RBSE Solutions for Class 7 Hindi Chapter 9 केवट का प्रेम

RBSE Solutions for Class 7 Hindi

Rajasthan Board RBSE Class 7 Hindi Chapter 9 केवट का प्रेम (कविता)

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पाठ से

सोचें और बताएँ –

प्रश्न 1.
श्रीराम की पैरों की धूल का क्या प्रभाव था?
उत्तर:
श्रीराम की पैरों की धूल का यह प्रभाव था कि उसके स्पर्श से पत्थर की शिला बनी अहल्या का उद्धार हो गया था। अर्थात् उस धूल का विशेष प्रभाव था। या श्रीराम, साता एव लक्ष्मण को नाव से गगा-पार ल गया।।

प्रश्न 2.
केवट श्रीराम को बिना पैर धोए नाव पर क्यों नहीं बैठाना चाहता था?
उत्तर:
केवट श्रीराम के चरणों का महत्त्व जानता था। वह अपना व अपने परिवार एवं पूर्वजों का उद्धार करना चाहता था। इसी से उसने बिना पैर धोए नाव पर न बिठाने का बहाना बनाया।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पाठ तुलसीदास के किस ग्रन्थ से लिया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ से लिया गया है।

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प्रश्न 2.
यह पाठ कौन-सी भाषा में लिखा गया है?
उत्तर:
यह पाठ अवधी भाषा में लिखा गया है।

प्रश्न 3.
अहल्या किस ऋषि की पत्नी थी?
उत्तर:
अहल्या गौतम ऋषि की पत्नी थी।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
केवट श्रीराम के चरण-कमलों की रज का कौनसा रहस्य जानता था?
उत्तर:
केवट काफी समझदार एवं भक्त था। वह जानता था कि श्रीराम के चरण-कमलों के रज से उसका और उसके परिवार का उद्धार हो सकता है। इससे उसे महान् पुण्य मिल सकता है और जीवन सफल हो सकता है।

प्रश्न 2.
श्रीराम के पैर धोकर केवट प्रसन्न क्यों हो गया था?
उत्तर:
केवट को संयोग से भगवान् श्रीराम के दर्शन हो गये थे। वह उनके पैर धोकर स्वयं को भाग्यशाली और पुण्यात्मा मानने लगा। इस तरह का पुण्य आसानी से मिल जाने से वह प्रसन्न हो रहा था। उसका हृदय अत्यधिक प्रेम से भर गया था।

प्रश्न 3.
केवट लक्ष्मणजी के क्रोध से भी क्यों नहीं डरता था?
उत्तर:
केवट श्रीराम का भक्त और परम प्रेमी था। लक्ष्मण तो श्रीराम के छोटे भाई हैं और श्रीराम की आज्ञा के बिना तीर नहीं चला सकते हैं। वे केवट का जरा भी अहित नहीं कर सकते हैं। इसी विश्वास से केवट उनके क्रोध से नहीं डरता था।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
इस पाठ में केवट का श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम प्रकट हुआ है, कैसे? लिखिए।
उत्तर:
केवट श्रीराम को साक्षात् भगवान् मानकर अपना और अपने परिवार का उद्धार करना चाहता था। वह श्रीराम का भक्त एवं सेवक जैसा था। इस कारण सरल प्रेमी एवं अपनत्व · रखने वाला था। श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण को वह नाव से गंगा पार कराना चाहता था, परन्तु पहले उनके पैर धोकर और चरणोदक पीकर पुण्य प्राप्त करना चाहता था। उसका श्रीराम की कृपा पर अगाध विश्वास भी था। इसी से वह बड़ी चतुराई से उनके पैर धोने का आग्रह कर रहा था। इन सब बातों से यही पता चलता है कि वह श्रीराम से अगाध प्रेम करता था।

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प्रश्न 2.
‘केवट का प्रेम’ पाठ श्रीराम की उदारता का सुन्दर उदाहरण है, कैसे? अपने विचार तर्क सहित लिखिए।
उत्तर:
श्रीराम मनुष्य रूप में ईश्वर के अवतार थे। वे अपने भक्तों पर सदा ही कृपा रखते थे। इसी कारण उन्हें कृपालु और दीनानाथ कहा गया है। वे अपने भक्तों की मनचाही कामना को सरलता से पूरी करते थे। प्रस्तुत पाठ में भी केवट ने जब उनके पैर धोने का आग्रह किया, तो श्रीराम ने उदारता दिखाई और उसे पैर धोने को कहा। इस प्रकार उन्होंने केवट को पुण्य का भागी बनाया और उसके जीवन का उद्धार किया। केवट के प्रेम के वश में होकर उसकी बात को उन्होंने आसानी से माना। इस कारण उन्होंने केवट पर जरा भी क्रोध नहीं कर उदारता दिखाई।

