RBSE Solutions for Class 7 Hindi Chapter 4 शरणागत की रक्षा

RBSE Solutions for Class 7 Hindi

Rajasthan Board RBSE Class 7 Hindi Chapter 4 शरणागत की रक्षा (कहानी)

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्षा पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पाठ से

सोचें और बताएँ –

प्रश्न 1.
हमीर कहाँ के राणा थे ?
उत्तर:
हमीर रणथम्भौर के राणा थे।

प्रश्न 2.
युद्ध से पहले माहिमशाह हमीर के सामने क्यों खड़ा हुआ ?
उत्तर:
युद्ध से पहले माहिमशाह इसलिए हमीर के सामने खड़ा हुआ कि वह स्वयं को बादशाह को सौंपना चाहता था और रणथम्भौर को पराजित नहीं देखना चाहता था।

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लिखें

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
“महाराज मैं दुखिया हूँ, मेरे प्राण संकट में हैं, आपकी शरण आया हूँ।” किसने कहा –
(क) हमीर ने
(ख) अलाउद्दीन ने
(ग) माहिमशाह ने
(घ) सलाहकारों ने।
उत्तर:
(ग) माहिमशाह ने

प्रश्न 2.
“यह कर्त्तव्य हमें पूरा करना है, फिर इससे दिल्ली का बादशाह नाराज हो या दुनिया का बादशाह।” किसने कहा
(क) हमीर ने
(ख) अलाउद्दीन ने
(ग) माहिमशाह ने।
(घ) सलाहकारों ने।
उत्तर:
(क) हमीर ने

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RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
माहिमशाह किसका भगोड़ा था?
उत्तर:
माहिमशाह दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी का भगोड़ा था।

प्रश्न 2.
माहिमशाह किसकी शरण में आया?
उत्तर:
माहिमशाह रणथम्भौर के राजा राणा हमीर की शरण में आया।

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राजा हमीर ने अपने सलाहकारों को अनुत्साहित क्यों पाया?
उत्तर:
राजा हमीर के सरदारों की राय थी कि आज भले ही माहिमशाह आपकी शरण में है, परन्तु कल तक इसकी तलवार हमारी खून की प्यासी थी। यह हमारा सबसे बड़ा शत्रु था। अब यदि इसे शरण दी जायेगी, तो दिल्ली का बादशाह क्रोध करेगा और हमें उसकी क्रोधाग्नि में जलना पड़ सकता है। हम ऐसी मुसीबत को क्यों मोल लें। इसी अभिप्राय से वे अनुत्साहित थे।

प्रश्न 2.
राजा हमीर ने कर्त्तव्य-पालन के बारे में सलाहकारों से क्या कहा?
उत्तर:
राजा हमीर ने अपने सलाहकारों से कहा कि कर्तव्यपालन करना राजपूत का धर्म होता है। कर्त्तव्य के पालन में चाहे सुख मिलेगा या दु:ख, जय होगी या पराजय, यह दुकानदारी की वृत्ति राजपूतों को शोभा नहीं देती। माहिमशाह इस समय शरणार्थी है और शरणार्थी की रक्षा करना राजपूत का कर्त्तव्य है। हमें यह कर्त्तव्य पूरा करना है।

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प्रश्न 3.
राजा हमीर ने अलाउद्दीन को भेजे सन्देश में क्या लिखा?
उत्तर:
राजा हमीर ने अलाउद्दीन को सन्देश में लिखा कि माहिम को शरण दी है, कोई नौकर नहीं रखा है। अपना सर्वस्व लुटाकर भी शरणागत की रक्षा करना हमारा संस्कार और कर्तव्य है। सपने में भी मैं माहिम को नहीं सौंपूँगा। आप जो उचित समझें, कीजिए।

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रणथम्भौर किले में हुई सभा में माहिमशाह ने राजा हमीर से क्या खुशामद की?
उत्तर:
रणथम्भौर के किले में राजा हमीर और उनके योद्धाओं ने एक सभा की कि कैसे बादशाह की सेना का मुकाबला किया जावे? तब माहिमशाह ने राजा हमीर से बहुत खुशामद की कि उसे बादशाह अलाउद्दीन को सौंप कर सुलह की जाए, अब और नुकसान होने से बचा जावे। माहिमशाह स्वयं देख चुका था कि अब किले में राशन भी खत्म हो गया है और उनके वीर भी घट रहे हैं। इसी से माहिमशाह ने उसे वापिस सौंप देने के लिए खुशामद की। परन्तु राजा हमीर ने उसकी खुशामद को नहीं माना।

