RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

Rajasthan Board RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र  Important Questions and Answers.

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RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न:

प्रश्न 1. 
एक खुली अर्थव्यवस्था में किस सम्बन्ध में चयन का विस्तार होता है? 
(अ) घरेलू एवं विदेशी वस्तु के सम्बन्ध में चयन 
(ब) निवेश के सम्बन्ध में चयन
(स) रोजगार के सम्बन्ध में चयन 
(द) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी 

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प्रश्न 2. 
चालू खाते में निम्न में से किस मद को शामिल किया जाता है?
(अ) वस्तुओं का आयात - निर्यात 
(ब) सेवाओं का आयात - निर्यात
(स) अंतरण अदायगी 
(द) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी 

प्रश्न 3. 
वास्तविक विनिमय दर ज्ञात करने का सूत्र है:
(अ) \(\frac{\mathrm{eP}_{\mathrm{f}}}{\mathrm{P}}\)
(ब) \(\frac{\mathrm{P}}{\mathrm{eP}_{\mathrm{f}}}\)
(स) \(\frac{\Delta P}{P_{f}}\)
(द) \(\frac{\mathrm{eP}_{\mathrm{f}}}{\Delta \mathrm{P}}\)
उत्तर:
(स) \(\frac{\Delta P}{P_{f}}\)

प्रश्न 4. 
जिस विनिमय दर का निर्धारण बाजार की मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, उसे कहा जाता है:
(अ) स्थिर विनिमय दर 
(ब) तिरती विनिमय दर
(स) प्रबंधित तिरती दर 
(द) सरकारी दर 
उत्तर:
(ब) तिरती विनिमय दर

प्रश्न 5. 
विनिमय दर को प्रभावित करने वाला तत्त्व है:
(अ) सट्टेबाजी 
(ब) ब्याज की दरें 
(स) आय
(द) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी 

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प्रश्न 6. 
खुली अर्थव्यवस्था में गुणक ज्ञात करने का सही सूत्र है:
(अ)  \(\frac{1}{1-c}\)
(ब)  \(\frac{1}{1-c+m}\)
(स) \(\frac{1}{1-c-m}\)
(द)  \(\frac{1}{1+m}\)
उत्तर:
(द)   \(\frac{1}{1+m}\)

प्रश्न 7. 
भुगतान सन्तुलन के वित्तीय लेन-देनों से संबंधित खाता कहलाता है:
(अ) चालू खाता 
(ब) पूँजी खाता
(स) ऋण खाता 
(द) भुगतान खाता 
उत्तर:
(ब) पूँजी खाता

प्रश्न 8. 
भुगतान सन्तुलन के वस्तुओं एवं सेवाओं के आयातनिर्यात से सम्बन्धित खाते को कहा जाता है:
(अ) पूँजी खाता 
(ब) व्यापार खाता 
(स) ऋण खाता 
(द) भुगतान सन्तुलन
उत्तर:
(ब) व्यापार खाता 

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न: 

प्रश्न 1. 
बंद अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वह अर्थव्यवस्था जिसका अन्य किसी देश से कोई व्यापार या परिसम्पत्तियों का लेन - देन नहीं होता है, बंद अर्थव्यवस्था होती है।

प्रश्न 2. 
निवेश का तात्पर्य समझाइए।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में किसी समयावधि में पूँजीगत पदार्थों में वृद्धि को निवेश कहा जाता है।

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प्रश्न 3. 
व्यापार आधिक्य क्या है?
उत्तर:
विदेशी व्यापार में जब निर्यातों का मूल्य आयातों से अधिक होता है।

प्रश्न 4. 
अदायगी संतुलन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी देश के अन्य देशों के साथ लेन - देन का लेखा अथवा विवरण।

प्रश्न 5.
एक अमेरिकी डॉलर की कीमत भारतीय रुपये में 50 से गिरकर 48 हो जाती है, तो इसे भारतीय रुपये का  कहा जायेगा। (अवमूल्यन / पुनर्मूल्यन)
उत्तर:
पुनर्मूल्यन। 

प्रश्न 6. 
विदेशी विनिमय आपूर्ति के दो स्रोत बताइये।
उत्तर:
विदेशी विनिमय आपूर्ति:

  1. विदेशों से अनुदान प्राप्ति। 
  2. विदेशों से ऋणों की प्राप्ति।

प्रश्न 7. 
विदेशी विनिमय की मांग के दो स्रोत बताइये।
उत्तर:
विदेशी विनिमय की मांग:

  1. विदेशों से वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय सौदों हेतु भुगतान। 

प्रश्न 8. 
व्यापार संतुलन (शेष) क्या है?
अथवा 
व्यापार शेष से आप क्या समझते हैं?
अथवा 
वस्तुओं के निर्यातों और आयातों के मूल्य के बीच अन्तर को क्या कहते हैं?
उत्तर:
वस्तुओं के निर्यातों एवं आयातों के मूल्य के बीच का अन्तर व्यापार शेष कहलाता है।

प्रश्न 9. 
कौन - से लेन - देन व्यापार शेष को निर्धारित करते हैं?
अथवा 
व्यापार शेष खाते में शामिल मदों के नाम बताइए। 
उत्तर:
व्यापार शेष खाते में शामिल मदों:

  1. वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात। 
  2. वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात। 

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प्रश्न 10. 
व्यापार शेष में आधिक्य कब होगा? 
उत्तर:
जब निर्यातों का मूल्य आयातों से अधिक होता है।

प्रश्न 11. 
व्यापार शेष का घाटा क्या प्रकट करता
उत्तर:
व्यापार शेष का घाटा निर्यातों पर आयातों की अधिकता को प्रकट करता है।

प्रश्न 12. 
जब दो देशों के मध्य वस्तुओं तथा सेवाओं का क्रय - विक्रय किया जाता है तो उसे क्या कहा जाता
उत्तर:
विदेशी व्यापार।

प्रश्न 13. 
जब हम किसी अन्य देश से वस्तुओं को क्रय करते हैं तो उसे क्या कहा जाता है?
उत्तर:
आयात।

प्रश्न 14. 
जब हम किसी अन्य देश को वस्तुओं एवं सेवाओं का विक्रय करते हैं तो उसे क्या कहा जाता
उत्तर:
निर्यात।

प्रश्न 15. 
किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच वस्तुओं, सेवाओं और परिसम्पत्तियों के लेन-देन के विवरण को किसमें दर्ज किया जाता है?
उत्तर:
अदायगी सन्तुलन अथवा भुगतान सन्तुलन। 

प्रश्न 16. 
चालू खाते में दर्शाई जाने वाली किन्हीं दो मदों के नाम बताइए।
उत्तर:
चालू खाते में दर्शाई जाने वाली किन्हीं दो मदों:

  1. वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात - निर्यात 
  2. अन्तरण अदायगी।

प्रश्न 17. 
सेवाओं का व्यापार किस प्रकार का व्यापार कहलाता है?
उत्तर:
अदृश्य व्यापार।

प्रश्न 18. 
वस्तुओं का व्यापार किस प्रकार का व्यापार कहलाता है?
उत्तर:
दृश्य व्यापार।

प्रश्न 19. 
विदेशों से ऐसी प्राप्तियाँ जो किसी देश के निवासियों को नि:शुल्क प्राप्त होती हैं, क्या कहलाती
उत्तर:
अंतरण अदायगी।

प्रश्न 20. 
वस्तुओं के निर्यात और आयात के सन्तुलन को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
व्यापार सन्तुलन।

प्रश्न 21. 
उस विनिमय दर को क्या कहते हैं जो बाजार की माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है?
उत्तर:
नम्य अथवा तिरती विनिमय दर।

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प्रश्न 22. 
विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कोई दो तत्त्व बताइए।
उत्तर:
दर को प्रभावित:

  1. सट्टेबाजी 
  2. ब्याज की दरें।

प्रश्न 23. 
किन्हीं दो विदेशी व्यापार अवरोधकों के नाम बताइए।
उत्तर:
दो विदेशी व्यापार अवरोधकों के नाम:

  1. टैरिफ (प्रशुल्क) 
  2. कोटा।

प्रश्न 24. 
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का आयोजन किस वर्ष किया गया?
उत्तर:
वर्ष 1994 में।

प्रश्न 25. 
इक्वेडोर ने डॉलरीकरण की नयी व्यवस्था किस वर्ष अपनायी?
उत्तर:
वर्ष 2000 में। 

प्रश्न 26. 
विनिमय दर का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वह दर जिसके आधार पर एक देश की - मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में बदला जाता है।

प्रश्न 27. 
विदेशी विनिमय बाजार के तीव्र विकास के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि 
  2. विदेशी पूँजी निवेश को बढ़ावा।

प्रश्न 28. 
स्थिर विनिमय दर प्रणाली किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह प्रणाली जिसमें विनिमय दर का निर्धारण केन्द्रीय बैंक अथवा केन्द्रीय सत्ता द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 29. 
नम्य अथवा तिरती विनिमय दर प्रणाली किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह प्रणाली जिसमें विनिमय दर का निर्धारण माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है।

प्रश्न 30. 
मुद्रा की पूर्ति एवं विनिमय दर में कैसा सम्बन्ध पाया जाता है?
उत्तर:
मुद्रा की पूर्ति एवं विनिमय दर में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 31. 
विदेशी विनिमय बाजार कौनसा होता है?
उत्तर:
यह वह बाजार है जिसमें विदेशी मुद्राओं का क्रय-विक्रय किया जाता है।

प्रश्न 32. 
अवमूल्यन किसे कहते हैं?
उत्तर:
सरकार द्वारा अपनी मुद्रा के विनिमय मूल्य को जान - बूझकर कम कर देना अवमूल्यन कहलाता है।

प्रश्न 33. 
अर्थव्यवस्था को खोलने से कितने तरीकों से चयन बढ़ता है?
उत्तर:
तीन तरीकों से:

  1. वस्तुओं का चयन 
  2. परिसम्पत्तियों का चयन 
  3. उत्पादन एवं रोजगार स्थान का चयन।

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प्रश्न 34. 
चालू और पूँजी खाते के अतिरिक्त भुगतान सन्तुलन का तीसरा घटक कौनसा है?
उत्तर:
चालू और पूँजी के अतिरिक्त भुगतान शेष का तीसरा घटक भूल - चूक (अर्थात् त्रुटि और लोप) है।

प्रश्न 35. 
विदेशी मुद्रा बाजार का मुख्य उद्देश्य क्या
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश को प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 36. 
विदेशी विनिमय दर की किन्हीं दो प्रणालियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  नम्य विनिमय दर प्रणाली 
  2. स्थिर विनिमय दर प्रणाली।

प्रश्न 37. 
स्थिर विनिमय दर प्रणाली का कोई एक लाभ बताइए।
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर प्रणाली से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 38. 
नम्य विनिमय दर प्रणाली का कोई एक लाभ बताइए।
उत्तर:
नम्य विनिमय दर प्रणाली भुगतान शेष में सन्तुलन स्थापित करने में सहायक होती है।

प्रश्न 39. 
विदेशी विनिमय सन्तुलन दर किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस दर पर विदेशी विनिमय की माँग और पूर्ति बराबर होती है।

प्रश्न 40. 
विदेशी विनिमय के माँग वक्र का ढाल कैसा होता है?
उत्तर:
विदेशी विनिमय का माँग वक्र नीचे की और ढाल वाला वक्र होता है। 

प्रश्न 41. 
विदेशी विनिमय की पूर्ति वक्र का ढाल कैसा होता है?
उत्तर:
विदेशी विनिमय की पूर्ति वक्र का ढाल ऊपर की तरफ धनात्मक ढाल वाला होता है।

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प्रश्न 42. 
यदि विदेशी विनिमय बाजार में 1 डॉलर हेतु 50 रुपये का भुगतान करना पड़े तो विनिमय दर क्या - होगी?
उत्तर:
1 डॉलर = 50 रुपये।

प्रश्न 43. 
अदायगी सन्तुलन खाते के कोई दो प्रमुख घटकों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. चालू खाता 
  2. पूँजी खाता।

प्रश्न 44. 
भुगतान शेष लेखा में दृश्य मदों का शेष क्या दर्शाता है?
उत्तर:
भुगतान शेष लेखा में दृश्य मदों का शेष व्यापार शेष को दर्शाता है।

