RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण Important Questions and Answers.

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RBSE Class 11 Biology Chapter 16 Important Questions पाचन एवं अवशोषण


I. रिक्त स्थानों की पूर्ति के प्रश्न (Fill in the blanks type questions) 

प्रश्न 1. 
पाचन की प्रक्रिया यांत्रिक एवं ......................... विधियों द्वारा सम्पन्न होती है। 
उत्तर:
रासायनिक

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

प्रश्न 2. 
......................... भोजन को निगलते समय श्वास नली में प्रवेश करने से रोकती है। 
उत्तर:
घांटी दक्कन

प्रश्न 3. 
मस्कुलेरिस प्रायः वर्तुल पेशियों एवं बाह्य ......................... पेशियों की बनी होती है। 
उत्तर:
अनुदैर्घ्य

प्रश्न 4. 
......................... को यकृत की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई कहते हैं।
उत्तर:
यकृत पालि

प्रश्न 5. 
अग्नाशय बहि:स्रावी और ......................... दोनों ही ग्रन्थियों की तरह कार्य करती हैं।
उत्तर:
अन्त: लावी

प्रश्न 6. 
लार में उपस्थित ......................... जीवाणुओं के संक्रमण को रोकता है। 
उत्तर:
लाइसोजाइम

प्रश्न 7. 
आमाशय ......................... घण्टे तक भोजन का संग्रहण करता है।
उत्तर:
4 - 5

प्रश्न 8. 
नवजातों के जठर रस में ......................... नामक प्रोटीन अपपटनीय एंजाइम होता है जो दूध के प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है।
उत्तर:
रेनिन

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प्रश्न 9. 
सबसे अधिक पचित भोजन का अवशोषण ......................... में होता है। 
उत्तर:
छोटी आंत्र

प्रश्न 10. 
मलद्वार से मल का बहिक्षेपण एक ......................... क्रिया है।
उत्तर:
ऐच्छिक।
 
II. सत्य व असत्य प्रकार के प्रश्न (True and False type questions) 

प्रश्न 1. 
पीलिया रोग में त्वचा और आँख पित्त वर्णकों के जमा होने से पीले रंग के दिखाई देते हैं। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 2. 
वसा अम्ल और ग्लिसेरॉल अविलय होने के कारण रक्त में अवशोषित नहीं हो पाते हैं। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 3. 
आहारनाल के विभिन्न भागों की पेशियों की सक्रियता भी स्थानीय एवं केन्द्रीय तंत्रिकीय क्रियाओं द्वारा नियमित नहीं होती है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
असत्य

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प्रश्न 4. 
हमारे भोजन के मुख्य अवयव कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा हैं। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 5. 
अपचित भोजन (मल) त्रिकांत्र (Ileoceacal) कपाट द्वारा वृहदांत्र की अंध नाल (Caecum) में प्रवेश करता है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 6. 
आमाशय में सरल शर्कराओं, अल्कोहल और दवाओं का भी अवशोषण होता है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 7. 
वमन (Vomitting) प्रतिवर्ती क्रिया मेडुला में स्थित वमन केन्द्र द्वारा नियंत्रित नहीं होती है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 8. 
कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन मुख गुहा से शुरू होता है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 9. 
प्रोटीन की अत्यधिक कमी के कारण होने वाले रोग को क्वाशीओरकॉर कहते हैं। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 10. 
मरास्मस रोग विटामिन की कमी से होने वाला रोग है। (सत्य/असत्य) 
उत्तर:
असत्य

III. निम्न को सुमेलित कीजिए (Match the following)

स्तम्भ - I में दिये गये पदों का स्तम्भ - II में दिये गये पदों के साथ सही मिलान कीजिए

प्रश्न 1. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. कार्डियक कपाट

(i) इलियम व कोलन के मध्य

B. ओडिका कपाट

(ii) ग्रसिका व आमाशय के मध्य

C. इलियासीकल कपाट

(iii) आमाशय व ग्रहणी के मध्य

D. पायलोरिक

(iv) सहपित्तवाहिनी व ग्रहणी के


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. कार्डियक कपाट

(ii) ग्रसिका व आमाशय के मध्य

B. ओडिका कपाट

(iv) सहपित्तवाहिनी व ग्रहणी के

C. इलियासीकल कपाट

(i) इलियम व कोलन के मध्य

D. पायलोरिक

(iii) आमाशय व ग्रहणी के मध्य


प्रश्न 2. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. क्वाशियोरकोर

(i) मल का पतला होना

B. पीलिया

(ii) प्रोटीन और कैलोरी की कमी

C. प्रवाहिका

(iii) त्वचा का पीला होना

D. मरास्मस

(iv) प्रोटीन की कमी


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. क्वाशियोरकोर

(iv) प्रोटीन की कमी

B. पीलिया

(iii) त्वचा का पीला होना

C. प्रवाहिका

(i) मल का पतला होना

D. मरास्मस

(ii) प्रोटीन और कैलोरी की कमी


प्रश्न 3. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. टायलिन

(i) वसा

B. पेप्पसिन

(ii) स्य र्च

C. लाइपेज

(iii) DNA

D. न्यूक्लिऐज

(iv) प्रोटीन


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. टायलिन

(ii) स्य र्च

B. पेप्पसिन

(iv) प्रोटीन

C. लाइपेज

(i) वसा

D. न्यूक्लिऐज

(iii) DNA


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प्रश्न 4. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. लिवरकुहन की दरारें

(i) ग्रहणी के लूप में

B. अग्नाशय

(ii) आमाशय

C. गील्सन केप्पसूल

(iii) आंत

D. जठरपन्थि

(iv) यकृत


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. लिवरकुहन की दरारें

(iii) आंत

B. अग्नाशय

(i) ग्रहणी के लूप में

C. गील्सन केप्पसूल

(iv) यकृत

D. जठरपन्थि

(ii) आमाशय

 

प्रश्न 5. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. गोबलेट कोशिकाएँ

(i) जीभ

B. फ्रेनुलम

(ii) श्लेष्मा

C. लार

(iii) HCl

D. अम्लजन कोशिकाएँ

(iv) अधोजिव्हा ग्रन्थियाँ


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. गोबलेट कोशिकाएँ

(ii) श्लेष्मा

B. फ्रेनुलम

(i) जीभ

C. लार

(iv) अधोजिव्हा ग्रन्थियाँ

D. अम्लजन कोशिकाएँ

(iii) HCl


प्रश्न 6. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. दांत

(i) इन्सुलिन

B. अग्नाशय

(ii) पित्त रस

C. यकृत

(iii) HCO3-

D. विद्युत अपघट्य

(iv) इनमल


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. दांत

(iv) इनमल

B. अग्नाशय

(i) इन्सुलिन

C. यकृत

(ii) पित्त रस

D. विद्युत अपघट्य

(iii) HCO3-


प्रश्न 7. 

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. नैज कारक

(i) दूध की प्रोटीन

B. रेनिन

(ii) विद्यामिन B12

C. बहिसावी

(iii) अग्नाशय

D. अन्तःस्रावी

(iv) लार ग्रंथि


उत्तर:

स्तम्भ - I

स्तम्भ - II

A. नैज कारक

(ii) विद्यामिन B12

B. रेनिन

(i) दूध की प्रोटीन

C. बहिसावी

(iv) लार ग्रंथि

D. अन्तःस्रावी

(iii) अग्नाशय


अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
होंठों, मसूढों व गालों के बीच पायी जाने वाली गुहा को क्या कहते हैं?
उत्तर:
होंठों, मसूढ़ों व गालों के बीच पायी जाने वाली गुहा को प्रधाण (Vestibule) कहते हैं।

प्रश्न 2. 
नरम तालु का वह भाग जो ग्रसनी में लटका रहता है, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
नरम तालु का वह भाग जो ग्रसनी में लटका रहता है, उसे वैलम पेलेटाई कहते हैं।

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प्रश्न 3. 
जिला मुखगुहा के फर्श से किस दोहरी झिल्ली से जुड़ी रहती है?
उत्तर:
जिला मुखगुहा के फर्श से फ्रेन्यूलम लिंगुई (Frenulum Linguae) नामक दोहरी शिल्ली से जुड़ी रहती है।

प्रश्न 4.
कशेरुकियों के शरीर के सबसे कठोरतम भाग को क्या कहते हैं?
उत्तर:
कशेरुकियों के शरीर के सबसे कठोरतम भाग को इनेमल (Enamel) कहते हैं।

प्रश्न 5. 
मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में इन्साइजर, केनाइन, प्रीमोलर व मोलर की संख्या लिखिए।
उत्तर:
इन्साइजर - 4, केनाइन - 2, प्रीमोलर - 4 एवं मोलर - 6.

प्रश्न 6. 
मनुष्य में तीसरे मोलर दाँत को क्या कहते हैं?
उत्तर:
मनुष्य में तीसरे मोलर दाँत को अक्कल दाढ़ (Wisdom teeth) कहते हैं।

प्रश्न 7. 
पित्त वर्णकों (Bile pigments) की मात्रा के रक्त में बढ़ने से होने वाले रोग का नाम लिखिए।
उत्तर:
पित्त वर्णकों (Bile pigments) की मात्रा के रक्त में बढ़ने से पीलिया (jaundice) नामक रोग हो जाता है।

प्रश्न 8. 
नैज कारक किसके अवशोषण में सहायक है? 
उत्तर:
नैज कारक विटामिन B12 के अवशोषण में सहायक है। 

प्रश्न 9. 
मनुष्य के आमाशय की आकृति किस प्रकार की होती है? 
उत्तर:
मनुष्य के आमाशय की आकृति 'J' आकार की होती है।

प्रश्न 10. 
यकृत की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को क्या कहते हैं?
उत्तर:
यकृत की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को यकृत पालिका कहते हैं।

प्रश्न 11. 
भोजन को श्वसन मार्ग में जाने से रोकने वाली संरचना को क्या कहते हैं?
उत्तर:
भोजन को श्वसन मार्ग में जाने से रोकने वाली संरचना को घांटी ढक्कन (Epiglottis) कहते हैं।

प्रश्न 12. 
लैंगरहैन्स के द्वीप समूह कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर:
लैंगरहैन्स के द्वीप समूह अग्न्याशय (Pancreas) में पाये जाते हैं।

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प्रश्न 13. 
मुखगुहा के दो कार्य लिखिए। 
उत्तर:

  1. भोजन का चर्वण 
  2. निगलने की क्रिया। 

प्रश्न 14. 
लीवर कुहन की दरारों का कार्य लिखिए।
उत्तर:
लीवर कुहन की दरारों का कार्य आंत्रीय रस का स्त्रावण करना होता है।

प्रश्न 15. 
पित्त का प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर:
पित्त का प्रमुख कार्य वसा का पायसीकरण (Emulsification) करना है।

प्रश्न 16. 
मरास्मस (Marasmus) रोग का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
मरास्मस रोग का मुख्य कारण कम अन्तराल में पुनः गर्भधारण अथवा शिशु का जन्म होना है।

प्रश्न 17. 
पाचन (Digestion) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जटिल पोषक पदार्थों को जल अपपटन द्वारा सरल पोषक पदार्थों में बदलने की क्रिया को पाचन कहते हैं।

प्रश्न 18. 
ऐल्कोहॉल का अवशोषण आहार नाल के किस भाग में होता है?
उत्तर:
ऐल्कोहॉल का अवशोषण आहारनाल के आमाशय (Stomach) भाग में होता है।

प्रश्न 19. 
बोलस किसे कहते हैं? 
उत्तर:
मुंह में पाचन के पश्चात् भोजन का स्वरूप बोलस कहलाता है।

प्रश्न 20. 
उस कपाट का नाम बताइए जो सह पित्त वाहिनी व ग्रहणी के बीच स्थित होता है।
उत्तर:
ओडाई की अवरोधिनी (Sphinctor of odi) नामक कपाट पाया जाता है।

प्रश्न 21. 
यदि भोजन के उपरान्त आमाशय में सूई द्वारा सोडियम कार्बोनेट का घोल पहुँचा दें तो पाचन पर इसका क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
सोडियम कार्बोनेट का घोल माध्यम को अम्लीय से क्षारीय कर देगा जिसके फलस्वरूप पेप्सिनोजन प्रोरेनिन इत्यादि अपनी सक्रिय अवस्था में नहीं आ सकेंगे और प्रोटीन का पाचन नहीं हो सकेगा।

प्रश्न 22. 
अमरूद खाने हेतु मनुष्य सबसे पहले किन दाँतों का उपयोग करेगा?
उत्तर:
अमरूद खाने हेतु मनुष्य सबसे पहले कृन्तक/इन्साइजर्स दाँतों का उपयोग करेगा।

प्रश्न 23. 
ऑक्सिन्टिक कोशिकाओं द्वारा सावित किन्हीं दो पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. HCL 
  2. नजकारक। 

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प्रश्न 24. 
PEM का पूरा नाम लिखिए। 
उत्तर:
प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण। 

प्रश्न 25. 
बंगलादेश में मुक्ति युद्ध किससे सम्बन्धित है? 
उत्तर:
बंगलादेश में मुक्ति युद्ध कुपोषण से सम्बन्धित है।

प्रश्न 26. 
सूखा, अकाल एवं राजनीतिक उथल - पुथल के कारण जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा किससे प्रभावित है?
उत्तर:
सूखा, अकाल एवं राजनीतिक उथल - पुथल के कारण जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण (PEM) से प्रभावित है।

प्रश्न 27. 
प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण से सम्बन्धित दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. मरास्मस 
  2. क्वाशिओरकर। 

प्रश्न 28. 
मरास्मस रोग कितनी आयु के शिशुओं में पाया जाता है?
उत्तर:
मरास्मस रोग एक वर्ष से कम आयु के शिशुओं में पाया जाता है।

प्रश्न 29. 
इथोपिया में भयंकर सूखे के कारण वहाँ के लोग किसके शिकार हुए?
उत्तर:
इथोपिया में भर्यकर सूखे के कारण वहाँ के लोग कुपोषण के शिकार हुए।

प्रश्न 30. 
कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन का स्थूल ऊष्मीय (कैलोरी) मान कितना होता है?
उत्तर:

  1. कार्बोहाइड्रेट - 4.1 Kcal/g
  2. प्रोटीन - 5.65 Kcal/g. 

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
मनुष्य में कितनी जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं? नाम लिखिए तथा लार ग्रन्थियों के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य में तीन जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं, जो निम्नलिखित हैं:

  • कर्णपूर्व ग्रन्थि (Parotid gland) 
  • अधोजम्भ ग्रन्थि (Subinaxillary gland) 
  • अघोजिव्हा प्रन्धि (Sublingual gland) 


लार ग्रन्थियों के कार्य (Functions of Salivary glands):

  1. ग्रन्धियों से सावित लार मुखगुहा को नम बनाये रखती है। 
  2. भोजन को नम बनाने एवं निगलने में सहायता करती है।
  3. भोजन में उपस्थित मण्ड का आंशिक रूप से पाचन करती है तथा टायलिन (Phylin) द्वारा स्टार्च को माल्टोज में बदलती है।
  4. मुँह व दांतों को साफ रखती है।
  5. लार में उपस्थित लाइसोजाइम्स जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायता प्रदान करती है।

प्रश्न 2. 
मनुष्य में आहारनाल से सम्बन्धित पाचन प्रन्थियाँ कौनकौनसी हैं?
उत्तर:
मनुष्य में आहारनाल से सम्बन्धित पाचन प्रन्थियाँ निम्न है:

  1. लार ग्रन्धियाँ (Salivary glands) 
  2. आन्याशय (Pancreas) 
  3. यकृत (Liver)

यकृत (Liver): यह मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी प्रन्धि है जिसका वयस्क में भार लगभग 1.2 से 15 कि.ग्रा. होता है। यह उदर में मध्य पट के ठीक नीचे स्थित होता है और इसकी दो पालियां (Lobes) होती हैं। यकृत पालिकाएं यकृत की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाइयाँ हैं, जिनके अंदर यकृत कोशिकाएं रज्जु की तरह उपस्थित रहती हैं। प्रत्येक पालिका संयोजी ऊतक की एक पतली परत से ढकी होती है जिसे ग्लिसंस केपसूल कहते हैं। यकृत की कोशिकाओं से पित्त रस का स्राव होता है जो यकृत नलिका से होते हुए पतली पेशीय थैलीनुमा रचना जिसे पित्ताशय कहते हैं जिसमें सान्द्रित एवं जमा होता है, पित्ताशय यकृतीय नलिका से मिलकर एक मूल पित्त वाहिनी बनाती है। पित्ताशयी नलिका एवं अग्न्याशयी नलिका, दोनों मिलकर यकृत अग्न्याशयी वाहिनी द्वारा ग्रहणी में खलती हैं जो ओडी अवरोधिनी से नियन्त्रित होती हैं।

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प्रश्न 3. 
यदि मनुष्य के पित्ताशय को निकाल दिया जाये तो क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि मनुष्य के पित्ताशय को निकाल दिया जाये तो भोजन का आगे पाचन रुक जायेगा, क्योंकि पित्ताशय से एक क्षारीय द्रव नावित होता है, जिसे पित्त रस कहते हैं। पित्त रस वसाओं के पाचन में महत्वपूर्ण होता है। पित्त वसा का पायसीकरण करता है तथा भोजन को क्षारीय माध्यम प्रदान करता है।

प्रश्न 4. 
कॉलम I में दिए गए लक्षणों को कॉलम II में दिए गए पाचन तन्त्र के भागों से मैच कीजिए -

कॉलम I लक्षण

कॉलम II भाग

1. साँस के साथ भीतर ले जाने वाली वायु और निगले जाने वाले भोजन का सामान्य मार्ग

(अ) छोटी आंत

2. आहारनाल का सबसे बड़ा भाग

(ब) ग्रसनी

3. पित्त और आन्याशय रस प्राप्त करता है

(स) परिशेषिका

4. शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि

(द) ग्रहणी

5. ग्रहणी के घुमाव वाले भाग में स्थित प्रन्थि

(य) यकृत

6. लचीला थैलानुमा जिसकी आकृति (J) के आकार की

(२) अग्न्याशय

7. संकरा कृमि जैसा बहिवेषण

(ल) आमाशय


उत्तर:

कॉलम I लक्षण

कॉलम II भाग

1. साँस के साथ भीतर ले जाने वाली वायु और निगले जाने वाले भोजन का सामान्य मार्ग

(ब) ग्रसनी

2. आहारनाल का सबसे बड़ा भाग

(अ) छोटी आंत

3. पित्त और आन्याशय रस प्राप्त करता है

(द) ग्रहणी

4. शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि

(य) यकृत

5. ग्रहणी के घुमाव वाले भाग में स्थित प्रन्थि

(२) अग्न्याशय

6. लचीला थैलानुमा जिसकी आकृति (J) के आकार की

(ल) आमाशय

7. संकरा कृमि जैसा बहिवेषण

(स) परिशेषिका


प्रश्न 5. 
निम्नलिखित एंजाइमों की स्रोत ग्रन्थि का नाम बताइये
(i) एमाइलेज 
(ii) पेप्सिन 
(iii) लाइपेज 
(iv) लाइसोजाइम। 
उत्तर:

