RBSE Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

Rajasthan Board RBSE Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय Textbook Exercise Questions and Answers.

Rajasthan Board RBSE Solutions for Class 10 Social Science in Hindi Medium & English Medium are part of RBSE Solutions for Class 10. Students can also read RBSE Class 10 Social Science Important Questions for exam preparation. Students can also go through RBSE Class 10 Social Science Notes to understand and remember the concepts easily. The class 10 economics chapter 2 intext questions are curated with the aim of boosting confidence among students.

RBSE Class 10 Social Science Solutions History Chapter 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

RBSE Class 10 Social Science यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय InText Questions and Answers

गतिविधि-पृष्ठ 3

प्रश्न 1.
आपकी राय में (पाठ्यपुस्तक का) चित्र-1 किस प्रकार एक कल्पनादर्शी दृष्टि को प्रतिबिम्बित करता है?
उत्तर:
1848 ई. में एक फ्रांसीसी कलाकार फ्रेडरिक सॉरयू ने चार चित्रों की एक श्रृंखला बनाई। इनमें उसने अपने सपनों के एक संसार की कल्पना की जो 'जनतान्त्रिक और सामाजिक गणतन्त्रों से मिलकर बना था। इस चित्र में यरोप और अमेरिका के लोग दिखाए गए हैं। इसमें सभी लोग एक लम्बी पंक्ति में स्वतन्त्रता की मूर्ति की वन्दना करते हुए दिखाए गए हैं। चित्रकार के कल्पनादर्श में विश्व के लोग अलग राष्ट्रों के समूहों में बँटे हुए हैं जिनकी पहचान उनके वस्त्रों तथा राष्ट्रीय वेशभूषा से होती है। ऊपर स्वर्ग से ईसा मसीह, संत और फरिश्ते इस दृश्य पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं। यह चित्र दुनिया के राष्ट्रों के बीच भाईचारे का प्रतीक है। इस प्रकार यह चित्र चित्रकार की कल्पनादर्शों दृष्टि को प्रतिबिंबित करता है। 

चर्चा करें-पृष्ठ 4

प्रश्न 1.
रेनन की समझ के अनुसार एक राष्ट्र की विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण दें। उसके मतानुसार राष्ट्र क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
रेनन की समझ के अनुसार एक राष्ट्र की अग्रलिखित विशेषताएँ होती हैं-

  • एक राष्ट्र लम्बे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिन्दु होता है। 
  • इसका आधार वीरता से परिपूर्ण अतीत, महापुरुषों के नाम तथा प्राचीन गौरव होते हैं।
  • एक जन-समूह के राष्ट्र होने की आवश्यक शर्ते हैं- अतीत में समान गौरव का होना, वर्तमान में एक समान इच्छा, संकल्प का होना, साथ मिलकर महान कार्य करना और भविष्य में इसी प्रकार के कार्य करने की इच्छा रखना।
  • राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता है। उसका अस्तित्व प्रतिदिन होने वाला जनमत संग्रह है। 
  • राष्ट्र की किसी देश के विलय या उस पर उसकी इच्छा के विरुद्ध आधिपत्य स्थापित होने में कोई रुचि नहीं होती।

राष्ट्र का महत्त्व- रेनन के अनुसार राष्ट्रों का होना आवश्यक है क्योंकि उनका होना स्वतन्त्रता की गारण्टी है। यदि संसार में केवल एक कानून और उसका केवल एक स्वामी हो तो स्वतन्त्रता का लोप हो जाएगा। 

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चर्चा करें-पृष्ठ 10

प्रश्न 1.
उन राजनीतिक उद्देश्यों का विवरण दें जिन्हें 'आर्थिक कदमों' द्वारा हासिल करने की उम्मीद लिस्ट को है।
उत्तर:
जर्मनी के ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर फ्रेडरीख लिस्ट की मान्यता थी कि जॉलवेराइन नामक एक शुल्क संघ जर्मनी के एकीकरण में सहायक है। उसके अनुसार जॉलवेराइन का लक्ष्य जर्मन लोगों को आर्थिक रूप में एक राष्ट्र के रूप में बाँध देना है। वह राष्ट्र की आर्थिक अवस्था जितना बाह्य रूप से उसके हितों की रक्षा करके उसे सुदृढ़ बनाएगा, उतना ही आन्तरिक उत्पादन को बढ़ाकर भी यही कार्य करेगा। लिस्ट का विचार था कि एक मुक्त आर्थिक व्यवस्था द्वारा राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत किया जा सकता है। 

चर्चा करें-पृष्ठ 11

प्रश्न 1.
व्यंग्यकार क्या दर्शाने का प्रयास कर रहा है? (चित्र 6)
उत्तर:
व्यंग्यकार द्वारा चित्र में चिंतकों का क्लब दर्शाया गया है जिसमें चिंतक मुंह पर पट्टी बांधे बैठे हुए हैं। यहां व्यंग्यकार यह दर्शाने का प्रयास कर रहा है कि तत्कालीन रुढ़िवादी शासन व्यवस्थाएं पूर्ण निरंकुश थीं। कोई भी उनके खिलाफ नहीं बोल सकता था। वे आलोचना और असहमति बर्दाश्त नहीं करती थीं। वे उन सभी गतिविधियों को दबा देती थीं जो निरंकुश सरकारों की वैधता पर सवाल उठाती थीं। ज्यादातर सरकारों ने सेंसरशिप के नियम बनाये थे जिनके द्वारा अखबारों, किताबों, नाटकों तथा गीतों में व्यक्त बातों पर नियंत्रण लगाया गया था। इस प्रकार व्यंग्यकार दर्शाता है कि चिंतकों का क्लब तो था लेकिन उनके मुंह पर पट्टी बांधी गयी थी। 