प्रश्न 45. 
यदि एक देश के आयात 280 करोड़ एवं निर्यात 380 करोड़ के हों तो आधिक्य क्या होगा? 
उत्तर:
व्यापार शेष का आधिक्य = निर्यात - आयात 
= 380 - 280 = 100 करोड़ रुपये।

प्रश्न 46. 
पूँजी खाते की किन्हीं दो मदों का नाम बताइए।
उत्तर:

  1. विदेशी निवेश 
  2. विदेशी ऋण। 

लघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1. 
विदेशी व्यापार आधिक्य एवं व्यापार घाटे में अन्तर समझाइए।
उत्तर:
जब देश के निर्यात, आयातों से अधिक होते हैं तो व्यापार आधिक्य एवं निर्यात, आयातों से कम होते हैं तो व्यापार घाटे की स्थिति होगी।

प्रश्न 2. 
विदेशी विनिमय बाजार का अर्थ समझाइए। इस बाजार के कोई दो प्रतिभागियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विदेशी विनिमय बाजार वह बाजार है जहाँ राष्ट्रीय करेंसियों का एक - दूसरे के लिए व्यापार होता है। इसके मुख्य प्रतिभागी व्यावसायिक बैंक, विदेशी विनिमय दलाल तथा मुद्रा प्राधिकारी होते हैं।

प्रश्न 3. 
विनिमय दर की परिभाषा दें।
अथवा 
विदेशी विनिमय दर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विनिमय दर अथवा विदेशी विनिमय दर से हमारा अभिप्राय उस दर से है, जिसके आधार पर एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा में परिवर्तित की जाती है।

प्रश्न 4. 
स्थिर विनिमय दर प्रणाली से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर प्रणाली विनिमय दर की वह प्रणाली है जिसमें विनिमय दर देश की केन्द्रीय सत्ता अथवा सरकार अथवा केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती

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प्रश्न 5. 
लोचशील विनिमय दर किसे कहते हैं?
उत्तर:
लोचशील विनिमय दर वह दर होती है जो विदेशी विनिमय बाजार में मुद्रा की माँग एवं पूर्ति के अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्धारित होती है। 

प्रश्न 6. 
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है?
अथवा 
भुगतान संतुलन खाते से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भुगतान संतुलन में किसी देश तथा शेष विश्व के बीच वस्तुओं, सेवाओं और परिसम्पत्तियों के लेन - देन का विवरण दर्ज होता है।

प्रश्न 7. 
व्यापार खाते का शेष अनुकूल कब होगा?
उत्तर:
किसी देश के व्यापार खाते का शेष अनुकूल तब होगा जब उसके निर्यातों का मूल्य, आयातों के मूल्य से अधिक होगा।

प्रश्न 8. 
व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
व्यापार संतुलन में केवल आयातों एवं निर्यातों को शामिल किया जाता है, जबकि भुगतान संतुलन में सभी आर्थिक लेन - देनों को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 9. 
बन्द अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था को तब बन्द अर्थव्यवस्था कहते हैं जब उसका अन्य किसी देश से कोई व्यापार अथवा परिसम्पत्तियों का लेन-देन नहीं होता है।

प्रश्न 10. 
एक देश का व्यापार शेष (+) 100 करोड़ रुपये तथा वस्तुओं का निर्यात मूल्य 175 करोड़ रुपये है। वस्तुओं का आयात मूल्य ज्ञात करें। 
उत्तर:
व्यापार शेष = निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य
100 = 175 - आयातों का मूल्य 
आयातों का मूल्य = 175 - 100 = 75 करोड़ रुपये।

प्रश्न 11. 
एक देश का व्यापार शेष (+) 75 करोड़ रुपये है। वस्तुओं का आयात मूल्य 100 करोड़ रुपये है। वस्तुओं का निर्यात मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
व्यापार शेष = निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य
75 = निर्यातों का मूल्य - 100 
निर्यातों का मूल्य = 100 + 75 = 175 करोड़ रुपये

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प्रश्न 12. 
एक देश का व्यापार शेष (-) 50 करोड़ है। वस्तुओं का आयात मूल्य 200 करोड़ रु. है। वस्तुओं का निर्यात मूल्य क्या होगा? 
उत्तर:
व्यापार शेष = निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य 
(-) 50 = निर्यातों का मूल्य - 200 
निर्यातों का मूल्य = 200 - 50 = 150 करोड़ रुपये

प्रश्न 13. 
अदृश्य लेखा शेष की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
अदृश्य लेखा शेष का तात्पर्य किसी देश में सेवाओं के निर्यात एवं सेवाओं के आयातों के मूल्यों के अन्तर से है।

प्रश्न 14. 
आयात - निर्यात का अर्थ बताइए।
उत्तर:
किसी देश द्वारा अन्य देश को वस्तुएँ एवं सेवाएं बेचना निर्यात एवं अन्य देशों से वस्तुएँ एवं सेवाएँ खरीदना आयात कहलाता है।

प्रश्न 15. 
खुली अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं?
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें अन्य राष्ट्रों के साथ वस्तुओं, सेवाओं तथा वित्तीय परिसम्पत्तियों का व्यापार किया जाता है। 

प्रश्न 16.
विदेशी मुद्रा बाजार में कौन - कौन भाग लेते हैं?
उत्तर:
विदेशी मुद्रा बाजार में व्यापारिक बैंक, विदेशी विनिमय, दलाल तथा अन्य अधिकृत व्यापारी और मौद्रिक अधिकारी भाग लेते हैं। 

प्रश्न 17. 
स्थिर विनिमय दर प्रणाली के कोई दो महत्त्व बताइये।
उत्तर:

  1. स्थिर विनिमय दरों में विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टे की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है।
  2. इनमें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन मिलता

प्रश्न 18. 
एक अर्थव्यवस्था को खोलने से प्राप्त होने वाला कोई एक लाभ बताइए।
उत्तर:
इससे निवेशकों को घरेलू एवं विदेशी परिसम्पत्तियों के बीच चयन का अवसर प्राप्त होता है, जिससे वित्तीय बाजार सहलग्नता का निर्माण होता है।

प्रश्न 19. 
खुली अर्थव्यवस्था एवं बन्द अर्थव्यवस्था में एक अन्तर बताइए।
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था में शेष विश्व के साथ आर्थिक सम्बन्ध पाए जाते हैं, जबकि बन्द अर्थव्यवस्था में दूसरे देशों के साथ कोई आर्थिक सम्बन्ध नहीं पाए जाते

प्रश्न 20. 
भुगतान सन्तुलन की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1.  इसमें सभी दृश्य, अदृश्य एवं पूँजी अन्तरण की मदें शामिल की जाती हैं।।
  2. इसमें दोहरी लेखा पद्धति के आधार पर भुगतान व प्राप्तियों को लेखाबद्ध किया जाता है।

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प्रश्न 21. 
स्थिर विनिमय दरों के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर:

  1. स्थिर विनिमय दर से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होती है।
  2. स्थिर विनिमय दर से अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 22. 
परिवर्तनशील विनिमय दरों के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर:

  1. इन दरों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विनिमय दरों में साम्य बनाना अधिक आसान है।
  2. इन दरों से सट्टे की प्रवृत्तियों पर रोक लगती

प्रश्न 23. 
भुगतान सन्तुलन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अदायगी सन्तुलन अथवा भुगतान सन्तुलन में किसी एक देश के निवासियों तथा शेष विश्व के बीच वस्तुओं, सेवाओं तथा परिसम्पत्तियों के लेन-देन का विवरण दर्ज होता है।

प्रश्न 24. 
खली अर्थव्यवस्था से आपका क्या अभिप्राय है? ऐसे कोई दो प्रकार बताइए जिनमें खुली अर्थव्यवस्था आपके चयन का विस्तार करती है।
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें अन्य राष्ट्रों के साथ वस्तुओं, सेवाओं तथा वित्तीय परिसम्पत्तियों का व्यापार होता है। खुली अर्थव्यवस्था से

  1. उपभोक्ता और फर्मों को घरेलू एवं विदेशी वस्तुओं के बीच चयन करने का अवसर मिलता है।
  2. निवेशकों को घरेलू और विदेशी परिसम्पत्तियों के बीच चयन करने का अवसर मिलता है।

प्रश्न 25. 
जब M = 60 + 0.06 Y हो तो आयात की सीमान्त प्रवृत्ति क्या होगी एवं अगर Y = 100 करोड़ हो तो M ज्ञात कीजिए। 
उत्तर:
आयात की सीमान्त प्रवृत्ति
M = 60 + 0.06Y
AM = 0.06 यदि Y = 100 हो तो M
M = 60+ 0.06Y
= 60+ 0.06 x 100 = 60 +6
= 66 करोड़ रुपये 

प्रश्न 26. 
विदेशी मुद्रा का वायदा बाजार क्या है? विदेशी मुद्रा के वायदा बाजार की कोई दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
विदेशी मुद्रा का वायदा बाजार वह बाजार है जिसमें मुद्रा का लेन-देन भविष्य की किसी तिथि पर होता है।
विशेषताएँ:

  1. विदेशी मुद्रा के वायदा बाजार केवल भविष्य से सम्बन्धित होता है।
  2. यह भविष्य की विनिमय दर का निर्धारण करता है।

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प्रश्न 27. 
सन्तुलन विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?
अथवा 
स्वतंत्र बाजार में विदेशी विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
सन्तुलन विनिमय दर का निर्धारण वहाँ होता न है जहाँ विदेशी विनिमय की मांग, विदेशी विनिमय की च पूर्ति के बराबर हो। इसे सामने दिये गये रेखाचित्र से स्पष्ट ग किया जा सकता है।
RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 26
यहाँ संतुलन बिन्दु E के अनुसार Oe विनिमय दर का निर्धारण होता है।

प्रश्न 28. 
विनिमय दर के प्रकार बताइये। स्थिर एवं लोचशील विनिमय दर कैसे भिन्न हैं?
उत्तर:
विनिमय दर के प्रकार:

  1. नम्य अथवा लोचशील विनिमय दर 
  2. स्थिर विनिमय दर 
  3. प्रबंधित तिरती दर।

लोचशील विनिमय दर का निर्धारण माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, जबकि स्थिर विनिमय दर का निर्धारण केन्द्रीय सत्ता अथवा सरकार द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 29. 
विदेशी मुद्रा दर का क्या अर्थ है? तीन कारण दीजिये कि क्या लोग विदेशी मुद्रा प्राप्त करना चाहते हैं?
उत्तर:
विदेशी मुद्रा दर वह दर है जिसके आधार पर एक देश की मुद्रा को अन्य देश की मुद्रा में परिवर्तित किया जाता है। 
विदेशी मुद्रा की माँग के कारण:

  1. शेष विश्व से किए गए आयातों के भुगतान हेतु।
  2. शेष विश्व को उपहार, अनुदान एवं निवेश हेतु।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय ऋणों के भुगतान हेतु।

प्रश्न 30. 
विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति के चार - चार स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विदेशी मुद्रा की माँग के स्त्रोत:

  1. वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात हेतु 
  2. विदेशों में विनियोग हेतु 
  3. विदेशों को अनुदान देने हेतु 
  4. विदेशी ऋणों के भुगतान हेतु। 

विदेशी मुदा की पूर्ति के स्रोत:

  1. विदेशी विनियोगों से प्राप्त राशि 
  2. निर्यातों से प्राप्त राशि 
  3. विदेशों द्वारा ऋण भुगतान से प्राप्त राशि 
  4. विदेशों से प्राप्त साधन आय।

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प्रश्न 31. 
विदेशी विनिमय दर में वृद्धि होने से इसकी पूर्ति में वृद्धि क्यों होती है?
उत्तर:
विदेशी विनिमय दर में वृद्धि होने के फलस्वरूप विदेशी करेन्सी की अन्तर्राष्ट्रीय कीमत में वृद्धि होती है जिसके कारण अधिक कीमत पर मुद्रा बाजार में विदेशी विनिमय की पूर्ति में भी वृद्धि होती है।

