RBSE Class 12 History Notes Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

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RBSE Class 12 History Chapter 7 Notes एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

→ विजयनगर अथवा 'विजय का शहर' एक शहर एवं एक साम्राज्य दोनों के लिए प्रयोग किया जाने वाला नाम था।

→ चौदहवीं शताब्दी में स्थापित विजयनगर साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष के समय उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला हुआ था। 

→ विजयनगर को 1565 ई. में आक्रमण कर लूटा गया। धीरे-धीरे 17वीं-18वीं शताब्दियों तक यह शहर पूर्ण रूप से नष्ट हो गया, फिर भी कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र के निवासियों में इसकी स्मृति शेष रहीं, उन्होंने इस शहर को हम्पी नाम से याद रखा। इस नाम का प्रचलन यहाँ की स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से हुआ था। 

→ ईस्ट इंडिया कम्पनी में कार्यरत अभियंता एवं पुरातत्वविद कॉलिन मैकेन्जी ने 1800 ई. में हम्पी के भग्नावशेषों को खोज निकाला। उसने इस स्थान का व्यापक सर्वेक्षण कर एक मानचित्र तैयार किया। उसकी प्रारंभिक जानकारियाँ विरुपाक्ष मन्दिर एवं पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थीं। 

→ अभिलेखों तथा परम्परा पर आधारित साक्ष्यों के आधार पर इतिहासकारों का यह मत है कि 1336 ई. में दो भाइयों—हरिहर तथा बुक्का द्वारा विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की गयी।

→ विजयनगर साम्राज्य की सीमाओं में अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले एवं अलग-अलग धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले लोग रहते थे। 

→ विजयनगर के शासकों ने उर्वर नदी घाटी के भू-भाग एवं विदेशी लाभकारी व्यापार से उत्पन्न सम्पदा पर अधिकार हेतु दक्कन के सुल्तान एवं उड़ीसा के गजपति शासकों से संघर्ष किया। 

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→ विजयनगर के शासक अपने आपको 'राय' कहते थे जिन्होंने मन्दिरों के संरक्षण की परम्पराओं को आगे बढ़ाया तथा उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। 

→ समकालीन लोगों ने विजयनगर साम्राज्य के लिए कर्नाटक साम्राज्य शब्द का प्रयोग किया। 

→ 15वीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली शासक वंश का नाम गजपति था जिसका शाब्दिक अर्थ है- हाथियों का स्वामी।

→ विजयनगर की लोक प्रचलित परम्पराओं में दक्कन के सुल्तानों को 'अश्वपति' अथवा 'घोड़ों के स्वामी' और रायों को 'नरपति' अथवा लोगों के स्वामी' कहा गया है। 

→ चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के दौरान युद्धकला पूर्ण रूप से कुशल अश्व सेना पर आधारित होती थी। इसलिए प्रतिस्पर्धी राज्यों के लिए अरब और मध्य एशिया से उत्तम घोड़ों का आयात बहुत ही महत्व रखता था।

→ प्रारंभिक चरणों में अरब व्यापारियों द्वारा अरब और मध्य एशिया से घोड़ों के व्यापार को नियंत्रित किया जाता था। स्थानीय व्यापारी, जिन्हें कुदिरई चेट्टी' अथवा 'घोड़ों के व्यापारी' कहा जाता था, भी इस व्यापार में भाग लेते थे।

→ 1498 ई. में पुर्तगालियों ने भारतीय उप-महाद्वीप के पश्चिमी तट पर व्यापारिक एवं सामरिक केन्द्र स्थापित करने के प्रयास करने प्रारम्भ कर दिए। 

→ पुर्तगाली बन्दूक के प्रयोग में कुशल थे, इसलिए वे समकालीन राजनीति में शक्ति का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गए।

→ विजयनगर साम्राज्य अपने मसालों, वस्त्रों एवं रत्नों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। ऐसे शहरों के लिए व्यापार प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता था।

→ विजयनगर की समृद्धि एवं सम्पन्नता के कारण विदेशी वस्तुओं की माँग जनता में बहुत अधिक थी तथा व्यापार से राज्य को बहुत अधिक राजस्व की प्राप्ति होती थी।

→ विजयनगर साम्राज्य का पहला राजवंश संगम वंश' था। 1485 ई. तक विजयनगर इस वंश के अधीन रहा। 

→ सुलुवों ने संगम राजवंश को उखाड़ फेंका। ये सैनिक कमांडर थे जिन्होंने 1503 ई. तक शासन किया। इसके पश्चात् तुलुवों ने सुलुवों को पराजित कर विजयनगर पर अपना अधिकार कर लिया।

