RBSE Class 12 History Notes Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

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RBSE Class 12 History Chapter 14 Notes विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

→ सन् 1947 में भारत का विभाजन दो राष्ट्रों के रूप में हुआ जिन्हें आज भारत और पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है। 

→ ब्रिटिश भारत के दो सम्प्रभु राज्यों भारत और पाकिस्तान (जिसके पश्चिमी व पूर्वी भाग थे) में बँटवारे से कई आकस्मिक परिवर्तन आए। लाखों की संख्या में लोग मारे गये, कई लोगों की जिन्दगियाँ पलक झपकते ही बदल गयीं, शहर बदले, भारत बदला, नए देश का जन्म हुआ और ऐसा जनसंहार, हिंसा और विस्थापन हुआ जिसका इतिहास में पहले से कोई उदाहरण नहीं मिलता है। 

→ 'भारत का बँटवारा एक महाध्वंस था जिसमें कई लाख लोग मारे गये एवं न जाने कितनी औरतों का बलात्कार और अपहरण हुआ, करोड़ों बेघर हो गये या फिर रातों-रात अजनबी जमीन पर शरणार्थी बनकर रह गए।

→ 1947 के भारत-पाक विभाजन के दौरान हुए दुखद घटनाक्रम से जीवित बचे लोग 1947 ई. को प्रायः कई दूसरे शब्दों से व्यक्त करते हैं, जैसे-"माशल-ला" (मार्शल लॉ), "मारामारी", "रौला" या "हुल्लड़"। 

→ भारत-पाक विभाजन के दौरान हुई हत्याओं, बलात्कार, आगजनी एवं लूटपाट की घटनाओं के कारण समकालीन प्रेक्षकों एवं विद्वानों ने इसके लिए कई बार "महाध्वंस" (होलोकॉस्ट) शब्द का उल्लेख किया है। इस शब्द के माध्यम से वे इस सामूहिक जनसंहार की भीषणता को उजागर करना चाहते थे।

→ 1947 ई. में भारतीय उपमहाद्वीप में जो कुछ हो रहा था उसकी भीषणता की स्थिति को होलोकॉस्ट' शब्द से ही समझा जा सकता है। यह घटना इतनी जघन्य थी कि 'विभाजन', 'बँटवारे' या तकसीम' जैसे शब्दों से उसके सभी पहलू सामने नहीं आते हैं। 

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→ भारत विभाजन के समय जो नस्ली सफाया हुआ वह सरकारी निकायों का नहीं बल्कि समुदायों के स्वयंभू प्रतिनिधियों का कार्य था।

→ भारत में पाकिस्तान से घृणा करने वाले तथा पाकिस्तान में भारत से घृणा करने वाले दोनों ही बँटवारे की उपज हैं। 

→ भारत विभाजन ने हिन्दू और मुसलमानों के मध्य ऐसी स्मृतियों, घृणाओं, छवियों और पहचानों को बल दिया है कि आज भी लोगों के दिलों से नफरत साफ नहीं हो पायी है। 

→ इतिहासकार इन धारणाओं में मौजूद गलतफहमियों की बार-बार आलोचना करते रहे हैं लेकिन दोनों ही देशों में घृणा के स्वर शान्त नहीं हो पा रहे हैं। 

→ कुछ विद्वानों का यह भी मानना था कि देश का विभाजन उस साम्प्रदायिक राजनीति का अन्तिम बिन्दु था जो 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में शुरू हुई थी। उनका तर्क था कि अंग्रेजी सरकार द्वारा 1909 ई. के अधिनियम में मुसलमानों के लिए बनाये गये पृथक चुनाव क्षेत्रों (जिनका 1919 ई. में विस्तार कर दिया गया) का साम्प्रदायिक राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसी साम्प्रदायिक राजनीति का चरम परिणाम बँटवारा था। 

