RBSE Solutions for Class 6 Social Science Chapter 21 प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था

Rajasthan Board RBSE Class 6 Social Science Solutions Chapter 21 प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था

RBSE Solutions for Class 6 Social Science

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RBSE Class 6 Social Science प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था Intext Questions and Answers

गतिविधि

पृष्ठ संख्या – 150

प्रश्न 1.
मित्रों के साथ चर्चा करेंप्राचीन भारत को सोने की चिड़िया क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्राचीन भारत को सोने की चिड़िया की संज्ञा देना प्राचीन भारत सोने की चिड़िया कहलाता रहा है। प्राचीन भारत में उद्योग एवं व्यापार अपने चरमोत्कर्ष पर थे। भारत में बनी हुई वस्तुओं की किस्म अच्छी होने के कारण उसकी विदेशों में बहुत माँग रहती थी। इससे यहाँ का बहुत-सा माल विदेशों में निर्यात किया जाता था। निर्यात के बदले मुद्रा के रूप में सोना व चाँदी लिया जाता था। भारत में ही अच्छे माल की उपलब्धता के कारण अपने देश को अन्य देशों से माल आयात नहीं करना पड़ता था। इससे विदेशों से प्राप्त सोना-चाँदी भारत में ही रहता था। इससे सम्पूर्ण विश्व का सोना भारत में एकत्र होने लगा। धीरे धीरे यहाँ पर सोने के भण्डार बढ़ने लगे। भारत अन्य देशों के मुकाबले सम्पन्न होने लगा। यही कारण था कि प्राचीन भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था।

पृष्ठ संख्या – 151

प्रश्न 1.
प्राचीन काल के कृषि उत्पादनों की सूची बनाइये।
उत्तर:
प्राचीन काल के कृषि उत्पादनों की सूची प्राचीन काल में भारत की कृषि अन्य देशों की तुलना में बहुत उन्नत अवस्था में थी। प्राचीन काल में भारत में चीनी, नमक, चाय, अफीम, कपास, गन्ना, मसाले, नील, रेशम, गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार, बाजरा, तिलहन, दाल, चना आदि का उत्पादन अच्छी मात्रा में होता था।

प्रश्न 2.
“भारतीय किसान कुछ मायने में एक औसत अंग्रेज किसान से भी अच्छा है।” यह वाक्य किसने कहा? उसके कारणों पर चर्चा करें।
उत्तर:
“भारतीय किसान कुछ मायने में एक औसत अंग्रेज किसान से भी अच्छा है।” यह वाक्य डॉ. वायलेकर ने 1889 ई. में कहा था। इसके कारण निम्नलिखित थे –

  1. भारतीय किसान अधिक अच्छे ढंग से खेती से खरपतवार को साफ करता था।
  2. भारतीय किसान मिट्टी, फसल की कटाई और युवाई के बारे में अधिक अच्छी जानकारी रखता था।

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प्रश्न 3.
सफेद कपड़े का उत्पादन कहाँ पर होता था?
उत्तर:
सफेद कपड़े का उत्पादन लाहौर, सरहिन्द, पटना, ढाका, कलकत्ता, अहमदाबाद, बुरहानपुर, मद्रास, पांडिचेरी एवं नागापटनम आदि स्थानों पर होता था।

प्रश्न 4.
चेक और धारीदार कपड़े का उत्पादन कहाँकहाँ होता था?
उत्तर:
चेक और धारीदार कपड़े का उत्पादन लाहौर, सरहिंद, कलकत्ता, अहमदाबाद, बुरहानपुर, मद्रास एवं पांडिचेरी आदि स्थानों पर होता था।

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प्रश्न 5.
शिंद्ज (छींट छापेदार सूती कपड़े) के केन्द्र कौन-कौनसे थे?
उत्तर:
शिंट्ज के केन्द्र समाना, पटना, ढाका, पंतन, बुरहानपुर, पेताबेली और मद्रास थे।