चर्चा करें-पृष्ठ 15

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय पहचान के निर्मित होने में भाषा और लोक परम्पराओं के महत्त्व की चर्चा करें। 
उत्तर:
राष्ट्रीय पहचान के निर्माण में भाषा और लोक परम्पराओं का महत्त्व निम्नलिखित है-

  • किसी क्षेत्र विशेष या देश की भाषा और लोक परम्पराएँ लोगों द्वारा एक साथ व्यतीत किए गए अतीत व सामूहिक एकता से जीवन-यापन की जानकारी देती हैं।
  • भाषा और लोक परम्पराएँ लोगों को सांस्कृतिक रूप से समान होने की भावना प्रदान करती हैं।
  • भाषा व लोक परम्पराएँ लोगों को एकता एवं गर्व के धागे से बाँधती हैं। 

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चर्चा करें-पृष्ठ 16

प्रश्न 1.
सिलेसियाई बुनकरों के विद्रोह के कारणों का वर्णन करें। पत्रकार के नजरिये पर टिप्पणी करें। 
उत्तर:
सिलेसियाई बुनकरों ने ठेकेदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जिसके निम्नलिखित कारण थे-

  • सिलेसिया के बुनकर ठेकेदारों से कच्चा माल लेकर उनके लिए कपड़े तैयार करते थे, परन्तु ठेकेदार बुनकरों को निर्मित कपड़े के दाम बहुत कम देते थे।
  • बुनकरों की दशा शोचनीय थी। बेरोजगारी के कारण काम की माँग बढ़ने लगी। इस स्थिति का लाभ उठाकर ठेकेदारों ने निर्मित वस्तुओं की कीमतें और गिरा दीं।

पत्रकार का नजरिया- बुनकरों के प्रति पत्रकार का नजरिया सहानुभूतिपूर्ण था। बुनकरों की शोचनीय दशा देखकर पत्रकार दुःखी था। अपनी शोचनीय आर्थिक स्थिति से मुक्ति पाने के लिए ही बुनकरों ने ठेकेदारों के विरुद्ध विद्रोह किया था।

चर्चा करें-पृष्ठ 18

प्रश्न 1.
ऊपर उद्धत (स्रोत-ग) तीन लेखकों द्वारा महिलाओं के अधिकार के प्रश्न पर व्यक्त विचारों की तुलना करें। उनसे उदारवादी विचारधारा के बारे में क्या स्पष्ट होता है?
उत्तर:
(1) एक उदारवादी राजनीतिज्ञ कार्ल वेल्कर ने पुरुषों एवं महिलाओं का कार्यक्षेत्र अलग-अलग बतलाया तथा कहा कि लिंगों में बराबरी परिवार के मेल-मिलाप तथा गरिमा को खतरे में डाल देगी। उदारवादी होने के बावजूद वे महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे।

(2) लुइजे ऑटो-पीटर्स एक राजनीतिक कार्यकर्ता थी जिसने महिलाओं की पत्रिका और बाद में एक नारीवादी राजनीतिक संगठन की स्थापना की। उसके अनुसार पुरुषों के अथक प्रयास केवल पुरुषों के लाभ के लिए हैं समस्त मानव जाति के लाभ के लिए नहीं। परन्तु.स्वतन्त्रता को विभाजित नहीं किया जा सकता। अतः स्वतन्त्र पुरुषों को परतन्त्रता से घिरे रहना स्वीकार नहीं होना चाहिए।

(3) एक अन्य लेखक के अनुसार महिलाओं को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखना अनुचित और अविवेकपूर्ण है। यह लज्जा की बात है कि एक पुरुष होने के नाते एक सबसे मूर्ख पशु-पालक को मत देने का अधिकार है, जबकि अत्यन्त योग्य महिलाएँ मत देने के अधिकार से वंचित हैं।

तीनों लेखकों के विचारों से स्पष्ट होता है कि उनमें उदारवादी विचारधारा के प्रश्न पर बड़ा मतभेद है। उदारवादी लेखक और चिंतक महिला अधिकारों के प्रश्न पर एकमत नहीं हैं। 

गतिविधि-पृष्ठ 20

प्रश्न 1.
इस व्यंग्य चित्र (चित्र 13-पृष्ठ 20) का वर्णन करें। इसमें बिस्मार्क और संसद के निर्वाचित डेप्यूटीज के बीच किस प्रकार का सम्बन्ध दिखाई देता है? यहाँ चित्रकार लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं की क्या व्याख्या करना चाहता है?
उत्तर:
इस व्यंग्य चित्र में प्रशा के प्रधानमन्त्री बिस्मार्क को एक हंटर घुमाते हुए तथा संसद के सदस्यों को अपना बचाव करते हुए दिखाया गया है। अपने बचाव के लिए सभी प्रतिनिधि बिस्मार्क के लिए आदर प्रदर्शित करते हुए संसद में सिर झुकाए बैठे हैं।

