RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित 

Rajasthan Board RBSE Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित (सवैये)

RBSE Solutions for Class 8 Hindi

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पपाठ से

सोचें और बताएँ

प्रश्न 1.
सुदामा के मित्र कौन थे?
उत्तर:
सुदामा के मित्र द्वारका के राजा श्रीकृष्ण थे।

प्रश्न 2.
किसके कहने पर सुदामा द्वारिका गये थे?
उत्तर:
पत्नी वसुंधरा के कहने पर सुदामा द्वारिका गये थे।

लिखें

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
पाठ में ‘वसुधा’ शब्द आया है –
(क) श्रीकृष्ण के लिए
(ख) पृथ्वी के लिए
(ग) सुदामा की पत्नी के लिए
(घ) अंगोछा के लिए।
उत्तर:
(ख) पृथ्वी के लिए

RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित 

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण कहाँ के राजा थे?
उत्तर:
श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा थे।

प्रश्न 2.
सुदामा श्रीकृष्ण के लिए भेंटस्वरूप क्या ले गए थे?
उत्तर:
सुदामा श्रीकृष्ण के लिए भेंटस्वरूप थोड़े-से चावल ले गये थे।

प्रश्न 3.
द्वारपाल ने सुदामा का चित्रण किसके सामने किया?
उत्तर:
द्वारपाल ने सुदामा का चित्रण श्री कृष्ण के सामने किया।

RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित 

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण कहाँ के राजा थे?
उत्तर:
श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा थे।

प्रश्न 2.
सुदामा श्रीकृष्ण के लिए भेंटस्वरूप क्या ले गए थे?
उत्तर:
सुदामा श्रीकृष्ण के लिए भेंटस्वरूप थोड़े-से चावल ले गये थे।

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प्रश्न 3.
द्वारपाल ने सुदामा का चित्रण किसके सामने किया?
उत्तर:
द्वारपाल ने सुदामा का चित्रण श्री कृष्ण के सामने किया।

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वारपाल ने सुदामा के आगमन की सूचना किसको तथा क्या दी?
उत्तर:
द्वारपाल ने सुदामा के आगमन की सूचना श्रीकृष्ण को दी। द्वारपाल ने श्रीकृष्ण से बताया कि एक ब्राह्मण द्वार पर आया है। उसके सिर पर पगड़ी नहीं है और शरीर पर कपड़े भी नहीं हैं, पैरों में जूते नहीं हैं, धोती फटी और दुपट्टा बहुत पुराना है। आश्चर्य से वह यहाँ की सुंदरता को देख रहा है। वह आपका निवास पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण ने सुदामा के पाँव कैसे धोए? उक्त क्रिया वाली पंक्तियाँ सवैया में से छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाकर जब उनके पाँव धोने के लिए हाथ बढ़ाया तो देखा उनके पैरों में बहुत से काँटे चुभे हुए हैं। उनकी एड़ियाँ भी कई धारियों में फटी हुई हैं। सुदामा की यह दशा देखकर श्रीकृष्ण रोने लगे। मित्र की दीन दशा देखकर श्री कृष्ण की आँखों से आँसू टपकने लगे और सुदामा के पैरों पर गिरने लगे। श्री कृष्ण को परात में रखे पानी की तो आवश्यकता ही नहीं पड़ी, सुदामा के पैर तो उनके आँसुओं से ही धुल गए। यथा -पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।

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RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिएपाँच सुपारि विचारु तू देखिके, भेंट को चारि न चाउर मेरे।
उत्तर:
संदर्भ एवं प्रसंग प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ ‘नरोत्तमदास’ द्वारा रचित ‘सुदामा चरित’ के सवैया से ली गई हैं। ये हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित हैं। पत्नी के बार-बार द्वारिका जाने की जिद पर सुदामा अपनी दयनीय दशा के बारे में दु:खी होकर पत्नी को अपनी विवशता बता रहे हैं। व्याख्या-सुदामा अपनी पत्नी से कहते हैं कि तुम मुझे द्वा का के राजा श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए बार-बार कहती हो लेकिन मैं अपनी इस फटी धोती को पहनकर उनके पास कैसे जाऊँ, तुम्हीं अपने मन में विचार करके देखो। हमारे पास उनको उपहारस्वरूप देने के लिए पाँच सुपारी और चार चावल भी नहीं हैं। क्या ऐसी दशा में किसी राजा के पास जाना चाहिए?

