RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

Rajasthan Board RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार Important Questions and Answers.

Rajasthan Board RBSE Solutions for Class 11 Business Studies in Hindi Medium & English Medium are part of RBSE Solutions for Class 11. Students can also read RBSE Class 11 Business Studies Important Questions for exam preparation. Students can also go through RBSE Class 11 Business Studies Notes to understand and remember the concepts easily.

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

बहुचयनात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
प्रवेश के निम्न माध्यमों में से किसमें घरेलू विनिर्माता फीस के बदले अन्य देश के विनिर्माता को अपनी बौद्धिक परिसम्पत्तियों जैसे-पेटेंट एवं ट्रेडमार्क का प्रयोग करने का अधिकार देता है-
(क) अनुज्ञप्ति 
(ख) अनुबन्ध 
(ग) संयुक्त उपक्रम 
(घ) इनमें से कोई नहीं 
उत्तर:
(क) अनुज्ञप्ति

प्रश्न 2. 
दो या दो से अधिक फर्मों द्वारा मिलकर एक नई व्यापारिक इकाई का निर्माण, जोकि अपनी जनक इकाइयों से कानूनी रूप से स्वतंत्र एवं पृथक् है, को कहते हैं-
(क) ठेके पर विनियोग 
(ख) फ्रैंचाइजिंग 
(ग) संयुक्त उपक्रम 
(घ) अनुज्ञप्ति 
उत्तर:
(ग) संयुक्त उपक्रम

प्रश्न 3. 
निम्न में से कौनसा निर्यात व्यापार का लाभ नहीं है? 
(क) अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रवेश का सरल मार्ग 
(ख) तुलना में कम जोखिम 
(ग) विदेशी बाजारों में सीमित उपस्थिति 
(घ) निवेश की आवश्यकता कम 
उत्तर:
(ग) विदेशी बाजारों में सीमित उपस्थिति

प्रश्न 4. 
प्रवेश के निम्न मार्गों में से किसमें जोखिम अधिक है? 
(क) अनुज्ञप्ति 
(ख) फ्रैंचाइजिंग 
(ग) ठेके पर विनिर्माण 
(घ) संयुक्त उपक्रम 
उत्तर:
(घ) संयुक्त उपक्रम

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 5. 
निम्न में से कौनसी मद भारत की प्रमुख निर्यात मदों में से एक नहीं है? 
(क) कपड़ा एवं वस्त्र 
(ख) रत्न एवं जेवरात 
(ग) तेल एवं पेट्रोलियम उत्पाद 
(घ) बासमती चावल 
उत्तर:
(ग) तेल एवं पेट्रोलियम उत्पाद

प्रश्न 6. 
निम्न में से कौनसी मद भारत की प्रमुख आयात मदों में से एक नहीं है? 
(क) आयुर्वेदिक दवाइयाँ 
(ख) तेल एवं पेट्रोलियम उत्पाद 
(ग) मोती एवं कीमती पत्थर 
(घ) मशीनरी 
उत्तर:
(क) आयुर्वेदिक दवाइयाँ

प्रश्न 7. 
निम्न में से कौनसा देश भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार नहीं है? 
(क) यू.एस.ए. 
(ख) यू.के. 
(ग) जर्मनी 
(घ) न्यूजीलैण्ड 
उत्तर:
(घ) न्यूजीलैण्ड

प्रश्न 8. 
निर्यात लाइसेंस प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित में से कौनसे प्रलेखों की आवश्यकता नहीं होती? 
(क) आई.ई.सी. नम्बर 
(ख) साख-पत्र 
(ग) पंजीयन संग सदस्यता पत्र 
(घ) बैंक खाता संख्या 
उत्तर:
(ख) साख-पत्र

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 9. 
निम्न में से कौनसा शुल्क वापसी योजना का अंग नहीं है? 
(क) उत्पादन शुल्क की वापसी 
(ख) सीमा शुल्क की वापसी 
(ग) निर्यात कर की वापसी 
(घ) लदान बंदरगाह पर बंदरगाही 
उत्तर:
(घ) लदान बंदरगाह पर बंदरगाही

प्रश्न 10. 
निम्न में से कौन-सा निर्यात सम्बन्धित प्रलेखों में सम्मिलित नहीं है? 
(क) वाणिज्यिक बैंक 
(ख) उद्गम स्थान प्रमाण-पत्र 
(ग) प्रवेश बिल 
(घ) कारिंदे की रसीद 
उत्तर:
(ग) प्रवेश बिल

प्रश्न 11. 
जब माल का जहाज पर लदान कर दिया जाता है तो जहाज के कप्तान द्वारा जारी रसीद को कहते हैं 
(क) जहाजरानी रसीद 
(ख) कारिंदे की रसीद 
(ग) नौ भार माल रसीद 
(घ) जहाज किराये की रसीद
उत्तर:
(ख) कारिंदे की रसीद

प्रश्न 12. 
निम्न में से कौनसा प्रलेख निर्यातक द्वारा बनाया जाता है जिसमें जहाज से माल भेजने से सम्बन्धित विवरण होता है, जैसे भेजने वाले का नाम, पैकेजों की संख्या, जहाजी बिल, गंतव्य बंदरगाह, जहाज का नाम आदि। 
(क) जहाजी बिल 
(ख) पैकेजिंग सूची 
(ग) कारिंदे की रसीद 
(घ) विनिमय पत्र 
उत्तर:
(ख) पैकेजिंग सूची

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 13. 
प्रलेख जिसमें बैंक द्वारा उस पर निर्यातक द्वारा लिखे बिल के भुगतान की गारण्टी दी होती है, वह है 
(क) बंधक पत्र 
(ख) साख पत्र 
(ग) जहाजी बिल्टी 
(घ) विनिमय पत्र 
उत्तर:
(ख) साख पत्र

प्रश्न 14. 
टी.आर.आई.पी. विश्व व्यापार समझौते में से एक है जो सम्बन्धित है- 
(क) कृषि व्यापार 
(ख) सेवा व्यापार 
(ग) व्यापार सम्बन्धित निवेश उपाय 
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 15. 
विश्व के विभिन्न देशों के बीच संवाद एवं व्यावसायिक सम्बन्ध की वृद्धि में भारी योगदान रहा है- 
(क) विश्व व्यापार संघ का 
(ख) विश्व व्यापार संघ एवं विभिन्न देशों की सरकारों का 
(ग) संयुक्त राष्ट्र संघ का 
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का 
उत्तर:
(ख) विश्व व्यापार संघ एवं विभिन्न देशों की सरकारों का

प्रश्न 16. 
सन् 1991 में भारत सरकार ने अपने भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए किसके सामने गुहार लगायी 
(क) विश्व व्यापार संघ 
(ख) भारतीय रिजर्व बैंक 
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष 
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका 
उत्तर:
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 17. 
"अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय वह वाणिज्यिक क्रिया है, जो राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर गई है।" यह कथन है- 
(क) रोजर बैनेट का 
(ख) माईकल आर. जिंकोटा का 
(ग) जॉन डी. डेनियल्स का 
(घ) सी. एच. रेडेवाफ का 
उत्तर:
(क) रोजर बैनेट का

प्रश्न 18. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के क्षेत्र में सम्मिलित है- 
(क) वस्तुओं का आयात-निर्यात 
(ख) सेवाओं का आयात-निर्यात 
(ग) लाइसेंस एवं फ्रैंचाइजी 
(घ) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 19. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से देश को कौनसा लाभ प्राप्त होता है? 
(क) विदेशी मुद्रा प्राप्त होना 
(ख) जीवन स्तर में वृद्धि होना 
(ग) संसाधनों का अधिकतम उपयोग होना 
(घ) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 20. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का वह स्वरूप जिसमें एक फर्म विदेशों में अपनी आवश्यकता के अनुसार घटक एवं वस्तुओं के उत्पादन के लिए स्थानीय विनिर्माता से अनुबन्ध कर लेती है, कहलाता है-
(क) आयात-निर्यात 
(ख) संविदा विनिर्माण 
(ग) विक्रेयाधिकार 
(घ) फ्रैंचाइजिंग 
उत्तर:
(ख) संविदा विनिर्माण

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 21. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के क्षेत्र में दो या दो से अधिक स्वतंत्र इकाइयों के संयुक्त स्वामित्व में एक फर्म की स्थापना को कहा जाता है-
(क) साझेदारी 
(ख) संयुक्त पूँजी कम्पनी 
(ग) संयुक्त उपक्रम 
(घ) निजी कम्पनी 
उत्तर:
(ग) संयुक्त उपक्रम

प्रश्न 22. 
'कौशल भारत' जैसे महत्त्वपूर्ण पहलूओं को किस विदेश व्यापार नीति में प्रोत्साहन दिया गया है? 
(क) सन् 1991 की विदेशी व्यापार नीति 
(ख) विदेश व्यापार नीति 2015-20 
(ग) सन् 2001 की नीति 
(घ) सन् 2005 की विदेश व्यापार नीति 
उत्तर:
(ख) विदेश व्यापार नीति 2015-20

प्रश्न 23. 
आज भारत में विश्व की कौनसे नम्बर की सबसे बड़ी एवं चीन के बाद सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है-
(क) पाँचवी 
(ख) दसवीं 
(ग) बीसवीं 
(घ) इक्कीसवीं 
उत्तर:
(ख) दसवीं 

प्रश्न 24. 
11 दिसम्बर, 2005 को विश्व व्यापार संगठन के कितने देश सदस्य थे? 
(क) 91 
(ख) 100 
(ग) 149 
(घ) 188 
उत्तर:
(ग) 149

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 25. 
निर्यात प्रक्रिया का चरण नहीं है- 
(क) पूछताछ प्राप्त करना एवं निर्ख भेजना 
(ख) आदेश अथवा इंडेंट भेजना 
(ग) वस्तुओं का उत्पादन एवं अधिप्राप्ति 
(घ) जहाज लदान निरीक्षण 
उत्तर:
(ख) आदेश अथवा इंडेंट भेजना

प्रश्न 26. 
आयात प्रक्रिया का प्रमुख चरण है- 
(क) पूछताछ प्राप्त करना एवं निर्ख भेजना 
(ख) आदेश अथवा इंडेंट की प्राप्ति 
(ग) साख-पत्र प्राप्त करना 
(घ) उद्गम प्रमाण-पत्र प्राप्त करना
उत्तर:
(ग) साख-पत्र प्राप्त करना

प्रश्न 27. 
निर्यात प्रक्रिया के कस्टम निकासी चरण में जहाजी बिल की कितनी प्रतियाँ कस्टम घर में तैनात कस्टम मूल्यांकन अधिकारी के पास जमा करायी जाती हैं? 
(क) तीन प्रतियाँ 
(ख) चार प्रतियाँ 
(ग) पाँच प्रतियाँ 
(घ) आठ प्रतियाँ 
उत्तर:
(ग) पाँच प्रतियाँ

प्रश्न 28. 
निर्यात लेन-देन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं से सम्बन्धित प्रलेख हैं-
(क) निर्यात बीजक 
(ख) पैकिंग सूची 
(ग) निरीक्षण प्रमाण-पत्र 
(घ) उपर्युक्त सभी 
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 29. 
आयातक के बैंक द्वारा दी जाने वाली वह गारण्टी जिसमें वह निर्यातक के बैंक को एक निश्चित राशि तक के निर्यात बिल के भुगतान की गारण्टी देता है, कहलाता है- 
(क) निर्यात बीजक 
(ख) जहाजी बिल 
(ग) साख-पत्र 
(घ) निरीक्षण प्रमाण-पत्र 
उत्तर:
(ग) साख-पत्र

प्रश्न 30.
जी.ए.टी.टी. का उत्तराधिकारी है-
(क) विश्वव्यापार संगठन 
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  
(ग) विश्व बैंक 
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं 
उत्तर:
(क) विश्वव्यापार संगठन

प्रश्न 31. 
विनिमय विपत्र कितने प्रकार का होता है- 
(क) दो प्रकार का 
(ख) चार प्रकार का 
(ग) छः प्रकार का 
(घ) आठ प्रकार का 
उत्तर:
(क) दो प्रकार का

प्रश्न 32. 
विनिमय पत्र का वह प्रकार, जिसमें बिल को स्वीकार कर देने पर ही प्रलेख सौंपने का आदेश देता है, कहलाता 
(क) प्रवेश बिल 
(ख) दर्श बिल 
(ग) मुद्दती बिल 
(घ) हवाई मार्ग बिल 
उत्तर:
(ग) मुद्दती बिल

प्रश्न 33. 
वर्तमान में भारत में कितने सामग्री बोर्ड हैं? 
(क) पाँच 
(ख) सात 
(ग) नौ 
(घ) बारह 
उत्तर:
(ख) सात

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 34. 
भारतीय व्यापार प्रोन्नति संगठन के अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालय नहीं हैं- 
(क) जर्मनी में 
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका में 
(ग) भारत में 
(घ) यू.ए.ई. में 
उत्तर:
(क) जर्मनी में

प्रश्न 35. 
राज्य व्यापार संगठन (एस.टी.सी.) की स्थापना की गई थी 
(क) मई 1948 में 
(ख) मई 1956 में 
(ग) मई 1958 में 
(घ) मई 1966 में 
उत्तर:
(ख) मई 1956 में

प्रश्न 36. 
अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ का निर्माण किया गया 
(क) सन् 1960 में 
(ख) सन् 1970 में 
(ग) सन् 1980 में 
(घ) सन् 1990 में 
उत्तर:
(क) सन् 1960 में 

प्रश्न 37. 
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब की गई थी? 
(क) सन् 1991 में 
(ख) सन् 1995 में 
(ग) सन् 2000 में 
(घ) सन् 2003 में 
उत्तर:
(ख) सन् 1995 में

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

रिक्त स्थानों की पूर्ति वाले प्रश्न 
निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
 

1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय एक .................... शब्द है। (व्यापक/पूरक) 
2. विभिन्न फ अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से जुड़कर उन वस्तुओं का .................... करती हैं जिन्हें वह दूसरे देशों से कम मूल्य पर प्राप्त कर सकती हैं। (आयात/निर्यात) 
3. भारत में .................. में उदारीकरण की नीति को अपनाया गया। (सन् 1956/सन् 1991) 
4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का संचालन एवं प्रबन्धन घरेलू व्यवसाय को चलाने से कहीं अधिक .................... है। (आसान/जटिल) 
5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से .................... व्यापक होता है। (कम/अधिक) 
6. .................... निवेशक को विदेशी कम्पनी में नियन्त्रण का अधिकार देता है। (अप्रत्यक्ष निवेश/प्रत्यक्ष निवेश) 
7. .................... उन व्यावसायिक फर्मों के लिए विकास की सीढ़ी का कार्य करता है जिन्हें घरेलू बाजार में भारी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है। (अन्तर्राज्यीय व्यापार/अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय) 
8. ठेके पर विनिर्माण को ....................स्रोतीकरण भी कहते हैं। (आन्तरिक/बाह्य) 
9. विशेषाधिकार अनुज्ञप्ति से अधिक .................... है। (आसान/कठोर) 
10. जनक कम्पनी को अन्य देश में स्थापित कम्पनी में पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए .................... प्रतिशत पूँजी का निवेश करना होगा। (51/100)
11. ..................जहाज के नायक के कार्यालय द्वारा जहाज पर माल के लदान पर जारी की जाती है। (निरीक्षण प्रमाण पत्र/मेट्स रसीद)। 
12. .................. आयातक को एक निश्चित राशि का निश्चित व्यक्ति या आदेशित व्यक्ति को भुगतान करने का आदेश होता है। (प्रतिज्ञापत्र/विनिमय विपत्र) 
13. ................... आयातक के बैंक द्वारा दी जाने वाली गारण्टी है। (वायुमार्ग विपत्र/साख पत्र) 
14. भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान की स्थापना .................... में की गई थी। (1963/1973) 
15. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विश्व बैंक के बाद .................... अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। (दूसरा/तीसरा) 
उत्तर:
1. व्यापक 
2. आयात 
3. सन् 1991 
4. जटिल 
5. कम 
6. प्रत्यक्ष निवेश 
7. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय, 
8. बाह्य 
9. कठोर 
10. 100 
11. मेट्स रसीद 
12. विनिमय विपत्र 
13. साख पत्र 
14. 1963 
15. दूसरा 

सत्य/असत्य वाले प्रश्न- 
निम्न में से सत्य/असत्य कथन छाँटिये-
 

1. सन् 1991 में भारत ने अपने भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए कोष जुटाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को गुहार लगायी। 
2. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में दूसरे देशों के ग्राहकों को ध्यान में रखकर वस्तुएँ तैयार नहीं की जाती हैं। 
3. विदेशी निवेश में कुछ वित्तीय प्रतिफल के बदले विदेशों में धन का निवेश किया जाता है। 
4. अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रवेश की आयात/निर्यात सबसे सरल पद्धति है। 
5. अनुज्ञप्ति/फ्रैंचाइजी प्रणाली में अनुज्ञप्तिदाता/फ्रैंचाइजर न तो व्यवसाय को स्थापित करता है और न ही इसमें अपनी पूँजी लगाता है। 
6. निर्यात लाइसेंस प्राप्त करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिकृत किसी भी बैंक में खाता खोलना एवं खाता संख्या प्राप्त करना आवश्यक है। 
7. एक निर्यातक फर्म को आयात-निर्यात कोड संख्या अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। 
8. विदेशों से भुगतान को राजनीतिक एवं वाणिज्यिक जोखिमों से संरक्षण प्राप्त करने के लिए ई.सी.जी.सी. के पास पंजीकरण कराना आवश्यक है।
9. निर्यात व्यापार में उद्गम प्रमाण पत्र आयातक के देश में स्थित वाणिज्य दूतावास अधिकारी से प्राप्त किया जा सकता है।
10. निर्यातक जो निर्ख तैयार करता है वह प्रारूप बीजक कहलाता है। 
11. आयात व्यापार में भुगतान के बदले प्रलेख मुद्दती विपत्र कहलाता है। 
12. प्रवेश बिल पाँच प्रतियों में तैयार किया जाता है। 
13. निर्यात संवर्द्धन पूँजीगत वस्तुएँ योजना का मुख्य उद्देश्य निर्यात उत्पादन के लिए पूँजीगत वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन देना होता है। 
14. वर्तमान में भारत में 21 निर्यात प्रोन्नति परिषद् हैं। 
15. पुनर्निमार्ण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक ही विश्व बैंक कहलाता है। 
उत्तर:
1. सत्य, 
2. असत्य, 
3. सत्य, 
4. सत्य, 
5. असत्य, 
6. सत्य, 
7. सत्य, 
8. सत्य, 
9. असत्य, 
10. सत्य, 
11. असत्य, 
12. असत्य, 
13. सत्य, 
14. सत्य, 
15. सत्य 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

