RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 7 भक्ति पदावली

Rajasthan Board RBSE Class 8 Hindi Chapter 7 भक्ति पदावली

RBSE Solutions for Class 8 Hindi

RBSE Class 8 Hindi भक्ति पदावली पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पपाठ से

सोचें और बताएँ

प्रश्न 1.
मीराँ अपनी आँखों में किसे बसाना चाहती थी?
उत्तर:
मीराँ अपनी आँखों में श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप को बसाना चाहती थीं।

प्रश्न 2.
द्रौपदी की लाज किसने बचाई ?
उत्तर:
द्रौपदी की लाज श्रीकृष्ण ने बचाई।

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प्रश्न 3.
मीराँ को सतगुरु से कौनसी वस्तु मिली?
उत्तर:
मीरों को सतगुरु से राम नामरूपी अनमोल वस्तु मिली।

लिखें

RBSE Class 8 Hindi भक्ति पदावली अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मीराँ ने पीर को हरने वाला किसे बताया है?
उत्तर:
मीरों ने पीर को हरने वाला प्रभु श्रीकृष्ण को बताया

प्रश्न 2.
प्रहलाद को बचाने के लिए हरि ने कौन-सा रूप धारण किया ?
उत्तर:
प्रहलाद को बचाने के लिए हरि ने नरसिंह का रूप धारण किया।

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RBSE Class 8 Hindi भक्ति पदावली लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण के किस रूप को मीराँ अपनी आँखों में बसाना चाहती है?
उत्तर:
मीराँबाई श्रीकृष्ण के उस रूप को अपनी आँखों में बसाना चाहती हैं जिसमें उन्होंने मोर का मुकुट पहन रखा है, कानों में मकर की आकृति वाला कुंडल, मस्तक पर लाल रंग का तिलक, होंठों पर मुरली, गले में बैजंती की माला, कमर में घंटियों वाली करधनी तथा पैरों में नूपुर धारण किया हो।

प्रश्न 2.
मीराँ ने राम नाम रूपी धन को अमूल्य क्यों बताया?
उत्तर:
मीरों ने राम नाम रूपी धन को अमूल्य इसलिए बताया है क्योंकि वह कभी खर्च करने पर खर्च नहीं होगा, कोई चोर उसे चुरा नहीं सकेगा और वह प्रतिदिन सवा गुना बढ़ता जाएगा। साथ ही साथ यह धन संसार-सागर से भी पार लगा देगा।

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प्रश्न 3.
मीराँ ने संसार को पार करने का क्या उपाय बताया ?
उत्तर:
मीरों ने संसार को पार करने के लिए सतगुरु की शरण में जाने को कहा है क्योंकि सत्य की नाव चलाने वाले सतगुरु ने ही मीराँबाई को संसार रूपी भवसागर से पार लगाया है।

RBSE Class 8 Hindi भक्ति दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मीराँ ने ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ पद में कृष्ण की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर:
मीरों ने ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ पद में कृष्ण को द्रौपदी की चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाने वाला बताया है। भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकशिपु को मारने वाला कहा है। गज-ग्राह युद्ध होने पर मगर को मारकर डूबते हुए हाथियों के राजा को बचाने वाला बताया है। इस प्रकार मीराँ ने श्री कृष्ण को भक्तों और शरणागतों की रक्षा करने वाला बताया है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भव सागर तर आयो।
(ख) अधर-सुधा-रस मुरली राजति, उर बैजंती माल।
उत्तर:
(क) भावार्थ:
मीराँबाई के अनुसार उन्हें सत्यरूपी नाव के खेवनहार सतगुरु मिल गये हैं जो उन्हें संसाररूपी भवसागर से पार कर देंगे।

(ख) भावार्थ:
मीराबाई श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वह अपने उस मनमोहक रूप से उनके नेत्रों में आ बसें जिसमें अमृत के समान आनंद देने वाली मुरली (बाँसुरी) उनके होंठों पर सुशोभित होती है और गले में सुंदर बैजंती की माला शोभायमान रहती है।