प्रश्न 6.
सिल्क का उत्पादन भारत में कहाँ-कहाँ पर होता बा?
उत्तर:
भारत में सिल्क का उत्पादन बनारस, पंतन एवं अहमदाबाद में होता था।

पृष्ठ संख्या – 152

प्रश्न 1.
चर्चा करें-प्राचीन काल में भारत विदेशों से माल का आयात बहुत ही कम करता था। क्यों?
उत्तर:
प्राचीन काल में भारत विदेशों से माल का आयात बहुत ही कम करता था। चूँकि अन्य देश उस समय औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े थे एवं भारत औद्योगिक संसाधनों से पूर्ण था इसलिए भारत उनसे आयात नहीं करता था।

पढ़ें और बताएँ

पृष्ठ संख्या – 153

प्रश्न 1.
उत्तरापथ व दक्षिणापथ किसे कहते हैं?
उत्तर:
रेशी व्यापार के लिए प्राचीन भारत में दो प्रमुख माग थे –

  1. उत्तरापथ तथा
  2. दक्षिणापथ।

प्रश्न 2.
देशी व विदेशी व्यापार में क्या अन्तर है?
उत्तर:
देशी व्यापार में व्यापार या कारोबार देश की सीमाओं के अन्दर किया जाता है तथा विदेशी व्यापार में यह कारोबाएक देश से दूसरे देश के बीच में किया जाता है। देश व्यापार को घरेलू व्यापार भी कहते हैं।

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प्रश्न 3.
एशिया के बल्ख तक पहुँचने के लिए मार्ग कहाँ से होकर जाता था?
उत्तर:
एशिया से बल्ख तक पहुँचने के लिए मार्ग अफगानिस्तान से काबुल होकर जाता था।

गतिविधि

पृष्ठ संख्या – 155

प्रश्न 1.
ऐसी वस्तुओं की सूची बनाइये जिसमें प्राचीन काल में भारत की वस्तुओं की विदेशी बाजारों में मांग रहती थी।
उत्तर:

  1. मलमल
  2. छींट
  3. जरी के वस्त्र
  4. लोहे व इस्पात की वस्तुएँ
  5. तम्बाकू
  6. नील
  7. शाल
  8. रेशम व रेशमी वस्त्र
  9. गरम मसाले
  10. हीरेजवाहरात
  11. काली मिर्च
  12. तांबा
  13. चन्दन
  14. सागवान
  15. थोड़े
  16. सूती वस्त्र
  17. महीन कपड़े

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
यह कथन किसने कहे?

  1. भारतीय किसान एक औसत अंग्रेज किसान की तरह अच्छा है और कुछ मायनों में तो इससे भी श्रेष्ठ।
  2. जिस समय पश्चिमी यूरोप में असभ्य जातियाँ निवास करती थी, भारत अपने शासकों के वैभव तथा शिल्पकारों की उच्चकोटि की कला के लिए विख्यात था।
  3. भारतीय सामग्री के प्रयोग के कारण रोमन साम्राज्य से साना बाहर की ओर जा रहा है।

उत्तर:

  1. यह कथन डॉ. बायलेकर (1889 ई.) ने कहा।
  2. यह क्थन भारतीय औद्योगिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट, 1916 में कहा।
  3. पहली सदी में प्लिनी नामक लेखक ने यह कथन कह

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (कोष्ठक में दिए शब्दों की सहायता से) [गेहूँ, पानी का जहाज, हाथी दाँत व सोना, सोना व चाँदी, ईसवाल (उदयपुर)]

  1. यहाँ का बहुत-सा मल विदेशों में निर्यात किया जाता था तथा निर्यात के बदले मुद्रा के रूप में ………………. लिया जाता था।
  2. ………………… की खेती यहाँ पर इंग्लैण्ड व यूरोप से कई शताब्दी पूर्व प्रारम्भ की थी।
  3. ………………… बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे था।
  4. ………………… में मौर्यकालीन लोह प्रगलम भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  5. इथोपिया (अफ्रीका) से ………………… भारत आता था।