मिलान करने वाले प्रश्न-
निम्न को सुमेलित कीजिए-

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 1
RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 2
उत्तर:
RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 3

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
घरेलू व्यापार किसे कहते हैं? 
उत्तर:
जब व्यापारिक क्रियाएँ देश की भौगोलिक सीमाओं की परिधि में होती हैं तो इसे घरेलू व्यापार कहते हैं। 

प्रश्न 2. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय किसे कहते हैं? 
उत्तर:
जब दो देशों के बीच में व्यवसाय किया जाता है उसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय कहते हैं। इसमें न केवल वस्तु एवं सेवाओं का ही व्यवसाय सम्मिलित है बल्कि पूँजी, व्यक्ति, तकनीक, बौद्धिक सम्पत्ति (पेटेन्ट्स, ट्रेडमार्क इत्यादि) भी शामिल हैं। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 3. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के कोई दो कारण बतलाइये। 
उत्तर"

  • प्रत्येक देश द्वारा अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पाना। 
  • आवश्यक पूँजी का अभाव होना। 

प्रश्न 4. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय की प्रमुख क्रियाएँ कौन-कौन सी हैं? 
उत्तर:

  • वस्तुओं का आयात एवं निर्यात 
  • सेवाओं का आयात एवं निर्यात 
  • लाइसेंस एवं फ्रैंचाइजी 
  • विदेशी निवेश। 

प्रश्न 5. 
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व व्यापार के प्रमुख अंग कौन-कौनसे हैं? 
उत्तर:

  • पर्यटन, 
  • परिवहन। 

प्रश्न 6. 
संविदा विनिर्माण से आपका क्या आशय है? 
उत्तर:
यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का वह स्वरूप है जिसमें एक फर्म विदेशों में अपनी आवश्यकतानुसार घटक एवं वस्तुओं के उत्पादन के लिए स्थानीय विनिर्माता अथवा विनिर्माताओं से अनुबन्ध कर लेते हैं ।

प्रश्न 7. 
अनुज्ञप्ति या लाइसेंस प्रणाली क्या है? 
उत्तर:
जब किसी दूसरे देश में वहीं के व्यवसायी को कुछ फीस के बदले आपके अपने ट्रेडमार्क, पेटेंट या कॉपीराइट के अन्तर्गत वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रय की अनुमति देना, अनुज्ञप्ति या लाइसेंस प्रणाली कहलाती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 8. 
विदेशी निवेश से आपका क्या आशय है? 
उत्तर:
जब कुछ वित्तीय प्रतिफल के बदले में दूसरे देशों में धन का निवेश किया जाता है तो वह विदेशी निवेश कहलाता है। 

प्रश्न 9. 
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई.) किसे कहते हैं? 
उत्तर:
जब कोई कम्पनी किसी देश में वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन एवं विपणन के लिए वहाँ संयंत्र एवं मशीनों जैसी परिसम्पत्तियों में प्रत्यक्ष निवेश करती है तो वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अर्थात् एफ.डी.आई. कहलाता है। 

प्रश्न 10. 
संयुक्त उपक्रम किसे कहते हैं? 
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक स्वतंत्र इकाइयों के संयुक्त स्वामित्व में एक फर्म की स्थापना की जाती है, जिसका उद्देश्य लाभ कमाना होता है, तो वह संयुक्त उपक्रम कहलाता है। 

प्रश्न 11. 
आयात एवं निर्यात व्यापार से आप क्या समझते हैं? 
उत्तर:
आयात व्यापार से तात्पर्य किसी दूसरे देशों से अपने देश में वस्तुओं एवं सेवाओं को मंगाने से है। निर्यात व्यापार का तात्पर्य वस्तु एवं सेवाओं को अपने देश से दूसरे देशों को भेजना है। 

प्रश्न 12. 
विक्रेयाधिकार (फ्रैंचाइजी) किसे कहते हैं?
उत्तर:
विक्रेयाधिकार का प्रयोग सेवाओं के सन्दर्भ में किया जाता है। इसके अन्तर्गत एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को तकनीक, ट्रेडमार्क एवं पेटेण्ट को एक पूर्वनिश्चित प्रतिफल के बदले निश्चित समय के लिए उपयोग करने का अधिकार देता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 13. 
संविदा विनिर्माण के दो अन्य नाम लिखिये। 
उत्तर:

  • ठेके पर विनिर्माण, 
  • बाह्यस्त्रोतीकरण। 

प्रश्न 14. 
'अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विधि' वाक्य खण्ड का क्या अर्थ है? 
उत्तर:
'अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की विधि' वाक्य खण्ड का अर्थ है, "अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के विभिन्न तरीके।" 

प्रश्न 15. 
अनुज्ञप्ति तथा मताधिकारी में अन्तर बतलाइये। 
उत्तर:

  • अनुज्ञप्ति का प्रयोग वस्तुओं के उत्पादन एवं विनिमय के लिए होता है, जबकि मताधिकारी का प्रयोग सेवाओं के सन्दर्भ में किया जाता है। 
  • अनुज्ञप्ति उतना कठोर नहीं होता है, जितना कि मताधिकारी या विशेषाधिकारी। 

प्रश्न 16. 
संयुक्त स्वामित्व उपक्रम की स्थापना किस-किस प्रकार से हो सकती है? (कोई दो) 
उत्तर:

  • विदेशी निवेशक द्वारा स्थापित कम्पनी में हिस्सेदारी क्रय करना। 
  • स्थानीय फर्म द्वारा पूर्व स्थापित विदेशी फर्म में हिस्सा प्राप्त कर लेना। 

प्रश्न 17. 
सम्पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी से आपका क्या तात्पर्य है? 
उत्तर:
जो विदेशी कम्पनियाँ अन्य देशों में अपनी कम्पनियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहती हैं वे उन कम्पनियों को स्थापित करने के बाद या किसी भी अन्य कम्पनी में 100 प्रतिशत पूँजी लगाकर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त कर लेती है, उन्हें सम्पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी कहा जाता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 18. 
भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मदद मिल सके। इस नीति के अन्तर्गत दो प्रमुख योजनाएँ कौन-कौन सी हैं? नाम लिखिए। 
उत्तर:

  • भारत से वस्तुओं के निर्यात की योजना (MEIS) 
  • भारत से सेवाओं के निर्यात की योजना (SEIS)। 

प्रश्न 19. 
निर्यात प्रक्रिया के अन्तर्गत कस्टम मूल्यांकन अधिकारी के पास कौन-कौन से प्रलेख जमा कराये जाते हैं? 
उत्तर:
निर्यात अनुबन्ध या निर्यात आदेश, साख-पत्र, वाणिज्यिक बीजक, उद्गम प्रमाण पत्र, निरीक्षण प्रमाण पत्र यदि आवश्यक है तो, समुद्री बीमा पॉलिसी एवं अधीक्षक। 

प्रश्न 20. 
जहाज लदान से सम्बन्धित प्रमुख प्रलेखों के नाम लिखिए। 
उत्तर:
मेट्स रसीद, जहाजी बिल, जहाजी बिल्टी, वायुमार्ग विपत्र, समुद्री बीमा पॉलिसी। 

प्रश्न 21. 
प्रारूप बीजक किसे कहते हैं? 
उत्तर:
प्रारूप बीजक वह प्रलेख होता है जिसमें निर्यात के माल का मूल्य, गुणवत्ता, श्रेणी, डिजाइन, माप, भार तथा निर्यात की शर्तों का विस्तृत वर्णन होता है। 

प्रश्न 22. 
आदेश (इंडेंट) क्या होता है? 
उत्तर:
निर्यात प्रक्रिया में वह आदेश जिसमें आदेशित वस्तुओं का विवरण, देय मूल्य, सुपुर्दगी की शर्ते, पैकिंग एवं चिन्हांकन का ब्यौरा एवं सुपुर्दगी सम्बन्धी निर्देश होते हैं, आदेश (इंडेंट) कहलाता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 23. 
भारत में निर्यात लाइसेंस प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम क्या कार्यवाही करनी पडती है? 
उत्तर:
विदेशी व्यापार अथवा क्षेत्रीय आयात-निर्यात लाइसेंसिंग प्राधिकरण से आयात-निर्यात कोड संख्या प्राप्त करना। 

प्रश्न 24. 
प्रेषण पूर्व वित्त से आपका क्या आशय है? 
उत्तर:
प्रेषण पूर्व वित्त वह राशि है जिसकी निर्यातक को कच्चा माल एवं अन्य सम्बन्धित चीजों का क्रय करने, वस्तुओं के प्रक्रियन एवं अन्य सम्बन्धित चीजों का क्रय करने, पैकेजिंग तथा वस्तुओं के माल लदान बन्दरगाह तक परिवहन के लिए आवश्यक होती है।

प्रश्न 25. 
दर्श विपत्र क्या होता है? 
उत्तर:
यह वह विपत्र होता है जिसमें माल को प्राप्त करने का अधिकार आयातक द्वारा भुगतान करने पर ही मिलता है। 

प्रश्न 26. 
मुद्दती विपत्र से आपका क्या अभिप्राय है? 
उत्तर:
यह विनिमय विपत्र का वह प्रकार है जिसमें इसका लेखक बैंक को आयातक को सम्बन्धित प्रलेख मुद्दती बिल को स्वीकार कर देने पर ही सौंपने के आदेश देता है। 

प्रश्न 27. 
जहाजी आदेश पत्र क्या होता है?
उत्तर:
जहाजी आदेश पत्र जहाज के कप्तान के नाम आदेश होता है कि वह निर्धारित वस्तुओं को नामित बन्दरगाह पर सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा निकासी होने पर जहाज पर माल का लदान करा ले। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 28. 
निर्यात व्यापार में वस्तुओं का बीमा क्यों कराया जाता है?
उत्तर:

  • मार्ग में समुद्री जोखिमों के कारण 
  • माल के खो जाने अथवा टूट-फूट हो जाने की जोखिम से संरक्षण प्राप्त करने के लिए। 

प्रश्न 29. 
ढो ले जाने का आदेश क्या होता है? 
उत्तर:
ढो ले जाने का आदेश बन्दरगाह के प्रवेश द्वार पर तैनात कर्मचारियों के नाम, डॉक में माल के प्रवेश की अनुमति देने के लिए आदेश होता है। 

प्रश्न 30. 
निकासी एवं माल भेजने वाला एजेण्ट किसे कहते हैं? 
उत्तर:
यह वह व्यक्ति होता है जो निर्यात किये जाने वाले माल को भेजने सम्बन्धी समस्त औपचारिकताओं को निर्यातक की ओर से पूरा करवाता है। 

प्रश्न 31. 
मेट्स रसीद में किन-किन बातों का उल्लेख होता है? 
उत्तर:
जहाज का नाम, माल लदान की तिथि, पैकेज का विवरण, चिह्न एवं संख्या, जहाज पर प्राप्ति के समय माल की दशा आदि का उल्लेख मेट्स रसीद में उल्लेखित होता है। 

प्रश्न 32. 
जहाजी बिल्टी किसे कहते हैं? 
उत्तर:
यह एक ऐसा प्रलेख है जो जहाजी कम्पनी द्वारा जहाज पर माल प्राप्ति की रसीद होता है। साथ ही गन्तव्य बन्दरगाह तक उन्हें ले जाने का शपथ-पत्र भी होता है। 

प्रश्न 33. 
वायु मार्ग विपत्र से आपका क्या आशय है? 
उत्तर:
यह एक ऐसा प्रलेख है जो एयर लाइन कम्पनी की हवाई जहाज पर माल की प्राप्ति की विधिवत् रसीद होता है तथा जिसमें वह गन्तव्य हवाई अड्डे तक उन्हें ले जाने का वचन देता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 34. 
प्रवेश बिल से क्या तात्पर्य है? 
उत्तर:
यह सीमा शुल्क कार्यालय द्वारा आयातक को दिया जाने वाला एक फार्म होता है, जिससे आयातक माल की प्राप्ति कर सकता है। इसकी तीन प्रतियाँ होती हैं तथा इसे सीमा शुल्क कार्यालय में जमा कराया जाता है। 

प्रश्न 35. 
प्रवेश बिल में किन-किन बातों का समावेश होता है? 
उत्तर:
प्रवेश बिल में आयातक का नाम एवं पता, जहाज का नाम, पैकेजों की संख्या, पैकेज पर चिन्ह, माल की मात्रा एवं मूल्य इत्यादि का उल्लेख होता है। 

प्रश्न 36. 
आयातक को राजनीतिक एवं वाणिज्यिक जोखिमों से संरक्षण के लिए किसके पास पंजीकरण कराना अनिवार्य है? 
उत्तर:
आयातक को राजनीतिक एवं वाणिज्यिक से संरक्षण के लिए ई.सी.जी.सी. के पास पंजीकरण कराना आवश्यक है। 

प्रश्न 37. 
देश में निर्यात गुणवत्ता को निश्चित करने के लिए भारत सरकार ने क्या कदम उठाया? 
उत्तर:
देश से केवल अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुओं के निर्यात को निश्चित करने के लिए भारत सरकार ने निर्यात गुणवत्ता नियन्त्रण एवं निरीक्षण अधिनियम, 1963 को पारित किया है। 

प्रश्न 38. 
प्रलेखों का विनियमन से आप क्या समझते हैं? 
उत्तर:
प्रासंगिक प्रलेखों को बैंक को भुगतान प्राप्ति के उद्देश्य से सौंपना प्रलेखों का विनियमन कहलाता है। ये प्रलेख हैं—बीज की सत्यापित प्रति, जहाजी बिल्टी, पैकिंग सूची, बीमा पॉलिसी, उद्गम प्रमाण-पत्र एवं साख पत्र आदि। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 39. 
पैकिंग सूची से आप क्या समझते हैं? 
उत्तर:
पैकिंग सूची, पेटियों अथवा गाँठों की संख्या एवं इनमें रखे गये माल का विवरण है। इसमें निर्यात किये गये माल की प्रकृति एवं इनके स्वरूप का विवरण दिया होता है। 

प्रश्न 40. 
विनिमय विपत्र किसे कहते हैं? 
उत्तर:
यह वह लिखित प्रपत्र है जिसमें इसको जारी करने वाला दूसरे पक्ष को एक निश्चित राशि, एक निश्चित व्यक्ति अथवा इसके धारक को भुगतान का आदेश देता है। 

प्रश्न 41. 
भारत में आयातक के लिए सर्वप्रथम किस औपचारिकता को पूरा किया जाना आवश्यक है? 
उत्तर:
प्रत्येक आयातक के लिए विदेशी व्यापार महानिदेशक अथवा क्षेत्रीय आयात-निर्यात लाइसेंसिंग प्राधिकरण के पास पंजीयन कराना एवं आयात-निर्यात कोड नम्बर प्राप्त करना आवश्यक है। 

प्रश्न 42. 
साख-पत्र से आप क्या समझते हैं? 
उत्तर:
साख-पत्र आयातक के बैंक द्वारा दी जाने वाली गारण्टी है जिसमें वह निर्यातक के बैंक को एक निश्चित राशि तक के निर्यात बिल के भुगतान की गारण्टी देता है। 

प्रश्न 43. 
आयातित माल की सूची किसे कहते हैं? 
उत्तर:
आयातित माल की सूची वह प्रलेख है जिसमें आयातित माल का विस्तृत विवरण दिया हुआ होता है। इसी के आधार पर माल को जहाज से उतरवाया जाता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 44. 
डॉक चालान किसे कहते हैं? . 
उत्तर:
सीमा शुल्क सम्बन्धी औपचारिकताओं की पूर्ति पर डॉक व्यय का भुगतान किया जाता है। डॉक/गोदी व्यय का भुगतान करते समय आयातक अथवा उसका निकासी एजेण्ट डॉक व्यय की राशि एक चालान अथवा फार्म में दर्शाता है जिसे डॉक चालान कहा जाता है। 

प्रश्न 45. 
वर्तमान में भारत सरकार द्वारा किन निर्यातक इकाइयों को आयकर में छूट दी जाती है? 
उत्तर:
वर्तमान में भारत सरकार द्वारा आयकर में छट केवल 100 प्रतिशत निर्यात मलक इकाइयों एवं निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों/विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित इकाइयों को ही कुछ चुने हुए वर्षों के लिए ही मिलती है। 

प्रश्न 46. 
निर्यात संवर्द्धन पूँजीगत वस्तुएँ योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है? 
उत्तर:
इस योजना का मुख्य उद्देश्य निर्यात उत्पादन के लिए पूँजीगत वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन देना है। यह निर्यात फर्मों को पूँजीगत वस्तुओं को नीची दर अथवा शून्य सीमा शुल्क पर आयात की अनुमति देती है। 

प्रश्न 47. 
वर्तमान में भारत में कितनी निर्यात प्रोन्नति परिषदें (ई.पी.सी.) हैं? 
उत्तर:
वर्तमान में भारत में 21 निर्यात प्रोन्नति परिषदें हैं जो विभिन्न वस्तुओं में व्यवहार करती हैं। 

प्रश्न 48. 
भारतीय व्यापार प्रोन्नति संगठन (आई.टी.पी.ओ.) के भारत में कहाँ-कहाँ क्षेत्रीय कार्यालय स्थित हैं? 
उत्तर:
मुम्बई, बैंगलोर, कोलकाता, कानपुर एवं चेन्नई। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 49. 
विश्व बैंक का दूसरा नाम बतलाइये। 
उत्तर:
पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (आई.बी.आर.डी.)। 

प्रश्न 50. 
अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य बतलाइये। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य कम विकसित सदस्य देशों को आसान शर्तों पर ऋण के रूप में वित्त उपलब्ध कराना था। 

प्रश्न 51. 
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में कितने सदस्य हैं तथा इसका मख्यालय कहाँ स्थित है? 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सन् 2005 में 91 देश सदस्य थे तथा इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. में स्थित है। वर्तमान में 188 देश इसके सदस्य हैं। 