नाम एन्जाइम (Name of Enzyme)

ग्रन्थि का नाम (Name of Gland)

(i) एमाइलेज (Amylase)

लार - प्रन्थियाँ (Salivary glands)

(ii) पेप्सिन (Pepsin)

आमाशय की जठर ग्रन्थियाँ (Gastric glands of Stomach)

(iii) लाइपेज (Lipase)

अग्न्याशय (Pancreas)

(iv) लाइसोजाइम (Lysozyme)

लार प्रन्थियाँ (Salivary glands)


प्रश्न 6. 
निम्न को परिभाषित कीजिए:
(i) स्वांगीकरण 
(ii) काइम 
(iii) काइल 
(iv) इनमल 
(v) बुनर्स ग्रन्थियाँ।
उत्तर:
(i) स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषित खाद्य पदार्थ रक्त द्वारा शरीर की विभिन्न कोशिकाओं को पहुंचाये जाते हैं। भोजन के ये अन्तिम उत्पाद कोशिकाओं में जाकर उपापचय की क्रियाओं द्वारा कोशिकाओं के हिस्से या अंश बन जाते हैं। इसे स्वांगीकरण कहते है।

(ii) काइम (Chyme): आमाशय की पेशीय दीवार के संकुचन द्वारा भोजन का मंथन (Churning) होता है जिसके फलस्वरूप बोलस अर्धतरल पोल अर्थात् पेस्ट के रूप में बदल जाता है जिसे काइम (Chyme) कहते हैं।

(iii) काइल (Chyle): भोजन का लगभग पूर्ण पाचन ग्रहणी (duodenum) में ही हो जाता है। पाचक रसों के मिश्रण से भोजन और अधिक तरल हो जाता है तथा अब यह काइल (Chyle) कहलाता है।

(iv) इनमल (Enamel): हमारे शरीर में पाये जाने वाला कठोरतम पदार्थं जिसमें 98 प्रतिशत अकार्बनिक लवण होते हैं इनमल कहलाता है। यह दाँत का बाह्य आवरण का निर्माण करता है। जिसके कारण दाँत सफेद चमकदार होते हैं।

(v) बुनर्स ग्रन्थियाँ (Brunner's glands): ये ग्रन्थियाँ ग्रहणी के सबम्यूकोसा (Submucosa) स्तर में पाई जाती हैं। ये शाखान्वित ग्रन्थियाँ होती हैं। इनके द्वारा पाचक रसों का लावण किया जाता है, जो भोजन को पचाने में सहायता करता है।

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प्रश्न 7.
आमाशय का नामांकित चित्र बनाइए। इसके जठर ग्रन्थियों में पाई जाने वाली कोशिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
आमाशय की जठर ग्रन्थियों में मुख्य रूप से तीन प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं:

  1. श्लेष्मा कोशिकाएँ (Mucous glands): श्लेष्मा (Mucous) का लावण करती हैं।
  2. जाइमोजन कोशिकाएँ या पेप्टीक कोशिकाएँ या मुख्य कोशिकाएँ (Zymogen Cells or Peptic Cells or Chief Cells): इनके द्वारा पेप्सीनोजन व प्रोरेनिन नामक निष्क्रिय एन्जाइम्स का लावण किया जाता है।
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  3. भित्तीय कोशिकाएँ या ऑक्सिन्टिक कोशिकाएँ (Parietal Cells or Oxyntic Cells): इनके द्वारा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) और नैज कारक सावित किया जाता है। नैज कारक विटामिन B12 के अवशोषण के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 8. 
पेपियन एवं ट्रिप्सिन में कोई चार अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पेप्सिन एवं ट्रिप्सिन में अन्तर (Differences between Pepsin and Trypsin) 

पेप्सिन (Pepsin)

ट्रिप्सिन (Trypsin)

1. पेपिसन एन्जाइम जठर रस (Gastric juice) में पाया जाता है।

जबकि ट्रिप्सिन आन्याशय रस में पाया जाता है।

2. इसका उत्पादन निष्क्रिय पेप्सिनोजन के रूप में होता है।

जबकि इसका उत्पादन निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन के रूप में होता है।

3. यह जठर रस के HCl द्वारा सक्रिय होता है।

आन्त्रीय रस के एन्टेरोकाइनेज एन्जाइम द्वारा सक्रिय होता है।

4. यह आमाशय में क्रियाशील होता है।

यह ग्रहणी एवं जेजूनम में क्रियाशील होता है।

5. यह अम्लीय माध्यम में ही क्रिया करता है।

जबकि यह क्षारीय माध्यम में क्रिया करता है।


प्रश्न 9.
मनुष्य के ऊपर जबड़े में पाये जाने वाले दाँतों का प्रकार, आकृति, कार्य एवं संख्या लिखिए। 
उत्तर:

प्रकार (Type)

आकार (Shape)

कार्य (Function)

ऊपरी जबड़े में दाँतों की संख्या (Number of Teeth in Jaw)

1. कृन्तक (Incisor)

छैनी के आकार (Chisel shaped)

काटना (Biting)

4

2. रदनक (Canine)

नुकीले किनारे

चीरने व फाड़ने

2

3. अग्र चर्वणक (Pre-molars)

कसपस गोल आकृति जड़ (Root) एक यो दो

चबाने एवं पीसने

4

4. चर्वणक (Molars)

कसपस मोल आकृति जड़ (Root) एक से अधिक

चबाने एवं पीसने

6


प्रश्न 10. 
कुपोषण किसे कहते हैं? मरास्मस रोग के कोई चार लक्षण लिखिए।
उत्तर:
कुपोषण (Malnutrition): दैनिक आहार से शरीर को आवश्यक ऊर्जा तथा पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते हैं तो इस अवस्था को कुपोषण कहते हैं।
मरास्मस (Marasumus): रोग के निम्न चार लक्षण

  1. त्वचा शुष्क, पतली एवं झुरींदार हो जाती है। 
  2. वृद्धि की दर एवं शारीरिक भार बहुत घट जाता है। 
  3. अत्यन्त कृशकायी शरीर एवं हाथ-पैर अधिक पतले हो जाते है।
  4. मानसिक क्षमता भी असन्तुलित हो जाती है।

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प्रश्न 11. 
क्वाशीओरकॉर रोग किसे कहते हैं? इसका कारण एवं कोई चार लक्षण लिखिए।
उत्तर:
क्वाशीओरकॉर (Kwashiorkar): प्रोटीन की अत्यधिक कमी के कारण होने वाले रोग को क्याशीओरकार कहते हैं। यह रोग एक वर्ष से अधिक आयु वाले शिशुओं में होता है। माताएँ अपने बच्चों को स्तनपान के स्थान पर उच्च कैलोरी परन्तु प्रोटीन की न्यूनला वाला आहार देने के कारण बच्चे इस रोग से ग्रसित हो जाते हैं।
क्वाशीओरकॉर (Kwashiorkar) रोग के निम्न चार लक्षण:

  1. रोगग्रस्त बच्चे की मांसपेशियाँ लटक जाती हैं। 
  2. वृद्धि एवं मस्तिष्क का विकास रुक जाता है।
  3. शरीर के विभिन्न भागों में सूजन तथा पेट आगे आ जाता है अर्थात् पेट फूल जाता है।
  4. रोगी के हाथ - पैर पतले हो जाते हैं।

प्रश्न 12. 
अवशोषण किसे कहते हैं? निष्क्रिय अवशोषण व सक्रिय अवशोषण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अवशोषण (Absorption):
पचे हुए खाद्य पदार्थों, विटामिनों, लवणों एवं जल का आंत्र की उपकला कोशिकाओं के माध्यम से रुधिर या लसीका में स्थानान्तरण को अवशोषण कहते हैं। 
निष्क्रिय अवशोषण व सक्रिय अवशोषण में अन्तर (Differences between Passive and Active Absorption) 

निष्क्रिय अवशोषण (Passive Absorption)

सक्रिय अवशोषण (Active Absorption)

1. निष्क्रिय अवशोषण सांद्रण प्रवणता (Concentration gradient) की तरफ होता है।

सक्रिय अवशोषण सांदण - प्रवणता (Concentration gradient) के विरुद्ध होता है।

2. यह एक धीमी प्रक्रिया है।

यह एक सक्रिय एवं तेज (rapid) प्रक्रिया है।

3. निष्क्रिय अवशोषण में ऊर्जा का उपयोग नहीं होता है।

सक्रिय अवशोषण में ऊर्जा का उपयोग होता है।

4. पोषक तत्वों का पूर्णतया अवशोषण नहीं होता है।

पोषक तत्वों का पूर्ण रूप से अवशोषण होता है।

5. इस क्रिया में वाहक अणुओं (Carrier Molecules) की आवश्यकता नहीं होती है।

हमेशा वाहक अणुओं (Carrier molecules) की आवश्यकता होती है।

 

प्रश्न 13.
पाचन तन्त्र के विभिन्न भागों में अवशोषण का संक्षिप्त में वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
पाचन तन के विभिन्न भागों में अवशोषण निम्न प्रकार से है:

मुख (Mouth)

आमाशय (Stomach)

छोटी आंत (Small Intestine)

बड़ी आंत (Large Intestine)

कुछ औषधियाँ जो मुख और जिला की निचली सतह के म्यूकोसा के सम्पर्क में आती हैं। वे आस्तरित करने वाली रुधिर कोशिकाओं में अवशोषित हो जाती हैं।

जल, सरल शर्करा, ऐल्कोहॉल आदि का अवशोषण होता है।

पोषक तत्वों के अवशोषण का प्रमुख अंग। यहाँ पर पाचन की क्रिया पूरी होती है और पाचन के अंतिम उत्पाद, जैसे- लूकोस, फ्रक्टोस, वसीय अम्ल, ग्लिसराल और ऐमीनो अम्ल का म्यूकोसा द्वारा रक्त प्रवाह और लसीका में अवशोषण होता है।

जल, कुछ खनिजों और औषधि का अवशोषण होता है।


प्रश्न 14.
काइलोमाइक्रॉन क्या है? समझाइए।
उत्तर:
काइलोमाइक्रॉन (Chylomicron): कोशिका में वसा अम्ल एवं मोनोग्लिसराइड चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका में प्रवेश कर नयी ट्राइग्लिसराइड संश्लेषित करते हैं। इन ट्राइग्लिसराइड अणुओं को चारों ओर से प्रोटीन घेर लेती है। अत: लाइपोप्रोटीन से बनी ये गोलियां काइलोमाइक्रॉन कहलाती हैं। काइलोमाइक्रॉन का व्यास 1 से 3.5 µm होता है। काइलोमाइक्रॉन रुधिर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित न होकर रसांकुरों में स्थित लसिका वाहिनी (लेक्टियल) द्वारा अवशोषित होते हैं व लसिका में परिवर्तित होते हैं तथा अन्तत: बायें कन्धे के समीप सबक्लोवियन व जुगलर शिरा के संगम पर रुधिर में मिल जाते हैं। काइलोमाइक्रॉन की उपस्थिति से लसिका वाहिनियों का रंग श्वेत दिखाई देता है जिसे काइल कहते हैं। कई बार पित्त नलिका के अवरोध या यकृत के अनियमित स्रावण के कारण काइलोमाइक्रॉन मूत्र द्वारा निष्कासित होने लगते हैं। ऐसे मूत्र का रंग भी दूधिया होता है तथा यह अवस्था काइलूरिया कहलाती है।

प्रश्न 15. 
आंत्र की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। 
उत्तर:
RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण 2

प्रश्न 16. 
अंकुर दर्शाते हुए क्षुद्रांत्र म्यूकोसा के एक भाग का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण 3

प्रश्न 17. 
जठर रस में पाये जाने वाले HCl के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
HCL के कार्य निम्न हैं

  1. यह भोजन को सड़ने से बचाता है। 
  2. यह अम्लीय माध्यम प्रदान करता है। 
  3. HCL कठोर ऊतकों को घोलने में सहायता करता है। 
  4. यह भोजन को रोगाणुरहित (Sterilize) करता है। 
  5. निष्क्रिय पैप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
  6. जठर निर्गमी रोधनी (Pyloric sphincter) को नियन्वित करता है।
  7. कैल्सियम एवं लौह के अवशोषण में सहायता करता है।

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

प्रश्न 18. 
फ्रेनूलम लिंग्वी किसे कहते हैं? जिह्वा की ऊपरी सतह पर पाये जाने वाले अंकुरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रेनूलम लिंग्बी: जिला मध्य अधर भाग से एक वलन द्वारा मुखगुहा की फर्श से जुड़ा होता है, जिसे फ्रेनूलम लिंग्वी कहते हैं।
जिला की ऊपरी सतह पर चार प्रकार के अंकुर पाये जाते हैं -

  1. सूत्रकार या फिलिफार्म अंकुर: ये जीभ की पूरी सतह पर पाये जाते हैं। ये सबसे छोटे अंकुर हैं। ये संख्या में सर्वाधिक होते हैं।
  2. शल्काकार या कोलिएट अंकुर: ये चौड़ी पत्ती के समान होते हैं। जिला पर मुखगुहिका एवं ग्रसनी के बीच वाले भाग के पाश्चों में एक-एक कतार में लगे होते हैं।
  3. छत्राकार या फन्जीफार्म: ये जिह्य के अगले भाग तथा पाश्यों में किनारे पर कवक रूपी या छत्राकार अंकुर।
  4. परिकोटीय या सर्कमवेलेट: ये जिहा के आधार भाग की पृष्ठ सतह पर उल्टे V या U के आकार में व्यवस्थित होते हैं। ये संख्या में सबसे कम लेकिन आकार में सबसे बड़े होते हैं।

प्रश्न 19.
पायसीकरण किसे कहते हैं? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पायसीकरण: पित्त लवण (पित्त अम्ल व सोडियम, पोटैशियम के लवण) तथा लेसीथिन बसा के पायसीकरण में महत्त्वपूर्ण होते हैं। पित्त लवण एवं लेसीथिन अणुओं का एक भाग ध्रुवीय तथा दूसरा भाग अधुवीय होता है। अधुवीय भाग वसा नलिकाओं की सतह में घुल जाता है तथा ध्रुवीय भाग भोजन में उपस्थित जल में विलेय रहता है। इस क्रिया के कारण वसा गोलिकाएँ छोटे आकार की वसा बूंदों में टूट जाती हैं। इस क्रिया को पायसीकरण कहते हैं। - पायसीकृत वसा पर एन्जाइम तेजी से क्रिया करते हैं।

प्रश्न 20. 
पाचन तन्त्र के विकार और अनियमितताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आंत्रनलिका का शोथ जीवाणुओं और विषाणुओं के संक्रमण से होने वाला एक सामान्य विकार है। आंत्र संक्रमण परजीवियों जैसे फीताकृमि, गोलकृमि, सूत्रकृमि, हुकवर्म, पिनवर्म आदि से होता है।

  1. पीलिया (Jaundice): पीलिया में त्वचा और आँख पित्त वर्णकों के जमा हो जाने के कारण पीले रंग के दिखाई देते हैं। इस रोग में यकृत (Liver) प्रभावित होता है।
  2. वमन (Vomiting): यह आमाशय में संग्रहित पदार्थों को मुख से बाहर निकलने की क्रिया है। यह प्रतिवर्ती क्रिया मेडुला में स्थित वमन केन्द्र से नियंत्रित होती है। उल्टी से पहले बेचैनी की अनुभूति होती है।
  3. प्रवाहिका (Diarrhoea): आंत्र की असामान्य गति की बारम्बारता और मल का अत्यधिक पतला हो जाना प्रवाहिका (Diarrhoea) कहलाता है। इसमें भोजन अवशोषण की क्रिया घट जाती है।
  4. कब्ज (Constipation): कब्ज में मलाशय में मल रुक जाता है और आंत्र की गतिशीलता अनियमित हो जाती है।
  5. अपच (Indigestion): इस स्थिति में भोजन पूरी तरह नहीं पचता है और पेट भरा - भरा महसूस होता है। अपच एंजाइमों के साथ में कमी, व्यग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिक भोजन करने एवं मसालेदार भोजन करने के कारण होती है।

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प्रश्न 21. 
मनुष्य की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइए तथा निम्नलिखित भागों के कार्य लिखिए - ग्रहणी, क्षुद्रान्व, उण्डुक व मलाशय।
उत्तर:
मनुष्य का पाचन तंत्र आहारनाल (Alimentary canal) एवं पाचक ग्रन्थियों (digestive glands) से मिलकर बना होता है। 
आहार नाल (Alimentary Canal):
मनुष्य की आहारनाल लम्बी कुण्डलित एवं पेशीय संरचना है जो मुँह से लेकर गुदा (Anus) तक फैली रहती है। मनुष्य में आहारनाल लगभग 8 से 10 मीटर लम्बी होती है। इसे गेस्ट्रो - इन्टेस्टीनल ट्रेक्ट (Gastro  - Intestinal Tract) भी कहते हैं। आहारनाल के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:

1. मुख (Mouth)
2. मुख गुहिका (Buccal Cavity) 
3. ग्रसनी (Pharynx) 
4. ग्रसिका (Oesophagus) 
5. आमाशय (Stomach) 
6. आंत्र (Intestine) 

  • छोटी आंत्र (Small Intestine)
    • ग्रहणी 
    • जेजुनम 
    • इलियम 
  • बड़ी आंत्र (Large Intestine)
    • सीकम 
    • कोलन 
    • मलाशय

7. गुदा (Anus)।

  • ग्रहणी का कार्य: भोजन को पचाना।
  • क्षुद्राब का कार्य: भोजन के पाचन के साथ - साथ अवशोषण करना। अधिकांश अवशोषण इसी भाग से होता है।
  • उण्डुक (सीकम) का कार्य: यह एक अवशेषी अंग है। शाकाहारी प्राणियों में सीकम द्वारा सेल्यूलोज का पाचन किया जाता है।
  • मलाशय का कार्य: मल को अस्थायी रूप से संग्रह एवं समय - समय पर गुदा के द्वारा मल को त्यागना।

प्रश्न 22. 
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ कहाँ पाई जाती हैं? इनके द्वारा उत्पादित रसायनों के नाम लिखिए।
उत्तर:
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ अग्न्याशयी पिण्डकों के बीचबीच में पाई जाती हैं। ये समूह अन्त:स्रावी प्रकृति के होते हैं। इनके द्वारा उत्पादित रसायनों के नाम निम्नलिखित हैं:
(अ) इन्सुलिन (Insulin) जो कि बीटा कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है।
(ब) ग्लूकैगोन (Glucogon) जो कि ऐल्फा कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है।
(स) अग्न्याशयी गैस्ट्रीन व सोमेटोस्टेनिन जो कि डेल्टा कोशिकाओं द्वारा सावित होता है।

प्रश्न 23. 
स्थूल ऊर्जा मान एवं कार्यिकी मान को परिभाषित कीजिए तथा प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के स्थूल ऊष्मीय मान लिखिए।
उत्तर:
स्थूल ऊर्जा मान: एक ग्राम खाद्य पदार्थ के पूर्ण दहन से मोचित ऊर्जा को खाद्य का स्थूल कैलोरी मान (ऊष्मीय मान) अथवा स्थूल ऊजाँ मान कहते हैं।
एक ग्राम खाद्य पदार्थ की वास्तविक दहन कर्जा उस खाद्य का कार्यिकी मान कहलाता है। 

  1. प्रोटीन -  5.65 Kcal/g 
  2. कार्बोहाइड्रेट - 4.1 Kcal/g 
  3. वसा -  9.45 Kcal/g. 