लखनऊ समझौता-यह समझौता दिसम्बर 1916 में हुआ जो कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के आपसी ताल-मेल को दर्शाता है। इसके तहत कांग्रेस ने पृथक चुनाव क्षेत्रों को माना जिसने कांग्रेस के मध्यमार्गियों, अतिवादियों तथा मुस्लिम लीग के लिए एक संयुक्त राजनीतिक मंच तैयार किया।

आर्य समाज-स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज 19वीं सदी के अंतिम दशकों तथा प्रारंभिक 20वीं शताब्दी में उत्तर भारतीय 'हिन्दू सुधार' आन्दोलन के रूप में मुख्यतः पंजाब में सक्रिय था। आर्य समाज का उद्देश्य वैदिक ज्ञान का पुनरुत्थान कर उसको विज्ञान की आधुनिक शिक्षा से जोड़ना था। वेदों की ओर लौटो' आर्य समाज का मुख्य नारा था।

→ 1920 व 1930 के दशकों में कई घटनाएँ हुईं, जिनके कारण दोनों समुदायों में गहरा तनाव देखा गया। मुसलमानों को मस्जिद के सामने संगीत, गौ-रक्षा आन्दोलन और आर्य समाज की नव मुसलमानों को फिर से हिन्दू बनाने की शुद्धि प्रणाली पर क्रोध आया। दूसरी तरफ हिन्दू 1923 ई. के बाद तबलीग (प्रचार) व तंजीम (संगठन) के विस्तार से उत्तेजित हुए।

→ जैसे-जैसे साम्प्रदायिक कार्यकर्ताओं एवं प्रचारकों के द्वारा अपने-अपने समुदायों के लोगों को दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध भड़काया गया वैसे-वैसे ही देश के विभिन्न भागों में दंगे फैलते चले गये।

→ धार्मिक समुदायों के बीच विरोध तथा झगड़े उत्पन्न करने वाली राजनीति को साम्प्रदायिकता कहा जाता है। इस तरह की राजनीति धार्मिक पहचान को बुनियादी एवं अटल मानती है।

→ 1937 ई. में प्रान्तीय संसदों के गठन के लिए प्रथम बार चुनाव कराये गये जिनमें मताधिकार केवल 10 से 12 प्रतिशत लोगों को ही प्राप्त था।

→ इन चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 5 प्रान्तों में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया तथा 7 प्रान्तों में सरकारें बनाईं। इन चुनावों में जो क्षेत्र मुसलमानों के लिए आरक्षित थे उन क्षेत्रों में कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा परन्तु मुस्लिम लीग भी इन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। उसे इस निर्वाचन में सम्पूर्ण मुस्लिम वोट का केवल 4.4 प्रतिशत भाग ही मिल पाया। उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त में उसे कोई भी सीट प्राप्त नहीं हो सकी।

→ मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ संयुक्त रूप से संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में सरकार बनाना चाहती थी। कांग्रेस ने लीग की इस माँग को ठुकरा दिया क्योंकि उसे यहाँ पूर्ण बहुमत हासिल था। 

मुस्लिम लीग -1906 ई. में ढाका में इसे शुरू किया गया। कम समय में ही यह उत्तर प्रदेश के मुस्लिम संभ्रांत वर्ग (विशेषतः अलीगढ़) के प्रभाव में आ गई। 1940 के दशक में लीग ने भारतीय महाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों की स्वायत्तता या पुनः पाकिस्तान की माँग करना शुरू किया।

हिन्दू महासभा-1915 ई. में स्थापित हिन्दू महासभा मुख्यतः उत्तर भारत तक सीमित रही एक हिन्दू पार्टी थी। यह पार्टी हिन्दुओं के बीच जाति और संप्रदाय के अंतरों को समाप्त कर हिन्दू समाज में एकता बनाने को प्रयासरत् थी।

