RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Rajasthan Board RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Textbook Exercise Questions and Answers.

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RBSE Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

RBSE Class 12 History संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत InText Questions and Answers

(पृष्ठ सं. 413) 

प्रश्न 1. 
उद्देश्य प्रस्ताव में 'लोकतान्त्रिक' शब्द का इस्तेमाल न करने के लिये जवाहरलाल नेहरू ने क्या कारण बताया था ?
उत्तर:
उन्हें लगा कि यह तो स्वाभाविक ही है कि 'गणराज्य' शब्द में यह शब्द पहले से ही निहित होता है।

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(पृष्ठ सं. 415) 

प्रश्न 2. 
स्रोत-2 में वक्ता को ऐसा क्यों लगता है कि संविधान सभा ब्रिटिश बन्दूकों के साये में काम कर रही है ?
उत्तर:
वक्ता को यहाँ लगता है कि सत्ता का बुनियादी प्रश्न अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। 

(पृष्ठ सं. 416) 

प्रश्न 3. 
जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव पर अपने भाषण में कौन-से विचार पेश किए ? उत्तरपण्डित जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव पर निम्नलिखित विचार व्यक्त किये 

  1. भारत एक स्वतन्त्र सम्प्रभु गणराज्य होगा। 
  2. अल्पसंख्यक, पिछड़ों तथा जनजातियों को सभी अधिकार मिलेंगे। 
  3. हमें अमेरिका के महान संविधान-निर्माताओं से प्रेरणा लेनी चाहिए। 
  4. टेनिस कोर्ट की शपथ को हमें याद रखना चाहिये।
  5. सोवियत समाजवादी गणराज्य की क्रान्ति का उदाहरण हमारे सामने है। 
  6. हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं। 
  7. यहाँ नेहरू जी के अतीत-प्रेम का भी पता चलता है।
  8. भारतीय संविधान का उद्देश्य यह होगा कि लोकतन्त्र के उदारवादी विचारों तथा आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश किया जायेगा।

(पृष्ठ सं. 418) 

प्रश्न 4. 
स्रोत 3 तथा 4 को पढ़िए। पृथक निर्वाचिकाओं के विरोध में कौन-कौनसे तर्क दिए गए
उत्तरl:

  1. सरदार पटेल ने कहा कि विश्व में कहीं भी पृथक निर्वाचिका नहीं है।
  2. देश में विभाजन के बाद भी पृथक निर्वाचिका को रखा जायेगा तो यहाँ जीने का कोई अर्थ नहीं होगा।
  3. हम सबका भला इसी में है कि हम अतीत को भूल जाएँ।
  4. एक दिन हम सब एकजुट हो जाएंगे। .
  5. अंग्रेजों की पृथक निर्वाचिका की बात करना शरारत भरा कार्य है।
  6. पण्डित गोविन्द वल्लभ पन्त के अनुसार पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी।
  7. यदि हमें अलग-अलग कर दिया जाये तो हम कभी भी स्वयं को बहुसंख्यकों के रूप में स्थापित नहीं कर पायेंगे।
  8. यदि अल्पसंख्यक पृथक निर्वाचिकाओं से जीतकर आते रहे तो कभी प्रभावी योगदान नहीं दे पायेंगे।

प्रश्न 4. 
महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए ?
अथवा
हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गाँधीजी द्वारा प्रस्तावित करने के कारणों की परख कीजिए।
उत्तर:
भाषा विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम है। अतः किसी भी देश में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने हेतु एक भाषा का होना आवश्यक है। भारत बहुभाषा-भाषी देश है तथा यहाँ विभिन्न संस्कृतियों को आश्रय प्राप्त हुआ है। अतः यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। भाषा के सन्दर्भ में गाँधीजी का मानना था कि सभी भारतवासियों को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिन्दी और उर्दू के संयोग अर्थात् मेल से बनी हिन्दुस्तानी भाषा भारत के बहुत बड़े हिस्से में बोली जाती है।

यह विभिन्न संस्कृतियों के शब्दों को अपने में संजोये एक ऐसी गतिमान भाषा थी जो नित नवीन रूप धारण किये जा रही थी। इस भाषा की समृद्धता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। अतः गाँधीजी को लगता था कि यह बहुसांस्कृतिक भाषा विविध समुदायों के मध्य संचार की आदर्श भाषा बन सकती है। यह भाषा उत्तर तथा दक्षिण को एवं हिन्दू तथा मुसलमानों को एकजुट कर सकती है। इन सभी कारणों से गाँधीजी को लगता था कि 'हिन्दुस्तानी' ही राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए।

