RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

Rajasthan Board RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला Important Questions and Answers.

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RBSE Class 12 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

बहुचयनात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
अशोक द्वारा निर्मित कराए गए स्तंभ किसके बने हुए हैं?
(अ) पक्की ईंटों के 
(ब) मिट्टी के
(स) पत्थर के 
(द) संगमरमर के 
उत्तर:
(स) पत्थर के

प्रश्न 2.
स्तंभ के किस भाग पर पशुओं की मूर्तियाँ अंकित हैं?
(अ) चोटी पर 
(ब) सम्पूर्ण स्तंभ पर
(स) मध्य भाग पर 
(द) तल पर
उत्तर:
(अ) चोटी पर

प्रश्न 3.
अशोक द्वारा निर्मित कौनसा स्तंभ मौर्यकालीन मूर्तिकला की दृष्टि से अद्वितीय है?
(अ) रामपरवा का स्तंभ 
(ब) सारनाथ का सिंह शीर्ष
(स) बखीरा का स्तंभ 
(द) इलाहाबाद का स्तंभ
उत्तर:
(ब) सारनाथ का सिंह शीर्ष

प्रश्न 4.
सारनाथ के सिंह शीर्ष पर कितने सिंह पीठ से पीठ मिलाए आसीन हैं?
(अ) 8 
(ब) 4
(स) 2 
(द) 5
उत्तर:
(ब) 4

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

प्रश्न 5.
मौर्यकालीन यक्ष एवं यक्षिणियों की मूर्तियाँ किस परम्परा से संबंधित हैं?
(अ) व्यावसायिक 
(ब) राजकीय संरक्षण
(स) लोक परम्परा 
(द) बौद्ध परम्परा
उत्तर:
(स) लोक परम्परा

प्रश्न 6.
चामरग्राहिणी की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है?
(अ) इलाहाबाद से 
(ब) बनारस से
(स) पाटलीपुत्र से 
(द) दीदारगंज से
उत्तर:
(द) दीदारगंज से

प्रश्न 7.
दीदारगंज से प्राप्त मूर्ति किसकी है?
(अ) बौद्ध भिक्षु की 
(ब) यक्षिणी की
(स) दासी की 
(द) सम्राज्ञी की
उत्तर:
(ब) यक्षिणी की

प्रश्न 8.
सांची के स्तूप का निर्माण ईंटों से किसने करवाया था?
(अ) चन्द्रगुप्त मौर्य 
(ब) अशोक
(स) बिन्दुसार 
(द) बृहद्रथ
उत्तर:
(ब) अशोक

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

प्रश्न 9.
सांची का स्तूप स्थित है-
(अ) भोपाल के समीप
(ब) ग्वालियर के समीप
(स) रायपुर के समीप
(द) पटना के समीप
उत्तर:
(अ) भोपाल के समीप

प्रश्न 10.
सांची के स्तूप के तोरणों पर किससे संबंधित अनेक प्रतीक चिह्न अंकित किए गए हैं?
(अ) अशोक
(ब) प्रसेनजित
(स) बुद्ध 
(द) महावीर स्वामी 
उत्तर:
(स) बुद्ध

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. मौर्यकालीन स्तंभ ................... से कटे हुए स्तंभ हैं।
2. मौर्यकालीन प्रस्तर स्तंभों पर ............... उत्कीर्ण किए गए थे।
3. सारनाथ में पाया गया मौर्यकालीन स्तंभ शीर्ष आज हमारा ................. प्रतीक है।
4. यक्षिणी की प्रतिमा का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण ..................... पटना में देखा जा सकता है।
5. ओडिशा में धौली स्थल पर चट्टान को काटकर बनाए गए एक ....................... की आकृति भी मूर्तिकला में सुन्दरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
6. बिहार में बाराबार की पहाड़ियों में शैलकृत गुफा को ........................... की गुफा कहते हैं।
7. ..................... अधिकतर बुद्ध के स्मृति चिह्नों पर बनाए जाते थे।
8. पटना के दीदारगंज में मिली यक्षिणी की मूर्ति ....................... की बनी है।
उत्तर:
1. चट्टानों
2. शिलालेख
3. राष्ट्रीय
4. दीदारगंज
5. विशाल हाथी
6. लोमष ऋषि
7. स्तूप 
8. बलुआ पत्थर

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

निम्नलिखित में सत्य/असत्य कथन छाँटिए-

1. मौर्य सम्राटों में अशोक ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बौद्धों की श्रमण परम्परा को संरक्षण दिया था।
2. मौर्यकालीन स्तंभ राजमिस्त्री द्वारा अनेक टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए थे।
3. लोमष ऋषि की गुफा मौर्यकाल का इस तरह का एक अलग अकेला उदाहरण है।
4. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक बुद्ध को प्रतीकों-जैसे कि पदचिह्नों, स्तूपों, कमलसिंहासन, चक्र आदि के रूप में दर्शाया गया है।
5. जातक कथाएँ स्तंभों पर शिलालेखों में उत्कीर्ण की गई हैं।
उत्तर:
1. सत्य
2. असत्य
3. सत्य
4. सत्य
5. असत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइए-