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→ 1937 ई. में मौलाना आजाद ने प्रश्न किया था कि कांग्रेस के सदस्यों को लीग में शामिल होने की छूट नहीं है किन्तु उन्हें हिन्दू महासभा में शामिल होने से नहीं रोका जाता है। तब दिसम्बर 1938 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने कांग्रेस के सदस्यों का हिन्दू महासभा के सदस्य नहीं होने की घोषणा की थी। 

→ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) 1930 के दशक में नागपुर से निकल कर संयुक्त प्रान्त, पंजाब तथा देश के अन्य भागों में फैला। 1940 ई. तक इसके पास एक लाख से अधिक हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के प्रति समर्पित अत्यन्त अनुशासित कार्यकर्ता थे। 

→ 23 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग ने भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान बहुल क्षेत्रों के लिए,सीमित स्वायत्तता की माँग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया, परन्तु पेश किये गये प्रस्ताव में कहीं पर भी विभाजन तथा पाकिस्तान की माँग का उल्लेख नहीं किया गया था। 

→ इसके विपरीत इस प्रस्ताव को लिखने वाले पंजाब के प्रधानमंत्री एवं यूनियनिस्ट पार्टी के नेता सिकन्दर हयात खान ने 1 मार्च, 1941 में पंजाब असेम्बली को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वह ऐसे पाकिस्तान की माँग का विरोध करते हैं, जिसमें "यहाँ मुस्लिम राज और शेष जगह हिन्दू राज होगा।

→ अनेक लोगों ने प्रसिद्ध उर्दू कवि मोहम्मद इकबाल को पाकिस्तान के गठन की माँग को आरम्भ करने वाला व्यक्ति माना है। मोहम्मद इकबाल वही थे जिन्होंने "सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" गीत लिखा था।

→ कैम्ब्रिज के एक पंजाबी मुस्लिम छात्र चौधरी रहमत अली ने 1933 व 1935 में लिखित दो पर्यों में पाकिस्तन या पाक-स्तान (पंजाब, अफगान, कश्मीर, सिंध तथा बलूचिस्तान) नाम गढ़ा। इस नयी इकाई के लिए अलग राष्ट्रीय हैसियत चाहने वाले रहमत अली की बात को 1930 के दशक में किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया।

→ 1930 ई. में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए मोहम्मद इकबाल ने एक 'उत्तर पश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य' की स्थापना पर बल दिया, परन्तु इस भाषण में कवि इकबाल ने एक नवीन देश के उदय पर नहीं बल्कि पश्चिमोत्तर भारत में मुस्लिम बहुल इलाकों की स्वायत्त इकाई की स्थापना पर बल दिया था। यह इकाई भारतीय संघ के भीतर ही स्थापित होनी थी। 

→ भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल प्रदेशों के लिए सीमित स्वायत्तता की माँग से लेकर विभाजन होने के मध्य तक बहुत ही कम समय (केवल 7 वर्ष) लगा। कोई भी व्यक्ति यह नहीं जानता था कि पाकिस्तान की स्थापना का उद्देश्य क्या होगा और भविष्य में लोगों की जिन्दगी किस तरह तय होगी।

→ 1947 ई. में अपने मूल स्थान को छोड़कर नयी जगह जाने वाले व्यक्तियों में से अधिकतर लोगों को यही लगता था कि जैसे ही शान्ति स्थापित हो जायेगी, वे अपने घर वापस लौट आयेंगे।

→ द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण अंग्रेजों को स्वतंत्रता के बारे में औपचारिक वार्ताएँ कुछ समय तक टालनी पड़ीं, परन्तु 1942 ई. के भारत छोड़ो आन्दोलन का परिणाम था कि अंग्रेजों को सम्भावित सत्ता हस्तान्तरण के बारे में भारतीयों के साथ बातचीत के लिए तैयार होना पड़ा।

→ 1945 ई. में पुनः भारतीय नेताओं व अंग्रेजी सरकार के मध्य वार्ताएँ प्रारम्भ हुईं तो अंग्रेजी सरकार इस बात पर सहमत हुई कि एक केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा बनायी जाएगी जिसमें वायसराय और सशस्त्र सेनाओं के सेनापतियों को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय ही होंगे।

