RBSE Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 5 गीतामृतम्

RBSE Solutions for Class 8 Sanskrit

Rajasthan Board RBSE Class 8 Sanskrit Chapter 5 गीतामृतम्

RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम् पाठ्यपुस्तकस्य प्रश्नोत्तराणि

RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम् मौखिकप्रश्नाः

प्रश्ना 1.
उच्चारणं कुरुत: (उच्चारण कीजिए-)
परित्राणाय, क्रोधात्, भ्रंशाद्, विभ्रमः, बुद्धिनाशो, यद्ययदाचरित, श्रेष्ठः, सृजाम्यहम्, सङ्गोऽस्त्वकर्मणि, विद्यते, श्रद्धावाँल्लभते, पैशुनम्, ह्रीः, धृतिः, वाङ्मयम्, संशुद्धिः।

नोट:
छात्र स्वयं ही उच्चारण करें।

प्रश्ना 2.
एकपदेन उत्तरं वदत:
(एक पद में उत्तर बताइये)

(क) क्रोधाद किं भवति ?
(क्रोध से क्या होता है ?)

(ख) ज्ञानं कः लभते ?
(ज्ञान कौन प्राप्त करता है ?)

(ग) अस्माकं अधिकारः कुत्र अस्ति ?
(हमारा अधिकार कहाँ है?)

(घ) केषां परित्राणाय ईश्वरः सम्भवति ?
(किनकी रक्षा के लिए ईश्वर अवतरित होता है?)
उत्तराणि:
(क) सम्मोहः (मूढ़भाव)
(ख) श्रद्धावान् (श्रद्धालु)
(ग) कर्मणि (कर्म करने में)
(घ) साधूनाम् (सज्जनों की)

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RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम्लि खितप्रश्नाः

प्रश्ना 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत
(नीचे लिखे हुए प्रश्नों के उत्तर एक पद में लिखिए-)

(क) परमात्मा आत्मानं कदा सृजति ?
(परमात्मा अपने को कब प्रकट करता है ?)

(ख) वाङ्मय तपः किम् अस्ति ?
(वाणी की तपस्या क्या है ?)

(ग) मौनं कीदृशं तपः उच्यते ?
(मौन कैसी तपस्या कही – जाती है ?)

(घ) कः लभते ज्ञानम् ?
(ज्ञान को कौन प्राप्त करता है ?)
उत्तराणि:
(क) धर्मस्य पतन काले।
(ख) स्वाध्यायाभ्यसनम्।
(ग) मानसम्।
(घ) श्रद्धावान्।

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प्रश्ना 2.
उचितपदप्रयोगेण रिक्तस्थानानि पूरयत
(उचित पद के प्रयोग द्वारा रिक्त स्थानों को पूरा कीजिए-)
(क) ते अधिकारः अस्ति …………. । (कर्मणि / अकर्मणि)
(ख) ईश्वरः साधूनां ………….. युगे युगे सम्भवति। (विनाशाय / परित्राणाय)
(ग) ………….. भवति सम्मोहः।(श्रद्धया / क्रोधात्)
(घ) यद्यदाचरित ………….. तत्तदेवेतरो जनः।(कनिष्ठ / श्रेष्ठः)
उत्तराणि:
(क) कर्मणि
(ख) परित्राणाय
(ग) क्रोधात्
(घ) श्रेष्ठ।

प्रश्ना 3.
रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत:
(रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए-)
उदाहरणम्:
कर्मणि एव ते अधिकारः।

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प्रश्ना
कस्मिन्नेव ते अधिकारः ?
(क) क्रोधाद् भवति सम्मोहः।।
(ख) यद्यदाचरति श्रेष्ठः जनः लोकः तदनुवर्तते।
(ग) धर्मस्य ग्लानिर्भवति।
(घ) न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रम्।
(ङ) मनः प्रसादः सौम्यत्वं तयोः मानसमुच्यते।
उत्तर:
(क) कस्मात भवति सम्मोहः ?
(ख) यद्यदाचरति कः जनः लोकः तदनुवर्तते ?
(ग) कस्य ग्लानिर्भवति ?
(घ) नहि केन सदृशं पवित्रम् ?
(ङ) मनः प्रसादः सौम्यत्वं का मानसमुच्यते ?