प्रश्न 32. 
विदेशी विनिमय दर में कमी होने पर इसकी माँग में वृद्धि क्यों होती है?
उत्तर:
जब विदेशी विनिमय दर में गिरावट आती है तो विदेशी मुद्रा की कीमत कम हो जाती है अर्थात् वह पहले से सस्ती हो जाती है। अतः कम कीमत पर विदेशी विनिमय की मांग में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 33. 
भुगतान सन्तुलन खाते की दृश्य और अदृश्य मदों का क्या अर्थ है? अदृश्य मदों के दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
भुगतान संतुलन खाते में वस्तुओं के आयातनिर्यात को दृश्य मदें कहते हैं, जबकि इस खाते में सेवाओं के आयात-निर्यात को अदृश्य मद कहते हैं।

अदृश्य मदों के दो उदाहरण:

  1. बैंकिंग सेवाओं का आयात - निर्यात। 
  2. विशेषज्ञों की सेवाओं का आयात - निर्यात।

प्रश्न 34. 
व्यापार शेष एवं चालू लेखा शेष के बीच भेद कीजिये।
उत्तर:
व्यापार शेष में केवल वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात को शामिल किया जाता है, जबकि चालू लेखा शेष में वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात - निर्यात के साथ - साथ अन्तरण अदायगियों का विवरण भी दर्ज किया जाता है।

प्रश्न 35. 
भुगतान संतुलन खाते के चालू खाते और पूँजी खाते की चार-चार मदें बताइये।
उत्तर:
चालू खाते की मदें:

  1. वस्तुओं का आयात - निर्यात 
  2. सेवाओं का आयात - निर्यात 
  3. गैर कारक आय 
  4. निजी अन्तरण। 

पूँजी खाते की मदें:

  1.  विदेशी सहायता 
  2. विदेशी निवेश 
  3. विदेशी ऋण 
  4. पूँजीगत लेन - देन। 

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प्रश्न 36. 
स्थिर विनिमय दर के मुख्य गुण बताइये। 
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर के गुण:

  1. स्थिर विनिमय दरों में निश्चितता का गुण पाया जाता है।
  2. स्थिर विनिमय दर का निर्धारण सरल है।
  3. स्थिर विनिमय दर में लोचशीलता का गुण पाया जाता है।
  4. स्थिर विनिमय दरों पर बाह्य कारकों का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 37. 
लचीली विनिमय दर के मुख्य गुण समझाइये।
अथवा 
नम्य विनिमय दर के कोई चार गुण बताइए।
उत्तर:
नम्य अथवा लचीली विनिमय दर के गुण:

  1. लचीली विनिमय दर. बाजार माँग एवं पूर्ति शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है।
  2. लचीली विनिमय दर प्रणाली स्व-संचालित होती है।
  3. लचीली विनिमय दर प्रणाली में लोचशीलता का गुण पाया जाता है।
  4. इससे साधनों के अनुकूलतम आवंटन को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 38. 
विदेशी विनिमय दर एवं विदेशी विनिमय की माँग में सम्बन्ध बताइये।
उत्तर:
विदेशी विनिमय दर एवं विदेशी विनिमय की माँग में विपरीत सम्बन्ध पाया जाता है। विदेशी विनिमय दर के कम होने पर विदेशी विनिमय की अधिक माँग तथा विनिमय दर के अधिक होने पर विदेशी विनिमय की माँग कम होगी।

प्रश्न 39. 
विदेशी विनिमय दर और विदेशी विनिमय पूर्ति के बीच सम्बन्ध समझाइये।
उत्तर:
विदेशी विनिमय दर तथा विदेशी विनिमय पूर्ति में सकारात्मक सम्बन्ध पाया जाता है। विदेशी विनिमय दर अधिक होने पर विदेशी विनिमय की पूर्ति भी अधिक होगी तथा विदेशी विनिमय दर कम होने पर विदेशी विनिमय की पूर्ति भी कम होगी।

प्रश्न 40. 
अदायगी सन्तुलन एवं व्यापार सन्तुलन में अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
अथवा 
व्यापार सन्तुलन एवं भुगतान सन्तुलन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
अथवा 
व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. भुगतान शेष सन्तुलन एक व्यापक धारणा है, जबकि व्यापार शेष एक संकुचित धारणा है।
  2. व्यापार शेष, भुगतान शेष का एक भाग होता है, जबकि भुगतान शेष व्यापार शेष का भाग नहीं होता है।
  3. व्यापार शेष सन्तुलित अथवा असन्तुलित दोनों हो सकता है, जबकि भुगतान शेष सदैव सन्तुलित होता है।
  4. व्यापार शेष के घाटे को भुगतान शेष द्वारा पूरा किया जा सकता है परन्तु भुगतान शेष के घाटे को अन्य उपायों द्वारा पूरा किया जाता है।

प्रश्न 41. 
व्यापार शेष में 5000 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया गया है और आयातों का मूल्य 9000 करोड़ रुपये का है। निर्यातों का क्या मूल्य है?
उत्तर: 
व्यापार शेष = निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य 
- 5000 = निर्यातों का मूल्य - 9000 
निर्यातों का मूल्य = 9000 - 5000
= 4000 करोड़ रुपये.

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प्रश्न 42. 
एक अर्थव्यवस्था को खोलने से किस प्रकार हमारे चयन में वृद्धि होती है?
उत्तर:

  1. उपभोक्ताओं और फर्मों को घरेलू एवं विदेशी वस्तुओं के बीच चयन करने का अवसर मिलता
  2. निवेशकों को घरेलू और विदेशी परिसम्पत्तियों के बीच चयन करने का अवसर मिलता है।
  3. फर्मों को उत्पादन स्थान एवं श्रमिकों को रोजगार स्थान के चयन करने का अवसर मिलता है।

प्रश्न 43. 
विदेशी विनिमय बाजार की क्या आवश्यकता होती है?
उत्तर:
जब हम किसी वस्तु अथवा सेवा का आयात अथवा निर्यात करते हैं तब हमें भुगतान करने तथा भुगतान प्राप्त करने हेतु दूसरे देश की तथा अपने देश की करेन्सी की आवश्यकता पड़ती है। अत: विभिन्न देशों की करेन्सियों के आपसी विनिमय हेतु विदेशी विनिमय बाजार की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 44.
चालू खाता तथा पूँजी खाते में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चालू खाता भुगतान सन्तुलन का वह खाता है जिसमें वस्तुओं के आयात - निर्यात, सेवाओं और अन्तरण अदायगियों का विवरण दर्ज होता है जबकि पूँजी खाते में परिसम्पत्तियों जैसे - मुद्रा, स्टॉक, बंध पत्र आदि के सभी प्रकार के अन्तर्राष्ट्रीय क्रय - विक्रय का विवरण होता है।

प्रश्न 45. 
व्यापार खाते में घाटे अथवा आधिक्य की स्थिति कब होती है?
उत्तर:
व्यापार खाते में जब आयातों का मूल्य निर्यातों. के मूल्य से अधिक होता है तो व्यापार खाते में घाटा होता है तथा जब निर्यातों का मूल्य, आयातों के मूल्य से अधिक होता है तो व्यापार शेष में आधिक्य होता है।

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प्रश्न 46. 
अदायगी सन्तुलन में त्रुटि तथा लोप किस बात को दर्शाता है? 
उत्तर:
चालू एवं पूँजी खाते के अतिरिक्त त्रुटि तथा लोप अदायगी सन्तुलन का तीसरा महत्त्वपूर्ण अवयव है। यह हमारी अन्तर्राष्ट्रीय संव्यवहार को शुद्धतापूर्वक दर्ज नहीं करने की अयोग्यता को प्रतिबिम्बित करती है।

प्रश्न 47. 
वास्तविक विनिमय दर किसे कहते हैं?
उत्तर:
देशी कीमत स्तर और विदेशी कीमत स्तर के बीच अनुपात को वास्तविक विनिमय दर कहते हैं। 
वास्तविक विनिमय दर =  \(\frac{\mathrm{eP}_{\mathrm{f}}}{\mathrm{P}}\)
यहाँ P = देश का कीमत स्तर, Pf= विदेशी कीमत स्तर तथा e = विदेशी मुद्रा की कीमत अपने देश की मुद्रा के रूप में है।

प्रश्न 48. 
प्रबंधित विनिमय दर प्रणाली किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह नम्य विनिमय दर तथा स्थिर विनिमय दर का मिश्रण होती है। इस प्रणाली में केन्द्रीय बैंक विनिमय दर को उदार बनाने के लिए जब कभी ऐसे कार्य को समुचित समझता है, तब विदेशी विनिमय का क्रय - विक्रय करके विनिमय दर में हस्तक्षेप करता है।

प्रश्न 49. 
खुली अर्थव्यवस्था में गुणक की गणना किस सूत्र द्वारा की जाती है?
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था में गुणक की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जा सकती है:
\(=\frac{\Delta \mathbf{Y}}{\Delta \overline{\mathrm{A}}}=\frac{1}{1-\mathrm{c}+\mathrm{m}}\)
यहाँ c = उपभोग की सीमान्त प्रवृत्ति तथा 
m = आयात की सीमान्त प्रवृत्ति है।

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प्रश्न 50. 
यदि c = 0.8 तथा m = 0.4 हो तो खुली अर्थव्यवस्था में गुणक का मूल्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
गुणक = \(\frac{1}{1-c+m}\)
\(\begin{aligned} &=\frac{1}{1-0.8+0.4} \\ &=\frac{1}{0.2+0.4} \\ &=\frac{1}{0.6}=1.67 \end{aligned}\)

प्रश्न 51. 
खुली अर्थव्यवस्था में साम्य आय की गणना किस प्रकार की जाती है? सूत्र लिखिए। 
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था में साम्य आय की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जाती है:
\(\mathbf{Y}=\overline{\mathrm{C}}+\mathrm{c}(\mathrm{Y}-\mathrm{T})+\overline{\mathrm{I}}+\overline{\mathrm{G}}+\overline{\mathrm{X}}-\overline{\mathrm{M}}-\mathrm{mY}\)
यहाँ C = स्थिर उपभोग, 
c = उपभोग की सीमान्त प्रवृत्ति, 
T = कर, 
I = निवेश, 
G = सरकारी क्रय,
x = निर्यात, 
M = आयात तथा
m = आयातों की सीमान्त प्रवृत्ति है।

प्रश्न 52. 
यदि c = 0.8 तथा m = 0.3 तो बन्द अर्थव्यवस्था में गुणक के मूल्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
बन्द अर्थव्यवस्था में गुणक का मूल्य
\(\begin{aligned} &=\frac{1}{1-c} \\ &=\frac{1}{1-0.8} \\ &=\frac{1}{0.2} \end{aligned}\)

प्रश्न 53. 
यदि किसी अर्थव्यवस्था में सन्तुलित आय 1000 करोड़ रुपये, निर्यात = 180 करोड़ रुपये, आयात (M) =80 + 0.2 Y है तो निवल निर्यात सन्तुलन ज्ञात कीजिए। 
उत्तर:
निवल निर्यात सन्तुलन = X - M
x = 180 करोड़ रुपये 
M = 80+ 0.2 x 1000
= 80 + 200 = 280 करोड़ रुपये 
अत: निवल निर्यात सन्तुलन
= 180 - 280
= -100 करोड़ रुपये.

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प्रश्न 54. 
नम्य विनिमय दर प्रणाली के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:

  1. नम्य विनिमय दर प्रणाली भुगतान शेष में सन्तुलन स्थापित करने में सहायक होती है। 
  2. नम्य विनिमय दर प्रणाली में केन्द्रीय बैंकों को स्वर्ण तथा बहुमूल्य धातुओं का कोष रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

प्रश्न 55. 
स्थिर विनिमय दर से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब किसी देश की मुद्रा की अन्य देशों की मुद्राओं से विनिमय दरें उस देश के मौद्रिक प्राधिकरण अर्थात् केन्द्रीय बैंक अथवा केन्द्रीय सत्ता अथवा सरकार द्वारा निश्चित की जाती हैं तो उसे स्थिर विदेशी विनिमय दर कहते हैं।

प्रश्न 56. 
अवमूल्यन की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर:
केन्द्रीय बैंक देश की मुद्रा का अवमूल्यन देश के निर्यातों को बढ़ाने तथा आयातों को कम करने के लिए करता है। ऐसा करने से विदेशी विनिमय का अन्तर्वाह बढ़ सकता है तथा बहिर्वाह कम हो सकता है, इससे भुगतान सन्तुलन में मदद मिलती है।

प्रश्न 57. 
विदेशी विनिमय के माँग वक्र का नीचे की ओर ढाल होना क्या दर्शाता है?
उत्तर:
विदेशी विनिमय माँग वक्र का नीचे की ओर ढाल होना यह दर्शाता है कि विनिमय दर के अधिक होने पर विदेशी मुद्रा की माँग कम होती है तथा विदेशी विनिमय दर के कम होने पर विदेशी मुद्रा की माँग अधिक होगी।

प्रश्न 58. 
भुगतान शेष की प्रतिकलता क्या है? इसे कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर:
भुगतान शेष की प्रतिकूलता उस स्थिति को दर्शाती है जब देश को भुगतान सन्तुलन में घाटे का सामना करना पड़ता है तथा इस प्रतिकूलता को समाप्त करने के लिए अपनी सम्पत्ति का विक्रय करना  पड़ता है अथवा विदेशों से ऋण लेना पड़ता है।

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प्रश्न 59. 
एक देश का व्यापार शेष (+) 125 करोड़ रुपये है। इसके वस्तुओं के निर्यात का मूल्य 175 करोड़ रुपये है। वस्तुओं के आयात का मूल्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर?:
व्यापार शेष = निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य
125 = 175 - आयातों का मूल्य 
आयातों का मूल्य = 175 - 125 = 50 करोड़ रुपये. 

