RBSE Solutions for Class 7 Social Science Chapter 18 राजस्थान के राजवंश एवं मुगल

Rajasthan Board RBSE Class 7 Social Science Chapter 18 राजस्थान के राजवंश एवं मुगल

RBSE Solutions for Class 7 Social Science

RBSE Solutions for Class 7 Social Science Chapter 18 राजस्थान के राजवंश एवं मुगल

RBSE Class 7 Social Science राजस्थान के राजवंश एवं मुगल Intext Questions and Answers

गतिविधि

पृष्ठ संख्या  – 159

प्रश्न 1.
मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के जीवन चरित्र एवं उनके द्वारा निर्मित नौ – चौकी पर जानकारी संकलित कीजिए।
उत्तर:
महाराणा राजसिंह का जीवन:
चरित्र – महाराणा राजसिंह महाराणा जगतसिंह के पुत्र थे। जगतसिंह की मृत्यु के पश्चात् 1652 में राजसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। मुगल सम्राट शाहजहाँ ने उसे पाँच हजार जात और पाँच हजार सवार का मनसब प्रदान किया। राजसिंह ने दरीबा, माण्डल, बनेड़ा, शाहपुरा, जहाजपुर आदि मुगल थानों पर आक्रमण किया और उन्हें खूब लूटा। उसने टोडा, मालपुरा, टोंक, चाकसू और लालसोट पर भी धावे बोले और उन्हें खूब लूटा। जब औरंगजेब सम्राट बना, तो उसने राजसिंह को 6 हजार जात और 6 हजार सवार का पद प्रदान किया। राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति से विवाह किया।

राठौड़ – सिसोदिया गठबन्धन:
महाराणा राजसिंह औरंगजेब की धर्मान्धता की नीति से नाराज था। उसने औरंगजेब द्वारा 1679 में जजिया कर लगाने का विरोध किया और उसने मन्दिरों के ध्वस्त किये जाने का भी विरोध किया। अतः दुर्गादास के प्रयासों से मारवाड़ और मेवाड़ के मध्य राठौड़सिसोदिया गठबन्धन हुआ। महाराणा राजसिंह ने मुगलों के विरुद्ध राठौड़ों को सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। 1680 में देबारी में मुगलों तथा मेवाड़ की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। 1880 में राजसिंह की मृत्यु हो गई।

राजसिंह के लोक:
कल्याण के कार्य-महाराणा राजसिंह ने राजसमुद्र की झील का निर्माण करवाया। उसने सर्वऋतु विलास तथा जनसागर का भी निर्माण करवाया। राजसमुद्र जलाशय वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। वह बाँध लगभग तीन मील लम्बा और डेढ़ मील चौड़ा है। मध्य में तोरण द्वार बना हुआ है।

नौ – चौकी:
राजसमुद्र नामक झील के दोनों ओर किनारों पर दो पहाड़ियाँ इस प्रकार आ गई हैं कि जिसको 200 गज लम्बे व 70 गज चौड़े बाँध के द्वारा बाँधकर एक ‘सुदृढ़ बाँध तैयार किया गया है। इस बाँध को नौ-चौकी कहते हैं। इसे नौ-चौकी इसलिए कहते हैं कि इस बाँध के नीचे वाले तीन बड़े चबूतरों पर तीन-तीन छतरियों वाले मण्डप बने हुए हैं, जिनका योग १ होता है। इन मण्डपों का ढाँचा. वैसा ही है जैसा किसी समाधि-छत्रों, या गरुड़ या नन्दी की. छत्री का होता है।

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक व दो के सही उत्तर: कोष्ठक में लिखिए –
(i) महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम था ………………
(अ) लीलण
(ब) चेतक
(स) केसर
(द) ऐटक
उत्तर:
(ब) चेतक

(ii) सेना का हरावल दस्ता होता है
(अ) सेना का अग्रिम भाग
(ब) सेना के मध्य का भाग
(स) सेना के पीछे का भाग
(द) सम्पूर्ण सेना।
उत्तर:
(अ) सेना का अग्रिम भाग

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प्रश्न 2.
महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व की विशेषताएँ –
1. योद्धा व जननायक – महाराणा प्रताप श्रेष्ठ योद्धा और सच्चे जननायक थे। सभी धर्मों के लोग मातृभूमि के स्वाधीनता संघर्ष में प्रताप के साथ थे।

2. राष्ट्र प्रेमी-वे अपने देश की स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता के लिए जीवनपर्यन्त संघर्षरत रहे।