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प्रश्ना 4.
‘क’ खण्डं ‘ख’ खण्डेन सह उचितेन पदेन योजयत्
(क खण्ड को ‘ख’ खण्ड के साथ उचित पद से मिलाइये)
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प्रश्ना 5.
निम्नाङ्कितपदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत:
(नीचे लिखे हुए पदों में सन्धि-विच्छेद कीजिए-)
उत्तराणि:
(क) कर्मण्येव = कर्मणि + एव
(ख) क्रोधाद् भवति = क्रोधात् + भवति
(ग) ग्लानिर्भवति = ग्लानिः + भवति
(घ) अचिरेणाधिगच्छति = अचिरेण + अधिगच्छति
(ङ) शान्तिरपैशुनम् = शान्तिः + अपैशुनम्

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प्रश्ना 6.
अधोलिखितपदेषु शब्दं विभक्तिवचनं च लिखत –
(नीचे लिखे हुए पदों में शब्द, विभक्ति और वचन लिखिए)
उत्तराणि:
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RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम् अन्य महत्वपूर्णः प्रश्नाः –

RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम् वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तराणि

प्रश्ना 1.
मानवस्य कस्मिन् एव अधिकारः ?
(क) पठने
(ख) लिखने
(ग) गमने
(घ) कर्मणि
उत्तराणि:
(घ) कर्मणि

प्रश्ना 2.
क्रोधाद भवति –
(क) सम्मोहः
(ख) लोभः
(ग) धनप्राप्तिः
(घ) यशप्राप्तिः
उत्तराणि:
(क) सम्मोहः

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प्रश्ना 3.
युगे-युगे कः सम्भवति ?
(क) कंसः
(ख) कृष्णः
(ग) हंसः
(घ) रावणः
उत्तराणि:
(ख) कृष्णः

प्रश्ना 4.
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदः अस्ति।
(क) कर्मण्ये + वाधिकारः + ते
(ख) कर्मणि + एवाधिकारः + ते
(ग) कर्मणि + एव + अधिकारः + ते
(घ) कर्मण्येवधिकारः + ते।
उत्तराणि:
(ग) कर्मणि + एव + अधिकारः + ते

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प्रश्ना 5.
ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण किम् अधिगच्छति ?
(क) परां शान्तेः
(ख) धनस्य
(ग) भवनस्य
(घ) यशसः
उत्तराणि:
(क) परां शान्तेः

RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम्अ तिलघूत्तरीयाः प्रश्नाः

प्रश्ना 1.
स्मृतिभ्रंशाद् कस्य: नाशं भवति ?
उत्तरम्:
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धेः नाशं भवति।

प्रश्ना 2.
यदा धर्मस्य ग्लानिः भवति तदा कः आत्मानं सृजति?
उत्तरम्:
यदा धर्मस्य ग्लानिः भवति तदा श्रीकृष्णः आत्मानं सृजति।

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प्रश्ना 3.
धर्मसंस्थापनार्थाय कः युगे युगे सम्भवति ?
उत्तरम्:
धर्मसंस्थापनार्थाय श्रीकृष्णः युगे-युगे सम्भवति।

प्रश्ना 4.
श्रद्धावान् कः भवति ?
उत्तरम्:
श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः भवति।

RBSE Class 8 Sanskrit गीतामृतम्ल घूत्तरीयाः प्रश्नाः

प्रश्ना 1.
‘कर्मणि एव ते अधिकारः’ इति कः कं प्रति कथयति ?
उत्तरम्:
कर्मणि एव ते अधिकारः इति श्रीकृष्णः अर्जुनं प्रति कथयति।

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प्रश्ना 2.
बुद्धिनाशः कस्मात् भवति?
उत्तरम्:
बुद्धिनाशः स्मृतिभ्रंशात् भवति।

प्रश्ना 3.
अस्मिन् पाठे कः कस्मै उपदेशं ददाति ?
उत्तरम्:
अस्मिन् पाठे श्रीकृष्णः अर्जुनाय उपदेशं ददाति।