प्रश्न 60. 
व्यापार शेष 6000 करोड़ रुपये का घाटा दर्शाता है तथा आयातों का मूल्य 10000 करोड़ रुपये है तो निर्यातों का मूल्य ज्ञात कीजिए। 
उत्तर:
व्यापार शेष
= निर्यातों का मूल्य - आयातों का मूल्य 
- 6000 = निर्यातों का मूल्य - 10000 
निर्यातों का मूल्य = 10000 - 6,000 = 4000.

प्रश्न 61. 
खुली अर्थ व्यवस्था एवं बन्द अर्थव्यवस्था में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था:
1. खुली अर्थव्यवस्था का शेष विश्व से आर्थिक संबंध होता है। 
2. खुली अर्थव्यवस्था में विकास की संभावनाएँ अधिक होती हैं। 
3. इसमें घरेलू आय तथा राष्ट्रीय आय में अंतर हो सकता है। 
4. आजकल अधिकांश अर्थव्यवस्था खुली अर्थव्यवस्था है। 

बन्द अर्थव्यवस्था:
1. बन्द अर्थव्यवस्था का शेष विश्व से कोई आर्थिक संबंध नहीं होता। 
2. बन्द अर्थव्यवस्था में विकास की संभावनाएँ कम - होती हैं।  
3. इसमें घरेलू आय तथा राष्ट्रीय आय समान होती है।
4. आधुनिक युग में बन्द अर्थव्यवस्था देखने में नहीं आती।

प्रश्न 62. 
असन्तुलित भुगतान सन्तुलन (घाटे) से आप क्या समझते हैं? इसे ठीक करने के उपाय बताइए।
उत्तर:
यदि किसी देश के अदायगी सन्तुलन में असन्तुलन अर्थात् घाटा है तो इसका तात्पर्य यह है कि उस देश में भुगतान अधिक है तथा प्राप्तियाँ कम हैं। किसी देश में भुगतान सन्तुलन के घाटे को निम्न उपायों द्वारा सन्तुलित किया जा सकता है

  1. स्वर्ण का निर्यात करके। 
  2. विदेशों में स्थित परिसम्पत्तियों का विक्रय करके। 
  3. देश के संचित कोष से धन निकालना। 
  4. विदेशों से ऋण अथवा अनुदान प्राप्त करना।

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प्रश्न 63. 
भुगतान सन्तुलन की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. भुगतान सन्तुलन एक देश का अन्य देशों के साथ किये गये समस्त आर्थिक सौदों का एक क्रमबद्ध लेखा होता है।
  2. यह एक वर्ष की अवधि के साथ संबंधित होता है।
  3. इसमें सभी दृश्य और अदृश्य व पूँजी अन्तरण की मदें सम्मिलित की जाती हैं।
  4. दोहरी लेखा पद्धति के आधार पर भुगतान व प्राप्तियों को लेखाबद्ध किया जाता है।

प्रश्न 64. 
भुगतान सन्तुलन का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
किसी देश के लिए भुगतान सन्तुलन का बड़ा महत्त्व है। भुगतान सन्तुलन विदेशी व्यापार की स्थिति की जानकारी देता है। इससे विदेशों से प्राप्तियाँ और विदेशों को भुगतान का पता चलता है। एक देश अन्य देशों पर किस प्रकार निर्भर है, इसका पता भुगतान सन्तुलन लेखे से चलता है।

प्रश्न 65. 
अदायगी सन्तुलन की पूँजी खाते की मदों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(अ) पूँजीगत प्राप्तियाँ:

  1. विदेशी ऋणों की प्राप्ति 
  2. बैंकिंग पूँजी का आन्तरिक प्रवाह 
  3.  सरकारी क्षेत्र द्वारा प्राप्त ऋण 
  4.  रिजर्व बैंक एवं मौद्रिक स्वर्ण प्राप्तियाँ 
  5. स्वर्ण का विक्रय। 

(ब) पूँजीगत भुगतान:

  1. विदेशी ऋणों का भुगतान 
  2. बैंकिंग पूँजी का बाह्य प्रवाह 
  3. सरकार द्वारा ऋणों का भुगतान 
  4. रिजर्व बैंक द्वारा एवं मौद्रिक स्वर्ण भुगतान 
  5. स्वर्ण का क्रय।

प्रश्न 66. 
व्यापार शेष और भुगतान शेष की परिभाषा करें।
उत्तर:
व्यापार शेष - एक लेखा वर्ष की अवधि में किसी देश के विश्व के अन्य देशों के साथ वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात तथा आयात के अन्तर को व्यापार शेष कहते हैं। भुगतान शेष - एक वर्ष की अवधि में किसी देश के शेष विश्व के साथ सभी प्रकार के लेन - देनों के अंतर को भुगतान शेष कहते हैं।

प्रश्न 67. 
समायोजित और स्वप्रेरित मदों की - परिभाषा दीजिए।
उत्तर:

  1. समायोजित मदें: भुगतान शेष खाते की समायोजित मदें वे मदें होती हैं जिनके अन्तर्गत लेन-देन करना किन्हीं अन्य मदों के परिवर्तन के कारण अनिवार्य होता है।  उदाहरण - सरकार द्वारा वित्तीयन आदि। 
  2. स्वप्रेरित मदें - स्वप्रेरित मदों में वे सभी अन्तर्राष्ट्रीय लेन - देन आते हैं जो लाभ जैसी प्रेरणाओं के कारण किये जाते हैं। ये विनिमय देश के भुगतान शेष की चिंता से मुक्त होते हैं।

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प्रश्न 68. 
भुगतान शेष के चालू खाते की मदें लिखें।
उत्तर:
भुगतान शेष के चालू खाते की मदें निम्न प्रकार हैं:

देनदारी:
1. वस्तुओं का आयात (दृश्य) 
2. अदृश्य मदें:
(a) शेष विश्व से प्राप्त सेवाएँ। 
(b) शेष विश्व को हस्तांतरण भुगतान। 
(c) शेष विश्व को प्रदान की गई अर्जित आय।

(i) शेष विश्व को दी गई निवेश आय।
(ii) शेष विश्व को दी गई कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति / मुआवजा।

लेनदारी: 
1. वस्तुओं का निर्यात (दृश्य) 
2. अदृश्य मदें 
(a) शेष विश्व को दी गई सेवाएँ। 
(b) शेष विश्व से हस्तांतरण भुगतान। 
(c) शेष विश्व से प्राप्त / अर्जित आय।

(i) शेष विश्व से प्राप्त निवेश आय। 
(ii) शेष विश्व से प्राप्त कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति / मुआवजा।

प्रश्न 69. 
नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर के निर्धारण को स्पष्ट कीजिए।
अथवा 
तिरती विनिमय दर का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
नम्य विनिमय दर का निर्धारण विदेशी विनिमय बाजार में माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। इसे सामने दिये गए रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।

RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 27
रेखाचित्र में SS विदेशी मुद्रा का पूर्ति वक्र है तथा DD विदेशी मुद्रा का माँग वक्र है। रेखाचित्र में E सन्तुलन का बिन्दु है जहाँ पर विदेशी मुद्रा की माँग तथा पूर्ति बराबर है। अतः सन्तुलन बिन्दु पर विनिमय दर e निर्धारित होती है।

प्रश्न 70. 
कीमतों में परिवर्तन का देश की आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि घरेलू पदार्थों की कीमतों में कमी आती है और विदेशों की कीमतें स्थिर रहती हैं, तब देश के निर्यातों में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप समग्र माँग में वृद्धि होती है। अतः उत्पाद और आय में वृद्धि होगी। इसी प्रकार विदेशों में कीमतों में वृद्धि होने से विदेशी वस्तुएँ महँगी होंगी। शुद्ध निर्यात बढ़ेगा। इससे घरेलू उत्पाद और आय में वृद्धि होगी। विदेशों में कीमत में कमी का विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

प्रश्न 71. 
चालू खाते पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चालू खाता अदायगी सन्तुलन का प्रमुख घटक होता है। चालू खाते में वस्तुओं के आयात - निर्यात, सेवाओं के आयात - निर्यात तथा अन्तरण अदायगियों का विवरण दर्ज किया जाता है। वस्तुओं का आयात - निर्यात दृश्य व्यापार कहलाता है तथा सेवाओं का आयात-निर्यात अदृश्य व्यापार कहलाता है। 

प्रश्न 72. 
विदेशी मुद्रा की माँग को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विदेशी मुद्रा की माँग उन समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात के कारण पैदा होती है जिन वस्तुओं तथा सेवाओं को दूसरे देशों से अपने देश में आयात किया जाता है क्योंकि आयातित वस्तुओं एवं सेवाओं के भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 73. 
विदेशी मुद्रा की पूर्ति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विदेशी मुद्रा की पूर्ति वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात के कारण उत्पन्न होती है। जब अपने देश से दूसरे देशों को वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात किया जाता है तो विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।

प्रश्न 74. 
विदेशी विनिमय बाजार के किन्हीं दो - प्रमुख व्यवसायियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. बैंक: बैंक विदेशी विनिमय बाजार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यवसायी होते हैं। ये बैंक अपने ग्राहकों के आदेश पर विदेशी विनिमय बिलों की कटौती, भुगतान और क्रय - विक्रय करते हैं।
  2. स्वीकृति गृह: स्वीकृति गृह अपने ग्राहकों की ओर से विदेशी विनिमय बिलों पर स्वीकृति देकर अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों में मदद करते हैं।

प्रश्न 75. 
नम्य विनिमय दर प्रणाली को संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
नम्य विनिमय दर प्रणाली: इस प्रणाली में विनिमय दर का निर्धारण बाजार माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, इसे तिरती विनिमय दर भी कहते हैं। इस प्रणाली में जिस दर पर विदेशी मुद्रा की माँग तथा पूर्ति बराबर होती है वही सन्तुलित विनिमय दर होती है।

निबन्धात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1. 
विदेशी विनिमय दर का क्या अर्थ है? स्वतन्त्र बाजार में इसे कैसे निर्धारित किया जाता है?
अथवा 
विदेशी विनिमय दर से आप क्या समझते हैं? माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा सन्तुलित विनिमय दर का निर्धारण किस प्रकार होता है? रेखाचित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विनिमय दर: विनिमय दर से हमारा अभिप्राय उस दर से होता है जिसके आधार पर एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा में परिवर्तित की जाती है। दूसरे शब्दों में यह वह अनुपात है, जिस पर एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा में बदली जाती है। उदाहरण के लिए, यदि एक डॉलर के बदले 50 रुपये देने पड़ते हैं तो विनिमय दर 1 डॉलर = 50 रुपये होगी।

विदेशी मुद्रा की माँग एवं पूर्ति विदेशी मुद्रा की माँग: विदेशी मुद्रा की माँग उन समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात के कारण पैदा होती है जिनका दूसरे देशों से अपने देश में आयात किया जाता है क्योंकि आयातित वस्तुओं एवं सेवाओं का भुगतान करने के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरण के लिए, वस्तुओं का आयात, बैंकिंग व बीमा सेवायें, जहाजी भाड़ा, कमीशन, दलाली, ब्याज, लाभांश का भुगतान, विदेशों में पर्यटकों के लिए भुगतान, विशेषज्ञों की सेवाओं का आयात, विदेशों में पूँजी का विनियोग, ऋण, अनुदान, जनसंख्या प्रवास, विदेशों में प्रतिनिधिमण्डलों व राजदूतों पर व्यय इत्यादि को विदेशी भुगतानों में सम्मिलित किया जाता है।

