RBSE Solutions for Class 6 Social Science Chapter 18 वैदिक सभ्यता एवं सामाजिक विज्ञानि

Rajasthan Board RBSE Class 6 Social Science Solutions Chapter 18 वैदिक सभ्यता एवं सामाजिक विज्ञानि

RBSE Solutions for Class 6 Social Science

RBSE Solutions for Class 6 Social Science Chapter 18 वैदिक सभ्यता एवं सामाजिक विज्ञानि

RBSE Class 6 Social Science वैदिक सभ्यता एवं सामाजिक विज्ञानि Intext Questions and Answers

गतिविधि

पृष्ठ संख्या – 130

प्रश्न 1.
वैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें कहाँ से प्राप्त होता हैं?
उत्तर:
वैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें वेदों तथा वैदिक साहित्य से प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
वैदिक काल को कितने भागों में बाँटा जा सकता
उत्तर:
वैदिक काल को दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. पूर्व – वैदिक काल
  2. उत्तर – वैदिक काल

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प्रश्न 3.
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ है – “सम्पूर्ण पृथ्वी के प्राणी मात्र के एक ही परिवार का हिस्सा होने की श्रेष्ठ भावना।”

पृष्ठ संख्या – 131

प्रश्न 4.
अपने गुरुजी को पूछ कर बतायें निम्न प्राचीन स्थानों के वर्तमान नाम क्या हैं?

  1. इन्द्रप्रस्थ
  2. पाटलिपुत्र,
  3. मिथिला
  4. कौशल

उत्तर:
प्राचीन स्थानों के नाम – वर्तमान नाम:

  1. इन्द्रप्रस्थ – दिल्ली तथा मेरठ का भू-भाग
  2. पाटलिपुत्र – गया तथा पटना के जिले
  3. मिथिला – आधुनिक जनकपुर
  4. कौशल – उत्तर प्रदेश के अयोध्या फैजाबाद का क्षेत्र

पृष्ठ संख्या – 133

चर्चा करें –
प्रश्न 1.
संयुक्त परिवार प्रथा की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
वैदिक काल में संयुक्त परिवारों की प्रधानता थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  1. चार – पांच पीढ़ियों का साथ-साथ रहना।
  2. परिवार की सम्पत्ति तथा सदस्यों की सुरक्षा।
  3. जीविका के मुख्य साधनों जैसे-कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग-धन्धों आदि में सभी का सम्मिलित योगदान होता था।
  4. परिवार के कार्यों में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता था।

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प्रश्न 2.
वैदिक काल में शिक्षा का माध्यम क्या था?
उत्तर:
वैदिक काल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत थी।

प्रश्न 3.
वैदिक काल की प्रमुख विदुषी स्त्रियों के नाम बताइये।
उत्तर:
वैदिक काल की प्रमुख विदुषी स्त्रियाँ थीं –

  1. घोषा
  2. अपाला
  3. लोपामुद्रा
  4. श्रद्धा।

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प्रश्न 4.
वैदिक काल में व्यक्ति के लिए कितने संस्कारों का विधान था?
उत्तर:
वैदिक काल में व्यक्ति के लिए 16 संस्कारों का विधान था।

पृष्ठ संख्या – 134

प्रश्न 5.
हमारे देश में कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्थाएँ। कौन-कौनसी हैं? सूची बनाएँ।
उत्तर:

  1. संसद (केन्द्रीय स्तर पर)
  2. राज्यों के विधानमण्डल (राज्य स्तर पर)

पृष्ठ संख्या – 136

प्रश्न 6.
वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कौन-कौनसे रीति-रिवाज, प्रथाएँ व संस्कार आज भी प्रचलन में हैं? इनकी सूची बनाइए।
उत्तर:
वैदिक सभ्यता और संस्कृति के निम्नलिखित रीतिरिवाज, प्रथाएँ व संस्कार आज भी प्रचलन में हैं –
1. रीति-रिवाज –