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
विभिन्न देश व्यापार क्यों करते हैं? इसकी व्याख्या कीजिए। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का आधारभूत कारण यह है कि देश अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का भली प्रकार से एवं सस्ते मूल्य पर उत्पादन नहीं कर सकते हैं, जबकि कई देश अपने विभिन्न संसाधनों की सहायता से अन्य देशों की तुलना में श्रेष्ठ गुणवत्ता वस्तुओं का कम लागत पर उत्पादन करने की स्थिति में रहते हैं अर्थात् कुछ देश कुछ चुनिन्दा वस्तुओं एवं सेवाओं के लाभ में उत्पादन करने की स्थिति में होते हैं जबकि इन्हीं को अन्य देश उतने ही प्रभावी एवं क्षमता से उत्पादन नहीं कर सकते हैं। इसी कारण से प्रत्येक देश के लिए उन वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन अधिक लाभप्रद रहता है, जिनका वे अधिक कुशलतापूर्वक उत्पादन कर सकते हैं तथा शेष वस्तुओं को वे अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के माध्यम से उन देशों में ले सकते हैं, जो उन वस्तुओं का उत्पादन कम लागत पर कर सकते हैं। 

विभिन्न देशों एवं फर्मों को अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से केवल मूल्य का ही लाभ नहीं मिलता है बल्कि और भी बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं जैसे राष्ट्रीय आय में वृद्धि, जीवन स्तर में वृद्धि होना, भौगोलिक सुविधाओं का लाभ प्राप्त होना, विदेशी मुद्रा का अर्जन, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, संसाधनों का अधिक क्षमता से उपभोग इत्यादि। ये सभी विभिन्न देशों को आपस में व्यापार करने के लिए प्रेरित करते हैं। 
RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 

प्रश्न 2. 
ठेके पर विनिर्माण/उत्पादन की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। 
उत्तर:
ठेके पर विनिर्माण/उत्पादन की सीमाएँ 
1. गुणवत्ता उत्पादन की समस्या-स्थानीय फळं यदि उत्पादन, डिजाइन एवं गुणवत्ता मान के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय फर्म को गुणवत्ता उत्पादन की कठिन समस्या सामने आ सकती है। 

2. उत्पादन प्रक्रिया पर नियन्त्रण नहीं-संविदा निर्माण के अन्तर्गत स्थानीय उत्पादकों का उत्पादन प्रक्रिया पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता, क्योंकि वस्तुओं का उत्पादन अनुबन्ध में निर्धारित शर्तों एवं विशिष्ट वर्णन के अनुसार किया जाता है।

3. स्थानीय इकाई द्वारा अपनी इच्छानुसार माल का विक्रय नहीं-संविदा विनिर्माण के अन्तर्गत उत्पादन करने वाली स्थानीय इकाइयाँ अपनी इच्छानुसार इस माल को नहीं बेच सकती हैं। उन्हें अपने माल को अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी को पूर्व निर्धारित मूल्य पर ही बेचना होगा। यदि खुले बाजार में इन वस्तुओं का मूल्य अधिक है तो स्थानीय फर्म को इससे कम लाभ प्राप्त होगा। 

प्रश्न 3. 
अनुज्ञप्ति एवं विक्रेयाधिकार/फ्रैंचाइजिंग में अन्तर्भेद कीजिए। 
उत्तर:
अनुज्ञप्ति एवं विक्रेयाधिकार/फ्रैंचाइजिंग में अन्तर्भेद- 
1. अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत किसी दूसरे देश में वहीं के व्यवसायी को कुछ फीस के बदले आपके अपने ट्रेडमार्क, पेटेंट या कॉपीराइट के अन्तर्गत वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रय की अनुमति दी जाती है, जबकि विक्रेयाधिकार या फ्रेंचाइजिंग में वस्तुओं एवं सेवाओं के विक्रय की अनुमति नहीं दी जाती है। 

2. अनुज्ञप्ति वस्तुओं के क्रय-विक्रय से सम्बन्धित होती है, जबकि विक्रेयाधिकार सेवाओं के क्रय-विक्रय से सम्बन्धित होता है। 

3. अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत व्यवसाय प्रचालन में लचीला होता है जबकि विक्रेयाधिकार व्यवसाय प्रचालन में अधिक कठोर होता है। 

प्रश्न 4. 
भारत में निर्यात की प्रमुख मदों को सूचीबद्ध कीजिए। 
अथवा 
भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख मदें कौन-कौनसी हैं? 
उत्तर:
भारत के निर्यात की प्रमुख मदें-भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं-
1. प्राथमिक उत्पाद/वस्तुएँ-

  • कषि एवं कृषिजनक वस्तुएँ,
  • कच्चा लोहा एवं खनिज पदार्थ। 

2. निर्मित वस्तुएँ-

  • कपड़ा-तैयार वस्त्र सहित
  • रत्न एवं गहने
  • इंजनियरिंग वस्तुएँ सामान
  • रसायन एवं सम्बन्धित वस्तुएँ
  • चमड़ा एवं चमड़े का बना सामान
  • पेट्रोलियम, कच्चा एवं इससे जुड़े उत्पाद
  • अन्य-चाय, दवाइयाँ एवं औषधियाँ, चावल एवं तम्बाकू आदि। 

प्रश्न 5. 
उन प्रमुख देशों की सूची बनाइये जिनसे भारत का व्यापार है। 
उत्तर:
भारत के साथ व्यापार करने वाले प्रमुख देशों की सूची- 

  • संयुक्त राज्य अमेरिका, 
  • इंग्लैण्ड, 
  • बेल्जियम, 
  • जर्मनी, 
  • जापान, 
  • स्विट्जरलैण्ड, 
  • हांगकांग, 
  • संयुक्त अरब अमीरात, 
  • चीन, 
  • सिंगापुर, 
  • मलेशिया। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 6. 
आन्तरिक व्यवसाय तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में दो अन्तर बतलाइये। 
उत्तर:
आन्तरिक व्यवसाय तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में अन्तर 
1. क्रेता एवं विक्रेताओं की राष्ट्रीयता-आन्तरिक व्यवसाय में क्रेता एवं विक्रेता की राष्ट्रीयता एक ही होती है; क्योंकि ऐसे व्यवसाय में एक ही देश के व्यक्ति अथवा संगठन भाग लेते हैं, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में क्रेता एवं विक्रेता की राष्ट्रीयता अलग-अलग होती है; क्योंकि इसमें विभिन्न देशों की राष्ट्रीयता वाले लोग एवं संगठन भाग लेते हैं। 

2. उत्पादन के साधनों की गतिशीलता-आन्तरिक व्यवसाय में एक देश की सीमाओं में उत्पादन के साधन जैसे—श्रम एवं पूँजी अपेक्षाकृत अधिक गतिशील होते हैं, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में विभिन्न देशों के बीच उत्पादन के साधन जैसे श्रम एवं पूँजी अपेक्षाकृत कम गतिशील होते हैं। 

प्रश्न 7. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से व्यावसायिक फर्मों को प्राप्त होने वाले कोई तीन लाभ बतलाइये। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से व्यावसायिक फर्मों को प्राप्त होने वाले लाभ 
1. उच्च लाभ की सम्भावना-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में घरेलू या आन्तरिक व्यापार की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त होता है। जब आन्तरिक व्यवसाय में मूल्य कम हो तो उन देशों में माल बेचकर लाभ कमाया जा सकता है जिनमें मूल्य अधिक है। 

2. बढ़ी हुई क्षमता का उपयोग-बहुत सी व्यावसायिक इकाइयाँ घरेलू बाजार में उनकी वस्तुओं की मांग से अधिक क्षमता स्थापित कर लेती हैं। बाहरी विस्तार एवं अन्य देशों के ग्राहकों से आदेश प्राप्त करने की योजना के द्वारा वे अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के उपयोग के बारे में सोच सकती हैं तथा व्यवसाय की लाभदेयता को बढ़ा सकती हैं।

3. विकास एवं विस्तार की सम्भावनाएँ-जब व्यावसायिक इकाइयों की वस्तुओं की मांग में घरेलू बाजार में . ठहराव आने लगता है, काफी प्रयत्नों के बाद माँग में वृद्धि नहीं होती है तो उनमें निराशा व्याप्त होने लगती है। ऐसी इकाइयाँ विदेशी बाजारों में प्रवेश करके अपनी वस्तुओं की मांग बढ़ाकर अपने विकास एवं विस्तार की सम्भावना बढ़ा सकती हैं। 

प्रश्न 8. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की आयात/निर्यात विधि के प्रमुख लाभ बतलाइये। 
उत्तर:
आयात/निर्यात विधि के प्रमुख लाभ 
1. सरल पद्धति-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के अन्य माध्यमों की तुलना में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रवेश की आयात/निर्यात सबसे सरल पद्धति है। यह संयुक्त उपक्रमों की स्थापना एवं प्रबन्धन से या विदेशों में स्वयं के स्वामित्व वाली सहायक कम्पनियों की तुलना में कम जटिल प्रक्रिया है।

2. ज्यादा धन एवं समय लगाने की आवश्यकता नहीं-आयात-निर्यात विधि में सम्बद्धता कम होती है अर्थात् काइयों को अन्य माध्यमों की तुलना में कम धन एवं समय लगाने की आवश्यकता होती है। 

3. कम जोखिम-क्योंकि आयात/निर्यात में विदेशों में अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती है। अतः विदेशों में निवेश सम्बन्धी जोखिम नहीं के बराबर ही होती है या फिर अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के अन्य माध्यमों की तुलना में यह बहुत ही कम होती है। 

प्रश्न 9. 
संविदा निर्माण में अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं/स्थानीय उत्पादकों को होने वाली प्रमुख हानियाँ बतलाइये। 
उत्तर:
सावदा निर्माण से हानियाँ-संविदा निर्माण से अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं/स्थानीय उत्पादकों को निम्नलिखित हानियाँ हो सकती हैं-
1. स्थानीय इकाइयाँ यदि उत्पादन डिजाइन एवं गुणवत्ता मानक के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय फर्म को गुणवत्ता उत्पादन की कठिन समस्या पैदा हो सकती है। 

2. बाहरी देश के स्थानीय उत्पादक का उत्पादन प्रक्रिया पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता; क्योंकि वस्तुओं का उत्पादन अनुबन्ध में निर्धारित शर्तों एवं विशिष्ट वर्णन के अनुसार ही किया जाता है। 

3. उत्पादन करने वाली स्थानीय इकाई अपनी इच्छानुसार इस माल को बेच नहीं सकती। इसे अपने माल को अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी को पूर्व निर्धारित मूल्य पर ही बेचना होगा। खुले बाजार में इन वस्तुओं का मूल्य यदि अनुबन्धित मूल्य से अधिक है, तो स्थानीय फर्म को इससे कम लाभ प्राप्त होगा। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 10. 
विशेषाधिकार (फ्रैंचाइजिंग) की परिभाषा दीजिये। 
उत्तर:
चार्ल्स, डब्ल्यू. एल. हिल के अनुसार, "विशेषाधिकार (फ्रैंचाइजिंग) मूल रूप से अनुज्ञप्ति का एक विशिष्ट स्वरूप है, जिसमें फ्रेंचाइजर न केवल अमूर्त परिसम्पत्ति (साधारणतया ट्रेडमार्क) को विशेषाधिकार प्राप्तकर्ता (फ्रैंचाइजी) को बेच देता है, बल्कि इस पर भी जोर देता है कि फ्रैंचाइजी व्यवसाय का संचालन किस प्रकार से करें। इसके सम्बन्ध में नियमों को मानने के लिये सहमत हों।" 

प्रश्न 11. 
विदेश व्यापार नीति 2015-20 को संक्षेप में समझाइये। 
उत्तर:
विदेश व्यापार नीति 2015-20-भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और व्यापारिक असन्तुलन में कमी लाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-20 को लागू किया गया है जिससे कि वस्तुओं एवं सेवाओं के विदेशी व्यापार के लिए स्थिर एवं सतत् वातावरण तैयार हो सके। इसी नीति में आयात एवं निर्यात हेतु नियम एवं सुविधाओं को इस प्रकार जोड़ा गया है कि 'कौशल भारत' जैसे महवपूर्ण पहलुओं को प्रोत्साहन मिल सके और निर्यात संवर्द्धन एवं विविधता से भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मदद मिल सके। 

इस नीति की प्रमुख योजनाएँ- 

1. भारत से वस्तओं की निर्यात की योजना ( MEIS )-इसमें कषि उत्पाद, फल, फल, सब्जी, चाय-कॉफी, मसाले, हस्तशिल्प, जूट उत्पाद, वस्त्र एवं परिधान, औषधि, शल्य, जड़ी-बूटी, ऑटो पुर्जे, टेलीकॉम, यातायात, रेलवे, चमड़ा उत्पाद, कागज आदि सम्मिलित हैं। 

2. भारत से सेवाओं के निर्यात की योजना (SEIS )-इसमें न्यायिक, लेखांकन, वास्तुकला, अभियंत्रण, शैक्षिक, अस्पताल सेवा, होटल और जलपान गृह, यात्रा अभिकरण और यात्रा परिचालक तथा 3 प्रतिशत की दर से अन्य व्यापारिक सेवाएँ सम्मिलित हैं।

प्रश्न 12. 
आयात-निर्यात कोड नम्बर क्या होते हैं? 
उत्तर:
आयात-निर्यात कोड नम्बर-आयात-निर्यात कोड नम्बर वह संख्या है जो प्रत्येक निर्यातक फर्म को विदेशी व्यापार करने के लिए विदेशी व्यापार (डी.जी.एल.टी.) अथवा क्षेत्रीय आयात-निर्यात लाइसेंसिंग प्राधिकरण से प्राप्त करनी होती है। क्योंकि आयात-निर्यात कोड नम्बरों को कई आयात-निर्यात विलेखों में लिखना अनिवार्य होता है। 

प्रश्न 13. 
लदान पूर्व वित्त क्या है?
उत्तर:
माल को आयातक के पास भेजने के लिए निर्यातक माल के प्रेषण से पूर्व अर्थात लदान पूर्व के वित्त हेतु अपने बैंक के पास जाता है, जिससे कि वह निर्यात के लिए उत्पादन कर सके। प्रेषण पूर्व या लदान पूर्व वित्त वह राशि है जिसकी निर्यातक को कच्चा माल एवं अन्य सम्बन्धित चीजों को क्रय करने, वस्तुओं के प्रक्रियण एवं अन्य सम्बन्धित चीजों का क्रय करने, वस्तुओं के प्रक्रियम एवं पैकेजिंग तथा वस्तुओं के लदान बन्दरगाह तक परिवहन के लिए आवश्यक होती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 14. 
निर्यात की वस्तुओं को कस्टम से निकासी की प्रक्रिया को संक्षेप में समझाइये। 
उत्तर:
निर्यात की वस्तुओं को कस्टम से निकासी प्राप्त करने के लिए निर्यातक जहाजी बिल तैयार यह वह मुख्य प्रलेख होता है जिसके आधार पर कस्टम कार्यालय निर्यात की अनुमति प्रदान करता है। जहाजी बिल की पांच प्रतियाँ एवं निम्न प्रलेख कस्टम घर में लगे हुए कस्टम मूल्यांकन अधिकारी के पास जमा करा दिये जाते हैं (i) निर्यात अनुबन्ध एवं निर्यात आदेश, (ii) साख-पत्र, (iii) वाणिज्यक बीजक, (iv) उद्गम प्रमाण-पत्र, (v) निरीक्षण प्रमाण पत्र यदि आवश्यक हो तो, (vi) समुद्री बीमा पॉलिसी।

इन प्रलेखों को जमा करने के पश्चात् सम्बन्धित बन्दरगाह न्यास के पास माल को ढो ले जाने का आदेश प्राप्त किया जाता है। माल ढो ले जाने का आदेश बन्दरगाह के प्रवेश द्वार पर तैनात कर्मचारियों के नाम, डॉक में माल के प्रवेश की अनुमति देने के लिए आदेश होता है। ढो ले जाने के आदेश की प्राप्ति पर माल को बन्दरगाह क्षेत्र में ले जाकर उपयुक्त शेड में संगृहित कर दिया जायेगा। 

प्रश्न 15. 
जहाजी बिल्टी क्या है? यह प्रवेश बिल से किस प्रकार भिन्न है? 
उत्तर:
जहाजी बिल्टी का अर्थ-जहाजी बिल्टी एक ऐसा प्रलेख है जो जहाजी कम्पनी द्वारा जारी जहाज पर माल प्राप्ति की रसीद है तथा साथ ही गन्तव्य बन्दरगाह तक उन्हें ले जाने की शपथ भी है। यह वस्तु और स्वामित्व का अधिकार प्रलेख है। इसीलिए यह बेचान एवं सुपुर्दगी द्वारा स्वतन्त्र रूप से हस्तान्तरणीय है। 

जहाजी बिल्टी एवं प्रवेश बिल में अन्तर-

  • जहाजी बिल्टी निर्यातक द्वारा तैयार करवायी जाती है,जबकि प्रवेश बिल आयातक द्वारा तैयार करवाया जाता 
  • जहाजी बिल्टी जहाज के नायक द्वारा तैयार एवं हस्ताक्षर युक्त विलेख होता है, जबकि प्रवेश बिल सीमा शुल्क कार्यालय द्वारा आयातक को दिया जाने वाला फार्म है। 
  • जहाजी बिल्टी में माल को निधारित बन्दरगाह तक ले जाने से सम्बन्धित शर्ते दी हुई होती हैं, जबकि प्रवेश . बिल में आयातक का नाम एवं पता, जहाज का नाम, माल की मात्रा एवं मूल्य आदि का विवरण होता है। 

प्रश्न 16. 
जहाजी कारिंदे की रसीद के अर्थ को समझाइये। 
उत्तर:
जहाजी कारिंदे की रसीद-वस्तुओं या माल का जब जहाज में लदान किया जाता है तो उसके बदले जहाज का कारिंदा या कप्तान बन्दरगाह अधीक्षक को जारी करता है। इस प्रकार जहाजी कारिंदे की रसीद या मेट्स रसीद जहाज के नायक या कप्तान के कार्यालय द्वारा जहाज पर माल के लदान होने पर जारी की जाती है जिसमें जहाज का नाम, माल लदान की तिथि, पेटी बन्धन (पैकेज) का विवरण, चिह्न एवं संख्या, जहाज पर प्राप्ति के समय माल की दशा आदि की सूचना दी जाती है। बन्दरगाह का अधीक्षक बन्दरगाह शुल्क प्राप्ति के पश्चात् जहाजी कारिंदे को रसीद या मेट्स की रसीद को निकासी या प्रेषक एजेण्ट को सौंप देता है। 