प्रश्न 5. 
वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया ?
उत्तर:
निश्चय ही संविधान को दिशा देने में अनेक शक्तियों का योगदान रहा है, इसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझ सकते हैं

  1. भारत में शिक्षा का प्रचार विशेषकर अंग्रेजी शिक्षा के कारण एक नवीन मध्यम वर्ग का उदय हुआ। 
  2. इस मध्यम वर्ग ने अनेक सामाजिक तथा सांस्कृतिक बुराइयों के विरुद्ध आन्दोलन चलाये, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक जागरूकता उत्पन्न हुई। इस कारण अनेक नियम-कानून भी बनाये गये। 
  3. राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से महिलाओं के उत्थान के लिये अनेक प्रयास हुए जिनके परिणामस्वरूप तत्कालीन राजनेता भी सकारात्मक रूप से प्रभावित हुए और उन्होंने संविधान निर्माण में महिलाओं के अधिकारों का विशेष ध्यान रखा। 
  4. भारत में अंग्रेजों के दमन के कारण 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अत्यधिक राजनैतिक चेतना जाग्रत हुई जिसके फलस्वरूप दमित वर्ग, पिछड़े वर्ग तथा आदिवासियों के क्षेत्र से अनेक नेता उभरकर सामने आये जिन्होंने अनेक सफल आन्दोलनों का भी संचालन किया। 
  5. रंगा, पेरियार, अम्बेडकर इत्यादि अनेक वर्गों के नेताओं ने तीव्र आन्दोलन चलाये। 
  6. स्वामी विवेकानन्द ने जब हिन्दू धर्म में सुधार के लिये अभियान चलाया तो वह धर्मों को और अधिक न्यायसंगत बनाने का प्रयास कर रहे थे। महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले ने दमित जातियों के उत्पीड़न का प्रश्न उठाया, साम्यवादी तथा समाजवादियों ने श्रमिकों एवं कृषकों को एकजुट किया। इस प्रकार ये सभी आर्थिक तथा सामाजिक न्याय के लिये ही संघर्ष कर रहे थे। 
  7. राष्ट्रीय आन्दोलन निश्चित रूप से एक दमनकारी सरकार के विरुद्ध लोकतन्त्र एवं न्याय की स्थापना का संघर्ष था।

प्रश्न 6.
दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावे निम्नलिखित हैं
(1) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने राष्ट्रीय आन्दोलन के समय पृथक निर्वाचिकाओं की माँग दमित वर्ग के लिए की थी। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि ऐसा करने से यह समुदाय स्थायी रूप से शेष समाज से कट जायेगा। संविधान सभा में इस प्रश्न पर अत्यधिक विवाद हुआ।

(2) संविधान सभा में उपस्थित दमित जातियों के प्रतिनिधियों का आग्रह था कि अस्पृश्यों की समस्या को केवल संरक्षण एवं बचाव के द्वारा ही हल नहीं किया जा सकता। उनकी अपंगता के पीछे जातियों में विभाजित समाज के सामाजिक नियम-कानून एवं नैतिक मूल्यों व मान्यताओं का हाथ है। समाज ने अपनी स्वार्थ साधना हेतु उनका पर्याप्त उपयोग किया है लेकिन सामाजिक रूप से
उन्हें अपने से दूर रखा है। अन्य जातियों के लोग उनसे मिलने में हिचकिचाहट महसूस करते हैं। वे उनके साथ भोजन नहीं करते हैं तथा उन्हें मन्दिरों में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता है।

(3) मद्रास के एक सदस्य जे. नागप्पा ने कहा था, "हम सदा कष्ट उठाते आये हैं किन्तु अब हम और अधिक कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हमें अपने उत्तरदायित्वों का अहसास हो चुका है। हम जानते हैं कि हमें अपनी बात कैसे मनवानी है। जे. नागप्पा ने कहा कि संख्या की दृष्टि से दलितवर्ग अल्पसंख्यक नहीं है। जनसंख्या में उनका कुल अनुपात लगभग 20-25 प्रतिशत है। उनकी समस्या का कारण यह है कि उन्हें सदैव समाज तथा राजनीति में हाशिए पर रखा गया है जिसका कारण यह है कि उनकी न तो शिक्षा तक सही पहुँच थी और न ही शासन में भागीदारी।