प्रश्न 2.
सुदामा की दुर्दशा देखकर श्रीकृष्ण की क्या स्थिति हुई? लिखिए।
उत्तर:
सुदामा की दुर्दशा देखकर श्रीकृष्ण जी रोने लगते हैं। वे अत्यंत दु:खी होकर सुदामा से कहते हैं कि हे मित्र! तुम इतना कष्ट जीवन भर सहते रहे, मुझको क्यों नहीं याद किया? इतने दिनों तक तुम कहाँ रहे? यहाँ क्यों नहीं आए? हैं। वे अत्यंत दुःखी होकर सुदामा से कहते हैं कि हे मित्र! तुम इतना कष्ट जीवन भर सहते रहे, मुझको क्यों नहीं याद किया? इतने दिनों तक तुम कहाँ रहे? यहाँ क्यों नहीं आए? इतना कहते हुए उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली। अपने इन्हीं आँसुओं से उन्होंने सुदामा के पाँव धोए। अपने सुंदर गमछे से उनके पाँव पोंछे और जितना चाहिए उससे अधिक अपने मित्र को सम्मान दिया।

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प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण-सुदामा के मिलन का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
जब द्वारपाल ने श्री कृष्ण से सुदामा की दयनीय दशा का वर्णन किया और यह बताया कि वह आपको पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है। कहते हैं कि सुदामा नाम सुनते ही श्रीकृष्ण नंगे पाँव जैसे थे वैसे उन्हें बुलाने के लिए दौड़ते हुए स्वयं आए और अपने मित्र से प्रेमपूर्वक लिपट गए।

सम्मानपूर्वक वे सुदामा को महल में ले आए और अपने सिंहासन पर बैठाकर उनके पाँव धोने लगे। पाँव धोते हुए उन्होंने मित्र की बुरी दशा और पैरों में चुभे हुए काँटों के समूह को देखा तो उनका हृदय करुणा से भर गया। वे रोते हुए पूछने लगे हाय मित्र! तुम इतने दिनों तक कहाँ थे? हमसे मिलने क्यों नहीं आए? इस तरह वे रोते हुए अपने आँसुओं से ही मित्र सुदामा के पाँव धोने लगे।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में कर्ता और क्रिया पदों को छाँटकर लिखिए –
(क) सुदामा कृष्ण से मिलने जा रहे थे।
(ख) सुदामा अपने साथ चावल की पोटली लेकर गए।
(ग) सेवक ने सुदामा के बारे में कृष्ण को बताया।
(घ) कृष्ण सुदामा का नाम सुनकर दौड़े आए।
उत्तर:
प्रस्तुत वाक्यों के कर्ता और क्रिया पद निम्नलिखित
(क) क सुदामा – क्रिया – जाना
(ख) कर्ता – सुदामा, क्रिया – जाना
(ग) कर्ता – सेवक, क्रिया – बताना
(घ) कर्ता – कृष्ण, क्रिया – आना।

प्रश्न 2.
दिए गए वाक्यों में क्रिया सकर्मक है या अकर्मक। वाक्यों को अपनी कॉपी में लिखकर क्रिया का भेद लिखिए –

  1. द्वारपाल बोला।
  2. कृष्ण ने चावल खाए।
  3. कृष्ण ने सुदामा के पैर धोए।

उत्तर:
दिए गए वाक्यों के क्रिया-भेद निम्नलिखित हैं –

  1. अकर्मक क्रिया
  2. सकर्मक क्रिया
  3. सकर्मक क्रिया

नोट:

  1. सकर्मक क्रिया उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो।
  2. जिन क्रियाओं का व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे ‘अकर्मक’ कहलाती हैं।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
सुदामा कृष्ण से मिलने बहुत पहले भी जा सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कारण जानिए और लिखिए।
उत्तर:
सुदामा कृष्ण से मिलने बहुत पहले भी जा सकते थे लेकिन सुदामा का संबंध श्रीकृष्ण से दो तरह का था। पहले तो वे श्रीकृष्ण को अपना मित्र मानते थे और दूसरे, वे श्रीकृष्ण को भगवान भी मानते थे। दूसरे संबंध में तो उनका भगवान-भक्त का नाता है। भगवान से भक्त कभी भी कुछ भी माँग सकता है। इस संबंध के माध्यम से तो श्रीकृष्ण से मिलने वे कभी भी जा सकते थे। किंतु पहला संबंध मित्रता का था।

सुदामा की विचारधारा यह थी कि “विपत्ति पड़ने पर मित्र के घर न जाइए।” अपने इन्हीं विचारों के कारण सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने नहीं जा रहे थे लेकिन पत्नी के बार-बार कहने पर वे जाने को मजबूर हो जाते हैं। मित्र के विषय में सुदामा का यह विचार उनके स्वाभिमान का परिचायक है। लेकिन अब के लोग इस प्रकार के विचार को महत्त्व नहीं देते हैं।

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प्रश्न 2.
जे गरीब पर हित करे, ते रहीम बड़ लोग। कहाँ सुदामा बापुरी, कृष्ण मितायी जोग।। उपर्युक्त दोहे का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उपर्युक्त दोहे का भावार्थ निम्नलिखित हैभावार्थ कवि रहीमजी कहते हैं कि जो लोग गरीबों का हित (भलाई) करते हैं वे बड़े हृदय वाले होते हैं। कहाँ बेचारे गरीब सुदामा और कहाँ द्वारिका के राजा श्रीकृष्ण की मित्रता। यह संयोग ही है कि छोटे और बड़े, मित्र के रूप में हमें दिखाई दें क्योंकि ऐसी मित्रता बहुत कम दिखाई देती है। इसके लिए श्री कृष्ण का बड़प्पन ही कारण है।

प्रश्न 3.
आपने कभी अपने मित्र की मदद की होगी, उस घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बात उन दिनों की है जब हम लोग परीक्षा दे रहे थे। चार-पाँच मित्रों के साथ हम लोग सुबह 5.30 बजे घर से निकल लेते थे क्योंकि परीक्षा केंद्र हम लोगों के घर से लगभग 12 किलोमीटर दूर था। एक दिन गणित विषय का पेपर था। हम लोग घर से निकले थे, करीब आठ किलोमीटर तक का रास्ता हमने तय कर लिया था। तभी एक मित्र बंशीलाल ने कहा-मित्र!

मेरा प्रवेश-पत्र तो घर पर ही छूट गया। हम लोग बड़ी मुश्किल में पड़ गये क्योंकि समय बहुत कम रह गया था। परीक्षा शुरू होने में 40 मिनट शेष थे। मुझे उस समय एक उपाय सूझा-थोड़ी दूर पीछे जाकर एक बाजार था।  वहाँ मेरे पापा के परिचित की दुकान थी, उनके पास मोटर साइकिल थी। मैं भी उनसे परिचित था, इसलिए अपने दोस्त को साथ लेकर मैं उनके यहाँ गया और उन्हें अपनी परेशानी से अवगत कराया।

उन्होंने मुझे तो परीक्षा देने के लिए भेज दिया और मित्र को मोटरसाइकिल से बैठाकर उसके घर गये और प्रवेश-पत्र लेकर उसे परीक्षा केंद्र तक छोड़ा तब तक परीक्षा शुरू होने में केवल 5 मिनट परीक्षा देने के लिए भेज दिया और मित्र को मोटरसाइकिल से बैठाकर उसके घर गये और प्रवेश-पत्र लेकर उसे परीक्षा केंद्र तक छोड़ा तब तक परीक्षा शुरू होने में केवल 5 मिनट शेष रह गये थे। कापी बँट चुकी थी।

