RBSE Class 8 Sanskrit व्याकरण कारक प्रकरण

RBSE Solutions for Class 8 Sanskrit

Rajasthan Board RBSE Class 8 Sanskrit व्याकरण कारक प्रकरण

कारक की परिभाषा – वाक्य में क्रिया की सिद्धि करने वाले को अथवा जिसका क्रिया के साथ सम्बन्ध होता है, उसको कारक कहते हैं।

संस्कृत व्याकरण में कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः ही कारक माने गये हैं।

विभक्ति – उपर्युक्त सभी छः कारकों का बोध कराने के लिए विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है और ‘सम्बन्ध’ को कारक न मानने पर भी इसका बोध कराने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी और सम्बोधन ये आठ विभक्तियाँ हैं। सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति का ही प्रयोग होता है।

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1. कर्ता कारक

कर्ता कारक की परिभाषा-किसी क्रिया को करने वाला कर्ता कहलाता है। जैसे- ‘रामः पुस्तकं पठति’ इस वाक्य में पुस्तक को पढ़ने वाला ‘राम’ कर्ता है। अतः राम में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होगा।

2. कर्म कारक

कर्म कारक की परिभाषा-कर्ता जिसको बहुत अधिक चाहता है, उसे ‘कर्म’ कारक कहते हैं। जैसे- मोहनः चित्रं पश्यति। यहाँ चित्रं कर्म कारक है, कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। अतः ‘चित्रम्’ में द्वितीया विभक्ति हुई है।
(i) ‘अधिशीङ्स्थासां कर्म’ सूत्र के अनुसार ‘अधि’ उपसर्गपूर्वक शीङ् (सोना), स्था (ठहरना) एवं आस् (बैठना) धातु के आधार की कर्म संज्ञा होती है अर्थात् सप्तमी विभक्ति के अर्थ में द्वितीया विभक्ति होती है, जैसे- हरिः वैकुण्ठम् अधिशेते। (हरि वैकुण्ठ में सोते हैं।)

(ii) उभयतः (दोनों ओर), सर्वतः (सभी ओर), धिक् (धिक्कार है), उपर्युपरि (उपरि + उपरि = ऊपर-ऊपर), अध्यधि (अधि + अधि = अन्दर-अन्दर) और अधोऽधः (अधः + अधः = नीचे-नीचे) इन शब्दों का योग होने पर द्वितीया विभक्ति ही होती है। जैसे-

  • कृष्णम् उभयतः गोपाः सन्ति। (कृष्ण के दोनों ओर ग्वाले हैं।)
  • ग्राम सर्वतः जलम् अस्ति। (गाँव के सब ओर जल है।)।
  • दुर्जनं धिक्। (दुर्जन को धिक्कार है।)

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(iii) अभितः परितः समयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि’ वार्तिक से अभितः (दोनों ओर), परितः (चारों ओर), समया (समीप में), निकषा (समीप में), हा (अफसोस) तथा प्रति (ओर) का योग होने पर भी द्वितीया विभक्ति होती है जैसे – प्रयागम् अभितः नद्यौ स्तः। (प्रयाग के दोनों ओर नदियाँ हैं।) ग्रामं समया विद्यालयोऽस्ति। (गाँव के समीप में विद्यालय है।)

3. करण कारक

करण कारक की परिभाषा – ‘साधकतमं करणम्’ अर्थात् किसी क्रिया की सिद्धि में जो अत्यन्त सहायक होता है, उसे करण कारक कहते हैं।
(i) करण कारक में तृतीया विभक्ति आती है तथा कर्मवाच्य एवं भाववाच्य के कर्ता में भी तृतीया विभक्ति आती है। जैसे-

  • रामः कलमेन लिखति। (राम कलम से लिखता है।)
  • मया पुस्तकं पठ्यते। (मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है।)

(ii) ‘प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्’ अर्थात् प्रकृति, प्रायः, गोत्र आदि शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-

  • रामः प्रकृत्या दयालुः अस्ति। (राम प्रकृति से दयालु है।)
  • सोमदत्तः प्रायेण याज्ञिकोऽस्ति। (सोमदत्त प्रायः याज्ञिक है।)