प्रश्न 17. 
निम्न में अन्तर्भेद कीजिए:
(क) दर्श विपत्र एवं मुद्दती विपत्र 
(ख) जहाजी बिल्टी एवं वायुमार्ग बिल 
(ग) लदान पूर्व एवं लदान के पश्चात् वित्त। 
उत्तर:
(क) दर्श विपत्र एवं मुद्दती विपत्र में अन्तर- 

  • दर्श विपत्र में अधिकार पत्रों को आयातक को भुगतान पर ही सौंपे जाते हैं, जबकि मुद्दती विपत्र में आयातक को निश्चित अवधि के पश्चात् ही भुगतान करना होता है। 
  • देश विपत्र के अन्तर्गत आयातक तुरन्त भुगतान करता है, जबकि मुद्दती विपत्र में विपत्र को भुगतान तिथि पर भुगतान के लिए आयातक इसे स्वीकार करता है। 

(ख) जहाजी बिल्टी एवं वाय मार्ग बिल में अन्तर 

  • जहाजी बिल्टी जहाजी कम्पनी द्वारा जारी करती है, जबकि वायुमार्ग एयरलाईन कम्पनी जारी करती है। 
  • जहाजी बिल्टी जहाजी कम्पनी द्वारा जहाज पर माल प्राप्ति की रसीद है, जबकि वायुमार्ग बिल वायुयान कम्पनी द्वारा हवाई जहाज पर माल प्राप्ति की रसीद है। 

(ग) लदान पूर्व एवं लदान के पश्चात् वित्त में अन्तर 
(1) लदान पूर्व वित्त में निर्यातक को माल प्रेषण से पूर्व वित्त की आवश्यकता होती है जबकि लदान पश्चात् वित्त में आयातक को निर्यातक द्वारा भेजे गये माल को बन्दरगाह से अपने गोदाम तक लाने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। 

(2) लदान पूर्व वित्त में निर्यातक को कच्चा माल एवं अन्य सम्बन्धित वस्तुओं को क्रय करने, वस्तुओं के प्रक्रियन एवं अन्य सम्बन्धित चीजों का क्रय करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है, जबकि लदान पश्चात वित्त में आयातक को निर्यातक द्वारा माल की डिलीवरी, बन्दरगाह से लेने व उसे गोदाम तक पहुंचाने तथा निर्यातकों को भुगतान करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 18. 
आयात के सम्बन्ध में प्रयुक्त निम्न प्रलेखों को समझाइये- 
(क) व्यापार सम्बन्धी पूछताछ 
(ख) आयात लाइसेंस 
(ग) माल भेजने की सूचना 
(घ) आयातित माल की सूची। 
उत्तर:
(क) व्यापार सम्बन्धी पूछताछ-अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में आयात-निर्यात प्रक्रिया के अन्तर्गत सर्वप्रथम आयातक उन देशों एवं फर्मों के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्रित करता है जो उसके लिए आवश्यक उत्पाद का निर्यात करते हैं। ये सूचनाएँ उसे व्यापार निर्देशिका अथवा व्यापार संघ एवं व्यापार संगठनों से प्राप्त होती हैं। निर्यातक फर्मों एवं देशों की पहचान करने के पश्चात् आयातक फर्म निर्यातक फर्मों से उनके व्यापारिक पूछताछ के द्वारा निर्यात मूल्यों एवं निर्यात की शर्तों की सूचना प्राप्त करती है। व्यापक पूछताछ आयातक फर्म द्वारा निर्यातक फर्म के नाम लिखित प्रार्थना पत्र है। जिसमें वह उस मूल्य एवं विभिन्न शर्तों की सूचना देने के लिए प्रार्थना करता है जिन पर निर्यातक माल का निर्यात करने के लिए तैयार है। 

(ख) आयात लाइसेंस-आयात व्यापार में कुछ वस्तुओं को तो स्वतंत्रतापूर्वक आयात किया जा सकता है जबकि अन्य के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है और किन वस्तुओं के लिए नहीं, यह जानकारी देश की आयात निर्यात नीति से हो सकती है। यदि आयात की जाने वाली वस्तुओं के लिये आयात लाइसेंस की आवश्यकता होती है तो इसके लिए आयात लाइसेंस प्राप्त किया जाना चाहिए। भारत में प्रत्येक आयातक-निर्यातक के लिए विदेशी व्यापार महानिदेशक अथवा क्षेत्रीय आयात-निर्यात लाइसेंसिंग प्राधिकरण के पास पंजीयन कराना एवं आयात-निर्यात कोड नम्बर प्राप्त करना आवश्यक है। 

(ग) माल भेजने की सूचना-यह निर्यातक द्वारा आयातक को भेजा जाने वाला प्रलेख है, जिसमें यह सूचित किया जाता है कि माल का लदान करा दिया गया है। माल लदान/प्रेषण सूचना-पत्र में बीजक नम्बर, जहाजी बिल्टी, वायु मार्ग बिल संख्या एवं तिथि, जहाज का नाम एवं तिथि, निर्यातक, बन्दरगाह, माल का विवरण एवं मात्रा और जहांज की यात्रा प्रारम्भ करने की तिथि का विवरण होता है। 

(घ) आयातित माल की सूची-आयातित माल की सूची वह प्रलेख है जिसमें आयातित माल का विस्तृत विवरण दिया होता है और इसी के आधार पर ही माल को उतरवाया जाता है। 

प्रश्न 19. 
विश्व बैंक से सम्बद्ध प्रमुख संगठनों के नाम बतलाइये। 
उत्तर:
विश्व बैंक से सम्बद्ध प्रमुख संगठन 

  • पुनर्निर्माण एवं विकास अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (आई.बी.आर.डी.) 
  • अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आई.एफ.सी.) 
  • अन्तर्राष्ट्रीय विकास निगम (आई.डी.ए.) 
  • बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (एम.आई.जी.ए.) 
  • निवेश विवाद का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र (आई.सी.एस.आई.डी.)। 

प्रश्न 20. 
निम्न पर संक्षेप में टिप्पणी लिखें 
(क) संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास परिषद् 
(ख) बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी 
(ग) विश्व बैंक 
(घ) भारतीय व्यापार प्रवर्तन संगठन 
(ङ) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष। 
उत्तर:
(क) संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास परिषद् (UNCTAD) विकसित तथा विकासशील देशों के बढ़ते हुए व्यापारिक मतभेदों को कम करने के लिए गैट (GATT) के कई मसलों पर सभी देशों की स्वीकृति नहीं होने के कारण संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास परिषद् की स्थापना सन् 1964 में की गई थी। इस परिषद् के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-(1) सभी देशों के आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के विकास की गति को तीव्र करना । (2) विभिन्न देशों के आर्थिक विकास सम्बन्धी नीति-निर्धारण करना व ऐसा कार्य करना जिसे विश्व की समस्त अर्थव्यवस्थाओं में तालमेल बना रहे। 

(ख) बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (एम.आई.जी.ए.)-इसकी स्थापना अप्रेल 1988 में विश्व बैंक एवं आई.एफ.सी. के कार्यों की अनुपूर्ति हेतु की गई थी। इस एजेन्सी के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं- 

  • कम विकसित सदस्य देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देना। 
  • निवेशकों को राजनीतिक जोखिमों के विरुद्ध बीमा कराना। 
  • गैर-वाणिज्यिक जोखिमों के विरुद्ध गारण्टी देना। 
  • नये निवेशों का बीमा करना, वर्तमान निवेशों का विस्तार, निजीकरण एवं वित्तीय पुनर्गठन। 
  • प्रवर्तन एवं सलाहकार सेवाएं प्रदान करना।
  • साख का निर्माण करना। 

(ग) विश्व बैंक-पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (विश्व बैंक) की स्थापना का मुख्य उद्देश्य युद्ध से प्रभावित यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण एवं विश्व के अविकसित देशों के विकास के कार्य में सहायता प्रदान करना था। अपने प्रारम्भ के वर्षों में विश्व बैंक ने इस कार्य को पूरी कुशलता के साथ पूरा किया, तत्पश्चात् उसने अपना ध्यान विकासशील देशों के विकास पर देना शुरू किया। विश्व बैंक के अनुसार यदि अविकसित देशों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश किया जाये तो विकासशील देशों में सामाजिक आर्थिक बदलाव लाने में सहायता मिलेगी। अतः सन् 1960 में अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ का निर्माण किया गया, श्य अविकसित देशों को रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराना था। कालांतर में विश्व बैंक की छत्रछाया में अतिरिक्त संगठनों की स्थापना की गई। वर्तमान में विश्व बैंक पाँच अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का समूह है जो विभिन्न देशों को वित्त प्रदान करते हैं। 

(घ) भारत व्यापार प्रवर्तन संगठन (आई.टी.पी.ओ.)-इस संगठन की स्थापना भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा कम्पनी अधिनियम, 1956 के अन्तर्गत जनवरी, 1992 में की गई थी। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसका निर्माण दो पूर्व एजेन्सियों व्यापार विकास प्राधिकरण एवं भारतीय व्यापार मेला प्राधिकरण को मिलाकर किया गया। उद्योग एवं सरकार से नियमित एवं नजदीकी आदान-प्रदान है। यह देश में व देश के बाहर व्यापार मेले एवं प्रदर्शनियों का आयोजन कर औद्योगिक क्षेत्र की सेवा करता है। यह निर्यात फर्मों को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले एवं प्रदर्शनियों में भाग लेने में सहायता करता है, नई वस्तुओं के निर्यात को विकसित करता है, वाणिज्य-व्यवसाय सम्बन्धी आज तक की सूचना उपलब्ध कराता है एवं समंक प्रदान करता है। इसके बैंगलोर, मुम्बई, कोलकाता, कानपुर एवं चैन्नई में क्षेत्रीय कार्यालय हैं तथा जापान, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात एवं अमेरिका में अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालय स्थित हैं। 

(ङ) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.)-सन् 1945 में स्थापित अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. में स्थित है। सन् 2005 में 91 देश इसके सदस्य थे जो अब बढ़कर 188 हो गये हैं। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य एक व्यवस्थित अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली का विकास करना है अर्थात् अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली को सुविधाजनक बनाना एवं राष्ट्रीय मुद्राओं में विनिमय दर को समायोजित करना है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 21. 
आयात-निर्यात कोड (आई.ई.सी.) नम्बर प्राप्त करने की प्रक्रिया को संक्षेप में बतलाइये। 
उत्तर:
आयात-निर्यात कोड (आई.ई.सी.) नम्बर प्राप्त करने की प्रक्रिया 
आयात-निर्यात कोड नम्बर प्राप्त करने के लिए निर्यातक फर्म को प्रमुख निदेशक विदेशी व्यापार (डाइरेक्टर जनरल फॉर फॉरेन ट्रेड) के पास आवेदन करना होता है। इस आवेदन पत्र के साथ निर्यात खाता, अपेक्षित फीस की बैंक की रसीद, बैंक से एक फार्म पर प्रमाण पत्र, बैंक द्वारा अनुप्रमाणित फोटोग्राफ, गैर आवासी हित का विस्तृत ब्यौरा एवं धान रहना है उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है, इस आशय की घोषणा संलग्न की जाती है। इसके साथ ही प्रत्येक निर्यातक के लिए उपयुक्त निर्यात संवर्द्धन परिषद् के यहाँ पंजीयन कानूनी बाध्यता है। ऐसा होने पर ही सरकार से निर्यातक फर्मों को मिलने वाले लाभों को प्राप्त कर सकता है। 

प्रश्न 22. 
सीमा शुल्क निकासी एवं माल छुड़ाने की प्रक्रिया को संक्षेप में बतलाइये। 
उत्तर:
सीमा शुल्क निकासी एवं माल छुड़ाने की प्रक्रिया 
सर्वप्रथम आयातक सुपुर्दगी आदेश प्राप्त करेगा जिसे सुपुर्दगी के लिए बेचान भी कहते हैं। सामान्यतः जब जहाज बन्दरगाह पर पहुँचता है तो आयातक जहाजी बिल्टी के पृष्ठभाग पर बेचान करा लेता है। यह बेचान सम्बन्धित जहाजी कम्पनी के द्वारा किया जाता है। कुछ मामलों में जहाजी कम्पनी बिल का बेचान करने के स्थान पर एक आदेश-पत्र जारी कर देती है। यह आदेश-पत्र आयातक को माल की सुपुर्दगी लेने का अधिकार देता है। आयातक को माल को अपने अधिकार में लेने से पहले भाड़ा चुकाना होगा। 

आयातक को डॉक (गोदी) व्यय का भी भुगतान करना होगा जिसके बदले उसे बन्दरगाह न्यास शुल्क की रसीद मिलेगी। इसके लिए आयातक अवतरण एवं जहाजी शुल्क कार्यालय में एक फार्म को भरकर उसकी दो प्रति जमा करानी होती हैं। इसे आयात आवेदन कहते हैं। अवतरण एवं जहाजी शुल्क कार्यालय गोदी अधिकारियों की सेवाओं के बदले शुल्क लगाती है जिसे आयातक वहन करता है। डॉक व्यय का भुगतान कर देने पर आवेदन की एक प्रति आयातक को लौटा दी जाती है। आयातक इसके पश्चात् आयात शुल्क निर्धारण हेतु प्रवेश बिल फार्म भरेगा। एक मूल्यांकनकर्ता सभी विलेखों का ध्यान से अध्ययन कर निरीक्षण के लिए आदेश देगा। आयातक मूल्यांकनकतो के द्वारा तैयार विलख का प्राप्त करेगा और यदि सीमा शुल्क देना है तो उसका भुगतान करेगा। 

आयात शुल्क का भुगतान कर देने के पश्चात् प्रवेश बिल को गोदी अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा। अध्यक्ष इसे चिन्हित करेगा तो निरीक्षक से आयातित माल का भौतिक रूप में निरीक्षण करने के लिए कहेगा। निरीक्षक प्रवेश बिल पर ही अपनी अनुवेदना लिख देगा। आयातक अथवा उसका प्रतिनिधि इस प्रवेश बिल को बन्दरगाह अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करेगा। आवश्यक शल्क ले लेने के पश्चात वह अधिकारी माल देगा। 

प्रश्न 23. 
बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (एम.आई.जी.ए.) के उद्देश्य बतलाइये। 
उत्तर:
बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी के उद्देश्य अप्रेल 1988 में स्थापित बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • विश्व के कम विकसित सदस्य देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना। 
  • निवेशकों को राजनीतिक जोखिमों के विरुद्ध बीमा कराना। 
  • गैर वाणिज्यिक जोखिमों के विरुद्ध गारण्टी देना जैसे मुद्रा हस्तान्तरण में आने वाली जोखिमें, युद्ध एवं नागरिक उपद्रव एवं करार भंग आदि। 
  • नये निवेशों का बीमा कराना। वर्तमान निवेशों का विस्तार करना, निजीकरण को प्रोत्साहन देना तथा वित्तीय पुनर्गठन करना। 
  • सदस्य देशों को प्रवर्तन एवं सलाहकार सेवाएं प्रदान करना। 
  • साख का निर्माण करना। 

प्रश्न 24. 
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के लाभों को बतलाइये।
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के लाभ

  • विश्व व्यापार संगठन अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देता है एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय को आसान बनाता है।
  • यह संगठन समस्त सदस्य देशों के बीच विवादों को आपसी बातचीत से निपटाने का कार्य करता है।
  • विश्व व्यापार संगठन के नियम अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं सम्बन्धों को मृदु एवं सम्भाव्य बनाते हैं।
  • विश्व व्यापारसंगठन ने स्वतंत्र व्यापार को बढावा दिया है जिसके कारण आर्थिक विकास में तीव्रता आई है।
  • विश्व व्यापार संगठन श्रेष्ठ शासन को प्रोत्साहित करती है।
  • स्वतन्त्र व्यापार के कारण विभिन्न प्रकार की अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुओं को प्राप्त करने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
  • यह संगठन विकासशील देशों के विकास, व्यापार से सम्बन्धित मामलों में विशेष ध्यान रखकर प्राथमिकता के आधार पर व्यवहार कर पोषण करने में सहायक होता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 25. 
अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (आई.डी.ए.) के मुख्य उद्देश्य बतलाइये। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (आई.डी.ए.) के मुख्य उद्देश्य 

  • कम विकसित सदस्य देशों को आसान शर्तों पर ऋण के रूप में वित्त उपलब्ध कराना। 
  • कम विकसित सदस्य देशों को आसान शर्तों पर विकास वित्त प्रदान करना। 
  • गरीब देशों में गरीबी दूर करने में सहायता प्रदान करना। 
  • कम विकसित देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, उत्पादकता एवं जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए रियायती ब्याज दर पर वित्त उपलब्ध कराना। 
  • आर्थिक प्रबन्ध सेवाएँ जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, मानव संसाधन विकास एवं जनसंख्या नियन्त्रण आदि। 

प्रश्न 26. 
जनरल एग्रीमेंट फॉर टैरिफ्स एण्ड ट्रेड क्या है? 
उत्तर:
जनरल एग्रीमेंट फॉर टैरिफ्स एण्ड ट्रेड-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक की तर्ज पर ब्रैटनवुड्स सम्मेलन में प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संघ की स्थापना का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना एवं सुविधाजनक बनाना तथा उस समय व्याप्त विभिन्न प्रतिबन्ध एवं पक्षपात पर काबू पाना है। लेकिन यह विचार अमेरिका के कड़े विरोध के कारण व्यवहार में नहीं आ सका। लेकिन इस विचार को पूर्ण रूप से त्याग देने के स्थान पर जो देश बटनवुड्स सम्मेलन में भाग ले रहे थे, ने विश्व को ऊँचे सीमा शुल्क एवं उस समय लागू एवं दूसरे प्रकार के प्रतिबन्धों से मुक्त करने के लिए आपस में कोई व्यवस्था करना तय किया। यह व्यवस्था शुल्क एवं व्यापार का साधारण समझौता (जनरल एग्रीमेंट फॉर टैरिफ्स एण्ड ट्रेड) अर्थात् गैंट (GATT) कहलाया। 

प्रश्न 27. 
विश्व बैंक के कार्यों को संक्षेप में बतलाइये। 
उत्तर:
विश्व बैंक के कार्य- 

