RBSE Solutions for Class 8 Hindi Chapter 15 शक्ति और क्षमा

Rajasthan Board RBSE Class 8 Hindi Chapter 15 शक्ति और क्षमा (कविता)

RBSE Solutions for Class 8 Hindi

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पाठ से

सोचें और बताएँ

प्रश्न 1.
पांडवों को कौरवों ने कब तक कायर समझा ?
उत्तर:
पांडवों को कौरवों ने तब तक कायर समझा जब तक वे उनसे विनती करते रहे।

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प्रश्न 2.
क्षमा किसे शोभा देती है ?
उत्तर:
क्षमा शक्तिशाली को शोभा देती है।

लिखें

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा बहुविकल्पी

प्रश्न 1.
कवि ने नर-व्याघ्र’ कहा है –
(क) अर्जुन को
(ख) युधिष्ठिर को
(ग) भीष्म पितामह को
(घ) दुर्योधन को।
उत्तर:
(ख) युधिष्ठिर को

प्रश्न  2.
इस कविता में कौन किसको समझा रहा है –
(क) श्रीकृष्ण अर्जुन को
(ख) श्रीकृष्ण युधिष्ठर को
(ग) भीष्म पितामह युधिष्ठिर को
(घ) भीष्म पितामह अर्जुन को।
उत्तर:
(ग) भीष्म पितामह युधिष्ठिर को

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RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विषहीन, विनीतं और सरल साँप द्वारा दी गई क्षमा को निरर्थक क्यों कहा गया है ?
उत्तर:
विषहीन, विनीत और सरल साँप द्वारा दी गई क्षमा को निरर्थक इसलिए कहा गया है क्योंकि उसकी क्षमा का कोई महत्व नहीं होता। जो स्वयं निर्बल है वह किसी को क्या क्षमा करेगा वह तो खुद ही दया का पात्र है।

प्रश्न 2.
सागर ने राम की दासता कब स्वीकार की ?
उत्तर:
सागर ने राम की दासता तब स्वीकार की जब राम ने उसे अपनी शक्ति का प्रभुत्व दिखाया। राम तीन दिन तक विनम्रता से सागर से मार्ग माँगते रहे किंतु सागर ने एक सुनी, परंतु जब राम ने क्रोध करके धनुष पर अग्निबाण का संधान किया तो सागर भयभीत होकर उनकी शरण में आ गया।

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प्रश्न 3.
सहनशीलता, क्षमा, दया आदि गुणों की कद्र कब होती है ?
उत्तर:
सहनशीलता, क्षमा, दया आदि गुणों की कद्र तभी होती है जब तक मनुष्य के पास शक्ति है क्योंकि बिना शविर के ये गुण निरर्थक होते हैं। सभी जगह शक्तिशाली का आद: होता है। जिसके पास शक्ति नहीं होती, उसका कहीं सम्मान नहीं होता।

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता का मुख्य संदेश क्या है ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित कविता का मुख्य संदेश यह है कि अहंकारी शत्रु पर क्षमा और उदारता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उलटे वह क्षमा करने वाले को कायर समझता रहता है। अतः उसे शक्ति से ही रास्ते पर लाना चाहिए। शक्ति से संपन्न व्यक्ति की क्षमाशीलता ही सुशोभित होती है। कहा गया है कि ‘शठेशाठ्यं समाचरेत्।’ दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए, विनती नहीं। उससे विनय करने पर वह और दुर्व्यवहार करता है। इसलिए हमें दुष्ट व्यक्ति को क्षमा नहीं बल्कि दंड देना चाहिए।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए –
(क) क्षमा शोभती उस भुजंग को ………. विनीत, विषहीन, सरल हो।
उत्तर:
व्याख्याकवि का कहना है कि क्षमा जैसा गुण उस साँप को शोभा देता है जो शक्तिशाली विषधर हो और जिससे सभी डरते हों। उसके लिए क्षमा का क्या महत्व जो निर्बल, दाँतों से रहित, विषरहित, विनम्र और सीधा-सादा हो। अर्थात् शक्तिशाली ही किसी को क्षमा कर सकता है। कमजोर के लिए इसका कोई महत्व नहीं है।