  • सामाजिक – धार्मिक समारोहों में स्वीपुरुष की सहभागिता
  • कर्म व श्रम आधारित सामाजिक

2. प्रथाएँ –

  • संयुक्त परिवार प्रथा
  • नारी का सम्मान
  • बाल विवाह न करना
  • लड़के – लड़कियों की समान शिक्षा व्यवस्था

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न एक व दो के सही उत्तर कोष्ठक में लिखिए –
प्रश्न 1.
वेदों की संख्या है ………………….
(अ) दो
(ब) तीन
(स) चार
(द) पाँच
उत्तर:
(स) चार

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प्रश्न 2.
सरस्वती नदी का प्राचीन नाम है …………………
(अ) विपाशा
(ब) सिन्धु
(स) गोमती
(द) दृषद्वती
उत्तर:
(द) दृषद्वती

प्रश्न 3.
बेदकालीन दो राजनीतिक संस्थाओं के नाम बताइये।
उत्तर:
वेदकालीन दो राजनीतिक संस्थाएँ थीं –

  1. सभा
  2. समिति

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प्रश्न 4.
वैदिक काल में परिवार प्रथा कैसी थी?
उत्तर:
वैदिक काल में परिवार प्रथा वैदिक काल में संयुक्त परिवारों की प्रधानता थी। संयुक्त परिवार में माता-पिता, भाई-बहिन, चाचा-भतीजा, पुत्र पौत्र आदि चार-पांच पीढ़ियाँ एक ही परिवार में साथ-साथ रहती थीं संयुक्त परिवार प्रणाली के मूल में दो बातें प्रमुख थीं –

  1. परिवार की सम्पत्ति तथा सदस्यों की सुरक्षा
  2. सम्मिलित आजीविका।

प्रश्न 5.
‘पणि’ एवं ‘निष्क’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पणि – व्यापारी वर्ग को ‘पणि’ कहा जाता था। निष्क-सोने के सिक्कों को ‘निष्क’ कहा जाता था।

प्रश्न 6.
वेदों के नाम बताइये। इनमें सबसे प्राचीन वेद कौनसा है?
उत्तर:
वेद चार हैं। इनके नाम ये हैं –

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद और
  4. अथर्ववेद इनमें सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है।

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प्रश्न 7.
बेवकालीन शिल्प कला पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वेदकालीन शिल्प कला वेदकालीन शिल्प कला उन्नत अवस्था में थी। आर्यों ने शिल्प कला में बहुत उन्नति की थी। आर्य कपड़ा अच्छा बुनते थे तथा चमड़ा रंगने एवं आभूषण बनाने की कला में भी निपुण थे। बढ़ई लोग हल, बैलगाड़ियाँ, तख्त, चारपाई, नौकाएँ आदि बनाने में निपुण थे। कुछ लोग लोहार, सुनार, कुम्हार आदि का कार्य भी करते थे। इस समय वैद्य भी थे, जो कि चिकित्सा का कार्य करते थे। वेदकालीन आर्य किसी, भी शिल्प को हीन नहीं मानते थे। शिल्पकारों का समाज में सम्मानपूर्ण स्थान था।

प्रश्न 8.
वैदिक संस्कृति की विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:
वैदिक संस्कृति की विशेषताएँ वैदिक संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थी –
1. संयुक्त परिवार प्रथा – वैदिक काल में समाज की मूल इकाई परिवार थी। पिता परिवार का मुखिया होता था। वैदिक काल में संयुक्त परिवारों को प्रधानता थी। संयुक्त परिवार में माता-पिता, भाई-बहिन, चाचा-भतीजा, पुत्रपौत्र आदि चार-पांच पीढ़ियाँ एक ही परिवार में साथ-साथ रहती थीं। संयुक्त परिवार प्रणाली के मूल में दो बातें प्रमुख थीं –

