RBSE Class 11 Sociology Notes Chapter 3 पर्यावरण और समाज

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RBSE Class 11 Sociology Chapter 3 Notes पर्यावरण और समाज

→ पारिस्थितिकी (Ecology)
पारिस्थितिकी प्रत्येक समाज का आधार होती है। 'पारिस्थितिकी' शब्द से अभिप्राय एक ऐसे जाल से है जहाँ भौतिक और जैविक व्यवस्थाएँ तथा प्रक्रियायें घटित होती हैं और मनुष्य भी इसका एक अंग होता है। पर्वत तथा नदियाँ, मैदान तथा सागर और जीव-जन्तु ये सब पारिस्थितिकी के अंग हैं।

  • किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमण्डल की अन्तःक्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता
  • समय के साथ-साथ मनुष्य की क्रियाओं द्वारा पारिस्थितिकी में परिवर्तन आया है। मनुष्य की ऐसी क्रियाओं के उदाहरण हैं नदियों के ऊपरी क्षेत्र में जंगलों की अंधाधुंध कटाई, विश्वव्यापी तापमान वृद्धि आदि।
  • समय के साथ पारिस्थितिकीय परिवर्तन के लिए, कई बार प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों में अन्तर करना | काफी कठिन होता है।
  • जैव भौतिक सम्पदा और प्रक्रिया में जहाँ मनुष्य के हस्तक्षेप के कारण परिवर्तन देखा गया है। जैसे—कृषि भूमि पर मिट्टी व पानी के बचाव के कार्य, कृत्रिम खाद तथा कीटनाशक का प्रयोग, शहर के निर्माण में प्रयुक्त संसाधन आदि।

→ सामाजिक पर्यावरण
सामाजिक पर्यावरण का उद्भव जैव भौतिक पारिस्थितिकी तथा मनुष्य के हस्तक्षेप की अन्तःक्रिया के द्वारा होता है। यह दो-तरफा प्रक्रिया है। जिस प्रकार से प्रकृति समाज को आकार देती है, ठीक उसी तरह से समाज भी प्रकृति को आकार देता है।

  • पारिस्थितिकी मनुष्य के जीवन तथा उसकी संस्कृति को आकार देती है, जैसे-गंगा-जमुना के मैदान, राजस्थान का मरुस्थल आदि।
  • पूँजीवादी सामाजिक संगठनों ने विश्वभर की प्रकृति को आकार दिया है। जैसे-शहरों में वायु प्रदूषण तथा भीड़भाड़, प्रादेशिक झगड़े, तेल के लिए युद्ध तथा विश्वव्यापी तापमान वृद्धि आदि। बढ़ता हुआ मानवीय हस्तक्षेप पर्यावरण को पूरी तरह से बदलने में सक्षम है।

RBSE Class 11 Sociology Notes Chapter 3 पर्यावरण और समाज 

→ सामाजिक संगठन 
सामाजिक संगठन के द्वारा पर्यावरण तथा समाज की अन्तःक्रिया को आकार प्रदान किया जाता है। यथा

  • सम्पत्ति के सम्बन्ध यह निर्धारित करते हैं कि कैसे तथा किसके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जायेगा।
  • भूमि तथा जल संसाधन का व्यक्तिगत स्वामित्व इस बात का निर्धारण करेंगे कि क्या अन्य लोगों को इन संसाधनों के उपयोग का अधिकार होगा और यदि हाँ, तो किन नियमों तथा शर्तों के अन्तर्गत?
  • संसाधनों पर नियंत्रण तथा स्वामित्व, श्रम विभाजन और उत्पादन प्रक्रिया से संबंधित है। कृषिहीन मजदूरों एवं स्त्रियों का प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्ध पुरुषों की तुलना में भिन्न होता है। 

→ सामाजिक मूल्य तथा प्रतिमान
पर्यावरण तथा समाज के सम्बन्ध उसके सामाजिक मूल्यों तथा प्रतिमानों की व्यवस्था में भी प्रतिबिंबित होते हैं।। यथा

  • पूँजीवादी मूल्यों ने प्रकृति के उपयोगी वस्तु होने की विचारधारा को पोषित किया है जहाँ प्रकृति को एक वस्तु के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है जिसे लाभ के लिए खरीदा या बेचा जा सकता है।
  • समानता तथा न्याय के समाजवादी मूल्यों ने कई देशों में बड़े-बड़े जमींदारों से उनकी जमीनों को छीन उन्हें पुनः भूमिहीन किसानों में बाँट दिया है।
  • धार्मिक मूल्य धार्मिक हितों तथा विभिन्न किस्मों को संरक्षण दे सकें तथा अन्य वर्ग यह मान सकें कि उन्हें अपने हितों के लिए पर्यावरण में परिवर्तन करने का दैवीय अधिकार प्राप्त है।