प्रश्न 2.
राजा हमीर और रणथम्भौर ने शरणागत की रक्षा के लिए क्या-क्या कुर्बानियाँ दी?
उत्तर:
राजा हमीर और रणथम्भौर ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना सब-कुछ कुर्बान कर दिया। युद्ध में बादशाह की विशाल सेना का मुकाबला करने पर सारे वीरों ने आत्मबलिदान किया, सब वीर गति को प्राप्त हुए। रणथम्भौर की पराजय हुई, तो उसका सारा वैभव शत्रु-सेना ने लूट लिया। रणथम्भौर के वीरों ने रक्त की आखिरी बूंद तक वीरता का परिचय दिया। उस युद्ध में वहाँ पर सब कुछ कुर्बानी देकर रणथम्भौर के वीर इतिहास में अमर बन गये।

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भाषा की बात –

प्रश्न 1.
“हमीर ने अपने सलाहकारों को देखा तो अनुत्साहित पाया।” वाक्य में ‘अनुत्साहित’ शब्द अन् + उत्साहित से बना है। आप भी ‘अन्’ उपसर्ग लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
उत्तर:
अन् + आदर = अनादर! अन् + आदि = अनादि। अन् + उदार = अनुदार। अन् + एक = अनेक। अन् + अधिकार = अनधिकार।

प्रश्न 2.
जिस प्रकार इतिहास में इक प्रत्यय जुड़ने से ‘ऐतिहासिक’ बना है। इसी प्रकार ‘इक’ प्रत्यय लगाकर नये शब्द बनाइए।
उत्तर:
लोक + इक = लौकिक। मूल + इक = मौलिक। धर्म + इक = धार्मिक। वर्ष + इक = वार्षिक। समाज. + इक = सामाजिक।

प्रश्न 3.
नीचे समश्रुति भिन्नार्थक शब्द दिये गये हैं। इनको वाक्यों में प्रयोग कर इनके अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए –
सुत-सूत, पथ्य-पथ, धन्य-धान्य, उदार-उद्धार।
उत्तर:
सुत – राजा दशरथ के चार सुत थे।
सूत- – सूत ने रथ में बैठाकर राजकुमारों को सैर कराई।
पथ्य – रोगी के पथ्य का ध्यान रखो।
पथ – शहर जाने का पथ वही है।
धन्य – आपकी उदारता से मैं धन्य हो गया।
धान्य – मण्डी में धान्य बिकता है।
उदार – दानशील व्यक्ति उदार होते हैं।
उद्धार – भगवान् पापियों का उद्धार करते हैं।

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पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
कक्षा में हमीर, माहिमशाह और अलाउद्दीन खिलजी का संवाद कराएँ।
उत्तर:
अध्यापक की सहायता से करें।

प्रश्न 2.
इसी प्रकार की ऐतिहासिक कहानियों जिनमें शरणागत की रक्षा का प्रसंग हो का संकलन कर ‘मेरा संकलन’ में जोड़िए। \
उत्तर:
स्वयं कीजिए।

प्रश्न 3.
आपके अनुसार हमीर का माहिमशाह को शरण देना उचित है या अनुचित है? तर्क सहित लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही शरण में आये व्यक्ति को शरण देना श्रेष्ठ कर्त्तव्य माना गया है। चाहे शत्रु शरण में आये या विधर्मी आये, उसे शरण देने की परम्परा रही है। इसी परम्परा के आधार पर हमीर द्वारा माहिमशाह को शरण देना उचित है।

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कल्पना करें
प्रश्न -राणा हमीर यदि माहिमशाह को शरण नहीं देते, तो क्या होता?
उत्तर:
यदि राणा हमीर माहिमशाह को शरण नहीं देते, तो हिन्दू संस्कृति की परम्परा एवं राजपूतों की मर्यादा का पालन नहीं होता। इससे हमीर की बदनामी होती। माहिमशाह कहीं दूसरे के पास चला जाता। तब हमीर के साथ बादशाह अलाउद्दीन का युद्ध नहीं होता और रणथम्भौर का पतन भी नहीं होता। रणथम्भौर का इतिहास दूसरा होता।