(ख) सच पूछो ……… तो शर में ही, जिसमें शक्ति विजय की।
उत्तर:
व्याख्या कवि कहता है कि वास्तव में शक्ति में ही विनय का प्रभाव दिखाई देता है। समझौते का आदेश उसी का माना जाता है जो जीतने की शक्ति रखता हो अर्थात् शक्तिशाली की ही बात को महत्व दिया जाता है।

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भाषा की बात

प्रश्न  1.
‘विषहीन’, ‘क्षमाशील’ की तरह ‘हीन’ एवं ‘शील’ जोड़कर दो-दो नए शब्द बनाइए।
उत्तर:
गुणहीन, बुद्धिहीन, कर्महीन सहनशील।

प्रश्न  2.
प्रस्तुत कविता को पढ़ने पर हमारे मन में उत्साह का भाव पैदा होता है। इसी प्रकार जब किसी रचना को पढ़ते हैं, तो हमें आनंद की अनुभूति होती है। इस प्रकार प्राप्त आनंद को साहित्य में रस कहते हैं।

पाठ से आगे

प्रश्न  1.
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहिं न प्रीति।। शिक्षक की सहायता से दोहे का अर्थ करते हुए पता कीजिए यह दोहा कहाँ से उद्धृत किया गया है ? इसी भाव की अन्य रचना को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर:
जब समुद्र को पार करने के लिए श्रीरामचंद्रजी सागर से तीन दिन तक विनती करते रहे और समुद्र ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया तब रामचंद्रजी ने क्रोध करके कहा कि बिना भय के प्रेम नहीं होता। ये पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के लंका कांड से ली गई हैं।

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प्रश्न  2.
यदि आप दुर्योधन के स्थान पर होते तो क्या करते ? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
यदि हम दुर्योधन के स्थान पर होते तो हठधर्मिता छोड़कर सत्य की ओर अग्रसर होते। हम जानते हैं कि असत्य और अन्याय के मार्ग पर चलकर विनाश के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होता है महाभारत का युद्ध इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

यह भी करें
सागर द्वारा श्री राम की सेना को रास्ता देने की कथा अपने अभिभावक अथवा गुरुजन से जानिए।

संकलन
दिनकर की अन्य कविताओं को भी पढ़कर संकलित कीजिए।
उत्तर:
संकेत-छात्र स्वयं करें।

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीराम ने रास्ता देने के लिए किससे अनुनय-विनय की?
(क) सूर्य से
(ख) समुद्र से
(ग) पर्वत से
(घ) हवा से।
उत्तर:
(ख) समुद्र से

प्रश्न 2.
क्षमाशील व्यक्ति को प्रायः लोग क्या समझते हैं ?
(क) कायर
(ख) वीर
(ग) बुद्धिमान
(घ) क्रूर।
उत्तर:
(क) कायर

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प्रश्न 3.
श्रीराम कितने दिन तक सागर से पंथ माँगते रहे ?
(क) दो
(ख) पाँच
(ग) तीन
(घ) एक।
उत्तर:
(ग) तीन

प्रश्न 4.
कौरवों ने कायर किसे समझा?
(क) कृष्ण को
(ख) प्रजा को
(ग) राजा को
(घ) पांडवों को।
उत्तर:
(घ) पांडवों को।

प्रश्न 5.
शक्ति और क्षमा कविता के रचयिता कौन हैं ?
(क) सियारामशरण गुप्त
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) रामावतार त्यागी।
उत्तर:
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’।