यह व्यंग्य चित्र दर्शाता है कि बिस्मार्क जर्मन सांसदों के मस्तिष्कों पर शासन करता था। इस चित्र में कलाकार ने बिस्मार्क के जनतांत्रिक होने की व्यंग्यात्मक व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि इसमें जनतंत्र नाममात्र के लिए ही अस्तित्व में है। यथार्थ में यह बिस्मार्क का एकतंत्र है। इस प्रकार बिस्मार्क की लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में कोई आस्था नहीं थी। व्यंग्यकार ने इस चित्र के द्वारा बिस्मार्क के लोकतन्त्र का उपहास किया है। 

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गतिविधि-पृष्ठ 21

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के चित्र 14 (क) को देखें। क्या आप को लगता है कि इनमें से किसी भी क्षेत्र में रहने वाले खुद को इतालवी मानते होंगे?
पाठ्यपुस्तक के चित्र 14(ख)की जाँच करें। कौनसा क्षेत्र सबसे पहले एकीकृत इटली का हिस्सा बना? सबसे आखिर में कौनसा क्षेत्र शामिल हुआ? किस साल सबसे ज्यादा राज्य एकीकृत इटली में शामिल हुए?
उत्तर:
(क) इनमें से केवल सार्जीनिया क्षेत्र में रहने वाले लोग खुद को इतालवी मानते होंगे, क्योंकि उस समय केवल सार्डीनिया-पीडमॉण्ट में ही एक इतालवी राजघराने का शासन था।

(ख) (i) लोम्बार्डी का क्षेत्र सबसे पहले एकीकृत इटली का हिस्सा बना। 
(ii) पेपल का क्षेत्र (रोम) सबसे बाद में एकीकृत इटली में शामिल हुआ।
(iii) 1860 ई. में सबसे ज्यादा राज्य एकीकृत इटली में शामिल हुए। 

गतिविधि-पृष्ठ 22

प्रश्न 1.
चित्रकार ने गैरीबाल्डी को सार्जीनिया-पीडमांट के राजा को जूते पहनाते दिखाया है। अब इटली के नक्शे को फिर देखो। यह व्यंग्य-चित्र (पाठ्यपुस्तक का चित्र 15) क्या कहने का प्रयास कर रहा है?
उत्तर:
1860 ई. में गैरीबाल्डी ने अपने सशस्त्र स्वयंसेवकों को लेकर सिसली और नेपल्स पर आक्रमण किया और शीघ्र ही सिसली तथा नेपल्स पर अधिकार कर लिया। गैरीबाल्डी ने सिसली तथा नेपल्स के राज्य सार्जीनिया, पीडमांट के राजा विक्टर इमेनुएल द्वितीय को सौंप दिए। 1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का सम्राट घोषित किया गया।

इस व्यंग्य- चित्र से ज्ञात होता है कि गैरीबाल्डी के प्रयासों से ही सिसली तथा नेपल्स को एकीकृत इटली में शामिल किया जा सका था। इस चित्र से गैरीबाल्डी के साहस, शौर्य, त्याग और बलिदान की भावना प्रकट होती है। 

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गतिविधि-पृष्ठ 24

प्रश्न 1.
बॉक्स 3 में दिए गए चार्ट की सहायता से वेइत की जर्मेनिया के गुणों को पहचानें और तस्वीर के प्रतीकात्मक अर्थ की व्याख्या करें। 1836 की एक पुरानी रूपकात्मक तस्वीर में वेइत ने काइजर के मुकुट को उस जगह चित्रित किया था जहाँ अब उन्होंने टूटी हुई बेड़ियाँ दिखाई हैं। इस बदलाव का महत्त्व स्पष्ट करें।
उत्तर:

जर्मेनिया के गुण

प्रतीकात्मक अर्थ

टूटी हुई बेड़ियाँ

आजादी मिलना

बाज़-छाप कवच

जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति

बलूत पत्तियों का मुकुट

बहादुरी

तलवार

मुकाबले की तैयारी

तलवार पर लिपटी जैतून की डाली

शांति की चाह

काला, लाल और सुनहरा तिरंगा

1848 में उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा, जिसे जर्मन राज्यों के ड्यूक्स ने प्रतिबंधित घोषित कर दिया

उगते सूर्य की किरणें

एक नए युग का सूत्रपात

इस चित्र से ज्ञात होता है कि जर्मनी ने अपनी बहादुरी और सैन्य-शक्ति के बल पर आजादी प्राप्त की है। जर्मनी ने विदेशी शक्तियों-डेनमार्क, आस्ट्रिया तथा फ्रांस को अपनी उत्कृष्ट सैन्य-शक्ति के बल पर पराजित किया जिसके फलस्वरूप एक नवीन जर्मन-साम्राज्य का उदय हुआ। इस प्रकार जर्मनी में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। 

1836 की पुरानी रूपकात्मक तस्वीर में वेइत ने काइजर के मुकुट को उस जगह चित्रित किया था जहां अब उन्होंने टूटी हुई बेडियां दिखाई हैं। इसका अर्थ है कि अब जमैनिया की बेड़ियां टूट गई हैं। वह आजाद हो गई है अर्थात् उसका एकीकरण हो गया है और उसने अपने मुकुट को सिर पर धारण कर लिया है और बेड़ियों को तोड़कर जमीन पर फेंक दिया हैं। 