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
माहिमशाह बादशाह अलाउद्दीन का क्या था?
(क) सेनापति
(ख) मन्त्री
(ग) खादिम
(घ) दूत।
उत्तर:
(ग) खादिम

प्रश्न 2.
कोई भी माहिमशाह को शरण देकर किसे नाराज नहीं करना चाहता था?
(क) हमीर को
(ख) माहिमशाह को
(ग) बादशाह अकबर को
(घ) अलाउद्दीन खिलजी को।
उत्तर:
(घ) अलाउद्दीन खिलजी को।

प्रश्न 3.
खिलजी ने हमीर को आखिरी सन्देश क्या भेजा?
(क) माहिम को मुझे सौंप दो।
(ख) युद्ध की बात मत करो।
(ग) शरणागत की रक्षा करो।
(घ) माहिम को कठोर दण्ड दो।
उत्तर:
(क) माहिम को मुझे सौंप दो।

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प्रश्न 4.
रणथम्भौर के किले का दरवाजा खोलने का फैसला किया –
(क) राजा हमीर ने
(ख) सभी वीरों ने
(ग) सभी नारियों ने
(घ) माहिमशाह ने।
उत्तर:
(ख) सभी वीरों ने

प्रश्न 5.
उस युद्ध में रणथम्भौर वालों ने कैसा यज्ञ किया था?
(क) अश्वमेध का
(ख) नरमेध का
(ग) आत्मदान का
(घ) भूमिदान का।
उत्तर:
(ग) आत्मदान का

रिक्त स्थानों की पूर्ति –
प्रश्न 6.
निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति कोष्ठक में दिये गये सही शब्दों से कीजिए –
(क) प्राणों की रक्षा के लिए………. आया हूँ। (सेवा में / शरण में)
(ख) पर कर्त्तव्य की भी एक. .. होती है। (रेखा / सीमा)
(ग) दोनों तरफ से हजारों योद्धा……….आये। (पास / काम)
(घ) जीत की कामना सिपाही को ….देती है। (उत्साह / भय)
उत्तर:
(क) शरण में
(ख) सीमा
(ग) काम
(घ) उत्साह।

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RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
राणा हमीर कहाँ के राजा थे?
उत्तर:
राणा हमीर रणथम्भौर के राजा थे।

प्रश्न 8.
माहिमशाह को दूसरे राजाओं ने क्यों शरण नहीं दी?
उत्तर:
दूसरे राजा अलाउद्दीन खिलजी से डरते थे, इस कारण उन्होंने माहिमशाह को शरण नहीं दी।

प्रश्न 9.
माहिमशाह कहाँ से भागकर आया था?
उत्तर:
माहिमशाह बादशाह अलाउद्दीन खिलजी की जेल से फरार होकर आया था?

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प्रश्न 10.
एक दिन भण्डारी ने आकर राणा को क्या खबर दी?
उत्तर:
एक दिन भण्डारी ने आकर राणा को खबर दी कि आज किले में खाने का सामान नहीं है।

प्रश्न 11.
वीरता के इतिहास में किसका जोड़ नहीं मिलता
उत्तर:
वीरता के इतिहास में रणथम्भौर के वीरों की वीरता एवं बलिदान का जोड़ नहीं मिलता है।

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प्रश्न 12.
माहिमशाह राणा हमीर की शरण में क्यों आया?
उत्तर:
एक मामूली बात पर बादशाह अलाउद्दीन खिलजी माहिमशाह से नाराज हो गया था। बादशाह ने उसे फाँसी का हुक्म दे दिया था। तब वह जेल से फरार होकर आया और अपने प्राणों की रक्षा के लिए अन्य राजाओं से शरण नहीं मिलने से राणा हमीर की शरण में आया।

प्रश्न 13.
अन्य राजाओं से माहिमशाह को शरण क्यों नहीं मिली?
उत्तर:
माहिमशाह बादशाह अलाउद्दीन का भगोड़ा सेवक था। उसे शरण देने से बादशाह नाराज हो जाता और शरण देने वाले पर बादशाह आक्रमण कर देता। इसी बात का विचार करके अन्य राजाओं ने माहिमशाह को शरण देने से मना कर दिया।