उस मित्र ने उन अंकल के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और बहुत धन्यवाद दिया। उसने मुझे भी धन्यवाद देते हुए कहा मित्र, यदि तुम न होते तो आज मेरी परीक्षा छूट जाती। तुम्हारा यह एहसान हम कभी नहीं भूलेंगे। किसी को यदि भविष्य में मेरी सहायता की जरूरत होगी तो निश्चित रूप से मैं उसकी सहायता करने की पूरी कोशिश करूँगा।

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संकलन

श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता की कहानी है। ऐसी कहानियों का संकलन कीजिए।
उत्तर:
छात्र-छात्राएँ कर्ण और दुर्योधन, राम और सुग्रीव की मित्रता से संबंधित कहानियाँ संकलित कर सकते हैं। ये कहानियाँ आदर्श मित्रता का उदाहरण हैं।

यह भी करें

निम्नलिखित संवाद को आगे बढ़ाइए –
द्वारपाल:
महाराज की जय हो। महाराज द्वार पर एक ब्राह्मण खड़ा है। आप से मिलना चाहता है।
श्रीकृष्ण:
मुझसे मिलना चाहता है मगर क्यों? क्या नाम है उसका और कहाँ से आया है?
द्वारपाल:
न जाने कहाँ से आया है? वह स्वयं को आपका परममित्र और अपना नाम सुदामा बता रहा है।
श्रीकृष्ण:
(आश्चर्यचकित होकर) सुदामा।

तब और अब

नीचे लिखे शब्दों के मानक रूप लिखिए –
द्वारिका, कह्यो, द्विज, द्वार, रह्यो
उत्तर:
शब्दों के मानक रूप निम्नलिखित हैं –
RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित - 1

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित बहुविकल्पीय

प्रश्न 1.
सुदामा की वेशभूषा से क्या पता चलता था?
(क) संपन्नता
(ख) धनवान
(ग) वैभवशाली
(घ) दीन-हीन।
उत्तर:
(घ) दीन-हीन।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण क्यों रोने लगे थे?
(क) सुदामा से बहुत दिनों बाद मिलने के कारण
(ख) भावुकता के कारण
(ग) सुदामा के रोने के कारण
(घ) सुदामा के पैरों में चुभे हुए काँटे और फटी एड़ियाँ
उत्तर:
(घ) सुदामा के पैरों में चुभे हुए काँटे और फटी एड़ियाँ

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प्रश्न 3.
‘अभिरामा’ शब्द का अर्थ है –
(क) कमीज
(ख) धोती
(ग) सुंदर
(घ) पगड़ी।
उत्तर:
(ग) सुंदर

प्रश्न 4.
सुदामा के पैर श्रीकृष्ण ने कैसे धोये –
(क) पानी से
(ख) दूध-दही से
(ग) अमृत से
(घ) आँसुओं से।
उत्तर:
(घ) आँसुओं से।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. द्वार खड़े……….प्रभु के। (छड़िया / घड़ियाँ)
  2. सीस पगा न………..तन पै प्रभु। (झगा / ग्रामा)
  3. पूछत…………….को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा। (दीनदयाल / हरदयाल)
  4. देखि सुदामा की दीन दसा, करुणा करिके………..रोये। (दयासागर / करुणानिधि)

उत्तर:

  1. छड़िया
  2. झगा
  3. दीनदयाल
  4. करुणानिधि।

सुमेलित कीजिए –
खण्ड ‘अ’ एवं खण्ड ‘ब’ में दी गई पंक्तियों का मिलान कीजिए –
खण्ड ‘अ’              खण्ड ‘ब’
(क) सीस पगा न – की नहीं सामा
(ख) जाने को आहि – लटी दुपटी अरु
(ग) धोती फटी-सी – बसै केहि ग्रामा
(घ) पाँव उपानहुँ – झगा तन पै प्रभु
उत्तर:
(क) झगा तन पै प्रभु
(ख) बसै केहि ग्रामा।
(ग) लटी दुपटी अरु।
(घ) की नहीं सामा।