3. नारी के प्रति सम्मान – वे नारी का पूर्ण सम्मान करते थे। नारी सुरक्षा व संरक्षण के लिए उन्होंने कई प्रयास किए। नके प्रयासों की बदौलत मेवाड़ को भविष्य में जौहर जैसी त्रासदी नहीं झेलनी पड़ी। उन्होंने कैद की गई मुगल स्त्रियों को सुरक्षित लौटाकर नारी सम्मान का पाठ पढ़ाया।

4. पर्यावरण सुरक्षा के प्रति सजग – उन्होंने पर्यावरण सुरक्षा को प्रत्येक शासक और नागरिक के कर्तव्य के रूप में परिभाषित किया।

5. कला प्रेमी – महाराणा प्रताप ने संगीत, मूर्तिकला व चित्रकला को संरक्षण दिया।

6. साहित्य व संस्कृति के प्रति सम्मान – उन्होंने विद्वानों और दूरदर्शी लोगों को संरक्षण दिया तथा भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान उनका निरन्तर बना रहा।

7. सर्व धर्म समभाव व सहिष्णुता के परिचायक – वे सभी धर्मों का समान आदर करते थे तथा सहिष्णुता के मूल्य में विश्वास करते थे। वे नीतिगत आदर्शों का पालन करने वाले व्यक्ति थे तथा मानवाधिकारों की सुरक्षा के प्रति सजग थे।

प्रश्न 3.
विक्रमादित्य के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला राजा कौन था?
उत्तर:
विक्रमादित्य के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला राजा हेमचन्द्र (हेमू) था।

प्रश्न 4.
महाराजा सूरजमल ने राजस्थान के किस शहर की स्थापना की थी?
उत्तर:
महाराजा सूरजमल ने राजस्थान के भरतपुर शहर की स्थापना की थी।

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प्रश्न 5.
दुर्गादास राठौड़ का अन्तिम समय कहाँ व्यतीत हुआ?
उत्तर:
दुर्गादास राठौड़ का अन्तिम समय उज्जैन (मध्य प्रदेश) में व्यतीत हुआ। वहीं 22 नवम्बर, 1718 को उसका देहान्त हो गया।

प्रश्न 6.
महाराणा प्रताप को अधीन करने के लिए अकबर के कूटनीतिक प्रयासों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
महाराणा प्रताप को अधीन करने के लिए अकबर ने निम्नलिखित चार कूटनीतिक प्रयास किये –

  1. सर्वप्रथम 1572 ई. में अकबर ने जलाल खाँ को महाराणा प्रताप के पास भेजा, परन्तु उसे अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।
  2. इसके बाद अप्रैल, 1573 में अकबर ने मानसिंह को प्रताप के पास भेजा, परन्तु प्रताप ने मुगलों की अधीनता मानने से इन्कार कर दिया।
  3. सितम्बर – अक्टूबर, 1573 में अकबर ने राजा भगवन्तदास को मेवाड़ भेजा, परन्तु उसे भी अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।
  4. दिसम्बर, 1573 में अकबर ने राजा टोडरमल को राणा प्रताप के पास भेजा, परन्तु प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से
  5. इन्कार कर दिया। इस प्रकार महाराणा प्रताप ने अकबर के समस्त कूटनीतिक प्रयासों को विफल कर दिया।

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प्रश्न 7.
दुर्गादास राठौड़ ने किस प्रकार मारवाड़ के उत्तर:ाधिकारी अजीतसिंह की रक्षा की?
उत्तर:
दुर्गादास द्वारा अजीत सिंह की रक्षा:
28 नवम्बर, 1678 को जोधपुर के शासक जसवन्त सिंह की मृत्यु हो गई। 19 फरवरी, 1679 को जसवन्त सिंह की दो रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया। एक पुत्र दलथम्भन की कुछ समय बाद मृत्यु हो गई तथा दूसरे पुत्र का नाम अजीतसिंह था। औरंगजेब के आदेश से जसवन्त सिंह की दो रानियों तथा अजीत सिंह को दिल्ली लाया गया। राठौड़ सरदारों ने औरंगजेब से प्रार्थना की कि अजीत सिंह को मारवाड़ का शासक घोषित किया जाए।

परन्तु औरंगजेब ने अजीतसिंह द्वारा इस्लाम धर्म ग्रहण करने की शर्त पर उसे मारवाड़ का शासक बनाने का आश्वासन दिया। दुर्गादास तथा अन्य राठौड़ सरदार इस अपमानजनक शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं थे, दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह तथा रानियों को दिल्ली से निकालकर मारवाड़ की ओर प्रस्थान किया। उसने पीछा करती हुई मुगल सेना का भी मुकाबला किया।