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सुमेलित कीजिए –
खण्ड ‘अ’ एवं खण्ड ‘ब’ में दी गई पंक्तियों का मिलान कीजिए –
खण्ड ‘अ’                             खण्ड ‘ब’
(क) क्षमा, दया, तप, – रघुपति सिन्धु किनारे त्याग, मनोबल
(ख) क्षमाशील हो – जिसके पास गरल हो। रिपु समक्ष
(ग) क्षमा शोभती उस भुजंग – तुम हुए विनत जितना को
(घ) तीन दिवस तक पंथ – सबका लिया सहारा। माँगते
उत्तर:
(क) सबका लिया सहारा।
(ख) तुम हुए विनत जितना ही।
(ग) जिसके पास गरल हो।
(घ) रघुपति सिंधु किनारे।

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कौरवों ने पांडवों को कायर क्यों समझा ?
उत्तर:
कौरवों ने पांडवों को कायर इसलिए समझा क्योंकि पांडवों ने क्षमा, दया, तप, त्याग आदि का सहारा लिया।

प्रश्न 2.
क्षमा किसको शोभा नहीं देती ?
उत्तर:
क्षमा कायर को शोभा नहीं देती।

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प्रश्न 3.
“सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि’ करता आ गिरा शरण में” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव-जब श्रीरामचंद्रजी ने अपना उग्र रूप दिखाया तो सागर मनुष्य का शरीर धर कर त्राहि-त्राहि करता हुआ उनके चरणों में आकर गिर गया।

प्रश्न 4.
“सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव- सहनशीलता, क्षमा और दया आदि गुणों को संसार तभी आदर देता है, जब इनके पीछे शक्ति का गर्व दिखाई देता है।

RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आशय-कौरवों ने पांडवों को कायर इसलिए समझा क्योंकि पांडव सदा उनके साथ क्षमाशीलता, दया, त्याग दिखाते थे। इसी से कौरव समझते थे कि पांडव इसलिए विनम्र होकर उनके पास आ रहे हैं क्योंकि वे कमजोर और शक्तिहीन हैं।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण ने पांडवों को क्या समझाया ?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने पांडवों को समझाया कि क्षमा, दया, तप आदि गुणों के कारण तुमने कौरवों से प्रेम की बात की किंतु कौरवों ने उसका मूल्य नहीं समझा और तुम लोगों को कमजोर समझकर युद्ध करने के लिए प्रेरित किया।

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प्रश्न 3.
दंतहीन भुजंग को क्षमाशीलता शोभा क्यों नहीं देती ?
उत्तर:
दंतहीन भुजंग को क्षमाशीलता इसलिए शोभा नहीं देती क्योंकि ऐसा भुजंग जिसके पास दाँत ही नहीं है तो वह किसी को क्या काटेगा। किसी को उसके काटने का भय नहीं रहता। ऐसी स्थिति में यदि वह क्षमा का प्रदर्शन करता है तो उसका कोई महत्व नहीं रहता।

प्रश्न 4.
श्रीरामचंद्र जी सिंधु से अनुनय-विनय क्यों करते रहे ?
उत्तर:
श्रीरामचंद्र जी सागर से अनुनय-विनय मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अपनी विनम्रता और शिष्टता के कारण करते रहे। वे समुद्र पर पुल बनाकर उसे पार करना चाहते थे इसलिए उन्होंने विनम्रतापूर्वक समुद्र से बार-बार आग्रह किया।

प्रश्न 5.
संधि का प्रस्ताव किसका आदरणीय होता है?
उत्तर:
उसी व्यक्ति के संधि के प्रस्ताव को आदर सहित स्वीकार किया जाता है जो विजयी होने की शक्ति रखता है। | जो व्यक्ति शक्तिशाली है उसके सामने सभी नतमस्तक होते | हैं। कमजोर का कोई आदर सम्मान नहीं करता।