1. जातक कथाएँ

(अ) मौर्य शासक

2. अशोक

(ब) सिंह शीर्ष स्तंभ

3. सारनाथ

(स) खड़ी यक्षिणी की आदमकद मूर्ति

4. लोमष ऋषि की गुफा

(द) विशाल हाथी आकृति की मूर्ति

5. दीदारगंज

(य) भगवान बुद्ध

6. धौली स्थल

(र) बाराबार की पहाड़ियों में शैलकृत गुफा

उत्तर:

1. जातक कथाएँ

(य) भगवान बुद्ध

2. अशोक

(अ) मौर्य शासक

3. सारनाथ

(ब) सिंह शीर्ष स्तंभ

4. लोमष ऋषि की गुफा

(र) बाराबार की पहाड़ियों में शैलकृत गुफा

5. दीदारगंज

(स) खड़ी यक्षिणी की आदमकद मूर्ति

6. धौली स्थल

(द) विशाल हाथी आकृति की मूर्ति

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
अशोक के स्तंभ किस पत्थर के बने हैं?
उत्तर:
अशोक के स्तंभ बलुआ पत्थर के बने हैं।

प्रश्न 2.
मौर्यकालीन स्तंभ एकैमेनियम स्तंभों से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर:
मौर्यकालीन स्तंभ चट्टानों से कटे एक विशाल पत्थर से बने स्तंभ हैं जबकि एकैमेनियम स्तंभ राजमिस्त्री द्वारा अनेक टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए थे।

प्रश्न 3.
मौर्यकालीन स्तंभों पर क्या उत्कीर्ण किए गए थे?
उत्तर:
मौर्यकालीन स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण किए गए थे।

प्रश्न 4.
अशोक द्वारा निर्मित चार प्रमुख स्तंभों के नाम लिखिए। 
उत्तर:

  • बिहार में बसराह--बखीरा शीर्ष स्तंभ,
  • लौरिया-नंदनगढ़ का स्तंभ,
  • रामपुरवा का सिंहशीर्ष स्तंभ
  • सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ 

प्रश्न 5.
मौर्यकालीन मूर्ति परम्परा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कौनसा है?
उत्तर:
सारनाथ में पाया गया 'सिंह-शीर्ष स्तंभ' मौर्यकालीन मूर्ति परम्परा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

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प्रश्न 6.
मौर्यकालीन कौनसा शिल्प भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है?
उत्तर:
सारनाथ का सिंह-शीर्ष स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

प्रश्न 7.
सारनाथ का सिंह-शीर्ष स्तंभ बुद्ध जीवन की किस ऐतिहासिक घटना का द्योतक है? 
उत्तर:
यह स्तंभ भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश देने की ऐतिहासिक घटना की स्मृति में सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था।

प्रश्न 8.
सारनाथ स्तंभ की गोलाकार बेदी कितने सिंहों की आकृतियाँ हैं और वे किस अवस्था में हैं?
उत्तर:
सारनाथ स्तंभ की गोलाकार बेदी पर दहाड़ते हुए चार शेरों की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ स्थापित हैं।

प्रश्न 9.
सारनाथ स्तंभ की गोलाकार बेदी के निचले भाग में क्या उकेरा गया है? 
उत्तर:
सारनाथ स्तंभ की गोलाकार बेदी के निचले भाग में घोड़ा, सांड, हिरन आदि को गतिमान मुद्रा में उकेरा गया है। 

प्रश्न 10.
चामर ग्राहिणी की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है? यह किसकी मूर्ति है?
उत्तर:
चामर ग्राहिणी की मूर्ति पटना के निकट दीदारगंज से प्राप्त हुई है। यह एक यक्षिणी की मूर्ति है।

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प्रश्न 11.
मौर्यकालीन दो प्रमुख मूर्ति शिल्पों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • सारनाथ का सिंह-शीर्ष स्तंभ
  • दीदारगंज से प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति।

प्रश्न 12.
ओडिशा में धोली स्थल पर किसकी मूर्ति है और उसकी क्या विशेषता है? 
उत्तर:
ओडिशा में धोली स्थल पर चट्टान को काटकर बनाई गई एक विशाल हाथी की मूर्ति है जो मूर्तिकला में रेखांकन लय पारखी की सुन्दरता का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

प्रश्न 13.
ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में कला के क्षेत्र में कौन कौनसे कार्य हुए? 
उत्तर:
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में, यक्ष-यक्षिणियों और पशुओं की विशाल मूर्तियाँ बनाई गईं, शीर्षाकृतियों वाले प्रस्तर स्तंभ बनाए व स्थापित किए गए तथा चट्टानों को काटकर गुफाएँ बनाई गईं। 

प्रश्न 14.
मौर्यकाल की कौनसी गुफा एक अलग अकेला उदाहरण है?
उत्तर:
लोमष ऋषि की गुफा मौर्य काल का एक अलग अकेला उदाहरण है।