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प्रश्न 3.
मीराँ ने संसार को पार करने का क्या उपाय बताया है?
उत्तर:
मीराँबाई ने संसार को पार करने का उपाय श्रीकृष्ण की भक्ति को बताया है। गुरुकृपा से मीराँबाई को राम रतन रूपी धन प्राप्त हो गया है। मीरों के अनुसार यह धन प्रतिदिन सवाया बढ़ता है। यह खर्च करने पर भी समाप्त नहीं होता है। चोर इसे चुरा नहीं सकते। सतगुरु ही सत्य की नाव को पार लगाने वाले हैं, जिससे इस संसार सागर से पार जाया जा सकता है। मीराँबाई के अनुसार सतगुरु के बताए मार्ग पर चलकर श्रीकृष्ण की भक्ति करके संसाररूपी समुद्रं को पार किया जा सकता है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
‘मोहनि मूरति’, ‘साँवरि-सूरति’ में प्रथम वर्ण की आवृत्ति हुई है, ‘म-म’ तथा ‘स-स।’ इस प्रकार काव्य में वर्णों की आवृत्ति जहाँ होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। अलंकार का शाब्दिक अर्थ है सुंदरता को बढ़ाने वाला कारक। काव्य (कविता) में जो कारक उसके सौंदर्य में वृद्धि करते हैं, अलंकार कहलाते हैं। पाठ में आए अन्य अलंकारों के बारे में अध्यापक जी की सहायता से जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
पाठ में आए अन्य अलंकार निम्नलिखित हैं –

  1. मोर-मुकुट मकराकृत कुंडल। – अनुप्रास अलंकार
  2. चरण-कँवल पै सीर। – रूपक अलंकार
  3. राम रतन धन पायो। – अनुप्रास अलंकार तथा रूपक अलंकार
  4. किरपा कर अपनायो। – अनुप्रसास अलंकार
  5. जन्म-जन्म। दिन-दिन। हरख-हरख – अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
  6. भवसागर तर आयो। – रूपक अलंकार

प्रश्न 2.
पाठ में से निम्नलिखित तत्सम शब्दों के तद्भव रूप को छाँटकर लिखिए –
मूर्ति, विशाल, क्षुद्र, शब्द, वत्सल, कृपा, रत्न, हर्ष।
उत्तर:
पाठ में आए तत्सम शब्दों के तद्भव रूप निम्नलिखित हैं –
तत्सम – तद्भव
मूर्ति – मूरति
बिसाल – विशाल
शब्द – सबद
वत्सल – बछल
कृपा – किरपा
रत्न – रतन
हर्ष – हरख

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित संज्ञा शब्दों के उचित भेद अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखिए –
(क) बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
(ख) हरि! तुम हरो जन की पीर।
(ग) हरक-हरक जस गायो।
(घ) द्रौपदी की लाज राखी।
उत्तर:
उपर्युक्त रेखांकित संज्ञा शब्दों के उचित भेद निम्नलिखित हैं –
(क) नंदलाल – व्यक्तिवाचक संज्ञा
(ख) जन – समूहवाचक संज्ञा
(ग) हरख – हरख – भाववाचक संज्ञा, (प्रयोग के अनुसार यह क्रिया है।)
(घ) द्रौपदी – व्यक्तिवाचक संज्ञा।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
मीराँ के इन पदों को बालसभा में गाकर सुनाइए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

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प्रश्न 2.
मीरों के जीवन में आए कष्टों को जानिए और समस्याओं से लड़ने और समाधान खोजने पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मीराँबाई का विवाह छोटी आयु में मेवाड़ के महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज के साथ हुआ था, जिनका शीघ्र ही देहांत हो गया और मीरौं विधवा हो गईं। विधवा का जीवन जीते हुए वह श्रीकृष्ण की भक्ति और प्रेम में लीन हो गईं। वे संतों के साथ बैठकर भजन गाती थीं, जो राज- परिवार को उचित नहीं लगता था।