राठौड़ – मुगल संघर्ष:
दुर्गादास राठौड़ अजीत सिंह को लेकर 23 जुलाई, 1679 को मारवाड़ के सालावास गाँव पहुंचा। जहाँ से अजीत सिंह को सिरोही भेज दिया गया। सिरोही सजाव आल इन वन के महाराव वैरीसाल सिंह की देख – रेख में कालन्द्री गाँव के ब्राह्मण जयदेव की पत्नी ने उनका पालन – पोषण किया। अजीतसिंह के मारवाड़ आने की सूचना पाकर राठौड़ दुर्गादास के नेतृत्व में संगठित होने लगे। उन्होंने मुगल फौजदार को जोधपुर से खदेड़कर नगर पर अधिकार कर लिया।

इस पर औरंगजेब ने जोधपुर पर अधिकार करने के लिए एक विशाल सेना भेजी तथा स्वयं अजमेर पहुँच गया। राठौड़ों ने अब छापामार पद्धति से मुगलों का प्रतिरोध करना शुरू कर दिया। राठौड़ – सिसोदिया गठबंधन – दुर्गादास ने संघर्ष बढ़ता देखकर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से अजीत सिंह को आश्रय देने की प्रार्थना की। महाराणा ने इसे स्वीकार कर लिया। महाराणा ने राठौड़ों को पूर्ण सहायता देने का आश्वासन भी दिया। दूसरी ओर दुर्गादास के प्रोत्साहन पर औरंगजेब के पुत्र अकबर ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। दुर्गादास के प्रयासों से मारवाड़ और मेवाड़ के बीच राठौड़-सिसोदिया गठबन्धन हुआ। यह दुर्गादास का एक महान कार्य था।

मेवाड़ के महाराणा ने बालक अजीत सिंह को मेवाड़ में आश्रय देने और औरंगजेब की नीतियों का विरोध करना स्वीकार कर लिया। मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब द्वारा मन्दिरों को ध्वस्त करने तथा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाने का विरोध किया। इस कारण 1680 में देबारी में मेवाड़ और औरंगजेब की सेना के बीच युद्ध हुआ। दुर्गादास अकबर को लेकर मराठों की सहायता लेने दक्षिण चला गया। जोधपुर पर अजीत सिंह का अधिकार-दुर्गादास का मराठा सहयोग प्राप्त करना उसकी एक बड़ी कूटनीतिक विजय थी। अतः औरंगजेब को दक्षिण की ओर जाना पड़ा। इससे मारवाड़ पर मुगल सैनिक दबाव कम हो गया। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। इस स्थिति का लाभ उठा कर अजीत सिंह ने मारवाड़ पर अधिकार कर लिया।

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प्रश्न 8.
हल्दीघाटी के युद्ध पर निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
हल्दीघाटी के युद्ध के कारण –

  1. महाराणा प्रताप मुगलों की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
  2. अकबर एक महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह मेवाड़राज्य पर भी अपना अधिकार स्थापित करना चाहता था।
  3. महाराणा प्रताप मेवाड़ – राज्य की स्वाधीनता को बनाए रखना चाहता था।
  4. अकबर ने कूटनीतिक प्रयासों से महाराणा प्रताप को अपने अधीन करने का प्रयास किया परन्तु उसे अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।

हल्दीघाटी के युद्ध की घटनाएँ:
युद्ध को अवश्यम्भावी जानकर महाराणा प्रताप ने युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी थी। अतः जनता युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार थी। दूसरी ओर अकबर ने मानसिंह को प्रधान सेनानायक बना कर प्रताप के विरुद्ध भेज दिया। उसकी सेना में लगभग 5 हजार सैनिक थे। राणा प्रताप भी अपनी सेना लेकर चल पड़े। 18 जून, 1576 को प्रातः हल्दीघाटी के मैदानों में युद्ध शुरू हुआ। महाराणा प्रताप की सेना के सेनापति रावल किशनदास, भीमसिंह डोडिया, रामदास मेड़तिया, रामशाह तँवर, झाला मान, झाला बीदा, मानसिंह सोनगरा आदि थे।

