवाह ब्यूरो के द्वारा किया जा रहा है, जो कि वेबसाइट अथवा किसी अन्य साधन के द्वारा वैवाहिक सम्बन्धों का निर्धारण करते हैं।
  2. अनेक निजी संस्थानों के द्वारा व्यक्तित्व को संवारने, अंग्रेजी पढ़ना-लिखना सिखाने तथा अन्य कई कार्यों के लिए व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाये जाते हैं।
  3. पहले जहाँ सामाजिक कौशल और शिष्टाचार को घर-परिवार में सिखाया जाता था, आज निजी संस्थाओं द्वारा यह कार्य किया जा रहा है। इस प्रकार से आज शिक्षा का भी पण्यीकरण हो गया है।

प्रश्न 13. 
भूमण्डलीकरण से क्या तात्पर्य है ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
भूमण्डलीकरण का अर्थ-भूमण्डलीकरण मुक्त बाजार की स्थिति में विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं से संयुक्त या एकीकृत होने की प्रक्रिया है । यह विश्व को आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सूत्र में बाँधती है। गिडिंग्स के अनुसार, "विभिन्न लोगों और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के बीच बढ़ती हुई अन्योन्याश्रितता या पारस्परिकता ही भूमण्डलीकरण है। यह पारस्परिकता प्रमुखतः सामाजिक-आर्थिक सम्बन्धों में होती है। इसमें समय और स्थान सिमट जाते हैं।"

भूमण्डलीकरण की विशेषताएँ-भूमण्डलीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. अन्तर्सम्बन्धिता-भूमण्डलीकरण में अत्यधिक अन्तर्सम्बन्धिता होती है। आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से इसमें विश्व स्तर पर सम्बन्धिता पाई जाती है।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आवागमन का विस्तार-भूमण्डलीकरण में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, समाचार और लोगों का आवागमन बढ़ता है। साथ ही इसमें प्रौद्योगिकी (कम्प्यूटर, दूरसंचार और परिवहन के क्षेत्र में) और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास होता है, जो कि इस आवागमन को गति प्रदान करते हैं।
  3. मुक्त अर्थव्यवस्था और निजीकरण को बढ़ावा-भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया मुक्त अर्थव्यवस्था तथा निजीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।
  4. एकीकरण में वृद्धि-भूमण्डलीकरण में विश्व के एकीकरण में वृद्धि होती है। विश्व के एक कोने में हुए परिवर्तन का प्रभाव दूसरे कोने में भी पड़ता है।
  5. बाजार की व्यापकता-भूमण्डलीकरण में अनेक उत्पाद, सेवाएँ और सांस्कृतिक तत्व, जो पहले बाजार-व्यवस्था से बाहर थे, अब बाजार के हिस्से बन जाते हैं।

प्रश्न 14. 
भूमण्डलीकरण के प्रभावों पर प्रकाश डालिये। 
उत्तर:
भूमण्डलीकरण के प्रभाव भूमण्डलीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के प्रभाव पाये जाते हैं । 
यथाभूमण्डलीकरण के सकारात्मक प्रभाव भूमण्डलीकरण के प्रमुख सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:
1. बाजारों का एकीकरण-भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के द्वारा चारों कोनों में बाजारों का विस्तार तथा एकीकरण किया जाता है। एकीकरण से यहाँ अभिप्राय यह है कि दुनियाँ के किसी कोने में बाजार में जो परिवर्तन आता है, दूसरे कोने में उसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव अवश्य पड़ता है।

2. बाजारों का विस्तार-भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के द्वारा बाजारों का विस्तार वैश्विक स्तर पर हो जाता है। उदाहरण के लिए, सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग और व्यापार में बाह्य स्रोतों के प्रयोग का उद्योग उन प्रमुख उद्योगों में से है जिसके द्वारा भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ता जा रहा है।
3. सांस्कृतिक उत्पादों और छवियों का वैश्विक परिचालन-भूमण्डलीकरण के अन्तर्गत पूँजी और सेवाओं के वैश्विक परिचालन के साथ-साथ लोगों, सांस्कृतिक उत्पादों और छवियों का भी विश्वभर में परिचालन होता है। ये विनिमय के नये दायरों तथा नये बाजारों में प्रवेश करती हैं। जो उत्पाद, सेवाएँ और सांस्कृतिक तत्व पहले बाजार-व्यवस्था से बाहर थे, अब वही बाजार व्यवस्था के हिस्से हैं। जैसे-भारतीय योग और आयुर्वेद, अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन आदि।