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(4) इस सम्बन्ध में श्री. के. जे. खांडेलकर का निम्नलिखित कथन महत्वपूर्ण है "हमें हजारों साल तक दबाया गया है।...दबाया गया...इस सीमा तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करते तथा अब हमारां हृदय भी भावशून्य हो चुका है। अब हमारी स्थिति आगे बढ़ने योग्य नहीं रह गयी है। यही हमारी वस्तुस्थिति

(5) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने बँटवारे की हिंसा के उपरान्त पृथक निर्वाचन की माँग छोड़ दी। उन्होंने संविधान सभा को निम्नलिखित सुझाव दिए

  1. स्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए। 
  2. हिन्दू मन्दिरों को सभी जातियों के लिये खोल दिया जाए। 
  3. दमित समूहों को विधायिका तथा सरकारी नौकरी में पर्याप्त आरक्षण दिया जाए।
  4. बहुत से व्यक्तियों का मानना था कि इससे सभी समस्याएँ समाप्त नहीं हो पायेंगी। सामाजिक भेदभाव को केवल संवैधानिक कानून द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिये समाज की सोच में परिवर्तन लाना होगा। जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया।

प्रश्न 7. 
संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की आवश्यकता के बीच क्या सम्बन्ध देखा ?
उत्तर:
तत्कालीन भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश शासन के समय जिस संवैधानिक व्यवस्था का अनुभव किया तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान जो प्रभाव देखा उससे केन्द्र की सशक्तता एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में उभरी थी। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति एवं एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच निम्नलिखित सम्बन्ध देखा
(1) जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्रवादी, जो भारत में एक मजबूत केन्द्र चाहते थे, ने इस विषय में कहा, "अब विभाजन एक हकीकत बन चुका है एक दुर्बल केन्द्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिये हानिकारक होगी क्योंकि ऐसा केन्द्र शान्ति स्थापित करने में, आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पूर्ण देश के लिये आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा।"

(2) मुस्लिम लीग द्वारा उस समय की राजनीति में चलाये गये पृथकतावादी आन्दोलन से देश अत्यधिक रूप से साम्प्रदायिक झगड़ों से त्रस्त था। इस समय रियासतों का एकीकरण निश्चय ही एक गम्भीर समस्या थी। . इस सम्बन्ध में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का कथन महत्वपूर्ण है "1935 के भारत सरकार अधिनियम में हमने जो केन्द्र बनाया था उससे भी ज्यादा शक्तिशाली केन्द्र हम चाहते हैं।"
पण्डित जवाहरलाल नेहरू तथा डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को एक शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता इसलिए अनुभव हुई क्योंकि ब्रिटिश शासन के समय जो आर्थिक शोषण तथा बदहाली का समय था, वह शीघ्र ही समाप्त हो सके।

(3) संयुक्त प्रान्त के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला कि आज की परिस्थितियों में एक शक्तिशाली केन्द्र का होना अति आवश्यक है ताकि वह देश के हित में योजना बनाकर, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके, एक उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सके तथा राष्ट्र को विदेशी आक्रमणों से बचा सके।

(4) भारत विभाजन से पूर्व कांग्रेस ने प्रान्तों को अधिक स्वायत्तता देने पर अपनी सहमति प्रदान की थी। एक सीमा तक मुस्लिम लीग को भरोसा दिलाया कि जिन प्रान्तों में उनकी सरकार बनी है वहाँ हस्तक्षेप नहीं होगा, लेकिन देश के विभाजन के पश्चात् अब एक विकेन्द्रीकृत संरचना हेतु पहले जैसे राजनैतिक दबाव नहीं रह गये थे। अतः शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता पर बल दिया गया।

(5) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा देश में पहले से ही थोपी गयी एकल राजनैतिक व्यवस्था विद्यमान थी। उस समय में हुई घटनाओं से केन्द्र की स्थापना को बढ़ावा मिला। इसे अराजकता पर अंकुश लगाने एवं देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए और भी आवश्यक माना जाने लगा। इस प्रकार तत्कालीन परिस्थितियों में संविधान में भारतीय संघ के घटक राज्यों की तुलना में केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया। 