गतिविधि-पृष्ठ 24

प्रश्न 1.
बताएँ कि चित्र 18 (पाठ्यपुस्तक) में आपको क्या दिखाई पड़ रहा है? राष्ट्र के इस रूपकात्मक चित्रण में ह्यूबनर किन ऐतिहासिक घटनाओं की ओर संकेत कर रहे हैं?
उत्तर:
चित्र 18 में जर्मन राष्ट्र की रूपक जर्मेनिया को निराश मुद्रा में लेटे हुए प्रदर्शित किया गया है। सन् 1850 में जूलियस ह्यूबनर द्वारा चित्रित इस चित्र में जर्मेनिया काइजर के मुकुट तथा छड़ी के समक्ष गिरी पड़ी है। जर्मन राष्ट्र के रूपक जर्मेनिया के इस रूपकात्मक चित्रण का अर्थ है कि सर्व-जर्मन नेशन एसेंबली, जो फ्रेंकफर्ट संसद के रूप में आयोजित हुई थी, असफल हो गई। चित्र में मुकुट और गद्दी इस बात के प्रतीक हैं कि फ्रेंकफर्ट संसद को सेना तथा राजशाही द्वारा भंग कर दिया गया। 

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गतिविधि-पृष्ठ 25

प्रश्न 1.
चित्र 10 को एक बार फिर देखें। कल्पना करें कि आप मार्च, 1848 में फ्रैंकफर्ट के नागरिक हैं और संसद की कार्रवाई के समय वहीं मौजूद हैं। यदि आप हाल ऑफ डेप्यूटीज में बैठे हुए पुरुष होते तो दीवार पर लगे जर्मेनिया के बैनर को देखकर क्या महसूस करते और अगर आप हाल ऑफ डेप्यूटीज में बैठी महिला होती तो इस चित्र को देखकर क्या महसूस करती? दोनों भाव लिखें।
उत्तर:
यदि मैं मार्च, 1848 में फ्रैंकफर्ट का नागरिक होता/होती-
(i) यदि मैं हाल ऑफ डेप्यूटीज में बैठा हुआ पुरुष होता, तो जर्मेनिया के बैनर को देखकर यह महसूस करता कि अब विदेशी शक्तियों के प्रभुत्व से मुक्ति पाने का समय आ गया है।

(ii) यदि मैं हाल ऑफ डेप्यूटीज में बैठी महिला होती तो जर्मेनिया के इस चित्र को देखकर महसूस करती कि जर्मनी के एकीकरण के आन्दोलन में महिलाओं को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखने तथा उन्हें एसेम्बली के चुनाव में मताधिकार से वंचित रखने से जर्मनी के एकीकरण के आन्दोलन को आघात पहुँचेगा और उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा को असफलता का सामना करना पड़ेगा।

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संक्षेप में लिखें-

प्रश्न 1. 
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखें-
(क) ज्युसेपे मेत्सिनी 
(ख) काउंट कैमिलो दे कावूर 
(ग) यूनानी स्वतन्त्रता युद्ध 
(घ) फ्रैंकफर्ट संसद 
(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका।
उत्तर:
(क) ज्युसेपे मेसिनी- ज्युसेपे मेत्सिनी इटली का एक महान क्रान्तिकारी था। उसका जन्म 1807 में जेनोआ में हुआ था। वह 'कार्बोनारी' नामक एक गुप्त क्रान्तिकारी संगठन का सदस्य बन गया और क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगा। 24 वर्ष की आयु में लिगुरिया में क्रान्ति करने के कारण उसे बहिष्कृत कर दिया गया। 1831 ई. में मेत्सिनी ने मार्सेई में 'यंग इटली' नामक संगठन की स्थापना की। 1833 ई. में उसने बर्न में 'यंग यूरोप' नामक संगठन स्थापित किया जिसके सदस्य पोलैण्ड, फ्रांस, इटली और जर्मन राज्यों में समान विचार रखने वाले युवा थे।

मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की इच्छा के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई थी। अतः इटली छोटेछोटे राज्यों और प्रदेशों में विभाजित नहीं रह सकता था। इन राज्यों को संगठित कर एक एकीकृत इटली राष्ट्र एवं गणतन्त्र का निर्माण करना आवश्यक था । मेत्सिनी के अनुसार केवल एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता था। मेत्सिनी ने राजतन्त्र का घोर विरोध किया और प्रजातान्त्रिक गणतन्त्र की स्थापना पर बल देकर रूढ़िवादियों और अनुदारवादियों को परास्त कर दिया।

(ख) काउंट कैमिलो दे कावूर- कावूर सार्डीनिया-पीडमांट का प्रधानमन्त्री था। उसने इटली के राज्यों को एकीकृत करने वाले आन्दोलन का नेतृत्व किया। वह न तो एक क्रान्तिकारी था और न ही जनतन्त्र में विश्वास करता था। वह इतालवी भाषा से अच्छी फ्रांसीसी भाषा बोलता था। उसके प्रयत्नों से ही फ्रांस और सार्डीनिया-पीडमांट के बीच एक कूटनीतिक सन्धि हुई थी, जिसे 'प्लाम्बियर्स की सन्धि' कहते हैं। इस सन्धि के अनुसार फ्रांस ने आस्ट्रिया के विरुद्ध सार्डीनिया-पीडमांट को सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। इसी सन्धि के परिणामस्वरूप 1859 ई. में सार्जीनियापीडमांट आस्ट्रिया की सेना को पराजित करने में सफल रहा था।