  • आरम्भ के वर्षों में मूलभूत ढाँचागत सुविधाओं के विकास के लिए ऋण प्रदान करना जैसे ऊर्जा, परिवहन इत्यादि। 
  • अविकसित एवं विकासशील देशों के विकास के लिए इन देशों में औद्योगिक एवं कृषि क्षेत्र के विकास का प्रयास करना। 
  • विभिन्न देशों को नकदी फसल उगाने के लिए सहायता करना। 
  • लघु पैमाने के उद्यमों को संसाधनों की उपलब्धता कराना। 
  • विभिन्न देशों के विभिन्न क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि कर ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी को दूर करने का प्रयत्न करना। 

प्रश्न 28. 
भारतीय पैकेजिंग संस्थान (आई.आई.पी.) को संक्षेप में समझाइये। 
उत्तर:
भारतीय पैकेजिंग संस्थान (आई.आई.पी.)-भारतीय पैकेजिंग संस्थान की स्थापना 1966 में भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय एवं भारतीय पैकेजिंग उद्योग एवं सम्बन्धित हितों के संयुक्त प्रयास से एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में की गई थी। इसका मुख्यालय एवं प्रमुख प्रयोगशाला मुम्बई में एवं कोलकाता, दिल्ली एवं चेन्नई में तीन क्षेत्रीय प्रयोगशालाएँ स्थित हैं। यह पैकेजिंग एवं जाँच का प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान है। यह संस्थान राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार की पैकेजिंग की जरूरतों को पूरा करता है। यह तकनीकी सलाह देने, पैकेजिंग के विकास की जाँच सेवाएँ, प्रशिक्षण एवं शैक्षणिक कार्यक्रम संवर्द्धन इनामी प्रतियोगिता, सूचना सेवाएं एवं अन्य सहायक क्रियाएँ करता है। 

प्रश्न 29. 
'निर्यात निरीक्षण परिषद्' पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर:
निर्यात निरीक्षण परिषद--निर्यात निरीक्षण परिषद् की स्थापना भारत सरकार द्वारा निर्यात गुणवत्ता, नियंत्रण एवं निरीक्षण अधिनियम, 1963 की धारा 3 के अन्तर्गत की गई थी। इस परिषद् का मुख्य उद्देश्य गुणवत्ता नियन्त्रण एवं लदानपूर्व निरीक्षण के माध्यम से निर्यात व्यवसाय का संवर्द्धन करना है। निर्यात की वस्तुओं के गुणवत्ता नियन्त्रण एवं पूर्व लदान निरीक्षण सम्बन्धी क्रियाओं पर नियंत्रण हेतु यह एक शीर्ष संस्था है। कुछ वस्तुओं को छोड़कर शेष सभी निर्यात की वस्तुओं के लिए ई.आई.सी. की स्वीकृति लेना अनिवार्य है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

दीर्घउत्तरात्मक प्रश्न- 

प्रश्न 1. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय तथा आन्तरिक व्यवसाय में अन्तर स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय तथा आन्तरिक व्यवसाय/घरेलू व्यवसाय में अन्तर 
1. क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का क्षेत्र जहाँ विस्तृत होता है, वहीं आन्तरिक व्यवसाय का क्षेत्र संकुचित होता है। 

2. क्रेताओं एवं विक्रेताओं की राष्ट्रीयता-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में विभिन्न देशों की राष्ट्रीयता प्राप्त लोग एवं संगठन भाग लेते हैं, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में व्यावसायिक लेन-देन में एक ही देश के व्यक्ति अथवा संगठन भाग लेते हैं। 

3. सौदों को अन्तिम रूप देना-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में भाषा, रुझान, सामाजिक रीतियाँ एवं व्यावसायिक उद्देश्य एवं व्यवहार में अन्तर के कारण एक-दूसरे से संवाद एवं व्यावसायिक सौदों को अन्तिम रूप देना अपेक्षाकृत अधिक कठिन होता है, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में क्रेता एवं विक्रेता दोनों एक ही देश के रहने वाले होते हैं। इसीलिए दोनों पक्षकार एक-दूसरे को भली-भाँति समझते हैं, अतः व्यावसायिक सौदों को अन्तिम रूप देना आसान होता है। 

4. अन्य हितार्थियों की राष्ट्रीयता-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में अन्य दूसरे हितार्थी जैसे-आपूर्तिकर्ता, कर्मचारी, मध्यस्थ, अंशधारक एवं साझेदार अलग-अलग देशों से होते हैं, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में अन्य दूसरे हितार्थी जैसे आपूर्तिकर्ता, कर्मचारी, मध्यस्थ, अंशधारक एवं साझेदार सामान्यतः एक ही देश के नागरिक होते हैं। 

5. उत्पादन के साधनों की गतिशीलता-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में विभिन्न देशों के बीच उत्पादन के साधन जैसे- श्रम एवं पूँजी अपेक्षाकृत कम गतिशील होते हैं, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में एक देश की सीमाओं में उत्पादन के साधन जैसे श्रम एवं पूँजी अपेक्षाकृत अधिक गतिशील होते हैं। 

6. बाजारों में ग्राहक के स्वरूप में भिन्नता-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में ग्राहक अलग-अलग देशों के होते हैं इसलिए उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी भिन्न होती है। उनकी रुचि, फैशन, भाषा, विश्वास एवं रीति-रिवाज, रुझान एवं वस्तुओं को प्राथमिकता में अन्तर के कारण न केवल माँग में भिन्नता होती है, बल्कि उनके सम्प्रेषण, स्वरूप एवं क्रय व्यवहार में विविधता होती है। यद्यपि आन्तरिक व्यवसाय में किसी एक देश के ग्राहकों की रुचि एवं पसन्द में अन्तर हो सकते हैं; किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय की तुलना में अपेक्षाकृत कम होते हैं। 

7. व्यवसाय पद्धतियाँ एवं आचरण-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में विभिन्न देशों की व्यवसाय पद्धतियों एवं आचरणों में बहुत अधिक अन्तर होता है, जबकि आन्तरिक व्यवसाय की दशा में एक ही देश के भीतर व्यवसाय पद्धतियों एवं आचरण में इतना अन्तर नहीं होता है। 

8. राजनीतिक प्रणाली एवं जोखिमें अलग-अलग देशों की राजनीतिक प्रणालियों के स्वरूप एवं जोखिमों की सीमा अधिक होती है, जो कभी-कभी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में बाधक बन जाती है, जबकि आन्तरिक व्यवसाय को एक ही देश की राजनीतिक प्रणाली एवं जोखिमों से वास्ता पड़ता है। 

9. व्यवसाय के नियम एवं नीतियाँ-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में लेन-देन पर बहुत से देशों के नियम-कानून एवं नीतियाँ, सीमा शुल्क एवं कोटा आदि लागू होते हैं, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में एक ही देश के नियम, कानून, नीतियाँ एवं कर प्रणाली लागू होती हैं। 

10. व्यावसायिक लेन-देनों के लिए प्रयुक्त मुद्रा विभिन्न देशों की मुद्राएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। विनिमय दर अर्थात् किसी एक देश की मुद्रा के मूल्य परिवर्तित होते रहते हैं। फलतः अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में संलग्न फर्म को अपनी वस्तओं का मल्य निर्धारित करना एवं विदेशी विनिमय की जोखिमों से सरक्षा कठिन हो जाती है, जबकि आन्तरिक व्यवसाय में व्यावसायिक लेन-देनों के लिए प्रयुक्त मुद्रा सम्बन्धी कोई समस्या नहीं रहती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 2. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के चयन को शासित करने वाले तत्त्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिये। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के चयन को शासित करने वाले तत्त्व- अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश करने की कुछ महत्त्वपूर्ण प्रणालियाँ एवं उनके लाभ व सीमाएँ निम्नलिखित हैं, जिनके आधार पर निर्णय लिया जा सकता है कि किन परिस्थितियों में कौनसी प्रणाली अधिक उपयुक्त है- 

1. आयात-निर्यात-निर्यात से अभिप्राय वस्तु एवं सेवाओं को अपने देश से दूसरे देश को भेजने से है। इसी प्रकार से आयात का अर्थ है विदेशों से माल को खरीदकर अपने देश में लाना। एक व्यावसायिक फर्म आयात-निर्यात दो तरीकों से कर सकती है-प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आयात-निर्यात।

प्रत्यक्ष आयात/निर्यात से फर्म स्वयं विदेशी क्रेता तक पहुँचती है और सारी औपचारिकताओं को स्वयं पूरा करती है। दसरी तरफ अप्रत्यक्ष आयात-निर्यात वह है जिसमें फर्म की भागीदारी न्यूनतम होती है तथा वस्तुओं के आयात निर्यात से सम्बन्धित अधिकांश कार्य को कुछ मध्यस्थ करते हैं। 

लाभ-

  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश के अन्य माध्यमों की तुलना में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रवेश की यह सबसे सरल पद्धति है। 
  • आयात/निर्यात में संबद्धता कम होती है अर्थात् इसमें व्यावसायिक इकाइयों को उतना धन एवं समय लगाने की आवश्यकता नहीं है जितना कि अन्य माध्यमों को स्थापित करने में लगाया जाता है। 
  • आयात/निर्यात माध्यमों में विदेशों में निवेश का जोखिम शून्य होता है; क्योंकि इसमें ज्यादा धन की आवश्यकता नहीं होती। 

सीमाएँ-
(1) आयात-निर्यात में वस्तुओं को भौतिक रूप से एक देश से दूसरे देश में लाया-ले जाया जाता है। इसलिए इन पर पैकेजिंग, परिवहन एवं बीमा की लागत आती है। साथ ही सीमा शुल्क एवं अन्य कर भी लगते हैं। इससे वस्तुओं की लागत में वृद्धि हो जाती है और वह कम प्रतियोगी हो जाते हैं। 

(2) जब किसी देश में आयात पर प्रतिबन्ध लगा होता है तो वहाँ निर्यात नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में फर्मों के पास केवल अन्य माध्यमों का विकल्प रह जाता है जैसे अनुज्ञप्ति/फ्रैंचाइजिंग या संयुक्त उपक्रम। 

(3) निर्यात इकाइयाँ मूल रूप से अपने गृह देश से प्रचालन करती हैं। वे अपने देश में उत्पादन कर उन्हें दूसरे देशों में भेजती हैं। निर्यात फर्मों के कार्यकारी अधिकारियों का अपनी वस्तुओं के प्रवर्तन के लिए अन्य देशों की गिनी चुनी यात्राओं को छोड़कर इनका विदेशी बाजार से और अधिक सम्पर्क नहीं हो पाता। इससे निर्यात इकाइयाँ स्थानीय इकाइयों की तुलना में घाटे की स्थिति में रहती हैं। 

2. संविदा विनिर्माण-यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का वह स्वरूप है जिसमें एक फर्म विदेशों में अपनी आवश्यकता के अनुसार घटक एवं वस्तुओं के उत्पादन के लिए स्थानीय विनिर्माता अथवा विनिर्माताओं से अनुबन्ध कर लेती है। ठेके पर विनिर्माण को बाह्यस्रोतीकरण भी कहते हैं। इसके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं- 

  • कुछ घटकों का उत्पादन जैसे स्वचालित वाहनों का घटक। इस घटक को बाद में कार में प्रयोग में लाया जाता है। 
  • घटकों को मिलाकर अन्तिम उत्पाद में परिवर्तित करना जैसे-कम्प्यूटर के विभिन्न पार्टी को मिलाकर कम्प्यूटर बनाना। 
  • कुछ वस्तुओं का पूर्ण रूप से उत्पादन जैसे सिले-सिलाये वस्त्र। 

लाभ-

  • इसमें अन्तर्राष्ट्रीय फर्मे उत्पादन सुविधाओं की स्थापना में बिना पूँजी लगाये बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन करा लेती हैं। ये फर्मे दूसरे देशों में पहले से ही उपलब्ध उत्पादन सुविधाओं का उपयोग करती हैं। 
  • बाह्य देशों में इनकी कोई पूँजी नहीं लगी होती है या फिर कम पूँजी लगी होती है। इसलिए इसमें जोखिम कम उठानी पड़ती है। 
  • ठेके पर उत्पादन कम लागत पर करवाया जाना संभव हो जाता है विशेष रूप से यदि स्थानीय उत्पादनकर्ता ऐसे देशों में हैं जहाँ कच्चा माल एवं श्रम सस्ता है। 
  • बाहरी देशों के स्थानीय उत्पादकों को भी ठेके पर उत्पादन का लाभ मिलता है। यदि उनकी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है तो उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। 
  • स्थानीय उत्पादकों को भी ठेका निर्माण के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में सम्मिलित होने का अवसर मिलता है। यदि अन्तर्राष्ट्रीय निकाय इन उत्पादित वस्तुओं की अपनी देश को आपूर्ति करते हैं या फिर किसी अन्य देश को भेजते हैं तो निर्यात फर्मों को मिलने वाले प्रोत्साहन का लाभ भी मिलता है। 

हानियाँ/सीमाएँ-

  • स्थानीय फर्मे यदि उत्पादन, डिजाइन एवं गुणवत्ता मानक के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय फर्म के सामने गुणवत्ता उत्पादन की कठिन समस्या पैदा हो सकती है। 
  • दूसरे देश के स्थानीय उत्पादक का उत्पादन प्रक्रिया पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता। 
  • संविदा निर्माण के अन्तर्गत उत्पादन करने वाली स्थानीय इकाई अपनी इच्छानुसार इस माल को नहीं बेच सकती। इसे अपने माल को अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी को पूर्व निर्धारित मूल्य पर बेचना होगा। 

3. अनुज्ञप्ति/लाइसेंस एवं विक्रेयाधिकार-अनुज्ञप्ति या लाइसेंस प्रदान करना एक ऐसी अनुबन्धीय व्यवस्था है जिसमें एक फर्म दूसरे देश की दूसरी फर्म की एक फीस (रायल्टी) के बदले में पेटेंट अधिकार, व्यापार के रहस्य या फिर तकनीक दे देती है। 

विशेषाधिकार (फ्रैंचाइजिंग) में जनक कम्पनी अन्य स्वतन्त्र कम्पनी को एक निर्धारित तरीके से व्यवसाय संचालन का अधिकार देती है। यह अधिकार फ्रैंचाइजर के उत्पादों को उसका नाम, उत्पादन एवं विपणन तकनीक का प्रयोग करते हुए बेचने के रूप में अथवा व्यवसाय के रूप में हो सकता है। 

लाभ-

  • बहुत कम विदेशी निवेश के कारण फ्रैंचाइजर की विदेशी व्यापार से होने वाली हानि में कोई भागीदारी नहीं होती। 
  • यह विदेशी व्यापार में प्रवेश के लिये यह सबसे सरल मार्ग है। 
  • फ्रैंचाइजी से तब तक पूर्व निर्धारित फीस का भुगतान मिलता रहेगा जब तक उसकी व्यावसायिक इकाई में उत्पादन अथवा विक्रय होता रहेगा। 
  • बाह्य देश के व्यवसाय का प्रबन्ध फ्रैंचाइजी द्वारा किया जाता है जो कि स्थानीय व्यक्ति होता है। इसीलिए सरकार द्वारा व्यवसाय के अधिग्रहण या उसमें हस्तक्षेप का जोखिम कम होता है। 
  • फ्रैंचाइजी क्योंकि एक स्थानीय व्यक्ति होता है, इसलिए उसे बाजार का अधिक ज्ञान होता है। इससे फ्रैंचाइजर अपने कार्य सफलतापूर्वक चला सकता है। 
  • अन्य फर्म फ्रैंचाइजी के ट्रेडमार्क का उपयोग नहीं कर सकती है। 

सीमाएँ:

  • फ्रैंचाइजी जब अधिकारिक वस्तुओं के विनिर्माण में निपुणता प्राप्त कर लेता है, तो उसके द्वारा समान उत्पाद के थोड़े भिन्न ब्रांड के नाम से व्यापार करने का खतरा रहता है।
  • यदि व्यापार के रहस्यों को भली प्रकार से गुप्त नहीं रखा गया तो विदेशी बाजार में दूसरों को ज्ञान हो जायेगा। 
  • कुछ समय पश्चात् फ्रैंचाइजर एवं फ्रैंचाइजी के बीच खातों को रखने, रायल्टी का भुगतान एवं गुणवत्ता उत्पादों के उत्पादन के सम्बन्ध में मानकों का पालन नहीं करना जैसे मामलों पर मतभेद पैदा हो जाते हैं। 

4. संयुक्त उपक्रम-संयुक्त उपक्रम अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का एक सामान्य माध्यम है। संयुक्त उपक्रम का अर्थ होता है दो या दो से अधिक स्वतंत्र इकाइयों के संयुक्त स्वामित्व में एक फर्म की स्थापना। विस्तृत अर्थों में यह संगठन का वह स्वरूप है, जिसमें एक लम्बी अवधि के लिए सहयोग की अपेक्षा की जाती है। एक संयुक्त स्वामित्व उपक्रम को तीन प्रकार से बनाया जा सकता है- 

  • विदेशी निवेशक द्वारा स्थानीय कम्पनी में हिस्सेदारी का क्रय करके। 
  • स्थानीय फर्म द्वारा पूर्व स्थापित विदेशी फर्म में हिस्सा प्राप्त कर लेना। 
  • विदेशी एवं स्थानीय उद्यमी दोनों ही मिलकर एकल या एक उद्यम की स्थापना कर लें। 

लाभ:

  • संयुक्त उपक्रमों की समता पूँजी में स्थानीय साझी का भी योगदान होता है, इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय फर्म पर विश्वव्यापी विस्तार में कम वित्तीय भार पड़ेगा। 
  • इनके कारण अधिक पूँजी एवं श्रम शक्ति वाली बड़ी योजनाओं को कार्यान्वित करना सम्भव हो पाता है। 
  • विदेशी व्यावसायिक इकाइयों को स्थानीय साझी के मेहमान देश की प्रतियोगी परिस्थितियों, संस्कृति, भाषा, राजनीतिक प्रणाली एवं व्यावसायिक पद्धतियों के सम्बन्ध में जानकारी का पूरा लाभ प्राप्त होता है। 
  • कई मामलों में विदेशी व्यापार में प्रवेश करना खर्चीला एवं जोखिम भरा भी होता है। संयुक्त उपक्रम करार के द्वारा इस प्रकार की लागत एवं जोखिम को बाँटने के माध्यम से इनसे बचा जा सकता है। 

सीमाएँ:

  • विदेशी फर्म जो संयुक्त उपक्रम में भागीदार बनती है, वह अपनी प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज विदेशी स्थानीय फर्म के साथ बाँटती है। इससे प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज दूसरों को उजागर किये जाने का भय रहता है। 
  • द्विस्वामित्व व्यवस्था में मतभेद की सम्भावना सदैव बनी रहती है। 