प्रश्ना 4.
अस्मिन् पाठे प्रयुक्तानि विसर्गसन्धेः त्रीणि उदाहरणानि लिखत।
उत्तराणि:
सङ्गोऽस्त्व कर्मणि सङ्गः + अस्तु + अकर्मणि।
लोकस्तदनुवर्तते = लोकः + तत् + अनुवर्तते।
कर्मफलेहेतुर्भूर्मा = कर्मफलहेतुः + भूः + मा।

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योग्यता-विस्तारः

हिन्दी अनुवाद
(क) पाठ परिचय:
भारतीय संस्कृति के प्रसिद्ध दो उपजीव्य काव्य ग्रन्थ हैं –
(1) रामायण और
(2) महाभारत।

श्रीमद्भागवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है। इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण के कर्तव्य से विमुख अर्जुन को दिये गये दिव्य सन्देश हैं। यह ग्रन्थ न केवल अर्जुन के लिए अपितु मानवमात्र के लिए कल्याणकारी है। गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं।

(ख) भाषा विस्तारः विसर्ग-सन्धिः
1. (विसर्ग के बाद ‘च’ अथवा ‘छ’ होता है तब विसर्ग के स्थान पर ‘श’ आदेश हो जाता है। जैसे –
रामः + चलति = रामश्चलति) विसर्ग का श् आदेश)
निः + छल = निश्छलः (विसर्ग का श् आदेश)।

2. (विसर्ग के बाद ‘त्’ अथवा ‘थ्’ वर्ण होता है तब विसर्ग के स्थान पर ‘स’ वर्ण हो जाता है। जैसे –
यशः + तनोति = यशस्तनोति (विसर्ग का ‘स्’ आदेश)
नमः + ते = नमस्ते (विसर्ग का ‘स्’ आदेश)।

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3. (जब अकार के परे विसर्ग होता है, विसर्ग के परे पुनः अकार होता है तब पहले वाले अकार और विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है तथा बाद में स्थित ‘अकार’ के स्थान पर ‘5’ (अवग्रह) हो जाता है। जैसे –
सः + अपि = सोऽपि (विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ तथा ‘अ’ के स्थान पर 5)
कः + अयम् = कोऽयम् (विसर्ग के स्थान पर ओ तथा ‘अ’ के स्थान पर 5)।

4. (जब विसर्ग के पहले ‘अ’ तथा विसर्ग के बाद अन्य स्वर होता है तब विसर्ग का लोप हो जाता है। जैसे –
रामः + आगतः = राम आगतः (विसर्ग का लोप)
सूर्यः + उदेति = सूर्य उदेति (विसर्ग का लोप)

5. (जब विसर्ग से पहले ‘अ’ तथा बाद में वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण होता है तब ‘अ’ तथा विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है। जैसे –
पयः + धरः = पयोधरः (‘अ’ तथा विसर्ग का ‘ओ’ आदेश)
पुरः + हितः = पुरोहितः (‘अ’ तथा विसर्ग का ‘ओ’ आदेश)।

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महत्वपूर्णानांशब्दार्थानाम् सूची
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पाठ परिचयः
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय धार्मिक तथा दार्शनिक साहित्य की अनुपम कृति है। यह महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है। वास्तविक रूप से अपनी विषयवस्तु की दृष्टि से यह ऐसी पूर्ण कृति है कि महाभारत का अंश होते हुए भी इसे पूर्ण ग्रन्थ की संज्ञा दी गई है। इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण के कर्तव्य से विमुख अर्जुन को दिये गये दिव्य सन्देश हैं।

मूल अंश, अन्वय, भावार्थ, शब्दार्थ, हिन्दी अनुवाद

(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मण

अन्वयः
ते कर्मणि एव अधिकारः (अस्ति), फलेषु कदाचन मा (अस्ति अतः त्वं) कर्मफलहेतुः मा भूः, ते अकर्मणि सङ्गः (अपि) मा अस्तु। संस्कृत भावार्थ:-भगवान् श्रीकृष्ण: अर्जुनं प्रति कथयति यत् हे अर्जुन! ते अधिकारः एकमात्रकर्मणि एव अस्ति। तेषाम् परिणामेषु न। त्वम् कर्मस्य फलानां कारणः मा भव।