(ग) यूनानी स्वतन्त्रता युद्ध- 1821 ई. में यूनानियों का स्वतन्त्रता-युद्ध शुरू हुआ। यूनानी तुर्की साम्राज्य के आधिपत्य से मुक्त होना चाहते थे। इस स्वतन्त्रता युद्ध में निर्वासन में रह रहे यूनानियों ने सहायता दी। इसके अतिरिक्त पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों ने भी यूनानियों के स्वतन्त्रता-संग्राम का समर्थन किया। ये लोग प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे। अनेक कवियों और कलाकारों ने यूनान को 'यूरोपीय सभ्यता का पालना' बताकर उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की और तुर्की-साम्राज्य के विरुद्ध यूनान के स्वतन्त्रता-संघर्ष के लिए जनमत जुटाया। अंग्रेज कवि लार्ड बायरन ने धन एकत्रित किया और युद्ध में लड़ने भी गए। वहाँ 1824 में बुखार के कारण लार्ड बायरन की मृत्यु हो गई। अन्ततः 1832 में कुस्तुन्तुनिया की सन्धि हुई जिसने यूनान को एक स्वतन्त्र राष्ट्र की मान्यता प्रदान की।

यूनानी स्वतन्त्रता-युद्ध का विश्व के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस युद्ध ने सम्पूर्ण यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रवादी भावनाओं का संचार किया।

(घ) फ्रैंकफर्ट संसद- फ्रैंकफर्ट संसद ने भी जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रयास किया। 18 मई, 1848 को विभिन्न जर्मन राज्यों के 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया। यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई। उन्होंने जर्मन राष्ट्र की लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया। इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था। जब फ्रैंकफर्ट संसद के प्रतिनिधियों ने प्रशा के सम्राट फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ से राजमुकुट पहनने का आग्रह किया, तो उसने उसे अस्वीकार कर दिया, और उन राजाओं का साथ दिया जो रूढिवादी थे तथा निर्वाचित संसद के विरोधी थे। इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का प्रयास विफल हो गया। जहाँ कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया, वहीं संसद का सामाजिक आधार कमजोर हो गया। अन्त में सेना की सहायता से संसद को भंग कर दिया गया।

(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका- राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए आन्दोलन चलाए और बड़ी संख्या में महिलाओं ने उन आन्दोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किये, समाचार-पत्र शुरू किये और राजनीतिक सभाओं तथा प्रदर्शनों में भाग लिया। इसके बावजूद महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखा गया। जब 1848 में सेंट पॉल चर्च में फ्रेंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी, तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों के रूप में ही दर्शक-दीर्घा में खड़े होने की अनुमति दी गई।

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प्रश्न 2. 
फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रान्तिकारियों ने क्या कदम उठाए?
अथवा 
फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रान्तिकारियों द्वारा उठाये गये चार उपायों का उल्लेख करें।
उत्तर:
फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रान्तिकारियों ने निम्नलिखित कदम उठाये-

  • फ्रांसीसी क्रान्तिकारियों ने 'पितृभूमि' तथा 'नागरिक' जैसे विचारों को फ्रांसीसी लोगों तक पहुँचाया। इन विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया। इस संयुक्त समुदाय को एक संविधान के अन्तर्गत समान अधिकार प्राप्त थे।
  • एक नया फ्रांसीसी झण्डा तिरंगा चुना गया जिसने पहले के राजध्वज का स्थान ले लिया।
  • इस्टेट जनरेल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा। इसका नाम बदल कर नेशनल एसेम्बली कर दिया गया।
  • नई स्तुतियों की रचना की गई, शपथें ली गईं तथा शहीदों का गुणगान किया गया । इन सबने राष्ट्रीय भावना को प्रोत्साहन दिया।
  • एक केन्द्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई जिसने अपने अधीन राज्यों में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए।
  • आन्तरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिये गये तथा सम्पूर्ण देश में माप-तौल की एकसमान प्रणालियाँ . लागू की गईं।
  • क्षेत्रीय बोलियों को बढ़ावा नहीं दिया गया तथा उनके स्थान पर फ्रेंच सम्पूर्ण देश की भाषा बन गई। 

प्रश्न 3. 
मारीआन और जर्मेनिया कौन थे? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया, उसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मारीआन और जर्मेनिया दो नारियों के चित्र हैं। इन्हें राष्ट्रों के रूपकों के रूप में चित्रित किया गया है। मारीआन फ्रांसीसी गणराज्य का प्रतिनिधित्व करती है और जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र का रूपक है।

मारीआन- फ्रांसीसी क्रान्ति के दौरान कलाकारों ने स्वतन्त्रता, न्याय तथा गणतंत्र जैसे विचारों को व्यक्त करने के लिए नारी रूपक का प्रयोग किया। फ्रांस में नारी रूपक को लोकप्रिय ईसाई नाम मारीआन दिया गया, जिसने जन-राष्ट्र के विचार को रेखांकित किया। उसके चिह्न भी स्वतंत्रता और गणतंत्र के थे-लाल टोप, तिरंगा तथा कलगी।