इसलिए मेवाड़ के राणा विक्रमादित्य ने मीराँबाई को मारने का भी प्रयास किया। इन परेशानियों के कारण ही मीरों ने घर-द्वार त्याग दिया और वृंदावन में जाकर रहने लगी। तत्कालीन परिस्थितियों में समस्याओं से लड़ने का जो समाधान मीराँबाई के द्वारा खोजा गया वह उचित ही प्रतीत होता है क्योंकि तब महिला होने के नाते उन्हें अधिक स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त थी।

यह भी करें

प्रश्न 1.
हमारे समाज में मीरा-सी भक्तिन व विदुषी और भी कई महिलाएँ हुई हैं, उनकी जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:

  1. महादेवी वर्मा
  2. सहजोबाई।

प्रश्न 2.
अंतर्कथाएँ जानिए –
(क) द्रौपदी का चीर बढ़ाना
(ख) भक्त प्रहलाद की रक्षा
(ग) गजराज की ग्राह से रक्षा।
उत्तर:
(क) द्रौपदी का चीर बढ़ाना:
जब पांडव जुए में द्रौपदी को हार जाते हैं तब दुर्योधन ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुःशासन को भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का आदेश देता है। दुःशासन द्रौपदी के खुले हुए बालों को पकड़कर घसीटते हुए राजसभा में ले आता है और उसे नंगी करने के लिए उसकी साड़ी खींचने लगता है।

भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य आदि योद्धा चुपचाप बैठे यह सब कुछ देखते रहते हैं। उनसे द्रौपदी सहायता माँगती है किंतु कोई सहायता के लिए आगे नहीं आता। अन्त में असहाय होकर द्रौपदी श्री कृष्ण को पुकारती है। श्रीकृष्ण उसकी साड़ी को इतना बढ़ा देते हैं कि दुःशासन साड़ी खींचते-खींचते थककर गिर पड़ता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण द्रौपदी की लाज की रक्षा करते हैं।

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(ख) भक्त प्रह्लाद की रक्षा:
प्रह्लाद का पिता हिरण्यकशिपु था। उसने तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था कि वह न दिन में न रात में, न आकाश में, न पाताल में, न पृथ्वी पर, न घर में न बाहर, न अस्त्र से न शस्त्र से मरे। न मनुष्य, न देवता, कोई भी उसे मार न सके। यह वरदान पाकर हिरण्यकशिपु बहुत ही अहंकारी हो गया और अपनी ही पूजा करने के लिए सबको बाध्य करने लगा। उसका पुत्र प्रह्लाद श्री नारायण का नाम लेता था।

जब हिरण्यकशिपु को यह बात पता चली तो उसने प्रहलाद को क्रोध में मारने के कई प्रयास किए किंतु हरि की कृपा से वह बचता गया। अंत में उसने एक खंभे से प्रह्लाद को बाँ कर तलवार से मारने का प्रयास किया। तब उसी खंभे से नारायण नरसिंह का रूप धारण कर प्रकट हुए। उनका ऊपर का आधा शरीर सिंह का तथा नीचे का मनुष्य जैसा था। उन्होंने संध्या के समय हिरण्यकशिपु को अपनी जाँघों पर रखकर अपने नाखूनों से उसके पेट को चीर डाला। इस प्रकार नारायण ने प्रह्लाद की रक्षा की।

(ग) गजराज की ग्राह से रक्षा:
एक बार हाथियों का राजा अपनी पत्नी हथिनियों के साथ जल विहार कर रहा था। अचानक उसके पैर को पूर्व जन्म के शत्रु एक मगर ने पकड़ लिया और उसे गहरे जल में खींच कर ले जाने लगा। गजराज ने बहुत प्रयास किया लेकिन वह उससे छूट नहीं पा रहा था। अंत में उसने नारायण को पुकारा। भगवान नारायण तुरंत गरुड़ पर सवार होकर आए और मगर को मारकर गजराज की रक्षा की।

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तब और अब

नीचे लिखे शब्दों के मानक रूप लिखिए –
भक्ति, व्यक्ति,शक्ति, सिद्धि,
उत्तर:
उपर्युक्त शब्दों के मानक रूप निम्नलिखित हैंभक्ति, व्यक्ति, शक्ति, सिद्धि।