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. 
मनुष्य की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य का पाचन तंत्र आहारनाल (Alimentary canal) एवं पाचक ग्रन्थियों (digestive glands) से मिलकर बना होता है। 
आहार नाल (Alimentary Canal):
मनुष्य की आहारनाल लम्बी कुण्डलित एवं पेशीय संरचना है जो मुँह से लेकर गुदा (Anus) तक फैली रहती है। मनुष्य में आहारनाल लगभग 8 से 10 मीटर लम्बी होती है। इसे गेस्ट्रो - इन्टेस्टीनल ट्रेक्ट (Gastro  - Intestinal Tract) भी कहते हैं। आहारनाल के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:

1. मुख (Mouth)
2. मुख गुहिका (Buccal Cavity) 
3. ग्रसनी (Pharynx) 
4. ग्रसिका (Oesophagus) 
5. आमाशय (Stomach) 
6. आंत्र (Intestine) 

  • छोटी आंत्र (Small Intestine)
    • ग्रहणी 
    • जेजुनम 
    • इलियम 
  •  बड़ी आंत्र (Large Intestine)
    • सीकम 
    • कोलन 
    • मलाशय

7. गुदा (Anus)।

(1) मुख (Mouth):
मुख दो गतिशील, पेशीय होंठों के द्वारा घिरा होता है, जिन्हें क्रमशः ऊपरी होंठ (Upper Lip) व निचला होंठ (Lower Lip) कहते हैं। इन होंठों के बीच मुख अर्थचन्द्राकार दरार के रूप में होता है। दोनों होंठों के भीतरी सतह पर कई लेबियल ग्रन्धियाँ स्थित होती हैं तथा इनके द्वारा स्रावित श्लेष्म (mucous) होंठों की इस सतह को लसदार बनाये रखते हैं। ऊपरी होंठ ठीक बीच में से दबा हुआ होता है अर्थात् एक गड्ढा होता है जो नाक तक फैला होता है जिसे फिलट्रोन (Philtron) कहते हैं। इसके कार्य के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। ऊपरी होंठ पर वयस्क अवस्था में घनी मूंछे (moustache) उग आती हैं जबकि मादा में नहीं। इसके अतिरिक्त होंठ मख को खोलने व बन्द करने का कार्य करते हैं, इसके साथ ही, भोजन को पकड़ने में भी सहायता करते हैं। मुख मुखगुहा में खुलता है।

(2) मुख गुहा (Buccal Cavity):
मुख गुहा दो भागों में विभक्त होती है जिसे क्रमशः प्रघाण (Vestibule) एवं मुखगुहिका कहते हैं।
प्रघाण (Vestibule): मुखगुहा का वह संकरा भाग जो होंठों, गाल व दांतों के बीच होता है वह प्रघाण कहलाता है।
मुखगुहिका (Buccal Cavity): मसूड़ों के पीछे या जबड़ों के अन्दर की ओर दाँतों की पंक्तियों से घिरे हुए भाग को वास्तविक मुखगुहिका कहते हैं।
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मुखगुहा ऊपरी एवं निचले जबड़ों से घिरी होती है। ऊपरी जबड़ा अचल होता है तथा निचला जबड़ा चल होता है। मुखगुहा में निम्न भाग होते हैं:

(i) तालु (Palate):
यह मुखगुहा की छत का निर्माण करती है अथवा मुखगुहा की छत को तालु कहते हैं। यह मुखगुहा को श्वसन मार्ग से अलग करता है। तालु दो भागों में बँटा होता है। आगे वाले भाग को कठोर ताल (Hard palate) व पीछे वाले भाग को कोमल तालु (Soft palate) कहते हैं।

(अ) कठोर तालु (Hard Palate): 
अस्थियों से निर्मित होने के कारण इसे कठोर तालु कहते हैं। कठोर तालु पर कृतनक (Incisors) के पीछे एक जोड़ी छोटे छिद्र होते हैं। जिनके द्वारा नेसोपेलेटाइन नलिका (Nasopalatine duct) मुखगुहा में खुलती है। यह नलिका मुखगुहा को नासा मार्गों को जोड़ने का कार्य करती है। नेसोपेलेटाइन नलिका में घ्राण संवेदी अंग (Olfactory organ) पाये जाते हैं, जिसे जैकब्सन अंग (Jocobson's organ) कहते हैं जो गन्ध ज्ञान द्वारा भोजन को पहचानने से सहायता करते हैं।

(ब) कोमल तालु (Soft Palate):
यह केवल संयोजी ऊतक एवं पेशियों से निर्मित होने के कारण कोमल होता है। कोमल तालु का अन्तिम भाग एक उभार के रूप में ग्रसनी की गुहा में लटका रहता है जिसे वैलम पैलेटाई (Velum palati) अथवा यूवेला (Uvula) कहते हैं। भोजन को निगलते समय वैलम पैलेटाई अन्तः नासा छिद्रों को बन्द करने का कार्य करता है। तालु पर अनेक प्रेलेटाइन श्लेष्मा ग्रन्थियाँ (Palatine mucous glands) पायी जाती हैं जो तालु को नम बनाये रखती हैं एवं भोजन को निगलने में सहायता करती हैं।

(ii) जीभ (Tongue):
जीभ मुख गुहा के तल पर पायी जाती है। यह मोटी मांसल व लचीली होती है। जीभ का अग्र भाग स्वतंत्र होता है तथा पश्च भाग मुख गुहा की फर्श से एक वलन (fold) द्वारा जुड़ा रहता है जिसे फ्रेनुलम लिंगवी (frenulum linguac) कहते हैं। जीभ की सतह पर अनेक स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) पायी जाती हैं जो मीठे, नमकीन, खट्टे एवं कड़वे स्वाद का ज्ञान कराती हैं।

जीभ के कार्य (Functions of Tongue):

  1. भोजन को निगलने में सहायता करती है। 
  2. भोजन को चबाने में सहायता करती है। 
  3. भोजन के स्वाद का ज्ञान कराने में सहायक होती है। 
  4. जीभ दाँतों की सफाई करने में सहायक होती है। 
  5. जीभ बोलने में सहायक होती है।

(iii) दाँत (Teeth):
दाँत दोनों जबड़ों में पाये जाते हैं। ये दाँत जबड़े की अस्थि की गतिकाओं (Sockets) में स्थित होते हैं अत: ये गर्तदन्ती (Thecodont) होते हैं। मनुष्य के जीवनकाल में दाँत दो बार आते हैं। इस अवस्था को द्विबार दन्ती (Diphyodont) अवस्था कहते हैं। इस प्रकार दाँत दो प्रकार के होते हैं:

(a) अस्थायी दाँत (Temporary Teeth):
ऐसे दाँत जिनका क्षय कुछ समय बाद हो जाता है, उन्हें अस्थायी दाँत कहते हैं। इन्हें दूध के दाँत (Milk teeth) भी कहते हैं। वयस्क में ये दाँत स्थायी दाँतों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इन्हें गिरने वाले दाँत (Deciduous teeth) भी कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है।

(b) स्थायी दाँत (Permanent Teeth):
ऐसे दाँत जो जीवन में एक बार ही आते हैं स्थायी दाँत कहलाते हैं। मनुष्य में स्थायी दाँत 32 होते हैं। इन दाँतों का आकार एक समान नहीं होता है तथा विभिन्न कार्यों के अनुसार दाँतों का आकार एवं परिमाण पर निर्भर करता है। इस प्रकार के दाँतों को विषमदन्ती (Heterdont) कहते हैं। ये दाँत चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisors): ये संख्या में होते हैं तथा भोजन को काटने (Biting) का कार्य करते हैं।
  2. रदनक (Canines): ये संख्या में 4 होते हैं, जो नुकीले (Pointed) होते हैं तथा भोजन चीरने व फाड़ने का कार्य करते हैं।
  3. अग्र चर्वणक (Pre - molars): ये संख्या में 8 होते हैं। ये भोजन को चबाने व पीसने का कार्य करते हैं।
  4. चर्वणक (Molars): ये संख्या में 12 होते हैं। ये भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण 5
अग्र - चर्वणक (Pre - molars) व चर्वणक (Molars) को कपोल दाँत (Cheek teeth) कहते हैं। मनुष्य में तीसरा मोलर दाँत सबसे बाद में निकलता है जिसे अक्कल दाड़ (Wisdom teeth) कहते हैं। यह एक अवशेषी अंग है।
दन्त सूत्र (Dental formula): स्तनियों में दन्त विन्यास (Dentition) एक सूत्र के रूप में व्यक्त किया जाता है, इसे दन्त सूत्र (Dental formula) कहते हैं। प्रत्येक जबड़े में दो अर्थाश पाये जाते हैं - बायां अधांश व दायां अर्धांश । बायें अधांश व दायें अर्धाश में दाँतों की संख्या समान होती है। इसलिए दाँतों की संख्या को 2 से गुणा करने पर कुल दाँतों की संख्या प्राप्त होती है।
दन्त सूत्र (Dental Formula) 
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इस सूत्र में कृन्तक (Incisor) को I, रदनक दांत (Canine) को C, अग्र चर्वणक (Pre - molar) को Pm एवं चर्वणक (Molar) को M द्वारा सम्बोधन किया जाता है।
मनुष्य का दन्त सूत्र 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{2}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{8} \times 2=32\)
बच्चों का दन्त सूत्र ( अस्थायी दाँत ) 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{0}{0}, \mathrm{M} \frac{2}{2}=\frac{5}{5} \times 2=20\)
खरगोश का दन्त सूत्र 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{1}, \mathrm{C} \frac{0}{0}, \mathrm{Pm} \frac{3}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{6} \times 2=28\)
कुत्ते का दन्त सूत्र 
\(\mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{2}{3}=\frac{10}{11} \times 2=  \frac{20}{22} = 42\)
सूअर व घोड़े का दन्त सूत्र
= \(\mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{11}{11} \times 2=  \frac{22}{22} = 44\)
सूअर व घोड़े में सर्वाधिक दाँत 44 पाये जाते हैं।
दाँत की संरचना (Structure of Tooth): प्रत्येक दाँत के तीन भाग होते हैं:

  1. शिखर (Crown): दाँत का वह भाग जो मसूड़े से बाहर निकला होता है, शिखर कहलाता है।
  2. ग्रीवा (Neck): मसूढ़े में स्थित भाग को ग्रीवा कहते हैं।
  3. जड़ (Root): यह दाँत का आधार भाग है जो जबड़े की अस्थि की गर्तिका में धंसा रहता है।

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दाँत का शिखर एक मोटे सफेद चमकदार तथा अत्यन्त कठोर आवरण से ढका होता है जिसे इनेमल (Enamel) कहते हैं। शेष दाँत पर सीमेन्ट (Cement) जैसा कठोर पदार्थ का आवरण होता है। दाँत के इन आवरणों के नीचे डेन्टीन (Dentine) नामक अपेक्षाकृत कोमल पदार्थ का मोटा स्तर होता है। डेन्टीन स्तर में कई महीन एवं शाखान्वित नलिकाएं होती हैं। डेन्टीन स्तर एक पतली दंत गुहिका को घेरे होता है। इस गुहा को पल्प गुहा (Pulp Cavity) कहते हैं। पल्प गुहा में एक संयोजी ऊतक द्वारा निर्मित तरल भरा रहता है, इसे पल्प (Pulp) कहते हैं। पल्प में रक्त कोशिकाओं तथा तंत्रिका तंतुओं का पना जाल होता है जो पल्प केविटी छिद्र द्वारा शेष शरीर से सम्बन्धित होता है। पल्प गुहा के चारों ओर डेन्टीन से लगा कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। इस स्तर की कोशिकाएँ शाखान्वित होती हैं तथा दन्त कोशिकाएँ अर्थात् ओडोन्टोब्लास्ट्स (Odontoblasts) कहलाती हैं। ओडोन्टोब्लास्ट कोशिकाओं के प्रवर्ध डेन्टीन की नलिकाओं में फैली रहती है तथा ये कोशिकाएँ पल्प से O2 तथा पोषक पदार्थ डेन्टीन में पहुँचाती हैं। जिससे डेन्टीन में वृद्धि होती है। इसके वृद्धि करने से दाँत में वृद्धि होती है।

अधिकांश दाँतों में पूर्ण विकास के बाद वृद्धि रुक जाती है क्योंकि ओडोन्टोब्लास्ट्स कोशिकाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं तथा पल्प केविटी (Pulp Cavity) का छिद्र बहुत छोटा हो जाता है।

(3) ग्रसनी (Pharynx):
मुख गुहा पीछे की ओर एक कीपनुमा नलिका में खुलती है जिसे ग्रसनी (Pharynx) कहते हैं। वेलम पेलेटाइ (Valum Palati) ग्रसनी गुहा को दो कक्षों में वर्गीकृत कर देती है- पृष्ठ कक्ष को नासा ग्रसनी (Naso pharynx) व अधर कक्ष को मुख ग्रसनी (Oropharynx) कहते हैं। ग्रसनी में निम्न चार छिद पाये जाते है-

  1. ग्रसिका द्वार (Gullet)
  2. घांटी द्वार (Glottis)
  3. यूस्टेकी नलिका (Eustachian duct)
  4. अन्तःनासाछिद (Internal nares)

(4) ग्रसिका (Oesophagus): 
यह सीधी नलिकाकार होती है। इसकी लम्बाई लगभग 25 सेमी. होती है। यह ग्रसनी को आमाशय से जोड़ने का कार्य करती है। यह ग्रीवा तथा वक्ष भाग से होती हुई तनु पट (Diaphragm) को भेदकर उदरगुहा में प्रवेश करती है और अन्त में आमाशय में खलती है। ग्रसिका में श्लेष्म ग्रन्धियाँ होती हैं परन्तु पाचक ग्रन्थियों का अभाव होता है।

ग्रसिका की औतिकी (Histology of Oesophagus): इसकी भित्ति में ऊतकों के सामान्य स्तर सिरोसा (Serosa) बाह्य, पेशी स्तर (Muscular Layer), अधःश्लेष्मिका (Sub - mucosa) एवं श्लेष्मिका (Mucosa) पाये जाते हैं। सिरोसा वास्तव में विसरल पेरीटोनियम (Visceral peritoneum) होता है। पेशी स्तर (Muscular layer) से बाहा अनुदेi (Longitudinal) एवं भीतरी वर्तुल (circular) अरेखित पेशियों के स्तर होते हैं। अध:श्लेष्मिका (Submucosa) संयोजी ऊतक से निर्मित स्तर होता है जिसमें तंत्रिकाएँ, रुधिर एवं लसिका वाहिनियाँ, कॉलेजन तन्तु एवं लचीले तन्तु तथा कुछ श्लेष्मा ग्रन्थियाँ (Mucous glands) पाई जाती हैं।

श्लेष्मिका (Mucosa) सबसे भीतरी स्तर है इसमें उपकला, आधार पटल (Lamina propria) एवं श्लेष्मिका पेशी पाई जाती है। ग्रसिका की भीतरी उपकला, स्तरित शल्की उपकला (Stratified squamous epithelium) के रूप में होती है। ग्रसिका के प्रारम्भिक भाग में रेखित पेशियाँ, मध्य भाग में रेखित व अरेखित पेशियाँ व अन्तिम भाग में केवल अरेखित पेशियाँ पायी जाती हैं। ग्रसिका भोजन को क्रमाकुंचन द्वारा ग्रसनी से आमाशय में भेजती है।

(5) आमाशय (Stomach):यह उदर गुहा में बायीं ओर डायफ्राम के पीछे स्थित होता है। यह आहारनाल का सबसे चौड़ा थैलेनुमा पेशीय भाग है, जिसकी आकृति 'J' के समान होती है। ग्रसिका आमाशय के लगभग मध्य भाग में बाई ओर खुलती है अर्थात् कार्डियक भाग में खुलती है।
RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण 8
आमाशय में निम्न तीन भाग पाये जाते हैं

  1. जठरागम भाग (Cardiac part) 
  2. फंडस भाग (Fundic part) 
  3. जठर निर्गमी भाग (Pyloric part)

(6) आंत्र (Intestine):आहारनाल का शेष बच रहा भाग आंत्र कहलाता है। यह आहारनाल का सबसे लम्बा भाग है। आंत्र को दो भागों में बाँटा गया है:

  • छोटी आंत्र (Small Intestine) 
  • बड़ी आंत्र (Large Intestine)

(7) गुदा (Anus): गुदा के चारों ओर दो अवरोधिनियाँ (Splhincters) होती हैं-आन्तरिक अवरोधिनी (Intemal Sphincter) व बाह्य अवरोधिनी (External sphincter)। ये अवरोधिनियाँ गुदा को खुलने व बन्द होने को नियंत्रित करती हैं। 

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प्रश्न 2. 
मनुष्य में आत्रीय पाचन का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्रहणी में पाचन (Digestion in duodenum):
ग्रहणी में काइम के प्रवेश के साथ ही इसमें पित्त रस एवं आन्याशयी रस मिश्रित होते हैं। पित्त रस एक क्षारीय द्रव है जो यकृत द्वारा खावित होता है, यह रस भोजन के अम्लीय स्वरूप को क्षारीय बनाता है। इसके कार्बनिक लवण जैसे ग्लाइकोकोलेट, टॉरोकोलोट आदि वसाओं का पायसीकरण कर देते हैं, इसके अकार्बनिक लवण जैसे सोडियम बाइकार्बोनेट आदि हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करते हैं तथा पित्त लवण, वसा अम्लों एवं विटामिन ए, डी, ई आदि के अवशोषण में सहायक होते हैं। पित्त में बिलीरविन, बिलीवर्डिन (Biliverdin) कोलेस्ट्रॉल लेसिथिन जैसे उत्सर्जी पदार्थ भी पाये जाते हैं। बिलीरुबिन व बिलीवर्डिन का निर्माण मृत RRC के हीमोग्लोबिन के विघटन द्वारा होता है। बिलीरुबिन पीले रंग का व बिलीवर्डिन हरे रंग का होता है जिससे पित्त रस का रंग होता है। इसी प्रकार बिलीरुबिन का रंग पीला होता है जिसके कारण मल का रंग पील होता है। कोलेस्ट्रॉल को भी मल के साथ कोप्रोस्टीरॉल (Coprosterol) के रूप में उत्सर्जित किया जाता है।