हरावल दस्ते में चूण्डावतों के साथ अग्रिम पंक्ति में हकीम खाँ-सूर भी थे। प्रताप के चंदावल दस्ते में पुरोहित गोपीनाथ, जयमल मेहता, चारण जैसा आदि तथा मध्य भाग के बांयी ओर भामाशाह व अन्य सैनिक थे। चंदावल में ही घाटी के मुहानों पर राणा पूंजा के नेतृत्व में भील लोग तीर कमान के साथ मौजूद थे। हरावल दस्ते ने ही सर्वप्रथम मुगल सेना पर आक्रमण किया जिससे मुगल सेना पूर्ण रूप से अस्त-व्यस्त हो गई। इसके बाद प्रताप ने भी मुगल सेना पर धावा बोल दिया। बदायूँनी ने लिखा है कि मेवाड़ी सेना के आक्रमण का वेग इतना तीव्र था कि मुगल सैनिकों ने बनास के दूसरे किनारे से 10-15 किलोमीटर भाम कर अपनी जान बचाई। अब राणा प्रताप ने अपने चेतक घोड़े को छलाँग लगवा कर हाथी पर सवार मानसिंह पर अपने भाले से वार किया परन्तु मानसिंह बच गया। उसका हाथी मानसिंह को लेकर भाग गया।

इस घटना में चेतक की एक टांग कट गई और मुगल सैनिकों ने राणा प्रताप को चारों ओर से घेर लिया। परन्तु प्रताप ने सन्तुलन बनाए रखा और मुगल सैनिक बहलोल खाँ के वार को असफल कर दिया। बहलोल खान तथा उसके घोड़े के दो फाड़ हो गए। इस दृश्य को देखकर मुगल सेना में हड़कम्प मच गया। अब प्रताप ने युद्ध को मैदान की बजाय पहाड़ों में मोड़ दिया। प्रताप की सेना के दोनों भाग पहाड़ों की ओर मुड़े और अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गए। झाला मान ने अपने प्राण देकर भी मुगल सेना को रोके रखा। इस युद्ध में मुगल सैनिकों में प्रताप की सेना का पीछा करने का साहस खत्म हो गया था।

हल्दीघाटी के युद्ध के परिणाम:
1. मुगलों की पराजय – भारत में पहली बार मुगल सेना को राणा प्रताप से करारी हार का सामना करना पड़ा। मेवाड़ की इस विजय ने प्रताप के नेतृत्व के प्रति जनमानस में विश्वास दृढ़ किया। इस युद्ध ने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ दिया। अब राणा प्रताप वीर शिरोमणि के रूप में स्थापित हो गए।

2. मुगल सेना की शोचनीय दशां – मुगल सेना का मनोबल टूट गया। गोगुन्दा में मुगल सेना की हालत बन्दी जैसी हो गई। दृढ़ नाकेबन्दी के कारण खाद्य व अन्य मुगल छावनियों में न पहुँच सकी और मुगल सैनिक तथा जानवरों को भूखों मरने की नौबत आ गई। निराश होकर मुगल सेना गोगुन्दा खाली कर अकबर के दरबार में लौट गई।

3. अकबर के उद्देश्यों का पूरा न होना – अकबर न तो महाराणा प्रताप को बन्दी बना सका और न ही मेवाड़ को अपने अधीन कर सका।

4. युद्ध के परिणामों से असन्तुष्ट होना – अकबर युद्ध के परिणामों से सन्तुष्ट नहीं हुआ। इसी कारण उसने कुछ समय के लिए मानसिंह तथा आसफ खाँ को दरबार में आने से रोक दिया।

5. युद्ध नीति में परिवर्तन – हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने खुले युद्ध की बजाय अगले पाँच वर्ष तक छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया। अकबर ने तीन बार शाहबाज खाँ को महाराणा प्रताप के विरुद्ध भेजा, परन्तु उसे असफल होकर लौटना पड़ा।

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प्रश्न 9.
अमरसिंह राठौड़ का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
अमरसिंह राठौड़ का चरित्र चित्रण –
1. साहसी, स्वाभिमानी तथा त्यागी – अमरसिंह जोधपुर के शासक गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था। वह एक पराक्रमी, |साहसी एवं स्वाभिमानी व्यक्ति था। वह कुशाग्र बुद्धि, चंचल स्वभाव तथा स्वाभिमान से परिपूर्ण था। गजसिंह ने अपने जीवन काल में ही अपने छोटे पुत्र जसवन्तसिंह को अपना उत्तरधिकारी बना दिया। अमरसिंह ने इस निर्णय का विरोध नहीं किया। इस घटना से अमरसिंह नाराज होकर शाहजहाँ के दरबार में चला गया। शाहजहाँ ने अमरसिंह को उच्च मनसब, राव की पदवी दी तथा नागौर का परगना दिया।

2. पराक्रमी, वीर तथा योग्य – अमरसिंह की वीरता, सूझबूझ और योग्यता से शाहजहाँ परिचित था। अतः वह अनेक कठिन अभियानों में अमरसिंह को भेजता रहता था। उसे जुझार सिंह बुन्देला, कांगड़ा के राजा जगतसिंह, ईरान के शाह सफी आदि के विरुद्ध भेजा गया।