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कौन आठों पहर द्वारिका जाने के लिए कह रहा था?
उत्तर:
सुदामा की पत्नी आठों प्रहर द्वारिका जाने के लिए कह रही थी।

प्रश्न 2.
“पाँच सुपारि विचारि तू देखिके भेंट को चारि न चाउर मेरे” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सुदामा अपनी पत्नी से कह रहे हैं कि तू विचार करके देख। श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए उनके पास पाँच सुपारी और चावल के चार दाने भी नहीं हैं।

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प्रश्न 3.
किसके पैरों में काँटे चुभे हुए थे?
उत्तर:
सुदामा के पैरों में काँटे चुभे हुए थे।

प्रश्न 4.
“करुणा करिके करुणानिधि रोए” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-सुदामा की दयनीय दशा देखकर करुणा सागर भगवान द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण दया-करुणा पूर्ण होकर रोने लगे।

प्रश्न 5.
श्रीकृष्ण ने मित्र सुदामा के साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने मित्र सुदामा के साथ बड़ा प्रेमपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार किया।

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RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण के पास सुदामा क्यों गये?
उत्तर:
श्रीकृष्ण और सुदामा ने संदीपन ऋषि के यहाँ एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। यह बात उन्होंने अपनी पत्नी को बताई थी इसलिए पत्नी ने उन्हें द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण से कुछ आर्थिक सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से उनके पास भेजा था।

प्रश्न 2.
सुदामा की वेशभूषा से क्या पता चलता था?
उत्तर:
सुदामा की वेशभूषा को देखकर ही द्वारपालों को पता चल गया था कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। वह गरीबी में अपना जीवन किसी तरह काट रहे हैं।

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प्रश्न 3.
“पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोए।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आशय-श्रीकृष्ण ने सुदामा के पैर धोने के लिए परात में जो पानी रखा था, उसे हाथ नहीं लगाया बल्कि अपने आँसुओं के जर’ से ही उनके पैर धोए।

RBSE Class 8 Hindi सुदामा चरित दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता क्या आज भी देखने को मिल सकती है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता की तो आज केवल कल्पना ही की जा सकती है। लोग पैसों के इतने लोभी हैं कि मुफ्त में न इतना धन किसी को देना चाहते हैं, न गरीबों से दोस्ती करके अपने (हैसियत) को गिराना। अतः आज लोग यही कहकर किनारा कर लेते हैं कि क्या मैं हरिश्चंद्र हूँ? मैं श्रीकृष्ण हूँ? मैं राम हूँ? लोग इनके जैसा आचरण और व्यवहार अब अपनाना ही नहीं चाहते। न तो अब वे जीवन मूल्य हैं न उन जीवन मूल्यों में किसी का विश्वास। चारों तरफ स्वार्थ का बोलबाला है।

प्रश्न 2.
‘सुदामा चरित’ पाठ के आधार पर श्रीकृष्ण के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जब श्री कृष्ण को द्वारपाल ने सुदामा की दीन-हीन दशा बताई तो श्रीकृष्ण ने अपने पद और प्रभाव की चिंता किए बिना सुदामा को गले लगाकर उनका स्वागत किया। उनको आदर सहित अपने सिंहासन पर बिठाकर उनके पैर धोने लगे। सुदामा के पैरों की दुर्दशा देखकर उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे। ये सभी बातें बताती हैं कि श्री कृष्ण सच्चे मित्र, अभिमान रहित, उदार, दानी और दयालु महापुरुष थे।