  • परिवार की सम्पत्ति तथा सदस्यों की सुरक्षा
  • सम्मिलित आजीविका।

2. नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा – वैदिक काल में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान था। शिक्षा का आधार सादा जीवन तथा उच्च विचार था। गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। लड़केलड़कियों को समान रूप से शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का माध्यम संस्कृत था। शिक्षा का प्रधान लक्ष्य बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास तथा आचरण की पवित्रता को विकसित करना था।

3. नारी का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान – वैदिक काल में समाज में स्थियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। समाज में उन सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त था। परिवार में स्वी को पुरुषों की भौति सभी अधिकार प्राप्त थे। सामाजिक व धार्मिक समारोहों पर स्त्रियाँ पुरुषों के साथ भाग लेती थीं। इस काल में पर्दाप्रथा नहीं थी। लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी।

4. संस्कार – वैदिक संस्कृति में संस्कारों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बच्चे के जन्म, यज्ञोपवीत, विवाह, मृत्यु आदि के अवसर पर विधि-विधान से अनुष्ठानों एवं संस्कारों की प्रथा प्रचलित थी। इस युग में एक व्यक्ति के जीवन में जन्म से मृत्युपर्यन्त कुल 16 संस्कारों का प्रचलन था। यज्ञ जीवन का आवश्यक अंग था। इसे स्त्री-पुरुष दोनों करते थे। अधिकांश संस्कार मन्त्रोच्चार एवं यज्ञ के साथ सम्पन्न होते थे।

5. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना – ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ है “सम्पूर्ण पृथ्वी के प्राणी मात्र के एक ही परिवार का हिस्सा होने की श्रेष्ठ भावना।” वैदिक काल में प्रत्येक व्यक्ति इस भावना से व्यवहार करता था “सर्वे भवन्तु सुखिनः”

6. आश्रम व्यवस्था – मनुष्य जीवन की आयु को 100 वर्ष मानकर आश्रम जीवन को चार भागों में बांटा गया है –

  • ब्रह्मचर्य आश्रम – इसमें यज्ञोपवीत संस्कार से 25 वर्ष की आयु तक व्यक्ति अविवाहित रहते हुए गुरुकुल में रहकर विद्या अध्ययन करता था।
  • गृहस्थ आश्रम – गृहस्थाश्रम की आयु 25-50 वर्ष तक मानी गई थी। गृहस्थ पर सम्पूर्ण समाज का दायित्व होता है। विवाह इस आश्रम का मुख्य संस्कार है। यह आश्रम अन्य सभी आश्रमों का पोषक है।
  • वानप्रस्थ आश्रम – वानप्रस्थाश्रम की आयु 50-75 वर्ष तक के बीच मानी गई है। इस आश्रम में व्यकिा परिवार के दायित्व से मुक्त होकर अपना जीवन गाँव के निकट जंगल में बिताता था तथा वह सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए सोचता था। गृहस्थों को सलाह देना इस आश्रम की मुख्य विशेषता थी।
  • संन्यास आश्रम – संन्यास आश्रम में मनुष्य की आयु 75-100 वर्ष मानी गयी है। इस काल में व्यकिा अपना सम्पूर्ण भाग उस परम पिता परमात्मा को सौंप कर समाज को ही
  • अपना आराध्य मानकर जीवन के शेष 25 वर्ष समाज की सेवा के लिए समर्पित करता है। इस आश्रम में व्यक्ति एक जगह नहीं रहता, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर विचरण करता हुआ लोगों को सदाचार की शिक्षा देता था।

7. वर्ण व्यवस्था – वर्ण व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप बहुत अच्छा था। वह कर्म और श्रम के सिद्धान्त पर आधारित थी। जन्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं था। कर्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, अत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र हो सकता था। वर्ण व्यवस्था व्यवसाय से जुड़ी हुई थी और वर्ण-विभाजन जन्मजात नहीं था। आवश्यकतानुसार कोई भी व्यक्ति अपना व्यवसाय बदल सकता था और इसके साथ ही उसका वर्ष भी बदल जाता था।