शब्दार्थ:
ते = तेरा। कर्मणि एव अधिकारः = कर्म करने में ही अधिकार है। फलेष = कर्मजन्य फलों में। कदाचन = कभी। मा = नहीं है। कर्मफलहेतुः = कर्मों के फल का हेतु। मा भूः = मत हो। अकर्मणि = कर्म न करने में। सङ्गः = अनुराग या आसक्ति। मा अस्तु = नहीं होवे।

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अनुवादः
तेरा कर्म करने में अधिकार है, कर्मजन्य फलों में कभी नहीं। (अतः तू) कर्मों के फल का हेतु मत हो और तेरी कार्य न करने में (भी) अनुराग या आसक्ति न होवे। हिन्दी भावार्थ-श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म तो तुझे करना ही पड़ेगा क्योंकि जब तक यह त्रिगुणात्मक शरीर है, तब तक कार्य करने से विमुख नहीं हुआ जा सकता, किन्तु उस कर्म से उत्पन्न फलों के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए। तेरा अधिकार केवल कार्य करने में है, तज्जन्य फलों में नहीं। इसलिए तू फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करता जा, कर्म न करने में आसक्त मत हो।

(2) क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

अन्वयः
क्रोधात् सम्मोहः भवति, सम्मोहात् स्मृति विभ्रमः (भवति) स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति) बुद्धिनाशात् (स) प्रणश्यति। संस्कृत भावार्थ:-कृष्णः कथयति-हे भारत! क्रोधात् मूढता आयाति। मूढतायाः स्मरणशक्तेः नाशः भवति। स्मरणशक्तेः नाशात् बुद्धेः विनाशः भवति। बुद्धिनाशात् प्राणानाम् विनाशः भवति।

शब्दार्थ:
क्रोधात् = क्रोध से। सम्मोहः भवति = सम्मोह या अत्यन्त मूढभाव उत्पन्न होता है। सम्मोहात् = सम्मोह से मूढभाव से। स्मृतिविभ्रमः = स्मरण शक्ति में भ्रम उत्पन्न होता है। स्मृति भ्रंशात् = स्मरण शक्ति के नष्ट हो जाने से। बुद्धिनाशः = बुद्धि अर्थात् ज्ञान-शक्ति का नाश हो जाता है। प्रणश्यति = गिर जाता है।

अनुवादः
क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से.स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मरण शक्ति में भ्रम हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नाश से वह स्वयं गिर जाता है। हिन्दी भावार्थ-क्रोध तो पाप का मूल है। यह मनुष्य को पागल बना देता है। इससे मनुष्य की बुद्धि में मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है। मूढ़भाव से मनुष्य की स्मरण शक्ति जाती रहती है और स्मरण शक्ति के विनाश से मनुष्य की बुद्धि का क्षय हो जाता है। बुद्धि के क्षय से योग का नाश हो जाता है, क्योंकि अचल बुद्धि से ही तो योग की प्राप्ति होती है। योगभ्रष्ट होने से मनुष्य पतित हो जाता है। इस प्रकार उसका नैतिक और सामाजिक दोनों रूपों से पतन हो जाता है।

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(3) यद्यदाचरित श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अन्वयः
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतर जनः तत् तत् एवं (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते। संस्कृत भावार्थ:-कृष्णः कथयति यत् श्रेष्ठाः पुरुषाः यत् यत् आचरणं कुर्वन्ति, अन्याः जनाः अपि तत्-तत् आचरणं अनुवर्तन्ते। श्रेष्ठाः पुरुषाः यां व्यवस्थां कुर्वन्ति, समस्तलोकः तदेव पालयति।

शब्दार्थः
श्रेष्ठः = श्रेष्ठ पुरुष। यत् यत् आचरति = जो जो आचरण करता है। इतरः जनः = अन्य लोग। तत् तत् एव = वही-वही (आचरण करता है)। सः यत् = वह जो कुछ। प्रमाणं कुरुते = प्रमाण कर देता है। लोकः = संसार के लोग। तत् = उसी का। अनुवर्तते = अनुकरण करते हैं।