जर्मेनिया- जर्मन राष्ट्र का रूपक थी। फ्रांस में एक डाक टिकट पर मारीआन की तस्वीर छापी। उसकी प्रतिमाओं को सार्वजनिक स्थानों पर लगाया गया ताकि लोगों में राष्ट्रीय भावना की जागृति हो।

जर्मेनिया को बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दिखाया गया क्योंकि जर्मन बलूत को वीरता का प्रतीक मानते हैं। जर्मेनिया की तलवार पर जर्मन तलवार जर्मन साम्राज्य की रक्षा करती है अंकित है। नारी रूप में जर्मेनिया का चित्र जर्मनी की स्वतन्त्रता तथा अखण्डता को प्रतिबिम्बित करता है।

महत्त्व- इन चित्रों ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को प्रबल किया तथा फ्रांस और जर्मनी को एक अलग-अलग राष्ट्र के रूप में पहचान दी।

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प्रश्न 4. 
जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ। 
उत्तर:
जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-
(1) 1848 की क्रान्तियों से प्रभावित होकर जर्मन-राज्यों के राष्ट्रवादियों ने विभिन्न क्षेत्रों को जोड़कर एक स्वतन्त्र जर्मन राष्ट्र-राज्य के निर्माण की मांगों पर बल दिया। यह राष्ट्र-राज्य संविधान, प्रेस की स्वतन्त्रता तथा संगठन के निर्माण की स्वतन्त्रता पर आधारित था।

(2) राष्ट्र निर्माण का यह उदारवादी प्रयास विफल हो गया। राष्ट्र-निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और सेना की शक्ति ने मिलकर दबा दी। इन ताकतों का प्रशा के बड़े भू-स्वामियों ने भी समर्थन किया।

(3) इसके बाद प्रशा ने जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रयास किया। प्रशा का प्रधानमन्त्री आटोवॉन बिस्मार्क जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का जनक था। उसने इस कार्य हेतु प्रशा की सेना और नौकरशाही से सहायता ली। उसने 'लौह और रक्त' की नीति अपनाई और सात वर्ष की अवधि में डेनमार्क, आस्ट्रिया तथा फ्रांस को तीन युद्धों में पराजित किया । इस प्रकार 1871 में जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई।

(4) 18 जनवरी, 1871 को बिस्मार्क ने वर्साय के शीशमहल में विलियम प्रथम को नवीन जर्मन साम्राज्य का सम्राट घोषित किया।

प्रश्न 5. 
अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या बदलाव किए?
अथवा 
फ्रांसीसियों द्वारा उपनिवेशों के विकास हेतु किये गये कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा 
नेपोलियन की संहिता की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
शासन व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन द्वारा किये गये परिवर्तन- अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने के लिए 1804 ई. में नेपोलियन ने नागरिक संहिता लागू की। यह संहिता 'नेपोलियन की संहिता' के नाम से जानी जाती है। इस संहिता को फ्रांसीसी नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में भी लागू किया गया। इस संहिता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

  • इस संहिता ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए। 
  • कानून के समक्ष समानता तथा सम्पत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया गया।
  • डच गणतन्त्र, स्विट्जरलैण्ड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने सामन्ती व्यवस्था को समाप्त किया तथा किसानों को भू-दासत्व तथा जागीरदारी करों से मुक्ति दिलाई।।
  • शहरों में कारीगरों के श्रेणी-संघों के नियन्त्रणों को हटा दिया गया। 
  • यातायात तथा संचार व्यवस्थाओं में सुधार किये गए।
  • एक समान कानून व्यवस्था तथा माप-तौल की एक जैसी प्रणाली लागू की गई।
  • सम्पूर्ण देश में एक राष्ट्रीय मुद्रा प्रचलित की गई। 

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प्रश्न 1. 
उदारवादियों की 1848 की क्रान्ति का क्या अर्थ लगाया जाता है? उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया?
अथवा 
उदारवाद क्या है? उदारवादियों की 1848 की क्रान्ति ने विश्व में किन विचारों को बढ़ावा दिया?
उत्तर:
उदारवादियों की 1848 की क्रान्ति का अर्थ- उदारवादियों की 1848 की क्रान्ति का अर्थ था राजतन्त्र की समाप्ति एवं गणतन्त्र की स्थापना। उदारवादियों की 1848 की क्रान्ति फ्रांस के मध्यमवर्गीय लोगों से सम्बन्धित थी। इस क्रान्ति के फलस्वरूप फरवरी, 1848 में फ्रांस के सम्राट को सिंहासन छोड़ना पड़ा और फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना की गई। यह गणतन्त्र पुरुषों के सर्वव्यापी मताधिकार पर आधारित था।

उदारवाद का अर्थ- उदारवाद शब्द अंग्रेजी के Liberalism का हिन्दी रूपान्तर है और Liberalism शब्द लैटिन भाषा के मूल Liber पर आधारित है, जिसका अर्थ है-आजाद। नये मध्य वर्गों के लिए उदारवाद का आशय थाव्यक्ति के लिए आजादी और कानून के समक्ष सबकी बराबरी । इस प्रकार उदारवाद गणतंत्र, राष्ट्र-राज्य, संविधानवाद, प्रेस की स्वतंत्रता तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता के संसदीय विचारों पर आधारित है।