→ पर्यावरण तथा समाज के सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य 

  • पर्यावरण तथा समाज के सम्बन्धों को कई परिप्रेक्ष्यों में देखा जा सकता है-
  • पारिवेशिक कारक-पारिवेशिक कारकों से प्रभावित होकर 'प्रकृति-पोषण' विवाद तथा व्यक्तिगत विशेषताएँ | होती हैं। उदाहरण के लिए व्यक्ति के गरीब होने के कारण हैं—कम गुणी होना या कम मेहनती होना या उसका जन्म अच्छी परिस्थितियों में न होना या उचित मौका न मिलना।
  • सामाजिक परिस्थितियाँ-पर्यावरण तथा समाज के बारे में सिद्धान्त तथा आँकड़े उन सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं जिनसे उनका प्रादुर्भाव होता है—समानता की विचारधारा तथा साम्राज्यवाद ने पर्यावरण तथा| समाज से संबंधित ज्ञान का प्रसार किया। साम्राज्यवादी आवश्यकताओं के अनुरूप नये विषयों का संस्थागत रूप | तैयार किया गया ताकि ये प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन को आसान बना सकें।
  • पर्यावरण प्रबंधन-बढ़ते औद्योगीकरण के कारण पर्यावरण के साथ मनुष्य के सम्बन्धों की जटिलता बढ़ गयी है। औद्योगीकरण ने पारिस्थितिकी तंत्र को कई तरह से प्रभावित किया है। जटिल औद्योगिक तकनीक तथा संगठन की व्यवस्थाओं के लिए बेहतरीन प्रबंधन व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

→ पर्यावरण की प्रमुख समस्यायें और जोखिम
पर्यावरण से संबंधित निम्नलिखित समस्याओं को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है
(अ) संसाधनों की क्षीणता (कमी)-अस्वीकृत प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करना पर्यावरण की एक गंभीर समस्या है।

  • पानी की भूमि में आ रही तीव्र गति से क्षीणता के कारण हैं--कृषि, उद्योग तथा शहरी केन्द्रों में इनकी बढ़ती मांग।
  • मृदा की ऊपरी सतह महत्त्वपूर्ण कृषि संसाधन है, जो पर्यावरण के कुप्रबन्धन—भू-कटाव, पानी का जमाव और खारेपन के कारण, नष्ट हो रही है।
  • जैविक विविध आवास; जैसे-जंगल, घास के मैदान, आर्द्र भूमि आदि, भी बढ़ती कृषि भूमि के कारण समाप्त हो रहे हैं। इन आवासों की बढ़ती कमी कई वन्य जीवों की किस्मों के लिए खतरा है।

(ब) प्रदूषण-प्रदूषण के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं

  • वायु प्रदूषण-वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं-उद्योगों तथा वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसें. घरेल। उपयोग हेतु लकड़ी और कोयले से निकलने वाला धुआँ । इससे श्वास तथा सेहत सम्बन्धी अनेक बीमारियाँ हो जाती |
  • जल प्रदूषण-जल प्रदूषण ने भूमि के सतही तथा आन्तरिक जल को प्रभावित किया है। इसके स्रोत हैघरेलू नालियाँ, फैक्ट्रियों से निकलने वाले पदार्थ, कृत्रिम खाद तथा कीटनाशकों के प्रयुक्त होने वाले खेतों से निकलने वाला जल। नदियों तथा जलाशयों का प्रदूषण प्रमुख समस्या है।
  • ध्वनि प्रदूषण-शहर ध्वनि प्रदूषण से भी ग्रसित है। इसके स्रोत हैं, लाउडस्पीकर, राजनीतिक प्रचार, वाहनों के हॉर्न और यातायात तथा निर्माण उद्योग आदि।

(स) वैश्विक तापमान वृद्धि-पृथ्वी द्वारा छोड़ी गयी कुछ प्रमुख गैसों...कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन तथा अन्य गैसों-सूर्य की रोशनी को रोककर तथा उसे वापस वायुमण्डल में न जाने देकर 'ग्रीनहाउस प्रभाव' का निर्माण करती हैं। इससे विश्व के तापमान में वृद्धि हो रही है। इससे ध्रुवों की हिम की परतें पिघल रही हैं और समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, तटीय बस्तियों के डूबने का खतरा पैदा हो रहा है। दूसरे, इससे दुनिया की जलवायु में उतार-चढ़ाव तथा अनियमितता बढ़ी है।