विदेशी मुद्रा की पूर्ति:
जिस प्रकार विदेशी मुद्रा की माँग वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात के कारण उत्पन्न होती है ठीक उसी प्रकार विदेशी मुद्रा की पूर्ति वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात के कारण पैदा होती है। जब अपने देश से दूसरे देशों को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात किया जाता है तो विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। साधारणतया विदेशी मुद्रा की पूर्ति वस्तुओं के निर्यात, बैंकिंग व बीमा सेवायें प्रदान करने से प्राप्त भुगतान, जहाजी भाड़ा, कमीशन, दलाली, ब्याज, लाभांश की प्राप्ति, पर्यटकों के आने से प्राप्त आय, स्वदेशी विशेषज्ञों की सेवाओं के निर्यात से प्राप्त आय, स्वदेश में विदेशी पूँजी का विनियोग, ऋण, अनुदान की प्राप्ति, जनसंख्या आवास, स्वदेश में विदेशी राजदूतों व प्रतिनिधिमण्डलों द्वारा व्यय इत्यादि मदों से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है।

विदेशी विनिमय दर का निर्धारण:
विदेशी विनिमय दर का निर्धारण आगे रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है। इस चित्र में Ox अक्ष पर विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति की मात्रा को तथा OY अक्ष पर विदेशी मुद्रा की स्वदेशी मुद्रा के संदर्भ में विनिमय दर (अर्थात् विदेशी विनिमय दर निर्धारण) को दर्शाया गया है। प्रस्तुत चित्र में DD वक्र विदेशी मुद्रा की माँग को तथा SS वक्र विदेशी मुद्रा की पूर्ति को बताते हैं तथा जिस
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उपर्युक्त रेखाचित्र में यदि विदेशी विनिमय दर OR से बढ़कर OR1 हो जाती है तो विदेशी विनिमय की माँग कम और पूर्ति अधिक हो जावेगी, यह स्थिति संतुलन का सूचक नहीं होगी, यह पूर्ति आधिक्य की स्थिति होगी। पूर्ति के कम होने पर विनिमय दर पुनः कम होकर OR हो जाती है। जहाँ S = D की स्थिति है। इसके विपरीत यदि विनिमय दर OR से गिरकर OR2 हो जाती है तो ऐसी स्थिति में विदेशी विनिमय की माँग अधिक और पूर्ति कम रह जावेगी जो साम्य या सन्तुलन का सूचक नहीं होगी क्योंकि यहाँ पर मांग आधिक्य की स्थिति है। माँग के कम होने पर विनिमय दर पुन: बढ़कर OR हो जाती है जहाँ पर S = D की स्थिति है। यही बिन्दु वास्तव में विदेशी विनिमय दर निर्धारण का बिन्दु है।

विदेशी विनिमय की माँग और पूर्ति के स्थायी साम्य द्वारा निर्धारित विनिमय दर को विनिमय की समता दर या सन्तुलन दर के नाम से पुकारते है। विदेशी विनिमय का माँग और पूर्ति के अस्थायी सन्तुलन से जिस दर का निर्धारण किया जाता है वह विदेशी विनिमय की बाजार दर कहलाती है। बाजार दर में सदैव परिवर्तन या उच्चावचन होते रहते हैं। कभी बाजार दर साम्य दर से अधिक हो जाती है और कभी कम, अल्पकाल में साधारणतया ऐसा होता रहता है लेकिन दीर्घकाल में बाजार दर भी साम्य दर के समान होने की प्रवृत्ति रखती है।

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प्रश्न 2. 
स्थिर विनिमय दर से आप क्या समझते हैं? स्थिर विनिमय दरों के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर: स्थिर विनिमय दर वह दर होती है जो विदेशी विनिमय बाजार में मांग और पूर्ति के अनुसार स्वतन्त्र रूप से निर्धारित नहीं होती बल्कि यह दर देश की केन्द्रीय बैंक अथवा केन्द्रीय सत्ता अथवा सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है।

स्थिर विनिमय दर के पक्ष में तर्क: स्थिर विनिमय दर के पक्ष में निम्न तर्क दिए जा सकते हैं।
(1) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि: विनिमय दर में स्थिरता रहने के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में अनिश्चितता समाप्त हो जाती है। विदेशी व्यापारियों को विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन के कारण हानि होने की आशंका नहीं रहती है। इससे विदेश व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी को प्रोत्साहन: विनिमय दर में स्थिरता होने के कारण एक देश से दूसरे देश में पूँजी का भी हस्तान्तरण होता रहता है। इससे विश्व विनियोग में वृद्धि होती है। विनिमय दर के स्थिर रहने के कारण ऋणी को अधिक भुगतान करने का भय नहीं रहता है और ऋणदाता को कम भुगतान पाने की आशंका नहीं रहती।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि: निश्चित विनिमय दर व्यवस्था में स्थिर विनिमय दरों की व्यवस्था के कारण उच्चावचनों की प्रतिस्पर्धा व तनाव का वातावरण नहीं रहता । परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग व सद्भावना में वृद्धि होती है।

(4) पूँजी निर्माण को बढ़ावा: जब विनिमय दर में स्थिरता रहती है तो आन्तरिक कीमत स्तर में भी स्थायित्व आ जाता है। फलस्वरूप जनता अपनी आय का कुछ भाग बचाने में संकोच नहीं करती तथा जो राशि बचायी जाती है उसका विनियोजन भी कर दिया जाता है, क्योंकि सम्भावित लाभ की दर प्रायः स्थिर रहती है।

(5) आर्थिक विकास को बढ़ावा: स्थिर विनिमय दर अर्थव्यवस्था में स्थिर विनिमय दरों के कारण विनिमय नियन्त्रण अथवा प्रबन्ध सम्बन्धी अनेक व्यवस्थाओं में प्रशासन तथा सरकार को उलझे रहने से छुटकारा मिल जाता है। परिणामस्वरूप सरकार विकसित अर्थतन्त्र पर अधिक ध्यान देकर आर्थिक विकास की दर को बढ़ा सकती है।


(6) आर्थिक नियोजन का सफल क्रियान्वयनइस प्रकार की अर्थव्यवस्था में विनिमय दर स्थिर रहने पर सरकारी परियोजनाओं के व्यय निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं होते तथा सरकार के आयात मूल्यों में भारी उतारचढ़ाव नहीं आता जिससे आर्थिक नियोजन के कार्यान्वयन में कठिनाई नहीं आती।

(7) निश्चित एवं अनुशासित सरकारी नीतियाँविनिमय दर निश्चित रहने पर विकासशील देश अपनी निश्चित योजना के अनुसार विकास कर पाते हैं जबकि विनिमय दरों में परिवर्तन होते रहने पर उनकी योजनाओं और प्राथमिकताओं में परिवर्तन करना पड़ता है और वे विकास का निश्चित कार्यक्रम पूरा नहीं कर पाते । निश्चित योजना के अनुसार विकास होने पर मौद्रिक नीतियाँ भी अनुशासन में रहती हैं।

(8) भुगतान सन्तुलन बनाये रखने में सहायकस्थिर विनिमय दरों के कारण विदेशी पूंजी आकर्षित होती है, औद्योगिक विकास सम्भव होता है, रोजगार का विस्तार होता है, मूल्यों में स्थिरता बनी रहती है। इन सबके कारण देश का भुगतान सन्तुलन देश के अनुकूल हो जाता है।

(9) आर्थिक स्थिरता लाने में सहायक: स्थिर विनिमय दर देश में आर्थिक स्थिरता लाने में सहायक होती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिकांश देशों की आर्थिक स्थिति अस्थिर एवं डावांडोल हो रही थी। इस अस्थिरता को समाप्त करने में विनिमय दरों में स्थिरता सहायक सिद्ध हुई थी।

(10) सट्टे का समापन: स्थिर विनिमय दरें सट्टे तथा विनिमय दरों में उच्चावचनों के लाभ की दृष्टि से किये गये अनियन्त्रित सौदों को समाप्त कर देती हैं जिससे देश उनके दुष्परिणामों से बच जाता है।

प्रश्न 3. 
नम्य विनिमय दर अथवा परिवर्तनशील विनिमय दर से आप क्या समझते हैं? परिवर्तनशील विनिमय दर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
नम्य अथवा परिवर्तनशील विनिमय दरनम्य विनिमय दर वह है जो विदेशी विनिमय बाजार में विदेशी विनिमय की माँग तथा पूर्ति के अनुरूप स्वतन्त्र रूप से निर्धारित होती है। इस विनिमय दर में मांग तथा पूर्ति की दशाओं के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। परिवर्तनशील विनिमय दर के पक्ष में तर्क

परिवर्तनशील विनिमय दर के पक्ष में निम्न तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं:
(1) आर्थिक साम्यता अधिक आसानअन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विनिमय दरों में साम्यता बनाये रखने का सबसे सरल उपाय नम्य विनिमय दरें हो सकती हैं। इसके अभाव में सरकार को विदेशी व्यापार पर नियन्त्रण या प्रतिबन्ध की नीति का अनुसरण करना पड़ता है, जिसकी सभी देशों द्वारा निन्दा की गई है।

(2) स्वतंत्र विश्व व्यापार सम्भव: परिवर्तनशील विनिमय दरों द्वारा स्वतंत्र विश्व व्यापार का स्वप्न साकार हो सकेगा, क्योंकि इसके मार्ग की सभी रुकावटें दूर हो जायेंगी। सरकार भुगतान सन्तुलन बनाये रखने के लिए किसी प्रकार (विशेष परिस्थितियों को छोड़कर) का हस्तक्षेप नहीं करेगी।

(3) सट्टे के विरुद्ध उपाय: परिवर्तनशील विनिमय दरों के विपक्ष में एक सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क यह दिया जाता है कि इससे सट्टे की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है, लेकिन सटोरियों द्वारा अत्यधिक ऊंची दरों पर विदेशी विनिमय का क्रय - विक्रय करने से पूर्व यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि ऐसा करने से उन्हें हानि हो सकती है, क्योंकि विदेशी विनिमय दरों में कभी भी परिवर्तन हो सकता है। इस प्रकार सट्टे द्वारा जो विनिमय दरें निश्चित होंगी वे न्याय-संगत दरों के बिल्कुल आस-पास ही होंगी।

(4) मौद्रिक नीति का सफल संचालन: इस प्रणाली से देश अपनी मौद्रिक नीति को राष्ट्रीय हित में संचालित कर सकता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए, भारत में मुद्रा प्रसार की स्थिति है तो इसको नियन्त्रित करने के लिए भारत का रिजर्व बैंक.खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों को बेचना चालू करेगा। अन्य बैंक इन प्रतिभूतियों को खरीदेंगे जिससे उनके तरल कोषों में कमी आ जायेगी और ब्याज की दर बढ़ जायेगी, ब्याज की दर बढ़ने से विदेशी पूँजी देश में आने लगेगी, जिससे भारतीय रुपये की माँग बढ़ जायेगी। इससे विनिमय दर भारत के पक्ष में बढ़ने लगेगी, निर्यात कम होंगे, आयातों में वृद्धि होने लगेगी, मूल्य स्तर कम होंगे तथा मुद्रा प्रसार का प्रभाव समाप्त हो जायेगा। इस प्रकार परिवर्तनशील विनिमय दरों से मौद्रिक नीति सफलतापूर्वक संचालित हो सकती है।

(5) वास्तविक आर्थिक स्थिति का सूचकपरिवर्तनशील विनिमय दरै आर्थिक स्थिति का सही सूचक हैं। यदि देश में आर्थिक स्थिरता है तो विनिमय दरें स्थिर रहेंगी, लेकिन यदि देश में आर्थिक अस्थिरता है तो विनिमय दरें भी उसी के अनुरूप परिवर्तित होने लगेंगी।