→ मोहम्मद अली जिन्ना इस बात पर अड़े हुए थे कि केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा के मुस्लिम सदस्यों का चुनाव करने का अधिकार केवल मुस्लिम लीग का ही है। वे सभा में साम्प्रदायिक आधार पर वीटो की व्यवस्था भी चाहते थे। अतः अंग्रेजों द्वारा सत्ता के हस्तान्तरण की वार्ता पूर्ण न हो सकी।

→ 1946 ई. में फिर से प्रान्तीय निर्वाचन हुआ जिसमें सामान्य सीटों पर कांग्रेस को एकतरफा सफलता मिली। 91.3 प्रतिशत गैर-मुस्लिम वोट कांग्रेस को प्राप्त हुए। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भी अच्छी सफलता (कुल आरक्षित 509 सीटों में से 442 सीटें) प्राप्त हुई। अब मुस्लिम लीग भारतीय मुसलमानों की 'एकमात्र प्रवक्ता' होने का दावा कर सकती थी। 

→ मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा जिसने 3 महीनों तक भारत का दौरा किया और एक त्रिस्तरीय महासंघ की स्थापना का सुझाव दिया। 

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→ संविधान सभा का निर्वाचन करते हुए मौजूदा प्रान्तीय सभाओं को तीन वर्गों में बाँटा गया था। हिन्दू-बहुल प्रान्तों को समूह 'क' में, पश्चिमोत्तर के मुस्लिम बहुल प्रान्तों को समूह 'ख' में और पूर्वोत्तर (असम सहित) के मुस्लिम बहुल प्रान्तों को समूह 'ग' में रखा गया।

→ प्रारम्भ में सभी मुख्य पार्टियों ने इस योजना को स्वीकार कर लिया था, परन्तु कुछ समय बाद ही समझौते पर मतभेद शुरू हो गये क्योंकि कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों ने ही मानने से इंकार कर दिया।

→ कैबिनेट मिशन योजना को मुस्लिम लीग ने अपना समर्थन नहीं दिया और पाकिस्तान की मांग को पूरा करवाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को ही प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' मानने की घोषणा कर दी, उसी दिन कलकत्ता में दंगा भड़क गया और दंगे कई दिनों तक चलते रहे। इन दंगों में कई हजार व्यक्ति मारे गये।। 

→ मार्च 1947 तक उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में हिंसा फैल चुकी थी। 

→ मार्च, 1947 में कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब को मुस्लिम बहुल और हिन्दू/सिख बहुल दो भागों में बाँटने के प्रस्ताव पर मंजूरी दे दी। कांग्रेस ने बंगाल के मामले में भी यही सिद्धान्त अपनाने का सुझाव दिया। 

→ पंजाब में मार्च, 1947 से लगभग एक वर्ष तक रक्तपात चलता रहा इसका एक कारण यह भी था कि शासन की संस्थाएँ बिखर चुकी थीं। वर्ष के अन्त तक शासनतन्त्र पूर्णरूप से खत्म हो चुका था तथा सम्पूर्ण अमृतसर रक्तपात में डूब गया। 

→ भारतीय सिपाही और पुलिसवालों में भी हिन्दू, मुस्लिम या सिख जैसे साम्प्रदायिक आचरण शुरू हो गये जिससे साम्प्रदायिक तनाव और अधिक बढ़ गया। 

→ साम्प्रदायिक तनाव को खत्म करने के लिए गाँधीजी आगे आये। वे पूर्वी बंगाल के नोआखाली (वर्तमान बांग्लादेश) से बिहार के गाँवों में तथा उसके बाद कलकत्ता और दिल्ली के दंगाग्रस्त क्षेत्रों की यात्रा पर निकल पड़े। प्रत्येक स्थान पर उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय हिन्दू हो या मुस्लिम सभी को दिलासा प्रदान की। 