RBSE Class 8 Hindi भक्ति अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 8 Hindi भक्ति बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण अपने सिर पर धारण करते थे –
(क) मोर-मुकुट
(ख) स्वर्ण मुकुट
(ग) चंद्र-मुकुट
(घ) चाँदी का मुकुट
उत्तर:
(क) मोर-मुकुट

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण के कुण्डलों की आकृति थी –
(क) चक्र के समान
(ख) मछली के समान
(ग) कंगन के समान
(घ) त्रिकोण के समान।
उत्तर:
(ख) मछली के समान

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण की माला का नाम है –
(क) बैजंती
(ख) वनमाला
(ग) यशवंती
(घ) पद्म माला।
उत्तर:
(क) बैजंती

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प्रश्न 4.
हिरण्यकशिपु को मारने के लिए भगवान ने धारण किया था –
(क) हाथी का रूप
(ख) नरसिंह रूप
(ग) सिंह का रूप
(घ) विराट रूप।
उत्तर:
(ख) नरसिंह रूप

प्रश्न 5.
मीराँ ने भवसागर पार किया है –
(क) श्रीकृष्ण की कृपा से
(ख) सद्गुरु की कृपा से
(ग) अपनी भक्ति के बल से
(घ) संतों के आशीर्वाद से।
उत्तर:
(ख) सद्गुरु की कृपा से

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

  1. भक्त कारण रूप………………….धर्यो आप सरीर। (नरहरि / श्रीहरि)
  2. सत की नाव………..सतगुरु, भवसागर तर आयो। (खटियवा / खेवटिया)
  3. मोहनि मूरति, साँवरि…………नैना बने बिसाल। (सूरति / सुरती)
  4. बूढ़तो………..राख्यौ, करियो बाहर नीर। (गजराज / यमराज)

उत्तर:

  1. नरहरि
  2. खेवटिया
  3. सूरति
  4. गजराज।

सुमेलित कीजिए –
खण्ड ‘अ’ एवं खण्ड ‘ब’ में दी गई पंक्तियों का मिलान कीजिए –
खण्ड ‘अ’ खण्ड ‘ब’
(क) पायो जी मैंने – चरण कँवल पै सीर।
(ख) हरि, तुम हरो – राम रतन धन पायो।
(ग) बसो मेरे नैनन – जन की पीर
(घ) दासी मीरा लाल गिरधर – में नैंदलाल
उत्तर:
(क) राम रतन धन पायो।
(ख) जन की पीर।
(ग) में गैंदलाल
(घ) चरण कँवल पै सीर।

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RBSE Class 8 Hindi भक्ति अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हिरण्यकशिपु के पुत्र का नाम क्या था?
उत्तर:
हिरण्यकशिपु के पुत्र का नाम प्रह्लाद था।

प्रश्न 2.
‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-मीराँबाई अपने प्रभु गिरधर नागर (श्रीकृष्ण) का जस हरख-हरखकर (हर्षित होकर) गाती हैं।

प्रश्न 3.
मीराँ ने रामरतन धन को कैसी पूँजी बताया है?
उत्तर:
मीरों ने रामरतन धन को जन्म-जन्म की पूँजी बताया

प्रश्न 4.
रामरूपी धन को मीरा ने किसकी कृपा से प्राप्त किया है?
उत्तर:
रामरूपी धन को मीरों ने सतगुरु की कृपा से प्राप्त किया है।

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प्रश्न 5.
“सत की नाव खेवटिया सतगुरु” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सतगुरु शिष्य की सच्ची भक्ति भावना की नाव को भवसागर से पार लगाते हैं। उसको मुक्ति का अवसर दिलाते हैं। वे भक्त की नाव के खेवनहार होते हैं।

RBSE Class 8 Hindi भक्ति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘खरचैं नहि, कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आशय-प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से मीराँबाई ने यह बताया है कि रामरूपी धन कभी खर्च नहीं होता जबकि अन्य धन खर्च करने पर समाप्त हो जाता है। राम नाम के धन को कोई चुराकर नहीं ले जा सकता जबकि घर में रखी हुई धन-संपत्ति को चोर उठा ले जाते हैं। यह ऐसा धन है जो खर्च करने पर प्रतिदिन सवा गुना बढ़ता है।