आन्याशय (Pancreas) रस शरीर में खावित पाचक रसों में यह सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। अग्न्याशय रस में निम्न पाचक रस पाये जाते हैं -

  1. ट्रिप्सिनोजन (Trypsinogen): यह निष्क्रिय एन्जाइम है जो ग्रहणी की श्लेष्मिका सतह द्वारा स्रावित एन्टेरोकाइनेज (Enterokinase) एन्जाइम द्वारा सक्रिय ट्रिप्सिन (Trypsin) में परिवर्तित हो जाता है -
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  2. काइमोट्रिप्सिनोजन (Chymotrypsinogen): यह भी निष्क्रिय पूर्व एन्जाइम है जो ट्रिप्सिन के द्वारा सक्रिय काइमोट्रिप्सिन में परिवर्तित होता है -
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    यह दूध के थक्का बनाने हेतु आवश्यक है। उपरोक्त दोनों एन्जाइम ट्रिप्सिन व काइमोट्रिप्सिन प्रोटीन प्रोटिओजेज एवं पेप्पटोन्स को पॉलिपेप्पटाइड्स में परिवर्तित कर देते हैं -
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  3. काबॉक्सिपेप्टाइडेज (Carboxypeptidase): यह भी निष्क्रिय प्रकार का प्रोएन्जाइम है जो ट्रिप्सिन व एन्टेरोकाइनेज के द्वारा सक्रिय किया जाता है। 
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    यह कार्बोक्सिपेप्टाइडेज पॉलिपेप्टाइड्स को अमीनो अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं -
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  4. एमाइलेज (Amylase): यह एन्जाइम स्टार्च (मंड) व ग्लाइकोजन को माल्टोज में बदल देता है -
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  5. लाइपेज (Lipase): यह एन्जाइम जल अपघटन द्वारा वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता है।
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  6. न्यूक्लिऐजेज (Nucleases): यह दो प्रकार के होते हैंDNAase 2 RNAase-
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ये न्यूक्लिएस न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लियोटाइड और न्यूक्लियोसाइड में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रकार से ग्रहणी में भोजन का लगभग पूर्ण पाचन हो जाता है। पाचक रसों के मिश्रण से भोजन और अधिक तरल हो जाता है तथा अव यह काइल (Chyle) कहलाता है।

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प्रश्न 3. 
मनुष्य में पचे हुए भोजन का अवशोषण कहाँ और कैसे होता है? समझाइए।
उत्तर:
पचे हुए खाद्य पदार्थों, विटामिनों, लवणों एवं जल का आंत्र की उपकला कोशिकाओं के माध्यम से रुधिर या लसिका में स्थानान्तरण को अवशोषण (Absorption) कहते हैं। अधिकांश पदार्थों का अवशोषण क्षुद्रांत्र में होता है। अनेक वलनों, लाखों रसांकुरों एवं सुक्ष्मांकुरों की उपस्थिति से शुद्रांत्र श्लेष्मिका की अवशोषणकारी सतह का क्षेत्रफल लगभग एक हजार गुना बढ़ जाता है। श्लेष्मिका की उपकला कोशिकाओं में पाये जाने वाले सूक्ष्मांकुर मिलकर बुश बोर्डर का निर्माण करते हैं। प्रत्येक रसांकुर में एक केन्द्रीय लसिका कोशिका एवं रुधिर कोशिकाएं होती हैं।
पाचन के अन्तिम उत्पाद जो मुख्यतः अवशोषित होते हैं वे मोनोसैकेराइड्स (ग्लूकोज, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस) एमीनो अम्ल, मोनो ग्लिसराइड एवं वसा अम्ल हैं। अवशोषण की मुख्य क्रियाविधियाँ -

  • सक्रिय अभिगमन (Active transport)
  • निष्क्रिय अभिगमन (Inactive transport)

एमीनो अम्ल एवं ग्लूकोज का अवशोषण सक्रिय अभिगमन द्वारा रुधिर में होता है। अभिगमन हेतु ऊर्जा, सोडियम - सहअभिगमन द्वारा प्राप्त होती है। इस तंत्र में सोडियम एवं खाद्य पदार्थ एक साथ ही अवशोषित होते हैं। सोडियम आयनों का उपकला कोशिका से बाहर सक्रिय अभिगमन पहले हो जाता है। इस अभिगमन के लिए ATP द्वारा ऊर्जा मिलती है। सोडियम के बाहर जाने से कोशिका के अन्दर सोडियम की कमी हो जाती है। इसलिए सुगमीकृत विसरण की प्रक्रिया द्वारा आंत्र की गुहिका से सोडियम आयन उपकला कोशिका में परिवहित होते हैं। इस प्रक्रिया में एक परिवहन प्रोटीन सोडियम एवं खाद्य पदार्थ (ग्लूकोज या अमीनो अम्ल) के साथ - साथ परिवहित तभी करती है जब दोनों पदार्थ इस प्रोटीन से संलग्न हो जाते हैं। दोनों पदार्थ जुड़ जाने पर सोडियम विद्युत रासायनिक प्रवणता (Gradient) के कारण कोशिका के भीतर जाते हैं। इस प्रकार सोडियम - ग्लूकोज या सोडियम - एमीनो अम्ल साथ-साथ परिवहित हो जाते हैं। इसे सोडियम अभिगमन कहते हैं।
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वसा का अवशोषण वसीय अम्ल, कोलेस्ट्रोल एवं मोनोग्लिसराइड के रूप में विसरण द्वारा लसिका में होता है। पित्त रस का अवशोषण में महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन वसाओं के साथ पित्त रस मिलकर जटिल संरचनाएँ बनाते हैं जिन्हें मिसेल (Micelles) कहते हैं। ये काइम में विलय होती हैं। प्रत्येक मिसेल वसा एवं पित्त लवणों की छोटी गोलाकार अथवा बेलनाकार गोलिका होती है जिसका व्यास 3 - 6 मिमी. होता है। इस गोलिका के केन्द्रीय भाग में वसा अम्ल एवं मोनोग्लिसराइड होते हैं जिनके चारों ओर लवण एकत्रित हो जाते हैं। जब मिसेल सूक्ष्मांकुर के नजदीक आती है तो इसमें उपस्थित वसा कोशिका में घुलनशील होने के कारण मिसेल से निकलकर कोशिका में विसरित हो जाती है। पित्त लवण काइम में रह जाते हैं तथा पुन: मिसेल बनाते हैं। कोशिका में वसा अम्ल एवं मोनोग्लिसराइड चिकनी अन्तःप्रदव्यों जालिका में प्रवेश कर नयी ट्राइग्लिसराइड संश्लेषित करते हैं। इन ट्राइग्लिसराइड अणुओं को चारों ओर से प्रोटीन घेर लेती है। इस प्रकार लिपोप्रोटीन से बनी गोलिकाएँ काइलोमाइक्रॉन कहलाती हैं। काइलोमाइक्रॉन एक्सोसाइटोसिस (Exocytosis) द्वारा बाहर निकलकर लसिका कोशिका में चली जाती है। ये लसिका तंत्र से होते हुए शिरा के रुधिर प्लाज्मा में पहुँच जाती हैं। प्लाज्मा में लिपोप्रोटीन लाइपेज की सहायता से इन्हें वसा अम्लों एवं मोनोग्लिसराइड में बदल दिया जाता है।

निष्क्रिय अवशोषण (Passive Transport) के अन्तर्गत अधिकतर पदार्थ उच्च सान्द्रता से निम्न सान्द्रता की ओर सामान्य विसरण द्वारा आंत्र उपकला से शिरिकाओं से बनी रक्त कोशिकाओं के द्वारा यकृत निवाहिका उपतंत्र में ले जाये जाते हैं। इस विधि से विटामिन (Vitamins), प्यूरिन व पिरिमिडिन का अवशोषण होता है। पदार्थों का अवशोषण आहारनाल के विभिन्न भागों जैसे मुख, आमाशय, छोटी आंत एवं बड़ी आंत में होता है।

अवशोषित खाद्य पदार्थ अन्त में रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न कोशिकाओं को पहुँचाये जाते हैं। भोजन के यह अन्तिम उत्पाद कोशिकाओं में जाकर उपापचय की क्रियाओं द्वारा कोशिकाओं के हिस्से या अंश बन जाते हैं। इसे.स्वांगीकरण (Assimilation) कहते हैं। भोजन का अपचित शेष भाग वृहदांत्र में आता है। इसमें अनेक जीवाणु होते हैं जो अपचित शेष में उपस्थित सेलुलोज का विघटन करते हैं। वृहदांत्र का मुख्य कार्य जल अवशोषण एवं मल बनाना होता है। कोलन में अधिकांश जल का अवशोषण हो जाता है तथा खनिज भी अवशोषित होते हैं। शेष बचा अपचित भाग, श्लेष्मा, मृत उपकला कोशिकाएँ, मृत जीवाणु, बिलिरुबिन आदि मिलकर मल बनाते हैं। जब मल मलाशय में भेजा जाता है तथा मलाशय की भित्ति संकुचित होने पर मल पर दबाव पड़ता है। दबाव पड़ने पर अवरोधिनी खुलती है तथा गुदा द्वारा मल बाहर त्याग दिया जाता है। मल को त्यागने की घटना को बहिक्षेपण (Egestion) अथवा मलोत्सर्ग (Defaecation) कहते हैं। मल विसर्जन तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित होता है और यह मल से परिपूर्ण वृहदान्त्र के निचले भाग के उहीपन से उत्पन्न प्रतिवर्त अनुक्रिया (Reflex response) है। यह तभी होता है जय मलाशय की भित्ति पर मल का दाय एक निश्चित सीमा तक लगभग 20 मिमी, Hg पहुँच जाता है। मलोत्सर्ग एक ऐच्छिक क्रिया है।

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प्रश्न 4. 
निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(i) तालु 
(ii) जीभ 
(iii) दन्त सूत्र।
उत्तर:
(i) तालु (Palate):
यह मुखगुहा की छत का निर्माण करती है अथवा मुखगुहा की छत को तालु कहते हैं। यह मुखगुहा को श्वसन मार्ग से अलग करता है। तालु दो भागों में बँटा होता है। आगे वाले भाग को कठोर ताल (Hard palate) व पीछे वाले भाग को कोमल तालु (Soft palate) कहते हैं।

(अ) कठोर तालु (Hard Palate): 
अस्थियों से निर्मित होने के कारण इसे कठोर तालु कहते हैं। कठोर तालु पर कृतनक (Incisors) के पीछे एक जोड़ी छोटे छिद्र होते हैं। जिनके द्वारा नेसोपेलेटाइन नलिका (Nasopalatine duct) मुखगुहा में खुलती है। यह नलिका मुखगुहा को नासा मार्गों को जोड़ने का कार्य करती है। नेसोपेलेटाइन नलिका में घ्राण संवेदी अंग (Olfactory organ) पाये जाते हैं, जिसे जैकब्सन अंग (Jocobson's organ) कहते हैं जो गन्ध ज्ञान द्वारा भोजन को पहचानने से सहायता करते हैं।

(ब) कोमल तालु (Soft Palate):
यह केवल संयोजी ऊतक एवं पेशियों से निर्मित होने के कारण कोमल होता है। कोमल तालु का अन्तिम भाग एक उभार के रूप में ग्रसनी की गुहा में लटका रहता है जिसे वैलम पैलेटाई (Velum palati) अथवा यूवेला (Uvula) कहते हैं। भोजन को निगलते समय वैलम पैलेटाई अन्तः नासा छिद्रों को बन्द करने का कार्य करता है। तालु पर अनेक प्रेलेटाइन श्लेष्मा ग्रन्थियाँ (Palatine mucous glands) पायी जाती हैं जो तालु को नम बनाये रखती हैं एवं भोजन को निगलने में सहायता करती हैं।

(ii) जीभ (Tongue):
जीभ मुख गुहा के तल पर पायी जाती है। यह मोटी मांसल व लचीली होती है। जीभ का अग्र भाग स्वतंत्र होता है तथा पश्च भाग मुख गुहा की फर्श से एक वलन (fold) द्वारा जुड़ा रहता है जिसे फ्रेनुलम लिंगवी (frenulum linguac) कहते हैं। जीभ की सतह पर अनेक स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) पायी जाती हैं जो मीठे, नमकीन, खट्टे एवं कड़वे स्वाद का ज्ञान कराती हैं।

जीभ के कार्य (Functions of Tongue):

  • भोजन को निगलने में सहायता करती है। 
  • भोजन को चबाने में सहायता करती है। 
  • भोजन के स्वाद का ज्ञान कराने में सहायक होती है। 
  • जीभ दाँतों की सफाई करने में सहायक होती है। 
  • जीभ बोलने में सहायक होती है।

(iii) दाँत (Teeth):
दाँत दोनों जबड़ों में पाये जाते हैं। ये दाँत जबड़े की अस्थि की गतिकाओं (Sockets) में स्थित होते हैं अत: ये गर्तदन्ती (Thecodont) होते हैं। मनुष्य के जीवनकाल में दाँत दो बार आते हैं। इस अवस्था को द्विबार दन्ती (Diphyodont) अवस्था कहते हैं। इस प्रकार दाँत दो प्रकार के होते हैं:

(a) अस्थायी दाँत (Temporary Teeth):
ऐसे दाँत जिनका क्षय कुछ समय बाद हो जाता है, उन्हें अस्थायी दाँत कहते हैं। इन्हें दूध के दाँत (Milk teeth) भी कहते हैं। वयस्क में ये दाँत स्थायी दाँतों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इन्हें गिरने वाले दाँत (Deciduous teeth) भी कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है।

(b) स्थायी दाँत (Permanent Teeth):
ऐसे दाँत जो जीवन में एक बार ही आते हैं स्थायी दाँत कहलाते हैं। मनुष्य में स्थायी दाँत 32 होते हैं। इन दाँतों का आकार एक समान नहीं होता है तथा विभिन्न कार्यों के अनुसार दाँतों का आकार एवं परिमाण पर निर्भर करता है। इस प्रकार के दाँतों को विषमदन्ती (Heterdont) कहते हैं। ये दाँत चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisors): ये संख्या में होते हैं तथा भोजन को काटने (Biting) का कार्य करते हैं।
  2. रदनक (Canines): ये संख्या में 4 होते हैं, जो नुकीले (Pointed) होते हैं तथा भोजन चीरने व फाड़ने का कार्य करते हैं।
  3. अग्र चर्वणक (Pre - molars): ये संख्या में 8 होते हैं। ये भोजन को चबाने व पीसने का कार्य करते हैं।
  4. चर्वणक (Molars): ये संख्या में 12 होते हैं। ये भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।

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अग्र - चर्वणक (Pre - molars) व चर्वणक (Molars) को कपोल दाँत (Cheek teeth) कहते हैं। मनुष्य में तीसरा मोलर दाँत सबसे बाद में निकलता है जिसे अक्कल दाड़ (Wisdom teeth) कहते हैं। यह एक अवशेषी अंग है।
दन्त सूत्र (Dental formula): स्तनियों में दन्त विन्यास (Dentition) एक सूत्र के रूप में व्यक्त किया जाता है, इसे दन्त सूत्र (Dental formula) कहते हैं। प्रत्येक जबड़े में दो अर्थाश पाये जाते हैं - बायां अधांश व दायां अर्धांश । बायें अधांश व दायें अर्धाश में दाँतों की संख्या समान होती है। इसलिए दाँतों की संख्या को 2 से गुणा करने पर कुल दाँतों की संख्या प्राप्त होती है।
दन्त सूत्र (Dental Formula) 
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इस सूत्र में कृन्तक (Incisor) को I, रदनक दांत (Canine) को C, अग्र चर्वणक (Pre - molar) को Pm एवं चर्वणक (Molar) को M द्वारा सम्बोधन किया जाता है।
मनुष्य का दन्त सूत्र 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{2}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{8} \times 2=32\)
बच्चों का दन्त सूत्र ( अस्थायी दाँत ) 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{0}{0}, \mathrm{M} \frac{2}{2}=\frac{5}{5} \times 2=20\)
खरगोश का दन्त सूत्र 
= \(\mathrm{I} \frac{2}{1}, \mathrm{C} \frac{0}{0}, \mathrm{Pm} \frac{3}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{6} \times 2=28\)
कुत्ते का दन्त सूत्र 
= \(\mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{2}{3}=\frac{10}{11} \times 2= \frac{20}{22} = 42\)
सूअर व घोड़े का दन्त सूत्र
= \(= \mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{11}{11} \times 2= \frac{22}{22} = 44\)
सूअर व घोड़े में सर्वाधिक दाँत 44 पाये जाते हैं।

दाँत की संरचना (Structure of Tooth): प्रत्येक दाँत के तीन भाग होते हैं:

  1. शिखर (Crown): दाँत का वह भाग जो मसूड़े से बाहर निकला होता है, शिखर कहलाता है।
  2. ग्रीवा (Neck): मसूढ़े में स्थित भाग को ग्रीवा कहते हैं।
  3. जड़ (Root): यह दाँत का आधार भाग है जो जबड़े की अस्थि की गर्तिका में धंसा रहता है।

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दाँत का शिखर एक मोटे सफेद चमकदार तथा अत्यन्त कठोर आवरण से ढका होता है जिसे इनेमल (Enamel) कहते हैं। शेष दाँत पर सीमेन्ट (Cement) जैसा कठोर पदार्थ का आवरण होता है। दाँत के इन आवरणों के नीचे डेन्टीन (Dentine) नामक अपेक्षाकृत कोमल पदार्थ का मोटा स्तर होता है। डेन्टीन स्तर में कई महीन एवं शाखान्वित नलिकाएं होती हैं। डेन्टीन स्तर एक पतली दंत गुहिका को घेरे होता है। इस गुहा को पल्प गुहा (Pulp Cavity) कहते हैं। पल्प गुहा में एक संयोजी ऊतक द्वारा निर्मित तरल भरा रहता है, इसे पल्प (Pulp) कहते हैं। पल्प में रक्त कोशिकाओं तथा तंत्रिका तंतुओं का पना जाल होता है जो पल्प केविटी छिद्र द्वारा शेष शरीर से सम्बन्धित होता है। पल्प गुहा के चारों ओर डेन्टीन से लगा कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। इस स्तर की कोशिकाएँ शाखान्वित होती हैं तथा दन्त कोशिकाएँ अर्थात् ओडोन्टोब्लास्ट्स (Odontoblasts) कहलाती हैं। ओडोन्टोब्लास्ट कोशिकाओं के प्रवर्ध डेन्टीन की नलिकाओं में फैली रहती है तथा ये कोशिकाएँ पल्प से O2 तथा पोषक पदार्थ डेन्टीन में पहुँचाती हैं। जिससे डेन्टीन में वृद्धि होती है। इसके वृद्धि करने से दाँत में वृद्धि होती है।