इन वर्गों में अपने खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्धों पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं था और न ही छुआछूत थी। न तो किसी वर्ण को छोटा माना जाता था और न ही अपवित्र। इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था जन्म-प्रधान न होकर कर्म-प्रधान थी।

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प्रश्न 9.
वैदिक काल की शिक्षा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैदिककालीन शिक्षा – वैदिक काल में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान था। शिक्षा का आधार सादा जीवन उच्च विचार था। गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। लड़के-लड़कियों को समान रूप से शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का माध्यम -संस्कृत था। उस समय संस्कृत भाषा काफी उन्नत अवस्था में थी। शिक्षा का प्रधान लक्ष्य बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास तथा आचरण की पवित्रता को विकसित करना था।

प्रश्न 10.
वेदकालीन आश्रम व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वेदकालीन आश्रम व्यवस्था मनुष्य जीवन की आयु को 100 वर्ष मानकर आश्रम जीवन को चार भागों में बाय गया है –
1. ब्रह्मचर्य आश्रम – इसमें यज्ञोपवीत संस्कार से 25 वर्ष की आयु तक व्यक्ति अविवाहित रहते हुए गुरुकुल में रहकर विद्या अध्ययन करता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में जो कुछ सीखता था, उसको वह अपने व्यवहार में उतारने का कार्य गृहस्थाश्रम में करता था।

2 . गृहस्थ आश्रम – गृहस्थ आश्रम की आयु 25-50 वर्ष तक मानी गई थी। गृहस्थ पर सम्पूर्ण समाज का दायित्व होता है। विवाह इस आश्रम का मुख्य संस्कार है। यह आश्रम अन्य सभी आश्रमों का पोषक है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी तथा संन्यासियों का पोषण तो गृहस्थ ही करते थे।

3. वानप्रस्थ आश्रम – वानप्रस्थाश्रम की आयु 50-75 वर्ष तक के बीच मानी गई है। इस आश्रम में व्यक्ति परिवार के दायित्व से मुक्त होकर अपना जीवन गाँव के निकट जंगल में बिताता था। गृहस्थ आश्रम में वह अपने परिवार के कल्याण के लिए सोचता था, किन्तु यहाँ पर वह सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए सोचता था। गृहस्थों को सलाह देना इस आश्रम की मुख्य विशेषता थी।

4. संन्यास आश्रम-संन्यास आश्रम मनुष्य की आयु का 75-100 वर्ष माना गया है। इस काल में व्यक्ति अपना सम्पूर्ण भाग ईश्वर को सौंप कर समाज को ही अपना आराध्य मानकर जीवन के शेष 25 वर्ष समाज की सेवा के लिए समर्पित करता है। इस आश्रम में व्यक्ति एक जगह नहीं रहता, बल्कि अलग – अलग स्थानों पर विचरण करता हुआ लोगों को सदाचार की शिक्षा देता था।

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प्रश्न 11.
वेदकालीन व्यापार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वेदकालीन व्यापार:
आर्य लोग व्यापार भी करते थे। व्यापारी वर्ग को ‘पणि’ कहा जाता था। विदेशी व्यापार जल तथा स्थल दोनों मागों से होता था। व्यापार के लिए वस्तु-विनिमय का प्रयोग होता था। ऋग्वेद के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ‘निष्क’ नामक सोने का सिक्का भी प्रचलित था। इस सिक्के का प्रयोग मुद्रा के रूप में किया जाता था। उस समय वस्तुएँ ऊँटों, छकड़ों एवं घोड़ों के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाती थी।