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केवल पढ़ने के लिए

हम पृथ्वी की संतान
प्रकृति एक विशाल पारिस्थितिकी तंत्र है जिसमें दो प्रकार के प्रमुख घटक शामिल हैं जैविक और अजैविक। जैवमंडल का निर्माण भूमि, गगन, अनिल (वायु), अनल (अग्नि), जल नामक पंचतत्वों से होता है जिसमें हम छोटे-बड़े एवं जैव-अजैव विविधताओं के बीच रहते आए हैं। इसमें पेड़, पौधों एवं प्राणियों का निश्चित सामंजस्य और सहअस्तित्व है, जिसे समन्वयात्मक रूप में पर्यावरण के विभिन्न अवयव कहते हैं। पर्यावरण शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ इन दो शब्दों के योग से बना है। ‘परि’ और ‘आवरण’ का सम्यक अर्थ है वह आवरण जो हमें चारों ओर से ढके हुए है, आवृत किए हुए है।

प्रकृति और मानव के बीच का मधुर सामंजस्य बढ़ती जनसंख्या एवं उपभोगी प्रवृत्ति के कारण घोर संकट में है। यह असंतुलन प्रकृति के विरुद्ध तीसरे विश्वयुद्ध के समान है। विश्वभर में वनों का विनाश, अवैध एवं असंगत उत्खनन, कोयला, पेट्रोल, डीजल के उपयोग में अप्रत्याशित अभिवृद्धि और कल-कारखानों के विकास के नाम पर विस्तार। मानव सभ्यता को महाविनाश के कगार पर ला खड़ा कर दिया है। विश्व की प्रसिद्ध नदियाँ, जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, राइन, सीन, मास, टेम्स आदि नदियाँ भयानक रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं। इनके निकट बसे लोगों का जीवन दूभर हो गया है।

पृथ्वी के ऊपर वायुमण्डल के स्टोस्फियर में ओजोन गैस की एक मोटी परत है। यह धरती के जीवन की रक्षा कवच है जिससे सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणें रोक ली जाती हैं। किंतु पृथ्वी के ऊपर जहरीली गैसों के बादल बढ़ते जाने के कारण सूर्य की अनावश्यक किरणें बाह्य अंतरिक्ष में परावर्तित नहीं हो पाती जिसके कारण पृथ्वी का तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) बढ़ता जा रहा है। इससे छोटे-बड़े सभी द्वीपसमूहों एवं महाद्वीपों के तटीय क्षेत्रों के डूब जाने का खतरा बढ़ गया है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहते हैं।

यही स्थिति रही तो मुंबई जैसे महानगर प्रलय की गोद में समा सकते हैं। पृथ्वी पर बढ़ते तापमान के कारण विश्व सभ्यता को अमृत एवं पोषक जल प्रदान करने वाले ग्लेशियर या तो लुप्त हो गए हैं या लुप्त होने की ओर बढ़ते जा रहे हैं। अमृतवाहिनी गंगा अपने उद्गम गंगोत्री के मूल स्थान से कई किलोमीटर पीछे खिसक चुकी है। प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी के कारण लाखों लोग शरणार्थी बन चुके हैं। विशेषकर अपने भारत में ही बाँधों, कारखानों, हाइड्रोपॉवर स्टेशनों के बनने के कारण लाखों वनवासी भाई-बहन बेघर होकर शरणार्थी बने हैं।

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प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी के कारण लाखों लोग शरणार्थी बन चुके हैं। विशेषकर अपने भारत में ही बाँधों, कारखानों, हाइड्रोपॉवर स्टेशनों के बनने के कारण लाखों वनवासी भाई-बहन बेघर होकर शरणार्थी बने हैं। पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदनशीलता प्राचीन काल से ही मिलती है। अथर्ववेद में लिखा है—’माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ‘ अर्थात् भूमि माता है, हम पृथ्वी के पुत्र हैं। एक जगह यह भी विनय किया गया है कि ‘हे पवित्र करने वाली भूमि! हम कोई ऐसा काज न करें जिससे तेरे हृदय को आघात पहुँचे।’ हृदय को आघात पहुँचाने का अर्थ है पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्रों अर्थात् पर्यावरण के साथ क्रूर छेड़छाड़ न करना।