→ भारत व पाकिस्तान की सरकारों ने औरतों के प्रति कोई संवेदनशील रवैया नहीं अपनाया। औरतों को बहुत कुछ भुगतना पड़ा तथा उनके परिवार कई बार उजड़ गये। 

→ एक अनुमान के अनुसार 30,000 औरतों को बरामद किया गया था जिनमें से 22,000 मुस्लिम औरतों को भारत से और 8,000 हिन्दू व सिख औरतों को पाकिस्तान से निकाला गया।

→ विभाजन का सबसे क्रूरतम, खूनी व विनाशकारी रूप पंजाब में सामने आया। पश्चिमी पंजाब से लगभग सभी हिन्दुओं और सिखों . को भारत की ओर तथा लगभग सभी पंजाबी भाषी मुसलमानों को पाकिस्तान की ओर धकेल दिया गया। इतना सब कुछ मात्र 2 वर्ष में 1946 से 1948 ई. के मध्य हुआ। 

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→ बिहार, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश), मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के अनेक परिवार पचास व साठ के दशक में भी पाकिस्तान जाकर बसते गये। ऐसे ज्यादातरं उर्दू भाषा बोलने वाले, जिन्हें मुहाजिर (अप्रवासी) कहा जाता है, सिंध के करांची-हैदराबाद प्रदेश में बस गए।

→ बंगाली मुसलमानों (पूर्वी पाकिस्तानियों) ने जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धान्त को नकारते हुए खुद को पाकिस्तान से पृथक करने का निर्णय लिया जिसके परिणामस्वरूप 1971 ई. में बांग्लादेश की स्थापना हुई। 

→ हिंसा के कचरे और विभाजन की पीड़ा तले इंसानियत और सौहार्द्र का एक विशाल इतिहास दबा पड़ा है क्योंकि अनेक लोग बँटवारे के समय एक-दूसरे की सहायता भी कर रहे थे। संस्मरण, पारिवारिक इतिहास, डायरियाँ, मौखिक वृत्तान्त और स्वलिखित ब्यौरे-इन सबसे विभाजन के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों, परेशानियों तथा मुसीबतों को समझने में सहायता मिलती है।

→ विभाजन का मौखिक इतिहास ऐसे स्त्री-पुरुषों की पड़ताल करने में सफल रहा है जिनके अस्तित्व को अब तक नहीं माना गया था।

→ अभी भी अनेक इतिहासकार मौखिक इतिहास के बारे में शंकालु हैं। उनका विचार है कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती है और उनमें घटनाओं का क्रम एकदम सही नहीं होता है।

→ भारत के विभाजन और जर्मनी के महाध्वंस जैसी घटनाओं के सन्दर्भ में ऐसी गवाहियों की कोई कमी नहीं होगी जिनसे पता चलता है कि उनके मध्य अनगिनत लोगों ने कितने प्रकार की एवं कितनी भीषण कठिनाइयों एवं तनावों का सामना किया।

→ मौखिक इतिहासकारों को विभाजन के 'वास्तविक अनुभवों' को निर्मित स्मृतियों के जाल से बाहर निकालने का चुनौतीपूर्ण कार्य भी करना पड़ता है।

→ विभाजन - इस अध्याय में विभाजन का तात्पर्य भारत के विभाजन से है जो पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में हुआ। 

→ शरणार्थी - वह जो अपने निवास स्थान से बलपूर्वक हटा दिया गया हो और दूसरी जगह शरण पाना चाहता हो। 

→ सम्प्रभु राज्य - सम्पूर्ण शक्ति तथा अधिकारयुक्त राज्य। 

→ होलोकॉस्ट - बँटवारा अथवा महाध्वंस।

→ मार्शल-ला, मारामारी, रौला - देश-विभाजन में अत्यधिक हिंसक घटनाएँ हुई थीं, जो इन घटनाओं में बच गये वे इन घटनाओं को इन शाब्दिक रूपों में बताते हैं।