5. सम्पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाइयाँ/कम्पनियाँ-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का यह माध्यम उन कम्पनियों की पसन्द होता है, जो अपने विदेशों में परिचालन पर पूर्ण नियन्त्रण चाहते हैं। जनक कम्पनी अन्य देशों में स्थापित कम्पनी में 100 प्रतिशत पूँजी निवेश कर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त कर लेती है। 

इनकी स्थापना निम्न प्रकार से की जा सकती है-
प्रथम, विदेशों में परिचालन प्रारंभ करने के लिए एक बिल्कुल ही नई कम्पनी स्थापित करना। इसे 'हरित क्षेत्र उपक्रम' भी कहते हैं। द्वितीय, दूसरे देश में पहले से ही स्थापित संगठन का अधिग्रहण कर लेना तथा मेहमान देश में इसी इकाई के माध्यम से अपने उत्पादों का उत्पादन एवं संवर्द्धन करना। 

लाभ-

  • जनक कम्पनी अपने विदेश की क्रियाओं पर पूरा नियन्त्रण रख सकती है। 
  • जनक कम्पनी क्योंकि अपनी विदेशी सहायक कम्पनी के प्रचलन पर नजर रखती है। इससे इसके प्रौद्योगिकी एवं व्यापार के राज दूसरों पर नहीं खुलते। 

सीमाएँ.-
(1) जनक कम्पनी को विदेशी सहायक कम्पनी को पूँजी में 100 प्रतिशत निवेश करना होगा। इस प्रकार का अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय छोटी एवं मध्यम आकार की इकाइयों के लिए उपयुक्त नहीं है, जिनके पास विदेशों में निवेश के लिए पर्याप्त धन नहीं है। 

(2) अब क्योंकि जनक कम्पनी को ही विदेशी सहायक कम्पनी की 100 प्रतिशत समता पंजी में धन लगाना होता है। इसीलिए यदि इसके विदेशी व्यापारिक कार्य असफल रहते हैं, तो उसकी पूरी हानि इसी को वहन करनी पड़ेगी। 

(3) कुछ देश अपने देश में ऐसी कम्पनियों की स्थापना के विरुद्ध हैं। इस प्रकार से विदेशों में व्यवसाय संचालन को बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाना पड़ता है। 

अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश करने के तरीकों को प्रभावित करने वाले घटक- 
1. वित्त की उपलब्धता-यदि अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश करने वाली इकाई के पास अत्यधिक वित्त है तो वह सम्पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई का चयन करेगी; परन्तु वित्त की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है तो वह आयात-निर्यात के माध्यम अथवा अनुज्ञप्ति के माध्यम का चयन करेगी।

2. विपणन की सुविधा-यदि अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश करने वाली इकाई अपने स्रोतों से वस्तुओं एवं सेवाओं का क्रय-विक्रय कर सकती है, तो वह सम्पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई का चयन करेगी अन्यथा वह आयात निर्यात प्रक्रिया को प्राथमिकता देगी। 

3. सरकारी प्रतिबन्ध-कई बार सरकार भी विदेशी व्यापार में प्रवेश के प्रकार पर प्रतिबन्ध लगा देती है। फलतः अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश करने वाली संस्था को इस बात को भी ध्यान में रखना होगा। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 3. 
भारत वैश्वीकरण की राह पर है। स्पष्ट कीजिये। 
उत्तर: 
भारत वैश्वीकरण की राह पर 
यू.एस.एस.आर. में कम्यूनिस्ट सरकार के पतन के पश्चात् तथा यूरोप व अन्य देशों में अपनाये जाने वाले विभिन्न सुधार कार्यक्रमों के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के क्षेत्र में मूलभूत परिवर्तन हुए और इसने उत्थान के एक नये युग के रूप में प्रवेश किया। भारत भी इससे अछूता नहीं रह पाया। अस्सी के दशक में भारत भारी ऋण के बोझ से दबा हुआ था। सन् 1991 में भारत ने अपने भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए कोष जुटाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) को गुहार लगायी।

आई.एम.एफ. भारत को इस शर्त पर ऋण देने के लिये तैयार हो गया कि भारत ढाँचागत परिवर्तन करेगा जिससे कि ऋण के भुगतान को सुनिश्चित किया जा सके। भारत के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। यह आई.एम.एफ. का ही भारत पर दबाव था जिसके कारण भारत सरकार को आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। परिणामस्वरूप भारत सरकार ने सन् 1991 में अपनी औद्योगिक नीति में उदारीकरण एवं वैश्वीकरण की नीति को महत्त्व दिया। सन् 1991 की औद्योगिक नीति के लागू होने के बाद से ही आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण को प्रोत्साहन मिला। 

यद्यपि भारत की सुधार प्रक्रिया थोड़ी धीमी हो गई है फिर भी भारत वैश्वीकरण एवं विश्व अर्थव्यवस्था से पूरी तरह से जुड़ जाने के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। एक ओर कई बहु-राष्ट्रीय निगम अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री का भारतीय बाजार में साहस कर रही हैं, वहीं भारतीय कम्पनियों ने भी विदेशों में उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद एवं सेवाओं के विपणन हेतु अपने देश से दूसरे देशों के बाजारों में प्रवेश किया है। अब तो यह स्थिति हो गई है कि कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादों के साथ भारत में अपने पैर जमा चुकी हैं वहीं कई भारतीय कम्पनियों ने भी विदेशों में अपने व्यवसाय का विस्तार किया है। 

प्रश्न 4. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के क्षेत्र को समझाइए। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय के अन्तर्गत प्रमुख क्रियाएँ निम्नलिखित आती हैं-
1. वस्तुओं का आयात एवं निर्यात-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में वस्तुओं के आयात-निर्यात को सम्मिलित किया जाता है। व्यापार वस्तुओं के निर्यात का अर्थ है मूर्त वस्तुओं अर्थात् जिन्हें हम देख सकते हैं, को अन्य देशों को भेजना तथा इनके आयात का अर्थ है मूर्त वस्तुओं को बाह्य देश से अपने देश में लाना। व्यापारिक वस्तुओं के आयात-निर्यात अर्थात् वस्तुओं के व्यापार में मूर्त वस्तुएँ ही सम्मिलित होती हैं। 

2. सेवाओं का आयात एवं निर्यात-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में सेवाओं का आयात एवं निर्यात भी सम्मिलित है। सेवाओं के आयात-निर्यात में अमूर्त वस्तुओं का व्यापार होता है। इसी अमूर्त लक्षण के कारण सेवाओं के व्यापार को 'अदृश्य व्यापार' भी कहा जाता है। आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सेवाओं का व्यापार होता है जिनमें पर्यटन एवं यात्रा, भोजनालय एवं विश्राम (होटल एवं जलपान-गृह), मनोरंजन, परिवहन, पेशागत सेवाएँ (जैसे—प्रशिक्षण, भर्ती, परामर्श देना एवं अनुसन्धान), सम्प्रेषण (डाक, टेलीफोन, फैक्स, कूरियर एवं अन्य श्रव्य-दृश्य), निर्माण एवं इंजीनियरिंग, विपणन (थोक विक्रय, फुटकर विक्रय, विज्ञापन, विपणन अनुसन्धान एवं भण्डारण), शैक्षणिक एवं वित्तीय सेवाएँ (जैसे कि बैंकिंग एवं बीमा)। इनमें से पर्यटन एवं परिवहन विश्व व्यापार में प्रमुख स्थान रखते हैं। 

3. अनुज्ञप्ति एवं फ्रेंचाइजी-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का एक और तरीका है। किसी दूसरे देश में वहीं के व्यवसायी को कुछ फीस के बदले आपके अपने ट्रेडमार्क, पेटेंट या कॉपीराइट के अन्तर्गत वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रय की अनुमति देना। अनुज्ञप्ति प्रणाली में ही विदेशी पेय पदार्थ पैप्सी एवं कोकोकोला का स्थानीय स्तर पर उत्पादन एवं विक्रय किया जाता है। फ्रेंचाइजी भी अनुज्ञप्ति प्रणाली के समान है। लेकिन यह सेवाओं के सन्दर्भ में प्रयुक्त होती है जैसे-मेकडोनाल्ड्स फ्रेंचाइजी प्रणाली के द्वारा ही सम्पूर्ण विश्व में स्वयं सेवा खाद्य जलपान-गह 

4. विदेशी निवेश-विदेशों में निवेश करना अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का एक और महत्त्वपूर्ण प्रकार है। विदेशी निवेश में कुछ वित्तीय प्रतिफल के बदले विदेशों में धन का निवेश किया जाता है। विदेशी निवेश दो प्रकार के हो सकते हैं-(i) प्रत्यक्ष निवेश एवं (ii) पेटिका निवेश। 

(i) प्रत्यक्ष निवेश-इसमें एक कम्पनी किसी देश में वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन एवं विपणन के लिए वहाँ संयन्त्र एवं मशीनों जैसी परिस्थितियों में प्रत्यक्ष निवेश करती है। प्रत्यक्ष निवेश निवेशक को विदेशी कम्पनी में नियन्त्रण का अधिकार देता है। इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अर्थात एफ.डी.आई. कहते हैं। जब किसी एक या अधिक विदेशी व्यवसायी के साथ उत्पादन एवं विपणन में धन लगाया जाता है तो इस क्रिया को संयुक्त उपक्रम कहते हैं। यदि कोई कम्पनी चाहे तो वह विदेशी उपक्रम में 100 प्रतिशत निवेश कर एक पूर्ण रूप से अपने स्वामित्व में एक सहायक कम्पनी की स्थापना कर सकती है। इस प्रकार से उस सहायक कम्पनी के विदेशों में व्यवसाय पर इसका पूरा नियन्त्रण होगा। 

(ii) पेटिका निवेश-इसमें एक कम्पनी का दूसरी कम्पनी में उसके शेयर खरीद या फिर ऋण के रूप में निवेश होता है। निवेशक कम्पनी को लाभांश या ऋण पर ब्याज के रूप में आय प्राप्त होती है। इसमें निवेशक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के समान उत्पादन एवं विपणन क्रियाओं में लिप्त नहीं होता है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 5. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से राष्ट्र/देश को प्राप्त होने वाले लाभों की विवेचना कीजिए। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय से राष्ट्र/देश को प्राप्त होने वाले लाभ 
1. विदेशी मदा के अर्जन में सहायता अन्तर्राष्टीय व्यवसाय में भाग लेने से एक देश को विदेशी मुद्रा के अर्जन में सहायता मिलती है। ऐसी विदेशी मुद्रा का उपयोग वह देश ऐसी वस्तुओं के आयात में कर सकता है, जो वहाँ उपलब्ध नहीं हैं या पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती। 

2. संसाधनों का अधिक क्षमता से उपयोग-अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का संचालन इस सामान्य सिद्धान्त पर किया जाता है कि आप उन वस्तुओं का उत्पादन करें जिसे आपका देश अधिक क्षमता से कर सकता है तथा आधिक्य उत्पादन को दूसरे देशों के उन उत्पादों से विनिमय कर लें जिनका वे अधिक क्षमता से उत्पादन कर सकते हैं। जब सभी राष्ट्र इस सिद्धान्त पर व्यापार करते हैं तो वे यदि सभी वस्तु एवं सेवाओं का स्वयं ही उत्पादन करें, तो इस वस्तुओं का उत्पादन कर सकेंगे जिनका भली-भाँति उत्पादन कर सकते हैं। इस प्रकार से सभी देशों की वस्तु एवं सेवाओं को एकत्रित करके उसे समानता के आधार पर उनमें वितरित कर दिया जाये तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय में लगे हुए सभी देश लाभान्वित होंगे। 

3. विकास की सम्भावनाएँ एवं रोजगार के अवसरों में सुधार-यदि उत्पादन केवल घरेलू उपभोग के लिए किया जाता है तो इससे एक सीमा के बाद विकास एवं रोजगार की सम्भावनाओं में रुकावट पैदा होगी। यह देखने में आया है कि अनेक विकासशील देश बड़े पैमाने पर उत्पादन की अपनी योजनाओं को इसलिए कार्यान्वित नहीं कर सके; क्योंकि घरेलू बाजार में आधिक्य उत्पादन की खपत नहीं थी इसीलिए वह रोजगार के अवसर भी पैदा नहीं कर सके। 

कुछ समय पश्चात् कुछ देशों जैसे-चीन, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया आदि देशों ने विदेशों में अपने माल की बिक्री पर ध्यान दिया तथा 'निर्यात करो और फलो-फूलो' की रणनीति अपनाई एवं शीघ्र ही विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनायी। इससे न केवल उनके विकास के अवसर बढ़े; बल्कि इनके देशवासियों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हुए। 

4. जीवन स्तर में वृद्धि-यदि आज वस्तुओं एवं सेवाओं का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार नहीं होता तो विश्व समुदाय के लिए दूसरे देशों में उत्पादित वस्तुओं का उपभोग सम्भव नहीं होता। आज वे इन वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग कर उच्च जीवन स्तर को ऊँचाइयों की ओर ले जा रहे हैं। 

प्रश्न 6. 
अनुज्ञप्ति/लाइसेंस एवं मताधिकार पर एक लेख लिखें। 
उत्तर:
अनुज्ञप्ति/लाइसेंस एवं मताधिकार-अनुज्ञप्ति या लाइसेंस प्रदान करना एक ऐसी अनुबन्धीय व्यवस्था है, जिसमें एक फर्म दूसरे देश की फर्म को फीस (रॉयल्टी) के बदले में अपने पेटेंट अधिकार, व्यापार के रहस्य या फिर तकनीक दे देती है। जो फर्म दूसरी फर्म को इस प्रकार का लाइसेंस प्रदान करती है वह लाइसेंस प्रदानकर्ता एवं बाहरी देश की फर्म जो इस प्रकार के अधिकार प्राप्त करती है को केवल तकनीक का ही लाइसेंस नहीं दिया जाता; बल्कि फैशन उद्योग में कई डिजाइनकर्ता अपने नाम के प्रयोग करने का लाइसेंस दे देते हैं। इस प्रकार जब दो देशों की फर्मों के बीच ज्ञान, तकनीक एवं पेटेन्ट अधिकार का पारस्परिक विनिमय होता है तो इसे प्रति अनुज्ञप्ति लाइसेंस कहते हैं। 

मताधिकार या विशेषाधिकार अनुज्ञप्ति लाइसेंस से काफी मिलता-जुलता है। लेकिन पहले का प्रयोग वस्तुओं के उत्पादन एवं विनिमय के लिए होता है, तो मताधिकार का प्रयोग सेवाओं के सन्दर्भ में किया जाता है। विशेषाधिकार अनुज्ञप्ति से अधिक कठोर होता है। विशेषाधिकार प्रदानकर्ता सामान्यतया विशेषाधिकार प्राप्तकर्ताओं से अपने व्यवसाय का प्रचालन किस प्रकार से करना चाहिए, इस सम्बन्ध में सख्त नियम एवं शर्ते रखते हैं। इन दोनों अन्तरों को छोड़कर विशेष अधिकार अनुज्ञप्ति के समान ही है। विशेषाधिकार समझौते में भी एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को तकनीक, ट्रेडमार्क एवं पेटेन्ट को एक निश्चित प्रतिफल के बदले निश्चित समय के लिए उपयोग करने का अधिकार देता है। 

अविभावक कम्पनी को विशेषाधिकार प्रदानकर्ता एवं समझौते के दूसरे पक्ष को विशेषाधिकार प्राप्तकर्ता कहते हैं। फ्रेंचाइजर कोई भी सेवा प्रदान करने वाला जैसे एक जलपान-गृह, होटल, यात्रा एजेन्सी, बैंक, थोक विक्रेता या फिर फुटकर विक्रेता हो सकता है जिसने कि अपने नाम या ट्रेडमार्क के अधीन सेवाओं के निर्माण एवं विपणन के विशेष तकनीक का विकास किया हो। विशिष्ट तकनीक के कारण ही फ्रेंचाइजर अपने प्रतियोगियों से अधिक श्रेष्ठ हो जाता है तथा इससे सम्भावित सेवा प्रदानकर्ता विशेषाधिकार प्रणाली में सम्मिलित होने के लिए तैयार हो जाते हैं। 

लाभ-अनुज्ञप्ति के कुछ विशिष्ट लाभ निम्नलिखित हैं-

  • अनुज्ञप्ति/फ्रेंचाइजिंग प्रणाली में अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइज व्यवसाय को स्थापित करता है एवं इसमें अपनी पूँजी लगाता है अर्थात् अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर एक प्रकार से दूसरे देशों में निवेश करता है। 
  • बहुत ही कम निवेश के कारण अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर की विदेशी व्यापार से होने वाली हानि में कोई भागीदारी नहीं होती।
  • अनुज्ञप्तिधारक/फ्रेंचाइजी से तब तक पूर्व निर्धारित फीस का भुगतान मिलता रहेगा जब तक कि उसकी व्यावसायिक इकाई में उत्पादन अथवा विक्रय होता रहेगा। 
  • बाहरी देश के व्यवसाय का प्रबन्ध अनुज्ञप्ति धारक/फ्रेंचाइजी के द्वारा किया जाता है, जो कि एक स्थानीय व्यक्ति होता है। इसीलिए सरकार द्वारा व्यवसाय के अधिग्रहण अथवा उसमें हस्तक्षेप का जोखिम कम होता है। 
  • अनुज्ञप्तिधारक/फ्रेंचाइजी क्योंकि एक स्थानीय व्यक्ति होता है, उसे बाजार का ज्ञान होता है तथा उसके सम्पर्क-सूत्र भी अधिक होते हैं। इसका लाभ अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर को अपने विपणन कार्य को सफलतापूर्वक चलाने में मिलता है। 
  • अनुज्ञप्ति/फ्रेंचाइजिंग के अनुबन्ध की शर्तों के अनुसार इस अनुबन्ध के पक्षों को ही अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर के कॉपीराइट, पेटेंट एवं ब्राण्ड के नाम का बाह्य देशों में उपयोग करने का कानूनी अधिकार होता है। परिणामस्वरूप अन्य फर्मे इनका उपयोग नहीं कर सकती है। 

सीमाएँ:
अनुज्ञप्ति/फ्रेंचाइजिंग की कुछ प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं- 
1. अनुज्ञप्तिधारक/फ्रेंचाइजी जब आधिकारित वस्तुओं के विनिर्माण एवं विपणन में निपुणता प्राप्त कर लेता है तो उसके द्वारा समान उत्पाद से थोड़े भिन्न ब्राण्ड के नाम से व्यापार करने का खतरा बना रहता है। इससे अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। 