हमें प्राकृतिक संसाधनों के अप्राकृतिक एवं बेतहाशा दोहन से बचना होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के तमाम राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे को लेकर आपसी मतभेद भुला दें और अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निभाएँ, ताकि समय रहते सर्वनाश से उबरा जा सके। विश्वविनाश से निपटने के लिए सामूहिक एवं व्यक्तिगत प्रयासों की जरूरत है। इस दिशा में अनेक आंदोलन हो रहे हैं। अरण्य रोदन के बदले अरण्य संरक्षण की बात हो रही है। सचमुच हमें आत्मरक्षा के लिए पृथ्वी की रक्षा करनी होगी, ‘भूमि माता है और हम उसकी संतान’ इस कथन को चरितार्थ करना होगा।

पाठ-परिचय

नरोत्तमदास द्वारा रचित ‘सुदामा चरित’ में श्रीकृष्ण एवं सुदामा की पुरानी मित्रता का वर्णन है। सुदामा ने अपनी पत्नी को अपनी तथा कृष्ण की मित्रता के बारे में बताया था। इसलिए उनकी पत्नी वसुंधरा ने बहुत आग्रह करके सुदामा को द्वारका भेजा। जब सुदामा कृष्ण के महल द्वारका पहुँचे तब उनकी दीन-हीन दशा देखकर द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। सुदामा से पूरी जानकारी लेकर द्वारपाल ने श्रीकृष्ण को महल में जाकर पूरी बात बताई। सुदामा का नाम सुनकर कृष्ण उनसे मिलने को व्याकुल हो उठे। जब सुदामा से श्रीकृष्ण मिले तो उनकी दीन दशा देखकर बहुत दुःखी हुए।

पदयांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

(1) द्वारिका जाहुजू, द्वारिका जाहुजू,
आठहूँ याम यही जक तेरे।
जो न कह्यो करिये तो बड़ो दु:ख,
जायें कहाँ अपनी गति हेरे।
द्वार खड़े छड़िया प्रभु के, जहाँ भूपति जान न पावत मेरे।
पाँच सुपारि विचारु तू देखिके,
भेंट को चारि न चाउर मेरे।

कठिन शब्दार्थ:
जाहुजू = जाइए जी। आठहुँ = आठौ। याम = पहर। जक = रट, बार-बार कहना। गति = दशा। हेरे = देखते हुए। छड़िया = पहरेदार। भूपति = राजा। नेरे = समीप। सुपारि = सुपाड़ियाँ। चारि = चार। चाउर = चावल।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘सुदामा चरित’ नामक पाठ से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि ने पत्नी द्वारा बार-बार द्वारका जाने के लिए कहे जाने पर, सुदामा की मनोभावनाओं को प्रकाशित किया है।

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व्याख्या / भावार्थ:
सुदामा जी अपनी पत्नी को समझा रहे हैं कि तुम दिन-रात द्वारका जाइए, द्वारका जाइए की रट लगाए हुए हो। यदि मैं तुम्हारी बात नहीं मानता तो तुम्हें बड़ा दुख होगा लेकिन जब मेरा ध्यान अपनी दीन-हीन दशा पर जाता है तो मेरा महाराज श्रीकृष्ण से मिलने जाने का साहस नहीं होता। तुम्हें पता नहीं है कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण के द्वार पर पहरेदार खड़े रहते हैं। वे मेरे जैसे दरिद्र की तो बात ही क्या है, राजाओं तक को बिना श्री कृष्ण की आज्ञा के उनके पास नहीं जाने देते हैं। यदि मैं उनके पास पहुँच भी गया तो तनिक सोचो कि मैं उनको क्या भेंट करूँगा। हमारे घर में पाँच सुपारियाँ तो दूर, भेंट करने के लिए चार चावल (थोड़े से चावल) तक नहीं हैं। क्या मैं अपने राजा मित्र के यहाँ खाली हाथ जाऊँ ?