→ कृष्णदेव राय तुलुव वंश का सबसे प्रतापी शासक था जिसका शासनकाल विजयनगर साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का काल कहलाता है। इसके शासन की चारित्रिक विशेषता विस्तार एवं दृढ़ीकरण था।

→ कृष्णदेव राय ने 1512 ई. में तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के मध्य स्थित उपजाऊ भू-क्षेत्र (रायचूर दोआब) पर अधिकार कर अपने राज्य का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण किया। उसने उड़ीसा के शासकों व बीजापुर के सुल्तान को क्रमश: 1514 ई. व 1520 ई. में पराजित किया। 

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→ कृष्णदेव राय ने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया तथा विजयनगर के समीप ही अपनी माँ के नाम पर नगलपुरम नामक उपनगर की स्थापना की।

→ 1529 ई. में कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात् राजकीय ढाँचे में तनाव उत्पन्न होने लगा जिसका लाभ उठाकर 1542 ई. में अराविदु वंश ने विजयनगर की सत्ता पर कब्जा कर लिया। 17वीं शताब्दी तक इस वंश का विजयनगर पर शासन रहा।

→ 1565 ई. में राक्षसी-तांगडी (तालीकोटा) के युद्ध में बीजापुर, गोलकुण्डा एवं अहमदनगर की संयुक्त सेनाओं ने विजयनगर पर हमला कर उसे खूब लूटा। कुछ ही वर्षों में यह शहर पूरी तरह से उजड़ गया। 

→ इस कारण साम्राज्य का केन्द्र पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गया जहाँ अराविदु राजवंश ने पेनुकोण्डा से तथा बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के निकट) से शासन किया। 

→ यद्यपि सुल्तानों की सेनाएँ विजयनगर शहर के विध्वंस के लिए उत्तरदायी थीं, तथापि सुल्तानों एवं रायों के सम्बन्ध धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे। उदाहरण के लिए, कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के अनेक दावेदारों का समर्थन किया तथा “यवन राज्य की स्थापना करने वाला" विरुदधारण कर गौरव महसूस किया।

→ विजयनगर साम्राज्य में शक्ति का प्रयोग करने वालों में सेना प्रमुख होते थे, जो सामान्यतः किलों पर नियंत्रण रखते थे तथा इनके पास सशस्त्र सैनिक होते थे। इन सेना प्रमुखों को 'नायक' कहा जाता था जो आमतौर पर तेलुगु और कन्नड़ भाषा बोलते थे। 

→ अमर-नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक नई राजनीतिक खोज थी। अमर-नायक सैनिक कमांडर थे जिन्हें राय द्वारा प्रशासन के लिए राज्य क्षेत्र दिए जाते थे। वे किसानों, शिल्पियों एवं व्यापारियों से भू-राजस्व एवं अन्य कर वसूल करते थे तथा व्यक्तिगत उपयोग और घोड़ों व हाथियों के निर्धारित दल के रख-रखाव के लिए राजस्व का कुछ भाग अपने पास रख लेते थे। 

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→ अमर-नायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजा करते थे तथा अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करने के लिए राजदरबारों में उपहारों के साथ स्वयं उपस्थित होते थे।

→ 17वीं शताब्दी में कई नायकों द्वारा अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के कारण केन्द्रीय राजकीय ढाँचे का तीव्रता से विघटन होने लगा। 

→ विजयनगर के राजाओं और उनके नायकों द्वारा मन्दिरों को दिए जाने वाले दानों का उल्लेख और महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण बड़ी संख्या में मिले उनके अभिलेखों से मिलता है। 

→ विजयनगर साम्राज्य की राजधानी विजयनगर, शहर एक अति सुन्दर विकसित स्थापत्य कला एवं विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों से परिपूर्ण था।

→ विजयनगर की समृद्धि में यहाँ की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति का विशेष योगदान था। विजयनगर का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण तुंगभद्रा नदी द्वारा निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड है। शहर चारों ओर से ग्रेनाइट की पहाड़ियों से घिरा हुआ था जिनसे तुंगभद्रा नदी में कई जलधाराएँ आकर मिलती थीं। सभी जलधाराओं पर बाँध बनाकर जलापूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी। 