2. यदि व्यापार के रहस्य को गुप्त नहीं रखा गया तो विदेशी बाजार में दूसरे लोगों को इसकी जानकारी हो जायेगी। इस लापरवाही के कारण अनुज्ञप्तिदाता/फ्रेंचाइजर को अत्यधिक नुकसान हो सकता है। 

3. कुछ समय पश्चात् दोनों पक्षकारों में खातों के रखने, रॉयल्टी का भुगतान एवं गुणवत्ता उत्पादों के उत्पादन के पर मतभेद पैदा हो सकते हैं। आपस में मुकदमेबाजी तक की नौबत आ जाती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 7. 
निर्यात में प्रयुक्त प्रधान प्रलेखों की विवेचना कीजिए। 
उत्तर: 
निर्यात में प्रयुक्त प्रधान प्रलेख 
I. वस्तुओं से सम्बन्धित प्रलेख 
(1) निर्यात बीजक-निर्यात बीजक विक्रेता का विक्रय माल बिल होता है जिसमें बेचे गये माल के सम्बन्ध में सूचना दी जाती है, जैसे-माल की मात्रा, कुल मूल्य, पैकेजों की संख्या, पैकिंग पर चिह्न, गन्तव्य बन्दरगाह, जहाज का नाम, जहाजी बिल्टी संख्या, सुपुर्दगी सम्बन्धित शर्ते एवं भुगतान आदि। 

(2) पैकिंग सूची-पैकिंग सूची, पेटियों अथवा गाँठों की संख्या एवं इनमें रखे गये माल का विवरण है। इसमें निर्यात किये गये माल की प्रकति एवं इनके स्वरूप का विवरण दिया होता है। 

(3) उद्गम का प्रमाण-पत्र-उद्गम का प्रमाण-पत्र वह प्रमाण-पत्र होता है जो इस बात का निर्धारण करता है कि माल का उत्पादन किस देश में हुआ है। इस प्रमाण-पत्र से आयातक को कुछ पूर्व निर्धारित देशों में उत्पादित वस्तुओं पर शुल्क पर छूट या फिर अन्य छूट जैसे कोटा प्रतिबन्ध का लागू न होना, प्राप्त हो जाती है। जब कुछ चुनिंदा देशों से कुछ विशेष वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध हो तब भी इस प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है क्योंकि वस्तुएँ यदि प्रतिबन्धित देश में उत्पादित नहीं हैं तभी उन्हें आयातक देश में आने दिया जायेगा। 

(4) निरीक्षण प्रमाण-पत्र-निर्यात किये जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कुछ उत्पादों का किसी अधिकृत एजेन्सी द्वारा निरीक्षण अनिवार्य कर दिया गया है। भारतीय निर्यात निरीक्षण परिषद् (ई.आई.सी.आई.) एक ऐसी एजेन्सी है जो इस प्रकार का निरीक्षण करती है एवं इस आशय का प्रमाण पत्र जारी करती है कि प्रेषित माल का निर्यात गुणवत्ता नियन्त्रण एवं निरीक्षण अधिनियम, 1963 के तहत निरीक्षण कर लिया गया है एवं यह इस पर लागू गुणवत्ता नियन्त्रण एवं निरीक्षण शर्तों को पूरा करता है एवं यह निर्यात के सर्वथा योग्य है। प्रमाण-पत्र को अपने देश में आयातित वस्तुओं के लिए अधिकृत रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। 

II. जहाज से सम्बन्धित प्रलेख- 
(1) जहाजी कप्तान/कारिंदे की रसीद/मेट्स रसीद-मेट्स रसीद जहाज के नायक द्वारा जहाज पर माल के लदान के पश्चात् निर्यातक को दी जाती है। इस रसीद में जहाज का नाम, बर्थ, माल भेजने की तिथि, पैकेजों का विवरण, चिह्न एवं संख्या, जहाज पर माल की प्राप्ति के समय में माल की स्थिति आदि का उल्लेख होता है। जहाजी कम्पनी तब तक जहाजी बिल्टी जारी नहीं करती जब तक कि यह मेट्स रसीद प्राप्त नहीं कर लेती। 

(2) जहाजी बिल-यह वह मुख्य प्रलेख है, जिसके आधार पर कस्टम कार्यालय, निर्यात करता है। जहाजी बिल में निर्यात किये जा रहे माल का विवरण, जहाज का नाम, बन्दरगाह जिस पर माल उतारा जाना है, अन्तिम गंतव्य देश, निर्यातक का नाम, पता आदि होता है। 

(3) जहाजी बिल्टी-जहाजी बिल्टी एक ऐसा प्रलेख है जो जहाजी कम्पनी द्वारा जारी जहाज पर माल प्राप्ति की रसीद है। साथ ही गंतव्य बन्दरगाह तक उन्हें ले जाने की शपथ भी। यह वस्तुओं और स्वामित्व के अधिकार प्रलेख है। इसीलिए यह बेचान एवं सुपुर्दगी द्वारा स्वतंत्र रूप से हस्तान्तरणीय है। 

(4) वायु मार्ग विपत्र-जहाजी बिल्टी के समान ही वायु मार्ग विपत्र एक ऐसा प्रलेख है जो एयरलाइन कम्पनी की हवाई जहाज पर माल की प्राप्ति की रसीद होती है जिसमें वह (एयरलाइन कम्पनी) गन्तव्य हवाई अड्डे तक उन्हें ले जाने का वचन देती है। यह भी माल पर मालिकाना हक का प्रलेख है एवं यह बेचान एवं सुपुर्दगी द्वारा स्वतन्त्र रूप से हस्तान्तरणीय होती है। 

(5) समुद्री बीमा पॉलिसी-यह एक सामान्य बीमा अनुबन्ध का प्रमाण-पत्र होता है जिसमें बीमा कम्पनी बीमा कराने वाले को प्रतिफल (प्रीमियम) के भुगतान के बदले किसी समुद्री जोखिम से हानि की क्षतिपूर्ति का वचन देती है। 

(6) गाड़ी टिकट-गाड़ी टिकट को गाड़ी चिट, वाहन अथवा गेट पास भी कहते हैं। इसे निर्यातक तैयार करता है तथा इसमें निर्यात किये जाने वाले सामान का पूरा विवरण होता है। जैसे माल भेजने वाले का नाम, पैकेजों की संख्या, जहाजी बिल संख्या, गन्तव्य बन्दरगाह एवं माल ढोने वाले का नम्बर आदि। 

III. भुगतान सम्बन्धी प्रलेख- 
(1) साख-पत्र-साख-पत्र आयातक के बैंक द्वारा दी जाने वाली वह गारण्टी है जिसमें वह निर्यातक के बैंक को एक निश्चित राशि तक के निर्यात बिल के भुगतान की गारण्टी देता है। यह अन्तर्राष्ट्रीय सौदों के निपटाने के लिए भुगतान का सबसे उपयुक्त एवं सुरक्षित साधन है। 

(2) विनिमय विपत्र-विनिमय विपत्र एक ऐसा लिखित प्रपत्र है जिसमें इसको जारी करने वाला दूसरे पक्ष को एक निश्चित राशि, एक निश्चित व्यक्ति अथवा इसके धारक की भुगतान करने का आदेश देता है। 

आयात-निर्यात व्यापार के संदर्भ में यह विपत्र निर्यातक द्वारा आयात पर लिखा जाता है जिसमें वह आयातक को एक निश्चित व्यक्ति अथवा इसके धारक को एक निश्चित राशि के भुगतान के लिए कहता है। निर्यात किये गये माल पर मालिकाना अधिकार देने वाले प्रलेखों को आयातक को केवल उस दशा में ही सौंपा जाता है जबकि वह बिल में दिये गये आदेशों को स्वीकार कर लेता है। 

(3) बैंक का भुगतान सम्बन्धित प्रमाण-पत्र-निर्यात लेन-देन में प्रयुक्त होने वाला यह प्रलेख ऐसा प्रमाण पत्र होता है जो यह प्रमाणित करता है कि एक निश्चित निर्यात प्रेषण से सम्बन्धित प्रलेखों (विनिमय विपत्र को सम्मिलित कर) का प्रमाणन कर लिया गया है (आयातक को भुगतान के लिए प्रस्तुत कर दि नियंत्रण नियमों के अनुरूप भुगतान प्राप्त कर लिया गया है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 8. 
देश के निर्यात की प्रोन्नति के लिए सरकार द्वारा तैयार विभिन्न प्रेरक एवं योजनाओं को सूचीबद्ध कीजिए एवं समझाइये। 
अथवा 
निर्यात प्रोत्साहन हेतु अपनाई जाने वाली योजनाओं का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
भारत के निर्यात की प्रोन्नति के लिए सरकार द्वारा तैयार विभिन्न प्रेरक एवं योजनाएँ निम्नलिखित हैं- 
1. शुल्क वापसी योजना-निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर यदि किसी प्रकार के शुल्क का भुगतान कर दिया गया है तो उसे निर्यातक को लौटा दिया जायेगा लेकिन इसके लिए उसे सम्बन्धित अधिकारियों को निर्यात का प्रमाण देना होगा। यह योजना शुल्क वापसी योजना कहलाती है। कुछ प्रमुख शुल्क वापसियों में निर्यात के लिए वस्तुओं पर उत्पादन शुल्क, कच्चे माल एवं निर्यात हेतु उत्पादन के लिए आयातित मशीनों पर सीमा शुल्क का भुगतान सम्मिलित है। 

2. बांड योजना के अन्तर्गत निर्यात हेतु विनिर्माण-इस सुविधा के अनुसार फर्मे वस्तुओं का उत्पादन, उत्पादन शुल्क अथवा अन्य कोई शुल्क दिये बिना कर सकती हैं। जो फमें इस सुविधा का लाभ उठाना चाहती हैं उन्हें बांड होता है कि वह वस्तुओं का उत्पादन निर्यात के उद्देश्य से कर रहे हैं तथा वह इनका वास्तव में निर्यात करेंगे। 

3. विक्रय कर के भुगतान से छुट-निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर विक्रय कर नहीं लगता। यही नहीं काफी लम्बी अवधि तक निर्यात क्रियाओं से अर्जित आय पर आयकर भी नहीं देना होता है। अब आयकर पर छूट केवल 100 प्रतिशत निर्यात मूलक इकाइयों एवं निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों/विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित इकाइयों को ही कुछ चुने हुए वर्षों के लिए ही मिलती है। 

4. अग्रिम लाइसेंस योजना-इस योजना के अन्तर्गत निर्यातक को निर्यात के लिए वस्तुओं के उत्पादन घरेलू एवं आयातित लागत की बिना किसी शुल्क का भुगतान किये आपूर्ति की छूट है। निर्यातक को निर्यात के लिए वस्तुओं के विनिर्माण के लिए वस्तुओं के आयात पर सीमा शुल्क नहीं देना होता। अग्रिम लाइसेंस दोनों प्रकार के निर्यातकों को उपलब्ध है जो नियमित रूप से निर्यात करते हैं एवं जो तदर्थ निर्यात करते हैं अर्थात् कभी-कभी निर्यात करते हैं। कभी कभी निर्यात करने वाली फर्म भी विशिष्ट निर्यात आदेशों के विरुद्ध इस प्रकार का लाइसेंस प्राप्त कर सकती है। 

5. निर्यात संवर्द्धन पूँजीगत वस्तुएँ योजना-निर्यात संवर्द्धन की इस योजना का मुख्य उद्देश्य निर्यात उत्पादन के लिए पूँजीगत वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन देना है। यह योजना निर्यात फर्मों को पूँजीगत वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन देती है। यह योजना निर्यात फर्मों को पूँजीगत वस्तुओं को नीची दर पर अथवा शून्य सीमा शुल्क पर आयात की अनुमति देती है। लेकिन शर्त यह है कि वह वास्तविक उपयोगकर्ता होना चाहिए तथा वह कुछ विशिष्ट निर्यात अनुग्रहों को पूरा करता हो।

यदि विनिर्माता इन शर्तों को पूरा करता है तो वह पूँजीगत वस्तुओं को या तो शून्य अथवा रियायती दर पर आयात कर चुकाकर आयात कर सकता है। समर्थक विनिर्माता एवं सेवा प्रदानकतो भी इस योजना के अन्तर्गत पूंजीगत वस्तुओं के आयात के लिए योग्य है। यह योजना विशेष औद्योगिक इकाइयों के लिए उपयोगी है जो अपने वर्तमान संयन्त्र एवं मशीनरी के आधुनिकीकरण एवं संवर्द्धन में रुचि रखते हैं। 

अब सेवा निर्यात फ भी, निर्यात के लिए सॉफ्टवेयर विकसित करने के लिए कम्प्यूटर साफ्टवेयर प्रणाली जैसी वस्तुओं के आयात के लिए इस सुविधा का लाभ उठाती हैं। 

6. निर्यात फर्मों को निर्यात गृह एवं सुपर स्टार व्यापार गृहों के रूप में मान्यता देने की योजना-विदेशी व्यापार में स्थापित निर्यातकों को प्रोन्नति एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उनके उत्पादों के विपणन में सहायता के लिए सरकार कुछ चुनिंदा निर्यातक फर्मों को निर्यात गृह, व्यापार गृह एवं सुपर स्टार व्यापार गृह के स्तर की मान्यता देती है। यह सम्मानजनक स्थान किसी फर्म को तब दिया जाता है जब वह पिछले कुछ चुने हुए वर्षों में निर्धारित औसत निर्यात निष्पादन को प्राप्त कर लेती है।

न्यूनतम पिछली औसत निर्यात निष्पादन को प्राप्त करने के साथ-साथ ऐसी निर्यातक फर्मों को आयात-निर्यात नीति में उल्लिखित अन्य शर्तों को भी पूरा करना होगा। निर्यात संवर्द्धन के लिए विपणन मौलिक ढाँचा एवं विशेषज्ञता के विकास को ध्यान में रखते हुए विभिन्न वर्गों के निर्यात गृहों को मान्यता प्रदान की गई है। निर्यात संवर्द्धन के लिए इन गृहों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की गई है। इन्हें उच्च श्रेणी के पेशेवर एवं गतिशील संस्थानों के रूप में कार्य करना होता है। ये निर्यात के उत्थान के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में करते हैं। 

7. निर्यात सेवाएँ-निर्यात सेवाओं को प्रोत्साहन देने के लिए विभिन्न श्रेणी के निर्यात गृहों को मान्यता दी गई है। इन्हें इनके निर्यात निष्पादन के आधार पर सेवा निर्यात गृह, अन्तर्राष्ट्रीय सेवा निर्यात गृह, अन्तर्राष्ट्रीय स्टार सेवा निर्यात गृह के नाम दिये गये हैं। 

8. निर्यात वित्त-निर्यातकों को आयातकों से भुगतान प्राप्त होने में कुछ समय लग सकता है। इसीलिए अधिकृत बैंकों द्वारा निर्यातकों को उनकी आवश्यकता पर्ति के लिए दो प्रकार का निर्यात वित्त उपलब्ध कराया जाता है पूर्व वित्त तथा लदान पश्चात् वित्त कहते हैं। 

जहाज में माल के लदान से पूर्व वित्त में निर्यातक को वित्त क्रय, प्रक्रियण, विनिर्माण अथवा पैकेजिंग के लिए उपलब्ध कराया जाता है। माल लदान पश्चात् वित्त योजना के अन्तर्गत माल लदान के पश्चात् साख की तिथि को बढ़ाने से उपलब्ध करायी जाती है। निर्यातकों को वित्त ब्याज की रियायती दरों पर उपलब्ध रहता है। 

9. निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र-निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र (ई.पी.जैड.) वह औद्योगिक परिक्षेत्र होते हैं जो राष्ट्रीय सीमा शुल्क क्षेत्र में अन्तः क्षेत्र का सजन करते हैं। ये सामान्यतः समद्री बन्दरगाह अथवा हवाई अड़े के उद्देश्य कम लागत पर निर्यात उत्पादन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक शुल्क रहित वातावरण प्रदान करना है। इसमें निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों के उत्पाद अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता एवं मूल्य दोनों में प्रतिस्पर्धा योग्य किये गये हैं।

जिनमें कांदला, सांताक्रुज, फाल्टा, नोएडा, कोचीन, चेन्नई एवं विशाखापट्टनम प्रमुख हैं। हाल में ही निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में परिवर्तित कर दिया गया है जो निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों का और अधिक उन्नत स्वरूप है। निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र आयात-नियोत को शासित करने वाले नियमों, श्रम एवं बैंकिंग से सम्बन्धित को ह सरकार ने इन क्षेत्रों को विकसित करने के लिए निजी, राज्य अथवा संयुक्त क्षेत्रों को अनुमति दे दी है। निजी ई.पी.जैड. के लिए गठित अन्तः मन्त्रालय कमेटी पहले से ही मुम्बई, सूरत एवं कांचीपुरम में निजी ई.पी.जैड. (निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र) स्थापित करने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे चुकी है। 

10. 100 प्रतिशत निर्यातपरक इकाइयाँ-(100 प्रतिशत ई.ओ.यूस.)-100 प्रतिशत निर्यातपरक इकाइयाँ योजना को 1981 में निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र (ई.पी.जैड.) योजना के पूरक के रूप में लागू किया गया। इसकी स्थापना निर्यात के लिए अतिरिक्त उत्पादन क्षमता पैदा करने की दृष्टि से की गई है। इसके लिए उचित नीतिगत कर ढाँचा, परिचालन में लोचपूर्णता एवं प्रेरणा उपलब्ध करायी जाती है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 9. 
आयात लेन देनों में प्रयुक्त मुख्य प्रलेखों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: 
आयात लेन-देनों में प्रयुक्त मुख्य प्रलेख 
1. व्यापारिक पूछताछ-यह आयातक की ओर से निर्यात को एक लिखित आग्रह होता है जिसमें वह निर्यातक द्वारा निर्यात की वस्तुओं के मूल्य एवं विभिन्न शर्तों की सूचना प्रदान करने के लिए कहता है। 

2. प्रारूप बीजक-यहाँ वह प्रलेख जसमें निर्यात के माल के मूल्य, गुणवत्ता, श्रेणी, डिजाइन, माप, भार तथा निर्यात की शर्तों का विस्तृत विवरण होता है। 