2. सीस पगा न झगा तन पै प्रभु,
जाने को आहि, बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी-सी लटी दुपटी अरु,
पाँव उपानहुँ की नहीं सामा।

द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक,
रह्यो चकि सो वसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम,
बतावत आपनो नाम सुदामा।

कठिन शब्दार्थ:
सीस = सिर। पगा = पगड़ी। झगा – वस्त्र। तन = शरीर। आहि = है। केहि = किस। लटी = बहुत पुरानी, जीर्ण-शीर्ण । दुपटी = अंगोछा, गमछा । अरु = और। पाँव = पैर। उपानहुँ = जूता। सामा = सामर्थ्य । विज = ब्राहमण। दुर्बल = कमजोर। चकि सो = चकित। होकर। वसुधा = धरती। अभिरामा = सुंदर। दीनदयाल = गरीबों पर दया करने वाले। धाम = भवन। बतावत = बता रहा है। आपनो = अपना।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी के ‘सुदामा चरित’ नामक पाठ से ली गई हैं। इसके रचनाकार कवि नरोत्तमदास जी हैं। पत्नी के बार-बार कहने पर एक दिन सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने के लिए द्वारिका महल के पास पहुँच जाते हैं। वहाँ द्वारपाल ने सुदामा के बारे में जाकर श्रीकृष्ण को बताया।

व्याख्या / भावार्थ:
सुदामा के बार-बार कहने पर द्वारपाल ने राजभवन में जाकर भगवान श्री कृष्ण से निवेदन किया, हे प्रभु ! जिसके सिर पर पगड़ी नहीं है और शरीर पर झगा (एक प्रकार का कुर्ता) नहीं है। जाने कौन है और किस गाँव का रहने वाला है? फटी धोती पहने है और दुपट्टा भी तार-तार हो रहा है। पैरों में जूते तक नहीं हैं। ऐसा एक दुबला-पतला ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है। वह बहुत चकित होकर द्वारिका की सुंदर भूमि को देख रहा है। हे दीन दयाल ! वह आपके राज भवन का पता पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है।

RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 सुदामा चरित 

कठिन शब्दार्थ:
बिहाल = बेहाल, बुरा-हाल। बिवाइन = फटी हुई एड़ियाँ। कंटक जाल = बहुत से काँटे। गड़े = चुभे हुए। पग = पैर। जोये = देखे। पायो = पाया। इतै = इधर। कितै = किधर। खोये = गँवा दिए। दीन दसा = दयनीय दशा, बुरी हालत। करुना करिकै = दया करके। करुणानिधि = श्री कृष्ण, दया से भरा हुआ। नैनन के जल सौं = आँसुओं के द्वारा।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी के ‘सुदामा चरित’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता नरोत्तमदास जी हैं। द्वारपाल के सुदामा नाम बताने पर श्रीकृष्ण स्वयं दौड़ते हुए बाहर आते हैं और सुदामा को आदरपूर्वक महल में ले जाते हैं। सुदामा की हालत देखकर वे रो पड़ते हैं।

व्याख्या / भावार्थ:
इन पंक्तियों में नरोत्तमदास जी सुदामा की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण सुदामा को सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाकर उनके पैरों को धोने के लिए हाथ बढ़ाते हैं तो देखते हैं कि उनके पैरों में बहुत से काँटे चुभे हुए हैं। पैरों की एड़ियाँ फट गई हैं। सुदामा की यह दशा देखकर श्रीकृष्ण दुःखी होकर कहते हैं हे मित्र!

तुम इतना कष्ट सहते रहे, इतने दिनों तक कहाँ थे? इधर क्यों नहीं आए? सुदामा की ऐसी बुरी हालत देखकर करुणा के भंडार श्रीकृष्ण करुणा से भरकर रोने लगे। रोते हुए उनके नेत्रों से इतने आँसू निकले कि उन्होंने पैर धोने के लिए रखे गये पानी के परात को हाथ भी नहीं लगाया उनकी आँखों से बह रहे आँसुओं के पानी से ही सुदामा के पैर धुल गए।

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