भूमण्डलीकरण के नकारात्मक प्रभाव भूमण्डलीकरण के प्रमुख नकारात्मक प्रभाव ये हैं:

  1. भूमण्डलीकरण से अविकसित और विकासशील देशों के उद्योग विकसित देशों की उच्च प्रौद्योगिकी के कारण प्रतियोगिता में टिक नहीं पा रहे हैं। इसका उस देश पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
  2. भूमण्डलीकरण के कारण बाजारीकरण व पण्यीकरण बढ़ता जा रहा है इसमें गरीब लोग और गरीब होते जा रहे हैं; क्योंकि महंगी होती जा रही शिक्षा उनकी पकड़ से बाहर हो गई है।
  3. भूमण्डलीकरण के कारण रोजगार की अस्थिरता में वृद्धि हुई है। सरकारी नौकरियाँ कम होती जा रही हैं। लघु व कुटीर उद्योग समाप्त होते जा रहे हैं और बेरोजगारी बढ़ रही है।

प्रश्न 15. 
उदारीकरण का अर्थ और नीतियाँ बताते हुए इससे होने वाले आर्थिक परिवर्तन बताइये।
उत्तर:
उदारीकरण का अर्थ-उदारीकरण एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत एक नियंत्रित-अर्थव्यवस्था खुली-अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो जाती है। इसमें अर्थव्यवस्था की गतिशीलता और सकारात्मकता बढ़ती है। यह कार्यकुशलता पर बल देती है जिससे देश के विकास को गति मिलती है। उदारीकरण की नीतियाँ उदारीकरण की प्रमुख नीतियाँ निम्नलिखित हैं
1. इसके अन्तर्गत सरकारी उद्यमों का निजीकरण किया जाता है अर्थात् सरकारी उद्यमों को निजी संस्थाओं को बेच दिया जाता है।
2. पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप को कम या समाप्त किया जाता है। मजदूरी और मूल्यों पर सरकारी नियंत्रण कम कर दिया जाता है।
3. विदेशी वस्तुओं का देश में आयात सरल बन सके इसके लिए आयात शुल्क को समाप्त किया जाता है।
4. विदेशी कम्पनियों को अपने देश में उद्योग स्थापित करने के लिए विशेष सुविधाएँ दी जाती हैं। 
उदारीकरण से होने वाले परिवर्तन (प्रभाव):

  1. उदारीकरण से निजीकरण बढ़ता है, विदेशी कम्पनियों का प्रवेश होता है और बहुत सी ऐसी विदेशी वस्तुएँ बिकती हैं, जो पहले यहाँ नहीं बिकती थीं।
  2. विदेशी पूँजी निवेश से आर्थिक विकास होता है, रोजगार में वृद्धि होती है और कार्यकुशलता बढ़ती है।
  3. उद्योगों तथा व्यापार में सरकारी नियंत्रण व दबाव कम हो जाता है। 

प्रश्न 16. 
उदारवाद के कार्यक्रमों के अन्तर्गत हुए परिवर्तनों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद के कार्यक्रमों के तहत जो परिवर्तन हुए उन्होंने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया और इसके साथ ही भारतीय बाजारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोला। उदाहरण के लिए, अब बहुत सारी विदेशी वस्तुएँ यहाँ बिकती हैं, जो पहले यहाँ नहीं मिलती थीं। माना जाता है कि विदेशी पूँजी के निवेश से आर्थिक विकास होता है और रोजगार बढ़ते हैं। सरकारी कंपनियों के निजीकरण से कुशलता बढ़ती है और सरकार पर दबाव कम होता है। हालाँकि, उदारीकरण का असर मिश्रित रहा है। कई लोगों का यह भी मत है कि उदारीकरण का भारतीय परिवेश पर प्रतिकूल असर ही हुआ है और आगे के दिनों में भी ऐसा ही होगा, हम अपनी ज्यादा चीजें खोकर कम चीजों को पाएँगे। भारतीय उद्योग के कुछ क्षेत्रों या खेती को शायद वैश्विक बाजार से फायदा हो सकता है पर अन्य क्षेत्रों पर गहरा असर पड़ेगा क्योंकि यह उद्योग विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।