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प्रश्न 14.
माहिमशाह को शरण देने पर बादशाह खिलजी ने क्या सन्देश भेजा?
उत्तर:
बादशाह खिलजी ने हमीर को सन्देश भेजा कि माहिमशाह मेरा अपराधी है, उसे शरण क्यों दी? अब अपनी देखरेख में माहिम को मुझे सुपुर्द करो और अपने कसूर की माफी मांगो। मैं तुम्हारी इस मामूली भूल को माफ कर सकता हूँ।

RBSE Class 7 Hindi शरणागत की रक्ष निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 15.
सलाहकारों के द्वारा माहिम को शरण न देने की बात कहने पर राजा हमीर ने क्या कहा?
उत्तर:
सलाहकारों से राजा हमीर ने कहा कि माहिम को शरण देकर दिल्ली के बादशाह की लपलपाती क्रोधाग्नि को न्यौता देने की बात नहीं है। यह कर्त्तव्य-पालन का प्रश्न है, राजपूती आन का सवाल है। यदि शरणागत को हम शरण नहीं देंगे और वह हमारे द्वार से लौट जायेगा, तो स्वर्ग में हमारे पूर्वज क्या सोचेंगे? क्या उन्हें हमारे इस आचरण से स्वर्ग में दु:ख का अनुभव नहीं होगा? इसलिए शरण में आये व्यक्ति की रक्षा करना हमारा पवित्र कर्त्तव्य एवं राजपूती आन है। इसका पालन होना ही चाहिए।

प्रश्न 16.
युद्ध के कारण घबराये हुए माहिमशाह से राणा हमीर ने क्या कहा? बताइये।
उत्तर:
बादशाह अलाउद्दीन की विशाल सेना के साथ भयानक युद्ध चलने लगा। तब माहिमशाह हमीर के पास आकर कुछ सोचते हुए खड़ा हो गया। उसे घबराया देखकर राणा हमीर ने कहा कि युद्ध लड़कों का खेल नहीं है। मैं राजपूत हूँ, मैं जो वचन दे चुका हूँ, उसे मरते दम तक निभाऊँगा। इस लड़ाई में सभी वीरता से भाग ले रहे हैं। आप भी वीरता दिखा रहे हैं। मैं हार-जीत से जरा भी नहीं डरता, हार-जीत तो किस्मत के दो किनारे हैं। इसलिए इस युद्ध का जो भी परिणाम रहेगा, उसकी चिन्ता मत करो और मुझे अपने वचन का पालन करने दो।

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प्रश्न 17.
‘शरणागत की रक्षा’ कहानी के आधार पर राजा हमीर के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
‘शरणागत की रक्षा’ कहानी में राजा हमीर के चरित्र की निम्न विशेषताएँ दिखाई देती हैं –

  1. कर्त्तव्यपालक – राजा हमीर कर्त्तव्य-पालन करना राजपूती आन मानता था। वह शरण में आये व्यक्ति को आश्रय देना अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य मानता था।
  2. वचन-पालक – राजा हमीर ने अपने वचन का पालन अन्त समय तक किया और माहिमशाह की रक्षा में कोई कसर नहीं रखी।
  3. वीर योद्धा – इतिहास में राणा हमीर को महान् वीर योद्धा बताया जाता है। इस कहानी में भी उसका यही गुण प्रकट हुआ है।
  4. निडर – राजा हमीर दिल्ली के बादशाह की विशाल सेना का निडर होकर सामना करता रहा और अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए”कर्त्तव्य की सीमा?” कड़क कर हमीर ने पूछा, “कर्त्तव्य की सीमा है कर्त्तव्य-पालन।” कर्त्तव्य के पालन में सुख मिलेगा या दुःख, जय होगी या पराजय, यह दुकानदारी की वृत्ति राजपूतों को शोभा नहीं देती। माहिम शरणार्थी है, शरणार्थी की रक्षा राजपूत का कर्तव्य है। यह कर्त्तव्य हमें पूरा करना है, फिर इससे दिल्ली का बादशाह नाराज हो या दुनिया का बादशाह।”