भाषा की बात –

प्रश्न 1.
जब एक शब्द के कई समानार्थी शब्द आते हैं, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं। जैसे-इस पाठ में पत्थर के अर्थ में ‘सिला’ व ‘पाहन’ शब्द प्रयुक्त हुए हैं। कमल शब्द के अर्थ में ‘पदम’ व ‘सरोज’ –
निम्नांकित शब्दों के सही पर्यायवाची समूह चुनकर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखिए –
गंगा – सागर, जलनिधि, रत्नाकर
पैर – पुष्प, कुसुम, प्रसून
समुद्र – देवनदी, भागीरथी, जाह्नवी
संसार – पद, चरण, पाँव
फूल – जग, जगत, लोक

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आप अन्य शब्दों का चयन कर उनके पर्यायवाची लिखिए –
उत्तर:
गंगा – देवनदी, भागीरथी, जाह्नवी।
पैर – पद, चरण, पाँव
समुद्र – सागर, जलनिधि, रत्नाकर।
संसार – जग, जगत, लोक।
फूल – पुष्प, कुसुम, प्रसून।
अन्य शब्द
कमल – पंकज, जलज, पद्म, सरोज।
तीर – बाण, शर, सायक, नाराच।
नाव – तरनी, नौका, तरी।
पाहन – पत्थर, पाषाण, प्रस्तर, उपल।
जल – नीर, सलिल, तोय, उदक।
घरिनी – गृहिणी, पत्नी, भार्या, प्रिया।
प्रेम – अनुराग, प्रणय, प्रीति।

प्रश्न 2.
ध्यान से पढ़िएतुलसी-सा कवि, मीराँ-सी भक्तिन यहाँ समानता दिखाने के लिए दो तुलनात्मक शब्दों ‘सा’ और ‘सी’ का प्रयोग किया गया है। आप भी ऐसे तुलनात्मक शब्दों का प्रयोग कर वाक्य बनाइए

  1. राम – सा
  2. सीता – सी
  3. आकाश – सा।

उत्तर:

  1. संसार में राम – सा दयालु कोई नहीं है।
  2. सीता – सी सुकुमारी को वन जाना पड़ा।
  3. आकाश – सा नीला चंदोवा तान दिया था।

प्रश्न 3.
कोष्ठकों में लिखे वर्षों से नए शब्द बनाइए। आप वर्णों, मात्राओं की आवृत्ति कर सकते हैं –
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जैसे-ताता, तात, सीता।
उत्तर:
सहायता, सहाय, सती, सात, सतह।
यह, यही, यती, सही, सहता।
हाय, हत, तीस, तहत।

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पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
यदि आप केवट के स्थान पर होते तो श्रीराम से क्या निवेदन करते?
उत्तर:
यदि हम केवट के स्थान पर होते तो श्रीराम से अपने जीवन का तुरन्त उद्धार करने का निवेदन करते। हम उनकी सेवा करने के लिए साथ में चलने को तैयार होते और उनसे अपने साथ ले चलने का निवेदन करते।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पाठ अवधी भाषा में लिखा गया है। अवधी भाषा के सम्बन्ध में शिक्षक / शिक्षिका से जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
प्राकृत भाषा से अपभ्रंश भाषा का विकास हुआ। फिर अपभ्रंश भाषा से अर्द्धमागधी निकली, जिससे पूर्वी हिन्दी का विकास हुआ। लगभग आठवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी में पूर्वी हिन्दी से तीन भाषाओं की उत्पत्ति हुई –

  1. अवधी
  2. बघेली और
  3. छत्तीसगढ़ी।

इस तरह अवधी को आधुनिक काल की आर्य भाषा का एक भेद माना जाता है।

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प्रश्न 3.
केवट की तरह राम के अन्य भक्तों के भी नाम जानिए।
उत्तर:
श्रीराम के अनेक भक्त हुए, जिनमें कुछ प्रमुख नाम ये हैं-अहल्या, निषादराज, सुतीक्ष्ण, शबरी, सुग्रीव, हनुमान्, विभीषण, माल्यवान्, काकभुशुण्डि आदि।