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RBSE Class 8 Hindi शक्ति और क्षमा दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षमा शक्तिशाली को शोभा देती है। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्षमा शक्तिशाली को ही शोभा देती है यह कथन बिल्कुल सत्य है, क्योंकि क्षमा करने का अधिकार केवल शक्तिशाली व्यक्ति को ही है। जो व्यक्ति निर्बल, कमजोर और स्वयं दया का पात्र है वह भला किसी को क्या क्षमा करेगा। जैसे शक्तिशाली पांडव बार-बार कौरवों को क्षमा करते रहे। श्री रामचंद्र जी ने समद्र को उसकी उदंडता के लिए उसे क्षमा कर दिया। एक विषधर भुजंग जिससे सभी भयभीत होते हैं, यदि वह किसी के प्रति क्षमा भाव रखता है वह उसे शोभा देता है क्योंकि वह सामर्थ्यवान है। शक्तिशाली ही क्षमा कर सकता है। उदारता और क्षमाशीलता उसका गुण है।

प्रश्न 2.
श्री रामचंद्र जी द्वारा समुद्र से रास्ता माँगने पर समुद्र ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उत्तर:
श्री रामचंद्र जी द्वारा समुद्र से रास्ता माँगने पर पहले तो उसने अभिमानपूर्वक कोई जवाब नहीं दिया। उनकी विनम्रता के कारण वह उन्हें कमजोर, शक्तिहीन समझकर चुपचाप बैठा रहा, परंतु जब राम ने समुद्र की ऐसी धृष्टता देखी तो उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने समुद्र को सुखाने के लिए धनुष पर अग्निबाण चढ़ाया। राम को क्रोधित देखकर समुद्र भयभीत हो गया और बचाओ-बचाओ की आवाज लगाता हुआ उनकी शरण में आ गया। समुद्र, श्री रामचंद्र जी के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगने लगा। पहले जब श्री रामचंद्र जी विनम्रता से प्रार्थना कर रहे थे तो समुद्र ने उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया किंतु उनका उग्र रूप देखते ही समुद्र डरकर उनके सामने प्रकट हो गया और क्षमा माँगने लगा।

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केवल पढ़ने के लिए

नरेंद्र से विवेकानंद:
प्रख्यात अंग्रेज कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की एक प्रसिद्ध कविता है – एक्सकरशन। एक बार प्रोफेसर हेस्टी छात्रों के समक्ष इस कविता की व्याख्या कर रहे थे। ‘ट्रांस’ जैसे महत्त्वपूर्ण शब्द की व्याख्या करते समय प्रोफेसर साहब ने दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस का उल्लेख किया। इसी संदर्भ को आगे बढ़ा हुए प्रोफेसर साहब ने बताया कि श्री रामकृष्ण अक्सर’ ‘ट्रांच’ (समाधि) की स्थिति में आ जाते हैं।

‘ट्रांस’ एक प्रकार का आनंदमय आध्यात्मिक अनुभव है। इसी संदर्भ में यह जानना उचित होगा कि श्री रामकृष्ण ईश्वर की उपासना जगन्माता के रूप में करते थे। वे देवी की उपासना दक्षिणेश्वर में काली की मूर्ति के रूप में किया करते थे मूर्ति पूजा द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करने के उनके इस विचार ने मूर्ति-पूजा विरोधी आंदोलन को एक घातक आघात पहुँचाया।

इसके पूर्व भी नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण के विषय में सुन रखा था। इस संत के बारे में उनके अपने कुछ संदेह थे। लेकिन, जब उन्होंने प्रोफेसर हेस्टी से भी उनके विषय में सुना तो वे दक्षिणेश्वर के इस संत से भेंट करने को आतुर हो उठे। ऐसा कहा जाता है कि जाड़े की एक दोपहर में संभवतः 15 जनवरी, 1882 ई. रविवार को नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस से भेंट करने गए। श्री रामकृष्ण परमहंस से नरेंद्र की यह एक ऐतिहासिक भेंट थी।