प्रश्न 15.
बुद्ध के स्मृति चिह्नों पर बनाए गए किन्हीं दो स्तूपों का उल्लेख कीजिए। 
उत्तर:
बुद्ध के स्मृति चिह्नों पर बने दो स्तूप ये हैं:

  • बिहार में राजगृह का स्तूप तथा
  • नेपाल में कपिलवस्तु का स्तूप। 

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

प्रश्न 16.
बुद्ध के अवशेषों पर बने दो स्तूप कहाँ बने हुए हैं?
उत्तर:
बुद्ध के अवशेषों पर बने स्तूप-

  • अवंती और
  • गांधार जैसे स्थानों पर बने हुए हैं।

प्रश्न 17.
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का एक स्तूप राजस्थान में कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की स्तरीय संरचना का एक स्तूप राजस्थान में बैराठ स्थल पर स्थित है।

प्रश्न 18.
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक बुद्ध को किस रूप में दर्शाया गया है? 
उत्तर:
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक बुद्ध को प्रतीकों, जैसे कि-पदचिह्नों, स्तूपों, कमल सिंहासन, चक्र आदि के रूप में दर्शाया गया है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
मौर्यकालीन शासन काल कौनसा था तथा इस काल में किन-किन पूजा पद्धतियों व धर्मों का प्रचलन रहा? 
उत्तर:
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक मौर्यों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी तक भारत का बहुत बड़ा हिस्सा मौर्यों के नियंत्रण में आ गया था। मौर्य सम्राटों में अशोक एक अत्यन्त शक्तिशाली राजा हुआ, जिसने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बौद्धों की श्रमण परम्परा को संरक्षण दिया था।

मौर्य काल में यक्ष और मातृदेवियों की पूजा भी काफी प्रचलित थी। इस काल में सनातन धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म प्रचलित रहे । यक्ष पूजा बौद्ध धर्म के आगमन (ईसा पूर्व छठी शताब्दी) से पहले और उसके बाद भी काफी लोकप्रिय रही लेकिन आगे चलकर यह बौद्ध और जैन धर्मों में विलीन हो गई।

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

प्रश्न 2.
मौर्यकालीन वास्तुकला के प्रमुख अंगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मौर्यकालीन वास्तुकला-मौर्य काल में बौद्ध एवं जैन धर्म का उभार हुआ। इस काल की वास्तुकला पर इन धर्मों का प्रभाव रहा। यथा-

  • मठ के सम्बन्ध में स्तूपों और विहारों का निर्माण इस श्रमण परम्परा का एक अंग हो गया।
  • इस कलावधि में स्तूपों और विहारों के अलावा, अनेक स्थानों पर पत्थर के स्तंभ बनाए गए।
  • इस काल में चट्टानें काटकर गुफाएँ और विशाल मूर्तियाँ बनाई गईं।

प्रश्न 3.
मौर्यकालीन स्तंभों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मौर्यकालीन स्तंभों की प्रमुख विशेषताएँ-

  • मौर्यकालीन स्तंभ चट्टानों से कटे हुए (एक विशाल पत्थर से बने हुए) स्तंभ हैं।
  • मौर्यकालीन स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण किए गए हैं। 
  • इन स्तंभों की चोटी पर सांड, शेर, हाथी जैसे जानवरों की आकृति उकेरी गई है। ये आकृतियाँ हृष्ट-पुष्ट हैं और उन्हें एक वर्गाकार या गोल वेदी पर खड़ा उकेर! गया है। 
  • गोलाकार वेदियों को सुन्दर कमल-फूलों से सजाया गया है।

प्रश्न 4.
सारनाथ में पाये गये मौर्यकालीन स्तंभ शीर्ष के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सारनाथ-सिंह शीर्ष स्तंभ का महत्त्व-

  • सारनाथ में पाया गया मौर्यकालीन स्तंभ शीर्ष, जो कसह शीर्ष के नाम से प्रसिद्ध है, मौर्यकालीन मूर्ति परम्परा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
  • वर्तमान में यह हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है।
  • यह बड़ी सावधानी से उकेरा गया है। इसकी गोलाकार वेदी पर दहाड़ते हुए चार शेरों की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ हैं और उस वेदी के निचले भाग में घोड़ा, सांड, हिरन आदि को गतिमान मुद्राओं में उकेरा गया है। इसमें मूर्तिकार के उत्कृष्ट कौशल की साफ झलक दिखाई देती है।
  • यह स्तंभ शीर्ष धम्म चक्र प्रवर्तन का मानक प्रतीक है और बुद्ध के जीवन की एक महान ऐतिहासिक घटना का द्योतक है।

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प्रश्न 5.
सारनाथ में पाए गए मौर्यकालीन सिंह शीर्ष के मूलतः कितने अवयव/भाग थे?
उत्तर:
सारनाथ में पाए गए मौर्यकालीन सिंह शीर्ष के मूलतः पाँच अवयव/भाग थे। यथा-