उत्तर:

  1. सोना व चाँदी
  2. भारतीय किसानों ने गेहूँ
  3. पानी के जहाज
  4. ईसवाल (उदयपुर)
  5. हाथीदांत व सोना

प्रश्न 3.
प्राचीन काल में भारत से कौन-कौनसी वस्तएँ निर्यात की जाती थी?
उत्तर:
प्राचीन काल में भारत से मलमल, छींट, जरी के वस्त्र, लोहे व इस्पात की वस्तुएँ, तम्बाकू, नील, शाला, रेशम व रेशमी वस्वों एवं गरम मसालों का निर्यात किया जाता था।

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प्रश्न 4.
देशी व विदेशी व्यापार किसे कहते हैं? प्राचीन काल में भारत का कौन-कौनसे देशों से विदेशी व्यापार होता था?
उत्तर:
देशी व विदेशी व्यापार-देशी व्यापार में व्यापार का कारोबार देश की सीमाओं के अन्दर किया जाता है तथा विदेशी व्यापार में यह कारोबार एक देश से दूसरे देश के बीच में किया जाता है। देशी व्यापार को घरेलू व्यापार भी कहते हैं। प्राचीन काल में भारत का विदेशों से व्यापार-प्राचीन काल में भारत का विदेशी व्यापार विश्व के अनेक देशों से होता था जिनमें बेबीलोन, मिस, जावा, सुमात्रा, रोम आदि उल्लेखनीय हैं।

1. इथोपिया (अफ्रीका) से हाथी दांत व सोना भारत आता था। बाहर से भारत में पोड़ों का भी आयात किया जाता था। तीसरी ईस्वी सदी में जब रोम का साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा, तो भारत के व्यापारी पूर्व एशिया से अधिक व्यापार करने लगे।

2. आमीनियन एवं फारसी व्यापारी पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वा फारस और मध्य एशिया के रास्ते यहाँ की वस्तुएं लेकर जाते थे। यहाँ के बने महीन कपड़ों के थान कैटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दरों और रेगिस्तान के
पार ले जाते थे।

3. के तट पर स्थित सूरत बन्दरगाह से भारत बाड़ी और लाल सागर के बन्दरगाहों से जुड़ा हुआ था।

4. कोरोमंडल तट पर मच्छलीपट्नम् और बंगाल में हुगली के माध्यम से दक्षिणी-पूर्वी एशियाई बन्दरगाहों के साथ खूब व्यापार होता था।

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प्रश्न 5.
उत्तरापथ व दक्षिणापथ से क्या आशय है? उत्तरापथ में आने वाले स्थान कौन-कौनसे हैं?
उत्तर:
देशी व्यापार के लिए प्राचीन भारत में दो प्रमुख मार्ग थे –
(i) उत्तरापथ तथा
(ii) दक्षिणापथ। इसका उल्लेख महाभारत एवं बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में भी मिलता है।

1. उत्तरापथ – उत्तरापथ भारत के उत्तर के भागों को जोड़ता है तथा दक्षिणापथ भारत के दक्षिण के हिस्सों को जोड़ता है। उत्तरापथ ताम्रलिप्ति (बंगाल का पश्चिमी क्षेत्र) से शुरू होता था तथा पाटलिपुत्र, वैशाली, कुशीनगर, श्रावस्ती से होता हुआ वर्तमान उत्तरप्रदेश के हस्तिनापुर से गुजरता था। वहाँ से पंजाब-दिल्ली होते हुए हिमालय की तलहटी से गुजरता था आगे यह कश्मीर पाटी को छूते हुए पंजाब में तक्षशिला होते हुए पुष्कलावती (वर्तमान पेशावरपाकिस्तान) को पार करते हुए अफगानिस्तान को जाता था। अफगानिस्तान से यह रास्ता काबुल को पार करता हुआ एशिया में बल्ख तक पहुंचता था। पंजाब से एक रास्ता सिंध को भी जाता था।