अधिकांश दाँतों में पूर्ण विकास के बाद वृद्धि रुक जाती है क्योंकि ओडोन्टोब्लास्ट्स कोशिकाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं तथा पल्प केविटी (Pulp Cavity) का छिद्र बहुत छोटा हो जाता है।

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प्रश्न 5. 
दाँत के अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दाँत (Teeth):
दाँत दोनों जबड़ों में पाये जाते हैं। ये दाँत जबड़े की अस्थि की गतिकाओं (Sockets) में स्थित होते हैं अत: ये गर्तदन्ती (Thecodont) होते हैं। मनुष्य के जीवनकाल में दाँत दो बार आते हैं। इस अवस्था को द्विबार दन्ती (Diphyodont) अवस्था कहते हैं। इस प्रकार दाँत दो प्रकार के होते हैं:

(a) अस्थायी दाँत (Temporary Teeth):
ऐसे दाँत जिनका क्षय कुछ समय बाद हो जाता है, उन्हें अस्थायी दाँत कहते हैं। इन्हें दूध के दाँत (Milk teeth) भी कहते हैं। वयस्क में ये दाँत स्थायी दाँतों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इन्हें गिरने वाले दाँत (Deciduous teeth) भी कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है।

(b) स्थायी दाँत (Permanent Teeth):
ऐसे दाँत जो जीवन में एक बार ही आते हैं स्थायी दाँत कहलाते हैं। मनुष्य में स्थायी दाँत 32 होते हैं। इन दाँतों का आकार एक समान नहीं होता है तथा विभिन्न कार्यों के अनुसार दाँतों का आकार एवं परिमाण पर निर्भर करता है। इस प्रकार के दाँतों को विषमदन्ती (Heterdont) कहते हैं। ये दाँत चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisors): ये संख्या में होते हैं तथा भोजन को काटने (Biting) का कार्य करते हैं।
  2. रदनक (Canines): ये संख्या में 4 होते हैं, जो नुकीले (Pointed) होते हैं तथा भोजन चीरने व फाड़ने का कार्य करते हैं।
  3. अग्र चर्वणक (Pre - molars): ये संख्या में 8 होते हैं। ये भोजन को चबाने व पीसने का कार्य करते हैं।
  4. चर्वणक (Molars): ये संख्या में 12 होते हैं। ये भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।

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अग्र - चर्वणक (Pre - molars) व चर्वणक (Molars) को कपोल दाँत (Cheek teeth) कहते हैं। मनुष्य में तीसरा मोलर दाँत सबसे बाद में निकलता है जिसे अक्कल दाड़ (Wisdom teeth) कहते हैं। यह एक अवशेषी अंग है।

दन्त सूत्र (Dental formula): स्तनियों में दन्त विन्यास (Dentition) एक सूत्र के रूप में व्यक्त किया जाता है, इसे दन्त सूत्र (Dental formula) कहते हैं। प्रत्येक जबड़े में दो अर्थाश पाये जाते हैं - बायां अधांश व दायां अर्धांश । बायें अधांश व दायें अर्धाश में दाँतों की संख्या समान होती है। इसलिए दाँतों की संख्या को 2 से गुणा करने पर कुल दाँतों की संख्या प्राप्त होती है।
दन्त सूत्र (Dental Formula) 
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इस सूत्र में कृन्तक (Incisor) को I, रदनक दांत (Canine) को C, अग्र चर्वणक (Pre - molar) को Pm एवं चर्वणक (Molar) को M द्वारा सम्बोधन किया जाता है।
मनुष्य का दन्त सूत्र 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{2}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{8} \times 2=32\)
बच्चों का दन्त सूत्र ( अस्थायी दाँत ) 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{0}{0}, \mathrm{M} \frac{2}{2}=\frac{5}{5} \times 2=20\)
खरगोश का दन्त सूत्र 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{1}, \mathrm{C} \frac{0}{0}, \mathrm{Pm} \frac{3}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{6} \times 2=28\)
कुत्ते का दन्त सूत्र 
\(= \mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{2}{3}=\frac{10}{11} \times 2=  \frac{20}{22} = 42\)
सूअर व घोड़े का दन्त सूत्र
\(= \mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{11}{11} \times 2= \frac{22}{22} = 44\)
सूअर व घोड़े में सर्वाधिक दाँत 44 पाये जाते हैं।

दाँत की संरचना (Structure of Tooth): प्रत्येक दाँत के तीन भाग होते हैं:

  1. शिखर (Crown): दाँत का वह भाग जो मसूड़े से बाहर निकला होता है, शिखर कहलाता है।
  2. ग्रीवा (Neck): मसूढ़े में स्थित भाग को ग्रीवा कहते हैं।
  3. जड़ (Root): यह दाँत का आधार भाग है जो जबड़े की अस्थि की गर्तिका में धंसा रहता है।

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दाँत का शिखर एक मोटे सफेद चमकदार तथा अत्यन्त कठोर आवरण से ढका होता है जिसे इनेमल (Enamel) कहते हैं। शेष दाँत पर सीमेन्ट (Cement) जैसा कठोर पदार्थ का आवरण होता है। दाँत के इन आवरणों के नीचे डेन्टीन (Dentine) नामक अपेक्षाकृत कोमल पदार्थ का मोटा स्तर होता है। डेन्टीन स्तर में कई महीन एवं शाखान्वित नलिकाएं होती हैं। डेन्टीन स्तर एक पतली दंत गुहिका को घेरे होता है। इस गुहा को पल्प गुहा (Pulp Cavity) कहते हैं। पल्प गुहा में एक संयोजी ऊतक द्वारा निर्मित तरल भरा रहता है, इसे पल्प (Pulp) कहते हैं। पल्प में रक्त कोशिकाओं तथा तंत्रिका तंतुओं का पना जाल होता है जो पल्प केविटी छिद्र द्वारा शेष शरीर से सम्बन्धित होता है। पल्प गुहा के चारों ओर डेन्टीन से लगा कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। इस स्तर की कोशिकाएँ शाखान्वित होती हैं तथा दन्त कोशिकाएँ अर्थात् ओडोन्टोब्लास्ट्स (Odontoblasts) कहलाती हैं। ओडोन्टोब्लास्ट कोशिकाओं के प्रवर्ध डेन्टीन की नलिकाओं में फैली रहती है तथा ये कोशिकाएँ पल्प से O2 तथा पोषक पदार्थ डेन्टीन में पहुँचाती हैं। जिससे डेन्टीन में वृद्धि होती है। इसके वृद्धि करने से दाँत में वृद्धि होती है।

अधिकांश दाँतों में पूर्ण विकास के बाद वृद्धि रुक जाती है क्योंकि ओडोन्टोब्लास्ट्स कोशिकाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं तथा पल्प केविटी (Pulp Cavity) का छिद्र बहुत छोटा हो जाता है।

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प्रश्न 6. 
पाचन को परिभाषित कीजिए। आमाशय में होने वाली पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पाचन - जटिल भोज्य पदार्थों को जलीय अपघटन (hydrolysis) द्वारा सरल व छोटे अणुओं में विघटित करने की क्रिया को पाचन कहते हैं।
आमाशय में पाचन (Digestion of Stomach): भोजन का आमाशय में प्रवेश करने पर जठर ग्रन्थियाँ उत्तेजित होकर जठर रस का खावण करती हैं। जठर रस में HCl व एन्जाइम होते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) के निम्न कार्य हैं:

  1. भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करना।
  2. निष्क्रिय एन्जाइम पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलना तथा निष्क्रिय प्रोरेनिन को सक्रिय रेनिन में बदलना।
  3. कठोर ऊतकों को गलाना। 
  4. Ca व Fe के अवशोषण में सहायता करना। 
  5. टायलिन की क्रिया को बंद करना।
  6. मुख गुहा से आये भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाना एवं जठर निर्गम कपाट को नियंत्रण करना।

जठर रस में पेप्सिन व रेनिन नामक दो एन्जाइम होते हैं। ये क्रमश: पेप्सिनोजन एवं प्रोरेनिन नामक निष्क्रिय रूपों में पाये जाते हैं तथा इन्हें HCl द्वारा सक्रिय रूपों में परिवर्तित किया जाता है।
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सक्रिय पेप्सिन भोजन में उपस्थित प्रोटीन का जल अपघटन करके उसे प्रोटीओजेज व पेप्टोन्स में बदल देता है -
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नवजातों के जठर रस में रेनिन एन्जाइम होता है जो दूध की प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है। रेनिन द्वारा दूध में पाये जाने वाले घुलनशील प्रोटीन केसीनोजन को पहले अघुलनशील केसीन में तथा पैराकेसीन में परिवर्तित कर दिया जाता है। पैराकेसीन फिर कैल्सियम से क्रिया कर कैल्सियम पैराकेसीनेट बना देता है। इन क्रियाओं से दूध फट जाता है, यह महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि दूध एक तरल पदार्थ है जो आमाशय में रुकना आवश्यक है।
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यदि दूध बिना रुके सीधे आँतों में पहुंच जाता है तब इसका पाचन भली - भांति नहीं हो पाता। फट जाने के कारण यह अधिक समय तक आमाशय में रुक जाता है ताकि पाचन पूर्ण हो सके। नवजात में रेनिन का महत्त्व अधिक होता है। वयस्क अवस्था में दूध को फाड़ने का कार्य HCl द्वारा किया जाता है। आमाशय की जठर ग्रन्थियों द्वारा थोड़ी मात्रा में लाइपेज का भी स्रावण किया जाता है जो वसा को वसीय अम्ल ग्लिसरॉल में बदल देता है -
लाइपेज + वसा → वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल

आमाशय की भित्ति के पेशी स्तरों में पाचन - क्रिया के समय क्रमाकुंचक तरंगें (Peristaltic waves) उत्पन्न होती हैं जिसके फलस्वरूप भोजन का जठर रस के साथ मिश्रण होता है तथा इसका पूर्ण मंधन (Churning) भी हो जाता है। मंथन के बाद भोजन पतली लेई के समान हो जाता है जिसे काइम (Chyne) कहते हैं। आमाशय में भोजन लगभग 4 - 5 घण्टे तक रहता है। भोजन - मिश्रण के काइम में परिवर्तित होने के बाद पाइलोरिक कपाट (Pyloric Valve) थोड़ी - थोड़ी देर में खुलता रहता है एवं काइम ग्रहणी में प्रवेश करता है।

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प्रश्न 7.
आमाशय व ग्रहणी की ऊतकीय संरचना का चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आहार नाल (Alimentary Canal):
मनुष्य की आहारनाल लम्बी कुण्डलित एवं पेशीय संरचना है जो मुँह से लेकर गुदा (Anus) तक फैली रहती है। मनुष्य में आहारनाल लगभग 8 से 10 मीटर लम्बी होती है। इसे गेस्ट्रो - इन्टेस्टीनल ट्रेक्ट (Gastro  - Intestinal Tract) भी कहते हैं। आहारनाल के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
1. मुख (Mouth)
2. मुख गुहिका (Buccal Cavity) 
3. ग्रसनी (Pharynx) 
4. ग्रसिका (Oesophagus) 
5. आमाशय (Stomach) 
6. आंत्र (Intestine) 

  • छोटी आंत्र (Small Intestine)
    • ग्रहणी 
    • जेजुनम 
    • इलियम 
  • बड़ी आंत्र (Large Intestine)
    • सीकम 
    • कोलन 
    • मलाशय

7. गुदा (Anus)।
(1) मुख (Mouth):
मुख दो गतिशील, पेशीय होंठों के द्वारा घिरा होता है, जिन्हें क्रमशः ऊपरी होंठ (Upper Lip) व निचला होंठ (Lower Lip) कहते हैं। इन होंठों के बीच मुख अर्थचन्द्राकार दरार के रूप में होता है। दोनों होंठों के भीतरी सतह पर कई लेबियल ग्रन्धियाँ स्थित होती हैं तथा इनके द्वारा स्रावित श्लेष्म (mucous) होंठों की इस सतह को लसदार बनाये रखते हैं। ऊपरी होंठ ठीक बीच में से दबा हुआ होता है अर्थात् एक गड्ढा होता है जो नाक तक फैला होता है जिसे फिलट्रोन (Philtron) कहते हैं। इसके कार्य के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। ऊपरी होंठ पर वयस्क अवस्था में घनी मूंछे (moustache) उग आती हैं जबकि मादा में नहीं। इसके अतिरिक्त होंठ मख को खोलने व बन्द करने का कार्य करते हैं, इसके साथ ही, भोजन को पकड़ने में भी सहायता करते हैं। मुख मुखगुहा में खुलता है।

(2) मुख गुहा (Buccal Cavity):
मुख गुहा दो भागों में विभक्त होती है जिसे क्रमशः प्रघाण (Vestibule) एवं मुखगुहिका कहते हैं।
प्रघाण (Vestibule): मुखगुहा का वह संकरा भाग जो होंठों, गाल व दांतों के बीच होता है वह प्रघाण कहलाता है।
मुखगुहिका (Buccal Cavity): मसूड़ों के पीछे या जबड़ों के अन्दर की ओर दाँतों की पंक्तियों से घिरे हुए भाग को वास्तविक मुखगुहिका कहते हैं।
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मुखगुहा ऊपरी एवं निचले जबड़ों से घिरी होती है। ऊपरी जबड़ा अचल होता है तथा निचला जबड़ा चल होता है। मुखगुहा में निम्न भाग होते हैं:

(i) तालु (Palate):
यह मुखगुहा की छत का निर्माण करती है अथवा मुखगुहा की छत को तालु कहते हैं। यह मुखगुहा को श्वसन मार्ग से अलग करता है। तालु दो भागों में बँटा होता है। आगे वाले भाग को कठोर ताल (Hard palate) व पीछे वाले भाग को कोमल तालु (Soft palate) कहते हैं।

(अ) कठोर तालु (Hard Palate): 
अस्थियों से निर्मित होने के कारण इसे कठोर तालु कहते हैं। कठोर तालु पर कृतनक (Incisors) के पीछे एक जोड़ी छोटे छिद्र होते हैं। जिनके द्वारा नेसोपेलेटाइन नलिका (Nasopalatine duct) मुखगुहा में खुलती है। यह नलिका मुखगुहा को नासा मार्गों को जोड़ने का कार्य करती है। नेसोपेलेटाइन नलिका में घ्राण संवेदी अंग (Olfactory organ) पाये जाते हैं, जिसे जैकब्सन अंग (Jocobson's organ) कहते हैं जो गन्ध ज्ञान द्वारा भोजन को पहचानने से सहायता करते हैं।

(ब) कोमल तालु (Soft Palate):
यह केवल संयोजी ऊतक एवं पेशियों से निर्मित होने के कारण कोमल होता है। कोमल तालु का अन्तिम भाग एक उभार के रूप में ग्रसनी की गुहा में लटका रहता है जिसे वैलम पैलेटाई (Velum palati) अथवा यूवेला (Uvula) कहते हैं। भोजन को निगलते समय वैलम पैलेटाई अन्तः नासा छिद्रों को बन्द करने का कार्य करता है। तालु पर अनेक प्रेलेटाइन श्लेष्मा ग्रन्थियाँ (Palatine mucous glands) पायी जाती हैं जो तालु को नम बनाये रखती हैं एवं भोजन को निगलने में सहायता करती हैं।

(ii) जीभ (Tongue):
जीभ मुख गुहा के तल पर पायी जाती है। यह मोटी मांसल व लचीली होती है। जीभ का अग्र भाग स्वतंत्र होता है तथा पश्च भाग मुख गुहा की फर्श से एक वलन (fold) द्वारा जुड़ा रहता है जिसे फ्रेनुलम लिंगवी (frenulum linguac) कहते हैं। जीभ की सतह पर अनेक स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) पायी जाती हैं जो मीठे, नमकीन, खट्टे एवं कड़वे स्वाद का ज्ञान कराती हैं।

जीभ के कार्य (Functions of Tongue):

  1. भोजन को निगलने में सहायता करती है। 
  2. भोजन को चबाने में सहायता करती है। 
  3. भोजन के स्वाद का ज्ञान कराने में सहायक होती है। 
  4. जीभ दाँतों की सफाई करने में सहायक होती है। 
  5. जीभ बोलने में सहायक होती है।

(iii) दाँत (Teeth):
दाँत दोनों जबड़ों में पाये जाते हैं। ये दाँत जबड़े की अस्थि की गतिकाओं (Sockets) में स्थित होते हैं अत: ये गर्तदन्ती (Thecodont) होते हैं। मनुष्य के जीवनकाल में दाँत दो बार आते हैं। इस अवस्था को द्विबार दन्ती (Diphyodont) अवस्था कहते हैं। इस प्रकार दाँत दो प्रकार के होते हैं:

(a) अस्थायी दाँत (Temporary Teeth):
ऐसे दाँत जिनका क्षय कुछ समय बाद हो जाता है, उन्हें अस्थायी दाँत कहते हैं। इन्हें दूध के दाँत (Milk teeth) भी कहते हैं। वयस्क में ये दाँत स्थायी दाँतों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इन्हें गिरने वाले दाँत (Deciduous teeth) भी कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है।

(b) स्थायी दाँत (Permanent Teeth):
ऐसे दाँत जो जीवन में एक बार ही आते हैं स्थायी दाँत कहलाते हैं। मनुष्य में स्थायी दाँत 32 होते हैं। इन दाँतों का आकार एक समान नहीं होता है तथा विभिन्न कार्यों के अनुसार दाँतों का आकार एवं परिमाण पर निर्भर करता है। इस प्रकार के दाँतों को विषमदन्ती (Heterdont) कहते हैं। ये दाँत चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisors): ये संख्या में होते हैं तथा भोजन को काटने (Biting) का कार्य करते हैं।
  2. रदनक (Canines): ये संख्या में 4 होते हैं, जो नुकीले (Pointed) होते हैं तथा भोजन चीरने व फाड़ने का कार्य करते हैं।
  3. अग्र चर्वणक (Pre - molars): ये संख्या में 8 होते हैं। ये भोजन को चबाने व पीसने का कार्य करते हैं।
  4. चर्वणक (Molars): ये संख्या में 12 होते हैं। ये भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।