प्रश्न 8. 
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिये क्या रास्ता निकाला ? 
अथवा 
भारत की संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर काफी बहस हुई। सभा के सदस्यों द्वारा इस विषय पर दी गई दलीलों की परख कीजिए।
उत्तर:
भारत एक बहुसंस्कृति वाला बहुभाषी राष्ट्र भी है। भाषा की यह बहुतायत निश्चय ही कभी-कभी समस्या भी उत्पन्न कर सकती है। यह स्थिति संविधान निर्माण के समय में उत्पन्न हुई। संविधान सभा में इस सन्दर्भ में अनेक तर्क-वितर्क दिये गये। इस समय भाषा की समस्या सुलझाने के लिये अनेक प्रयास किये गये जिन्हें हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझ सकते हैं ।
(1) हिन्दुस्तानी भाषा-20वीं शताब्दी के तृतीय दशक तक काँग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि हिन्दुस्तानी को ही राष्ट्रीय भाषा का स्थान दिया जाये। यह भाषा हिन्दी तथा उर्दू का सम्मिलित रूप थी। इस समय हिन्दू तथा मुसलमानों का मानना था कि राष्ट्रभाषा का दर्जा न तो हिन्दी को मिले न ही उर्दू को। यहाँ मध्यम मार्ग हिन्दुस्तानी भाषा थी जो हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, अरबी तथा फारसी के विभिन्न शब्दों से बनी थी। यहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था कि देश की राष्ट्रीय भाषा ऐसी होनी चाहिये जो सभी देशवासियों की पहुँच में हो।

(2) गाँधीजी का मत-20वीं शताब्दी के मध्य तक हिन्दुस्तानी भाषा धीरे-धीरे बदल रही थी। स्वतंत्रता का संघर्ष जैसे-जैसे तीव्र होने लगा, वैसे-वैसे साम्प्रदायिक टकराव भी बढ़ने लगा, किन्तु दुर्भाग्य से हिन्दी तथा उर्दू के मध्य खाई बढ़ती जा रही थी। गाँधीजी की आस्था अभी भी हिन्दुस्तानी भाषा में बनी हुई थी। .

(3) नवीन सूत्र का उद्भव-संविधान की एक भाषा समिति भी थी जिसे राष्ट्र की भाषा में गहन अनुसन्धान करना था। इसने गहन अनुसन्धान के उपरान्त एक नवीन सूत्र दिया।

(4) धुलेकर का समर्थन संयुक्त प्रान्त के एक सदस्य आर. बी. धुलेकर ने हिन्दी के समर्थन में अत्यधिक प्रयास किया। जब किसी ने कहा कि संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों को हिन्दी नहीं आती, इस पर धुलेकर बोले "जो सदस्य हिन्दी नहीं समझते, उन्हें संविधान सभा की सदस्यता के अयोग्य माना जाये। उन्हें यहाँ से चले जाना चाहिए।" इस कथन पर हंगामा खड़ा हो गया तथा नेहरूजी के हस्तक्षेप से शान्ति स्थापित हो सकी।

(5) भाषा समिति का सुझाव भाषा समिति का यह सुझाव था कि देवनागरी लिपि में हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी, किन्तु समिति ने इस सूत्र की घोषणा नहीं की। यहाँ बीच का मार्ग सुझाया गया कि हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये धीरे-धीरे ही आगे बढ़ना चाहिये। इसके लिये शीघ्रता नहीं करनी चाहिये। समिति का सुझाव था कि प्रथम 15 वर्षों तक सरकारी कार्यों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रान्त को अपनी एक स्वतन्त्र भाषा के चयन का अधिकार होगा। मानचित्र कार्य

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प्रश्न 9. 
वर्तमान भारत के राजनीतिक मानचित्र पर यह दिखाइए कि प्रत्येक राज्य में कौन-कौनसी भाषाएँ बोली जाती हैं। इन राज्यों की राजभाषा को चिह्नित कीजिए। इस मानचित्र की तुलना 1950 के दशक के प्रारम्भ के मानचित्र से कीजिए। दोनों मानचित्रों में आप क्या अन्तर पाते हैं ? क्या इन अन्तरों से आपको भाषा तथा राज्यों के आयोजन के सम्बन्धों के विषय में कुछ पता चलता है ?
उत्तर:
हमारा भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 को गणतन्त्र बना, किन्तु भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन 1956 ई. में ही हो सका। वर्तमान समय में भारत में कुल 28 राज्य तथा 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं, जिनकी भाषाओं का विवरण निम्नलिखित है