  • स्तंभ, जो अब कई भागों में टूट चुका है।
  • एक कमल घटिका आधार।
  • उस पर बना हुआ एक ढोल, जिसमें चार पशु दक्षिणावर्त गति के साथ दिखाए गए हैं।
  • चार तेजस्वी सिंहों की आगे-पीछे जुड़ी हुई आकृतियाँ।
  • एक सर्वोपरि तल धर्मचक्र, जो कि एक पहिया है। यह चक्र इस समय टूटी हालत में है।

प्रश्न 6.
सारनाथ सिंह शीर्ष में दर्शाए गए चार शेरों की कलात्मक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सारनाथ सिंह शीर्ष के चार शेरों की कलात्मक विशेषताएँ-

  • शेरों की चारों आकृतियाँ अत्यन्त प्रभावशाली एवं ठोस हैं।
  • शेरों के चेहरे पर पेशी विन्यास बहुत सुदृढ़ प्रतीत होता है। 
  • होंठों की विपर्यस्त रेखाएँ और होंठों के अन्त में उनके फैलाव का प्रभाव मुख का स्वाभाविक चित्रण करता है। ऐसा मालूम होता है मानों शेरों ने अपनी सांस भीतर रोक रखी है।
  • प्रतिमा की सतह को अत्यधिक चिकना या पालिश किया हुआ बनाया गया है।
  • शेरों की घंघराली अयाल राशि आगे निकली हुई दिखाई गई है।
  • शेरों के शरीर के भारी बोझ को पैरों की फैली हुई मांसपेशियों के माध्यम से बखूबी दर्शाया गया है।

प्रश्न 7.
सारनाथ सिंह शीर्ष के धर्मचक्र की कलात्मक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सिंह शीर्ष के धर्मचक्र की कलात्मक विशेषताएँ-

  • चक्र का यह स्वरूप सम्पूर्ण बौद्ध कला में धर्मचक्र के निरूपण के लिए महत्त्वपूर्ण बन गया है।
  • प्रत्येक पशु आकृति सतह से जुड़ी होने के बावजूद काफी विस्तृत है और उनकी मुद्रा गतिमान प्रतीत होती है।
  • प्रत्येक चक्र के बीच में सीमित स्थान होने के बावजूद इन पशु आकृतियों से ऐसा प्रतीत होता है कि कलाकार में सीमित स्थान में भी कला को दर्शाने की पर्याप्त क्षमता थी।

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प्रश्न 8.
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ कहाँ पायी गई हैं तथा उनकी क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में पटना, विदिशा और मथुरा जैसे अनेक स्थलों पर यक्षों तथा यक्षिणियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ पाई गई हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  • ये विशाल प्रतिमाएँ अधिकतर खड़ी स्थिति में दिखाई गई हैं।
  • इन सभी प्रतिमाओं की सतह पालिश की हुई अर्थात् चिकनी हैं।
  • इनके चेहरों पर प्रकृति विज्ञान की निपुणता एवं स्पष्टता दिखाई देती है और अंग-प्रत्यंग का उभार स्पष्ट दिखाई देता है।
  • यक्षिणी की प्रतिमा का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण दीदारगंज (पटना) में देखा जा सकता है। यह एक लम्बी, ऊँची और सुगठित प्रतिमा है। इसकी सतह चिकनी है तथा रूपाकृति सुंदर तथा संवेदनशील है।

प्रश्न 9.
मौर्यकाल में पशुओं की विशाल मूर्तियाँ बनाई गई। एक उदाहरण देकर इस कथन को स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
मौर्यकाल में पशुओं की विशाल मूर्तियों तथा चट्टानों को काटकर गुफाएँ बनायी गईं। इसे निम्न उदाहरणों से स्पष्ट किया जा सकता है-

धोली स्थल पर विशाल हाथी-ओडिशा में धोली स्थल पर चट्टान को काटकर बनाए गए विशाल हाथी की आकृति मूर्तिकला में रेखांकन लय पारखी की सुन्दरता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पर सम्राट अशोक का एक शिलालेख भी अंकित है। 
RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला 1
चित्र : हाथी धौली

प्रश्न 10.
मौर्यकाल में चट्टानों को काटकर गुफाएँ भी बनाई गईं। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। 
अथवा
लोमष ऋषि की गुफा का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
मोर्यकाल में चट्टानों को काटकर गुफाएँ भी बनाई गईं। इसका प्रमुख उदाहरण लोमष ऋषि की गुफा है। बिहार में बारबार की पहाड़ियों में चट्टान को काटकर शैलकृत गुफा बनाई गई है, जिसे लोमष ऋषि की गुफा कहते हैं । इस गुफा के प्रवेशद्वार पर अर्द्धवृत्ताकार चैत्य चाप (मेहराब) की तरह सजा हुआ है। चैत्य के मेहराब पर एक गतिमान हाथी की प्रतिमा उकेरी हुई है। इस गुफा का भीतरी कक्ष आयताकार है और उसके पीछे एक गोलाकार कक्ष है। प्रवेशद्वार पर बड़े कक्ष की तरफ एक दीवार है। यह गुफा मौर्य सम्राट अशोक द्वारा आजीविक पंथ/संप्रदाय के लिए संरक्षित की गई थी। 