(6) स्वयं संचालित नियन्त्रण: नम्य दरें किसी भी देश के भुगतान संतुलन के लिए स्वयं संचालित नियन्त्रण का कार्य करती हैं। जब विनिमय दरों में ह्रास हो जाता है तो आयात महंगे पड़ते हैं तथा निर्यात सस्ते हो जाते हैं। यदि वस्तु की लोचदार माँग है तो निर्यातों में वृद्धि होती है और भुगतान सन्तुलन पक्ष में हो जाता है, किन्तु यह स्थिति दो परिस्थितियों में ही सफल होती है।
(i) देश में उपभोक्ता सामान की माँग में कटौती की जाने पर तथा
(ii) देश की सरकार अपने उद्योगों द्वारा निर्यात किये जाने वाले सामान के उत्पादन में शीघ्र वृद्धि करे। साथ ही सामान की श्रेष्ठ किस्म, निश्चित समय पर माल की सुपुर्दगी और अन्य सुविधाओं में किसी प्रकार की कमी न की जावे।

(7) मूल्यों में अनिश्चितता का भय नहीं: कुछ अर्थशास्त्रियों की यह मान्यता है कि नम्य दरों के फलस्वरूप आन्तरिक मूल्य स्तरों में अस्थिरता आ जायेगी तथा इससे पूँजी निर्माण में बाधा पड़ेगी, मिथ्या प्रतीत होती है। वास्तव में एक बार बड़े-बड़े देशों द्वारा इस नीति को अपना लेने के पश्चात् विनिमय दरों के सामान्य बिन्दु पर स्थिर रहने की प्रवृत्ति होगी।

(8) राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आर्थिक नीतियों का संचालन: परिवर्तनशील विनिमय दरों की व्यवस्था में सरकार अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आर्थिक नीतियाँ अपना सकती है क्योंकि विनिमय दरों को स्थिर रखने की समस्या नहीं होती है। विनिमय दरों की परवाह किये बिना सरकार व्यापार, उद्योग, रोजगार तथा नियोजन की नीतियाँ अपना सकती है जिससे देश के आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

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प्रश्न 4. 
विदेशी विनिमय बाजार से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख व्यवसायी एवं ग्राहकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विदेशी विनिमय बाजार: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक सौदों और ऋणों के भुगतान के लिए एक राष्ट्र के लोगों को दूसरे राष्ट्रों की विदेशी मुद्रा क्रय करनी पड़ती है तथा प्राप्त विदेशी मुद्रा का विक्रय करके स्वयं की मुद्रा क्रय करनी पड़ती है। ये समस्त क्रियाएँ विदेशी विनिमय बाजार के द्वारा ही सम्भव होती हैं। विदेशी विनिमय बाजार का आशय उस सम्पूर्ण क्षेत्र से लिया जाता है जहाँ पर विदेशी मुद्रा के क्रेता-विक्रेता और मध्यस्थ विदेशी भुगतानों के सौदों को सम्पन्न करने के लिए विदेशी मुद्रा का लेनदेन या क्रय-विक्रय करते हैं।

विदेशी विनिमय बाजार के व्यवसायी: विदेशी विनिमय बाजार के प्रथम श्रेणी के प्रमुख व्यवसायियों का संक्षिप्त विवेचन निम्न प्रकार है
(1) बैंक - विदेशी विनिमय बाजार में बैंक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यवसायी होते हैं। इन बैंकों की शाखायें एवं प्रतिनिधि बैंक दूसरे राष्ट्रों में भी फैले हुए होते हैं। ये बैंक साख पत्र, चैक, बैंक ड्राफ्ट, इन्टरनेट द्वारा ट्रान्सफर, डाक द्वारा स्थानान्तरण निर्गमित करते हैं और इनका भुगतान करते हैं। ये बैंक अपने ग्राहकों के आदेश पर विदेशी विनिमय बिलों की कटौती, भुगतान और क्रय-विक्रय करते

(2) स्वीकृति गृह: स्वीकृति गृह अपने ग्राहकों की ओर से विदेशी विनिमय बिलों पर स्वीकृति देकर अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों में मदद करते हैं। ये गृह विशेष रूप से उन आयातकर्ताओं के लिए अधिक लाभप्रद समझे जाते हैं जिनकी साख एवं आर्थिक स्थिति के बारे में विदेशी निर्यातकर्ता नहीं जानते हैं लेकिन वे स्वीकृति गृहों की स्वीकृति के कारण विदेशी आयातकर्ता को उधार की सुविधा देने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वीकृति गृहों के कारण विदेशी विनिमय बिलों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है।

(3) बिल ब्रोकर्स: बिल ब्रोकर्स विदेशी विनिमय बिलों के क्रेताओं और विक्रेताओं के मध्य सम्पर्क स्थापित करने में मदद करते हैं। ये मध्यस्थ अथवा बिचौलिये के रूप में कार्य करते हैं तथा कमीशन के रूप में आय कमाते हैं।

(4) कटौती गृह: ये साधारणतया विदेशी विनिमय बैंक होते हैं जो तत्काल भुगतान प्राप्त करने वाले बिल धारकों को बिल की कटौती कर शेष राशि चुका देते हैं। इन सेवाओं से यह लाभ प्राप्त होता है कि निर्यातकर्ताओं को विदेशी बिलों के भुगतान के लिए एक निश्चित अवधि तक इन्तजार नहीं करना होता है, उन्हें भुगतान तत्काल मिल जाता है.। उधार लेन-देन अधिक मात्रा में होने लगते हैं तथा कटौती गृह कटौती के रूप में आय अर्जित करते हैं।

विदेशी विनिमय बाजार के प्रमुख ग्राहक विदेशी विनिमय बाजार के प्रमुख ग्राहक निम्नलिखित:
(1) आयातकर्ता एवं निर्यातकर्ता: ये दोनों विदेशी विनिमय बाजार के प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण ग्राहक हैं। आयातकर्ता को अपने विदेशी भुगतानों को चुकाने के लिए विदेशी मुद्रा क्रय करनी पड़ती है जबकि निर्यातकों को विदेशों से प्राप्त विदेशी मुद्रा को देश की मुद्रा में बदलने के लिए बेचना पड़ता है।

(2)ऋणी एवं ऋणदाता: ऋणियों को ऋणों के ब्याज तथा मूल के पुनर्भुगतान में विदेशी मुद्रा क्रय करनी पड़ती है जबकि ऋणदाता को भुगतान वापसी एवं व्याज की प्राप्त विदेशी मुद्रा को अपने देश की मुद्रा के लिए बेचना पड़ता है।

(3) सरकार: सरकारें भी आजकल कई प्रकार के भुगतान लेती-देती रहती हैं। इसके लिए उन्हें विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करना पड़ता है।

(4) पर्यटन: पर्यटक अपने आने - जाने के खर्चों की पूर्ति के लिए विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करते हैं।

(5) पूँजी निवेशक: आजकल एक - दूसरे देशों में पूंजी निवेश किया जाने लगा है। पूँजी निवेशकों द्वारा भुगतान आदि के लिए विनिमय बाजार में विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करना पड़ता है।

(6) विदेशी विनिमय सटोरिये: सटोरिये विदेशी विनिमय बाजार में मुद्रा का क्रय - विक्रय वास्तविक भुगतानों के लिए नहीं करते बल्कि विदेशी विनिमय दरों में होने वाले उच्चावचनों से लाभ कमाने की दृष्टि से करते हैं। इनके द्वारा अग्रिम विनिमय के सौदे भी किये जाते हैं।

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प्रश्न 5.
अदायगी अथवा भुगतान सन्तुलन से आप क्या समझते हैं? एक उदाहरण द्वारा अदायगी सन्तुलन खाते को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अदायगी अथवा भुगतान सन्तुलनअदायगी सन्तुलन एक ऐसा लेखा है जिसमें एक देश के शेष विश्व के देशों से होने वाले सभी आर्थिक लेन-देनों का उल्लेख होता है। यह देश की विश्व के अन्य देशों से प्राप्तियों तथा अन्य देशों को किए गए भुगतानों को दर्शाता है। अदायगी सन्तुलन के मुख्य रूप से दो खाते हैं - चालू खाता एवं पूजी खाता।

चालू खाते में वस्तुओं के आयात: निर्यात, सेवाओं और अंतरण: अदायगियों के विवरण दर्ज किए जाते हैं। उपर्युक्त तालिका की पहली दो इकाई में वस्तु के आयात और निर्यात को दर्ज किया गया है। तीसरी इकाई में व्यापार संतुलन दिया गया है, जिसे वस्तु के निर्यात को आयात में से घटाकर प्राप्त किया जाता है। जब निर्यात आयात से अधिक होता है तो व्यापार आधिक्य होता है और जब आयात निर्यात से अधिक होता है तो व्यापार घाटा होता है। आयात निर्यात से अधिक होने के कारण भारत को 90 मिलियन अमेरिकी डॉलर का बहुत बड़ा व्यापार घाटा हुआ है। सेवाओं का व्यापार जिसे अदृश्य व्यापार कहा जाता है।

(क्योंकि उसे राष्ट्रीय सीमाओं को पार करते नहीं देखा जाता है) में उपदान आय (कर्मचारियों का मुआवजा और निवल निवेश आय बाद में ब्याज के बराबर हो जाता हैनिवेश आय जैसे - विदेशों में हमारी परिसंपत्तियों पर ब्याज, लाभ और लाभांश में से भारत में विदेशियों की परिसंपत्तियों से उनकी आय घटाने पर) और गैर - उपदान आय (जहाजरानी, बैंकिंग, बीमा, पर्यटन, सॉफ्टवेयर सेवाएँ, इत्यादि) आते हैं। अंतरण - अदायगी ऐसी प्राप्तियाँ होती हैं, जो किसी देश के निवासियों को निःशुल्क प्राप्त होती हैं और उनके बदले में उन्हें वर्तमान में या भविष्य में कोई अदायगी नहीं करनी पड़ती है। उनमें प्रेषित धन, उपहार और अनुदान शामिल हैं। वे सरकारी अथवा निजी हो सकते हैं। वस्तुओं के निर्यात और आयात के संतुलन को

व्यापार संतुलन कहते हैं। व्यापार संतुलन में सेवाओं का व्यापार और शुद्ध अंतरण का योग कर हम चालू खाता संतुलन प्राप्त करते हैं। चालू खाता संतुलन, तालिका के 5वें क्रम पर दिखाया गया है। इन आंकड़ों का तात्पर्य है कि चालू खाते के घटकों से संव्यवहार के कारण आई हुई प्राप्तियों से 38 मिलियन डॉलर अधिक का प्रवाह अदायगी के रूप में हुआ है। इसे चालू खाता घाटा के रूप में जाना जाता है। यदि ये आंकड़े धनात्मक संख्याओं में होते तो चालू खाता आधिक्य माना जाता है। पूंजी खातों में परिसंपत्तियों जैसे-मुद्रा, स्टॉक, बंधपत्र आदि के सभी प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय क्रय-विक्रय का विवरण होता है। विदेशियों को जिस किसी भी प्रकार के अंतरण द्वारा अदायगी की जाती है, उसे डेबिट में दर्ज करते हैं और उसे ऋणात्मक चिह्न दिया जाता है। कोई भी अंतरण जो विदेशियों से प्राप्ति के रूप में प्रविष्ट करते हैं, उसे क्रेडिट में दर्ज करते हैं और उसे धनात्मक चिह्न दिया जाता है।

प्रश्न 6. 
विदेशी विनिमय दर क्या है? विदेशी विनिमय दर को निर्धारित करने वाले घटक बताइये।
अथवा 
विनिमय दर को प्रभावित करने वाले तत्त्वों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विनिमय दर-विनिमय दर से हमारा अभिप्राय उस दर से होता है जिसके आधार पर एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा में परिवर्तित की जाती है।