उदारवादियों के विचार- उदारवादियों ने विश्व में निम्नलिखित विचारों को बढ़ावा दिया-
(1) राजनीतिक विचार-

  • उदारवादियों ने संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार का समर्थन किया। उदारवादी ऐसी सरकार की स्थापना पर बल देते थे जो सभी की सहमति से बनी हो।
  • वे कानून के सामने समानता के पक्षपाती थे परन्तु उनका यह विचार सबके लिए मताधिकार के पक्ष में नहीं था। 
  • पादरी वर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति के पक्षधर थे। 

(2) सामाजिक विचार-

  • उदारवादियों ने महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने की माँग की। 
  • भू-दासत्व तथा बन्धुआ मजदूरी को समाप्त करने पर बल दिया गया।

(3) आर्थिक विचार- 

  • उदारवादियों ने बाजारों की मुक्ति, वस्तुओं तथा पूँजी के आयात-निर्यात पर राज्य द्वारा लगाए गए नियन्त्रणों को समाप्त करने पर बल दिया।
  • उदारवादी निजी सम्पत्ति के स्वामित्व को अनिवार्य बना देना चाहते थे।

(4) अन्य विचार- उदारवादियों ने राष्ट्रीय राज्य का विचार, संविधानवाद का विचार, प्रेस की स्वतंत्रता तथा संगठन . बनाने की स्वतंत्रता के विचार को बढ़ावा दिया। 

प्रश्न 2. 
यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के लिए तीन उदाहरण दें।
अथवा
रूमानीवाद से आप क्या समझते हैं? रूमानीवाद ने राष्ट्रीयता की धारणा के विकास में किस प्रकार योगदान दिया? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रूमानीवाद यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में इस सांस्कृतिक जुड़ाव को रूमानीवाद नाम दिया गया। रूमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आन्दोलन था जो एक विशेष प्रकार की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था।

राष्ट्रीयता की धारणा के विकास में रूमानीवाद का योगदान-इस रूमानीवाद के तीन प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(1) लोक संस्कृति- जर्मन दार्शनिक योहान गाटफ्रीड ने दावा किया कि रूमानी जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों में निहित थी। उसने लोक संगीत, लोक काव्य और लोक नृत्यों के माध्यम से जर्मन राष्ट्र की भावना को प्रचारित-प्रसारित किया।
(2) भाषा- राष्ट्रवाद के विकास में भाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उदाहरण के लिए पोलैण्ड में पोलिश भाषा-भाषियों ने रूसी भाषा के प्रभुत्व का विरोध किया और इस प्रकार पोलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी।
(3) संगीत- पोलैण्ड में परतंत्रता की स्थिति में संगीत के द्वारा ही राष्ट्रीय भावना जागृत रखी गई। एक पोलिश नागरिक कैरोल कुस्किी ने राष्ट्रीय संघर्ष का अपने ऑपेरा व संगीत से गुणगान किया तथा पोलेनेस व माजुरका जैसे लोक नृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया।

RBSE Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

प्रश्न 3. 
किन्हीं दो देशों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए बताएँ कि उन्नीसवीं सदी में राष्ट्र किस प्रकार विकसित हुए?
उत्तर:
उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रों का विकास- उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक देशों में राष्ट्रवाद का विकास हुआ जिनमें जर्मनी और इटली प्रमुख हैं-
(1) जर्मन राष्ट्र-राज्य का विकास-
(i) फ्रैंकफर्ट संसद के प्रयास- जर्मनी में राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्य वर्ग के लोगों में अधिक थीं। उन्होंने सन् 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद (फ्रैंकफर्ट संसद) द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया। लेकिन राष्ट्र निर्माण का वह उदारवादी प्रयास राजशाही तथा सैन्य शक्ति ने मिलकर विफल कर दिया। उनका प्रशा के बड़े भू-स्वामियों ने भी समर्थन किया।

(ii) प्रशा का नेतृत्व तथा बिस्मार्क की भूमिका- इसके बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाला। प्रशा के प्रधानमन्त्री ऑटोवॉन बिस्मार्क ने प्रशा की सेना तथा नौकरशाही की सहायता की। उसने 'लौह और रक्त' की नीति अपनाते हुए सात वर्ष की अवधि में डेनमार्क, आस्ट्रिया तथा प्रशा को युद्धों में पराजित कर दिया और जर्मनी का एकीकरण पूरा किया।

(iii) जर्मन साम्राज्य की घोषणा- 18 जनवरी, 1871 को बिस्मार्क ने वर्साय के शीशमहल में विलियम प्रथम को नवीन जर्मन साम्राज्य का सम्राट घोषित किया। इस प्रकार जर्मनी में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया ने प्रशा राज्य की राज्य शक्ति के प्रभुत्व को दर्शाया है। एकीकरण के पश्चात् नये जर्मन राज्य में मुद्रा, बैंकिंग, कानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर बल दिया गया। 

(2) इटली राष्ट्र-राज्य का विकास-
(i) ज्युसेपे मेत्सिनी का योगदान- इटली अपने एकीकरण के पूर्व सात राज्यों में बँटा हुआ था। इनमें से केवल एक राज्य सार्डीनिया-पीडमांट में इतालवी राजवंश का शासन था। इटली के क्रान्तिकारी नेता ज्युसेपे मेत्सिनी ने 1831 में 'यंग इटली' नामक एक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना की और इसके माध्यम से इटलीवासियों में राष्ट्रीयता, देश-भक्ति, त्याग और बलिदान की भावनाएँ उत्पन्न की।