यह उनके जीवन का एक नया मोड़ था; क्योंकि उसके बाद में नरेंद्र के जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ हुआ। उनका जीवन कुछ असामान्य कार्य के लिए ढालना था। कुछ अत्यधिक शक्तिशाली एवं गतिशील जीवन के लिए वह जीवन क्या था? वह था-नरेंद्रनाथ का स्वामी विवेकानंद में रूपांतरण। श्री रामकृष्ण की नरेंद्र से प्रथम भेट ही उनके लिए आनंदमय एवं रोमांचकारी थी।

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ऐसा प्रतीत हुआ कि श्री रामकृष्ण की एक सच्चे शिष्य की खोज ईश्वर द्वारा आज पूरी हो गई। ऐसा उन्होंने भावावेश में आकर घोषित किया ‘ओ मेरे प्यारे पुत्र ! मैं कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।’ श्री रामकृष्ण से उनकी इस ऐतिहासिक भेंट के बारे में हमें यह जानना चाहिए कि स्वयं नरेंद्र ने क्या कहा – “मैंने इस व्यक्ति के विषय में सुना और उनसे भेंट करने गया। वे देखने में बिल्कुल एक सामान्य व्यक्ति प्रतीत हुए जिनके विषय में कुछ उल्लेखनीय नहीं था।

उन्होंने सीधी सरल भाषा का प्रयोग किया। मैंने सोचा-क्या यह व्यक्ति एक महान गुरु हो सकता है? मैं उनके निकट बढ़ता गया और वही प्रश्न पूछा, जो मैं दूसरों से जीवनभर पूछता रहा था। – “श्रीमन् ! क्या आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं?” उत्तर | मिला-“हाँ।” “कैसे?” “क्योंकि मैं उसे देखता हूँ ठीक वैसे ही जैसे तुम्हें यहाँ देख रहा हूँ।” उनके इन उत्तरों ने मुझे तुरंत प्रभावित किया। यह प्रथम अवसर था, जब मैंने एक ऐसे व्यक्ति को पाया जो यह कहने का साहस रखता था कि उसने ईश्वर को देखा है।

पाठ-परिचय:
प्रस्तुत कविता में कवि ‘रामधारी सिंह दिनकर’ यह प्रेरणा देते हैं कि शत्रु से भयभीत होकर युद्ध में पीछे हटना कायरता है, क्षमाशीलता नहीं है। शक्तिसंपन्न होने पर ही क्षमाशीलता शोभा देती है। कवि कहना चाहता है कि क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल आदि मनुष्य के गुण हैं लेकिन शत्रु के सामने विनम्रता दिखाने से वह और अधिक उदंड हो जाता है। कवि का कहना है कि क्षमा करना उसी को शोभा देता है जो शक्तिशाली हो, जो स्वयं कमजोर तथा दया का पात्र हो उसके द्वारा किसी को क्षमा करने का कोई महत्व नहीं है।

कठिन शब्दार्थ:
नर व्याघ्र = बाव के समान शक्तिशाली मनुष्य। रिपु = शत्रु, दुश्मन। विनत होना = विनम्र होना, झुकना। समक्ष = सामने । नाद = ध्वनि, आवाज। सागर = समुद्र। अधीन = जिसमें धैर्य न हो। उठना = जलना। पौरुष = पुरुषत्व, बल, मर्दानगी। आग = अग्नि। सिन्धु = समुद्र । देह = शरीर । त्राहि-त्राहि = बचाओ-बचाओ। ग्रहण = प्राप्त करना। मूढ़ = मूर्ख। बंधन = बँध जाना। शर = बाण । दीप्ति = चमक। विनय = विनम्रता। संपूज्य = विशेष ‘पूजनीय, आदरणीय। संधि = समझौता। वचन = बोल। बल = शक्ति। दर्प = घमंड। भुजंग = सॉप, सर्प । अनुनय = विनती, विनयपूर्ण आग्रह।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ
1. क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल। सबका लिया सहारा, ……………. पर नर-व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा क्षमाशील हो रिपु समक्ष तुम हुए विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत पंद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिंदी’ के ‘शक्ति और क्षमा’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। इसमें पांडवों की समाशीलता की व्यर्थता बताई गई है।