(द) जैनेटिकली मोडिफाइड आर्गेनिजम्स-वैज्ञानिक जीन-स्पेलसिंग की नयी तकनीकों के द्वारा एक किस्म के गुणों को दूसरी किस्म में डालते हैं ताकि बेहतरीन गुणों से भरपूर वस्तु का निर्माण किया जा सके। इसका उपयोग कम समय में पैदावार, फसल का आकार व उनकी समय सीमा को घटाने या बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। इसके प्रयोग द्वारा किसान अनुर्वरक बीजों के निर्माण एवं उनके पुनः उपयोग से बच सकते हैं। साथ ही उनकी गुणवत्ता को बनाए रखने की गारंटी भी मिलेगी।

(य) प्राकृतिक तथा मानव निर्मित पर्यावरण विनाश-1984 में भोपाल आपदा तथा 2004 की सुनामी आपदाएँ इसकी प्रमुख उदाहरण हैं।

RBSE Class 11 Sociology Notes Chapter 3 पर्यावरण और समाज

→ पर्यावरण की समस्यायें सामाजिक समस्यायें क्यों हैं?
(अ) सामाजिक असमानता में वृद्धि-सामाजिक पर्यावरण की समस्यायें सामाजिक असमानताओं को बढ़ा देती

  • कुछ स्थितियों में पर्यावरण समस्याओं के समाधान वास्तव में पर्यावरण की असमानताओं को बढ़ा देती हैं। उदाहरण के लिए गुजरात में गहरी खुदाई कर खोदे गये कुएँ सम्पन्न लोगों की सम्पन्नता को और बढ़ा रहे हैं।
  • कुछ पर्यावरण चिंतन कभी-कभी सार्वभौमिक चिंतन बन जाते हैं जब इनके सम्बन्ध किसी विशेष सामाजिक वर्ग से नहीं रह जाते। उदाहरण के लिए वायु प्रदूषण कम करना या जैव विविधता को संरक्षण देना, कभी-कभी सार्वभौमिक रूप से लाभदायक नहीं हो पाते हैं।
  • कभी-कभी जनहित के कार्यों की रक्षक नीतियाँ वास्तव में राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्गों के लाभ की रक्षा करती हैं तथा कमजोर वर्गों को हानि पहुँचाती हैं। जैसे बड़े-बड़े बाँध तथा उसके आसपास के प्रवेश सम्बन्धी वादविवाद।

(ब) सामाजिक पारिस्थितिकी-सामाजिक पारिस्थितिकी की विचारधारा यह बताती है कि सामाजिक सम्बन्ध, मुख्य रूप से संपत्ति तथा उत्पादन के संगठन पर्यावरण की सोच तथा प्रयास को एक आकार देते हैं। भिन्न सामाजिक वर्ग भिन्न प्रकार से पर्यावरण संबंधी मामलों को देखते तथा समझते हैं । उनकी अपनी-अपनी रुचियाँ तथा विचारधाराएँ पर्यावरण सम्बन्धी मतभेद पैदा कर देती हैं। इस अर्थ में पर्यावरण संकट की जड़ें सामाजिक असमानताओं में देखी जा सकती हैं।

अतः पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने का एक तरीका पर्यावरण तथा समाज के आपसी सम्बन्धों में परिवर्तन है। विभिन्न समूहों के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन विभिन्न ज्ञान व्यवस्थाओं और भिन्न ज्ञान तंत्र को जन्म देगा जो पर्यावरण का प्रबंधन सुचारु रूप से कर करेगा।

→ वर्षा नहीं, परन्तु बर्फ और पानी के क्रीड़ास्थल-जलरहित विदर्भ में जल के मनोरंजन एवं क्रीड़ास्थलों की बढ़ती संख्या; फन एंड फूड विलेज, वॉटर एण्ड एम्युजमैंट पार्क–बाजार, गांव, ग्राम पंचायत, नागपुर (देहात) जिला--पानी की भीषण कमी से जूझते हुए विदर्भ क्षेत्र में इस प्रकार की मनोरंजन तथा क्रीड़ास्थली की संख्या दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जिन गाँवों में ये क्रीड़ास्थल हैं, वे गाँव स्वयं पानी की भीषण कमी से जूझ रहे हैं।