प्रश्न 2.
मीराँ ने श्रीकृष्ण को संतों को सुख देने वाला क्यों कहा है ?
उत्तर:
मीराँ ने श्रीकृष्ण को संतों को सुख देने वाला इसलिए कहा है क्योंकि श्रीकृष्ण अपने भक्तों और संतों के सभी दुख दूर करके उनको सुखी कर देते हैं। जैसे उन्होंने द्रौपदी, प्रह्लाद और गजराज के दुख को एक ही पल में दूर कर दिया था।

प्रश्न 3.
मीराँ ने श्रीकृष्ण से क्या प्रार्थना की है?
उत्तर:
मीरों ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की है कि आप अपने संदर रूप के साथ मेरी आँखों में बस जाएँ जिससे मैं हर समय आपके दर्शन करती रहूँ और भक्ति भाव में लीन रहूँ।

प्रश्न 4.
‘बसो मेरे नैनन में नंदलाल’ पंक्ति में श्रीकृष्ण के प्रति मीराँ ने किस प्रेम को प्रकट किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से मीरौं ने केवल श्रीकृष्ण के प्रति अपनी प्रेम भावना को प्रकट किया है। वह गिरिधर गोपाल के अतिरिक्त और किसी को अपना नहीं मानती हैं। इसीलिए वह भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करती हैं कि वे उनके नयनों में आकर बस जाएँ ताकि किसी और को देखने का अवसर ही न मिले।

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RBSE Class 8 Hindi भक्ति दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मीराँ की भक्ति पदावली’ वाले पदों से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ?
उत्तर:
मीरों के इन भक्तिभाव से पूर्ण पदों से हमें प्रेरणा मिलती है कि हमको अपने इष्ट (पूज्य) देव में दृढ़ विश्वास और भक्ति होनी चाहिए। वही ईश्वर विभिन्न रूपों में जन्म लेकर भक्तों की सहायता और रक्षा करता है। श्रीकृष्ण ने ही द्रौपदी का चीर बढ़ाया था, हिरण्यकशिप को मारकर प्रहलाद की रक्षा की थी, गजराज को भी मगर से बचाया था।

मीराँबाई को सतगुरु ने रामरूपी धन भी प्रदान किया था। यह धन संसार के सभी धनों में श्रेष्ठ है, क्योंकि यह इस भवसागर से व्यक्ति को पार लगाने में पूर्ण रूप से सक्षम है। इन सब बातों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें ईश्वर में अगाध विश्वास करते हुए अच्छे पथ-प्रदर्शक के मार्गदर्शन में उन्नति करनी चाहिए।

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प्रश्न 2.
मीराँ के रामरूपी धन से अपने विद्यारूपी धन की तुलना कीजिए।
उत्तर:
मीरों का रामरूपी धन अनमोल है जिसे उन्होंने अपने सतगरु से प्राप्त किया था। अपना सब कुछ खोकर इसे उन्होंने कई जन्मों की पँजी के रूप में प्राप्त किया है। यह ऐसा धन है जो खर्च नहीं होता, चोर चुरा नहीं सकता। यदि इस धन को खर्च किया जाए तो प्रतिदिन यह सवा गुना बढ़ता जाता है। विद्यारूपी धन भी इसी प्रकार का अनमोल धन है जिसे हम अपने गुरु (शिक्षकों) से प्राप्त करते हैं। मैं भी इसे बहुत मेहनत (दिन-रात पढ़कर) से प्राप्त करता हूँ। विद्यारूपी धन को भी जितना खर्च किया जाता है, वह उतना ही बंढ़ता है। इसे भी कोई चोर चुरा नहीं सकता, भाई लोग इसे बाँट भी नहीं सकते। यह भारी भी बिल्कुल नहीं होता। इसलिए मीराँ के रामरूपी धन की तरह विद्यारूपी धन भी अमूल्य है।