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प्रश्न 11.
मौर्यकाल में अधिकतर स्तूप किस पर बनाए जाते थे? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
मौर्यकाल में अधिकतर स्तूप बुद्ध के स्मृति चिह्नों पर बनाए जाते थे। ऐसे अनेक स्तूप बिहार में राजगृह, वैशाली, वेथदीप एवं पावा, नेपाल में कपिलवस्तु, अल्लकप्पा एवं रामग्राम और उत्तर प्रदेश में कुशीनगर एवं पिप्पलिवन में स्थापित हैं। धार्मिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि बुद्ध के अनेक अवशेषों पर भी स्तूप बनाए जाते थे। ऐसे स्तूप अवंती और गांधार जैसे स्थानों पर बने हुए हैं, जो गंगा की घाटी के बाहर बसे हुए थे। 

प्रश्न 12.
स्तूपों के निर्माणकर्ता एवं संरक्षक के सम्बन्ध में क्या अभिलेखीय साक्ष्य मिलते हैं? 
उत्तर:
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के दौरान और उसके बाद हमें स्तूपों के निर्माण और संरक्षक के सम्बन्ध में निम्नलिखित साक्ष्य मिले हैं-

  • हमें ऐसे अनेक अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं जिनमें दानदाताओं का नाम और कहीं-कहीं तो उनके पेशे का नाम भी दिया गया है। व्यापारीजन अपने दान का अभिलेख लिखवाते समय अपने मूल स्थान का भी उल्लेख करवाते थे।
  • इन स्तूपों के राजसी संरक्षण के उदाहरण कम मिलते हैं। संरक्षकों में आम भक्तों से लेकर गृहपति और राजा-महाराजा भी शामिल हैं।
  • ऐसे अभिलेख बहुत कम पाए गए हैं जिनमें कलाकारों या शिल्पकारों का नाम दिया गया हो। कुछ अभिलेखों में शिल्पकारों की श्रेणियों का भी उल्लेख है।

प्रायः स्तूप निर्माण का सम्पूर्ण कार्य सामूहिक सहयोग से किया जाता था, लेकिन कहीं-कहीं स्मारक के किसी खास हिस्से का निर्माण खास संरक्षक के सौजन्य से कराए जाने का भी उल्लेख है। 

प्रश्न 13.
मौर्यकाल में बौद्ध-धर्म में पूजा या आराधना की पद्धति किस प्रकार की थी?
उत्तर:
ईसा पूर्व दसरी शताब्दी तक हमें बद्ध की प्रतिमाओं या आकतियों के दर्शन नहीं होते। बद्ध को प्रतीकों. जैसे-पदचिन्हों, स्तूपों, कमल सिंहासन, चक्र आदि के रूप में ही दर्शाया गया है। यह दर्शाता है कि इस समय तक पूजा या आराधना की पद्धति सरल थी और कभी-कभी उनके जीवन की घटनाओं को चित्रात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता था। जातक कथा या बुद्ध के जीवन की किसी घटना का वर्णन बौद्ध परम्परा का अभिन्न अंग बन गया था।

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
मौर्यकालीन सारनाथ के सिंह शीर्ष स्तंभ की कलात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ
वाराणसी के निकट सारनाथ में लगभग एक सौ वर्ष पहले खोजे गए ‘सिंह शीर्ष' को आमतौर पर 'सारनाथ सिंह शीर्ष' कहा जाता है। यह मौर्यकालीन मूर्तिकला का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। यह भगवान बुद्ध द्वारा प्रथम उपदेश देने की ऐतिहासिक घटना की स्मृति में सम्राट अशोक के द्वारा बनवाया गया था।

मुख्य भाग-इस सिंह शीर्ष के मूलतः पांच भाग थे-

  • स्तंभ-यह अब कई भागों में टूट चुका है।
  • एक कमल घंटिका आधार।
  • उस पर बना हुआ एक ढोल, जिसमें चार पशु दक्षिणावर्त गति के साथ दिखाए गए हैं।
  • चार तेजस्वी सिंहों के आगे-पीछे जुड़ी हुई आकृतियाँ।
  • एक सर्वोपरि तल धर्मचक्र, जो कि एक बड़ा पहिया है। यह चक्र इस समय टूटी हालत में है।

'इस सिंह शीर्ष को, उपरिचक्र और कमलाधार के बिना, स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया है। 

स्मारकीय विशेषताएँ-इसकी स्मारकीय विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-
(1) चार सिंह-इस सिंह शीर्ष पर बनी एक वेदी पर चार सिंह एक-दूसरे से पीठ जोड़कर बैठाए गए हैं। शेरों की चारों आकृतियाँ अत्यंत प्रभावशाली एवं ठोस हैं।