पानी की घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहाँ की महिलाओं को प्रतिदिन 15 किमी. की दूरी तय करनी पड़ती है। यहाँ बिजली मिलने की स्थिति भी खराब है। इससे लोगों के काम-काज तथा स्वास्थ्य पर काफी खराब असर पड़ा है। लेकिन ये मनोरंजन तथा क्रीड़ास्थल गांव की इन दशाओं से अप्रभावित रहते हैं। यहाँ 24 घंटे बिजली मिलती है तथा पानी की कोई कमी नहीं रहती है। पानी का प्रयोग जलक्रीड़ा के साथ-साथ, बाग-बगीचों के रख-रखाव, सफाई तथा दर्शकों के प्रयोग के लिए किया जाता है। यह पानी तथा धन की बर्बादी है। एक तरफ बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी की कोई व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई है और दूसरी तरफ जनता के इन संसाधनों का प्रयोग निजी लाभ को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है।
इस कारण इन सूखाग्रस्त कृषि इलाकों के किसान अपना जीवन अत्यधिक विपदाओं से घिरा पा रहे हैं। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के हजारों किसानों ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली।

→ किसानों की चिंताजनक स्थिति के कारण किसानों की चिंताजनक स्थिति के लिए मुख्यतः दो कारण उत्तरदायी हैं

  • पर्यावरण का गलन और
  • आर्थिक कारण।

(1) पर्यावरण का गलन-पर्यावरण के गलन के कारण प्रदेश में पानी की अत्यधिक कमी हो गई है। पर्याप्त वर्षा न होने के कारण जलस्तर नीचे चला गया है। किसानों के लिए सिंचाई की कीमत बढ़ती जा रही है।

(2) आर्थिक कारण-किसान विश्व के बाजारों के उतार-चढ़ाव के सीधे चपेट में आ गया है। इससे छोटे किसानों को दी जाने वाली सहायता (मुक्त बाजार नीतियों के कारण) कम होती जा रही है। कपास की खेती के लिए सिंचाई की आवश्यकता है, इसमें कीड़े लगने की संभावना भी रहती है। इसलिए सिंचाई तथा कीटनाशकों की आवश्यकता है। ये दोनों वस्तुएँ काफी कीमती हो गई हैं। बड़े किसानों ने गहरी खुदाई कर पानी के स्तर को नीचा कर दिया है। अतः छोटे किसानों को इनके लिए व्यापारियों से ऋण लेना पड़ रहा है। ऐसे में यदि पैदावार नष्ट हो जाती है तो न तो वे ऋण की रकम वापस कर पाते हैं और न पारिवारिक दायित्वों को पूरा कर पाते हैं। फलतः वे आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं।

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→ शहरी पर्यावरण-दो शहरों की कहानी
एक तरफ उत्तरी दिल्ली का अशोक विहार का पॉश इलाका है और दूसरी तरफ वजीरपुर झुग्गी-झोंपड़ियों की बस्ती है। इन दोनों क्षेत्रों के बीच एक पार्क है। अशोक विहार के निवासी इसे साफ-सुथरा, हरा-भरा सैर-सपाटे के लए उपयुक्त स्थान बनाना चाहते हैं तो वजीरपुर की बस्ती के लोगों के लिए शौचालय के रूप में इसकी आवश्यकता है। इसी बात को लेकर दोनों बस्तियों के लोगों में आये दिन संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि

जैसे-जैसे नगरों का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे स्थान के लिए मतभेद और बढ़ते जा रहे हैं। यथा

  • एक ओर जहाँ प्रवासी काम की तलाश में शहर आते हैं और कानूनी तौर पर रहने का सीमित स्थान उनके सामर्थ्य के बाहर होता है, वहीं दूसरी ओर वे सरकारी जमीन पर बसने के लिए मजबूर होते हैं।
  • शहरों में इस प्रकार की जमीन की माँग काफी बढ़ गई है ताकि समृद्ध वर्ग के लिए यहाँ बड़ी-बड़ी बहुमंजिली दुकानें, होटल, दर्शनीय स्थल बनाये जा सकें। परिणामस्वरूप गरीब मजदूर और उनके परिवारों को शहरों से | दूर निकाल फेंका गया और उनके घरों को तोड़ दिया गया।
  • जमीन के अतिरिक्त हवा तथा पानी भी इस शहरी पर्यावरण में महत्त्वपूर्ण प्रतियोगी के रूप में उभर कर सामने आए हैं।
Prasanna
Last Updated on Sept. 1, 2022, 11:16 a.m.
Published Sept. 1, 2022