विनिमय दर को प्रभावित करने वाले तत्त्व:
विनिमय दर को मुख्य रूप से निम्न तत्त्व प्रभावित करते हैं।
(1) सट्टेबाजी: बाजार में विनिमय दर केवल निर्यात और आयात की माँग एवं पूर्ति तथा परिसंपत्तियों में निवेश पर ही निर्भर नहीं करती है बल्कि विदेशी विनिमय के सट्टे पर भी निर्भर करती है, जहाँ विदेशी विनिमय की माँग मुद्रा की मूल्य वृद्धि से प्राप्त संभावित लाभ के लिए की जाती है। किसी भी देश की मुद्रा एक प्रकार की परिसंपत्ति है। यदि भारतीयों को यह विश्वास हो कि ब्रिटिश पौंड के मूल्य में रुपये की अपेक्षा वृद्धि होने की संभावना है, तो वे पौंड को अपने पास रखना चाहेंगे। इस परिकल्पना से पौंड की मांग बढ़ेगी और इससे रुपया पौंड विनिमय दर में वर्तमान में वृद्धि होगी, जिससे उसके विश्वास की स्वतः पूर्ति हो जाती है। उपर्युक्त विश्लेषण में यह मान लिया जाता है कि ब्याज की दर, आय और कीमत स्थिर रहती है। किन्तु इनमें परिवर्तन हो सकता है और इससे विदेशी विनिमय के माँग और पूर्ति वक्र शिफ्ट होंगे।

(2) ब्याज की दरें और विनिमय दर: अल्पकाल में विनिमय दर के निर्धारण में एक दूसरा कारक भी महत्त्वपूर्णहोता है, जिसे ब्याज दर विभेदक कहते हैं अर्थात् देशों के बीच ब्याज की दरों में अंतर है। बैंक, बहुराष्ट्रीय निगम और धनी व्यक्ति, विशाल निधि के स्वामी होते हैं जिसका अधिक आय प्राप्त करने के लिए ऊँची ब्याज दर की खोज में पूरे विश्व में संचलन होता है। यदि हम कल्पना करें कि एक देश A में सरकारी बंधपत्र पर ब्याज की दर 8 प्रतिशत है जबकि उसी के समान सुरक्षित बंधपत्र पर दूसरे देश B में 10 प्रतिशत की आय होती है, तो ब्याज दर विभेदक 2 प्रतिशत होगा।

देश A के निवेशकर्ता देश B की उच्च ब्याज दर की ओर आकर्षित होंगे और अपने देश की मुद्रा को बेचकर देश B की मुद्रा का क्रय करेंगे। इस स्थिति में, देश B के निवेशकर्ता भी अपने देश में निवेश करना चाहेंगे और इस प्रकार A की करेंसी की कम माँग करेंगे। इसका अर्थ यह है कि देश A की करेंसी का मांग वक्र बायीं ओर तथा पूर्ति वक्र दायीं ओर शिफ्ट होगा। इससे देश A की मुद्रा के मूल्य में ह्रास तथा देश B की मुद्रा के मूल्य में वृद्धि होगी। अत: किसी देश की आंतरिक ब्याज दर में वृद्धि से घरेलू मुद्रा के मूल्य में वृद्धि होगी। यहाँ यह मान लिया जाता है कि विदेशों की सरकारों के द्वारा बंधपत्रों के क्रय पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

(3) आय और विनिमय दर: जब आय में वृद्धि होती है, तो उपभोक्ता के व्यय में भी वृद्धि होती है तथा आयातित वस्तुओं पर व्यय में भी वृद्धि की संभावना होती है। जब आयात बढ़ता है तो विदेशी विनिमय का माँग वक्र दायीं ओर शिफ्ट होता है। इससे घरेलू मुद्रा के मूल्य में ह्रास होता है। यदि विदेशी आय में भी वृद्धि होती है, तो घरेलू निर्यात में वृद्धि होगी जिससे विदेशी विनिमय का पूर्ति वक्र बाहर की ओर शिफ्ट होगा। संतुलन की स्थिति में घरेलू मुद्रा का मूल्य ह्रास हो भी सकता है और नहीं भी। यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या निर्यात आयात से अधिक तेजी से बढ़ रहे हैं। आमतौर पर, अन्य बातें पूर्ववत् रहने पर एक देश जिसकी समस्त माँग शेष विश्व की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है, प्रायः उसकी मुद्रा के मूल्य में, निर्यात से आयात में अधिक वृद्धि के कारण ह्रास होता है। इससे विदेशी मुद्रा का माँग वक्र पूर्ति वक्र से अधिक तेजी से शिफ्ट होता है।

(4) दीर्घकाल में विनिमय दर: दीर्धकाल में नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर के संबंध में पूर्वानुमान करने के लिए क्रय - शक्ति समता सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई व्यापारिक अवरोधक जैसे-टैरिफ (प्रशुल्क) और कोटा (आयात की मात्रा की सीमा) नहीं होंगे, तो विनिमय दर स्वत: समायोजित हो जाएगी। इससे एक प्रकार के उत्पाद की लागत, चाहे भारत में रुपयों में या संयुक्त राज्य अमेरिका में डॉलर में अथवा जापान में येन में क्यों न हो, समान ही होगी। सिर्फ परिवहन व्यय में अंतर होगा। अत: दीर्घकाल में किन्हीं दो देशों की करेंसियों के बीच विनिमय दर के समायोजन से दोनों देशों के कीमत स्तर के अंतर का पता चलता है।

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प्रश्न 7. 
विनिमय दर की ब्रेटन वुड्स प्रणाली पर विस्तृत लेख लिखिए।
उत्तर:
ब्रेटन वुड्स प्रणाली: 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) और विश्व बैंक की स्थापना हुई तथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली की भी पुनर्स्थापना की गई। परिसंपत्तियों के चयन के रूप में यह अंतर्राष्ट्रीय स्वर्णमान से भिन्न था, जिसमें राष्ट्रीय करेंसी को परिवर्तनीय बनाया गया। करेंसियों की परिवर्तनीयता की द्विस्तरीय प्रणाली की स्थापना की गई, जिसके केन्द्र में डॉलर को रखा गया। संयुक्त राज्य अमेरिका के मौद्रिक प्राधिकरणों के द्वारा 35 डॉलर प्रति आउंस सोना की निश्चित दर पर डॉलर के सोने में परिवर्तनीयता की गारंटी प्रदान की गई।

इस प्रणाली के दूसरे स्तर में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रत्येक सदस्य देशों की मुद्रा प्राधिकरण के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसके अंतर्गत वे अपनी मुद्रा को एक निश्चित दर पर डॉलर में परिवर्तन करना चाहते थे। इस दूसरे स्तर को अधिकृत विनिमय दर कहा गया। उदाहरण के लिए, यदि फ्रांस की मुद्रा फ्रंक का 5 फ्रंक प्रति डॉलर के रूप में विनिमय किया जा सकता था, और 35 डॉलर प्रति आउंस की दर से सोने का विनिमय डॉलर के रूप में किया जा सकता था, तो इस प्रकार फ्रंक का मूल्य 175 फ्रंक प्रति आउंस सोने की दर पर निर्धारित किया जाता था (5 फ्रंक प्रति डॉलर गुणा 35 डॉलर प्रति आउंस)।

विनिमय दर में परिवर्तन की अनुमति केवल देश के अदायगी: संतुलन में आधारभूत असंतुलन की स्थिति में ही दी जाती थी, जिसका अभिप्राय अदायगी - संतुलन में पर्याप्त अनुपात में चिरकालिक घाटे से है। ऐसी विस्तृत परिवर्तनीय पद्धति की आवश्यकता थी, क्योंकि विभिन्न देशों में सोने का आरक्षित भंडार एक समान नहीं था। अधिकृत सोने के आरक्षित भंडार का 70 प्रतिशत केवल संयुक्त राज्य अमेरिका के पास था। अत: अन्य करेंसियों की विश्वसनीय परिवर्तनीयता के लिए सोने के भंडार के पुनर्वितरण की आवश्यकता होती। इसके अतिरिक्त, यह विश्वास किया जाता था कि अंतर्राष्ट्रीय तरलता की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए विद्यमान स्वर्ण भण्डार अपर्याप्त था। स्वर्ण भण्डार की रक्षा की एक विधि द्वि स्तरीय परिवर्तन पद्धति थी, जिसमें प्रधान मुद्रा का परिवर्तन सोना में और अन्य करेंसियों का परिवर्तन प्रधान मुद्रा के रूप में होता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् युद्ध से विनष्ट देशों के पुनर्निर्माण के लिए अत्यधिक संसाधन की आवश्यकता थी। आयात में वृद्धि हुई और घाटे के वित्त पोषण के लिए आरक्षित निधि का उपयोग किया गया। ऐसे देशों में उस समय संयुक्त राज्य की करेंसी डॉलर का उपयोग शेष विश्व के देशों में आरक्षित निधि के रूप में होता था। संयुक्त राज्य में लगातार अदायगी - संतुलन घाटे के परिणामस्वरूप उस आरक्षित निधि में वृद्धि हुई (अन्य देश अपनी मुद्रा और डॉलर के बीच परिवर्तनीयता को बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता के कारण आरक्षित धन के रूप में डॉलर का संग्रह करना चाहते थे)। अब समस्या यह थी कि यदि संयुक्त राज्य की अल्पकालिक डॉलर देयता में स्वर्ण भंडार के सापेक्ष वृद्धि निरंतर जारी रहती, तो उसकी स्थिर कीमत पर डॉलर के सोने में परिवर्तन को प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता के प्रति विश्वास नहीं रह जाता। 

इस प्रकार, केन्द्रीय बैंक के पास वर्तमान डॉलर के प्रतिधारित को सोने में परिवर्तन करने के लिए प्रचुर प्रोत्साहन होता और उससे संयुक्त राज्य को अपनी प्रतिबद्धता का परित्याग करने को बाध्य होना पड़ता। इसे ब्रेटन वुड्स पद्धति के मुख्य आलोचक राबर्ट ट्रिफिन के नाम से ट्रिफिन दुविधा कहा जाता है। ट्रिफिन ने सलाह दी कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को केन्द्रीय बैंकों के 'जमा बैंकों में बदल देना चाहिए और नई 'आरक्षित परिसंपत्ति' का सृजन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के नियंत्रण में करना चाहिए। 1967 में विशेष आहरण अधिकार (SDRs) के सृजन से सोना विस्थापित हो गया। अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित स्टॉक में वृद्धि करने के आशय से विशेष आहरण अधिकार (SDRs) को अंतर्राष्ट्रीय करेंसी के रूप में, 'कागजी स्वर्ण' के रूप में भी जाना जाता है। सोने के रूप में परिभाषा में 35 (SDRs) को एक आउंस सोना (ब्रेटन वुड्स पद्धति की डॉलर-सोना की दर) के समान माना गया। 1974 से इसे कई बार पुनर्परिभाषित किया गया है। 

वर्तमान में प्रतिदिन इसकी गणना पाँच देशों (फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका) की चार करेंसियों (यूरो, डॉलर, जापानी येन, पौंड स्टर्लिंग) के डॉलर में मूल्य के भारित योग के रूप में होती है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सदस्य देशों के द्वारा आरक्षित मुद्रा के रूप में राष्ट्रीय करेंसियों के विनिमय के लिए केन्द्रीय बैंकों के मध्य भुगतान के साधन के रूप में इसका प्रयोग किए जाने से, इसे शक्ति प्राप्त होती है। विशेष आहरण अधिकार की मूल्य किस्त का वितरण सदस्य देशों के बीच निधि (कोटा का संबंध देश के आर्थिक महत्त्व से संबंधित था, जिसका संकेत उसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मूल्य से मिलता था) में उनके कोटे के अनुसार किया जाता था।

प्रश्न 8. 
एक खुली अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय आय के तादात्म्य को स्पष्ट कीजिए।
अथवा 
एक खुली अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय के निर्धारण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: खुली अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय आय का तादात्म्य
बंद अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग के तीन स्रोत हैं-उपभोग (C), सरकारी खर्च (G), घरेलू निवेश (1) इसे इस प्रकार लिख सकते हैं।
Y= C + I + G ....(i) 

खुली अर्थव्यवस्था में निर्यात (X) से घरेलू वस्तुओं और सेवाओं की मांग के अतिरिक्त स्रोत की रचना होती है, जो विदेशों से आता है और इसलिए इसे समस्त मांग में जोड़ा जाना चाहिए। घरेलू बाजारों में आयात से पूरक पूर्ति होती है और इससे घरेलू माँग के उस भाग की रचना होती है, जिससे विदेशी वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर असर होता है। अतः राष्ट्रीय आय, एक खुली अर्थव्यवस्था में तादात्म्य है
Y+ M = C + I + G + x ....(ii) पुनर्गठन करने पर
Y= C + I + G + X - M ....(iii)
Y = C + I + G + Nx ....(iv) 