(ii) कावूर का योगदान- कावूर सार्जीनिया-पीडमांट का प्रधानमन्त्री था। 1859 में फ्रांस की सैनिक सहायता प्राप्त करके सार्डीनिया-पीडमांट ने आस्ट्रिया की सेनाओं को पराजित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप लोम्बार्डी को सार्डीनियापीडमांट में मिला लिया गया।

(iii) गैरीबाल्डी का योगदान- गैरीबाल्डी इटली का एक महान स्वतन्त्रता सेनानी था। उसने 1860 में सिसली और नेपल्स पर आक्रमण किया और उन पर अधिकार कर लिया। जनमत संग्रह के बाद सिसली और नेपल्स को सार्डीनियापीडमांट में मिला लिया गया।

(iv) विक्टर इमेनुएल द्वितीय का योगदान- विक्टर इमेनुएल द्वितीय सार्डीनिया-पीडमांट का राजा था। 1861 में उसे. एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया। 1866 में वेनेशिया को भी इटली में मिला लिया गया। 1870 में इटली की सेनाओं ने रोम पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार इटली का एकीकरण पूरा हुआ। 

प्रश्न 4. 
ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में किस प्रकार भिन्न था?
अथवा 
ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपीय देशों के राष्ट्रवाद का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटेन में राष्ट्रवाद- ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण अचानक हुई कोई उथल-पुथल अथवा क्रान्ति का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक लम्बी चलने वाली प्रक्रिया का परिणाम था। अतः ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में भिन्न था। यथा-

  • ब्रिटेन में अंग्रेज, वेल्स, स्कॉटिश व आयरिश आदि जातीय समूह थे, जिनकी पहचान नजातीय थी।
  • इन जातीय समूहों में अंग्रेजों की शक्ति, धन-सम्पत्ति तथा गौरव की वृद्धि हुई तो वह द्वीप-समूह के अन्य जातीय समूहों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुए।
  • सर्वप्रथम उन्होंने स्काटिश लोगों को अपने देश में सम्मिलित किया। फिर उन पर प्रभुत्व स्थापित किया।
  • इसके पश्चात् उन्होंने आयरिश लोगों पर नियंत्रण किया तथा आयरलैण्ड को बलपूर्वक ब्रितानी राज्य में सम्मिलित कर लिया।

इस प्रकार 'यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन' का शान्तिपूर्ण तरीके से गठन हुआ। जबकि अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के राष्ट्रवाद अचानक हुई कोई उथल-पुथल अथवा क्रान्ति के परिणाम थे । उदाहरण के लिए जर्मन राष्ट्रवाद प्रशा के नेतृत्व और बिस्मार्क की भूमिका का प्रमुख परिणाम था तो इटली के राष्ट्रवाद में कावूर, गैरीबाल्डी, विक्टर इमेनुअल का महत्त्वपूर्ण योगदान था।

RBSE Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

प्रश्न 5. 
बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव क्यों पनपा? 
उत्तर:
बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव पनपने के कारण इस क्षेत्र में तनाव पनपने के निम्नलिखित कारण थे-
(1) भौगोलिक और जातीय भिन्नता- बाल्कन क्षेत्र में भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी। इसमें रोमानिया. बुल्गेरिया, अल्बानिया, यूनान, मेसिडोनिया, बोस्निया, हर्जेगोविना, सर्बिया, मान्टिनिग्रो आदि शामिल थे। बाल्कन क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर आटोमन साम्राज्य का प्रभुत्व स्थापित था। तुर्क लोग बाल्कन या ईसाई जातियों का शोषण करते थे, जिससे बाल्कन जातियों में असन्तोष व्याप्त था।

(2) बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार- बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीयता की भावना के प्रसार तथा आटोमन साम्राज्य के विघटन के कारण बाल्कन क्षेत्र की स्थिति काफी विस्फोटक हो गई।

(3) आटोमन साम्राज्य द्वारा आधुनिकीकरण के प्रयास- 19वीं सदी में आटोमन साम्राज्य ने आधुनिकीकरण तथा आन्तरिक सुधारों के द्वारा अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली।।

(4) बाल्कन राज्यों में एकता का अभाव- बाल्कन राज्यों में परस्पर एकता का अभाव था। प्रत्येक राज्य अपने लिए अधिक से अधिक प्रदेश प्राप्त करना चाहता था। इस कारण बाल्कन राज्यों में तनाव व्याप्त था।

(5) बाल्कन क्षेत्र में यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा- बाल्कन क्षेत्र में यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण बाल्कन क्षेत्र में यह तनाव और अधिक बढ़ गया। इस समय यूरोपीय शक्तियों के बीच व्यापार, उपनिवेश-स्थापना, नौसैनिक एवं सैन्य शक्ति के लिए गहरी प्रतिस्पर्धा थी। रूस, जर्मनी, इंग्लैण्ड, आस्ट्रिया-हंगरी आदि देश बाल्कन-क्षेत्र में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। इससे इस क्षेत्र में कई युद्ध हुए और अन्ततः प्रथम विश्वयुद्ध भी हुआ।

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Last Updated on May 6, 2022, 5:18 p.m.
Published May 6, 2022