केवल पढ़ने के लिए –

सोनै री चिड़कली है –
सोनै री चिड़कली रै, प्यारो म्हारो देसड़ो,
नर वीरों री खान जगत अगवाणी।।
दूध दही री अठै नदियाँ बहती,रिध सिध साथै नव निध रहती,
होती अठै मोकली गाया, रहती फलफूलां री छायां,
करसा अन्न घणो निपजाता, बां. देख देव हरषाता,
सस्य श्यामला रै भारत भोम है,
ई,रो अन्नपूर्णा रूप, दुनियां जाणी रै।। सोनै री।
आ, धरती नर नाहर जाया, नार्यां भी रण में हाथ दिखाया,

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सूरा लड़ता सीस कट्योड़ा, देख्या पीछे नहीं हट्योड़ा,
रण में सदा विजय ही पाई सारै धरम धजा फहराई,
आ, तो करम भौम हैरै, श्री भगवान री.
लियो बार-बार अवतार, अमर कहाणी रै। सोनै री।। 2 ।।
आ धरती है रिषि मुनियां री,
चिन्ता करती सब दुनियां री, गूंजी अठै वेद री वाणी, गीता रण में पड़ी सुणाणी,
विकस्यो हो विज्ञान अठै ही, जलमी सारी कला अठै ही?
आ, तो जगत गुरु ही रै, भारत-भारती, अब तन मन जीवण वार, बा, छवि ल्याणी रै। सोनै री।।3।।

पाठ-परिचय
श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना पूरा जीवन बिताने वाली मीराँबाई के इन पदों में श्रीकृष्ण के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन हुआ है। भगवान की महिमा एवं गुरु की महत्ता के बारे में बताया गया है।

पदयांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

1. बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोर-मुकुट मकराकृत कुंडल, अंरुन तिलक सोहे भाल।
मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने बिसाल।
अधर-सुधा-रस मुरली राजति, उर बैजंती माल।
छुद्र घंटिका कटि-तट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
‘मीरा’ प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।।

कठिन-शब्दार्थ:
नैनन = नेत्र। नंदलाल = श्रीकृष्ण। मोर-मुकट = मोर के पंखों से बना मुकट। मकराकत = मगर या मछली की आकृति वाला। कुंडल = कानों में पहने जाने वाला आभूषण। अरुन = लाल। सोहे = सुशोभित होता है। भाल = मस्तक। मोहनि = मोहित करने वाली। मूरति = मूर्ति स्वरूप। साँवरि = साँवले रंग की। सूरति = छवि। अधर = होंठ। सुधा = अमृत। राजति = सुशोभित होती है। उर = हृदय। छुद्र = छोटी। कटि-तट = कमर पर। नूपुर = घुघरू, पैरों में पहना जाने वाला आभूषण जो बजता है। रसाल = मीठा। भगत-बछल = भक्तवत्सल, भक्तों से स्नेह करने वाले।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित मीराँबाई द्वारा रचित ‘भक्ति पदावली’ से लिया गया है। इसमें मीराँबाई श्रीकृष्ण की सुंदर छवि अपनी आँखों में सदा के लिए बसाना चाहती हैं।

व्याख्या / भावार्थ:
भक्त मीराँबाई श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हुई कहती हैं हे नंद के पुत्र श्रीकृष्ण ! आप मेरी आँखों में उस रूप के साथ निवास करिए जिसमें मोर पंखों से बना हुआ मुकुट आपके सिर पर शोभायमान हो, कानों में मछली के आकार वाले कुंडल हों, लाल रंग का तिलक आपके मस्तक पर सुशोभित हो, साँवली सूरत और मोहित करने वाली मूर्ति हो, बड़े-बड़े नेत्र हों, होंठों पर अमृत रस बरसाने वाली मुरली विराजती हो, गले में बैजंती की माला हो, छोटी-छोटी घंटियों से बनी हुई करधनी आपकी कमर में शोभा पा रही हो और पैरों में मीठी ध्वनि करने वाले नूपुर हों। हे, संतों को सुख देने वाले भक्तवत्सल गोपाल! आप इसी सुंदर रूप में हमारी आँखों में सदा विराजमान रहें।.