→ विजयनगर के सबसे महत्वपूर्ण हौजों में से एक हौज का निर्माण 15वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में हुआ था जिसे आज 'कमलपुरम् जलाशय' कहा जाता है। इससे खेतों की सिंचाई के साथ-साथ विजयनगर शहर में जलापूर्ति की जाती थी। विजयनगर शहर के भग्नावशेषों में हिरिया नहर का अस्तित्व आज भी मौजूद है। सम्भवत: संगम वंश के राजाओं द्वारा निर्मित इस ' नहर के पानी का प्रयोग धार्मिक केन्द्र' से 'शहरी केन्द्र' को अलग करने वाली घाटी की सिंचाई करने में किया जाता था।

→ विजयनगर शहर की सुरक्षा हेतु विशाल किलेबन्दी की गई थी, जिसे दीवारों से घेरा गया था। 15वीं शताब्दी में फारस के शासक द्वारा कालीकट (कोजीकोड) भेजा गया दूत अब्दुर रज्जाक यहाँ की किलेबन्दी से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उसने दुर्गों की सात पंक्तियों का वर्णन किया जिनसे शहर के साथ-साथ कृषि में प्रयुक्त आसपास.के क्षेत्र और जंगलों को भी घेरा गया था। किलेबन्दी से खेतों को भी घेरा गया था जो इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात थी। 

→ विजयनगर के दुर्ग में प्रवेश हेतु सुरक्षित प्रवेश द्वारों का निर्माण किया गया था जिनसे शहर की मुख्य सड़कें सम्बन्धित होती थीं। प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला उत्कृष्ट थी तथा इनके मेहराब एवं गुम्बदों के निर्माण में इंडो-इस्लामिक शैली का प्रयोग किया गया था।

→ सड़कें प्रायः पहाड़ी भू-भाग से हटकर बनाई जाती थीं। सबसे प्रमुख सड़कों में से कुछ मन्दिर के प्रवेश द्वारों से आगे की ओर बढ़ी हुई थीं तथा इनके दोनों ओर बाजार थे।

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→ शहरी केन्द्रों में सामान्य लोगों के आवासों के पुरातात्त्विक साक्ष्य कम ही शेष हैं। पुरातत्वविदों को शहरी केन्द्र के उत्तर-पूर्वी कोने से चीनी मिट्टी के टुकड़ों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सम्भवतः इस क्षेत्र में व्यापारी वर्ग के धनी लोगों के आवास थे।

→ शहरी केन्द्रों में कुछ मकबरों एवं मस्जिदों के साक्ष्य भी मिले हैं जिनकी स्थापत्य कला मन्दिरों की स्थानीय स्थापत्य कला से मिलती-जुलती है। अनुमान है कि यहाँ मुस्लिम आबादी भी थी। 

→ क्षेत्र सर्वेक्षणों से यह पता चलता है कि सम्पूर्ण शहरी क्षेत्र में अनेक पूजास्थल एवं छोटे-छोटे मन्दिर थे, जो विविध सम्प्रदायों से विजयनगर साम्राज्य में राजकीय केन्द्र बस्ती के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में स्थित था जिसमें 60 से अधिक मन्दिर सम्मिलित थे। ये शासकों की धार्मिक आस्था के परिचायक हैं। 

→ विजयनगर से महलों के रूप में लगभग 30 संरचनाओं के प्रमाण मिले हैं। महलरूपी ये बड़ी संरचनाएँ धार्मिक क्रिया-कलापों हेतु नहीं थीं। इन संरचनाओं एवं मन्दिरों के मध्य अन्तर यह था कि मन्दिरों के निर्माण में उच्चकोटि की सामग्री का प्रयोग किया गया . था, जबकि अन्य इमारतें नष्टप्रायः वस्तुओं से बनाई गयी थीं।

→ राजकीय क्षेत्र की कुछ विशिष्ट संरचनाओं का नामकरण भवनों के आकार एवं उनके कार्य के आधार पर किया गया है। एक सबसे विशाल संरचना का नामकरण राजा के भवन के रूप में किया गया है, परन्तु इसके राजकीय आवास होने के सम्बन्ध में कोई प्रमाणित साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। इस भवन के दो प्रभावशाली निर्माण हैं जिन्हें सभामण्डप' तथा 'महानवमी डिब्बा' कहा जाता है।

→ सभा मंडप एक ऊँचे मंच के रूप में निर्मित है जिसमें जगह-जगह एक निश्चित दूरी पर लकड़ी के स्तम्भों के लिए छेद निर्मित हैं। इन स्तम्भों पर टिकी दूसरी मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं।