3. स्वाभिमानी व्यक्तियों का सम्मान करना – अमर सिंह स्वाभिमानी व्यक्तियों का विशेष ध्यान रखता था। जब शाहजहाँ ने केसरी सिंह जोधा का मनसब जब्त कर लिया, तो अमर सिंह ने बादशाह की नाराजगी की चिन्ता किये बिना 30 हजार का पट्टा तथा नागौर की सुरक्षा का उत्तर:दायित्व केसरी सिंह को सौंपा। इस प्रकार अमर सिंह ने केसरी सिंह जोधा के सम्मान की रक्षा की।

4. अपने स्वाभिमान की रक्षा करना – कुछ घटनाओं के कारण अमरसिंह ने मुगल कोष में जमा कराए जाने वाले कर को देने से इन्कार कर दिया।

5. पराक्रमी तथा निडर – सलाबत खाँ अमरसिंह का विरोधी मनसबदार था। वह अमरसिंह राठौड़ के विरुद्ध शाहजहाँ के कान भरा करता था। जब सलाबत खाँ ने मानसिंह को अपमानजनक शब्द कहे तो अमरसिंह राठौड़ ने भरे दरबार में सलाबत खाँ की हत्या कर दी। भयग्रस्त बादशाह भाग कर अपनी जान बचा पाया। मुगल दरबार में अमरसिंह जब अकेला था, मुगल मनसबदार द्वारा धोखे से मार दिया गया। अमरसिंह राठौड़ अपने शौर्य, स्वाभिमान तथा त्याग का प्रतीक माना जाता है।

RBSE Class 7 Social Science राजस्थान के राजवंश एवं मुगल Important Questions and Answers

वस्तनिष्ठ प्रश्न

Question 1.
महाराणा प्रताप का राज्यारोहण हुआ ………………..
(अ) उदयपुर
(ब) चित्तौड़गढ़
(स) माण्डलगढ़
(द) गोगुन्दा
उत्तर:
(द) गोगुन्दा

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Question 2.
हेमचन्द्र किसके नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा ………………..
(अ) सूर्यदेव
(ब) विक्रमादित्य
(स) आदित्य
(द) परम गुरु
उत्तर:
(ब) विक्रमादित्य

Question 3.
महाराणा प्रताप के हरावल दस्ते में थे ………………..
(अ) जयमल
(ब) गोपीनाथ
(स) अजमल
(द) हकीम खाँ सूर
उत्तर:
(द) हकीम खाँ सूर

Question 4.
किस युद्ध में राणा प्रताप की निर्णायक विजय हुई?
(अ) गोगुन्दा
(ब) कुम्भलगढ़
(स) दिवेर
(द) उदयपुर
उत्तर:
(स) दिवेर

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Question 5.
राणा प्रताप ने किसे अपनी नई राजधानी बनाया?
(अ) उदयपुर
(ब) चावण्ड
(स) राजसमन्द
(द) चित्तौड़
उत्तर:
(ब) चावण्ड

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. हल्दीघाटी के युद्ध के परिणामों से निराश होकर अकबर ने ………………. के मगुल दरबार में उपस्थित होने पर रोक लगा दी थी।
  2. दिवेर के युद्ध में राणा प्रताप ने मुगल सेनानायक ……………….. को मार डाला।
  3. ………………. को चावण्ड में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई।
  4. प्रताप के संरक्षण में लिखी गई ………………. पुस्तक भारतीय शासकों के लिए आदर्श बनी।
  5. महाराणा प्रताप ने ……………….. को जन्म दिया।

उत्तर:

  1. मानसिंह तथा आसफ खाँ
  2. सुल्तान खाँ
  3. 19 जनवरी, 1597 ई.
  4. राज्याभिषेक पद्धति
  5. चावण्ड चित्रशैली

निम्नलिखित प्रश्नों में सत्य अथवा असत्य कथन बताइये

  1. महाराणा प्रताप का 32 वर्ष की आयु में उदयपुर में राज्यारोहण हुआ।
  2. राणा प्रताप के घोड़ा चेतक का पिछला पैर जख्मी हो गया।
  3. भारत में पहली बार मुगल सेना को राणा प्रताप से करारी हार का सामना करना पड़ा।
  4. अकबर ने प्रताप के दमन के लिए पाँच बार शाहबाज खाँ को भेजा।
  5. सलाबत खाँ ने आवेश में आकर मानसिंह राठौड़ की हत्या कर दी।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य