अनुवादः
श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो प्रमाण कर देता है, संसार के लोग उसी के अनुसार आचरण करने लगते हैं। हिन्दी भावार्थ यहाँ श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ज्ञानवान् योगी एक श्रेष्ठ पुरुष होता है। वह जैसा आचरण करता है, कल्याणकामी संसार के अन्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। उसका वह सत्कर्म लोक के लिए प्रमाण बन जाता है। अतः लोक के मनुष्य उसके अनुसार आचरण करते हुए कल्याण प्राप्ति का प्रयत्न करते हैं। इसलिए अर्जुन सदृश श्रेष्ठ पुरुष को नियत कर्म अवश्य करना चाहिए।

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(4) यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अन्वयः
भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (भवति), अधर्मस्य अभ्युत्थानम् भवति तदा हि अहम् आत्मानं सृजामि। संस्कृत भावार्थ:-केशवः कथयति हे अर्जुन ! यदा-यदा धर्मस्य लोपः अधर्मस्य च वृद्धिं भवति, तदा-तदा धर्मस्यस्थापनां कर्तुम् अधर्मं विनाशयितुं च अहम् जन्म ग्रहणामि।।

शब्दार्थ:
भारत ! = भरतवंशी। यदा-यदा = जब-जब। हि = निश्चित रूप से। धर्मस्य = धर्म की। ग्लानिः = हानि, पतन। भवति = होती है। अधर्मस्य = अधर्म की। अभ्युत्थानम् = वृद्धि। तदा = तब-तब। अहम् = मैं। आत्मानं = अपने को। सृजामि = प्रकट करता हूँ।

अनुवादः
हे भारतवंशी ! जब-जब धर्म का पतन होता है और अधर्म की वृद्धि होने लगती है, तब तब ही मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ। हिन्दी भावार्थ यहाँ सृजामि का अर्थ है कि भगवान् स्वयं यथार्थ रूप में प्रकट होते हैं। अतः जब भी अधर्म की वृद्धि और धर्म का लोप होने लगता है, तब वे स्वेच्छा से प्रकट होते हैं। केवल भगवान् ही किसी धर्म की व्यवस्था कर सकते हैं। अतः धर्म के नियम भगवान् के प्रत्यक्ष आदेश हैं।

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(5) परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे युगे॥

अन्वयः
साधूनां परित्राणाय दुष्कृताम् विनाशाय च धर्म संस्थापनार्थाय युगे युगे सम्भवामि। संस्कृत भावार्थ:-श्रीकृष्णः कथयति यत् हे धनञ्जय! सज्जनानां रक्षयितुम् दुष्टानाम् च विनाशयितुं, धर्मस्य स्थापनां कर्तुम् अहम् प्रत्येक युगे मनुष्यशरीरे प्रवेशयामि।

शब्दार्थः
साधूनां = साधु पुरुषों का। परित्राणाय = उद्धार करने के लिये। दुष्कृताम् = दुष्टों का, पाप कर्म करने वालों का। विनाशाय = विनाश करने के लिए। धर्म = धर्म की। संस्थापनार्थाय = अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए। युगे-युगे = हर युग में। सम्भवामि = प्रकट हुआ करता हूँ।

अनुवादः
साधु पुरुषों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट हुआ करता हूँ। हिन्दी भावार्थ भगवान् श्रीकृष्ण अपने उन निष्काम भक्तों को तुष्ट करने के लिए विशेष रूप से अवतार लेते हैं जो असुरों द्वारा निरन्तर तंग किये जाते हैं। असुर भक्त को तंग करता है, भले ही वह उसका सगा-सम्बन्धी क्यों न हो। अतः भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि भक्त का उद्धार करने के लिए तथा दुष्ट असुरों का संहार करने के लिए हर युग में अवतार लेता हूँ।

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(6) श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानं लब्ध्वा परांशान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

अन्वयः
संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् ज्ञानम् लभते। ज्ञानम्, लब्ध्वा अचिरेण पराम् शान्तिम् अधिगच्छति। संस्कृत भावार्थः-श्रीकृष्णः वदति यत् जितेन्द्रियः पुरुषः तल्लीनो भूत्वा श्रद्धया ज्ञानं आप्नोति। ज्ञानं प्राप्य सः अविलम्बन परमशान्तिं अधिगच्छति।