प्रश्न 12.
वेद के भाग कौन-कौनसे हैं?
उत्तर:
बेद के भाग वेद के चार भाग हैं –

  1. संहिता – ग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद को “संहिता’ कहा जाता है।
  2. ब्राह्मण – ब्राह्मण ग्रन्थ वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये हैं।
  3. अरण्यक – इनमें बज्ञों के स्थान पर ज्ञान एवं चिन्तन का प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार ये दार्शनिक रचनाएँ हैं।
  4. उपनिषद् – वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग उपनिषद् हैं जिन्हें ‘वेदाना’ भी कहा जाता है। उपनिषद् मुख्यतया ज्ञानमार्गी रचनाएँ हैं। इनका मुख्य विषय ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है। उपनिषद् वह साहित्य है जिसमें रहस्यात्मक ज्ञान एवं सिद्धान्त का संकलन है।

RBSE Class 6 Social Science वैदिक सभ्यता एवं सामाजिक विज्ञानि Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

Question 1.
सबसे प्राचीन वेद कौनसा है?
(अ) अग्वेद
(ब) यजुर्वेद
(स) सामवेद
(द) अथर्ववेद
उत्तर:
(अ) अग्वेद

Question 2.
गायत्री मन्त्र किस वेद का मन्त्र है?
(अ) ऋग्वेद
(ब) यजुर्वेद
(स) सामवेद
(द) अथर्ववेद
उत्तर:
(अ) ऋग्वेद

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Question 3.
वेद के कितने भाग हैं?
(अ) पांच
(ब) चार
(स) तीन
(द) दो
उत्तर:
(ब) चार

Question 4.
वैदिककाल की परम विदुषी महिला थी …………………
(अ) भारती
(ब) अवन्ति
(स) शकुन्तला
(द) अपाला
उत्तर:
(द) अपाला

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Question 5.
वैदिककाल में कुल संस्कारों का प्रचलन था …………………
(अ) 16
(ब) 8
(स) 12
(द) 10
उत्तर:
(अ) 16

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. सबसे पहले …………………. लिखा गया।
  2. वैदिक काल में …………………. परिवार का मुखिया होता
  3. पोषा तथा वैदिक काल की परम विदुषी स्त्रियाँ थीं।
  4. वर्ण व्यवस्था …………………. के सिद्धान्त पर आधारित थी।
  5. ‘जन’ का अधिकारी …………………. कहलाता था।

उत्तर:

  1. ऋग्वेद
  2. पिता
  3. अपाला
  4. कर्म और श्रम
  5. ‘शासक’ अथवा ‘राजन’

स्तम्भ’अ’ को स्तम्भ’ब’ से सुमेलित कीजिए

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उत्तर:
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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें किससे प्राप्त होता हैं?
उत्तर:
वैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें वेदों तथा वैदिक साहित्य से प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
वेद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सत्य एवं ज्ञान के बीज हमें वेदों से प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 3.
वेद कितने हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
वेद चार हैं। ये हैं –

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद
  4. अथर्ववेद

प्रश्न 4.
वेद के चार भागों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वेद के चार भाग ये हैं –

  1. संहिता
  2. ब्राह्मण
  3. अरण्यक
  4. उपनिषद्।

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प्रश्न 5.
धर्म का क्या अर्थ है?
उत्तर:
धर्म के अन्तर्गत सत्य बोलना, चोरी न करना, कर्म व वचन से पवित्रता का पालन करना, काम-क्रोध पर नियन्त्रण, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, दान-धर्म करना आदि शामिल हैं।

प्रश्न 6.
वैदिक काल में शिक्षा का प्रधान लक्ष्य क्या था?
उत्तर:
वैदिक काल में शिक्षा का प्रधान लक्ष्य बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास तथा आचरण की पवित्रता को विकसित करना था।

प्रश्न 7.
वैदिक काल में मानव-जीवन को कितने आश्रमों में बाँटा गया था?
उत्तर:

  1. ब्रह्मचर्य आश्रम
  2. गृहस्थ आश्रम
  3. वानप्रस्थ आश्रम
  4. संन्यास आश्रमा

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प्रश्न 8.
जन का प्रमुख अधिकारी क्या कहलाता था?
उत्तर:
जन का प्रमुख अधिकारी ‘शासक’ अथवा ‘राजन’ कहलाता था।

प्रश्न 9.
राजन के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. राज्य के कर्मचारियों तथा अधिकारियों को नियुक्त करना अथवा पदच्युत करना
  2. न्याय करना।

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प्रश्न 10.
विवाह किस आश्रम का मुख्य संस्कार है?
उत्तर:
विवाह गृहस्थ आश्रम का मुख्य संस्कार है।

प्रश्न 11.
गृहस्थों को सलाह देना किस आश्रम की मुख्य विशेषता है?
उत्तर:
गृहस्थों को सलाह देना वानप्रस्थ आश्रम की मुख्य विशेषता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैदिक संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वैदिक संस्कृति वैदिक संस्कृति भारत की सनातन संस्कृति है। वैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें वेदों या वैदिक साहित्य से प्राप्त होता है। वैदिक संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ थीं –

  1. संयुक्त परिवार प्रथा का प्रचलन
  2. नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा
  3. नारी का समाज में सम्माननीय स्थान
  4. जीवन में 16 संस्कारों का महत्व
  5. वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना तथा
  6. आश्रम व्यवस्था

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प्रश्न 2.
वैदिककालीन धर्म एवं दर्शन पर एक टिप्पणी लिखिए। ..
उत्तर:
वैदिककालीन धर्म एवं दर्शन सम्पूर्ण भारतीय जीवन, दर्शन और साहित्य का आधार धर्म ही रहा है। भारतीय संस्कृति के परम प्राण धर्म में ही विद्यमान हैं। धर्म के अन्तर्गत सत्य बोलना, चोरी न करना, कर्म व वचन से पवित्रता का पालन करना तथा काम, क्रोध एवं इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना, दान-धर्म करना आदि बातें सम्मिलित हैं। वैदिक धर्म व दर्शन मानव को विश्व मानव बनाने की योग्यता रखता है।

प्रश्न 3.
सभा व समिति के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राजा को परामर्श देने के लिए सभा व समिति नामक दो संस्थाएँ होती थी –

  1. समिति – समिति जनता के सदस्यों का संगठन था।
  2. सभा – सभा केवल मुख्य पदाधिकारियों एवं विद्वानों की बैठक थी। सभा तथा समिति को काफी प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे। वे राजा को पदच्युत एवं निर्वासित कर सकती थीं। वे राजा को शासन कार्य चलाने में सहायता देती थी और उसकी शक्तियों पर अंकुश रखती थीं। शक्तिशाली राजा भी इन संस्थाओं के निर्णयों की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

प्रश्न 4.
ऋग्वैदिककालीन पाँच नदियों के वर्तमान नाम बताइये।
उत्तर:
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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैदिककालीन राजनैतिक जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैदिककालीन राजनीतिक जीवन –
1. जन – आर्यों के राजनीतिक जीवन का मूल आधार कुटुम्ब था। कई कुटुम्बों को मिलाकर एक ‘ग्राम’ बनता था। ग्राम के अधिकारी को ‘ग्रामणी’ कहते थे। कई ग्रामों के समूह को मिलाकर एक ‘विश’ बनता था जिसका अधिकारी ‘विशपति’ कहलाता था। कई विशों के समूह से ‘जन’ नामक इकाई बनती थी, जिसके अधिकारी को ‘शासक’ अथवा ‘राजन’ कहा जाता था।