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(iii) सहयुक्तेऽप्रधाने’ अर्थात् सह (साथ), साकम् (साथ), समम् (साथ) और सार्धम् (साथ) के योग में अप्रधान (कर्ता का साथ देने वाले) में तृतीया विभक्ति आती है। जैसे- सीता रामेण सह गच्छति। (सीता राम के साथ जाती है।)

(iv) ‘येनाङ्गविकारः’ अर्थात् जिस अंग विशेष से शरीर का विकार जाना जाता है, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- सः नेत्रेण काणः। (वह नेत्र से काना है।)

(v) इत्थंभूतलक्षणे’ अर्थात् जिस लक्षण या चिह्न विशेष से किसी वस्तु या व्यक्ति का बोध होता है, उसमें तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। जैसे- जटाभिः तापसः प्रतीयते। (जटाओं से तपस्वी प्रतीत होता है।)

4. सम्प्रदान कारक

सम्प्रदान कारक की परिभाषा – जिसको सम्यक् (भलीभाँति) प्रकार से दान दिया जाय अथवा जिसको कोई वस्तु दी जाय, उसकी सम्प्रदान कारक संज्ञा होती है।
(i) ‘सम्प्रदाने चतर्थी’ अर्थात सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे- नृपः ब्राह्मणाय धेनुं ददाति। (राजा ब्राह्मण को गाय देता है।)

(ii) ‘रुच्यर्थानां प्रीयमाणः’ अर्थात् रुच् (अच्छा लगना) अर्थ वाली धातुओं के साथ चतुर्थी विभक्ति होती है। जिसे कोई वस्तु अच्छी लगती है, उसमें चतुर्थी आती है और जो वस्तु अच्छी लगती है, उसमें प्रथमा ही आती है। जैसे – बालकाय मोदकं रोचते। (बालक को लड्डू अच्छा लगता है।)

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(iii) ‘क्रुधगुहेासूयार्थानां यं प्रति कोपः’ अर्थात् क्रुध् (क्रोध करना), द्रुह् (द्रोह करना), ईर्ष्या (ईर्ष्या करना) और असूय् (दोष निकालना) धातुओं के योग में तथा इन धातुओं के समान अर्थ वाली अन्य धातुओं के योग में जिसके ऊपर क्रोध आदि किया जाता है, उसकी सम्प्रदान कारक संज्ञा होने से उसमें चतुर्थी विभक्ति आती है। जैसे- स्वामी सेवकाय क्रुध्यति कुप्यति वा। (स्वामी सेवक पर क्रोध करता है।)

(iv) ‘तादर्थ्य चतुर्थी’ अर्थात् जिस प्रयोजन के लिए कोई कार्य किया जाता है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है, जैसे-भक्तः मुक्तये हरिं भजति। (भक्त मुक्ति के लिए हरि को भजता है।)

(v) ‘नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च’ अर्थात् नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (अग्नि में आहुति), स्वधा (पितरों के लिए दान), अलम् (पर्याप्त, समर्थ)
और वषट् (न्यास आदि में उच्चरित) के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे-

  • श्रीगणेशाय नमः। (गणेशजी के लिए नमस्कार है।)
  • रामाय स्वस्तिः। (राम का कल्याण हो।)
  • अग्नये स्वाहा। (अग्नि के लिए आहुति।)
  • हरिः दैत्येभ्यः अलम्। (हरि दैत्यों के लिए पर्याप्त हैं।)

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5. अपादान कारक

अपादान कारक की परिभाषा-‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ अर्थात् किसी वस्तु या व्यक्ति के अलग होने पर जो वस्तु स्थिर होती है अर्थात् जिससे वस्तु अलग होती है, उसकी अपादान कारक संज्ञा होती है तथा-

(i) ‘अपादाने पञ्चमी’ अर्थात् अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। जैसे- वृक्षात् पत्रं पतति। (वृक्ष से पत्ता गिरता है।)

(ii) जुगुप्सा (घृणा करना), विराम (रुकना) और प्रमाद (असावधानी करना) अर्थ वाली धातुओं के साथ पञ्चमी विभक्ति प्रयुक्त होती है। जैसे-

  • रामः पापात् जुगुप्सते। (राम पाप से घृणा करता है।)
  • कृष्णः पापात् विरमति। (कृष्ण पाप (करने) से रुकता है।)