2. दक्षिणापथ – प्राचीन काल में विंध्य पर्वतमाला के दक्षिणी भाग को दक्षिणापथ के नाम से जाना जाता था। इस प्रकार दक्षिणापथ एक रास्ते का नाम भी था और एक भू-भाग का भी।

प्रश्न 6.
दक्षिणापथ के अन्तर्गत आने वाले मार्ग कौनकौनसे हैं?
उत्तर:
दक्षिणापथ के अन्तर्गत आने वाले मार्ग दक्षिणापथ दो दिशाओं में जाता था। एक दिशा महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के तट पर बसे शहर पैठण से बिहार के प्रमुख शहरों की ओर जाता था। दूसरी दिशा में पैठण से | पश्चिमी समुदी तट की ओर से गुजरता हुआ मध्य प्रदेश में नर्मदा के तट पर महेश्वर तथा उज्जैन को पार करता हुआ आगे वह गोनाहा (गोंडों का प्रदेश) से निकल कर भिलसा, कोसल, साकेत (अयोध्या), श्रावस्ती, सेताण्या, कपिलवस्तु, पावापुरी, भोग्नगारा, वैशाली और राजगृह होते हुए जाता था। दक्षिणापथ अनेक पहाड़ी श्रृंखलाओं से होकर गुजरता था। इन पहाड़ों पर रहने के लिए व्यापारियों ने अनेक गुफाएँ बना ली थी।

RBSE Class 6 Social Science प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

Question 1.
ईसा की उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ तक कौनसा उद्योग इंग्लैण्ड की अपेक्षा भारत में अधिक विकसित था ……………….
(अ) रेलें बनाने का उद्योग
(ब) भवन बनाने का उद्योग
(स) पानी के जहाज बनाने का उद्योग
(द) पुल बनाने का उद्योग
उत्तर:
(स) पानी के जहाज बनाने का उद्योग

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Question 2.
किस वस्व की सम्पूर्ण दुनिया में मांग रहती थी?
(अ) सूती वस्त्र की
(ब) मोटे कपड़े की
(स) ऊनी वस्व की
(द) दाका की मलमल
उत्तर:
(द) दाका की मलमल

Question 3.
कौनसा प्रान्त सूती व रेशमी वस्त्र उद्योग का मुख्य केन्द्र ……………….
(अ) पंजाब
(स) विहार
(ब) बंगाल
(द) उड़ीसा
उत्तर:
(ब) बंगाल

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Question 4.
लौह-स्तम्भ स्थित है ……………….
(अ) इलाहाबाद
(ब) लखनऊ
(स) रांची
(द) दिल्ली (महरौली)
उत्तर:
(द) दिल्ली (महरौली)

Question 5.
किस गरम मसाले की यूरोप में बहुत मांग थी?
(अ) इलायची
(ब) लौंग
(स) काली मिर्च
(द) शहद
उत्तर:
(स) काली मिर्च

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. प्राचीन काल में ………………. को सोने की चिड़िया कहा
  2. भारतीय किसानों ने गेहूँ की खेती ………………. से कई शताब्दी पूर्व प्रारम्भ की थी।
  3. प्राचीन भारत में ………………. की खेती भी पर्याप्त मात्रा में की जाती थी।
  4. ………………. बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे
  5. प्राचीन कला में ………………. भारत से कपड़ों का आयात करता था।

उत्तर:

  1. भारत
  2. इंग्लैण्ड व यूरोप
  3. कपास व गन्ने
  4. पानी के जहाज
  5. मित्र

स्तम्भ’अ’को स्तम्भ ‘ब’ से सुमेलित कीजिए

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उत्तर:
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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
खेती करने की तकनीक दुनिया ने किससे सीखी?
उत्तर:
खेती करने की तकनीक दुनिया ने भारत से सीखी।

प्रश्न 2.
भारत में किन वस्तुओं का उत्पादन अच्छी मात्रा में होता था?
उत्तर:
भारत में चीनी, नमक, चाय, अफीम, कपास, गन्ना. मसाले, नौल, रेशम आदि का उत्पादन अच्छी मात्रा में होत