2. राजन और मन्त्रिपरिषद् और उनके कार्य – राजन राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था। सामान्यतः राजा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शासक बनता था अर्थात् उसका पद पैतृक था, परन्तु कभी-कभी जनता नए राजा का निर्वाचन भी करती थी। राज्य की समस्त शक्तियाँ उसके हाथों में केन्द्रित थीं। वह राज्य के कर्मचारियों तथा अधिकारियों को नियुक्त करता था तथा उन्हें पदोन्नत एवं पदच्युत भी कर सकता था। उसका निर्णय अन्तिम समझा जाता था। किन्तु वह निरंकुश नहीं था। वह मनमानी नहीं कर सकता था। अपने मन्त्रिपरिषद् से विचार-विमर्श करने के बाद वह अपनी नीति-निर्धारण कर सकता था। प्रशासनिक कार्यों में राजा की सहायता करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख अधिकारी होते थे –

  • पुरोहित (राजा का प्रमुख सलाहकार)
  • सेनानी (सेना का प्रधान) तथा
  • ग्रामणी (गाँव का मुखिया)

3. सभा और समिति – राजा को परामर्श देने के लिए सभा तथा समिति नामक दो संस्थाएँ भी थीं। समिति जनता के सदस्यों का संगठन था, जबकि सभा केवल मुख्य पदाधिकारियों एवं विद्वानों की बैठक थी। सभा तथा समिति को काफी प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे। वे राजा को पदच्युत एवं निर्वाचित कर सकती थी। वे राजा को शासन कार्य चलाने में सहायता देती थी और उनकी शक्तियों पर अंकुश रखती थीं। शक्तिशाली राजा भी इन संस्थाओं के निर्णयों की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

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प्रश्न 2.
वैदिककालीन आर्थिक जीवन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
वैदिककालीन आर्थिक जीवन-वैदिककालीन आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थी –
1. कृषि – आर्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। ये लोग गेहूँ, जौ, चावल आदि फसलें पैदा करते थे। इस काल में कृषि वर्षा पर निर्भर थी। वर्षा के अभाव में कुएँ तथा नहरें भी जल-सिंचाई के साधन थे। खेती का काम हल व बैल से किया जाता था। अच्छी फसल के लिए खाद का प्रयोग भी किया जाता था। भूमि दो प्रकार की होती थी –

  • उर्वरा भूमि – इस भूमि पर फसल पैदा हो सकती थी।
  • खिल्य भूमि – यह भूमि बंजर भूमि होती थी। ऐसी भूमि पर समस्त गाँव का अधिकार होता था, वहाँ पर ग्रामीण अपने पशु चराते थे।

2. पशुपालन – आर्यों का दूसरा मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। उस समय आर्य लोग गाय, भैंस, भेड़, बकरी एवं घोड़ा आदि पशुओं का पालन करते थे। गाय का उनके जीवन में विशेष महत्व था।

3. शिल्प कला – आर्यों ने शिल्प कला में भी बहुत उन्नति की थी। वे अच्छा कपड़ा बुनते थे तथा चमड़ा रंगने एवं आभूषण बनाने की कला में भी निपुण थे। बढ़ई लोग | हल, बैलगाड़ियाँ, तख्त, चारपाई, नौकाएं आदि बनाते थे। कुछ लोग लोहार, सुनार, कुम्हार आदि का कार्य भी करते थे। इस समय वैद्य भी थे जो कि चिकित्सा का कार्य करत थे। इस युग के आर्य किसी भी शिल्प को हीन नहीं समझते थे। शिल्पकारों का समाज में सम्मानपूर्ण स्थान था।

4. व्यापार – आर्य लोग व्यापार भी करते थे। व्यापारी वर्ग को ‘पणि’ कहा जाता था। विदेशी व्यापार जला और स्थल दोनों मार्गों से होता था। व्यापार के लिए वस्तु विनिमय का प्रयोग होता था। ऋग्वेद के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ‘निष्क’ नामक सोने का सिक्का भी प्रचलित था। इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में किया जाता था। उस समय वस्तुएँ ऊँटों, छकड़ों एवं घोड़ों के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाती थी।

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