RBSE Class 8 Sanskrit व्याकरण सन्धि प्रकरण

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Rajasthan Board RBSE Class 8 Sanskrit व्याकरण सन्धि प्रकरण

परिभाषा – पूर्वपद के अन्तिम वर्ण के साथ उत्तरपद के पहले वर्ण के मिलने से जो परिवर्तन होता है, वह सन्धि है।

सन्धि का अर्थ – सामान्यतया सन्धि का अर्थ मेल, समझौता या जोड़ है। किन्तु सन्धि प्रकरण में इसका अर्थ थोड़ा भिन्न होते हुए यह है कि जब दो स्वर अथवा व्यञ्जन वर्ण अत्यधिक निकट होने के कारण मिलकर एक रूप धारण करते हैं तो वह सन्धि कहलाती है।

सन्धि-विच्छेद – सन्धियुक्त पद में दो या दो से अधिक शब्दों को अलग करना सन्धि विच्छेद कहलाता है। जैसे – ‘हिमालयः’ का सन्धि विच्छेद करने पर ‘हिम + आलयः’ ये दो शब्द अलग-अलग हो गये। सन्धि के भेद-सामान्य रूप से सन्धि तीन प्रकार की हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. स्वर सन्धि या अच् सन्धि
  2. व्यञ्जन सन्धि या हल् सन्धि
  3. विसर्ग सन्धि।

RBSE Class 8 Sanskrit व्याकरण सन्धि प्रकरण

1. स्वर या अच् सन्धि

परिभाषा – स्वर वर्ण के साथ स्वर वर्ण का मेल स्वर सन्धि कहा जाता है।
संस्कृत भाषा में स्वीकृत स्वर वर्ण ये हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, लु, ए, ऐ, ओ, औ। स्वर सन्धि इनके परस्पर मेल से होती है।
स्वर सन्धि के भेद – स्वर सन्धि के निम्न मुख्य भेद हैं-
(i) दीर्घ सन्धिः- (सूत्र : अकः सवर्णे दीर्घः) यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ, के बाद ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ आए तो दोनों के स्थान में उसी वर्ण का दीर्घ रूप हो जाता है। जैसे-

  1. पद्म + आसना = पद्मासना
  2. न + अर्जयाम = नार्जयाम्
  3. न + अस्ति = नास्ति
  4. जल + अधिपतिः = जलाधिपतिः
  5. तत्र + अपि = तत्रापि

(ii) गुण सन्धिः – (सूत्रः-आद्गुणः) ‘अ’ अथवा ‘आ’
के बाद ‘इ’ अथवा ‘ई’ आए तो दोनों के स्थान में ‘ए’ हो जाता है। ‘अ’ अथवा ‘आ’ के बाद ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ आए तो दोनों के स्थान में ‘ओ’ हो जाता है। ‘अ’ अथवा ‘आ’ के बाद ‘ऋ’ आए तो दोनों के स्थान पर ‘अर्’ हो जाता है। ‘अ’ अथवा ‘आ’ के बाद ‘लु’ आए तो दोनों को ‘अल’ हो जाता है। जैसे-

  1. कुन्द + इन्दु। = कुन्देन्दु
  2. स्व + उपार्जितं = स्वोपार्जितं
  3. न + उचितम् = नोचितम्
  4. एकेन + उक्तम् = एकेनोक्तम्
  5. एव + उच्यते = एवोच्यते

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(iii) वृद्धि सन्धिः – (सूत्रः-वृद्धि रेचि)- यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’ या ‘ऐ’ आए तो दोनों के स्थान में ‘ऐ’ और यदि ‘ओ’ या ‘औ’ आये तो दोनों के स्थान पर ‘औ’ हो जाता है। जैसे-

  1. प्रस्त + ओति = प्रस्तौति
  2. तेन + एव = तेनैव
  3. तथा + एव = तथैव
  4. अद्य + एव = अद्यैव
  5. न + एव = नैव

(iv) यण् सन्धिः – (सूत्रः-इको यणचि)- ‘इ’ अथवा ‘ई’ के बाद असमान स्वर आने पर ‘इ’ या ‘ई’ का य्। ‘उ’ या ‘ऊ’ के बाद असमान स्वर आने पर ‘उ’ या ‘ऊ’ का ‘व्’। ऋ के बाद असमान स्वर आने पर ‘ऋ’ का ‘र’ और ‘लु’ के बाद असमान स्वर आने पर ‘लु’ के स्थान पर ‘ल’ हो जाता है। जैसे-

  1. जलेषु + एव = जलेष्वेव
  2. कर्मणि + एव = कर्मण्येव
  3. अभि + उत्थानम् = अभ्युत्थानम्
  4. सृजामि + अहम् = सृजाम्यहम्
  5. इति + आदीनां = इत्यादीनां