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प्रश्न 3.
भारत में अंग्रेजों के आगमन से पहले कितनी प्रकार के उद्योग प्रचलित थे?
उत्तर:

  1. गाँवों में स्थापित कुटीर उद्योग
  2. शहरों में स्थापित बड़े उद्योग

प्रश्न 4.
पानी के जहाज बनाने की कला में भारत की ज्या स्थिति थी?
उत्तर:
पानी के जहाज बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे था।

प्रश्न 5.
सम्पूर्ण विश्व में किस प्रकार के भारतीय वस्त्र की मांग रहती थी?
उत्तर:
सम्पूर्ण विश्व में कपास और रेशम के महीन कपड़े. विशेषकर ढाका की मलमल की सम्पूर्ण विश्व में मांग रहती थी।

प्रश्न 6.
बंगाल कौनसे वस्त्रों का मुख्य केन्द्र था?
उत्तर:
बंगाल सूती व रेशमी वस्त्र उद्योगों का मुख्य केन्द्र था।

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प्रश्न 7.
भारत के किन देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे?
उत्तर:
भारत के मिस्त्र, यूनान, रोम, बेबीलोन, जावा, सुमाश आदि से व्यापारिक सम्बन्ध थे।

प्रश्न 8.
खेतड़ी से बाहर क्या भेजा जाता था?
उत्तर:
खेतड़ी की खदानों से ताँबा बाहर भेजा जाता था।

प्रश्न 9.
आयात-निर्यात किसे कहते हैं?
उत्तर:
विदेशी बाजारों से माल खरीदने को माल का आयात करना कहते हैं तथा विदेशी बाजारों में अपने देश के माल को बेचना निर्यात कहलाता है।

प्रश्न 10.
दिल्ली का लौह-स्तम्भ किस बात का प्रमाण है?
उत्तर:
दिल्ली (महरौली) में कुतुबमीनार के परिसर में खड़ा लौह-स्तम्भ प्राचीन भारतीय लौह-इस्पात उद्योग की गुणवत्ता का प्रमाण है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में कृषि की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन भारत में कृषि की स्थिति प्राचीन भारत में कृषि एवं सम्बन्धित कार्य लोगों का मुख्य व्यवसाय था। विद्वानों के अनुसार खेती करने की तकनीक विश्व ने भारत से सीखी। भारतीय किसानों ने गेहूँ की खेती इंग्लैण्ड व यूरोप से कई शताब्दी पूर्व आरम्भ को दी। अंग्रेज जब भारत आए तो यहाँ के कृषि विकास को देखकर आश्चर्यचकित थे। जितने अच्छे ढंग से भारत का किसान खेती को खरपतवार से साफ रखता था, मिट्टी, फसल की बुआई और कटाई के बारे में जानकारी रखता था. वह अन्यत्र देशों में देखने को नहीं मिलता था। यही कारण था यहाँ की कृषि अन्य देशों की तुलना में बहुत उन्नत अवस्था में थी। चीनी, नमक, चाय, अफीम, कपास, गण, मसाले, नील, रेशम आदि का उत्पादन अच्छी मात्रा में होगा या एवं विदेशों में इनकी माँग रहती थी।

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प्रश्न 2.
प्राचीन काल में भारतीय उद्योगों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल में भारतीय उद्योगों की स्थिति प्राचीन भारत में उद्योग उन्नत अवस्था में थे। भारत में अंग्रेजों के आने से पहले यहाँ के उद्योगों के विकास का स्तर यूरोप में हुए जोयोगिजिकाल के स्तर से ऊँच था।
(अ) दो प्रकार के उद्योग – उस समय भारत में दो प्रकार के उद्योग प्रचलित थे:

  • गाँवों में स्थापित कुटीर उद्योग तथा
  • शहरों में स्थापित बड़े उद्योग ग्रामीण उद्योग बहुत छोटे पैमाने पर कार्य करते थे तथा वे स्थानीय मांग को पूरा करते थे। नगरों में स्थापित उद्योग विस्तृत बाजारों की मांग को पूरा
  • करते थे। पानी के जहाज बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे था।

(ब) प्रमुख उद्योग – प्राचीन भारत के प्रमुख उद्योग निम्नलिखित थे:

  • जहाज उद्योग – ईसा की 14वीं सदी के प्रारम्भ तक जहाज बनाने का उद्योग इंग्लैण्ड की अपेक्षा भारत में अधिक विकसित था।
  • कपड़ा उद्योग – 1750 के आसपास भारत सम्पूर्ण विश्व में कपड़ा उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी देश था। कपास और रेशम के महीन कपड़े विशेषकर डाका की मलमल की सम्पूर्ण विश्व में मांग रहती थी।
  • धातु उद्योग – पीतल, ताँबे, कांसे की वस्तुओं का उत्पादन सर्वत्र किया जाता था।
  • आभूषण उद्योग – सोने व चांदी के आभूषण, रत्न व्यवसाय, संगमरमर, हाथी दाँत और शीशे पर कलापूर्ण कार्य आदि अन्य महत्त्वपूर्ण उद्योग थे।
  • लौह उद्योग – प्राचीन भारत में लौह-इस्पात उद्योग भी विकसित अवस्था में था। दिल्ली (मेहरोली) स्थित लौह-स्तम्भ इस बात का प्रमाण है।

प्रश्न 3.
“अंग्रेजों के भारत आगमन से पहले हमारा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत समृद्ध था।” विवेचना
उत्तर:
अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व भारत का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व भारत का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत समृद्ध था। भारत दूसरे देशों के साथ व्यापार ईसा से 2000 वर्ष पूर्व भी करता रहा है। मिस्र में ‘मम्मीज’ को भारतीय मलमल से लपेटकर रखा गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में मिल भारत से कपड़े का आयात करता था। यूनान में डाका की मलमल ‘गंगेतिया’ नाम से विकती थी। इसी प्रकार रोम में भी भारत में बनी वस्तुओं की भारी खपत थी। मध्य-पूर्व के देशों में रेशमी कपड़ा. जरी के काम, कीमती पत्थरों और उत्तर –

  1. गाँवों में स्थापित कुटीर उद्योग
  2. शहरों में स्थापित बड़े उद्योग।

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प्रश्न 4.
पानी के जहाज बनाने की कला में भारत की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
पानी के जहाज बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे था।

प्रश्न 5.
सम्पूर्ण विश्व में किस प्रकार के भारतीय वस्त्र की मांग रहती थी?
उत्तर:
सम्पूर्ण विश्व में कपास और रेशम के महीन कपड़े, विशेषकर ढाका की मलमल की सम्पूर्ण विश्व में मांग रहती थी। . प्रश्न 6. बंगाल कौनसे वस्त्रों का मुख्य केन्द्र था? उत्तर:बंगाल सूती व रेशमी वस्त्र उद्योगों का मुख्य केन्द्र था।

प्रश्न 7.
भारत के किन देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे?
उत्तर:
भारत के मिस्र, यूनान, रोम, बेबीलोन, जावा, सुमात्रा आदि से व्यापारिक सम्बन्ध थे।

प्रश्न 8.
खेतड़ी से बाहर क्या भेजा जाता था?
उत्तर:
खेतड़ी की खदानों से तांबा बाहर भेजा जाता था।

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प्रश्न 9.
आयात-निर्यात किसे कहते हैं?
उत्तर:
विदेशी आजारों से माल खरीदने को माल का आयात करना कहते हैं तथा विदेशी बाजारों में अपने देश के माल को बेचना निर्यात कहलाता है।