उदाहरण के तौर पर, भारतीय किसान अब अन्य देशों के किसानों के उत्पादों से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं क्योंकि कृषि संबंधित उत्पादों का आयात अब संभव है। पहले भारतीय कृषि सहायता मूल्य और सब्सिडी द्वारा विश्व बाजार से सुरक्षित थी। यह समर्थन मूल्य किसानों की न्यूनतम आमदनी को सुनिश्चित करता है क्योंकि यह वह मूल्य थे जिस पर सरकार कृषक उत्पादों को खरीदने को तैयार रहती है। सब्सिडी से किसानों द्वारा इस्तेमाल में लाने वाली चीजें जैसे-खाद उर्वरक, डीजल-तेल का भी सरकार दाम घटा देती थी। उदारवाद बाजार में इस तरह की सरकारी मदद के खिलाफ है अतः सब्सिडी और समर्थन मूल्य को घटा दिया या हटा लिया गया। इसी प्रकार छोटे उत्पादकों को विश्व स्तर के उत्पादकों के सामानों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है और यह अपवाद नहीं है कि उनमें से कुछ का बिल्कुल सफाया हो जाए। निजीकरण में उन सरकारी विभागों के मुलाजिमों की नौकरी भी कम हो गई है या कह सकते हैं वो रोजगार के स्रोत अब स्थिर नहीं हैं। गैर सरकारी असंगठित रोजगार उभर कर सामने आ रहे हैं और सरकारी संगठित विभागों में नौकरियाँ कम होती जा रही हैं। ये कामगारों के लिए ठीक नहीं है क्योंकि अब उन्हें कम तनख्वाह और अस्थायी नौकरियाँ ही हाथ लगेंगी।

प्रश्न 17. 
उदारीकरण के भारतीय कृषि तथा अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव बताइये। 
उत्तर:
उदारीकरण का भारतीय कृषि पर प्रभाव।
1. कृषि उत्पादों में प्रतिस्पर्धा का बढ़ना-भारतीय किसान अब अन्य देशों के किसानों के कृषि उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं; क्योंकि अब कृषि सम्बन्धी उत्पादों का आयात करना संभव हो गया है। इस प्रतिस्पर्धा में भारतीय किसान टिक नहीं पा रहे हैं; क्योंकि कृषि जोत का आकार छोटा होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता के कारण भारतीय कृषि की लागत उच्च आती है।

2. कीटनाशक दवाइयों, रासायनिक खाद व अच्छे बीज की अनुपलब्धता-भारत में कीटनाशक दवाइयाँ, खाद, बीज की अनुपलब्धता भी किसानों की प्रमुख समस्या है। ऐसी स्थिति में वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी फसल बेचने की बात को सोच ही नहीं सकता।

3. अनुदानित. सहायता में कमी-विकसित देशों के किसानों को पर्याप्त मात्रा में अनुदानित सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इसलिए वहाँ किसानों को अच्छा लाभ भी मिलता है, जबकि भारतीय किसानों को ऐसी अनुदानित सहायता नहीं मिलती है। फलतः उन्हें कृषि से लाभ नहीं मिल पा रहा है।

4. संविदा खेती-हाल ही में सरकार ने संविदा खेती भी लागू की है। इसके तहत किसानों को बीज राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत संस्थान से ही खरीद कर बोने होंगे। यह संविदा खेती उदारीकरण की नीति के तहत विदेशी प्रभाव है। अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव उदारीकरण की नीति के अन्य क्षेत्रों पर निम्न प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं

  1. छोटे स्तर के उत्पादकों को विश्व स्तर के उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है और छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा न टिक पाने के कारण बंद होते जा रहे हैं।
  2. निजीकरण की बढ़ती प्रक्रिया के कारण संगठित सरकारी क्षेत्र की नौकरियों के अवसर कम होते जा रहे हैं। अब रोजगार की अस्थिरता बढ़ गई है; क्योंकि प्राइवेट संस्थानों में ही अब नौकरियाँ निकल रही हैं, जहाँ कम वेतन पर अस्थायी नौकरियाँ करनी पड़ रही हैं।
     
Prasanna
Last Updated on June 16, 2022, 5:09 p.m.
Published June 10, 2022