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अग्र - चर्वणक (Pre - molars) व चर्वणक (Molars) को कपोल दाँत (Cheek teeth) कहते हैं। मनुष्य में तीसरा मोलर दाँत सबसे बाद में निकलता है जिसे अक्कल दाड़ (Wisdom teeth) कहते हैं। यह एक अवशेषी अंग है।
दन्त सूत्र (Dental formula): स्तनियों में दन्त विन्यास (Dentition) एक सूत्र के रूप में व्यक्त किया जाता है, इसे दन्त सूत्र (Dental formula) कहते हैं। प्रत्येक जबड़े में दो अर्थाश पाये जाते हैं - बायां अधांश व दायां अर्धांश । बायें अधांश व दायें अर्धाश में दाँतों की संख्या समान होती है। इसलिए दाँतों की संख्या को 2 से गुणा करने पर कुल दाँतों की संख्या प्राप्त होती है।
दन्त सूत्र (Dental Formula) 
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इस सूत्र में कृन्तक (Incisor) को I, रदनक दांत (Canine) को C, अग्र चर्वणक (Pre - molar) को Pm एवं चर्वणक (Molar) को M द्वारा सम्बोधन किया जाता है।
मनुष्य का दन्त सूत्र 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{2}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{8} \times 2=32\)
बच्चों का दन्त सूत्र ( अस्थायी दाँत ) 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{2}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{0}{0}, \mathrm{M} \frac{2}{2}=\frac{5}{5} \times 2=20\)
खरगोश का दन्त सूत्र 
\(= \mathrm{I} \frac{2}{1}, \mathrm{C} \frac{0}{0}, \mathrm{Pm} \frac{3}{2}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{8}{6} \times 2=28\)
कुत्ते का दन्त सूत्र 
\(= ]\mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{2}{3}=\frac{10}{11} \times 2= \frac{20}{22} = 42\)
सूअर व घोड़े का दन्त सूत्र
\(= \mathrm{I} \frac{3}{3}, \mathrm{C} \frac{1}{1}, \mathrm{Pm} \frac{4}{4}, \mathrm{M} \frac{3}{3}=\frac{11}{11} \times 2=  \frac{22}{22} = 44\)
सूअर व घोड़े में सर्वाधिक दाँत 44 पाये जाते हैं।

दाँत की संरचना (Structure of Tooth): प्रत्येक दाँत के तीन भाग होते हैं:

  1. शिखर (Crown): दाँत का वह भाग जो मसूड़े से बाहर निकला होता है, शिखर कहलाता है।
  2. ग्रीवा (Neck): मसूढ़े में स्थित भाग को ग्रीवा कहते हैं।
  3. जड़ (Root): यह दाँत का आधार भाग है जो जबड़े की अस्थि की गर्तिका में धंसा रहता है।

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दाँत का शिखर एक मोटे सफेद चमकदार तथा अत्यन्त कठोर आवरण से ढका होता है जिसे इनेमल (Enamel) कहते हैं। शेष दाँत पर सीमेन्ट (Cement) जैसा कठोर पदार्थ का आवरण होता है। दाँत के इन आवरणों के नीचे डेन्टीन (Dentine) नामक अपेक्षाकृत कोमल पदार्थ का मोटा स्तर होता है। डेन्टीन स्तर में कई महीन एवं शाखान्वित नलिकाएं होती हैं। डेन्टीन स्तर एक पतली दंत गुहिका को घेरे होता है। इस गुहा को पल्प गुहा (Pulp Cavity) कहते हैं। पल्प गुहा में एक संयोजी ऊतक द्वारा निर्मित तरल भरा रहता है, इसे पल्प (Pulp) कहते हैं। पल्प में रक्त कोशिकाओं तथा तंत्रिका तंतुओं का पना जाल होता है जो पल्प केविटी छिद्र द्वारा शेष शरीर से सम्बन्धित होता है। पल्प गुहा के चारों ओर डेन्टीन से लगा कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। इस स्तर की कोशिकाएँ शाखान्वित होती हैं तथा दन्त कोशिकाएँ अर्थात् ओडोन्टोब्लास्ट्स (Odontoblasts) कहलाती हैं। ओडोन्टोब्लास्ट कोशिकाओं के प्रवर्ध डेन्टीन की नलिकाओं में फैली रहती है तथा ये कोशिकाएँ पल्प से O2 तथा पोषक पदार्थ डेन्टीन में पहुँचाती हैं। जिससे डेन्टीन में वृद्धि होती है। इसके वृद्धि करने से दाँत में वृद्धि होती है।

अधिकांश दाँतों में पूर्ण विकास के बाद वृद्धि रुक जाती है क्योंकि ओडोन्टोब्लास्ट्स कोशिकाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं तथा पल्प केविटी (Pulp Cavity) का छिद्र बहुत छोटा हो जाता है।

(3) ग्रसनी (Pharynx):
मुख गुहा पीछे की ओर एक कीपनुमा नलिका में खुलती है जिसे ग्रसनी (Pharynx) कहते हैं। वेलम पेलेटाइ (Valum Palati) ग्रसनी गुहा को दो कक्षों में वर्गीकृत कर देती है- पृष्ठ कक्ष को नासा ग्रसनी (Naso pharynx) व अधर कक्ष को मुख ग्रसनी (Oropharynx) कहते हैं। ग्रसनी में निम्न चार छिद पाये जाते है-

  1. ग्रसिका द्वार (Gullet)
  2. घांटी द्वार (Glottis)
  3. यूस्टेकी नलिका (Eustachian duct)
  4. अन्तःनासाछिद (Internal nares)

(4) ग्रसिका (Oesophagus): 
यह सीधी नलिकाकार होती है। इसकी लम्बाई लगभग 25 सेमी. होती है। यह ग्रसनी को आमाशय से जोड़ने का कार्य करती है। यह ग्रीवा तथा वक्ष भाग से होती हुई तनु पट (Diaphragm) को भेदकर उदरगुहा में प्रवेश करती है और अन्त में आमाशय में खलती है। ग्रसिका में श्लेष्म ग्रन्धियाँ होती हैं परन्तु पाचक ग्रन्थियों का अभाव होता है।

ग्रसिका की औतिकी (Histology of Oesophagus): इसकी भित्ति में ऊतकों के सामान्य स्तर सिरोसा (Serosa) बाह्य, पेशी स्तर (Muscular Layer), अधःश्लेष्मिका (Sub - mucosa) एवं श्लेष्मिका (Mucosa) पाये जाते हैं। सिरोसा वास्तव में विसरल पेरीटोनियम (Visceral peritoneum) होता है। पेशी स्तर (Muscular layer) से बाहा अनुदेi (Longitudinal) एवं भीतरी वर्तुल (circular) अरेखित पेशियों के स्तर होते हैं। अध:श्लेष्मिका (Submucosa) संयोजी ऊतक से निर्मित स्तर होता है जिसमें तंत्रिकाएँ, रुधिर एवं लसिका वाहिनियाँ, कॉलेजन तन्तु एवं लचीले तन्तु तथा कुछ श्लेष्मा ग्रन्थियाँ (Mucous glands) पाई जाती हैं।

श्लेष्मिका (Mucosa) सबसे भीतरी स्तर है इसमें उपकला, आधार पटल (Lamina propria) एवं श्लेष्मिका पेशी पाई जाती है। ग्रसिका की भीतरी उपकला, स्तरित शल्की उपकला (Stratified squamous epithelium) के रूप में होती है। ग्रसिका के प्रारम्भिक भाग में रेखित पेशियाँ, मध्य भाग में रेखित व अरेखित पेशियाँ व अन्तिम भाग में केवल अरेखित पेशियाँ पायी जाती हैं। ग्रसिका भोजन को क्रमाकुंचन द्वारा ग्रसनी से आमाशय में भेजती है।

(5) आमाशय (Stomach):यह उदर गुहा में बायीं ओर डायफ्राम के पीछे स्थित होता है। यह आहारनाल का सबसे चौड़ा थैलेनुमा पेशीय भाग है, जिसकी आकृति 'J' के समान होती है। ग्रसिका आमाशय के लगभग मध्य भाग में बाई ओर खुलती है अर्थात् कार्डियक भाग में खुलती है।
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आमाशय में निम्न तीन भाग पाये जाते हैं

  1. जठरागम भाग (Cardiac part) 
  2. फंडस भाग (Fundic part) 
  3. जठर निर्गमी भाग (Pyloric part)

(6) आंत्र (Intestine):आहारनाल का शेष बच रहा भाग आंत्र कहलाता है। यह आहारनाल का सबसे लम्बा भाग है। आंत्र को दो भागों में बाँटा गया है:

  1. छोटी आंत्र (Small Intestine) 
  2. बड़ी आंत्र (Large Intestine)

(7) गुदा (Anus): गुदा के चारों ओर दो अवरोधिनियाँ (Splhincters) होती हैं-आन्तरिक अवरोधिनी (Intemal Sphincter) व बाह्य अवरोधिनी (External sphincter)। ये अवरोधिनियाँ गुदा को खुलने व बन्द होने को नियंत्रित करती हैं। 

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प्रश्न 8. 
निम्न पर टिप्पणियाँ लिखिए
(i) लार ग्रन्थियाँ 
(ii) अग्न्याशय।
उत्तर:
(i) लार ग्रन्थियाँ (Salivary Glands): मनुष्य में तीन जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। ये ग्रन्थियाँ बहिस्रावी (Exocrine) होती हैं।

  1. कर्ण पूर्व (Parotid glands): ये ग्रन्थियाँ सबसे बड़ी होती हैं तथा कर्ण के नीचे स्थित होती हैं। इन ग्रन्थियों की नलिका कूतक दाँतों (Incisors) के समीप खुलती है। जब कभी इस ग्रन्थि में वाइरस का संक्रमण हो जाता है तो इन्हें कर्ण-मूल (Mumps) कहते हैं। इसके कारण ग्रन्थि में सूजन आ जाती हैं।
  2. अधोजंभ/अवचिंबुकीय ग्रन्थियाँ (Sub - maxillary/Submandibular Glands): ये ग्रन्थियाँ ऊपरी जबड़ी व निचले जबड़े के जोड़ पर पायी जाती हैं। इन ग्रन्थियों की नलिकाएँ मुख गुहिका के फर्श पर खुलती हैं।
  3. अधोजिला ग्रन्थियाँ (Sub - linguals Glands): ये ग्रन्धियाँ जिला में पायी जाती हैं। ये सबसे छोटी लार ग्रन्थियाँ हैं। इन ग्रन्थियों की नलिकाएँ फ्रेनुलम (Frenulum) पर खुलती हैं।

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लार ग्रन्थियों के स्रावण को लार (Saliva) कहते हैं। लार एक क्षारीय तरल होता है इसमें श्लेष्म (Mucous), जल, लाइसोजाइम व टायलिन (Piylin) नामक एन्जाइम उपस्थित होता है जो भोजन के पाचन में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त लार में सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम बाइकार्बोनेट आदि आवन उपस्थित होते हैं। लार भोजन को पचाने का कार्य ही नहीं करती है बल्कि भोजन को लसलसा बनाती है ताकि भोजन को आसानी से निगला जा सके। इसके साथ ही लार बोलने में भी सहायक होती है।

(ii) अग्न्याशय (Pancreas): यह शरीर की दूसरी सबसे बड़ी पाचक प्रन्थि है। यह ग्रन्थि अनियमित आकार की कोमल गुलाबी रंग की चपटी रचना है जो ग्रहणी की दोनों भुजाओं के मध्य स्थित होती है। अग्न्याशय कोशिकाओं के बने अनेक पिण्डकों (Lobules) का बना होता है जिन्हें एसिनाई (acini) कहते हैं। इन कोशिकीय पिण्डकों से महीन बाहिनियाँ निकलती हैं जो परस्पर मिलकर एक बड़ी अग्न्याशय नलिका (Pancreatic duct) बनाती है। अग्न्याशय नलिका ग्रहणी (duodenum) की दूरस्थ भुजा में खुलती है। अन्याशय की कोशिकाएं अनेक एंजाइम युक्त पाचक आन्याशयी रस (pancreatic juice) का निर्माण करती हैं।
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आन्याशयी पिण्डकों के बीच कहीं - कहीं विशिष्ट कोशिका समूह स्थित होते हैं जिन्हें लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerthans) कहते हैं। ये समूह अन्त:स्रावी प्रकृति (Endocrine nature) के होते हैं। लैंगरहेंस की हीपिकाओं की a(एल्फा) कोशिकाओं से ग्लूकेगॉन (Glucagon) नामक हारमोन स्रावित किया जाता है तथा B (बीटा) कोशिकाओं के द्वारा इन्सुलिन (Insulin) नामक हारमोन सावित किया जाता है जिनका वर्णन विस्तार से अध्याय 22 में किया जायेगा।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि अग्न्याशय में दो प्रकार की ग्रन्थिल कोशिकाओं के समूह मिलते हैं। एक तो पाचन से सम्बन्धित वाहिनी युक्त एसिनाई (acini) जिनको कोशिकाएँ अपने सावी पदार्थों को अर्थात् आन्याशय रस को वाहिनियों द्वारा आहारनाल में पहुँचाती हैं तथा दूसरी लैंगरहेंस की द्वीपिकाओं की कोशिकाएँ जो वाहिनो रहित (ductless) होती हैं तथा अपने स्रावी पदार्थों को अर्थात् हारमोन्स को सीधे रक्त में डालती हैं। वाहिनी युक्त ग्रन्धियों को बहिःस्रावी (Exocrine) प्रन्थियाँ कहते हैं तथा वाहिनी रहित ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी (Endocrine) ग्रन्थियों कहते हैं। अतः अग्न्याशय बहिःस्रावी तथा अन्तःस्रावी प्रकार की संयुक्त ग्रन्थि होती है। इसे मिश्रित ग्रन्थि कहते हैं।

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प्रश्न 9. 
सबसे बड़ी ग्रन्धि किसे कहते हैं? इसकी संरचना का वर्णन करते हुए इसके कार्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
यकृत (Liver):
यकृत मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि है जिसका वयस्क में भार लगभग 12 से 15 किलोग्राम होता है। यह उदर में मध्य पेट के ठीक नीचे स्थित होता है। लवित्रकार स्नायु (Falciform Ligament) के द्वारा यकृत दो पालियों में बँटा होता है, जिन्हें क्रमश: बड़ी दायीं पाली व छोटी बायीं पाली कहते हैं। दायीं बड़ी पाली के नीचे थैलेनुमा हरे रंग की रचना पाई जाती है जिसे पित्ताशय (Gall bladder) कहते हैं। इसमें यकृत द्वारा स्रावित पित्त (Bile) रस का संचय होता है। पित्ताशय से पित्ताशय वाहिनी (Cystic duct) निकलकर यकृत वाहिनी (Hepatic duct) से जुड़ती है तथा सामान्य पित्त वाहिनी (Common bite duct) बनाती है जो ग्रहणी के समीपस्थ भाग में खलती है।
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यकृत की औतिकी (Histology of Liver):
यकृत का निर्माण छोटे - छोटे बहुभुजाकार (Polygonal) पिण्डकों (Lobules) का बना होता है। ये यकृत की संरचनात्मक इकाई हैं। प्रत्येक पाली में यकृत कोशिकाएं होती हैं जो पित्त रस का निर्माण करती हैं। ये यकृत कोशिकाएँ अरीय लड़ियों में क्रमबद्ध रहती हैं। ये मध्य से निकलकर परिधि की ओर विन्यासित होती हैं। प्रत्येक पाली के चारों ओर संयोजी ऊतक का आवरण पाया जाता है जिसे ग्लिसन कैप्सूल (Glisson's Capsule) कहते हैं। प्रत्येक पाली में एक केन्द्रीय शिरा होती है जो पिण्ड अथवा पाली का अक्ष बनाती है। इसे अन्तः पिण्डकीय शिरा कहते हैं। ग्लिसन्स केप्सूल के किनारों पर तीन-तीन नलिकाओं यकृत निवाहिका शिरा, यकृत धमनी एवं यकृत वाहिका का एक समूह होता है जिसे निर्वाहिका त्रय (Portal triad) कहते हैं। ये तीनों संयोजी ऊतक के बने आवरण से ढके होते हैं। प्रत्येक पाली में यकृत कोशिकाओं की जोड़ी के बीच-बीच में शिरा पात्र (Sinusoids) होते हैं। शिरा पाश की दीवारों में पाई जाने वाली विशिष्ट कोशिकाओं को कुफ्फर कोशिकाएँ (Kupffer's Cells) कहते हैं। ये पुरानी रक्त कणिकाओं का विखण्डन कर पित्त वर्णकों (Bile pigments) का निर्माण करती हैं। 
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यकृत के कार्य (Functions of Liver): यकृत एक पाचन ग्रन्थि के अतिरिक्त और भी निम्न महत्त्वपूर्ण कार्य करता है -

  1. पित्त संश्लेषण: यह एक प्रकार का क्षारीय रस है जिसमें Na2CO3, कोलेस्ट्रोल, लेसिथिन तथा पित्त वर्णक कणिकाएँ पायी जाती हैं। पित्त रस के निम्न कार्य हैं -
    • वसा का पायसीकरण करता है 
    • वसा के पृष्ठ तनाव को कम करता है 
    • आंत्र के अम्ल को उदासीन करता है 
    • भोजन को सड़ने से रोकता है 
    • पित्तवर्णक लवण आदि उत्सर्जी पदार्थों को यकृत से बाहर ले जाने का कार्य करता है 
    • यह केरोटीन, विटामिन D, E व K का अवशोषण करता है 
    • हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है 
    • अग्न्याशयी रस के लाइपेज को क्रियाशील बनाता है।
  2. वसा एवं विटामिन्स का संचय: यकृत कोशिकाएं ग्लूकोज को वसा में भी बदलकर संचय करती हैं। इस प्रकार विटामिन्स का भी संग्रह करती हैं।
  3. भ्रूणीय अवस्था में यकृत RRC का निर्माण करता है। वयस्क अवस्था में कुफ्फर कोशिकाएँ (Kupffer Cells) निष्क्रिय व मृत RBC को पचाकर हीमोग्लोबिन का विखण्डन कर देती हैं। इससे पित्तवर्णकों का निर्माण होता है।
  4. ग्लाइकोजन के रूप में ग्लूकोज का संचय: रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होने पर यकृत कोशिकाएँ ग्लूकोज (Glucose) को ग्लाइकोजन में बदल देती हैं। इस क्रिया को ग्लाइकोजेनेसिस (Glycogenesis) कहते हैं।
  5. ग्लाइकोजिनोलाइसिस: इस क्रिया में संचित ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदलना होता है। ऐसा रुधिर में ग्लुकोज की कमी के समय में होता है।
  6. ग्लूकोनियोजिनेसिस (Gluconeogenesis): यकृत कोशिकायें अमीनो अम्ल, वसीय अम्ला, ग्लिरॉल से ग्लूकोस का निर्माण करती हैं।
  7. विषहरण: यकृत द्वारा आंत्र में निर्मित विषैले पदार्थों का विषहरण किया जाता है। उपापचय के दौरान निर्मित विषैले प्रसनिक अम्ल (Prussnic acid) का भी विषहरण यकृत द्वारा किया जाता है।
  8. जीवाणुओं का भक्षण: रक्त में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं का यकृत कोशिकायें फैगोसाइटोसिस (Phagocytosis) द्वारा भक्षण कर नष्ट करती हैं।
  9. डीएमिनेशन (Deamination): अमीनो अम्ल को यकृत कोशिकाएँ ग्रहण करके उनका पाइरुविक अम्ल (Pyrivic acid) तथा NH3 में विघटन कर देती हैं। इस प्रतिक्रिया को डिएमीनेशन कहते हैं। 
  10. यूरिया संश्लेषण (Urea synthesis): अमोनिया को यकृत कोशिकाएँ CO2 से संयोजन कर उसे सामान्य यूरिया में बदल देती हैं। यूरिया वृक्क के द्वारा मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
  11. हिपैरिन का स्रावण: यकृत कोशिकाएं हिपैरिस नामक प्रोटीन का निर्माण करती हैं जो प्रतिस्कंद (Anticoagulant) है।
  12. प्रोधोम्बीन व फाइब्रोनोजन का संश्लेषण: यकृत कोशिकाएँ रक्त प्लाज्मा की प्रोनोम्बीन तथा फाइब्रोनोजन नामक महत्वपूर्ण प्रोटीन का निर्माण कर इन्हें संग्रहित करती हैं।
  13. यकृत अकार्बनिक पदार्थों का संचय के साथ एल्यूमिन के संश्लेषण में सहायक है।
  14.  यकृत लिम्फ निर्माण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके साथ ही इसे ताप उत्पादन का केन्द्र भी माना जाता है।