(v) अयादि सन्धिः – (सूत्रः-एचोऽयवायावः) एच् अर्थात् ए, ओ, ऐ, औ के बाद यदि कोई स्वर आए तो ए का अय्, ओ का अव्, ऐ का आय, ओ के स्थान में आव् आदेश होता है। जैसे-

  1. जे + अति = जयति
  2. भो + अनम् = भवनम्
  3. नै + अकः = नायकः
  4. नौ + इकः = नाविकः

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2. व्यंजन या हल् सन्धि

परिभाषा – व्यञ्जन का किसी व्यञ्जन या स्वर के साथ मेल होने पर व्यञ्जन में जो परिवर्तन आता है, उसे व्यञ्जन या हल् सन्धि कहते हैं। जैसे- वाक् + ईशः यहाँ स्वर ई के साथ क् का मेल होने पर क् के स्थान पर ग् होकर ‘वागीशः’ शब्द बना है।

(i) श्चुत्व सन्धिः – (स्तोः श्चुना श्चुः) यदि स् या त वर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) से पहले या बाद में श् या चवर्ग (च्, छ, ज, झ, ञ्) हो तो ‘स्’ का ‘श्’ और तवर्ग का चवर्ग (अर्थात् त् का च्, थ् का छ्, द् का ज्, ध् का झ्, न् का – ब्) हो जाता है। जैसे-

  1. रामस् + शेते = रामश्शेते (स् का श् होने पर)
  2. सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम् (त् का च् होने पर)
  3. आपद् + जालम् = आपज्जालम् (द् का ज् होने पर)
  4. शत्रून् + जयति = शत्रूञ्जयति (न् का ब् होने पर)
  5. सत् + जनः = सज्जनः (त् का ज् होने पर)

(ii) ष्टुत्व सन्धिः – (ष्टुना ष्टुः) ‘स्’ तथा तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) के पहले या बाद में ‘ए’ या टवर्ग (ट्, ठ्, ड्, द, ण) में से कोई वर्ण हो तो ‘स्’ का ‘ए’ तथा तवर्ग का क्रमशः टवर्ग हो जाता है (यथा त् का ट्, थ् का ठ्, द् का ड्, ध् का ढ् तथा न का ण् हो जाता है।) जैसे-

  1. रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः (स् का ष् होने पर)
  2. आकृष् + तः = आकृष्टः (त् का ट् होने पर)
  3. अभीष् + तः = अभीष्टः (त् का ट होने पर)
  4. पुष् + तः = पुष्टः (त् का ट होने पर)
  5. षष् + थः = षष्ठः (थ् का ठ् होने पर)

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(iii) जश्त्व-सन्धिः – (झलां जशोऽन्ते) अर्थात् पद के अन्त में ‘झल्’ (झ्, भ्, घ्, द, ध्, ज्, ब्, ग्, ड्, द्, ख्, फ्, छ्, ठ्, थ्, च्, ट्, त्, क्, प्, श्, ए, स्, ह्) के स्थान पर ‘जश्’ (ज, ब, ग, ड, द) हो जाता है। इस सन्धि के दो भाग हैं। जैसे-

  1. दिक् + गजः = दिग्गजः।
    यहाँ ‘क्’ अपने ही वर्ग का तृतीय वर्ण ‘ग्’ हो गया।
  2. षट् + आननः = षडाननः।
    यहाँ ‘ट्’ अपने ही वर्ग का तृतीय वर्ण ‘ड्’ हो गया।
  3. जगत् + ईशः = जगदीशः।

3. विसर्ग सन्धि

परिभाषा – विसर्ग (:) के साथ किसी स्वर या व्यंजन के मिलने से जो परिवर्तन (विकार) होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं। विसर्ग सन्धि के दो प्रमुख भेद हैं:
(i) सत्व विसर्ग सन्धिः – ‘विसर्जनीयस्य सः।
(क) यदि विसर्ग (:) के बाद क् ख् च् छ् ट ठ त् थ् प् फ् तथा श् ष् स् आये तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है। जैसे-
नमः + ते = नमस्ते

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(ख) यदि विसर्ग के बाद च् छ्, आये तो (:) विसर्ग के स्थान पर श् हो जाता है। जैसे-

  1. रामः + च = रामश्च
  2. गौः + चरति = गौश्चरति

(ग) यदि विसर्ग के बाद कवर्ग, टवर्ग, पवर्ग का प्रथम या द्वितीय अक्षर हो अथवा ष् हो तो विसर्ग के स्थान पर ष हो जाता है। जैसे-

  1. निः + पापः = निष्पापः,
  2. निः + ठा = निष्ठा

(ii) रुत्व विसर्ग सन्धिः – (ससजुषो रुः) पद के अन्तिम ‘स्’ तथा सजुष् शब्द के ‘ष’ का ‘रु’ (र) होता है। यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ तथा ‘आ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा विसर्ग के बाद में कोई स्वर या व्यंजन वर्ग का तीसरा, चौथा अथवा पाँचवाँ वर्ण हो तो विसर्ग का ‘र’ हो जाता है। जैसे-