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2. हरि, तुम हरो जन की पीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुरत बढ़ायो चीर।
भक्त कारण रूप नरहरि, धार्यो आप सरीर।
हिरणाकुश कुँ मारि लीन्हों, धार्यो नाहीं धीर।
बूढ़तो गजराज राख्यौ, करियो बाहर नीर।
दासी मीरा लाल गिरिधर, चरण-कँवल पै सीर।।

कठिन शब्दार्थ:
हरो = हरण करो, दूर कर दो। पीर = पीड़ा, दुख। लाज = लज्जा। राखी = बचा लिया। चीर = वस्त्र। कारण = के लिए। नरहरि = नरसिंह भगवान का रूप। धर्यो = धारण किया। हिरणाकुश = हिरण्यकशिपु। धीर = धैर्य। बूढ़तो = डूबते हुए। करियो = कर दिया। नीर = पानी। सीर = सिर। गिरिधर = पहाड़ को अपनी अंगुली पर धारण करने वाले।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित मीराँबाई द्वारा रचित ‘भक्ति पदावली’ से लिया गया है। इसमें मीराँबाई ने श्रीकृष्ण जी से विनय की है कि आप लोगों के दुखों को दूर कीजिए।

व्याख्या / भावार्थ:
श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन मीराँबाई यह प्रार्थना करती हैं कि हे श्रीकृष्ण आप सभी के दुखों को दूर करने वाले हैं। आपने तो पांडवों की पत्नी द्रौपदी की लाज बचाने के लिए तुरंत उसकी साड़ी को इतना बढ़ा दिया था कि दुःशासन खींचते-खींचते थक गया। अपने भक्त की रक्षा के लिए आपने नरसिंह का रूप धारण कर लिया था और हिरण्यकशिपु को मारने में थोड़ा भी धैर्य धारण नहीं किया। आपने पानी में डूबते हुए गजराज के भी प्राण बचाए थे। उसे मगरमच्छ से छुड़ाकर जल से बाहर निकाला था। हे गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले प्रभु आपके चरणरूपी कमलों में मैं अपना सिर झुकाती हूँ। आपको सादर नमन करती हूँ। आप मेरी भी विरह की पीड़ा दूर करें।

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3. पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा करि अपनायो।
जन्म-जन्म की पूँजी पाई, जग में सभी गँवायो।
खरचैं नहिं, कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस गायो।।

कठिन-शब्दार्थ:
अमोलक = अमूल्य। किरपा = कृपा। अपनायो = स्वीकार करना। पूँजी = संचित धन गँवायो = खो दिया। खरचैं = खर्च करने पर। सवायो = सवा गुना (एक और एक का चौथा भाग)। सत = सत्य। खेवटिया = नाव खेने वाले। भवसागर = संसाररूपी सागर। तर = पार होना। नागर = चतुर हरख-हरख = हर्षित होकर। जसयश।

संदर्भ तथा प्रसंग:
प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठ ‘भक्ति पदावली’ से लिया गया है। इसमें मीराँबाई अपने सद्गुरु के प्रति आभार प्रकट कर रही हैं कि उन्होंने उनको राम नाम रूपी अनमोल वस्त प्रदान की है। व्याख्या-मीराँबाई अपने सतगुरु की कृपा पाकर प्रसन्न होकर कह रही हैं कि उन्होंने राम नाम रूपी अनमोल रत्न प्राप्त कर लिया है।

यह अनमोल वस्तु उनके सतगुरु ने उन्हें दी है और उन पर कृपा करके उन्हें अपना लिया है। संसार में सब कुछ खोकर उन्होंने कई जन्मों की पूँजी (संचित धन) प्राप्त कर ली है। यह राम नामरूपी धन कभी खर्च नहीं होगा, कोई चोर इसे चुरा भी नहीं सकता। यह प्रतिदिन सवा गुना बढ़ता ही रहेगा। सत्य की नाव खेने वाले सतगुरु ने उन्हें संसार सागर से पार लगा दिया है। मीराँबाई अत्यंत हर्षित होकर प्रभु श्रीकृष्ण का यश गाती फिर रही हैं।

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