(iii) भीत्रार्थानां भयहेतुः’ अर्थात् भय अर्थ की और रक्षा अर्थ की धातुओं के साथ, जिससे भय हो अथवा जिससे रक्षा की जाये उसमें पञ्चमी विभक्ति आती है। जैसे-

  • बालकः चौराद् बिभेति। (बालक चोर से डरता है।)
  • नृपः चौरात् त्रायते। (राजा चोर से रक्षा करता है।)

(iv) छिपना या छिपाना अर्थ की धातु के योग में पञ्चमी विभक्ति आती है। जिससे छिपता है, वह अपादान कारक होता है। अतः उसी में पञ्चमी विभक्ति लगती है। जैसे- कृष्णः मातुः निलीयते। (कृष्ण माता से छिपता है।)

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6. षष्ठी विभक्ति

(i) ‘शेषे षष्ठी’ अर्थात् सम्बन्ध का बोध कराने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। जैसे-

  • राज्ञः पुरुषः। (राजा का पुरुष।)
  • गंगायाः जलम्। (गंगा का जल।)
  • शिशो: जननी। (बालक की माता।)

(ii) ‘षष्ठी हेतुप्रयोगे’ अर्थात् हेतु शब्द का प्रयोग करने पर प्रयोजनवाचक शब्द एवं हेतु शब्द, दोनों में ही षष्ठी विभक्ति आती है। जैसे- अन्नस्य हेतोः वसति। (अन्न के कारण रहता है।)

(iii) षष्ठ्यत्सर्थप्रत्ययेन’ अर्थात् अतस् प्रत्यान्त दिशावाची तथा उसके अर्थ वाले अन्य प्रत्यय लगाकर बने शब्दों तथा इसी प्रकार के अर्थ के पुरः (सामने), पुरस्तात् (सामने), पश्चात् (पीछे), उपरि (ऊपर), उपरिष्टात् (ऊपर की ओर), अधः (नीचे) और अधस्तात् (नीचे की ओर) आदि शब्दों के योग में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे-

  • ग्रामस्य दक्षिणतः देवालयोऽस्ति। (गाँव के दक्षिण की ओर मंदिर है।)
  • ग्रामस्य पुरः पुरस्तात् वा उद्यानम् अस्ति। (गाँव के सामने बाग है।)

(iv) ‘अधीगर्थदयेशां कर्मणि’ अर्थात् (अधि + इक्) अधिपूर्वक इक् धातु तथा स्मरणार्थक अन्य धातुओं के कर्म में षष्ठी हो जाती है। जैसे- बालक: मातुः स्मरति। (बालक माता को स्मरण करता है।)

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(v) समक्षम् (सामने), अन्तः (अन्दर), मध्ये (बीच में) और अन्तरे (अन्दर) शब्दों के साथ षष्ठी विभक्ति प्रयुक्त होती है। जैसे-

  • सः मम समक्षम् आगच्छत्। (वह मेरे सामने आया।)
  • रामः छात्राणां मध्ये अवदत्। (राम छात्रों के बीच में बोला।)

7. अधिकरण कारक

अधिकरण कारक की परिभाषा-‘आधारोऽधिकरणम्’ अर्थात् जिस स्थान पर कोई कार्य होता है अथवा किसी वस्तु का जो आधार होता है, उसे अधिकरण कारक कहते है।
(i) ‘सप्तम्यधिकरणे’ अर्थात् अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त होती है। जैसे-

  • सः कटे आस्ते। (वह चटाई पर बैठता है।)
  • ईश्वरः सर्वस्मिन् वर्तते। (ईश्वर सब में है।)
  • पाचकः स्थाल्यां पचति। (रसोईया पतीली में पकाता है।)

(ii) विषय में, बारे में तथा समयबोधक शब्दों में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे-

  • मम मोक्षे इच्छाऽस्ति। (मेरी मोक्ष (के विषय) में इच्छा है।)
  • सः सायंकाले पठति। (वह शाम को पढ़ता है।)

(iii) फेंकना या झपटना अर्थ की क्षिप, मुच् या अस् धातुओं के साथ सप्तमी विभक्ति आती है। जैसे- नृपः मृगे बाणं क्षिपति। (राजा हिरन पर बाण फेंकता है।)