यह भी करें –
प्रश्न 1.
अहल्या उद्धार व वामन अवतार की अन्तर्कथाएँ अपने पुस्तकालय से पढ़िए।
उत्तर:
अहल्या का उद्धार-अहल्या ऋषि गौतम की पत्नी थी। एक बार इन्द्र ने कपटी भेष रखकर अहल्या के शील को भ्रष्ट किया। तब ऋषि ने क्रोध में आकर उसे पत्थर बन जाने का शाप दिया। उसने ऋषि से काफी अनुनय-विनय की। तब ऋषि ने कहा कि भगवान् श्रीराम के पैरों से जब पत्थर की शिला रूप में पड़ी तुम्हारा स्पर्श होगा, तो तुम्हारा उद्धार हो जायेगा। तब तुम अपने असली रूप में खड़ी हो जाओगी।

इस शाप के आधार पर जब श्रीराम मुनि विश्वामित्र के साथ वन में गये, तो वहाँ पर उस पत्थर की शिला पर उनके पैर का स्पर्श होते ही अहल्या का उद्धार हो गया। वामन अवतार-भगवान् विष्णु के अवतारों में वामन अवतार की गणना होती है। दैत्यराज बलि ने देवताओं को पीड़ित कर रखा था।

RBSE Solutions for Class 7 Hindi Chapter 9 केवट का प्रेम

तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान ने वामन (बावन अंगुल के बराबर शरीर) का रूप धारण किया और दैत्यराज बलि से तीन कदम रखने की जगह का दान मांगा। बलि ने अहंकार में वह दान देना स्वीकार किया। तब वामन अवतार ने एक कदम (पैर) से सारी धरती को तथा दूसरे कदम से सारे आकाश को नाप दिया। तीसरा कदम बलि के सिर में रखा और उसे नीचे दबाकर पाताल भेज दिया। इस तरह देवताओं को बलि के अत्याचारों से मुक्ति दिलायी।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘केवट का प्रेम’ पाठ के रचयिता हैं –
(क) सूरदास
(ख) कालिदास
(ग) तुलसीदास
(घ) जयशंकर प्रसाद।
उत्तर:
(ग) तुलसीदास

प्रश्न 2.
श्रीराम ने किसे मुश्किल से वापस भेजा?
(क) सुमन्त्र को
(ख) भरत को
(ग) लक्ष्मण को
(घ) निषादराज को।
उत्तर:
(क) सुमन्त्र को

प्रश्न 3.
‘छअत सिला भई नारि’-वह नारी कौन थी?
(क) सीता
(ख) शबरी
(ग) अहल्या
(घ) शूर्पणखा
उत्तर:
(ग) अहल्या

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प्रश्न 4.
केवट के वचन सुनकर श्रीराम किसकी तरफ देखते हुए हँसे?
(क) नाव की ओर
(ख) गंगा नदी की ओर
(ग) केवट की ओर
(घ) सीता की ओर।
उत्तर:
(घ) सीता की ओर।

प्रश्न 5.
श्रीराम की आज्ञा पाकर केवट ने क्या किया?
(क) उनके पैर की धूल साफ की।
(ख) कठौते में पानी भरकर लाया।
(ग) अपने परिवार को बुलाया।
(घ) आनन्द-उमंग से नाचने लगा।
उत्तर:
(ख) कठौते में पानी भरकर लाया।

रिक्त स्थानों की पूर्ति –
प्रश्न 6.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कोष्ठक में दिये गये सही शब्दों से कीजिए –
(क) माँगी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार ……….. मैं जाना॥ (धरमु / मरमु)
(ख) एहि प्रतिपालउँ सब ……….. । (परिवारू / लोगह)
(ग) सुनि केवट के बैन, प्रेम ……….. अटपटे। (समेटे / लपेटे)
(घ) पद पखारि जलु ……….. करि, आपु सहित परिवार । (स्नान / पान)
उत्तर:
(क) मरमु
(ख) परिवारू
(ग) लपेटे
(घ) पान।

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RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
श्रीराम ने किसे मुश्किल से वापिस भेजा?
उत्तर:
श्रीराम ने राजा दशरथ के विश्वासपात्र वृद्ध मन्त्री सुमन्त्र को मुश्किल से वापिस भेजा।

प्रश्न 8.
केवट ने श्रीराम की चरण-रज को क्या बताया?
उत्तर:
केवट ने श्रीराम की चरण-रज को मनुष्य बनाने वाली कोई जड़ी-बूटी बताया।