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ज्याख्या / भावार्थ:
कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं कि शक्तिशाली पांडवों ने जब क्षमा, दया, तपस्या, त्याग, मन की शक्ति आदि सबका सहारा लिया तो उनके ये सभी गुण बेकार हो गए। विनम्र और क्षमाशील होकर जब वे शत्रु के सामने गए तो उन्होंने उनकी विनम्रता को नहीं समझा। पांडवों ने जितनी विनम्रता दिखाई दुष्ट कौरवों ने पांडवों को उतना अधिक कमजोर और कायर समझा। शक्तिशाली व्यक्ति को अपने मूर्ख एवं अहंकारी शत्रु के सामने विनम्रता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

2. क्षमा शोभती उस भुजंग को
                जिसके पास गरल हो,
उसको क्या, जो दंतहीन,
               विषरहित, विनीत, सरल हो।
तीन दिवस तक पंथ माँगते।
              रघुपति सिन्धु-किनारे, बैठे पढ़ते रहे छंद
अनुनय के प्यारे-प्यारे

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी के ‘शक्ति और क्षमा’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह दिनकर’ हैं। इसमें यह बताया गया है कि क्षमा उसी को शोभा देती है जो शक्तिशाली हो।

व्याख्या / भावार्थ:
कवि रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि क्षमा जैसा गुण उसी को शोभा देता है जो शक्तिशाली हो। ऐसा साँप जिसके पास विष है और सभी उससे डरते हों, उसी को क्षमा शोभा देती है। लेकिन जो साँप दाँत रहित है, विषहीन है, बड़ा नम्र है और सरल स्वभाव वाला है तो उसे कोई नहीं पूछता। श्री रामचंद्रजी समुद्र से रास्ता माँगने के लिए तीन दिन तक उनसे प्रार्थना करते रहे और उससे विनम्रतापूर्वक रास्ता माँगते रहे। लेकिन समुद्र ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

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3. उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से,
उठी अधीर धधक पौरुष से, आग राम के शर से।
सिंधु देह धर “त्राहि-त्राहि”करता आ गिरा शरण में,
चरण पूज, दासता ग्रहण की,बँधा मूढ़ बंधन में।

संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘शक्ति और क्षमा’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। इन पंक्तियों में शक्ति के सामने समर्पण की बात कही गई है।

व्याख्या / भावार्थ:
कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं कि जब रामचंद्रजी ने समुद्र से तीन दिन तक विनय की तो उसने उसका कोई जवाब नहीं दिया। इस पर क्रोधित होकर जब रामचंद्रजी ने समुद्र को सुखाने के लिए अग्निबाण का धनुष पर संधान किया तो समुद्र अपना जल रूप त्याग कर मानव देह धारण कर बचाओ-बचाओ की गुहार लगाता हुआ श्री रामचंद्रजी की शरण में आ गया। उसने सेवा करनी स्वीकार की और श्री रामचंद्रजी के समक्ष प्रार्थना करने लगा।

4. सच पूछो तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की,

            संधि-वचन संपूज्य उसी का,
            जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है,

           बल का दर्प चमकता
           उसके पीछे जब जगमग है।

संदर्भ तथा प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘शक्ति और क्षमा’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। इन पंक्तियों में शक्ति के महत्व को बताया गया है।

व्याख्या:
कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं कि वास्तव में विनम्रता की चमक बाण में ही बसती है। समझौता उसी का माना जाता है जिसमें विजय की शक्ति होती है, जो शक्तिशाली है। इस संसार में सहनशीलता, क्षमा, दया आदि गुणों का महत्व तभी होता है जब उसके पीछे शक्ति का गर्व दिखाई पड़ता है। इस संसार में शक्तिशाली को सम्मान मिलता है। शक्तिहीन का सभी तिरस्कार करते हैं।

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