प्रसंग – यह गद्यांश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित कहानी ‘शरणागत की रक्षा’ से लिया गया है। इसमें अपने सरदारों को लक्ष्य कर राजा हमीर ने कर्त्तव्य-पालन को लेकर अपना मत प्रकट किया है।

व्याख्या – कहानीकार कहता है कि जब हमीर के सरदारों ने माहिमशाह को शरण देने की बात पर कर्त्तव्य की सीमा को लेकर शंका प्रकट की, तब हमीर ने आवेश में आकर कहा |कि कर्त्तव्य की सीमा कहाँ तक होती है? कर्त्तव्य की सीमा तो कर्त्तव्य का अन्त तक पालन करने में होती है। कर्त्तव्य का पालन करने से कुछ लाभ होगा या हानि, सुख मिलेगा या दु:ख, अथवा जीत होगी या पराजय होगी – ऐसा विचार नहीं किया जाता है। ऐसा विचार तो दुकानदार या व्यापारी का आचरण होता है।

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इसमें अपना ही भला सोचा जाता है। जबकि कर्त्तव्य-पालन करने में राजपूत ऐसी धारणा नहीं रखते हैं। राजपूतों को ऐसी बात शोभा नहीं देती है। इसलिए माहिमशाह को शरण देना हमारा कर्त्तव्य है। वह शरणार्थी है। हम अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। इस बात पर अर्थात् माहिम को शरण देने से चाहे दिल्ली का या दुनिया का बादशाह नाराज हो जायें, हमें इसकी चिन्ता नहीं है। हमें तो हर हालत में अपने कर्तव्य का पालन करना है।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए| फैसला हुआ कि कल किले का द्वार खोल दिया जाए और जमकर युद्ध हो। इस युद्ध का स्पष्ट अर्थ था, आत्माहुति, सर्वस्व समर्पण। जीत की कामना सिपाही को उत्साह देती है, तो विजय की आशा उसे बल। कामना और आशा के झूले पर इधर से उधर झूलने वाले ये सिपाही न थे इन्हें झूलना नहीं, झूमना था, इन्हें बुझना नहीं, जूझना था।

प्रश्न –
(क) यह गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(ख) रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए।
(ग) किले का द्वार क्यों खोला गया?
(घ) सिपाही का उत्साह और बल किससे बढ़ता है?
उत्तर:
(क) यह गद्यांश ‘शरणागत की रक्षा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है।
(ख) आत्माहुति = अपना बलिदान करना। कामना = प्रबल हार्दिक इच्छा।
(ग) अन्तिम बार खुला मुकाबला करने और शत्रु-सेना पर सामने से वार करने के लिए किले का द्वार खोला गया।
(घ) सिपाही का उत्साह जीत की प्रबल इच्छा करने से और उसका बल विजयी होने की आशा से बढ़ता है।

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पाठ-परिचय
यह पाठ कन्हैयालाल मिश्र द्वारा लिखी गई कहानी है। रणथम्भौर के राणा हमीर ने अलाउद्दीन खिलजी के एक भगोड़े सेवक माहिम शाह को शरण दी। उसके कारण रणथम्भौर के किले पर अलाउद्दीन ने आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में सारे राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए। इतिहास में आत्म-बलिदान का ऐसा प्रसंग अन्यत्र नहीं मिलता है।

कठिन-शब्दार्थ:
व्यथा = मुसीबत, दु:ख। खादिम = नौकर, सेवक। भगोड़ा = भागा हुआ। अनुत्साहित = उत्साह से रहित। न्योता = निमन्त्रण, बुलावा। आन = इज्जत, परिवार की परम्परा। वृत्ति = आचरण। हिमाकत = हिम्मत, साहस। कसूर = अपराध, गलती। सर्वस्व = सब कुछ। शरणागत = शरण में आया व्यक्ति मुनासिब = उचित दुन्दुभि = नगाड़ा। खुशामद = मान-मनुवार, मनाने का निवेदन। कुबेर = धन का देवता। कोष = खज़ाना। आत्माहुति = प्राणों का बलिदान। कामना = हार्दिक इच्छा। शहादत = बलिदान। सौरभ = सुगन्ध। प्रदीप्त = जलता हुआ, ओजपूर्ण।

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