→ महानवमी डिब्बा नामक संरचना एक विशालकाय मंच के रूप में है जो शहर के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित है। यह मंच लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक जाता है। सम्भवतः इस विस्तृत मंच का प्रयोग आनुष्ठानिक कार्यों, विशेष उत्सवों, त्योहारों आदि के लिए किया जाता था। दशहरा, दुर्गापूजा, नवरात्रि या महानवमी के अवसरों पर विजयनगर के शासक सम्भवतः यहाँ अपनी शक्ति, प्रभाव एवं प्रभुता का प्रदर्शन करते थे।

→ मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा और भैंसों व अन्य जानवरों की बलि देना इस अवसर पर होने वाले प्रमुख धर्मानुष्ठान थे। इसके अतिरिक्त इस अवसर के प्रमुख आकर्षणों में नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा व साज लगे घोड़ों, हाथियों और रथों व सैनिकों की शोभायात्रा के साथ-साथ प्रमुख नायकों एवं अधीनस्थ राजाओं व उसके अतिथियों को दी जाने वाली औपचारिक भेंट इत्यादि सम्मिलित थीं। 

→ राजकीय केन्द्रों में स्थित अन्य भवनों में लोटस-महल (कमल महल) सबसे सुन्दर भवनों में से एक है। 19वीं शताब्दी के अंग्रेज यात्रियों ने इस महल की छत के गुम्बदों की कमलनुमा संरचना को देखकर इसे 'लोटस महल' की संज्ञा दी थी। 

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→ लोटस-महल के उपयोग के बारे में इतिहासकार कोई एक निश्चित मत नहीं बना सके हैं, लेकिन मैकेन्जी द्वारा बनाए गए मानचित्र से यह अनुमान लगाया जाता है कि राजा यहाँ अपने सलाहकारों से मिलता था। इस प्रकार से यह एक परिषदीय सभागार था।

→ राजकीय केन्द्रों में स्थित मन्दिरों में से 'हजार राम मन्दिर' अत्यन्त दर्शनीय है जिनका उपयोग सम्भवतः केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही पूजा-अर्चना के लिए किया जाता था।

→ तुंगभद्रा नदी के तट से लगा विजयनगर शहर का उत्तरी भाग पहाड़ी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ रामायण में वर्णित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य मान्यताओं के अनुसार पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष नामक देवता से विवाह के लिए तप किया था। 

→ विरुपाक्ष विजयनगर राज्य के संरक्षक देवता तथा शिव का एक रूप माने जाते थे। 

→ सम्भवतः विजयनगर को राजधानी के रूप में चुनने का कारण यहाँ भगवान विरुपाक्ष और पम्पादेवी के मन्दिरों का स्थित होना रहा हो।

→ विजयनगर के शासक अपने-आपको भगवान विरुपाक्ष का प्रतिनिधि मानकर शासन करने का दावा करते थे। राज्य के सभी राजकीय आदेशों पर श्री विरुपाक्ष शब्द कन्नड़ लिपि में सबसे ऊपर अंकित किया जाता था। 

→ विजयनगर के शासक देवताओं से अपने घनिष्ठ सम्बन्धों के संकेतक के रूप में विरुद 'हिन्दु सूरतराणा' का भी प्रयोग करते थे। विजयनगर के मन्दिर स्थापत्य में कई नए तत्वों का समावेश हुआ जिनमें विशाल स्तर पर बनाई गयी संरचनाएँ शामिल हैं। ये संरचनाएँ राजकीय सत्ता की प्रतीक थीं, जिनका सबसे अच्छा उदाहरण राय गोपुरम् अथवा राजकीय प्रवेश द्वार थे।

→ राय गोपुरम् अथवा राजकीय प्रवेश द्वार लम्बी दूरी से ही मन्दिर के होने का संकेत देते थे। ये सम्भवतः शासकों की शक्ति की याद भी दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारों के निर्माण के लिए आवश्यक साधन, तकनीक तथा कौशल जुटाने में सक्षम थे। अन्य विशेष संरचनाओं में मण्डप एवं लम्बे स्तम्भों वाले गलियारे उल्लेखनीय थे जो प्रायः मन्दिर परिसर में स्थित देवालयों के चारों ओर बने थे। 

→ विरुपाक्ष मन्दिर के निर्माण में कई शताब्दियों का समय लगा। मुख्य मन्दिर के सामने बना मण्डप राजा कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया था जिसे बारीकी से उत्कीर्णित स्तम्भों से सजाया गया था। कृष्णदेव राय को ही पूर्वी गोपुरम् के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। 