प्रश्न 10.
दिल्ली का लौह-स्तम्भ किस बात का प्रमाण
उत्तर:
दिल्ली (महरौली) में कुतुबमीनार के परिसर में खड़ा लौह-स्तम्भ प्राचीन भारतीय लौह-इस्पात उद्योग की गुणवत्ता का प्रमाण है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में कृषि की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन भारत में कृषि की स्थिति प्राचीन भारत में कृषि एवं सम्बन्धितस्कार्य लोगों का मुख्य व्यवसाय था। विद्वानों के अनुसार खेती करने की तकनीक विश्व ने भारत से सीखी। भारतीय किसानों ने गेहूँ की खेती इंग्लैण्ड व यूरोप से कई शताब्दी पूर्व आरम्भ की थी। अंग्रेज जब भारत आए तो यहाँ के कृषि विकास को देखकर आश्चर्यचकित थे। जितने अच्छे ढंग से भारत का किसान खेती को खरपतवार से साफ रखता था, मिट्टी, फसल की बुआई और कटाई के बारे में जानकारी रखता था. वह अन्यत्र देशों में देखने को नहीं मिलता था। यही कारण था यहाँ की कृषि अन्य देशों की तुलना में बहुत उन्नत अवस्था में थी। चीनी, नमक, चाय, अफीम, कपास, गन्ना, मसाले, नीला, रेशम आदि का उत्पादन अच्छी मात्रा में होता मो एवं विदेशों में इसकी माँग रहती थी।

प्रश्न 2.
प्राचीन काल में भारतीय उद्योगों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल में भारतीय उद्योगों की स्थिति प्राचीन भारत में उद्योग उन्नत अवस्था में थे। भारत में अंग्रेजों के आने से पहले यहाँ के उद्योगों के विकास का स्तर यूरोप में हुए जौद्योगिक विकास के स्तर से ऊँचा था।
(अ) दो प्रकार के उद्योग – उस समय भारत में दो प्रकार के उद्योग प्रचलित ये:

  • गाँवों में स्थापित कुटीर उद्योग तथा
  • शहरों में स्थापित बड़े उद्योग। ग्रामीण उद्योग बहुत छोटे पैमाने पर कार्य करते थे तथा वे स्थानीय मांग को पूरा करते थे। नगरों में स्थापित उद्योग विस्तृत आजारों की मांग को
  • पूरा करते थे। पानी के जहाज बनाने की कला में भारत यूरोप से आगे था।

(ब) प्रमुख उद्योग – प्राचीन भारत के प्रमुख उद्योग निम्नलिखित थे:

  • जहाज उद्योग – ईसा की 19वीं सदी के प्रारम्भ तक जहाज बनाने का उद्योग इंग्लैण्ड की अपेक्षा भारत में अधिक विकसित था।
  • कपड़ा उद्योग – 1750 के आसपास भारत सम्पूर्ण विश्व में कपड़ा उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी देश था। कपास और रेशम के महीन कपड़े विशेषकर डाका की मलमल की सम्पूर्ण विश्व में मांग रहती थी।
  • धातु उद्योग – पीतल, ताँबे, कांसे की वस्तुओं का उत्पादन सर्वा किया जाता था।
  • आभूषण उद्योग – सोने व चांदी के आभूषण, रत्न व्यवसाय, संगमरमर, हाथी दाँत और शीशे पर कलापूर्ण कार्य आदि अन्य महत्त्वपूर्ण उद्योग थे।
  • लौह उद्योग – प्राचीन भारत में लौह-इस्पात उद्योग भी विकसित अवस्था में था। दिल्ली (मेहरोली) स्थित लौह – स्तम्भ इस बात का प्रमाण है।