स्तंभ ‘अ’ को स्तंभ ‘ब’ से सुमेलित करें

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उत्तर:
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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हेमू (हेमचन्द्र) कौन था?
उत्तर:
हेमू (हेमचन्द्र) रिवाड़ी (हरियाणा) का हिन्दू व्यापारी था जो विक्रमादित्य के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

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प्रश्न 2.
प्रताप का राज्यारोहण कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में महाराणा प्रताप का राज्यारोहण हुआ था।

प्रश्न 3.
महाराणा प्रताप का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुम्भलगढ़ में हुआ।

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प्रश्न 4.
हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ और किस किसके बीच हुआ?
उत्तर:
18 जून, 1576 को महाराणा प्रताप तथा मुगलों के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ।

प्रश्न 5.
दिवेर का युद्ध कब हुआ?
उत्तर:
अक्टूबर, 1582 में दिवेर का युद्ध महाराणा प्रताप तथा मुगलों के बीच हुआ। इसमें दिवेर का मुगल सेनानायक सुल्तान खाँ मारा गया।

प्रश्न 6.
महाराणा प्रताप ने किसे अपनी नई राजधानी बनाया?
उत्तर:
महाराणा प्रताप ने चावण्ड को अपनी नई राजधानी बनाया।

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प्रश्न 7.
अमरसिंह राठौड़ कौन था?
उत्तर:
अमरसिंह राठौड़ जोधपुर के शासक गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था।

प्रश्न 8.
अमरसिंह राठौड़ ने किस मुगल सेनानायक का भरे दरबार में वध कर दिया था और क्यों?
उत्तर:
मुगल सेनानायक सलाबत खाँ द्वारा अपशब्द कहने पर अमरसिंह राठौड़ ने सलाबत खाँ का वध कर दिया था।

प्रश्न 9.
दुर्गादास राठौड़ का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
दुर्गादास राठौड़ का जन्म 13 अगस्त, 1638 को मारवाड़ के सालवा नामक ग्राम में हुआ था।

प्रश्न 10.
औरंगजेब के चंगुल से किसे बचाकर दुर्गादास राठौड़ दिल्ली से मारवाड़ लाया था?
उत्तर:
औरंगजेब के चंगुल से जसवन्त सिंह के पुत्र अजीत सिंह को बचाकर दिल्ली से मारवाड़ लाया था।

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प्रश्न 11.
दुर्गादास के प्रयासों से किस गठबन्धन का निर्माण हुआ?
उत्तर:
राठौड़-सिसोदिया गठबन्धन।

प्रश्न 12.
राणा प्रताप के दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार कौन थे?
उत्तर:
निसारुद्दीन।

प्रश्न 13.
औरंगजेब के किस पुत्र ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया?
उत्तर:
औरंगजेब के पुत्र अकबर ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया।

प्रश्न 14.
महाराजा सूरजमल कौन थे?
उत्तर:
महाराजा सूरजमल भरतपुर के लोकप्रिय शासक थे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हल्दीघाटी युद्ध के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. महाराणा प्रताप अकबर की अधीनता मानने को तैयार नहीं था।
  2. अकबर एक महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह मेवाड़राज्य पर भी अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता था।
  3. प्रताप ने अकबर-विरोधी नीति अपनाकर उसे नाराज कर दिया था।
  4. अकबर ने कूटनीतिक प्रयासों से महाराणा प्रताप को अपने अधीन करने का प्रयास किया, परन्तु उसे अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।

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प्रश्न 2.
हल्दीघाटी के युद्ध के क्या परिणाम हए?
उत्तर:

  1. हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना को राणा प्रताप से करारी हार का सामना करना पड़ा।
  2. गोगुन्दा में मुगल सेना की हालत बन्दी जैसी हो गई। मुगल सेना का मनोबल टूट गया।
  3. अकबर युद्ध के परिणामों से सन्तुष्ट नहीं हुआ। इसी कारण उसने कुछ समय के लिए मानसिंह तथा आसफ खाँ को मुगल दरबार में आने से रोक दिया।
  4. हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा प्रताप ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया।
  5. राणा प्रताप ने आक्रामक नीति अपनाई और मुगल थानों पर धावे बोलने शुरू कर दिए। उसने उदयपुर, गोगुन्दा, मोही, माण्डल, कुम्भलगढ़, पिण्डवाड़ा आदि पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 3.
राणा प्रताप को महान् क्यों कहा जाता है?
उत्तर:

  1. महाराणा प्रताप ने अपने देश की स्वतन्त्रता तथा सार्वभौमिकता के लिए मुगलों के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
  2. राणा प्रताप ने विविध क्षेत्रों में योगदान दिया। उन्होंने साहित्य तथा कला की उन्नति को प्रोत्साहन दिया।
  3. राष्ट्र प्रेम, सर्वधर्म सद्भाव, सहिष्णुता, करुणा, स्वाधीनता के लिए युद्ध, नीतिगत आदर्शों की पालना, मानवाधिकारों की सुरक्षा, नारी – सम्मान आदि मूल्य तथा साहित्य एवं संस्कृति के प्रति सम्मान महाराणा प्रताप की महानता के परिचायक हैं।

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प्रश्न 4.
महाराणा प्रताप के कला प्रेम का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
महाराणा प्रताप कला प्रेमी भी था। उसने संगीतकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला को संरक्षण दिया। यथाचित्रकला प्रेम-उसने अनेक चित्रकारों को राज्याश्रय प्रदान किया। उसने चावण्ड को चित्रकला का केन्द्र बनाकर नई चित्र शैली का प्रचलन किया। उसने निसारुद्दीन जैसे प्रसिद्ध चित्रकार से छह राग और छत्तीस रागनियों के ध्यान चित्र बनवाकर चावण्ड चित्र शैली को जन्म दिया। रागमाला श्रृंखला के ये चित्र अन्य कई क्षेत्रों के चित्रकारों के लिए अनुकरणीय बने।

अनेक रागमालाएँ चित्र तैयार हुईं, जो आज तक भारतीय चित्रकला की निधि मानी जाती हैं। वास्तुकला प्रेम-महाराणा प्रताप ने अपनी राजधानी चावण्ड में अनेक राजप्रासादों का निर्माण करवाया। इन राजप्रासादों का निर्माण कर प्रताप ने अपनी राजधानी चावण्ड को आकर्षक रूप प्रदान किया। इन राजप्रासादों के निकट चामुण्डा देवी का मन्दिर है जो युद्ध के समय प्रेरणा देने के लिए था।

प्रश्न 5.
“अमरसिंह राठौड़ एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे।” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. अमरसिंह राठौड़, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहते थे। जब शाहजहाँ ने केसरी सिंह जोधा का मनसब जब्त कर लिया, तो अमरसिंह राठौड़ ने बादशाह की नाराजगी की परवाह किये बगैर 30 हजार का पट्टा तथा नागौर की सुरक्षा का उत्तरदायित्व केसरीसिंह जोधा को सौंप दिया। इस प्रकार अमरसिंह ने केसरीसिंह जोधा के स्वाभिमान की रक्षा की।

2. अमरसिंह ने अपने स्वाभिमान पर भी कभी आँच नहीं आने दी। जब अमरसिंह के विरोधी मनसबदार सलाबत खाँ ने अमरसिंह को अपशब्द कहे, तो अमरसिंह ने उस पर धावा बोल कर उसका वध कर दिया।

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प्रश्न 6.
राठौड़ – सिसोदिया गठबन्धन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
औरंगजेब मारवाड़ के राठौड़ों की शक्ति को कुचलने के लिए कटिबद्ध था। मारवाड़ के सीमित साधनों को देखते हुए दुर्गादास राठौड़ ने मेवाड़ के शासक महाराणा राजसिंह से मुगलों के विरुद्ध सहायता देने की प्रार्थना की। महाराणा राजसिंह भी औरंगजेब की हिन्दू-विरोधी नीति से नाराज था। औरंगजेब ने 1679 में हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया था जिससे राजसिंह नाराज था। औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं के मन्दिर तोड़े जाने से भी राजसिंह नाराज था। अतः उसने राठौड़ों की सहायता करने का निश्चय कर लिया। इस प्रकार दुर्गादास राठौड़ के प्रयासों से मारवाड़ और मेवाड़ के मध्य राठौड़-सिसोदिया गठबन्धन हुआ।

प्रश्न 7.
महाराजा सूरजमल की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महाराजा सूरजमल की उपलब्धियाँ-महाराजा सूरजमल भरतपुर का एक लोकप्रिय शासक था। वह बदन सिंह का पुत्र था। सूरजमल ने भरतपुर शहर की स्थापना की। सूरजमल की प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं –

  1. जयपुर के शासक सवाई जयसिंह की मृत्यु के पश्चात् हए उत्तराधिकार के युद्ध में सूरजमल के सहयोग से ईश्वरी सिंह विजयी हुआ और जयपुर का शासक बना।
  2. मई, 1753 में सूरजमल ने फिरोजशाह कोटला पर अधिकार कर लिया।
  3. मराठों ने जनवरी, 1754 से मई, 1754 तक भरतपुर के कुम्हेर के किले को घेरे रखा परन्तु वे इस किले पर अधिकार नहीं कर सके और उन्हें सन्धि करनी पड़ी।
  4. 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित होने के बाद शेष मराठा सैनिकों के खाने – पीने, चिकित्सा एवं वस्त्रों की व्यवस्था महाराजा सूरजमल ने की थी।
  5. सूरजमल ने अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में किले व महल बनवाए, जिनमें प्रसिद्ध लोहागढ़ किला भी शामिल है।
  6. मराठों के पतन के पश्चात् सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर, आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, बनारस, फर्रुखनगर आदि प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 25 दिसम्बर, 1763 को महाराजा सूरजमल का देहान्त हो गया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“महाराणा प्रताप महान् थे।” व्याख्या कीजिए।
अथवा
महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
महाराणा प्रताप महान शासक महाराणा प्रताप एक महान् शासक थे। उनकी महानता के आधार पर उनके व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं –
1. वीर योद्धा और सच्चे जननायक-महाराणा प्रताप एक वीर योद्धा और सच्चे जननायक थे। उन्होंने अपने सीमित साधनों के होते हुए भी शक्तिशाली मुगलों का दीर्घकाल तक मुकाबला किया और अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अपने देश की स्वतन्त्रता तथा सार्वभौमिकता के लिए निरन्तर संघर्ष और उनका विविध क्षेत्रों में योगदान उन्हें महान् सिद्ध करता है।

2. वीरों के उत्तराधिकारियों के प्रति स्नेह-वीरों के। उत्तराधिकारियों को राणा प्रताप ने पिता की भाँति स्नेह दिया और उनके पुनर्वास के लिए अपूर्व प्रयास कर मानवाधिकारों के संरक्षण का आदर्श स्थापित किया।

3. नारी – सुरक्षा के प्रबल समर्थक-महाराणा प्रताप ने नारी-सुरक्षा और संरक्षण के अनेक प्रयास किए। उन्होंने बन्दी बनाई गई मुगल स्त्रियों को सुरक्षित लौटा कर नारियों के प्रति सम्मान प्रकट किया।

4. पर्यावरण की सुरक्षा – प्रताप ने पर्यावरण सुरक्षा पर भी बल दिया। उनका यह योगदान वैश्विक दृष्टि का परिचायक है। उन्होंने विश्ववल्लभ नामक ‘वृक्षायुर्विज्ञान’ नामक ग्रन्थ लिखाया।

5. विद्वानों और कलाकारों को संरक्षण – राणा प्रताप ने विद्वानों और कलाकारों को संरक्षण दिया। इनमें संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान पण्डित चक्रपाणि मिश्र प्रमुख थे। राणा प्रताप के संरक्षण में रचित ‘राज्याभिषेक पद्धति’ नामक पुस्तक भारतीय शासकों के लिए आदर्श बनी।

6. कला को संरक्षण प्रदान किया – महाराणा प्रताप कलाप्रेमी थे। उन्होंने संगीत, मूर्तिकला तथा चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने अपने दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार निसारदी से 6 राग और 36 रागनियों के ध्यान चित्र बनवाकर ‘चावण्ड चित्र शैली’ को जन्म दिया। रागमाला श्रृंखला के ये चित्र अन्य कई क्षेत्रों के चित्रकारों के लिए अनुकरणीय थे।

7. खदानों को सुरक्षा प्रदान करना – राणा प्रताप ने देश की समृद्धि को बनाए रखने के लिए धातुओं की खदानों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया।

8. धार्मिक सहिष्णुता के प्रबल समर्थक – राणा प्रताप धर्म-सहिष्णु व्यक्ति थे। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। जनजातियों के मुखिया, प्रताप के नेतृत्व में अपूर्व विश्वा करते थे। उदयपुर के निकट हरिहर जैसा मन्दिर उनके काल में शैव और वैष्णव धर्म की एकता का प्रतीक है।

निष्कर्ष:
इस प्रकार राष्ट्र – प्रेम, सर्वधर्म सद्भाव, सहिष्णुता, करुणा, स्वाधीनता के लिए सतत संघर्ष, नीतिगत आदर्शों की पालना, मानवाधिकारों की सुरक्षा, नारी सम्मान, पर्यावरण और जल संरक्षण तथा सर्व सामान्य का सम्मान जैसे मूल्य तथा साहित्य व संस्कृति के प्रति सम्मान राणा प्रताप की महानता के परिचायक हैं। प्रताप एक महान व्यक्तित्व के धनी थे। वे जन-जन में लोकप्रिय हो गए। समकालीन भारतीय शासकों में उनके समकक्ष कोई नहीं था।

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