→ विरुपाक्ष मन्दिर के सभागारों का उपयोग विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के कार्यों में किया जाता था। देवी-देवताओं को झूला झुलाने तथा उनके वैवाहिक उत्सवों का आनन्द मनाने हेतु अन्य सभागारों का प्रयोग किया जाता था। 

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→ विट्ठल मन्दिर विजय नगर का दूसरा महत्वपूर्ण `टर है। भगवान विट्ठल को विष्णु का स्वरूप माना जाता है। भगवान विट्ठल महाराष्ट्र में प्रमुख देव के रूप में पूजे जाते थे। कर्नाटक में विट्ठल की पूजा विजयनगर के शासकों द्वारा अलग-अलग प्रदेशों की परम्पराओं को आत्मसात् करने का उदाहरण है। 

→ विट्ठल मन्दिर रथ के आकार का है जिसके परिसर में पत्थर के टुकड़ों के फर्श से निर्मित रथ गलियाँ हैं जिनके दोनों ओर बने स्तम्भ वाले मंडपों में व्यापारी दुकानें लगाया करते थे। ये रथ गलियाँ मन्दिर के गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती हैं। 

→ किलेबन्दी की परम्पराओं की तरह नायकों ने मन्दिर निर्माण की परम्पराओं को भी जारी रखा जिनके अन्तर्गत उन्होंने कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरमों का निर्माण किया। 

→ विजयनगर के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए मैकेंजी द्वारा किए गए आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद यात्रा वृत्तान्तों तथा अभिलेखों से प्राप्त जानकारी को एक साथ जोड़ा गया। 20वीं शताब्दी में यह स्थान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा कर्नाटक पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के संरक्षण में आ गया।

→ सन् 1976 ई. में हम्पी को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया। तत्पश्चात् 1980 के दशक के आरम्भ में विविध प्रकार के अभिलेखनों द्वारा विजयनगर से मिले भौतिक अवशेषों के व्यापक प्रलेखन से भी एक महत्वपूर्ण परियोजना आरम्भ की गई। लगभग 20 वर्षों की अवधि में सम्पूर्ण विश्व के अनेक विद्वानों ने इस जानकारी को एकत्रित एवं संरक्षित करने का कार्य किया। 

→ इस परियोजना के अन्तर्गत सर्वेक्षण बहुत ही गहन परिश्रम से किए गए जिनमें छोटे-छोटे देवस्थानों से लेकर आवासों तथा विशाल मन्दिरों को पुनः सूक्ष्मता से विश्लेषित करके इनका प्रलेखन किया गया। इसके द्वारा महलों, मन्दिरों, बाजारों आदि के अवशेषों को पुनः प्राप्त कर इन सभी की स्थिति की पहचान की गई है। 

→ यद्यपि विजयनगर में लकड़ी से बनी संरचनाएँ अब नष्ट हो चुकी हैं, पत्थर की संरचनाएँ ही शेष हैं, फिर भी यात्रियों द्वारा छोड़े गए विवरण उस समय के जनजीवन के कुछ आयामों को पुनः निर्मित करने में सहायक होते हैं।

→ विजयनगर - अर्थ/विवरण विजय का शहर। यह एक शहर तथा एक साम्राज्य दोनों के लिए प्रयुक्त नाम था।

→ दोआब क्षेत्र - दो नदियों के मध्य का मैदानी भू-भाग।

→ गजपति - हाथियों का स्वामी। 15वीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली शासक वंश को इसी नाम से जाना जाला था। 

→ अश्वपति - घोड़ों के स्वामी। विजयनगर की लोक प्रचलित परम्पराओं में दक्कन के सुल्तानों को अश्वपति कहा जाता था। 

→ नरपति - लोगों के स्वामी। विजयनगर की लोक प्रचलित परम्पराओं में यहाँ के शासकों (रायों) को नरपति कहा जाता था।

RBSE Class 12 History Notes Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

→ कुदिरई चेट्टी - घोड़ों के स्थानीय व्यापारी।

→ गोपुरम् - मन्दिरों के प्रवेश द्वार।

→ उपनगर - बड़े नगर के बाहरी भाग में बसा हुआ एक छोटा नगर। 

→ यवन - यह संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका प्रयोग उत्तर-पश्चिम से भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले अन्य लोगों के लिए किया गया।

→ राय - विजयनगर में शासक को राय कहा जाता था। 

→ नायक - विजयनगर राज्य में सेना के प्रमुख जो किलों पर नियन्त्रण रखते थे तथा उनके पास सशस्त्र सैनिक होते थे।