प्रश्न 9.
नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ‘-केवट के इस कथन का आशय क्या है?
उत्तर:
इसका आशय है कि मैं अन्य कोई भी काम-धन्धा नहीं जानता। मेरी नाव नहीं रहेगी, तो मैं कैसे जीविका चलाऊँगा।

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प्रश्न 10.
“विहसे करुनाएन”-श्रीराम क्या सुनकर हँस दिये?
उत्तर:
श्रीराम केवट के प्रेम से भरे हुए अटपटे वचन सुनकर, उसके हृदय की बात जानकर हँस दिये।

प्रश्न 11.
केवट ने श्रीराम की आज्ञा पाकर क्या किया?
उत्तर:
केवट श्रीराम की आज्ञा पाकर लकड़ी के पात्र में पानी लाया और वह उनके पैर बड़ी श्रद्धा से धोने लगा।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 12.
“तब लगि न ………… पारु उतारिहौं।” इससे केवट ने श्रीराम से क्या कहा?
उत्तर:
केवट ने श्रीराम से कहा कि आपके चरणों की धूल का विशेष महत्त्व है। इससे पत्थर बनी हुई अहल्या का उद्धार हो गया। इसलिए जब तक मैं आपके पैर नहीं धोऊँगा, तब तक आपको नाव में बैठाकर नदी-पार नहीं ले जाऊँगा।

प्रश्न 13.
“चितइ जानकी लखन तन”- श्रीराम द्वारा सीता एवं लक्ष्मण की ओर देखने का कारण क्या था?
उत्तर:
श्रीराम के पैर धोकर अपना उद्धार चाहने के लिए केवट ने सुन्दर बहाना बनाया था। श्रीराम उसकी चतुरता समझ गये थे। वे सीता और लक्ष्मण की ओर देखकर यही बताना चाहते थे कि यह केवट सच्चा प्रेमी भक्त है। इसका आग्रह हर हाल में मानना ही पड़ेगा।

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प्रश्न 14.
“सोइ कपाल केवटहिं निहोरा”-इससे तुलसीदास ने क्या भाव प्रकट किया है?
उत्तर:
इससे तुलसीदास ने यह भाव प्रकट किया है कि जो श्रीराम अपनी शक्ति से तीनों लोकों में कुछ भी कर सकते हैं, जो अपने भक्तों व पापियों का भी उद्धार करते हैं और जिनकी भक्ति-प्रार्थना सब प्राणी करते हैं, वे ही श्रीराम उस समय केवट से नदी पार कराने का निवेदन कर रहे थे। वह केवट का भाग्य या पुण्य फल ही था।

प्रश्न 15.
देवगण पुष्प बरसाकर क्या सोच रहे थे?
उत्तर:
देवगण पुष्प बरसाते हुए सोच रहे थे कि भगवान् की लीला को कोई नहीं जानता है। वे अपने भक्तों पर सदा कृपा रखते हैं और उनकी इच्छा पूरी करके उन्हें पुण्य फल देते हैं। कितना अच्छा होता कि हमें भी श्रीराम की ऐसी कृपा प्राप्त होती।

RBSE Class 7 Hindi केवट का प्रेम निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 16.
‘केवट का प्रेम’ पाठ से केवट के चरित्र की किन विशेषताओं का पता चलता है?
उत्तर:
‘केवट का प्रेम’ पाठ से केवट की इन विशेषताओं का पता चलता है –

  1. सच्चा प्रेमी – केवट श्रीराम से सच्चा प्रेम रखता था।
  2. सच्चा भक्त – केवट प्रभु श्रीराम का परम भक्त था। वह उनके चरणों को धोकर अपना उद्धार करना चाहता था।
  3. चतुर-केवट काफी चतुर – चालाक था। वह बात बनाने में और अपनी बात मनवाने में चतुराई दिखा रहा था।
  4. सरल स्वभाव – केवट सरल स्वभाव का था। उसे अपनी नाव की और अपने परिवार की चिन्ता थी। वह काफी भोला व्यक्ति था।

प्रश्न 17.
‘केवट का प्रेम’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘केवट का प्रेम’ पाठ में ‘रामचरितमानस’ से कुछ अंश रखा गया है। वन में जाते समय श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण गंगा नदी के तट पर गये और केवट से नाव में बैठाकर पार करने को कहा। केवट ने श्रीराम से कहा कि पहले मैं आपके चरणों को धोऊँगा, तब आपको नाव से पार पहुँचा दूंगा। केवट ने कहा कि आपके पैरों की धूल का विशेष महत्त्व है। इसके लगने से पत्थर बनी अहल्या का उद्धार हुआ। इससे मेरी नाव का भी उद्धार हो सकता है। अतः आपके पैर की धूल को धोकर ही मैं नाव में बैठाऊँगा। तब श्रीराम ने उसे पैर धोने की आज्ञा दी। केवट ने उनके पैर धोये, चरणोदक पीकर पुण्य प्राप्त किया और उन्हें नाव से नदी पार कराया।