→ तकसीम - बँटवारा।

→ रूढ़ छवियों के विचार - हिन्दू तथा मुस्लिमों द्वारा एक-दूसरे को कट्टरपन्थी समझना। 

→ अकायद - आस्था ।

→ तबलीग - प्रचार।

→ गौ-रक्षा आन्दोलन - आर्य समाज द्वारा चलाया जाने वाला आन्दोलन।

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→ शुद्धि आन्दोलन - नव मुसलमानों को पुनः हिन्दू बनाने का आन्दोलन, जो आर्य समाज द्वारा चलाया गया। 

→ तंजीम - संगठन। 

→ संयुक्त प्रान्त - वर्तमान उत्तर प्रदेश। 

→ हिन्दू महासभा - इसकी स्थापना 1915 ई. में हुई। 

→ पाकिस्तान - पाक-स्तान (पंजाब, अफगान, कश्मीर, सिन्ध तथा बलूचिस्तान)। 

→ आर. एस. एस. - राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। 

→ समूह 'क' - हिन्दू-बहुल प्रान्त। 

→ समूह 'ख' - पश्चिमोत्तर मुस्लिम बहुल प्रान्त। 

→ समूह 'ग' - पूर्वोत्तर तथा असम सहित मुस्लिम बहुल प्रान्त। 

→ एन. डब्ल्यू. एफ. सी. - उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त। 

→ सीमान्त गाँधी - अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें फ्रण्टियर गाँधी अथवा सीमान्त गाँधी कहा जाता है।

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→ अध्याय में दी गईं महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं सम्बन्धित घटनाएँ

काल तथा कालावधि

 घटना/विवरण

1. 1930 ई.

 प्रसिद्ध उर्दू कवि मुहम्मद इकबाल ने एकीकृत ढीले ढाले भारतीय संघ के भीतर एक 'उत्तर पश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य' की जरूरत का विचार प्रस्तुत किया।

2. 1933 व 1935 ई.

 कैम्ब्रिज में पढ़ने वाले एक पंजाबी मुसलमान युवक चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान अथवा पाक स्तान नाम पेश किया।

3. 1937 - 39 ई.

ब्रिटिश भारत के 11 में से 7 प्रान्तों में काँग्रेस के मन्त्रिमण्डल सत्ता में आए।

4. 1940 ई.

 लाहौर में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए कुछ हद तक स्वायत्तता की माँग करते हुए प्रस्ताव पेश किया।

4. 1946 ई.

प्रान्तों में चुनाव सम्पन्न हुए जिनमें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में काँग्रेस को और मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग को शानदार कामयाबी प्राप्त हुई।

मार्च जून

 ब्रिटिश कैबिनेट ने अपना तीन सदस्यीय मिशन दिल्ली भेजा।

अगस्त

 मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की स्थापना के लिये प्रत्यक्ष कार्यवाही के पक्ष में निर्णय लिया।

16 अगस्त

 कलकत्ता में हिन्दू - सिखों और मुसलमानों के बीच हिंसा फूट पड़ी। कई दिन चलने वाली इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए।

6. मार्च, 1947.

 काँग्रेस हाईकमान ने पंजाब को मुस्लिम बहुल तथा हिन्दू/सिख बहुल हिस्सों में बाँटने के पक्ष में निर्णय लिया तथा बंगाल में भी इसी सिद्धान्त को अपनाने का आह्वान किया।

7. मार्च, 1947 के बाद 

 अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए।

8. 14 - 15 अगस्त, 1947

पाकिस्तान का गठन हुआ तथा भारत स्वतन्त्र हुआ है। महात्मा गाँधी ने साम्प्रदायिक सौहार्द्र स्थापित करने के लिये बंगाल का दौरा किया।

Prasanna
Last Updated on Jan. 10, 2024, 9:37 a.m.
Published Jan. 9, 2024