→ अमर - इसका आविर्भाव संस्कृत शब्द समर से हुआ है, जिसका अर्थ है- लड़ाई या युद्ध।

→ अमर नायक - उच्च सैनिक अथवा सेनापति, जिन्हें राय द्वारा प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र दिए जाते थे। ये भू-राजस्व तथा अन्य कर वसूल करते थे।

→ इंडो-इस्लामिक - हिन्द-इस्लामी स्थापत्य कला शैली।

→ मकबरा - वह इमारत जिसमें किसी की कब्र हो।

→ मस्जिद - मुस्लिम समुदाय का पूजा स्थल।

→ मन्दिर - हिन्दू समुदाय का पूजा स्थल।

→ मंडप - देवमन्दिर के ऊपर की गोल बनावट और उसके नीचे का स्थान।

→ महानवमी डिब्बा - विजयनगर राज्य का एक आनुष्ठानिक केन्द्र।

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→ अध्याय में दी गईं महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं सम्बन्धित घटनाएँ
कालरेखा-1 महत्वपूर्ण राजनीतिक परिर्वतन 

काल तथा कालावधि

घटना/विवरण

1. लगभग 1206-1526 ई. (गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैय्यद वंश तथा लोदी वंश)

 

  • दिल्ली सल्तनत का काल
  • 1206 ई. कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना,
  • 1236 ई. प्रथम महिला सुल्तान रजिया का गद्दी पर बैठना,
  • 1296-1316 ई. अलाउद्दीन खिलजी का शासनकाल,
  • 1320 ई. ग्यासुद्दीन तुगलक द्वारा तुगलक वंश की स्थापना,
  • 1325-51 ई. मुहम्मद तुगलक का शासनकाल,
  • 1414 ई. खिज्र खाँ द्वारा सैय्यद वंश की स्थापना,
  • 1451 ई. बहलोल लोदी द्वारा लोदी वंश की स्थापना।

2. लगभग 1336-1672 ई. (संगम वंश, सालुव वंश, तुलुव वंश, अराविदु वंश)

  • विजयनगर साम्राज्य का काल
  • 1336 ई. में हरिहर तथा बुक्का द्वारा विजयनगर (संगम वंश) साम्राज्य की स्थापना,
  • 1485 ई. में वीर नरसिंह द्वारा सालुव वंश की स्थापना,
  • 1506 ई. में वीर नरसिंह द्वारा तुलुव वंश की स्थापना,
  • 1509-29 ई. कृष्णदेव राय का शासनकाल,
  • 1572 ई. श्रीरंग द्वारा अराविदु वंश की स्थापना,
  • 1642-72 ई. अन्तिम विजयनगर शासक श्रीरंग तृतीय का काल।

3. 1347 ई.

दक्षिण में बहमनी राज्य की स्थापना।

4. लगभग 1400-1500 ई.

  • 1435 ई. में-पा के गजपति राज्य की स्थापना।
  • गुजरात तथा मालवा सल्तनतों की स्थापना।
  • 1490 ई. में अहमदनगर, बीजापुर तथा बेरार सल्तनतों की स्थापना।

5. 1500-1600 ई.

  • 1510 ई. में पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय; बहमनी राज्य का पतन।
  • 1518 ई. में गोलकुण्डा राज्य की स्थापना।
  • 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी को पराजित करके मुगल साम्राज्य की स्थापना।

कालरेखा 2 
विजयनगर की खोज एवं संरक्षण की मुख्य घटनाएँ

काल तथा कालावधि

घटना/विवरण

6. 1800 ई.

 कॉलिन मैकेन्जी द्वारा विजयनगर की यात्रा।

7. 1856 ई.

 अलेक्जेंडर ग्रनिलो ने हम्पी के पुरातात्त्विक अवशेषों के प्रथम विस्तृत चित्र लिए।

8. 1876 ई.

 पुरास्थल की मन्दिर की दीवारों के अभिलेखों का जे.एफ. फ्लीट द्वारा प्रलेखन आरम्भ।

9. 1902 ई.

 जॉन मार्शल के अधीन पुरातत्व संरक्षण कार्य आरम्भ।

10. 1976 ई.

 हम्पी को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया।

11. 1986 ई.

 हम्पी को यूनेस्को द्वारा विश्व पुरातत्व स्थल घोषित किया गया।.

Prasanna
Last Updated on Jan. 10, 2024, 9:36 a.m.
Published Jan. 9, 2024