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प्रश्न 3.
“अंग्रेजों के भारत आगमन से पहले हमारा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत समृद्ध था।” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व भारत का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व भारत का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत समृद्ध था। भारत दूसरे देशों के साथ व्यापार ईसा से 2000 वर्ष पूर्व भी करता रहा है। मिस्र में ‘मम्मीज’ को भारतीय मलमल से लपेटकर रखा गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में मिल भारत से कपड़े का आयात करता था। यूनान में डाका की मलमल ‘गंगेतिया’ नाम से विकती थी। इसी प्रकार रोम में भी भारत में बनी वस्तुओं की भारी खपत श्री। मध्य-पूर्व के देशों में रेशमी कपड़ों. जरी के काम, कीमती पत्थरों और धातु की बनी वस्तुओं की मांग सदैव बनी रहती थी। ये देश उस समय औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े थे। इसलिए भारत उनसे आयात नहीं करता था। भारतीय व्यापारियों को निर्यात के बदले में प्राय: सोना और चाँदी मिलता था। जिससे सिद्ध होता है कि सोने का देश के भीतर की ओर प्रवाह था।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में विदेशी व्यापार के विकास पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
प्राचीन भारत में विदेशी व्यापार का विकास:
1. वस्तुओं का निर्यात – भारत से मलमल, छींट, जरी के वस्त्र, लोहे व इस्पात की वस्तुएँ, तम्बाकू, नील, शाल, रेशम व रेशमी वस्त्र एवं गरम मसालों का काफी मात्रा में निर्यात किया जाता था। इसके बदले विदेशी व्यापारी हमें जवाहरात, सोना तथा चाँदी देते थे।

2. भारत का अनेक देशों से विदेशी व्यापार – विद्वानों के अनुसार बेबीलोन, मित्र, जावा, सुमात्रा, रोम आदि अनेक देशों से भारत का विदेशी व्यापार होता था। मध्य भारत के पंडालों से जहाज बनाने के लिए लकड़ी निति की जाती थी। खेतड़ी (राजस्थान) की खदानों से तांबा भेजा जाता था। मेवाड़ से जस्ता भेजा जाता था। हीरे, जवाहरात, रेशम के कपड़े व अन्य जवाहरात रोम में भेजे जाते थे। काली मिर्च को यूरोप में बहुत मांग थी। फारस की खाड़ी के दक्षिणी तट पर स्थित नगर ताम्बा, चन्दन तथा सागवान खरीदते थे।

3. आवात – इथोपिया (अफ्रीका) से हाथी दाँत व सोना भारत आता था। बाहर से हमारे देश में घोड़ों का आयात किया जाता था। तीसरी ईस्वी में जब सेम साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा, तो भारत के व्यापारी पूर्वी एशिया से अधिक व्यापार करने लगे। सुवर्णदीप, कम्बोज आदि स्थानों पर भारतीय बस्तियाँ बसने लगी। पूर्व में कलिंग देश के व्यापारी भी पूर्वी एशिया में जाते थे।

4. रेशमी व सूती उत्पादों की बहुलता – प्राचीन काल में अन्तराष्ट्रीय बाजार में भारत के रेशमी व सूती उत्पादों की बहुलता थी। आर्मीनियन और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के रास्ते यहाँ की वस्तुएँ लेकर जाते थे। यहाँ के बने महीन कपड़ों के धान कैटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दरों और रेगिस्तान के पार ले जाते थे। गुजरात के तट पर स्थित सूरत बन्दरगाह के माध्यम से भारत खाड़ी और लाल सागर के बन्दरगाहों से जुड़ा हुआ था। कोरोमंडल तट पर मच्छलीपट्नम् और बंगाल में हुगली के माध्यम से दक्षिण-पूर्वी एशियाई बन्दरगाहों के साथ खूब व्यापार होता था।

5. भू-मार्ग तथा समुद्री मार्ग से विदेशी व्यपार – भारत का विदेशी व्यापार मुख्यतः भू-मार्ग से तथा हिन्दमहासागर – अरबसागर के रास्ते समुद्री मार्ग से अरब देशों तक होता था। विदेशी व्यापारियों द्वारा समुद्री रास्ते की खोज के बाद तो अनेक पाश्चात्य जगत् की कम्पनियाँ भारत के साथ व्यापार करने लगीं, जिनमें मुख्यतः फ्रांस, डच एवं ब्रिटिश कम्पनियाँ थीं।

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