शब्दार्थः
श्रद्धावान् = श्रद्धालु व्यक्ति। लभते = प्राप्त होता है। तत्परः = साधनापरायण। संयतेन्द्रियः = संयमित इन्द्रियों वाला। ज्ञानं लब्ध्वा =ज्ञान प्राप्त करके। परांशान्तिम् = परम शान्ति को। अचिरेण = तत्काल ही। अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।

अनुवादः
जो श्रद्धालु दिव्य ज्ञान में समर्पित है और जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह इस ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर तत्काल ही (भगवत्प्राप्ति रूप) परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है। हिन्दी भावार्थ-श्रीकृष्ण में दृढ़ विश्वास रखने वाला व्यक्ति ही इस तरह का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वही पुरुष श्रद्धावान कहलाता है। जो यह सोचता है। कृष्ण भावना भावित होकर कर्म करने से वह परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। जो व्यक्ति कृष्ण के प्रति श्रद्धावान् है और जो इन्द्रियों को संयमित रखता है, वह शीघ्र ही कृष्णभावनामृत के ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करता है।

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(7) अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुपत्वं मार्दवः हीरचापलम्॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं देवीमभिजातस्य भारत॥ अन्वयः-अहिंसा सत्यम् अक्रोधः त्यागः शान्तिः अपैशुनम् भूतेष दया अलोलुपत्वम् मार्दवम् ह्री: अचापलम् तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहः न अतिमानिता भारत देवीम् सम्पदं अभिजातस्य भवन्ति!।

संस्कृत भावार्थः-कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् जीवानां रक्षणं, तेषां सुरक्षा च अहिंसा कथ्यते। अतः अहिंसा, सत्यस्य अनुपालनं, क्रोधस्य परित्यागः, शान्तिः अपैशुनं, प्राणिनाम् उपरि दयायाः भावना, कोमलता, लज्जा, चंचलता याः अभावः सर्वे दिव्याः गुणाः सन्ति। भगवान् कृष्णः वर्णयति यत् तेजः, क्षमा, धैर्यः, इन्द्रियाणां पवित्रताः द्रोहस्य अभावः, अभिमानस्य अभावः इत्यादयः अलौकिकाः गुणाः श्रेष्ठकुले जातस्य पुरुषस्य संस्कारे समाविष्टाः भवन्ति।

शब्दार्थः
सत्यम् = यथार्थ और प्रिय भाषण, सत्यता। अक्रोध = अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध न करना। त्यागः = अभिमान का त्याग। शान्तिः = चित्त की चञ्चलता का अभाव। अपैशुनम् = किसी की भी निन्दा या बुराई न करना। भूतेषु दया = सब प्राणियों में हेतुरहित दया। अलोलुप्त्वम् = इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना। मार्दवम् = कोमलता। ह्रीः = लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा। अचापलम् = व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। तेजः = तेज। क्षमा = क्षमा। धृतिः = धैर्य। शौचम् = पवित्रता, शुद्धि। अद्रोहः = किसी में भी शत्रु भाव का न होना। (और) नातिमानिता = अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव (ये सब तो)। भारत = हे अर्जुन। दैवीम् सम्पदम् = दैवी सम्पदा को। अभिजातस्य = लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के (लक्षण) भवन्ति = हैं।

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हिन्दी अनुवादः
भगवान ने कहा हे भरतपुत्र ! अहिंसा, सत्य, क्रोध विहीनता, त्याग, शान्ति, किसी की भी निन्दा न करना, समस्त जीवों पर हेतु रहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लज्जा, व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य; पवित्रता, ईर्ष्या तथा सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति ये सभी दिव्यगुण हैं जो दैवी सम्पदा से सम्पन्न पुरुषों में पाये जाते हैं। भावार्थ-अहिंसा का अर्थ है किसी जीव को मन, वाणी और शरीर से कष्ट न देना। सत्य का अर्थ है यथार्थ और प्रिय भाषण।