  1. निः + धनः = निर्धनः
  2. दु: + दशा = दुर्दशा
  3. मुनिः + अपि = मुनिरपि
  4. धनुः + धरः = धनुर्धरः

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अभ्यासः – 1

प्रश्ना 1.
‘क्षुधार्तः’ पदे प्रयुक्तसन्धिः अस्ति
(अ) अयादि
(ब) दीर्घः
(स) गुणः
(द) वृद्धि।
उत्तर:
(ब) दीर्घः

प्रश्ना 2.
‘प्राचीनेतिहासे’ पदे प्रयुक्तसन्धिः अस्ति
(अ) दीर्घः
(ब) गुणः
(स) यण्
(द) अयादि।
उत्तर:
(ब) गुणः

प्रश्ना 3.
‘तथैव’ पदे प्रयुक्तसन्धिः अस्ति-
(अ) यण
(ब) अयादि
(स) दीर्घः
(द) वृद्धिः।
उत्तर:
(द) वृद्धिः।

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प्रश्ना 4.
“प्रत्यावर्तत’ पदे प्रयुक्तसन्धिः अस्ति
(अ)) यण्
(ब) वृद्धिः
(स) अयादि
(द) गुणः।
उत्तर:
(अ)) यण्

प्रश्ना 5.
‘करोत्यनागतम्’ पदे प्रयुक्तसन्धिः अस्ति
(अ) यण्
(ब) गुणः
(स) वृद्धिः
(द) अयादि।
उत्तर:
(अ) यण्

प्रश्ना 6.
“हिमालयः’ पदस्य सम्यग् सन्धि-विच्छेदः अस्ति
(अ) हिम + आलयः
(ब) हिम + लयः।।
(स) हि + मालयः
(द) हिमा + लयः।
उत्तर:
(अ) हिम + आलयः

प्रश्ना 7.
‘पूर्वापरौ’ पदस्य सम्यग् सन्धि-विच्छेदः अस्ति
(अ) पूर्व + अपरौ
(ब) पूर्वा + परौ
(स) पूर्वापरौ
(द) पूर्वाय + रौ
उत्तर:
(अ) पूर्व + अपरौ

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प्रश्ना 8.
‘यस्यातपवन्ति’ पदस्य सम्यग् सन्धि-विच्छेदः अस्ति-
(अ) यस्य + आतपवन्ति
(ब) यस्या + तपवन्ति
(स) यस्यात + पवन्तिः
(द) यस्यातय + वन्ति।
उत्तर:
(अ) यस्य + आतपवन्ति

प्रश्ना 9.
‘तत्रैव’ पदस्य सम्यग् सन्धि-विच्छेदः अस्ति
(अ) त + त्रैव
(ब) तत्र + एव
(स) तत्रैव
(द) तत्र + व।
उत्तर:
(ब) तत्र + एव

प्रश्ना 10.
‘उत्थितैषा’ पदस्य सम्यग् सन्धि-विच्छेदः अस्ति
(अ) उत्थितै + षा
(ब) उत्थिता + एषा
(स) उत्थि + तैषा
(द) उ + त्थितैषा
उत्तर:
(ब) उत्थिता + एषा

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अभ्यासः – 2

प्रश्ना 1.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-सूर्योदयः, तथापि।
उत्तर:
सूर्योदयः = सूर्य + उदयः। तथापि = तथा + अपि।
सन्धिं कुरुत – नर + इन्द्रः नरेन्द्रः। स + उद्वेगम् = सोद्वेगम्।

प्रश्ना 2.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-नास्ति, जलाधिपतिः सृजाम्यहम्, षडाननः।
उत्तर:
नास्ति = न + अस्ति। जलाधिपति: = जल + अधिपतिः।
सन्धिं कुरुत – सृजामि + अहम् = सृजाम्यहम्। षट् + आननः = षडाननः।

प्रश्ना 3.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-अतीव, हिमालयः, पूर्वापरौ, तत्रैव।
उत्तर:
अतीव = अति + इव। हिमालयः = हिम + आलयः।
सन्धिं कुरुत – पूर्व + अपरौ = पूर्वापरौ। तत्र + एव = तत्रैव।

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प्रश्ना 4.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-प्रत्येकम्, दीर्घास्ति, शुभास्ते, नार्जयाम्।
उत्तर:
प्रत्येकम् = प्रति + एकम्। दीर्घास्ति = दीर्घ + अस्ति।
सन्धिं कुरुत – शुभ + अस्ते शुभास्ते। न + अर्जयाम-नार्जयाम्।

प्रश्ना 5.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-तदात्मानम्, प्रत्युवाच, शयनम्, स्वागतम्।
उत्तर:
तदात्मानम् = तदा + आत्मानम्। प्रत्युवाच = प्रति + उवाच।
सन्धिं कुरुत – शे + अनम् = शयनम्। सु + आगतम् = स्वागतम्।

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