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पाठ-परिचय:
पाठ में संकलित कविता गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचे गये ‘रामचरितमानस’ ग्रन्थ से ली गई है। इसमें वन को जाते समय गंगा नदी को पार कराने में केवट ने श्रीराम से जो प्रेम और भक्ति प्रकट की, उसका सुन्दर वर्णन किया गया है।

1. सप्रसंग व्याख्याएँचौपाई-बरबस राम ………….. कहहू॥

कठिन-शब्दार्थ:
बरबस = मुश्किल से। पठाए = भेजा। सुरसरि = गंगा नदी। तीर = किनारे। मरमु = मर्म, गोपनीय बात। रज = धूल। मूरि = जड़ी-बूटी। करनि = बनाने वाली। सिला = पत्थर की शिला। पाहन = पत्थर। काठ = लकड़ी। तरनिउ = नाव भी। घरिनी = घरवाली, पत्नी। बाट = रास्ता। एहिं = इसी से। प्रतिपालउँ = पालन-पोषण करता हूँ। अउर = और। कबारू = काम-धन्धा। अवसि = अवश्य। गा = जाना। पदुम = कमल। पखारन = धोने के लिए।

प्रसंग – यह अवतरण गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ से लिया गया है। इसका शीर्षक ‘केवट का प्रेम’ है। श्रीराम को नदी पार कराने से पहले केवट ने जो कुछ निवेदन किया, इसमें उसी का वर्णन है।
व्याख्या – तुलसीदास वर्णन करते हैं कि तब श्रीराम ने सुमन्त्र को बड़ी मुश्किल से वापिस भेजा और उसके बाद वे गंगा नदी के तट पर आये।

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उन्होंने नदी पार करने के लिए केवट से नाव माँगी, परन्तु वह नाव नहीं लाया। वह कहने लगा कि मैंने तुम्हारा मर्म (गोपनीय भेद) जान लिया है। तुम्हारे चरण-कमलों पर लगी धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि यह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी-बूटी है। इसके छूते ही पत्थर की शिला सुन्दर स्त्री हो गई, अर्थात् पत्थर बनी गौतम की पत्नी अहल्या फिर से नारी बन गई। मेरी नाव तो लकड़ी की है, लकड़ी तो पत्थर से कठोर (मजबूत) नहीं होती है। मेरी नाव मुनि गौतम की पत्नी हो जायेगी। इस प्रकार रास्ता रुक जायेगा और मेरी नाव उड़ जायेगी।

अर्थात् आपको नदी पार जाने का रास्ता भी नहीं मिलेगा और नाव उड़ जाने से मेरी भी हानि हो जायेगी। मैं इसी नाव से अपने सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। मैं दूसरा कोई काम-धन्धा नहीं जानता हूँ। इसलिए हे प्रभु ! यदि आप अवश्य ही नदी को पार करना चाहते हैं, तो पहले मुझे अपने चरण-कमल धोने के लिए कहिये। आशय या भाव यह है कि मैं पहले आपके पैर धोऊँगा, फिर नाव में बैठाकर नदी पार ले जाऊँगा।

2. छन्द-पद-कमल ………… उतारि हौं॥

कठिन-शब्दार्थ:
उतराई = पार कराने की मजदूरी। राउरि = आपकी। आन = दुहाई, सौगन्ध। सपथ = सौगन्ध। साची = सत्य। बरु = भले ही। पै = लेकिन। जब लगि = जब तक। नाथ = स्वामी, प्रभु। कृपाल = कृपा करने वाला।

प्रसंग – यह पद्यांश ‘केवट का प्रेम’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। रामचरितमानस’ से संकलित इस छन्द में श्रीराम से केवट ने जो कुछ कहा, उसका वर्णन किया है।
व्याख्या – भक्त कवि तुलसीदास वर्णन करते हैं कि केवट ने श्रीराम से निवेदन किया-हे नाथ! मैं आपके चरण-कमल धोकर आप सभी को नाव में चढ़ा लूँगा और मैं आपसे पार कराने की कुछ भी मजदूरी नहीं चाहता हूँ। हे प्रभु राम! मुझे आपकी दुहाई और महाराज दशरथ की सौगन्ध है, मैं सब सत्य कहता हूँ। भले ही लक्ष्मण मुझे तीर से मारे, परन्तु जब तक मैं आपके पैरों को नहीं धो लँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु ! मैं आपको पार नहीं उतारूँगा।