3. आयात आदेश अथवा इंडेंट-यह वह विलेख होता है जिसमें क्रेता (आयातक) आपूर्तिकर्ता (निर्यातक) को इसमें माँगी गई वस्तुओं की आपूर्ति का आदेश देता है। इस आदेश या इंडेंट में आयात की वस्तुओं, मात्रा एवं गुणवत्ता, मूल्य, माल लदान की पद्धति, पैकिंग की प्रकृति भुगतान का माध्यम आदि के सम्बन्ध में सूचना दी जाती है। 

4. साख-पत्र-साख-पत्र आयातक को बैंक द्वारा निर्यातक बैंक को एक निश्चित राशि के निर्यातक बिल के भुगतान की गारण्टी देता है। इसे निर्यातक आयातक को वस्तुओं के निर्यात के बदले में जारी करता है। 

5. माल प्रेषण की सूचना-यह निर्यातक द्वारा आयातक को भेजे जाने वाला प्रलेख है जिसमें यह सूचित करना होता है कि माल का लदान कर दिया गया है। माल लदान/प्रेषण सूचना पत्र में बीजक नम्बर, जहाजी बिल्टी, वायु मार्ग बिल संख्या एवं तिथि, जहाज का नाम एवं तिथि, निर्यात बन्दरगाह, माल का विवरण एवं मात्रा एवं जहाज की यात्रा प्रारम्भ तिथि होती है। 

6. जहाजी बिल्टी-जहाजी बिल्टी जहाज के कप्तान द्वारा तैयार एवं हस्ताक्षर युक्त विलेख होता है जिसमें वह माल के जहाज पर प्राप्ति को स्वीकार करता है। इसमें माल को निर्धारित बन्दरगाह तक ले जाने से सम्बन्धित शर्ते दी हुई रहती हैं। 

7. वायु मार्ग बिल-वायु मार्ग बिल एक ऐसा प्रलेख है जो एयर लाइन कम्पनी की वायुयान पर माल प्राप्ति की विधिवत रसीद होती है जिसमें वह माल को गंतव्य हवाई अड्डे तक ले जाने का वचन देती है। यह भी माल पर मालिकाना हक का प्रलेख है एवं यह भी बेचान एवं सुपुर्दगी द्वारा स्वतंत्र रूप से हस्तान्तरणीय है। 

8. प्रवेश बिल-प्रवेश बिल सीमा शुल्क कार्यालय द्वारा आयातक को दिया जाने वाला एक फार्म होता है जिसे आयातक माल की प्राप्ति पर भरता है। इसकी तीन प्रतियां होती हैं तथा इसे सीमा शुल्क कार्यालय में जमा कराया जाता है। इसमें जो सूचना दी हुई होती है वह है-आयातक का नाम एवं पता, जहाज का नाम, पैकेजों की संख्या, पैकेज पर चिन्ह, माल की मात्रा एवं मूल्य, निर्यातक का नाम एवं पता, गन्तव्य बन्दरगाह एवं देय सीमा शुल्क। 

9. विनिमय विपत्र-यह एक लिखित विपत्र है जिसमें इसको जारी करने वाला दूसरे पक्ष को एक निश्चित राशि एक निश्चित व्यक्ति अथवा इसके धारक को भुगतान के लिए कहता है। आयात-निर्यात लेन-देन के संदर्भ में यह निर्यातक द्वारा आयातक पर लिखा जाता है। जिसमें वह आयातक को एक निश्चित राशि एक निश्चित व्यक्ति अथवा उसके धारक को भुगतान करने का आदेश देता है। निर्यात किये गये माल पर मालिकाना अधिकार देने वाले प्रलेखों को आयातक को केवल उस दशा में ही सौंपा जाता है जबकि वह बिल में दिये गये आदेश को स्वीकृति प्रदान कर दे। 

10. दर्श बिल-यह विनिमय विपत्र का वह प्रकार है जिसमें इसका लेखक बैंक को आयातक को सम्बन्धित प्रलेख बिल को भुगतान कर देने पर ही देने का आदेश देता है। 

11. मुद्दती बिल-यह विनिमय विपत्र का वह प्रकार है जिसमें बिल को स्वीकार कर देने पर ही सौंपने का आदेश देता है। 

12. आयातित माल की सूची-यह वह प्रलेख है जिसमें आयातित माल का विस्तृत विवरण होता है। इसी के आधार पर माल को जहाज से उतरवाया जाता है। 

13. डॉक चालान-सीमा शुल्क सम्बन्धी औपचारिकओं की पूर्ति पर डाक व्यय का भुगतान किया जाता है। डॉक/गोदी व्यय का भुगतान करते समय आयातक अथवा उसके निकासी एजेण्ट डॉक व्यय की राशि एक चालान अथवा फार्म में दर्शाता है जिसे डॉक चालान कहते हैं। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 10. 
विश्व बैंक क्या है? इसके विभिन्न उद्देश्यों को एवं इससे सम्बद्ध एजेन्सियों की भूमिका की विवेचना कीजिये। 
अथवा 
विश्व बैंक पर एक विस्तृत लेख लिखिए। 
उत्तर: 
विश्व बैंक 
पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (आई.बी.आर.डी.) जिसे विश्व बैंक भी कहते हैं, एक ऐसी विश्वस्तरीय संस्था है, जिसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य यद्ध से प्रभावित यरोप के देशों की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण एवं विश्व के अविकसित देशों को विकास के कार्य में सहायता प्रदान करना था। सन् 1950 तक इस कार्य में सफलता प्राप्त कर लेने के पश्चात विश्व बैंक ने अविकसित देशों के विकास पर ध्यान देना प्रारम्भ किया। विश्व बैंक का मानना था कि जितना अधिक इन देशों में निवेश करेंगे विशेष रूप से सामाजिक क्षेत्र जैसे कि स्वास्थ्य एवं शिक्षा उतना ही अधिक विकासशील देशों में आवश्यक सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव लाना संभव होगा। अविकसित देशों में निवेश की इस पहल को मूर्त रूप देने के लिए 1960 में अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (आई.डी.ए.) का निर्माण किया गया। आई.डी.ए. की स्थापना का मुख्य उद्देश्य उन लोगों को रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराना था जिनकी प्रति व्यक्ति आय बहुत ही कम थी। 

कालांतर में विश्व बैंक की छत्रछाया में अतिरिक्त संगठनों की स्थापना की गई। आज विश्व बैंक पाँच अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का समूह है जो विभिन्न देशों को वित्त प्रदान करते हैं। ये अन्तर्राष्ट्रीय संगठन हैं-(1) पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (2) अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (3) अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम (4) बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (5) निवेश विवाद का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र। 

विश्व बैंक के उद्देश्य-

  • सदस्य राष्ट्रों की युद्ध-जर्जरित अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण एवं विकासशील सदस्य राष्ट्रों का आर्थिक विकास करना। 
  • अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी विनियोग को प्रोत्साहित करना। 
  • दीर्घकालीन सन्तुलित अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित करना। 
  • ऋण देने व ऋणों की गारण्टी देने में अधिक आवश्यक उत्पादन के कार्यों को प्राथमिकता देना।
  • सदस्य देशों की युद्धकालीन अर्थव्यवस्थाओं को शान्तिकालीन अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करना। 

विश्व बैंक के कार्य- 

  • विश्व बैंक आर्थिक विकास एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र के विस्तार का कार्य करता है। 
  • यह आर्थिक विकास का काम अविकसित देशों में भी करता है। लेकिन इन देशों में कमजोर प्रशासनिक कार्य योजना की कमी एवं निपुण श्रम की कमी के कारण सन्तोषजनक परिणाम नहीं मिले। 
  • लघु उद्योगों को संसाधन उपलब्ध कराता है। 
  • विश्व बैंक ने अविकसित देशों के मूलभूत ढाँचे के विकास के लिए इन देशों में औद्योगिक एवं कृषि के क्षेत्र में विकास लाने का निर्णय लिया। 
  • विभिन्न देशों को नकदी फसल उगाने के लिए सहायता दी जाती है जिससे कि उनकी आय में वद्धि हो। 
  • विभिन्न देशों में उत्पादकता में वृद्धि के द्वारा ग्रामीण गरीबी को दूर करना, गाँवों में गरीब लोगों की आय में वृद्धि करना, तकनीकी सहायता प्रदान करना एवं अनुसंधान एवं सहकारिता उद्यमों को प्रारम्भ करना। 

विश्व बैंक की प्रमुख संस्थाएँ/एजेन्सियाँ- 
1. अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (आई.डी.ए.)-सन् 1960 में विश्व बैंक की सम्बद्ध संस्था के रूप में की गई इस संस्था की स्थापना का मूल उद्देश्य कम विकसित सदस्य देशों को आसान शर्तों पर ऋण के रूप में वित्त उपलब कराना था। इसके इस उद्देश्य के कारण ही इसे आई.बी.आर.डी. की आसान ऋण खिड़की कहा जाता है। 

उद्देश्य-

  • कम विकसित सदस्य देशों को आसान शर्तों पर विकास वित्त प्रदान करना। 
  • सबसे गरीब देशों में गरीबी दूर करने में सहायता प्रदान करना। 
  • अल्प विकसित देश में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, उत्पादकता एवं जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए रियायती ब्याज दर पर वित्त उपलब्ध कराना। 
  • आर्थिक प्रबन्ध सेवाएँ जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, मानव संसाधन विकास एवं जनसंख्या नियन्त्रण आदि। 

2. अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आई.एफ.सी.)-इसकी स्थापना जुलाई 1956 में निजी क्षेत्र को वित्त उपलब्ध कराने के लिए की गई थी। आई.एफ.सी. भी विश्व बैंक की सम्बद्ध संस्था है। लेकिन इसका पृथक् कानूनी अस्तित्व, कोष एवं कार्य है। विश्व बैंक के सभी सदस्य आई.एफ.सी. के सदस्यता के योग्य होते हैं। 

3. बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (एम.आई.जी.ए.)-इसकी स्थापना अप्रेल 1988 में विश्व बैंक एवं आई.एफ.सी. के कार्यों की अनुपूर्ति हेतु की गई थी। 

बहुराष्ट्रीय निवेश गारण्टी एजेन्सी के प्रमुख उद्देश्य-

  • कम विकसित सदस्य देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • निवेशकों को राजनीतिक जोखिमों के विरुद्ध बीमा कराना।
  • गैर-वाणिज्यिक जोखिमों के विरुद्ध बीमा कराना।
  • गैर वाणिज्यक जोखिमों के विरुद्ध गारण्टी देना।
  • नये निवेशों का बीमा करना, वर्तमान निवेशों का विस्तार, निजीकरण एवं वित्तीय पुनर्गठन करना।
  • प्रवर्तन एवं सलाहकार सेवाएँ प्रदान करना।
  • साख का निर्माण करना। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 11. 
विश्व व्यापार संगठन एवं गैट पर टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर: 
विश्व व्यापार संगठन एवं गैट (GATT)
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक की तर्ज पर ब्रैटन वुड्स सम्मेलन के अन्तर्गत तीन अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का निर्माण किया गया। इनमें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संघ एक था। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना एवं उसे सुविधाजनक बनाना तथा द्वितीय विश्व युद्ध के समय व्याप्त विभिन्न प्रतिबन्धों एवं पक्षपात पर काबू पाना था। लेकिन यह विचार संयुक्त राज्य अमेरिका के कड़े विरोध के कारण व्यवहार में नहीं आ सका। परन्तु समस्त सदस्य देशों ने विश्व को ऊँचे सीमा शुल्क एवं उस समय लागू अन्य दूसरे प्रकार के प्रतिबन्धों से मुक्त कराने के लिए शुल्क एवं व्यापार का साधारण समझौता (GATT) का निर्माण किया। यह समझौता ही गैट के नाम से जाना जाता है। गैट 1 जनवरी, 1948 को अस्तित्व में आया और दिसम्बर, 1994 तक कार्यरत रहा। इसके सानिध्य में सीमा शुल्क एवं अन्य बाधाओं को कम करने के लिए बातचीत के कई दौर हुए। अन्तिम दौर (यूरूग्वे दौर) में सर्वाधिक संख्या में समस्याओं पर विचार किया गया एवं जिसकी अवधि सन् 1986 से 1994 तक की रही थी। 

गैट में विचार-विमर्श के यूरूग्वे दौर की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है. विभिन्न देशों में स्वतंत्र एवं संतोषजनक व्यापार की प्रोन्नति पर ध्यान देने के लिए एक स्थायी संस्था की स्थापना का निर्णय। इस निर्णय के परिणामस्वरूप गैट को 1 जनवरी, 1998 से विश्व व्यापार संगठन में परिवर्तित कर दिया गया। विश्व व्यापार संगठन का स्थापना का निर्णय। इस निर्णय के मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैण्ड में स्थित है। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना लगभग 50 वर्ष पूर्व के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन (आई.टी.ओ.) की स्थापना के मूल प्रस्ताव का क्रियान्वयन है। 

विश्व व्यापार संगठन गैट से अधिक एक शक्तिशाली संगठन है। यह न केवल वस्तुओं बल्कि सेवाओं एवं बौद्धिक सम्पदा अधिकार में व्यापार को शासित करता है। इसके अन्तर्गत सभी सदस्य देशों को सेवा व्यापार पर से प्रतिबन्ध को धीरे-धीरे समाप्त करना। प्रत्येक सदस्य देश सेवा से सम्बन्धित नियम एवं कानूनों, जिनमें वे व्यापार एवं सेवाओं से जुड़े अन्तर्राष्ट्रीय समझौते सम्मिलित हैं, जिन पर सदस्य देश ने हस्ताक्षर किये हैं, तुरन्त प्रकाशित करेगा। इस संगठन का वैश्विक स्तर है। भारत विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य है। 11 दिसम्बर 2005 को इसके 149 सदस्य थे जो 26 जून, 2014 को बढ़कर 160 हो गये। 

प्रश्न 12. 
निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र पर टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर:
निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र 
निर्यात प्रवर्तन क्षेत्र वे औद्योगिक परिक्षेत्र होते हैं जो.राष्ट्रीय सीमा शुल्क क्षेत्र में अन्तःक्षेत्र का सृजन करते हैं । यह सामान्यतः समुद्री बन्दरगाह अथवा हवाई अड्डे के समीप स्थित होते हैं। इनका उद्देश्य कम लागत पर निर्यात उत्पादन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक शुल्क रहित वातावरण प्रदान करना है। इससे निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों (ई.पी.जैड्स) के उत्पाद अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता एवं मूल्य दोनों में प्रतिस्पर्धा योग्य किये गये हैं जिनमें प्रमुख हैं: कांदला (गुजरात), सांताक्रुज (मुम्बई), फाल्टा (प. बंगाल), नोएडा (उ.प्र.), कोचीन (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु) एवं विशाखापट्टनम् (आन्ध्र प्रदेश)। 

सांताक्रूज क्षेत्र केवल इलैक्ट्रोनिक वस्तुओं एवं हीरा एवं जेवराती की मदों के लिए है। अन्य ई.पी.जैड. क्षेत्र अनेकों प्रकार की वस्तुओं का व्यापार करते हैं। हाल ही में ई.पी.जैड्स को विशेष आर्थिक क्षेत्र (स्पेशल इकोनोमिक जोन एस.ई.जैड.) में परिवर्तित कर दिया गया है जो निर्यात प्रवर्तन क्षेत्रों और अधिक उन्नत स्वरूप है। ई.पी.जैड. आयात-निर्यात को शासित करने वाले नियमों, श्रम एवं बैंकिंग से सम्बन्धित को छोड़कर मुक्त है। सरकार ने ई.पी.जैड. को विकसित करने के लिए निजी, राज्य अथवा संयुक्त क्षेत्रों को अनुमति दे दी है। निजी ई.पी.जैड. के लिए गठित अन्तः मंत्रालय कमेटी पहले ही मुम्बई, सूरत एवं कांचीपुरम में निजी ई.पी.जैड. स्थापित करने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे चुकी है। 

RBSE Class 11 Business Studies Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 13. 
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संस्थान एवं व्यापार समझौते पर टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संस्थान एवं व्यापार समझौते-सन् 1914 के प्रथम विश्व युद्ध एवं 1939-45 के द्वितीय विश्व युद्ध में पूरे विश्व में जीवन एवं सम्पत्ति को भारी नुकसान हुआ। विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएँ इससे बुरी तरह से प्रभावित हुईं। संसाधनों की कमी के कारण राष्ट्र कोई पुनर्निर्माण एवं विकास कार्य करने की स्थिति में नहीं थे। विश्व की मुद्रा प्रणाली में व्यवधान के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ा। विनिमय दर की कोई सर्वमान्य प्रणाली नहीं थी। ऐसे हालात में 44 देशों के प्रतिनिधि विश्व में शान्ति एवं सामान्य वातावरण की पुनः स्थापना के लिए उपाय ढूँढ़ने के लिए बैटनवुड्स, न्यू हैम्पशायर में एकत्रित हुए। 

मीटिंग का समापन तीन अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना के साथ हुआ। ये संस्थान हैं-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (आई.बी.आर.डी.) एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन (देश इन तीनों संगठनों को विश्व के आर्थिक विकास के तीन स्तम्भ मानते थे। विश्व बैंक को युद्ध के कारण नष्ट अर्थव्यवस्थाओं विशेषतः यूरोप का पुनर्निर्माण का कार्य सौंपा गया तो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को विश्व व्यापार के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करने के लिए विनिमय दरों में स्थिरता लाने का दायित्व सौंपा गया। आई.टी.ओ. का मुख्य कार्य सदस्य देशों के बीच उस समय व्यवहार में लाई जाने वाली विभिन्न प्रतिबन्ध एवं पक्षपातपूर्ण व्यवहार पर अधिकार प्राप्त कर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना एवं सुगम बनाना था।

प्रथम दो संस्थान अर्थात् पुनर्निर्माण एवं विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (आई.बी.आर.डी.) एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तुरन्त अस्तित्व में आ गये लेकिन डब्ल्यू.टी.ओ. के विचार को अमेरिका के विरोध के कारण मूर्त रूप प्रदान नहीं किया जा सका। संगठन के स्थान पर ऊँचे सीमा शुल्क तथा अन्य प्रतिबन्धों से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को मुक्त करने की व्यवस्था उभरकर आई। इस व्यवस्था को 'गैट' (जनरल एग्रीमेंट फॉर टेरिफ एण्ड ट्रेड) का नाम दिया गया। भारत इन तीनों संस्थाओं के संस्थापक सदस्यों में से एक है।

admin_rbse
Last Updated on July 14, 2022, 1:27 p.m.
Published July 14, 2022