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प्रश्न 10. 
मनुष्य में पाचक रसों का हारमोनों द्वारा नियन्त्रण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
जटिल व अघुलनशील भोजन को विभिन्न एन्जाइम्स की सहायता से सरल व विसरणशील अवस्था में बदलने की क्रिया को ही पाचन (Digestion) कहते हैं।
पाचन क्रिया दो चरणों में सम्पन्न होती है - यांत्रिक पाचन (Mechanical digestion) तथा रासायनिक पाचन (Chemical digestion)। यांत्रिक पाचन के दौरान भोजन को छोटे - छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है। यह क्रिया मुखगुहा व आमाशय में होती है। भोजन को छोटे - छोटे टुकड़ों में तोड़ देने से इसका रासायनिक पाचन अपेक्षाकृत शीघ्र व सरल हो जाता है। रासायनिक पाचन में एन्जाइम्स की सहायता से भोजन के जटिल अणुओं को सरल अणुओं में परिवर्तित किया जाता है। जटिल से सरल अणुओं में परिवर्तन की क्रियाएँ एन्जाइम्स द्वारा उत्प्रेरित जलअपघटनी क्रियाएँ होती हैं जो आहार नाल के विभिन्न क्षेत्रों में सम्पन्न होती जाती हैं।

मनुष्य की आहारनाल के विभिन्न भागों में निम्नलिखित पाचन क्रियाएँ होती हैं -

(1) मुख गुहा में पाचन (Digestion in Buccal Cavity):
मनुष्य सर्वाहारी है। जो कंतक (Incisors) दाँतों से काटकर अपने भोजन को ग्रहण करता है। मुख गुहा में भोजन को चबाया जाता है। इस दौरान भोजन के साथ लार मिलाई जाती है ताकि भोजन नम व लसलसा बन जाये। लार में ययलिन तथा लाइसोजाइम पाये जाते हैं। टायलिन जिसे एमाइलेज भी कहते हैं, यह भोजन में उपस्थित मण्ड (Starch) से क्रिया कर उसे डैक्सट्रीन तथा माल्टोज में बदल देता है -
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लार में उपस्थित लाइसोजाइम जीवाणुओं के संक्रमण को रोकता है। इसके अतिरिक्त लार में विद्युत अपघट्य (Electrolytes) जैसे Na+, K+,Cl- एवं HCO3- पाये जाते हैं। मुखगुहा में पाचन के पश्चात् भोजन का स्वरूप बोलस (Bolus) कहलाता है। अब बोलस को जीभ की सहायता से ग्रसनी से होते हुए ग्रसिका में धकेला जाता है। भोजन के निगलने की क्रिया को डिग्लूटिशन (Diglutition) कहते हैं। ग्रसनी व प्रसिका में किसी प्रकार पाचन क्रिया नहीं होती है। इसमें श्लेष्मा अन्थियों द्वारा श्लेष्मा का खावण होता है एवं ग्रसिका में क्रमाकुंचन गति द्वारा कार्डियक कपाट (Cardiac valve) के माध्यम से भोजन ग्रसिका से आमाशय में पहुँच जाता है। यह कपाट सामान्य अवस्था में बंद रहता है तथा आमाशय से भोजन को वापस नहीं आने देता है।

(2) आमाशय में पाचन (Digestion of Stomach): भोजन का आमाशय में प्रवेश करने पर जठर ग्रन्थियाँ उत्तेजित होकर जठर रस का खावण करती हैं। जठर रस में HCl व एन्जाइम होते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) के निम्न कार्य हैं:

  1. भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करना।
  2. निष्क्रिय एन्जाइम पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलना तथा निष्क्रिय प्रोरेनिन को सक्रिय रेनिन में बदलना।
  3. कठोर ऊतकों को गलाना। 
  4. Ca व Fe के अवशोषण में सहायता करना। 
  5. टायलिन की क्रिया को बंद करना।
  6. मुख गुहा से आये भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाना एवं जठर निर्गम कपाट को नियंत्रण करना।

जठर रस में पेप्सिन व रेनिन नामक दो एन्जाइम होते हैं। ये क्रमश: पेप्सिनोजन एवं प्रोरेनिन नामक निष्क्रिय रूपों में पाये जाते हैं तथा इन्हें HCl द्वारा सक्रिय रूपों में परिवर्तित किया जाता है।
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सक्रिय पेप्सिन भोजन में उपस्थित प्रोटीन का जल अपघटन करके उसे प्रोटीओजेज व पेप्टोन्स में बदल देता है -
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नवजातों के जठर रस में रेनिन एन्जाइम होता है जो दूध की प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है। रेनिन द्वारा दूध में पाये जाने वाले घुलनशील प्रोटीन केसीनोजन को पहले अघुलनशील केसीन में तथा पैराकेसीन में परिवर्तित कर दिया जाता है। पैराकेसीन फिर कैल्सियम से क्रिया कर कैल्सियम पैराकेसीनेट बना देता है। इन क्रियाओं से दूध फट जाता है, यह महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि दूध एक तरल पदार्थ है जो आमाशय में रुकना आवश्यक है।
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यदि दूध बिना रुके सीधे आँतों में पहुंच जाता है तब इसका पाचन भली - भांति नहीं हो पाता। फट जाने के कारण यह अधिक समय तक आमाशय में रुक जाता है ताकि पाचन पूर्ण हो सके। नवजात में रेनिन का महत्त्व अधिक होता है। वयस्क अवस्था में दूध को फाड़ने का कार्य HCl द्वारा किया जाता है। आमाशय की जठर ग्रन्थियों द्वारा थोड़ी मात्रा में लाइपेज का भी स्रावण किया जाता है जो वसा को वसीय अम्ल ग्लिसरॉल में बदल देता है -
लाइपेज + वसा → वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल

आमाशय की भित्ति के पेशी स्तरों में पाचन - क्रिया के समय क्रमाकुंचक तरंगें (Peristaltic waves) उत्पन्न होती हैं जिसके फलस्वरूप भोजन का जठर रस के साथ मिश्रण होता है तथा इसका पूर्ण मंधन (Churning) भी हो जाता है। मंथन के बाद भोजन पतली लेई के समान हो जाता है जिसे काइम (Chyne) कहते हैं। आमाशय में भोजन लगभग 4 - 5 घण्टे तक रहता है। भोजन - मिश्रण के काइम में परिवर्तित होने के बाद पाइलोरिक कपाट (Pyloric Valve) थोड़ी - थोड़ी देर में खुलता रहता है एवं काइम ग्रहणी में प्रवेश करता है।

(3) ग्रहणी में पाचन (Digestion in duodenum):
ग्रहणी में काइम के प्रवेश के साथ ही इसमें पित्त रस एवं आन्याशयी रस मिश्रित होते हैं। पित्त रस एक क्षारीय द्रव है जो यकृत द्वारा खावित होता है, यह रस भोजन के अम्लीय स्वरूप को क्षारीय बनाता है। इसके कार्बनिक लवण जैसे ग्लाइकोकोलेट, टॉरोकोलोट आदि वसाओं का पायसीकरण कर देते हैं, इसके अकार्बनिक लवण जैसे सोडियम बाइकार्बोनेट आदि हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करते हैं तथा पित्त लवण, वसा अम्लों एवं विटामिन ए, डी, ई आदि के अवशोषण में सहायक होते हैं। पित्त में बिलीरविन, बिलीवर्डिन (Biliverdin) कोलेस्ट्रॉल लेसिथिन जैसे उत्सर्जी पदार्थ भी पाये जाते हैं। बिलीरुबिन व बिलीवर्डिन का निर्माण मृत RRC के हीमोग्लोबिन के विघटन द्वारा होता है। बिलीरुबिन पीले रंग का व बिलीवर्डिन हरे रंग का होता है जिससे पित्त रस का रंग होता है। इसी प्रकार बिलीरुबिन का रंग पीला होता है जिसके कारण मल का रंग पील होता है। कोलेस्ट्रॉल को भी मल के साथ कोप्रोस्टीरॉल (Coprosterol) के रूप में उत्सर्जित किया जाता है।
आन्याशय (Pancreas) रस शरीर में खावित पाचक रसों में यह सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। अग्न्याशय रस में निम्न पाचक रस पाये जाते हैं -

  1. ट्रिप्सिनोजन (Trypsinogen): यह निष्क्रिय एन्जाइम है जो ग्रहणी की श्लेष्मिका सतह द्वारा स्रावित एन्टेरोकाइनेज (Enterokinase) एन्जाइम द्वारा सक्रिय ट्रिप्सिन (Trypsin) में परिवर्तित हो जाता है -
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  2. काइमोट्रिप्सिनोजन (Chymotrypsinogen): यह भी निष्क्रिय पूर्व एन्जाइम है जो ट्रिप्सिन के द्वारा सक्रिय काइमोट्रिप्सिन में परिवर्तित होता है -
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    यह दूध के थक्का बनाने हेतु आवश्यक है। उपरोक्त दोनों एन्जाइम ट्रिप्सिन व काइमोट्रिप्सिन प्रोटीन प्रोटिओजेज एवं पेप्पटोन्स को पॉलिपेप्पटाइड्स में परिवर्तित कर देते हैं -
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  3. काबॉक्सिपेप्टाइडेज (Carboxypeptidase): यह भी निष्क्रिय प्रकार का प्रोएन्जाइम है जो ट्रिप्सिन व एन्टेरोकाइनेज के द्वारा सक्रिय किया जाता है।
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    यह कार्बोक्सिपेप्टाइडेज पॉलिपेप्टाइड्स को अमीनो अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं -
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  4. एमाइलेज (Amylase): यह एन्जाइम स्टार्च (मंड) व ग्लाइकोजन को माल्टोज में बदल देता है -
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  5. लाइपेज (Lipase): यह एन्जाइम जल अपघटन द्वारा वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता है।
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  6. न्यूक्लिऐजेज (Nucleases): यह दो प्रकार के होते हैंDNAase 2 RNAase
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ये न्यूक्लिएस न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लियोटाइड और न्यूक्लियोसाइड में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रकार से ग्रहणी में भोजन का लगभग पूर्ण पाचन हो जाता है। पाचक रसों के मिश्रण से भोजन और अधिक तरल हो जाता है तथा अव यह काइल (Chyle) कहलाता है।

(4) इलियम में पाचन (Digestion in Ilium): मनुष्य की इलियम या क्षुद्रान्त्र से आंत्रीय रस (Succus - Entericus or Intestinal Juice) उत्पन्न होता है। यह इलियम में आये हुए भोजन काइल (Chyle) में मिल जाता है। आंत्र रस क्षारीय होता है। अनेक एन्जाइम का मिश्रण होता है जिसकी भोजन पर पाचन प्रतिक्रियाएं निम्नलिखित रूप से होती हैं:

  1. पैप्टिडेजेज (इरेप्सिन): यह प्रोटीओज पेप्पटोन्स तथा पॉलिपेप्टाइड को सरलतम एमीनो अम्ल में बदल देते हैं-
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  2. माल्टेज (Maltase): यह माल्टोज (डाइसैकेराइड) का अपघटन कर उसे ग्लूकोज (मोनोसैकेराइड) में बदल देता है -
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  3. सुक्रेज (Sucrase): यह सुक्रोज (डाइसैकेराइड) को ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज (दोनों मोनोसैकेराइड्स) में अपघटित कर देता है -
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  4. लैक्टेज (Lactase): यह दूध की शर्करा लैक्टोज (डाइसैकेराइड) को ग्लूकोज एवं गेलेक्टोज (दोनों मोनोसैकेराइड्स) में बदल देता है। 
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  5. लाइपेज (Lipase): यह पायसीकृत वसा को सरलतम वसीय अम्लों तथा ग्लिसरॉल में बदल देता है।
    पायसीकृत वसा → वसीय अम्ल + ग्लिसरॉल
  6. न्यूक्लिएज, न्यूक्लिओटाइडेज, न्यूक्लिओसाइडेज: ये क्रमशः न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लिओटाइड्स, न्यूक्लिओटाइइस को न्यूक्लिओसाइड्स एवं फॉस्फेट्स में तथा न्यूक्लिओसाइड्स को नाइट्रोजनी क्षारक एवं शर्करा में बदल देते हैं। इस प्रकार न्यूक्लिक अम्लों का पूर्ण रूप से जल अपघटन हो जाता है। क्षुद्रात्र (lleum) में भोजन का पाचन लगभग पूर्ण होकर इसके लगभग सभी घटक विसरणशील अवस्था में आ जाते हैं।

(5) बृहदांत्र (Large Intestine): इलियम से भोजन (अपचित) वृहदांत्र में आता है जहाँ कुछ लवणों व जल का अवशोषण होता है और भोजन अई ठोस बन जाता है जिसे मल कहते हैं। यह मलाशय में अस्थायी रूप से संग्रहित किया जाता है जिसे समय - समय पर बाहर त्याग दिया जाता है। जठरात्रिक पथ (Gastro - intestinal tract) अथवा आहार नाल में होने वाली विभिन्न गतियों (जैसे क्रमाकुंचन, आमाशय की मंथन गतियाँ, विभिन्न आंशीय गतियाँ इत्यादि) पर स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का नियंत्रण होता है। लार ग्रन्थियों (Salivary glands) द्वारा लार का उत्पादन भी तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित होता है। लार का उत्पादन वास्तव में एक प्रतिवती क्रिया (reflex action) है जो भोजन के देखने अथवा उसकी सुगंध से प्रारम्भ होती है।
इसी प्रकार पाचन रसों पर हारमोन्स का नियंत्रण होता है जो जठरआंशीय भित्ति (Gastro - intestinal wall) द्वारा उत्पन्न होते हैं। यह भित्ति सम्बन्धित क्षेत्र में भोजन की उपस्थिति से हारमोन्स के उत्पादन के लिए प्रेरित होती है।

आमाशय की भित्ति से गैस्ट्टिन (Gastrin) नामक हारमोन उत्पन्न होता है जिसके प्रभाव से जठर ग्रन्थियाँ जठर रस मुक्त करती हैं। ग्रहणी की भित्ति द्वारा एण्टेरोगेस्ट्रोन (Enterogastrone), कोलेसिस्टोकाइनिन (Cholecystokinin), सिक्रिटिन (Secretin), पैन्कि योजाइमिन (Pancreozymin) एवं एन्टे रोकाइनिन (Enterokinin) नामक चार हारमोन्स उत्पन्न किए जाते हैं। एन्टेरोगेस्ट्रोन के प्रभाव से जठर रस का सावण बन्द हो जाता है। कोलेसिस्टोकाइनिन यकृत से पित्त के सवण को प्रेरित करता है, सिक्रिटिन एवं पैन्क्रियोजाइमिन के प्रभाव से आन्याशयी रस का स्रवण होता है तथा एन्टेरोकाइनिन के प्रभाव से ब्रूनर ग्रन्थियों द्वारा आंत्रीय रस को मुक्त किया जाता है।

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प्रश्न 11. 
पाचन तन्त्र के विकार और अनियमितताओं पर लेख लिखिए।
उत्तर:
आहार नाल अथवा आंत्र नलिका (Intestinal tract) का शोथ जीवाणुओं (Bacteria) और विषाणुओं (Virus) के संक्रमण से होने वाला एक सामान्य विकार है। आंत्र संक्रमण परजीवियों जैसे फीता कृमि (tapeworm), गोल कृमि (round worm), सूत्रकृमि (thread worm), हुकवर्म (hook worm), पिनवर्म (pin worm) आदि से भी होता है।
ये विकार निम्नलिखित हैं -
(1) प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण (Protein Energy Malnutrition - PEM)
कुपोषण (Malnutrition) -
दैनिक आहार से शरीर को आवश्यक ऊर्जा तथा पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते हैं तो इस अवस्था को कुपोषण (Malnutrition) कहते हैं।
अथवा 
कुपोषण में प्रोटीन एवं सम्पूर्ण आहार कैलोरी की अल्प मात्रा को ही कुपोषण (Malnutrition) कहते हैं।
कुपोषण की समस्या से कम विकसित देश ग्रसित हैं जैसे दक्षिण एवं दक्षिण - पूर्व एशिया, दक्षिणी अमेरिका तथा पश्चिमी एवं मध्य अफ्रीका। जनसंख्या का एक विशाल भाग सूखा, अकाल एवं राजनीतिक अथवा उथल-पुथल के कारण प्रोटीन ऊजा कुपोषण से प्रभावित है। बंगलादेश में मुक्ति युद्ध एवं अस्सी के दशक में इथोपिया में भयंकर सूखे के कारण ऐसा हो चुका है। प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण (PEM) शिशुओं एवं बच्चों को प्रभावित करता है तथा मरास्मस (Marasmus) एवं क्वाशियोरकॉर (Kwashiorkar) रोग उत्पन्न करता है।

(i) मरास्मस (Marasmus):  यह रोग शिशु में प्रोटीन व कैलोरी दोनों की एक साथ कमी होने के कारण होता है। यह रोग एक वर्ष से कम आयु वाले शिशुओं में होता है। माताएँ अपने शिशुओं को स्तनपान कराना जल्दी बन्द कर देती हैं तथा शिशुओं को कम कैलोरी एवं प्रोटीन न्यूनता वाला आहार दिया जाता है जिसके कारण मरास्मस रोग हो जाता है। कम अन्तराल में पुनः गर्भधारण या शिशु का जन्म होना भी इसका मुख्य कारण है। इस रोग के निम्न लक्षण हैं -

  1. बुद्धि मंद तथा ऊतकों की प्रोटीन का विस्थापन। 
  2. कृशकायी शरीर एवं हाथ-पैर अत्यन्त पतले हो जाते हैं। 
  3. त्वचा शुष्क, पतली एवं झुरींदार हो जाती है। 
  4. वृद्धि दर एवं शारीरिक भार कम हो जाता है। 
  5. मस्तिष्क की वृद्धि एवं विकास भी बहुत अधिक मंद हो जाता हैं।
  6. मानसिक क्षमता भी असन्तुलित हो जाती है। 
  7. आँखें भीतर धंस जाती हैं। 
  8. पसलियाँ बाहर से दिखाई देती हैं। 
  9. बाल झड़ने लगते हैं।