जहाँ NX निवल निर्यात (निर्यात - आयात) है। एक धनात्मक निवल निर्यात (निर्यात, आयात से ज्यादा) से व्यापार अधिशेष और ऋणात्मक निवल निर्यात (आयात, निर्यात से ज्यादा) से व्यापार घाटा सूचित होता है। किसी खुली अर्थव्यवस्था में साम्य आय के निर्धारण में आयात और निर्यात की भूमिका की जाँच करने के लिए हम उसी प्रक्रिया को अपनाते हैं, जिस प्रक्रिया का प्रयोग बंद अर्थव्यवस्था के मामले में किया जाता है अर्थात् हम निवेश और सरकार के स्वायत्त व्यय को लेते हैं। इसके अतिरिक्त हमें आयात और निर्यात के निर्धारकों को भी स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है। आयात की मांग घरेलू आय (Y) और वास्तविक विनिमय दर (R) पर निर्भर करती है। 

उच्च आय होने पर अधिक आयात किया जाता है। वास्तविक विनिमय दर को घरेलू वस्तु के रूप में विदेशी वस्तुओं की सापेक्ष कीमत के रूप में परिभाषित किया जाता है। उच्च विनिमय दर से विदेशी वस्तुएँ अपेक्षाकृत अधिक महंगी हो जाती हैं और इस प्रकार आयात की मात्रा में कमी आती है। अतः आय (Y) का आयात पर धनात्मक प्रभाव पड़ता है और वास्तविक विनिमय दर (R) का ऋणात्मक। परिभाषा से एक देश का निर्यात दूसरे देश का आयात होता है। इस प्रकार, हमारे निर्यात से विदेशी आयात की रचना होती है। यह विदेशी आय और वास्तविक विनिमय दर पर निर्भर करेगा। विदेशी आय में वृद्धि से हमारी वस्तुओं की विदेशी मांग में वृद्धि होगी, जिससे अधिक निर्यात होगा। विनिमय दर (R) में वृद्धि से घरेलू वस्तु सस्ती होगी और हमारे निर्यात में वृद्धि होगी। 

विदेशी आय और वास्तविक विनिमय दर का निर्यात पर धनात्मक प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार, निर्यात और आयात घरेलू आय, विदेशी आय और वास्तविक विनिमय दर पर निर्भर करते हैं। हम कल्पना करते हैं कि कीमत स्तर और मौद्रिक विनिमय दर स्थिर है, तो वास्तविक विनिमय दर भी स्थिर होगी। हमारे देश के मामले में विदेशी आय और इसलिए निर्यात को बहिर्जात (X =X) समझा जाता है। इस प्रकार आयात की माँग आय पर निर्भर मानी जाती है और इसका एक स्वायत्त घटक होता है।

M= M + mY जहाँ M > 0 स्वायत्त घटक है 0 < m < 1

यहाँ m आयात की सीमांत प्रवृत्ति है। आय का एक अतिरिक्त रुपया आयात पर खर्च करने से प्राप्त अनुपात है। यह सीमांत उपभोग प्रवृत्ति के सादृश्य होता है। 
साम्य आय इस प्रकार होगी
Y= C + c(Y - T) + I + G + X - M - mY ....(vi)
स्वायत्त घटकों को A के रूप में एक साथ लेने पर प्राप्त होता है
Y= A + cY - mY ....(vii) या, 
(1 - c+ m)Y = A ....(viii) या, 
Y = A ....(ix)
आयव्यय ढाँचे में विदेशी व्यापार की अनुमति के प्रभाव की परीक्षा करने के क्रम में हमें बंद अर्थव्यवस्था के मॉडल में साम्य आय के लिए समतुल्य अभिव्यक्ति के समीकरण 

(ix) की तुलना करनी होगी। दोनों समीकरणों में साम्य आय को दो पदों, स्वायत्त व्यय गुणक और स्वायत्त
व्यय स्तरों के गुणनफल के रूप में अभिव्यक्त किया गया है; क्योंकि आयात की सीमांत प्रवृत्ति शून्य से अधिक होती है, इसलिए खुली अर्थव्यवस्था में हमें छोटा गुणक प्राप्त होता है। इसे निम्न प्रकार से अभिव्यक्त किया जाता हैखुली अर्थव्यवस्था गुणक = - 1 - c + m ...(x)

RBSE Class 12 Economics Important Questions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 9. 
मान लीजिए C = 60 + 0.8Y, T = 90, I= 100,G= 110, X = 130, M = 70+ 0.05Y हो तो निम्न की गणना कीजिए
(a) सन्तुलित आय का स्तर 
(b) सन्तुलन आय पर निवल निर्यात सन्तुलन
(c) सन्तुलन आय तथा निवल निर्यात सन्तुलन पर प्रभाव यदि G = 110 से 140 हो जाए।
उत्तर:
(a) सन्तुलित आय की गणना-सन्तुलित आय की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जा सकती है
Y= C + c (Y - T) + 1 + G + x - M - mY
= 60 + 0.86Y - 900 + 100 - 110 - 130 - 70 - 0.05
Y = 60 + 0.8Y - 72  + 100 - 110 + 130 - 70 - 0.05Y
Y = 0.75Y + 258 Y - 0.75Y  % D258  0.25
Y = 258
5 = 1032 

(b) सन्तुलन आय पर निवल निर्यात सन्तुलन निवल निर्यात सन्तुलन = निर्यात - आयात
निर्यात (X) = 130 
आयात 
(M) = 70 + 0.05 x 1032
= 70 + 51.6 = 121.6 
अतः निवल निर्यात सन्तुलन = 130 - 121.6 = 8.4

(c) G = 110 से 140 होने पर सन्तुलन आय की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जाएगी
Y = C + c (Y - T) + I + G + X - M - m
Y = 60 + 0.8 (Y - 900 + 100 + 140 + 130 - 70 - 0.05
Y = 60 + 0.81 - 72 + 100 + 140 - 130 - 70 - 0.05Y
Y= 0.75Y + 288 
Y - 0.75Y = 288 0.25
Y = 288
= 1152 निवल निर्यात सन्तुलन की गणना हम निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात करेंगे
निवल निर्यात सन्तुलन = निर्यात - आयात
निर्यात (X) = 130 आयात 
(M) = 70 + 0.05 x 1152
= 70 + 57.6
= 127.6 
अतः निवल निर्यात सन्तुलन = 130 - 127.6
= 2.4 

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प्रश्न 10. 
यदि C = 80 + 0.8YD
T = 100, 
I = 120,
G - 80,
x = 180,
M = 100 + 0.05Y हो तो निम्न की गणना कीजिए
(1) सन्तुलित आय ज्ञात कीजिए। 
(2) सन्तुलन आय पर निवल निर्यात सन्तुलन ज्ञात कीजिए।
(3) सन्तुलन आय एवं निवल निर्यात सन्तुलन क्या होगा जब सरकार के क्रय में 20 की वृद्धि हो।
उत्तर:
(1) सन्तुलित आय की गणना-सन्तुलित आय की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जा सकती है
Y = C + c(Y - T) + i + G + X - M - mY प्रश्नानुसार, 
C = 80
C = 0.8
T = 100
1 = 120
G= 80
X = 180
100, m = 0.65 
अत: Y = 80+ 0.8(४ - 100) + 120 + 80 + 180
(100 - 0.05Y) = 80 + 0.8Y - 80 + 120 + 80 + 180 
Y = 0.8Y + 280 -0.05Y
Y = 0.75Y +  280 Y - 0.75Y  % 3D280
Y = 1120 

(2) सन्तुलन आय पर निवल निर्यात सन्तुलन की गणना
सन्तुलन आय = 1120 निवल निर्यात सन्तुलन को निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता हैनिवल निर्यात सन्तुलन = निर्यात - आयात
निर्यात (X) = 180 आयात 
(M) = 100 + 0.05Y
= 100 + 0.05 x 1120 
= 100+ 56
= 156 
अत: निवल निर्यात सन्तुलन = निर्यात - आयात
= 180 - 156
=24 

(3) सरकार क्रय में 20 की वृद्धि होने पर G = 80 से बढ़कर 100 हो जाएगा तब सन्तुलन आय की गणना
Y= C + c(Y - T) + I  + G + X - M - mY 
= 80+ 0.8 (Y - 100) + 120 + 100 + 180
-100 - 0.05Y 
Y =  80 + 0.8Y - 80 + 120 + 100 + 180
100 - 0.05Y 
= 0.8Y + 300 - 0.05Y 
Y = 0.75Y + 300 
Y - 0.75Y = 300
0.25Y = 300
= 1200 निवल निर्यात सन्तुलननिवल निर्यात = निर्यात - आयात
= X -  M 
x= 180 
m = 100 + 0.05
Y = 100 +0.05 (1200) 
= 100+ 60
= 160 . 
अत: निवल निर्यात सन्तुलन = X - M
= 180 - 160
-20 

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प्रश्न 11. 
भुगतान संतुलन से आप क्या समझते हैं? भुगतान सन्तुलन की प्रमुख मदों का उल्लेख कीजिए।
अथवा 
व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन से क्या आशय है? भुगतान संतुलन की मदें समझाइये।
उत्तर:
अदायगी अथवा भुगतान संतुलनअदायगी अथवा भुगतान संतुलन में किसी एक देश के निवासियों तथा शेष विश्व के बीच वस्तुओं, सेवाओं तथा परिसम्पत्तियों के लेन-देनों का विवरण दर्ज होता है।
व्यापार संतुलन: व्यापार संतुलन में एक देश के निवासियों तथा शेष विश्व के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात - निर्यातों का विवरण दर्ज होता है। भुगतान संतुलन की प्रमुख मदें भुगतान संतुलन में दो खाते होते हैं - चालू खाता एवं पूँजी खाता। चालू खाते एवं पूँजी खाते की प्रमुख मदें अग्र प्रकार हैं

(i) चालू खाता: भुगतान शेष का चालू खाता अल्पकालीन वास्तविक सौदों को दर्शाता है। इसमें दृश्य और अदृश्य दोनों प्रकार की मदें सम्मिलित की जाती हैं () दृश्य मदें - इसमें हर प्रकार की भौतिक वस्तुओं के आयात तथा निर्यात को शामिल किया जाता है। निर्यात तथा आयात वस्तुओं के मूल्य के अंतर को व्यापार शेष कहा जाता है। यदि निर्यात आयात से अधिक होता है तो इसे व्यापार शेष का आधिक्य वाला व्यापार शेष कहते हैं। यदि निर्यात तथा आयात का मूल्य समान होता है, तब व्यापार शेष को संतुलन वाला व्यापार शेष कहते हैं। इसके विपरीत यदि निर्यात आयात से कम होता है तो व्यापार शेष घाटे वाला व्यापार शेष कहलाता है।

(ii) अदृश्य मदें: अदृश्य मदों में सेवाओं का मूल्य, आय तथा हस्तान्तरण भुगतान सम्मिलित होते हैं। अतः अदृश्य वस्तुओं को निम्न तीन उपशीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है
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(a) गैर - साधन सेवाएँ: इसमें एक देश द्वारा विश्व के अन्य देशों को प्रदान की गई सेवाएँ तथा अन्य देशों से प्राप्त की गई सेवाएँ शामिल होती हैं।
(b) निवेश से आय: इसमें विदेशों को दिये गये ऋण, विदेशों में निवेश लाभ आदि सम्मिलित होते हैं।
(e) हस्तान्तरण भुगतान: इसमें एकपक्षीय भुगतान शामिल होते हैं, जैसे-विदेशी उपहार, दान, सैनिक तकनीकी सहायता आदि।

(2) पूंजी खाता: भुगतान सन्तुलन का पूजी खाता वित्तीय लेन-देनों से संबंधित होता है। इसमें सभी प्रकार के अल्पकालीन और दीर्घकालीन पूँजी अन्तरणों को शामिल किया जाता है। इसकी मुख्य मदें निम्नलिखित हैं-निजी ऋण, सरकारी पूँजी का लेन - देन, बैंकिंग पूँजी का प्रवाह ऋण, ऋणों का भुगतान, केन्द्रीय बैंक के स्वर्ण भंडार, सरकार के SDR कोष, अन्तर्राष्ट्रीय कोष से क्रय तथा इसी प्रकार के दूसरे पूंजीगत लेन - देन सम्मिलित हैं।

Prasanna
Last Updated on Jan. 22, 2024, 9:35 a.m.
Published Jan. 21, 2024