(iv) व्यापृत (संलग्न), तत्पर, व्यग्र, कुशल, निपुण, दक्ष, प्रवीण आदि शब्दों के योग में सप्तमी होती है। जैसे-

  • जनाः गृहकर्मणि व्यापताः सन्ति। (लोग गृहकार्य में संलग्न हैं।)
  • ते समाजसेवायां तत्पराः सन्ति। (वे समाजसेवा में लगे हुए हैं।)

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अभ्यासः – 1

प्रश्न-रेखांकित पदों में प्रयुक्त विभक्ति तथा करण लिखिए

प्रश्ना 1.

  1. सः लगुडेन चलन्तं वृद्धम् अपश्यत्।
  2. अहम् एनं हंसम् अहनम्।

उत्तर:

  1. करण में तृतीया वि.
  2. कर्म में द्वितीया वि.

प्रश्ना 2.

  1. अहं शरणार्थिनं कदापि व्याधाय न दास्यामि।
  2. सिद्धार्थः प्रासादात् वनं निरगच्छत्।

उत्तर:

  1. सम्प्रदान में चतुर्थी वि.
  2. अपादान में पंचमी वि.

प्रश्ना 3.

  1. गंगा शान्तनोः भार्या आसीत्।
  2. स्वां रूपवतीं दुहितरं मह्यं यच्छ।

उत्तर:

  1. संबंध में षष्ठी वि.
  2. सम्प्रदान में चतुर्थी वि.

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प्रश्ना 4.

  1. अहं सदा ब्रह्मचर्येण स्थास्यामि।
  2. मम पित्रे स्वां दुहितरं यच्छ।

उत्तर:

  1. करण में तृतीया वि.
  2. सम्प्रदान में चतुर्थी वि.

प्रश्ना 5.

  1. अहं सत्यवती तुभ्यं विवाहे दास्यामि।
  2. नपतिना सह विवाहमकरोत्।

उत्तर:

  1. सम्प्रदान में चतुर्थी वि.
  2. ‘सह’ के योग में तृतीया वि।

अभ्यासः – 2

अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखांकितपदेषु प्रयुक्त विभक्तिं लिखत-

प्रश्ना 1.
(अ) सः कलमेन लिखति।
(ब) बालकः चौरात् विभेति।
(स) कविषु कालिदासः श्रेष्ठः।
(द) गुरवे नमः।
उत्तर:
(अ) तृतीया
(ब) पंचमी
(स) सप्तमी
(द) चतुर्थी।

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प्रश्ना 2.
(अ) वृक्षायुर्वेदग्रन्थस्य रचियता कः?
(ब) आर्यभट्टः किम् जानाति स्म?
(स) विद्युतकोशस्य आविष्कारकः कः आसीत्?
(द) त्वचारोपणम् आदौ कः कृतवान्?
उत्तर:
(अ) षष्ठी
(ब) प्रथमा
(स) प्रथमा
(द) द्वितीया।

प्रश्ना 3.
(अ) सर्वे जनाः किं पश्यन्ति?
(ब) कृष्णम् उभयतः गोपा सन्ति।
(स) कृषक: यवेभ्यो गां वारयति।
(द) शिशुः दुग्धाय क्रन्दति।
उत्तर:
(अ) प्रथमा
(ब) द्वितीया
(स) पञ्चमी
(द) चतुर्थी।

प्रश्ना 4.
(अ) कृषक: भारं ग्रामं वहति।
(ब) अर्जुनः एकः महान् धनुर्धरः आसीत्।
(स) पितृभ्यः स्वधा।
(द) निम्बवृक्षात् पिप्पलवृक्षः पवित्रतरः।
उत्तर:
(अ) द्वितीया
(ब) प्रथमा
(स) चतुर्थी
(द) पञ्चमी।

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प्रश्ना 5.
(अ) गोपालः धेनुं दुग्धं दोग्धि।
(ब) गिरधरः पादेन खञ्ज।
(स) मोक्षाय हरिं भजति।
(द) गोषु कृष्णा बहुक्षीरा।
उत्तर:
(अ) द्वितीया
(ब) तृतीया\
(स) चतुर्थी
(द) सप्तमी।