(ii) क्वाशिओरकर (Kwashiorkar): प्रोटीन की अत्यधिक कमी के कारण होने वाले रोग को क्वाशिओरकर कहते हैं। इस प्रकार का रोग एक वर्ष से अधिक आयु वाले शिशुओं में पाया जाता है। माताएँ अपने बच्चों को स्तनपान के स्थान पर उच्च कैलोरी एवं प्रोटीन की न्यूनता वाला आहार देने के कारण बच्चे इस रोग से ग्रसित हो जाते हैं। इस रोग के निम्नलिखित लक्षण हैं -

  1. मांसपेशियाँ लटक जाती हैं। 
  2. हाथ - पैर पतले हो जाते हैं। 
  3. वृद्धि एवं मस्तिष्क का विकास रुक जाता है। 
  4. शरीर के विभिन्न भागों में सूजन तथा पेट आगे निकल जाता है।
  5. त्वचा सूखी, काली और पपड़ीदार हो जाती है। 
  6. रोगी सुस्त एवं कुंठित रहने लगता है। 
  7. बाल पतले, कम तथा लाल या सफेद हो जाते हैं।

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(2) पीलिया (Jaundice): यह जीवाणुओं से होने वाला रोग है। इस रोग में त्वचा और आँखों में पित वर्णकों (Bile pigments) के जमा होने के कारण पीले रंग के दिखाई देते हैं। इस रोग से वकृत (Liver) प्रभावित होता है।

(3) वमन (Vomiting): आमाशय में संग्रहित भोजन का मुख से बाहर निकलना वमन कहलाता है। यह एक प्रतिकृति क्रिया (reflexaction) है जो कि मेड्यूला (Medulla) में स्थित वमन केन्द्र (Vomitcentre) द्वारा नियंत्रित होती है। उल्टी या वमन होने से पहले बेचैनी की अनुभूति होती है।

(4) प्रवाहिका (Diarrhoea): आंत्र में अपसामान्य गति का बार-बार होना तथा मल (Faccal) का अत्यधिक पतला हो जाना ही प्रवाहिका (Diarrhoea) कहलाता है। इसमें भोजन अवशोषण की क्रिया पट जाती है एवं शरीर में पानी की अधिक क्षति होती है।

(5) कब्ज (Constipation): कब्ज में मलाशय (Rectum) में मल रुक जाता है और आंत्र की गतिशीलता अनियमित हो जाती है।

(6) अपच (Indigestion): इस स्थिति में भोजन पूरी तरह से नहीं पचता है और पेट भरा-भरा महसूस होता है। अपच एन्जाइमों के स्रावों में कमी, व्यग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिक भोजन करने (Over eating) एवं मसालेदार भोजन (Spicy food) करने के कारण होती है।

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गये प्रश्न

प्रश्न 1. 
स्तनियों के दाँत होते हैं
(i) भिन्न - भिन्न प्रकार के 
(ii) जबड़े की अस्थि के सॉकेट या गर्त में धंसे होते हैं 
(iii) उत्पत्ति के आधार पर दो प्रकार के होते हैं इन परिस्थितियों को क्या कहते हैं?
अथवा 
खरगोश के दंत होते हैं
(a) हैटरोडॉन्ट, थीकोडॉन्ट, डायफायोडॉन्ट 
(b) थीकोडॉन्ट, हैटरोडॉन्ट, डायफायोडॉन्ट 
(c) डायफायोडॉन्ट, हैटरोडॉन्ट, थीकोडॉर 
(d) हैटरोडॉन्ट, डायफायोडॉन्ट, थीकोडॉर
(e) थीकोडॉन्ट, डायफायोडॉन्ट, हैटरोडॉन्च 
उत्तर:
(a) हैटरोडॉन्ट, थीकोडॉन्ट, डायफायोडॉन्ट

प्रश्न 2. 
निम्नलिखित में से कौनसी जठर कोशिकाएँ अप्रत्यक्ष रूप से रक्ताणु - उत्पत्ति में मदद करती है-
(a) मुख्य कोशिकाएँ 
(b) श्लेष्मा कोशिकाएँ
(c) गोब्लेट कोशिकाएं 
(d) भित्तीय कोशिकाएँ 
उत्तर:
(d) भित्तीय कोशिकाएँ

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प्रश्न 3. 
मानव में प्राथमिक दंतविन्यास, स्थायी दंतविन्यास से इस नाते भिन्न होता है कि प्राथमिक दंतविन्यास में निम्नलिखित कौनसे प्रकार के दाँत नहीं होते हैं
अथवा
एक दो वर्ष के शिशु को क्रीड़ा पाठशाला में प्रवेश दिलाया गया। वहाँ दंत परीक्षण पर दंत चिकित्सक ने पाया कि शिशु के बीस दाँत थे। शिशु के कौनसे दाँत अनुपस्थित थे
(a) प्रीमोलर
(b) मोलर 
(c) इनसाइजर
(d) कैनाइन 
उत्तर:
(a) प्रीमोलर

प्रश्न 4. 
दो दोस्त एक ही मेज पर बैठे साथ - साथ खाना खा रहे हैं। उनमें से एक को कुछ खाना निगलते समय अचानक धसका लगने लगा। यह धसका लगना किस भाग के अनुचित गति के कारण हुआ होगा-
(a) जीभ
(b) इपिग्लॉटिस (कण्ठच्छद) 
(c) डायफ्राम (मध्यपट) 
(d) गर्दन 
उत्तर:
(b) इपिग्लॉटिस (कण्ठच्छद) 

प्रश्न 5. 
यदि किसी कारणवश हमारी गॉपलेट (कलश) कोशिका कार्यविहीन हो जाए तो उससे किस पर हानिकारक प्रभाव पड़ेगा -
(a) अंतड़ियों में से भोजन की सहज गति पर 
(b) सोमैटोस्टैटिन के उत्पादन पर 
(c) सौवेशियस ग्रंथियों से सीबम के खावण पर
(d) शुक्राणुओं के परिपक्वन पर 
उत्तर:
(a) अंतड़ियों में से भोजन की सहज गति पर 

प्रश्न 6. 
एक खरगोश जो चने की बहुत अधिक मात्रा खाता है, तो उसका पाचन प्रारम्भ होता है-
(a) ग्रसिका (Gullet) में 
(b) आमाशय में
(c) छोटी आंत में
(d) मुखगुहा में 
उत्तर:
(b) आमाशय में

प्रश्न 7. 
कॉलम - I को कॉलम - II के साथ सुमेलित कीजिए तथा सही कथन छाँटिए-

कॉलम - I

कालम - II

A. गॉब्लेट कोशिकाएँ

1. एंटीबैक्टीरियल एजेंट

B. लाइसोजाइम

2. म्युकस

C. लार

3. HCl

D. ऑक्सिसेंटिक कोशिकाएँ

4. सबलिनगुअल ग्रंथि


(a) A - 3, B - 1, C - 4, D - 2  
(b) A - 1, B - 3, C - 4, D - 2 
(c) A - 2, B - 3, C - 1, D - 4 
(d) A - 4, B - 1, C - 2, D - 3
(e) A - 2, B - 1, C - 4, D - 3 
उत्तर:
(e) A - 2, B - 1, C - 4, D - 3 

प्रश्न 8. 
किस सतह में ब्रूनर ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं-
(a) आमाशय की सबम्यूकोसा 
(b) इलियम की म्यूकोसा 
(c) ड्यूओडिनम (आमाशय) की सबम्यूकोसा
(d) ग्रसिका की म्यूकोसा 
उत्तर:
(c) ड्यूओडिनम (आमाशय) की सबम्यूकोसा

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प्रश्न 9. 
निम्नलिखित कथनों में से कौनसा गलत है
(a) गॉब्लेट कोशिकाएँ आंत्र के म्यूकोसा में स्थित होती हैं तथा म्यूकस का स्राव करती हैं। 
(b) ऑक्सिन्टिक कोशिकाएँ आमाशय के म्यूकोसा में स्थित होती हैं तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्राव करती हैं 
(c) गुच्छकोष्ठक (ऐसिनस) अग्न्याशय में स्थित होते हैं और कार्योक्सीपेप्टाइडेज का साव करते हैं 
(d) ब्रूनर ग्रंथियाँ आमाशय के सबम्यूकोसा में स्थित होती हैं तथा पेप्सिनोजन का लाव करती हैं 
उत्तर:
(d) ब्रूनर ग्रंथियाँ आमाशय के सबम्यूकोसा में स्थित होती हैं तथा पेप्सिनोजन का लाव करती हैं 

प्रश्न 10. 
शिशु के जठर रस में होते हैं
(a) न्यूक्लिऐज, पेप्सिनोजन, लाइपेज 
(b) पेप्सिनोजत, लाइपेज, रेनिन 
(c) एमाइलेज, रेनिन, पेप्सिनोजन
(d) माल्टेज, पेप्सिनोजन, रेनिन 
उत्तर:
(b) पेप्सिनोजत, लाइपेज, रेनिन

प्रश्न 11. 
निम्नलिखित में से कौनसी संरचना प्रकृदन्यास की वाहिनी के ग्रहणी में खुलने वाले रन्ध्र की देखभाल करती है
(a) अर्धचन्द्राकार कपाट 
(b) त्रिकांच कपाट 
(c) जठरनिर्गम अवरोधिनी 
(d) ओडाई को अवरोधिनी
उत्तर:
(d) ओडाई को अवरोधिनी

प्रश्न 12. 
लीवरकुन - प्रगुहिका की कौनसी कोशिकाएँ एंटीबैक्टीरियल लाइसोजाइम सावित करती हैं-
(a) रजतरंजी कोशिकाएँ 
(b) पैनेथ कोशिकाएँ
(c) जाइमोजिन कोशिकाएँ 
(d) कुष्कर कोशिकाएँ 
उत्तर:
(b) पैनेथ कोशिकाएँ

प्रश्न 13. 
फ्रक्टोज का अवशोषण आंत की म्यूकोसा कोशिकाओं में से होकर रक्त में किस क्रियाविधि के द्वारा होता है
(a) सामान्य विसरण 
(b) सह परिवहन क्रियाविधि
(c) सक्रिय परिवहन 
(d) सुसाध्य परिवहन 
उत्तर:
(d) सुसाध्य परिवहन

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण
 

प्रश्न 14. 
यदि किसी कारणवश आहार - नाल के एपिथीलियम की पैराइटल कोशिकाएँ आंशिक कार्यविहीन हो जाएँ तो क्या हो सकने की सम्भावना होगी
(a) अग्नाशयी एंजाइम, विशेषत: ट्रिप्सिन तथा लाइपेज ठीक से कार्य नहीं कर पाएंगे 
(b) आमाशय का pH एकदम नीचे गिर जाएगा 
(c) स्टीएपिसन अधिक कार्यक्षम हो जाएगा 
(d) प्रोटीन्स का पेप्सिन द्वारा प्रोटियोजेज तथा पेप्टोन्स में पर्याप्त जल अपघटन नहीं हो पाएगा 
उत्तर:
(d) प्रोटीन्स का पेप्सिन द्वारा प्रोटियोजेज तथा पेप्टोन्स में पर्याप्त जल अपघटन नहीं हो पाएगा 

प्रश्न 15. 
निम्नलिखित में से कौनसा एक एन्जाइम है जो मानवों में दूध के पाचन में आरम्भिक चरण को अंजाम देता है
(a) केसीन
(b) रेनिन 
(c) पेप्सिन
(d) केसीनोजन 
उत्तर:
(b) रेनिन 

प्रश्न 16. 
निम्न में कौनसा विकल्प अग्नाशयी रसों के संयोजन को सर्वाचित रूप से दर्शाता है
(a) एमाइलेज, पैप्टीडेज, ट्रिप्सिनोजन, रेनिन 
(b) एमाइलेज, पेप्सिन, ट्रिप्सिनोजन, माल्टेस 
(c) पैप्टीडेज, एमाइलेज, पेप्सिन, रेनिन
(d) लाइपेज, एमाइलेज, ट्रिप्सिनोजन, प्रोकार्बोक्सीपैप्टीडेज 
उत्तर:
(d) लाइपेज, एमाइलेज, ट्रिप्सिनोजन, प्रोकार्बोक्सीपैप्टीडेज 

प्रश्न 17. 
मानवों में जिस समय अग्नाशय रस ड्युओडिनम (ग्रहणी) में छोड़ा जा रहा होता है, तब उनमें निम्नलिखित में से कौनसा एक रेचक मौजूद होता है-
(a) ट्रिप्सिन
(b) एंटेरोकाइनेज 
(c) ट्रिप्सिनोजेन
(d) काइमोट्रिप्सिन 
उत्तर:
(c) ट्रिप्सिनोजेन

प्रश्न 18. 
निम्न में से कौनसा हॉर्मोन पेंक्रियाटिक रस एवं बाइकार्बोनेट के उत्पादन को प्रेरित करता है-
(a) इन्सुलिन 
(b) सिक्रिटिन और कोलीसिस्टोकाइनिन 
(c) ग्लूकेगॉन 
(d) सिक्रिटिन
उत्तर:
(b) सिक्रिटिन और कोलीसिस्टोकाइनिन 

प्रश्न 19. 
निम्नलिखित कथनों में से कौनसा एक सही नहीं है
(a) रेटिनल विटामिन C का व्युत्पन्न है। 
(b) रोडोप्सिन बैंगनी लाल प्रोटीन है जो केवल शलाकाओं में ही उपस्थित होता है 
(c) रेटिनल दृष्टि प्रकाश - वर्षक का प्रकाश अवशोषण करने वाला भाग है 
(d) रेटिना में प्रकाश - वर्णक रोडोप्सिन शलाकाओं में होता है जबकि शंकओं में तीन प्रकार के प्रकाशवर्णक होते हैं। 
उत्तर:
(a) रेटिनल विटामिन C का व्युत्पन्न है। 

प्रश्न 20. 
निम्न में से किसकी मनुष्य के शरीर में न्यूनतम मात्रा में आवश्यकता होती है
(a) आयरन, आयोडीन, कार्बन, मैंगनीज, कॉपर, ऑक्सीजन 
(b) आयरन, आयोडीन, मैंगनीज, कॉपर, जिंक, फ्लोरीन 
(c) आयरन आयोडीन, मैंगनीज, जिंक, हाइड्रोजन
(d) नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, जिंक, फ्लोरीन 
उत्तर:
(b) आयरन, आयोडीन, मैंगनीज, कॉपर, जिंक, फ्लोरीन 

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

प्रश्न 21. 
एक गर्भवती स्त्री ने एक ऐसे बच्चे को जन्म दिया जो अल्पविकसित वृद्धि, मानसिक मंदता, निम्न बौद्धिक मापदण्ड एवं असामान्य त्वचा से ग्रस्त है। ऐसा किसके कारण हुआ
(a) पार्स डिस्टैलिस के अतिस्त्रावण से 
(b) आहार में आयोडीन की कमी से 
(c) वृद्धि हॉर्मोन के अल्प मात्रा में खावण से
(d) थायरायड ग्रंथि के कैंसर से। 
उत्तर:
(b) आहार में आयोडीन की कमी से 

प्रश्न 22. 
प्राणी जगत में पाया जाने वाला सर्वाधिक प्रचुर प्रोटीन कौनसा होता है-
(a) ट्रिप्सिन
(b) हीमोग्लोबिन 
(c) कोलैजेन
(d) इंसुलिन 
उत्तर:
(c) कोलैजेन

प्रश्न 23. 
दूध के दही में रूपान्तरण से इसकी अच्छी पोषक क्षमता किसकी वृद्धि के कारण होती है
(a) विटामिन D 
(b) विटामिन A
(c) विटामिन B12 
(d) विटामिन E 
उत्तर:
(c) विटामिन B12 

RBSE Class 11 Biology Important Questions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

प्रश्न 24. 
मानव शरीर में कुछ खास सहजीवी सूक्ष्मजीव सामान्यतः कहाँ पाये जाते हैं-
(a) अंधनाल (सीकम) में 
(b) मुख गुहा के अस्तर तथा जीभ की सतह पर 
(c) कृमिरूप परिशेषिका तथा मलाशय में
(d) ग्रहणी (डुओडीनम) में। 
उत्तर:
(a) अंधनाल (सीकम) में 

प्रश्न 25. 
एक ट्राईग्लिसराइड के अणु में होते हैं अथवा एक प्रारूपी वसा का अणु किसका बना होता है-
(a) तीन वसीय अम्ल व एक ग्लिसरॉल अणु 
(b) तीन वसीय अम्ल व दो ग्लिसरॉल अणु 
(c) दो वसीय अम्ल व दो ग्लिसरॉल अणु 
(d) एक वसीय अम्ल व एक ग्लिसरॉल अणु
उत्तर:
(a) तीन वसीय अम्ल व एक ग्लिसरॉल अणु

प्रश्न 26. 
कॉलम - I में दिए गए मानवों के पाचन - उत्पादों तथा कॉलम - II में दिए गए अवशोषण - स्थल एवं अवशोषण-प्रणाली के सही मिलान को चुनिए-

कॉलम - I

कॉलम - II

(a) कोलेस्ट्रॉल, माल्टोज

बड़ी आंत्र, सक्रिय अवशोषण

(b) ग्लाइसिन, ग्लूकोज

छोटी आंत्र, सक्रिय अवशोषण

(c) फ्रक्टोज, Na+

छोटी आंत्र, निष्क्रिय अवशोषण

(d) ग्लिसरॉल, वसा अम्ल

ग्रहणी, काइलोमाइक्रॉन के रूप में गति करते हैं


उत्तर:

(b) ग्लाइसिन, ग्लूकोज

छोटी आंत्र, सक्रिय अवशोषण

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प्रश्न 27. 
अच्छी दृष्टि, कैरोटीन प्रचुर खाद्य पदार्थों के अन्तर्ग्रहण पर निर्भर करती है। निम्न में सर्वोचित कथन का चयन कीजिए
(a) कैरोटीन से विटामिन A के व्युत्पन्न बनते हैं 
(b) प्रकाशवर्णक आन्तरिक खण्ड की झिल्लिका बिम्ब में गड़े हुए होते हैं
(c) रेटिनल विटामिन A का व्युत्पन्न है
(d) रेटिनल सभी दृष्टि प्रकाशवर्णकों का प्रकाश अवशोषी भाग है
विकल्प: 
(a) (A) एवं (B)
(b) (A), (C) एवं (D) 
(c) (A) एवं (C)
(d) (B), (C) एवं (D)
उत्तर:
(b) (A), (C) एवं (D) 

Bhagya
Last Updated on Aug. 20, 2022, 2:10 p.m.
Published Aug. 19, 2022