  • शेरों के चेहरे पर पेशी विन्यास बहुत सुदृढ़ प्रतीत होता है।
  • होठों की विपर्यस्त रेखाएँ और होठों के अन्त में उनके फैलाव का प्रभाव यह दर्शाता है कि कलाकार की अपनी सूक्ष्म दृष्टि शेर के मुख का स्वाभाविक चित्रण करने में सफल रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शेरों ने अपने भीतर सांस रोक रखी है।
  • अयाल की रेखाएँ तीखी हैं और उनमें प्रचलित परंपराओं का पालन किया गया है।
  • प्रतिमा की सतह को अत्यधिक चिकना या पॉलिश किया हुआ बनाया गया है।
  • शेरों की धुंघराली अयाल राशि आगे निकली हुई दिखाई गई है तथा शेरों के शरीर के भारी बोझ को पैरों की फैली हुई मांसपेशियों के माध्यम से बखूबी दर्शाया गया है।

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(2) महाचक्र-सिंह शीर्ष के शीर्ष फलक पर एक चक्र बना हुआ है जिसमें चारों दिशाओं में फैले हुए कुल मिलाकर 24 आरे हैं और प्रत्येक चक्र के साथ सांड, घोड़ा, हाथी और शेर की आकृतियाँ सुन्दरता से उकेरी गई हैं। इसकी कलात्मक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  • चक्र का यह स्वरूप संपूर्ण बौद्ध कला में धम्मचक्र के निरूपण के लिए महत्त्वपूर्ण बन गया है।
  • प्रत्येक पशु आकृति सतह से जुड़ी होने के बावजूद काफी विस्तृत है और उनकी मुद्रा गतिमान प्रतीत होती है।
  • प्रत्येक चक्र के बीच में सीमित स्थान होने के बावजूद इन पशु आकृतियों से ऐसा प्रतीत होता है कि कलाकार में सीमित स्थान में भी दर्शाने की पर्याप्त क्षमता थी।

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(3) वृत्ताकार शीर्ष फलक-वृत्ताकार शीर्ष फलक एक उल्टे कमल की आकृति पर टिका हुआ दिखाई देता है।

  • कमल पुष्प की प्रत्येक पंखुड़ी को उसकी सघनता को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।
  • नीचे के हिस्से में वक्र तलों को सुंदरता से उकेरा गया है।
  • एक स्तंभ की आकृति होने के कारण यह समझा गया था कि इसे चारों ओर से देखा जाएगा। इसलिए दृष्टि बिंदुओं की कोई निश्चित सीमाएँ नहीं रखी गई हैं।
  • मौर्यकालीन कलाकारों ने उल्टे कमल को पृथ्वी का परिचायक माना है और सिंह, हाथी, अश्व, बैल आदि चिह्नों के रूप में अशोक के उदार विचारों को प्रतीकात्मक रूप में उत्कीर्ण किया है।

RBSE Class 11 Drawing Important Questions Chapter 3 मौर्य कालीन कला 4

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प्रश्न 2.
मौर्यकालीन दीदारगंज की यक्षिणी की मूर्ति का वर्णन करते हुए इसकी कलात्मक विशेषताओं को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
यक्षिणी (दीदारगंज) की मूर्ति
दीदारगंज (पटना) में मिली एक यक्षिणी की आदमकद मूर्ति मौर्यकालीन मूर्ति परम्परा का एक अच्छा उदाहरण है। यह मूर्ति पटना के संग्रहालय में रखी हुई है।

विशेषताएँ-इस मूर्ति की प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
(1) यह यक्षिणी की मूर्ति लगभग 5 फीट 6 इंच ऊँची है तथा बलुआ पत्थर की बनी है। इसकी सतह पालिश की हुई (चिकनी) है।
(2) यक्षिणी को दाहिने हाथ में चौरी (चामर) पकड़े हुए दिखाया गया है तथा दूसरा हाथ टूटा हुआ है।
(3) चेहरा एवं कपोल गोल-गोल और मांसल दिखाए गए हैं लेकिन गर्दन अपेक्षाकृत छोटी है।
(4) यक्षिणी हाथ की कलाई में चूड़ियाँ तथा कंगन पहने हैं, केश राशि गुंथी हुई है।
(5) गले में एकावली पड़ी है तथा दो लड़ियों से युक्त मोतियों का हार पुष्ट गोल स्तनों के मध्य झूल रहा है।
(6) कमर में पाँच लड़ियों वाली करधनी पहने हुई हैं।
(7) वह पैरों में मोटे कड़े के आभूषण पहने हुई हैं तथा अपनी टांगों पर मजबूती से खड़ी हैं। 
(8) शरीर के ऊपरी भाग को ढकता हुआ एक पारदर्शक वस्त्र बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी भुजा के नीचे पैर तक फैला हुआ है। पेट पर पहनी हुई चुश्त पोशाक के कारण पेट आगे निकला हुआ प्रतीत होता है।
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चित्र : यक्षिणी, दीदारगंज
(9) धड़ भाग का भारीपन उसके भारी उरोजों से दृष्टिगोचर होता है। पीठ खुली हुई है और पीछे का वस्त्र दोनों टाँगों को ढकता है।
(10) पोशाक की मध्यवर्ती पट्टी ऊपर से नीचे तक उसकी टाँगों तक गिर रही है तथा टाँगों पर पोशाक का हर मोड़ बाहर निकला हुआ दिखाया गया है।