अक्रोध का अर्थ है-क्रोध को रोकना। मनुष्य को सदा सहिष्णु बने रहना चाहिए। अपैशुनम् का अर्थ है कि दूसरे की निन्दा न करे। हीन का अर्थ है कि मनुष्य अत्यन्त लज्जाशील हो। अचापलम् का अर्थ है व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। तेजस् शब्द क्षत्रियों के निमित्त है। शौचम् का अर्थ है पवित्रता, जो न केवल मन तथा शरीर की हो अपितु व्यवहार में भी हो। अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव अर्थात अपनी मर्यादा में बने रहना चाहिए। ये सभी वर्णित गुण दिव्य हैं। वर्णाश्रम धर्म के अनुसार इनका आचरण होना चाहिए। दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

(8) अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

अन्वयः
यत् अनुद्वेगकरं प्रियहितं सत्यं वाक्यं च स्वाध्याभ्यसनं (तत) एव वाड्मयं तपः उच्यते संस्कृत भावार्थ:-क्रोधस्य आवेग: अनर्थकारी भवति। अतः हे अर्जुन! इत्यस्य आवेगस्य परित्यागं कुर्यात्। प्रियं हितकारी च वाक्यं वदेत्। अनेन सह स्वाध्यायस्य अभ्यासं कुर्यात्। इदम् वाण्याः तपः कथ्यते।

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शब्दार्थः
अनुद्वेगकरं = क्षुब्ध न करने वाले। वाक्यं = वाक्य, भाषण। सत्यम् = सच्चे। प्रियः = प्रिय। हितम् = हितकारक। यत् = जो। स्वाध्याय = वेद-शास्त्रों के अध्ययन का। अभ्यासनम् = अभ्यास। वाङ्मयम् = वाणी की। तपः = तपस्या। उच्यते = कही जाती है।

अनुवादः
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (तथा) जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम जप का अभ्यास है, वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है। हिन्दी भावार्थ-मनुष्य को ऐसा नहीं बोलना चाहिए जिससे दूसरों के मन क्षुब्ध हो जाएँ। दूसरे को क्षुब्ध करने वाला सत्य न बोले। वही वाणी की तपस्या है।

इसके अतिरिक्त व्यर्थ की वार्ता नहीं करनी चाहिए। आध्यात्मिक क्षेत्रों में बोलने की विधि यह है कि जो भी कहा जाय, वह शास्त्र-सम्मत हो। इसके साथ-साथ बात सुनने में प्रिय लगनी चाहिए। ऐसी विवेचना से मनुष्य को सर्वोच्च लाभ और मानव समाज का उत्थान हो सकता है। वैदिक साहित्य का विपुल भण्डार है और इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यही वाणी की तपस्या कही जाती है।

RBSE Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 5 गीतामृतम्

(9) मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥

अन्वयः
मनः प्रसादः सौम्यत्वम् मौनम् आत्मविनिग्रहः भावसंशुद्धिः इति एतत् मानसम् तपः उच्यते। संस्कृत भावार्थ:-अर्जुनं प्रति श्रीकृष्णः सन्देशं इदं ददाति यत् अन्तःकरणस्य प्रसन्नता, शालीनता, सहजता मौनव्रतम्, आत्मनियंत्रणः, भावानां पवित्रता शुद्धता च मानसतपःकथ्यते।

शब्दार्थः
मनः प्रसादः = मन की प्रसन्नता। सौम्यत्वम् = शान्तभाव। मौनम् = गम्भीरता, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव। आत्म = अपना। विनिग्रहः = नियन्त्रण, संयम। भाव = स्वभाव का। संशुद्धिः = भली-भाँति शुद्धीकरण। इति = इस प्रकार। एतत् = यह। तपः = तपस्या। मानसम् = मन की मन सम्बन्धी। उच्यते = कही जाती है।

अनुवादः
मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का नियंत्रण (और) अन्त:करण के भावों का भलीभाँति शुद्धीकरण इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है। हिन्दी भावार्थ मन को संयमित बनाने का अर्थ है, उसे इन्द्रियवृत्ति से विलग करना। उसे इस तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे वह सदैव परोपकार के विषय में सोचे। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचारों की श्रेष्ठता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और इन्द्रिय भोग से सदैव बचना चाहिए। अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना कृष्ण भाव में सम्मिलित होना है।

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