अभ्यासः – 3

प्रश्ना 1.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) विभेति
(ख) रोचते
(ग) हेतो
(घ) सह
उत्तर:
(क) विभेति-बालकः चौरात् विभेति।
(ख) रोचते-हरये भक्तिः रोचते।
(ग) हेतोः-अन्नस्य हेतोः वसति।
(घ) सह-सीता रामेण सह गच्छति।

प्रश्ना 2.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) स्वाहा
(ख) उद्भवति
(ग) मोक्षे
(घ) हेतोः
उत्तर:
(क) स्वाहा-अग्नये स्वाहा।
(ख) उद्भवति-गङ्गा हिमालयात् उद्भवति।
(ग) मोक्षे-मम मोक्षे इच्छाऽस्ति।
(घ) हेतोः-सः नेत्रेण काणः अस्ति।

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प्रश्ना 3.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) अभितः
(ख) काणः
(ग) समया
(घ) बधिरः।
उत्तर:
(क) अभितः-प्रयागम् अभितः नद्यौ स्तः।
(ख) काण:-सः नेत्रेण काणः अस्ति।
(ग) समया-ग्रामं समया विद्यालयोऽस्ति।
(घ) बधिर:-मोहनं कर्णाभ्यां बधिरः आस्ति।

प्रश्ना 4.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) क्रुध्यति
(ख) विरमति
(ग) पुरः
(घ) सायंकाले
उत्तर:
(क) क्रुध्यति-स्वामी सेवकाय क्रुध्यति।
(ख) विरमति-कृष्णाः पापात् विरमति।
(ग) पुर:-ग्रामस्य पुरः उद्यानम् अस्ति।
(घ) सायंकाले- सः सायंकाले पठति।

प्रश्ना 5.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) हितं
(ख) वारयति
(ग) हिताय
(घ) युद्धाय
उत्तर:
(क) हितं- विप्राय हितं भूयात्।।
(ख) वारयति-कृषक: यवेभ्यो गां वारयति।
(ग) हिताय-बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।
(घ) युद्धाय-क्षत्रियधर्म पालयन् युद्धाय निश्चयः कृत।

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प्रश्ना 6.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) पुरः
(ख) पश्चात्
(ग) कटे
(घ) वर्तते
उत्तर:
(क) पुर:- ग्रामस्य पुरः उद्यानम् अस्ति।
(ख) पश्चात्-विद्यालयस्य पश्चात् वनम् अस्ति।
(ग) कटे- स: कटे आस्ति।
(घ) वर्तते-ईश्वरः सर्वस्मिन् वर्तते।

प्रश्ना 7.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) नमः
(ख) स्वस्ति
(ग) स्वाहा
(घ) स्वधा
उत्तर:
(क) नमः-गुरुवे नमः।
(ख) स्वस्ति-प्रजाभ्यः स्वस्ति।
(ग) स्वाहा-अग्नये स्वाहा।
(घ) स्वधा-पितृभ्यः स्वधा।

प्रश्ना 8.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) अलं
(ख) वषट्
(ग) स्वदते
(घ) स्पृह्यति
उत्तर:
(क) अलं-अलं विवादाय।
(ख) वषट्-इन्द्राय वषट्।
(ग) स्वदते-बालकाय मोदकं स्वदते।
(घ) स्पृह्यति- बालकः पुष्पेभ्यः स्पृह्यति।

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प्रश्ना 9.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) काणः
(ख) खञ्जः
(ग) बधिरः
(घ) खल्वाट:
उत्तर:
(क) काण:- सः नेत्रेण काणः।
(ख) खञ्जः-रामः पादेन खञ्जः।
(ग) बधिरः-मोहनः कर्णाभ्यां बधिरः।
(घ) खल्वाट:-सः शिरसा खल्वाटः।

प्रश्ना 10.
अधोलिखित पदयोः योगेन एकैकं वाक्यं लिखत
(क) सह
(ख) साकं
(ग) समं
(घ) सार्धम्
उत्तर:
(क) सह-सीता रामेण सह गच्छति।
(ख) साकं-पिता पुत्रेण साकं गच्छति।
(ग) सम-छात्रः शिक्षकेण समं पठति।
(घ) सार्धम्-बालकः जनकेन सार्धम् आगच्छति।

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