कलात्मक विशिष्टताएँ-

  • यक्षिणी की यह मूर्ति अपने आदमकद प्रतिमारूप तथा अद्भुत गतिशीलता के कारण विशेष महत्व रखती है।
  • यह मूर्ति ओपदार (पॉलिश की हई चिकनी) है जो अशोककालीन मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • अत्यन्त कोमल व तरल प्रवाहयुक्त, मोहक व कमनीय यक्षिणी रूप लिए यह मूर्ति भारतीय शिल्पकला की विशिष्ट नारी मूर्ति है।
  • इस प्रतिमा के रूप और माध्यम के प्रयोग में कुशलता बरती गयी है। गोल गठीली काया के प्रति मूर्तिकार की संवेदनशीलता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। साथ ही इसमें सौष्ठव और लालित्य के दर्शन भी होते हैं।
  • मूर्ति के अधोभाग में वस्त्र की सलवटों को दिखाने के लिए लहरियादार गहरी रेखाएँ बनाई गई हैं। टाँगों पर पोशाक का हर मोड़ बाहर निकलता हुआ दिखाया गया है, जो कुछ पारदर्शी प्रभाव उत्पन्न करता है।
  • जाँघ से नीचे की तरफ पतले होते हुए पैर, ग्रीवा की सुडौलता तथा उसके हल्के झुकाव के माध्यम से गति संचार लिए मूर्ति का सौंदर्य और भी निखरकर प्रस्तुत हुआ है।
  • दाहिने हाथ में पकड़ी हुई चौरी को प्रतिमा की पीठ पर फटी रेखाओं के रूप में दिखाना उसकी स्वाभाविकता को दर्शाता है। 

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प्रश्न 3.
मौर्यकालीन स्तंभों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
अथवा
मौर्यकालीन स्तंभ कला पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
मौर्यकालीन स्तंभों की प्रमुख विशेषताएँ
स्तंभ निर्माण की परंपरा बहुत पुरानी है और यह देखने में आया है कि एकैमेनियम साम्राज्य में भी विशाल स्तंभ बनाए जाते थे लेकिन मौर्यकालीन स्तंभ एकैमेनियम स्तंभों से भिन्न किस्म के हैं। मौर्यकालीन स्तंभों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) चट्टानों से काटकर बनाए गए स्तंभ-मौर्यकालीन स्तंभ चट्टानों से कटे हुए (एक विशाल पत्थर से बने हुए) स्तंभ हैं, जिनमें उत्कीर्णकर्ता कलाकार का कौशल स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि एकैमेनियम स्तंभ राजमिस्त्री द्वारा अनेक टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए थे।

(2) शिलालेख-मौर्यकाल में प्रस्तर स्तंभ सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य में कई स्थानों पर स्थापित किए गए थे और उन पर शिलालेख उत्कीर्ण किए गए थे।

(3) स्तंभों की बनावट-मौर्यकालीन स्तंभों के दण्ड गोलाकार हैं व नीचे से ऊपर ताड़ वृक्ष की तरह चढ़ाव-उतारदार हैं। स्तंभों के ऊपर के परगहों को निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है-

  • मेखला-यह इकहरी या दोहरी रहती है जो लाट के ठीक ऊपर होती है। 
  • वेदी (बैठकी)-मेखला के ऊपर एक वर्गाकार या गोल वेदी होती है। गोलाकार वेदियों को उल्टी कमल पंखुड़ियों की अलंकारिक आकृति से युक्त किया गया है।
  • कंठा-वेदी के ऊपर फिर एक कंठा बना होता है।
  • चौकी-कंठे के ऊपर गोल या चौकोर चौकी (वेदी) बनी रहती है।
  • शीर्ष-ऐसे स्तंभों के शीर्ष (चोटी) पर सांड, शेर, हाथी जैसे जानवरों की आकृति उकेरी गई है। सभी शीर्ष आकृतियाँ हृष्ट-पुष्ट हैं।

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चित्र : सजावटी कमल सहित स्तंभ व शीर्ष 

कुछ प्रमुख शीर्ष स्तंभ-शीर्ष आकृतियों वाले प्रस्तर स्तंभों में से कुछ स्तंभ आज भी सुरक्षित हैं और बिहार में बसराह-बखीरा, लौरिया-नंदनगढ़ व रामपुरवा तथा उत्तर प्रदेश में सनकिसा व सारनाथ में देखे जा सकते हैं। यथा-

  • लौरिया-नंदनगढ़-लौरिया-नंदनगढ़ के स्तंभ की चौकी पर उभारदार उड़ते हुए हंस अंकित किए गए हैं तथा शीर्ष पर सिंह है।
  • रामपुरवा की चौकी पर कमल, मुकुन्द आदि बने हैं तथा शीर्ष पर वृषभ (बैल) है।
  • सारनाथ का स्तंभ-सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ मौर्यकालीन मूर्तिकला का सबसे प्रसिद्ध व उत्कृष्ठ स्तंभ है। यह बड़ी सावधानी से उकेरा गया है। इसकी गोलाकार बेदी (चौकी) पर दहाड़ते हुए चार शेरों की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ स्थापित हैं और चौकी के निचले भाग में घोड़ा, सांड, हिरन आदि को गतिमान मुद्रा में उकेरा गया है।