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3. सोरठा – मुनि केवट ………. तन॥

कठिन-शब्दार्थ:
बैन = वचन। अटपटे = अस्पष्ट। विहसे = हँस पड़े। करुनाएन = करुणा के घर या भण्डार। चितइ = देखकर।
प्रसंग – यह पद्यांश तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ से संकलित अंश ‘केवट का प्रेम’ पाठ से लिया गया है। इसमें केवट की बातों से श्रीराम के प्रसन्न होने का वर्णन किया गया है।
व्याख्या – तुलसीदास वर्णन करते हैं कि केवट के प्रेम से लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणा के धाम श्रीराम सीता और लक्ष्मण की ओर देखकर हँस पड़े। भाव यह है कि केवट की चतुराई से कही गई अस्पष्ट परन्तु प्रेमभरी बात से श्रीराम हँस पड़े। उसकी बहानेबाजी से वे प्रसन्न हो गये।

4. चौपाई-कृपासिंधु …………. कोउ नाहीं॥

कठिन-शब्दार्थ:
सोई = वही। तव = तुम्हारी। बेगि = जल्दी। आनु = लाओ। विलम्बु = देर। पारू = पार। जासु = जिनका। भवसिंधु = संसार रूपी सागर। अपारा = अपार। निहोरा = खुशामद, निवेदन। थोरा = कम, छोटा। रजायसु = आज्ञा। कठवता = लकड़ी का बना पात्र, कठौता। उमगि = उमंगकर। अनुरागा = प्रेम। सरोज = कमल। सुमन = फूल । सुर = देवता। सकल = सब। सिहाहीं = सिहाने लगे। एहि = इसके। पुंज = राशि।

प्रसंग – यह पद्यांश ‘रामचरितमानस’ से संकलित अंश ‘केवट का प्रेम’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। तुलसीदासजी ने इसमें श्रीराम द्वारा केवट को पैर धोने की आज्ञा देने का वर्णन किया है।
व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि कृपा के समुद्र श्रीराम मुस्कराते हुए केवट से बोले-तुम वही करो, जिससे तुम्हारी नाव न जावे। अर्थात् नाव को कोई हानि नहीं पहुँचे। जल्दी से पानी लाओ और हमारे पैर धो लो। देर हो रही है, जल्दी से नदी पार उतार दो।

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जिनका नाम एक बार स्मरण करते ही मनुष्य इस अपार संसार रूपी सागर से पार उतर जाते हैं और जिन्होंने वामनावतार में जगत् को तीन पग (कदम) से छोटा कर दिया था, अर्थात् तीनों लोकों को नाप दिया था, वही कृपालु श्रीराम गंगा पार करने के लिए केवट से विनय कर रहे थे। तब केवट श्रीराम की आज्ञा पाकर कठौते में पानी भरकर लाया।

तब केवट अत्यन्त आनन्द और प्रेम में उमंग से भरकर श्रीराम के चरण-कमल धोने लगा। उस समय सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है। भाव यह है कि सब देवता केवट को भगवान् श्री राम के चरण धोते देखकर आपस में मन-ही-मन कहने या सोचने लगे कि केवट को जो पुण्य आज मिल रहा है, उसकी किसी अन्य कार्य से बराबरी नहीं हो सकती है।

5. दोहा-पद पखारि ……….. लेई पार॥

कठिन-शब्दार्थ:
पद = पैर। पखारि = धोकर। पितर = पूर्वज। मुदित = प्रसन्न।
प्रसंग – यह पद्यांश ‘केवट का प्रेम’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसमें तुलसीदासजी ने केवट द्वारा श्रीराम के पैर धोने और उन्हें नदी से पार कराने का वर्णन किया है।
व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि केवट ने श्रीराम के चरणों को धोकर, उस जल को परिवार सहित स्वयं पीकर पहले अपने पितरों को संसार सागर से पार कराया, फिर प्रसन्नता से श्रीराम को गंगा नदी के पार ले गया। भाव यह है कि अपना और अपने पूर्वजों का उद्धार किया तथा श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण को नाव से गंगा-पार ले गया।

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