  1. जम्मू-कश्मीर-डोगरी, कश्मीरी, उर्दू, हिन्दी तथा अंग्रेजी। 
  2. पंजाब-पंजाबी। 
  3. हिमाचल प्रदेश-पहाड़ी, कश्मीरी, हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी। 
  4. उत्तराखण्ड-कुमाऊँनी, गढ़वाली तथा हिन्दी। 
  5. उत्तर प्रदेश-उर्दू, हिन्दी तथा क्षेत्रीय बोली। 
  6. दिल्ली-हिन्दी, पंजाबी तथा उर्दू। 
  7. राजस्थान-हिन्दी (राजस्थानी)। 
  8. अरुणाचल प्रदेश-निसी, आदिअसमी, हिन्दी तथा अंग्रेजी। 
  9. असम-आसामी एवं बंगाली। 
  10. मेघालय-खासो एवं गारो। 
  11. मणिपुर-मणिपुरी एवं बोड़ो। 
  12. त्रिपुरा-लुशाई एवं बंगला। 
  13. पश्चिम बंगाल-बंगला, हिन्दी तथा संथाली। 
  14. ओडिशा (उड़ीसा)-उड़िया, हिन्दी तथा संथाली। 
  15. बिहार हिन्दी, उर्दू तथा मैथली। 
  16. झारखण्ड हिन्दी एवं उर्दू। 
  17. मध्य प्रदेश-हिन्दी एवं गोण्डी। 
  18. छत्तीसगढ़ हिन्दी तथा गोण्डी, भीली। 
  19. गुजरात-गुजराती, हिन्दी तथा उर्दू। 
  20. महाराष्ट्र मराठी, उर्दू तथा हिन्दी। 
  21. तेलंगाना तेलुगू, उर्दू तथा हिन्दी। 
  22. आन्ध्र प्रदेश-तेलुगू, उर्दू तथा हिन्दी। 
  23. तमिलनाडु तमिल। 
  24. गोवा-कोंकणी एवं अंग्रेजी। 
  25. केरल मलयालम। 
  26. कर्नाटक-कन्नड़। 
  27. हरियाणा हिन्दी। 
  28. मिजोरम-लुशाई एवं मिजो। 
  29. सिक्किम-नेपाली, भोटिया एवं हिन्दी। 
  30. लद्दाख-लद्दाखी एवं तिब्बती। उपर्युक्त सभी भाषाओं का राज्यवार विवरण हम निम्न मानचित्र में देख सकते हैं

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नोट:
उपर्युक्त मानचित्र में राज्य तथा उनसे सम्बन्धित भाषाओं को दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त इन राज्यों में विभिन्न क्षेत्रीय तथा अन्य भाषाओं को भी बोला जाता है।] मानचित्र 15.1 में भाषाओं की वर्तमान स्थिति दर्शायी गयी है, किन्तु 1950 ई. में ऐसी स्थिति नहीं थी। 1956 ई. में भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ था। इससे पूर्व की स्थिति हम मानचित्र 15.2 देख सकते हैं।
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वर्तमान भारतीय राज्यों में भाषायी परिवर्तन-1950 ई. के पश्चात् कई राज्यों का पुनर्गठन एवं उनके भाषायी चरित्र में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं जिनका विवरण निम्न प्रकार से है