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प्रश्न 4.
मौर्यकालीन मूर्तिकला पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
मौर्यकाल-ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक मौर्यों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी तक भारत का बहुत बड़ा हिस्सा मौर्यों के नियंत्रण में आ गया था। मौर्य सम्राटों में अशोक अत्यन्त शक्तिशाली सम्राट हुआ जिसने बौद्धों की श्रमण परम्परा को संरक्षण दिया।

मौर्यकालीन मूर्तिकला
सम्राट अशोक के समय में मूर्तिकला का विकास अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसके समय में भारत में मूर्तिकला का स्वतंत्र कला के रूप में विकास हुआ। यथा-
(1) स्तंभ-मौर्यकाल में अनेक स्थानों पर पत्थर के स्तंभ बनाए गए, चट्टानें काटकर गुफाएं और विशाल मूर्तियाँ बनाई गईं । मौर्यकालीन स्तंभ चट्टानों से कटे स्तंभ हैं, जिनमें उत्कीर्णकर्ता कलाकार का कौशल दिखाई देता है। इन प्रस्तर स्तंभों को मौर्य साम्राज्य में कई स्थानों पर स्थापित किया गया तथा उन पर शिलालेख उत्कीर्ण किए गए। ऐसे स्तंभों की चोटी पर सांड, शेर, हाथी जैसे जानवरों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं तथा उन्हें एक वर्गाकार या गोल वेदी पर खड़ा उकेरा गया है। गोलाकार वेदियों को सुंदर उल्टे कमल के फूल की आकृति का बनाया गया है।

(2) यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ-ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में यक्ष-यक्षिणियों की विशाल मूर्तियाँ बनाई गईं। पटना, विदिशा और मथुरा जैसे अनेक स्थलों पर यक्ष-यक्षिणियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ पायी गई हैं जो अधिकतर खड़ी स्थिति में दिखाई गई हैं। अनेक ऐसे उदाहरण भी मिले हैं जिनसे पता चलता है कि सनातन धर्म/ हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी बनती रहीं।

इन सभी प्रतिमाओं की सतह पॉलिश की हुई यानि चिकनी है। इनके चेहरों पर स्वाभाविक निपुणता तथा स्पष्टता दिखाई देती है और अंग-प्रत्यंग का उभार स्पष्ट दिखाई देता है। यक्षिणी की प्रतिमा का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण दीदारगंज पटना में देखा जा सकता है। इस मूर्ति के अंग-प्रत्यंग सुडौल, भरे हुए व गोलाईयुक्त हैं। इसमें सौष्ठव एवं लालित्य के दर्शन भी होते हैं। वस्त्राभूषणों से युक्त चामरग्राहिणी अशोककालीन गरिमामय शिल्प का उदाहरण है। 

(3) अन्य प्रस्तर मूर्तियाँ-भारत के विभिन्न प्रान्तों में मौर्यकालीन अन्य प्रस्तर कलाकृतियाँ भी मिली हैं जिनमें निम्न कलाकृतियाँ उल्लेखनीय हैं-
(i) धौली चट्टान का हाथी-ओडिसा के पुरी जिले के अन्तर्गत ‘धौली' नामक स्थान की एक चट्टान पर अशोक का शिलालेख उत्कीर्ण है और इसी चट्टान के अग्रभाग में एक विशाल हाथी चट्टान को काटकर बनाया गया है। इस हाथी का सम्पूर्ण शरीर बलिष्ठ व समानुपातिक है। हाथी की यह आकृति भी मूर्तिकला में रेखांकन लय पारखी की सुन्दरता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

(ii) लोमष ऋषि की गुफा पर हाथी-बिहार में बारबार की पहाड़ियों में शैलकृत लोमष ऋषि की गुफा के मेहराब पर एक गतिमान हाथी की प्रतिमा उकेरी गई है।
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चित्र : हाथी-धौली

(iii) बोधगया का वज्रासन-बोधगया में एक बलुए पत्थर का वज्रासन पाया गया है जिस पर मौर्यकालीन ओपदार पालिश है।

मौर्यकालीन मूर्तिकला की विशेषताएँ-

  • मौर्यकालीन मूर्तियों की यह विशेषता थी कि उनमें बहुत बारीकी व समानता थी और उनमें भद्दापन, भौंडापन आदि नहीं पाया जाता है।
  • इनमें यथार्थता का पालन भी किया गया है।
  • चमकदार पालिश भी मौर्यकालीन मूर्तिकला की एक प्रमुख विशेषता है। दीदारगंज (पटना) की चामरग्राहिणी यक्षिणी की मूर्ति तथा सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ इस प्रकार की चमकदार पालिश के उत्कृष्ट नमूने हैं।
  • नारी सौंदर्य में सुन्दरता का पूरी तरह से पालन किया गया है।
Prasanna
Last Updated on Aug. 8, 2022, 3:24 p.m.
Published Aug. 5, 2022