  1. राजस्थान राजस्थान में हिन्दी के साथ-साथ राजस्थानी, उर्दू एवं शहरों में अंग्रेजी भाषा के प्रभाव में वृद्धि हुई है। 
  2. मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में हिन्दी, भीली व गोंडी के साथ-स गहरों में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है। 
  3. उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश में हिन्दी के साथ-साथ अवधी, ब्रज भाषा, उर्दू, भोजपुरी एवं अंग्रेजी के प्रभाव में वृद्धि हुई है।
  4. गुजरात-गुजरात में गुजराती, हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा के प्रभाव में वृद्धि हुई है लेकिन मराठी का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ है।
  5. कर्नाटक-कर्नाटक में कन्नड़ भाषा के साथ-साथ तमिल, तेलुगु, अंग्रेजी व हिन्दी का प्रचार-प्रसार भी बढ़ा है।
  6. आंध्र प्रदेश व तेलंगाना-आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में तेलुगु का प्रभाव बढ़ा है लेकिन शहरों में हिन्दी व अंग्रेजी का भी विकास हुआ है।
  7. केरल केरल राज्य में मलयालम भाषा के साथ-साथ उर्दू तथा तमिल के साथ-साथ कुछ शहरों में हिन्दी व अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार भी बढ़ा है।
  8. गोवा-गोवा में अंग्रेजी व हिन्दी के प्रभाव में वृद्धि हुई है तथा पुर्तगाली भाषा का प्रभाव कम होता जा रहा है। 
  9. ओडिशा (उड़ीसा)-उड़ीसा में उड़िया भाषा के साथ शहरों में हिन्दी व अंग्रेजी का प्रभाव भी बढ़ा है। 
  10. तमिलनाडु तमिलनाडु में तमिल, कन्नड़ व तेलुगु के साथ-साथ शहरों में हिन्दी व अंग्रेजी के प्रभाव में भी वृद्धि हुई है। 
  11. पंजाब-पंजाब में पंजाबी के साथ-साथ अंग्रेजी व हिन्दी का भी प्रभाव बढ़ा है। 
  12. बिहार-बिहार में हिन्दी, उर्दू, भोजपुरी व संथाली भाषा का प्रभाव बढ़ा है। 
  13. जम्मू-कश्मीर-जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी, डोगरी के साथ-साथ उर्दू, अंग्रेजी व हिन्दी का भी प्रभाव बढ़ा है। 
  14. असम-असम राज्य में असमी भाषा के साथ-साथ हिन्दी व अंग्रेजी के प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि हुई है।
  15. त्रिपुरा-त्रिपुरा राज्य में अंग्रेजी व हिन्दी के प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि हुई है तथा बंगला भाषा का प्रभाव कम हुआ है। 
  16. मणिपुर-मणिपुर राज्य में मणिपुरी बोडो का प्रभाव बढ़ा है। शहरों में अंग्रेजी व हिन्दी बोली जाती है। 
  17. प. बंगाल-प. बंगाल में बंगाली भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी व हिन्दी का भी प्रचार-प्रसार हुआ है। . 
  18. मिजोरम-मिजोरम राज्य में लुशाई, अंग्रेजी एवं बांग्ला के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है। 
  19. सिक्किम-सिक्किम राज्य में नेपाली, भोटिया, हिन्दी व अंग्रेजी का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है। 
  20. मेघालय-मेघालय में खासी, गारो व बंगाली के प्रभाव में कमी आयी है तथा अंग्रेजी का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है। 
  21. हरियाणा-हरियाणा में हिन्दी, उर्दू व पंजाबी का प्रभाव कम हुआ है तथा हरियाणवी का प्रभाव बढ़ा है।
  22. छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ में गोड़ी, भीली व हिन्दी का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है। परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 10. 
हाल के वर्षों के किसी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन को चुनिए। पता लगाइए कि यह परिवर्तन क्यों हुआ, परिवर्तन के पीछे कौन-कौनसे तर्क दिए गए और परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी ? अगर सम्भव हो, तो संविधान सभा की चर्चाओं को देखने की कोशिश कीजिए। (http://parliamentofindia.nic.in/ls/debaes/debates. htm)। यह पता लगाइए कि मुद्दे पर उस वक्त कैसे चर्चा की गई। अपनी खोज पर संक्षिप्त रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

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प्रश्न 11. 
भारतीय संविधान की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका अथवा फ्रांस अथवा दक्षिण अफ्रीका के संविधान से कीजिए। ऐसा करते हुए निम्नलिखित में से किन्हीं दो विषयों पर गौर कीजिए : धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार और केन्द्र व राज्यों के बीच सम्बन्ध। यह पता लगाइए कि इन संविधानों में अन्तर और समानताएँ किस तरह से उनके क्षेत्रों के इतिहासों से जुड़ी हुई हैं। 
उत्तर:

  1. भारत के समान संयुक्त राज्य अमेरिका भी एक लोकतान्त्रिक राज्य है तथा दोनों ही राष्ट्रों की लोकतान्त्रिक  व्यवस्था का मुख्य स्रोत संविधान ही है। 
  2. भारत के समान ही संयुक्त राज्य अमेरिका में अल्पसंख्यकों को सभी प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त है।
Prasanna
Last Updated on Jan. 6, 2024, 9:27 a.m.
Published Jan. 6, 2024